लेखक सुदीप की बेटी, बिंदिया हलौअर  द्वारा पुरवाई ऑनलाइन
पत्रिका के लिए प्रस्तुतिकरण

कहानी संग्रह अनहद नाद
अनहद नाद 12 कहानियों का संग्रह है. लेखक सुदीप की यह कृति अनहद नाद, मुंबई जैसी महानगरी जीवन की पड़ताल करती हैं.
लेखक सुदीप की कहानियाँ  मात्र सामाजिक न होकर इस समाज में जीने वाले मनुष्य की आत्मिक संकुलता की कहानियाँ हैं. पात्र पिघल कर अदृश्य हो जाते हैं और सामने रह जाता है समय और उसके बीच जीते हुए मनुष्य के प्रश्न ओर प्रश्नों का उत्तर मांगती हुई आवाज़ें.
इस कहानी संग्रह का पहला पेपर संस्करण 2002 में प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रकाशित किया गया था.
पुरवाई से विशेष घोषणा
अनहद नाद ई-बुक फॉर्मेट में जुलाई 2023 में विश्व में रिलीज होगी.
ई-बुक उपलब्धता तिथि और संबंधित जानकारी पर मूल्यांकन करने के लिए कृपया www.writersudeep.com वेबसाइट देखें.
कहानी अंश
अनहद नाद्
शहर बड़ी अजीब चीज है । उससे भी अजीब हैं यहाँ के लोग-खास तौर पर बुद्धिजीवी कहे जानेवाले जीव । सूरज ढलते ही इन्हें अपनी कड़कड़ाती हड्डियों और तनी हुई शिराओं के लिए दारू-दवा की जरूरत महसूस होने लगती है-दवा की कम, दारू की ज्यादा । और फिर तीन-तीन पेग अन्दर उतर जाने के बाद उनकी चिन्ताएँ जाग्रत होने लगती हैं। “कमाल है न! शहर में कई-कई गाँव बसते हैं – गाँवों से भी बदतर गाँव । फिर भी हर रोज हजारों लोग अपने गाँव छोड़-छोड़कर शहर आते रहते हैं । क्या उन्हें कोई नहीं बताता कि शहरों में बसे गाँवों की हालत कितनी खराब है? गन्दगी, बदबू, बीमारी, बदमाशी, गुण्डागर्दी – क्या ये सारी चीजें गाँव की जिन्दगी से बेहतर जिन्दगी के सपनों का आधार हैं?” एक बहकता है, तो दूसरा उसके सुर में सुर मिला देता है, “मरना ही है, तो लोग अपने गाँवों में, घरों में, खेतों में काम करते हुए, बड़े किसानों की मार सहते हुए, ऊँचे लोगों की कठोर रूढ़ियों का पालन करने के प्रयास में, अपने लोगों के बीच ही क्यों नहीं मर जाते? शहरों में बसे गाँवों में तो कोई उनकी मिट्टी उठानेवाला भी नहीं होता । जैसे कोई आवारा कुत्ता-बिल्ली मर गया, वैसे ही ये भी मर गए। क्या ये स्वजनों-परिचितों के बीच मरना सिर्फ इसलिए बेहतर नहीं समझते, क्योंकि उससे उनकी हेठी होती है? क्या वे इतना भी नहीं समझते कि जब कोई गाँववासी शहर में मरता है, तो गाँव की आत्मा मरती है, एक आकांक्षा मर्ती है, एक सपना मरता है…और इन सारी चीजों की मौत से ही तो शहर का शरीर सुगठित होता है।” यह सुन्दर, मोहक शब्दावली तीसरे को अभिभूत कर लेती है, “शहर एक दैत्य है, जिसे सिर्फ खून चाहिए। बड़ा प्यासा है यह दैत्य । इसकी प्यास कभी नहीं बुझती, यारो, कभी नहीं बुझती…”
और एक कहानी जन्म लेने लगती है…
इस महानगर में एक गाँव था, जो अब देश के लाखों गाँवों की तरह उजड़ चुका है – उजड़ चुका है उन लोगों के लिए जो इसमें कभी रहते थे। अब उनमें से बहुत-से मर चुके हैं, जो बचे हैं, वे अपने टीन के बक्से और कथरियाँ उठाकर दूसरे गाँवों में जा बसे हैं । उनके लिए उनका गाँव उजड़ गया, लेकिन शहरवालों के लिए वह बस गया है, आबाद हो गया है और खुशहाल है, क्योंकि अब वहाँ गाँव नहीं है, शहर का एक हिस्सा है । दैत्य के विशाल शरीर का एक रोआँ है । यह गाँव बड़ा अजीब था । न कोई गली, न कोई मकान । सड़क के किनारे बेतरतीब टीन की दीवारें । ऊपर कैन्वस या बोरों का छाजन । एक तरफ बहुत चौड़ा, सड़ांधभरे काले कीचड़ से भरा नाला । सड़क और झोंपड़ों के बीच की कच्ची जमीन पर हर जगह हर वक्त हगने-मूतनेवाले बच्चे । मर्द सुबह नाले के किनारे दिशा-फराखत के लिए जाते थे, औरतें सूरज ढलने पर सड़क के किनारे-किनारे बैठ जाती थीं । कभी दिन में जरूरत पड़ती, या कोई पेट की किसी बीमारी का शिकार होती, तो वह पानी के डिब्बे के साथ पुरानी छतरी भी ले जाती । छतरी को खोलकर सामने रख लेने से लाज-शरम ढँकी रहती । छतरी न हो तो सड़क की तरफ पीठ करके तो बैठा ही जा सकता था ।
सड़क और झोंपड़ियों के पीछे दलदलवाला हिस्सा था  । उसमें कई तरह की झाड़ियाँ उगी हुई थीं। जब समन्दर में ज्वार आता था, तो खारा पानी कई बार दलदल तक भी आ पहुँचता था । दलदल खतरनाक था । कोई भटका हुआ कुत्ता या मरियल जानवर उधर जा निकलता था तो फिर लौटकर नहीं आता था । अक्सर डोम लोग मरे हुए जानवरों को दलदल के किनारे ले आते थे और उनकी खाल उतार कर बाकी बचा पिंजर दलदल में डाल जाते थे । कई बार जल्दबाजी में पिंजर दलदल के किनारे भी छोड़ दिए जाते थे । तब चील-कौओं और गिद्धों की बन आती थी । सड़ते हुए हाड़-मांस की बू माहौल में फैली रहती थी, लेकिन उस गाँव के लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि नाले की सड़ांध उस बू से कहीं ज्यादा तीखी थी और महानगर के बीच बसे उस गाँव के वासी उसके आदी हो चुके थे। 
दलदल के किनारे की जमीन ही वह जगह थी, जहाँ इस गाँव के बच्चे खेल सकते थे । यहीं कंचे-कौड़ियाँ खेले जाते थे, यहीं पतंगें उड़ा ली जाती थीं, यहीं किनारे के एक पेड़ पर चढ़-उतर कर बन्दरों की – सी उछल-कूद कर ली जाती थी । कभी-कभार किसी के हाथ ताश के पत्ते लग जाते, तो बच्चे अपने बनाए खेल भी खेल लेते । कभी-कभार कुश्ती हो जाती । ये खेल तब तक चलते रहते, जब तक बच्चों के माँ-बाप काम से न लौट आते-और माँएँ ईंटों से बने चूल्हे जला कर चावल, दाल और सस्ते में मिला बचा-खुचा गोश्त, केंकड़े, मछली, झींगा या सिर्फ प्याज का रस न पकाने लगतीं।
इस गाँव का रूप राष्ट्रीय था । दक्षिण भारतीय भी उसी तरह इसमें रहते थे,जैसे उत्तर भारतीय, पूर्व भारतीय या पश्चिम भारतीय । वे आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सब प्रदेशों के सब तरह के गरीब गाँवों से आए थे । उनमें ब्राह्मण भी थे, शूद्र भी, मुसलमान भी थे, सिख भी – और उन्होंने बस्ती के बीचोंबीच अपने-अपने पूजास्थल भी बना लिये थे – एक हनुमान चौरा था, जहाँ स्त्रियाँ और पुरुष मंगलवार और शनिवार को “संकट मोचन नाम तिहारो” गाते थे, लकड़ी का एक छोटा-सा क्रॉस था, जहाँ हर रोज कोई न कोई मोमबत्ती जला जाता था, एक छोटी-सी मस्जिद भी थी, जिसकी छोटी-छोटी मीनारें थीं । समस्या सिर्फ एक ही थी: इन पूजास्थलों का आकार इतना छोटा था कि उनके अन्दर प्रवेश करने के लिए आदमी को फुटों का नहीं, इंचों का बनना पड़ता । फिर भी, जैसा कि बस्ती के एक बुजुर्ग का कहना था, “सड़क के बाशिंदों के लिए उसी ईश्वर की जरूरत है जो सड़क पर रहता हो । उस ईश्वर का हमें क्या करना जो महलों जैसे पूजास्थलों में रहता हो, मखमल के बिछौनों पर सोता हो और गरीब की आहों और चीखों से नहीं, संगीतभरी अजानों और आरतियों से जागता हो !
जाहिर है, उस बुजुर्ग को बस्ती के लोगों ने नीम-पागल करार दे दिया था, हालाँकि जब बस्ती के सारे काम करने लायक स्त्रियाँ और मर्द अपने-अपने काम पर चले जाते थे, तो वही बुजुर्ग अशक्तों और रोगियों की देखभाल करता था और बच्चों पर भी निगरानी रखता था और उन्हें दलदल की तरफ जाने से रोकता था । वैसे यह बात अलग है कि बच्चे उसकी बात तब तक नहीं सुनते थे, जब तक वह उन्हें बहलाने के लिए सस्ती खट्टी-मीठी गोलियाँ नहीं देता था या उनके लिए नये-नये खेलों का आविष्कार नहीं करता था ।
इस बस्ती के सारे लोग मजदूर थे । समन्दर के किनारे एक बहुत बड़ी कॉलोनी बन रही थी और सबके-सब वहाँ इमारतें बनाने के लिए ईटें और गारा ढोने का काम करते थे । बनती हुई इमारतों के बीच वे सिर्फ मजदूर थे- बेनाम- बेपहचान । बस्ती में लौटकर आने पर ही उन्हें अपने नाम का ध्यान आता था, क्योंकि बच्चों के बीच आते ही वे माँ, बाप, चाचा, भाई, नाना वगैरह बन जाते थे ।
बच्चों को इन माँ-बाप, भाई-बहन, चाचा, मामा, नाना-दादा की दिन की जिन्दगी से कोई सरोकार नहीं था । उन्हें सरोकार था, सिर्फ दो वक्‍त की रोटी से और अपने खेलों से । बदन पर पूरे कपड़े हैं या नहीं, रात को सोने के लिए कोई टाठ का टुकड़ा भी है या नहीं- इस बात की ज्यादा चिन्ता उन्हें नहीं सताती थी । वे तो इस बात से भी बेखबर रहते थे कि उन्हें कभी बड़े भी होना है ।
झोंपड़ों और दलदल के बीच के उस छोटे-से जमीन के टुकड़े का बच्चों के लिए बड़ा महत्त्व था । यह टुकड़ा उनका खेल का मैदान था, युद्ध का मैदान था, जलसे-जुलूस का मैदान था, नारे लगाने का मैदान था, बाजीगरी और कीर्तन का मैदान था- और उनके ये खेल वक्‍त के साथ-साथ और माहौल में फैली हवा के मुताबिक बदलते रहते थे । जो कुछ वे सड़क पर देखते-सुनते थे, उसी को वे अपने साम्राज्यमें दोहराने लगते थे। नया कुछ नहीं होता था, तो पेड़ के पत्तों के खरगोश बनाने, दुकान लगाने, बांस की खपच्चियों की सीटियाँ बनाने आदि के खेल तो होते ही थे । 
मीरू इन खेलों में सबसे आगे होता था ।
मीरू बच्चों में सबसे बड़ा नहीं था, सबसे ज्यादा समझदार भी नहीं था । वह सबसे ज्यादा चुस्त और फुर्तीला जरूर था । दलदल के आसपास उड़नेवालों बर्रों के डंक निकालने में वह बड़ा होशियार था । डंक निकालकर बर्रों की धागे-सी कमर में धागा बाँधकर वह दूसरे बच्चों को थमा देता और दूसरे बच्चे उन्हें पतंगों की तरह उड़ाते फिरते । सड़ी हुई टहनियों की गाड़ियाँ बनाने में भी वह किसी शिल्पी से कम नहीं था । लेकिन उसका सबसे ज्यादा प्रिय खेल था कनकौए लूटना । उसने कहीं से एक फटा हुआ बॉँस प्राप्त कर लिया था और उसके एक सिरे पर एक सूखी हुई कँटीली झाड़ी बाँध ली थी । दूर से आती कोई भी कटी हुई पतंग उसके इस “अटकेसे बच नहीं पाती थी । अगर कभी कोई पतंग दलदल के किनारे के पेड़ में अटक जाती, तो वह बन्दरों की तरह पेड़ पर चढ़ जाता, और पतंग उतार लाता । मीरू के बारे में एक खास बात यह थी कि वह पतंग खुद कभी नहीं उड़ाता था । जो पतंग वह लूटता, दूसरे बच्चों को दे देता । इसीलिए वह बस्ती के बच्चों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय भी था ।
मीरू के माँ-बाप इस बस्ती में नहीं रहते थे । एक दिन अचानक वह इस बस्ती में नमूदार हो गया था और उसी दिन से बस्ती का चहेता बन गया था । बच्चे उससे उसके माँ-बाप के बारे में पूछते भी थे, तो वह कुछ नहीं बताता था । इसलिए उसके बारे में तरह-तरह के किस्से भी प्रचलित हो गए थे ।
कोई उसके बारे में यह कहता कि वह किसी गाँव से भागकर आया हुआ छोकरा है और वह सोचता है कि एक दिन वह फिल्‍मी हीरो बन जाएगा । 
कोई दूसरा कहता कि वह किसी बड़े घर की बेटी की नाजायज औलाद है, जो उसके पैदा होते ही उसे गटर में फेंक आई थी और वह बड़ा होकर भी गटर का कीड़ा ही बनेगा ।
कुछ लोगों का यह भी कहना था कि उन्होंने उसे पहले भी कहीं देखा है । (वैसे यह बात कहना सबसे ज्यादा आसान भी था, क्‍योंकि सड़कों पर पलनेवाले लाखों-लाख बच्चे देखने में लगभग एक-से ही लगते हैं ।) ऐसे लोगों का विश्वास था कि उसके माँ-बाप ने गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर ली होगी, या उनकी झोंपड़ी को रात में किसी ने अन्य झोंपड़ियों के साथ जला दिया होगा और मीरू किसी तरह बच गया होगा ।
कुछ ऐसे भी लोग थे जो यह मानते थे कि मीरू किसी रण्डी की औलाद है । 
मीरू को इन सारी कहानियों का पता था, लेकिन वह अपने बारे में किसी को कुछ नहीं बताता था । कोई औरत या बूढ़ा या उसका कोई हमउम्र उससे पूछ लेता कि उसका नाम मीरू किसने रखा, तो वह इतना ही कह देता-“किसी ने नहीं । मइं खुद ही रखा।” 
मीरू के मजहब, उसकी जात का किसी को कुछ पता नहीं था, इसलिए वह बस्ती में बने मन्दिर, मस्जिद, गिरजे में कहीं भी जा सकता था- हालाँकि वह वहाँ सोच-समझ कर कभी नहीं जाता था। अक्सर तो यही होता था कि किसी कटी हुई पतंग के पीछे, ऊपर को मुँह उठाए वह भाग रहा होता और रास्ते में ईश्वर का कोई घर पड़ जाता । ऐसे में वह अन्दाज से ही उन घरोंको फलांग कर आगे निकल जाता । इस बात की उसे कोई परवाह नहीं थी कि दारू के नशे में धुत पड़ा कोई बूढ़ा या केंकड़े छीलती कोई औरत उसे कोसने देने लगी है । उसकी बेपरवाही के लिए उसके पीछे भागती बच्चों की टोली भी काफी हद तक जिम्मेदार होती थी, जिनके लिए प्रभु के उन घरौंदों-से घरों का महत्त्व इतना ही था कि मंगल, शनि, ईद, दीवाली वगैरह पर वे उन्हें कुछ खील-बताशे या मिठाई दिलवा देते थे ।
वैसे मीरू की अपनी एक खासियत और भी थी । जितनी कहानियाँ उसके अपने बारे में बस्ती में प्रचलित थीं, उनसे कहीं ज्यादा वह बस्तीवालों की कहानियाँ सब बच्चों को सुनाता रहता था – बच्चों को उन कहानियों के मानी समझ में आते थे या नहीं, यह दीगर बात है । मीरू उन्हें बताता कि फलाँ चचा की बीवी अपनी जवान बेटी को बहुत पीटती और गालियाँ देती है, क्योंकि वह कई-कई दिन तक घर से गायब रहती है और वह जब भी लौटती है, उसके पास एक-न-एक नया कपड़ा और खूब सारे पैसे होते हैं। चाची कपड़ा और पैसे पहले ले लेती है, मार और गालियों का सिलसिला बाद में शुरू करती है…दिन भर चिंघाड़ती रहनेवाली मशीनों के खामोश हो जाने के बाद लालटेनों और चूल्हों की आग की रोशनी के बीच रेल की पटरी का टुकड़ा हाथ में लेकर उसे जोर-जोर से टुनटुनाने वाला और आल्हा गानेवाला फेंकू दरअसल दिन भर ईटें ढोने के बजाय मुकादम के साथ लगा रहता है और उसे बस्ती की सारी औरतों की खूबियाँ बताता रहता है…मुकादम को कोई ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज करवाने से वह शरमाता है- इसीलिए जब एक दिन बस्ती में एक डॉक्टर आया था, तो पहले तो उसने डॉक्टर को भगाने की कोशिश की थी, फिर खुद कहीं भाग गया था और डॉक्टर बस्ती की तीन-चार औरतों को इलाज के लिए अपने साथ अस्पताल ले गया था…इमारतें बनवाने वाला सेठ एक दिन बस्ती वालों को बैटरी से चलने वाला टी.वी. भी दे गया था । उस हँसती-बोलती-गाती तस्वीरोंवाले डिब्बे ने बस्तीवालों को इतना मोह लिया था कि उन्हें होश ही नहीं रहता था कि जब वे झुण्ड बनाए उसके सामने बैठे होते थे तो कौन-सी औरत या लड़की चन्द घण्टों के लिए वहाँ से गायब हो जाती थी और कब वह लौट कर अपनी झोंपड़ी में सो भी जाती थी… 
मीरू के पास इस तरह की कहानियों की कमी नहीं थी, लेकिन उसके हमउम्रों को इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे दिन भर अपने खेलों में डूबे रहते । लड़कों में धींगामुश्ती, कबड्डी, कंचे-गोली, ढिबरी आदि के खेल चलते रहते । लड़कियाँ चीथड़ों के गुड्ढे-गुड़ियों के ब्याह रचाती रहतीं । कभी-कभार लड़के-लड़कियाँ नयी बन रही इमारतों के बिना दीवारों-सीढ़ियों के ढाँचों में आँखमिचौली भी खेलते रहते- खासतौर पर बारिश के मौसम में, जब इमारतें बनाने का काम लगभग रोक दिया जाता । उनकी माँएँ उनके नाम ले-लेकर उन्हें पुकारती रहतीं, लेकिन बच्चे जैसे सुनकर भी अनसुनी कर देते । 
इमारतें बनती जा रही थीं । सड़क की तरफ के पेड़ कटते जा रहे थे । मीरू के करतब भी पेड़ों के कटने के साथ-साथ बदलते जा रहे थे । पहले कोई पतंग कटकर किसी पेड़ की फुनगी में अटकती थी, तो वह बन्दर की-सी फुरती से पेड़ पर चढ़ जाता था और कटी हुई पतंग को उतार लाता था और किसी बच्चे के हाथ में थमा देता था । अब पेड़ नहीं बचे थे । पतंगें अब ज्यादातर आकर दलदल में गिर जाती थीं । पेड़ न रहने से पत्तों के खरगोश ब़नाना भी कम हो गया था । अब उसकी जगह उड़ते हुए कागजों के टुकड़ों के हवाई जहाज ज्यादा बनने लगे थे । बच्चे उन्हें हवा में उछालते और वे अक्सर दलदल में जा गिरते । फिर भी बच्चों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी । वे जानते थे, मीरू उनके लिए कोई-न-कोई नया खेल जरूर खोज निकालेगा ।
दिन, हफ्ते, महीने गुजरते गए । इमारतें बनती गईं । बस्ती के बीचोंबीच पहले सड़कें बनाने के लिए गड्ढे खोदे गए, फिर उनमें पत्थर भर दिए गए । अब बच्चों को एक नया खेल मिल गया । वे उन पत्थरों पर ऐसे छलाँगें लगाते रहते जैसे वे रामजी की सेना के बन्दर हों और मीरू उनका हनुमान । फिर पत्थरों को कूट-कूट कर छोटा कर दिया गया । उन पर रोडरोलर चलने लगा । कोलतार के बड़े-बड़े ड्रम पिघलाए जाने लगे । सड़कें बनने लगीं । उन दिनों मीरू और उसकी पलटन शाम होते ही पुराने टायरों और सीमेण्ट की फटी बोरियों की होली जला कर बैठ जाते । उस होली को कूदकर फाँदना एक नया खेल बन गया । यह खेल खतरनाक था । मीरू के अलावा दो-तीन लड़के ही इसमें हिस्सा लेते थे । बाकी बच्चे आसपास बैठे सिर्फ तमाशा देखते रहते थे ।
सड़कें बन गई । इमारतों के आसपास पक्का फर्श बनाया जाने लगा । लॉन्स के लिए जगह छोड़कर दीवारें बनाई जाने लगीं । दलदल की तरफ भी एक दीवार बन गई बच्चों के खेल कम होते गए । यह स्वाभाविक भी था । बच्चे जानते थे, अब कुछ ही दिनों में उन्हें यहाँ से चल देना होगा-किसी और इलाके में, जहाँ नयी इमारतों के लिए जमीन की खुदाई शुरू होगी, उनके माँ-बाप, बुजुर्ग वहाँ काम करने लगेंगे ।
एक दिन बिजली कर्मचारी आए । उन्होंने खम्भे गाड़ना शुरू कर खम्भों पर तार भी लगा दिए गए । इमारतों में बिजली की फिटिंग पहले ही हो चुकी थी । अब दो-चार दिन-या हफ्ते भर के लिए जगमगाते लट्टूओं की रोशनी के दायरों के नीचे बच्चों को गोल-गोल घूमने का मौका मिल जानेवाला था । ऐसे दिनों में पल में लम्बी होती और पल में सिकुड़ कर उनके पैरों के पास सिमटती उनकी परछाइयाँ उन्हें विचित्र रोमांच का आभास देने लगतीं । वे इस बात से बेखबर खुश होते रहते कि रोशनी उनकी अपनी हो-न-हो, छोटी-बड़ी होती उनकी परछाईं  तो अपनी है ।
फिर वह रात भी आ गई, जब मुकादम ने मजदूरों को बताया कि यहाँ अब उनकी जरूरत नहीं है, कल से उन्हें दूसरी-दूसरी जगहों पर चले जाना है ।
बूढ़े और अधेड़ इमारतों को आसमान की तरफ सिर उठाता देखते रहे । उन्हें सन्‍तोष था कि उन्होंने साल-सवा साल में बंजर जमीन में ऊँची-ऊँची इमारतों की फसल उगा दी है । जवान उन इमारतों को देखकर कूढ़ते रहे और अपने सिर पर छोटी-मोटी छत का ख्वाब देखने के खयाल से आक्रोश से भरते रहे । बच्चे खेलते-खेलते थककर सो गए । माँएँ खाना बनाकर उन्हें जगाने की नाकाम कोशिश करती रहीं ।
मीरू चुपचाप बैठा था । सबसे दूर । थोड़ी देर बाद एक लड़की उसके पास आई । साथ खेलनेवालों में वह भी एक थी । वह चुपचाप उसके पास आकर बैठ गई ।
“तेरा छोटा भाई कहाँ है?” मीरू ने पूछा ।
“सो गया ।”
मीरू ने उसके भाई को कई बार पतंग लूटकर दी थी । पर उसने न तो कभी लड़की का नाम पूछा था, न उसके भाई का ।
“तेरा नाम क्‍या है?” उसने पूछ लिया । 
“सुब्बू…”
फिर दोनों खामोश बैठे रहे ।
“कल हम चले जाएँगे,” सुब्बू बोली । “तू कहाँ जाएगा?”
“कहीं भी…ये शहर भोत बड़ा है-है न?”
“हमारे साथ नईं जाएँगा?”
“क्या मालूम!”
फिर दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई ।
अगले दिन सुबह से ही मजदूर वहाँ से चलने की तैयारियाँ करने लगे । मीरू दूर-दूर रहकर ही सबको देखता रहा । फिर उसे सुब्बू और उसका भाई नजर आ गए । उसे लगा, वे दोनों उसी की तरफ आ रहे हैं ।
अचानक एक पतंग कटकर कहीं से आई । वह दलदल की तरफ जा रही थी-या उसके थोड़ा-सा इस पार । मीरू उसकी दिशा में भाग खड़ा हुआ ।
“मीरू, पतंग! मीरू, पतंग!” कहता सुब्बू का भाई भी पीछे भागा ।
पतंग बिजली के खम्भे पर आकर अटक गई थी । मीरू उसी तरह, बन्दरों के-से अन्दाज में, खम्भे पर चढ़ने लगा, जैसे वह पेड़ पर चढ़ जाया करता था ।
सुब्बू का भाई तब तक खम्भे के नीचे आ पहुँचा था । सुब्बू थोड़ा दूर रह गई थी, मगर वह पतंग और मीरू को देख सकती थी ।
मीरू ने पतंग की उलझी हुई डोर को सुलझाने के लिए हाथ आगे बढ़ाए । कोई आवाज नहीं हुई । बस हाथ आगे ही बढ़े रह गए और वह तारों के साथ ऐसे चिपक कर रह गया, जैसे उसके निक्कर को किसी दैत्य ने पीछे से खींच लिया हो ।
सुब्बू की चीख मीरू की चीख की ही तरह उसके गले में ही अटक कर रह गई…
शहर में कई गाँव बसते हैं, इन गाँवों में लोग आते-जाते रहते हैं, वे काम करते हैं, खाते हैं, सोते हैं, रोते हैं, कभी-कभी हँस भी लेते हैं, पूजाघर बना कर अपने-अपने भगवान को पूजते हैं, गला फाड़-फाड़कर उस भगवान को बुलाते रहते हैं, मर जाते हैं । लेकिन इस शहर को खबर ही नहीं कि उसके किसी गाँव में एक लड़की, जिसका नाम सुब्बू है-शुभलक्ष्मी-अब कभी बोल नहीं पाएगी । क्योंकि एक खूँखार दृश्य हमेशा उसके जेहन में अटका रहेगा और एक दमघोंटू चीख उसके गले में अपने पंजे गड़ाती रहेगी…

वैयक्तिक
सुदीप का जन्म 1 अप्रैल, 1942 को अविभाजित भारत के गोजरामंडी, पंजाब में हुआ था। 25 जून, 2020 को मुंबई, भारत, में स्वर्गवासी हो गए।
शिक्षा
बैचलर ऑफ़ आर्ट्स, आगरा यूनिवर्सिटी
मास्टर ऑफ़ आर्ट्स इंग्लिश, दिल्ली यूनिवर्सिटी
पेशेवर कैरियर
चार लघु कथा संग्रह, तीन उपन्यास, एक व्यंग्य, चार जीवनी हिंदी भाषा में प्रकाशित। सुदीप के कई लेखन का अंग्रेजी, मलयालम, पंजाबी और मराठी सहित विभिन्न अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है। विभिन्न भारतीय पत्रिकाओं और पुस्तक संकलनों में साठ से अधिक कहानियां प्रकाशित हुईं।
सुदीप द्वारा अपने संपादकीय पत्रकारिता करियर के दौरान धर्मयुग, सारिका, रविवर, करंट, संडे मेल, शीक, श्री वर्षा, अमर उज्जला, स्क्रीन और हमारा महानगर सहित विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित दो हजार लेख। अप्रैल 2000 में, मुंबई प्रेस क्लब ने सुदीप को पत्रकारिता में उनके अपार योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड  से सम्मानित किया।
सुदीप ने फिल्म ‘अंकुर, मैना और कबूतर’ के लिए संवाद लिखे, जिसने 1990 में भारत में सर्वश्रेष्ठ बच्चों का फिल्म पुरस्कार जीता। जमनालाल बजाज के जीवनी फिल्म कथनी करनी एक सी’ के लिए शोधकर्ता-लेखक थे, जिसने उसी वर्ष भारत में सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक मनोरंजन राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। सुदीप ने कई टीवी श्रृंखलाओं के लिए स्क्रिप्ट और लघु कथाएँ भी लिखीं।
प्रकाशित पुस्तकें
  • कहानी संग्रह: अंतहीन, 1981
  • कहानी संग्रह: तीये से अट्ठा, 1983
  • कहानी संग्रह: लंगड़े, 1986
  • कहानी संग्रह: अनहद नाद, 2002
  • उपन्यास: साधु सिंह परचारी, 1980
  • उपन्यास: नीड़, 1982
  • उपन्यास: मिट्टी के पांव, 1995
  • व्यंग्य: बिनु नारा सब सून, 2000
  • जीवनी: कथनी करनी जैसी, 1988
  • जीवनी: जन्मभूमि से बंधा मन, 1990
  • जीवनी: एक जीवंत प्रतिमा, 1993
  • जीवनी: एक जिंदगी कमल जैसी, 1995
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