Friday, June 21, 2024
होमकवितात्रिलोक सिंह ठकुरेला के दोहे

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के दोहे

सागर घन बनते रहे, और शिलाएँ रेत ।
चिरस्थायी कुछ नहीं, समय करे संकेत ।।
समय कसौटी पर कसे, करता रहता जाँच ।
साबित करता वक्त ही, क्या हीरा, क्या काँच ।।
जिनका सरल स्वभाव है, मिलता उन्हें दुलार ।
सागर सूखें प्रेम के, देख कुटिल व्यवहार ।।
जिनका सृजन सुहावना, वे मन लेते मोह ।
बढ़ता जाता सहज ही, उनसे निस्पृह छोह ।।
बहती है जीवन नदी, अपने ही अनुसार ।
युक्ति, कुशलता, संतुलन, सहज कराते पार ।।
धन की मूढ़ अधीनता, देती मन के रोग ।
नेह-गंध से जो भरें, वही सयाने लोग ।।
तुच्छ हुए सम्बन्ध अब, सब धन के आधीन ।
भावों को तीली दिखा, मानव हुआ मशीन ।।
अनुभव देकर उम्र ने, ऐसा किया निहाल ।
एक मौन के सामने, हारे सौ वाचाल ।।
करें भलाई लोक की, बना प्रेम को सत्व ।
जो परहित में विष पिये, पाता वही शिवत्व ।।
ध्येय, धैर्य, धुन,ढंग,श्रम, रहते जिसके पास ।
समयशिला के वक्ष पर, लिखता वह इतिहास ।।
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
त्रिलोक सिंह ठकुरेला समकालीन छंद-आधारित कविता के चर्चित नाम हैं. चार पुस्तकें प्रकाशित. आधा दर्जन पुस्तकों का संपादन. अनेक सम्मानों से सम्मानित. संपर्क - trilokthakurela@gmail.com
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest