चार महीनों में बैंगनबोलिया के फूल सूख गए थे फिर भी मैंने आदतवश उसमें एक जग पानी डाल दिया। मिट्टी में दबी प्यास पानी पाकर बुलबुलों में बदल गयी। बालकनी की धूप में नवंबर उतर आया था। मैं उधर ही कुर्सी डालकर बैठ गया।
अंदर कुछ था भी नहीं। चार महीनों में कमरों में धूल इतनी जम चुकी थी कि उनमें से एