Saturday, May 18, 2024
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रश्मि विभा त्रिपाठी की चार कविताएँ

जिस दिन मैं नहीं रहूँगी
तो मेरे न होने पर
तुम आँसू मत बहाना
जब तुम्हें पता चले
कि
मेरी साँस थम गई
मेरे होंठ जम गए
मेरे शब्द मौन हो गए
तुम मत रोना
क्या
मैं तुम्हारे लिए
इस आभासी दुनिया की
खोज थी?
तुम थे मेरी अमृता
मैं तुम्हारी इमरोज़ थी!
हाँ
जिस पल
तुमको
मुझे याद करते ही
तुम्हारे भीतर ऐसा लगे
कि कुछ फड़का है
दिल जोर से धड़का है
होंठ थरथरा गए
और तुमने मेरा नाम लेकर
चीखना चाहा
उस पल
कुछ मत करना
न घबराना, न डरना
बस
महसूस करना
क्योंकि
किसी को याद करते पल
तुम्हारे तन- बदन में
बिजली- सी कौंधी
हवा में तैरकर
तुम्हारे पास आई हो
उसकी यादों की
महक सौंधी
अचानक
एक बादल का टुकड़ा
तुम्हारी आँखों में बिन मौसम
बरस गया
मेरा नाम याद आते ही
अगर आत्मा में
कुछ पल को
कुछ फड़कता है
दिल जोर से धड़कता है
तो समझना
मैं तुम्हारे ही भीतर हूँ
तुम्हारी आत्मा से जुड़ी हुई
बेशक थीं
हमारी राहें मुड़ी हुई।
2
तुम ज़िन्दगी का दूसरा नाम हो
मेरा सुख-चैन, मेरा आराम हो
तुम फूल, तुम कली
तुम पराग, तुम खुश्बू की डली
तुम एहसास मखमली
तुम बागबान,
आई
अभिसिंचित चली
तुम तितलियों की धुन में
तुम भँवरों की गुनगुन में
तुम गीत में, तुम गति-लय-यति में
तुम दिखते हो मुझको रघुपति में
तुम सागर, तुम नदिया
अतृप्त कभी रहने न दिया
तुम सीकस में मीठा झरना
जिंदगी की धूप से
अब भला क्या करना!
तुम तपन में छाँव हो
तुम मेरे सपनों का गाँव हो
तुम बादल-नर्म रुई के फाहे
तुम स्वाति बूँद, तुम्हें पपीहा चाहे
तुम किरन, तुम चाँदनी
मेरे आँगन में बिखरी हीरे की कनी
तुम पूनम की रात हो,
तुम सुनहरा प्रात हो
तुम एक सीधी, सरल,
सच्ची बात हो
तुम फरहाद, तुम मजनूँ ,
तुम राँझा,
तुम एक घर के दो परिवारों का
चूल्हा साँझा
तुम मोनालिसा हो, तुम कला हो
मुझको तुमसे मिलाया,
तकदीर का भला हो!
तुम मूरत हो अजंता की
तुम सुंदर रचना नियंता की
तुम झील, तालाब, कुँआँ, बाबड़ी
तुम पानी भरने को एक पनिहारिन खड़ी
तुम जाड़े की गुनगुनी धूप
तुम हल्दी की रस्म के बाद
होने वाली दुलहिन का निखरा रूप
तुम स्वेटर बुनती
माँ की सलाई पर लूप
तुम शगना दे गीत,
तुम पावन प्रीत
तुम मेह, तुम पुरवाई
तुम सावन की घटा छाई
तुम नीम की डाल पर झूला
तुम हर गम भूला
तुम बच्चे की किलकारी
तुम माँ देवकी, यशोदा, तुम गिरधारी
तुम शास्त्र, तुम वेद ऋचा
तुम माता की चौकी पर आसन बिछा
तुम ज्ञात, तुम अज्ञात
तुम जल प्रपात
सुलगते विरह की आग ठण्ठी
तुम संस्कृत साहित्य के महाकवि दण्डी
तुम सफर के साथी
तुम हाथ में हाथ लिये
मैं चलती जाती
तुम विभावरी, तुम चंदा
तुम इस धरती पर एक नेक बंदा
तुम माँग के सिंदूर में
मेरे चेहरे के नूर में
कोई गलती, कुसूर में
माफी देना ही तुम्हारे दस्तूर में
तुम जंगल पहाड़ में
मेरे पीछे- पीछे चलते
सुरक्षित मुझे करते
कौन धँसेगा बाड़ में
तुम पतंग, जिसका माँझा हूँ मैं
तुम्हें कटने नहीं दूँगी, पूरी ढील देती रहूँगी
तुम धागा, तुम सुई, तुम इंचटेप
रिश्तों को मापते, कुतरे रिश्तों पर थिगड़ी लगाते तुम
तुम कविता में, तुम छंद में
तुम रस की परिभाषा, आनंद में
तुम एक उत्कृष्ट विधा हो
लक्षणा, व्यंजना, अभिधा हो
तुम बचपन का जमाना
बच्चों का बारिश में नहाना
पानी की कश्तियाँ चलाना
और अपने आप पर इतराना
तुम सुबह मेरी, तुम सुरमई शाम हो
दिन भर जो मैंने किया, तुम वो खास काम हो
तुम पहाड़ के पीछे दुबका सूरज
तुम रात पूरनमासी की
तुम खुशी, मिटी उदासी
तुम देव मेरे, मैं तुम्हारी दासी
तुम पहली नजर का पहला प्यार
तुम मेरी उम्मीद, मेरी हसरत मेरा इंतजार
तुम आरती के दीप में
तुम जैसे- मोती सीप में
तुम मेरे मन्दिर के देवता
अपनाओगे- ठुकराओगे नहीं पता
तुम माँ की लोरी
तुम गोदान का होरी
तुम दीवाली होली
तुम आँगन की रंगोली
तुम इंद्रधनुष
मेरे लिए तुम महापुरुष
तुम इस फिजा में
बहार हो खिजाँ में
तुम नाव, तुम पतवार
ले ही चलोगे मुझे उस पार
तुम मेरे माथे की बिंदी
तुम भाषाओं में हिन्दी
शबरी के बेर खाते राम हो
तुम नयनाभिराम हो
तुम निष्काम
तुम राधा के श्याम
तुम खनकता साज हो
मेरी चुप्पी की तुम आवाज हो
तुम दाल में नमक,
तुम बेहतरीन स्वाद
आवश्यकतानुसार नहीं
आवश्यक रूप से
हर पल चूल्हे में पकती है
तुम्हारी याद!
तुम कल्पना कवि की
तुम रश्मि हो रवि की
तुम एक नादान बच्चा
जिसके लिए सब सच्चा और अच्छा।
जो खेलता है आइस पाइस धप्पी
तुम एक जादू की झप्पी
तुम तीज त्योहार, तुम सोलह सिंगार
तुम चूड़ियाँ की खनक
तुम हथेली पर
मेंहदी के रंग की धनक
तुम शरीर, मन, आत्मा तक
तुम पाँव का आलता
तुम हो तो, कहाँ कोई दुख सालता?
तुम सुहाग मेरे, मैं तुम्हारी सुहागन
तुम आह्लाद, तुम उमंग, मैं हैँ मगन
तुम बन्दिगी, तुम हर खुशी
और
तुम ख्वाब, तुम हकीकत
तुम न जाने
कब और कैसे आँखों में आ बसे,
और बन गए मेरी अकीदत
तुम मेरी आत्मा और मन
तुम धड़कन का स्पंदन।
तुम मैं
मैं तुम
जहाँ देखूँ
जिधर देखूँ
तुम्हें हर जगह मैं पाती
ओ मेरे मीत! तुम मेरे प्राण की थाती

3

मैंने तुमसे
प्रेम नहीं किया
बस
अपनी देह पर तुम्हारी
उँगलियों के कुछ निशान लिये हैं
बस
अपनी आत्मा को
तुम्हारी आत्मा के निकट
ले जाने का प्रयास किया है
अहो भाग्य!
मुझे इसमें पूरी सफलता मिली है;
क्योंकि जब मेरी आत्मा
आहत हुई
तुम्हारी आत्मा में भी
उठी
उसी समय आकुलता
मैंने तुमसे प्रेम नहीं किया
बस
तुम्हारे हृदय की डोर को बाँधा
अपने हृदय से
और
सचमुच
बड़ी पक्की है यह डोर
जब मेरा दम
घुटने लगता है
तुम खींच लेते हो मुझे
जीवन की ओर
मैंने तुमसे प्रेम नहीं किया
बस
एक दिन तुम्हें
इसलिए
गले लगाया था ;
ताकि तुम्हारी धड़कन
और अपनी धड़कन की
आपस में
पहचान करवा दूँ
जब
मेरा दिल धड़के जोर से
तब तुम भी शांत न रह पाओ
उस शोर से
मैंने तुमसे प्रेम नहीं किया
बस
तुम्हारे भुजपाश में
आकर
बिखर गई
और
तुमने समेट लिया मुझे
मैंने तुमसे प्रेम नहीं किया
बस तुम्हें स्पर्श किया
ताकि तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति
मेरी शिराओं में
मैं जब तक जीवित हूँ
तब तक
रक्त बनकर बहे
सुनो
कोई कुछ भी कहे
जिस दिन मैं तुम्हें प्रेम करूँगी
तो
मेरी देह पर
तुम्हारी पवित्र उँगलियों के निशान
साक्ष्य होंगे
कि
हम
एक देह
एक आत्मा हैं,
मेरी आत्मा में उठेगा
नदी -सा प्रवाह
तुम डूब जाओगे
स्वयं में मुझको ही पाओगे
हमारे हृदय
एकाकार होंगे
दूर होकर भी
खींच लेंगे एक दूसरे को
अपने समीप
जब भी जी चाहेगा
मेरी धड़कन तुम्हारे सीने में
और तुम्हारी धड़कन
मेरे सीने में धड़केगी
तुम्हारी छाती में छुपी रहूँगी
कोई बिखेरेगा कैसे मुझे
तुम्हारा स्पर्श
मुझे जीवन देगा
जिस पल मैं तुम्हें प्रेम कर उठूँगी
मेरे भीतर तुम जन्म लोगे
पलोगे, बढ़ोगे
मेरे स्त्रीत्व को परम सुख दोगे!
4
देह का सुख
मैं
तुमसे नहीं माँगती
माँगती हूँ
मेरे माथे पर
सिर्फ
एक बोसा तुम्हारा
जो मेरी सारी शिकन मिटा दे
माँगती हूँ
तुम्हारी आँखों में अपना अक्स
जिनमें देखकर
यह तसल्ली कर लूँ
कि ठीक है ना
मेरा नैन- नक्श
माँगती हूँ
तुम्हारी छाती से लिपटकर
अपनी धड़कन की रफ्तार को
कम करना
माँगती हूँ
कि एक बार
मेरे दिल पे हाथ रख दो
जो तुमसे दूर रहकर
बहुत बेकाबू हुआ जाता है
माँगती हूँ
तुम्हारी बाजुओं में
अपने लिए उम्र भर की कैद
मैं तुम्हारे संग- संग चलूँ
मुझे कोई बदनियत से ना देखे
तुम रहो मुस्तैद
ये नहीं माँगती
तुम दूर हो
मगर जानते हो
कि ये हो ही नहीं सकता
कि मुझे मंजूर हो
किसी पर नजर डालना
अदब से
सर पर पल्ला करके
नजरें झुकाकर
चलती हूँ मैं
तुम्हारा नाम ऊँचा करने को
माँगती हूँ
जीवन भर का साथ?
नहीं!!!
बस उतने पल का साथ
जिन पलों में
मैं अपनी बाकी ज़िन्दगी जी लूँ।
रश्मि विभा त्रिपाठी रिशू
रश्मि विभा त्रिपाठी रिशू
संपर्क - rashmivibhatripathi@gmail.com
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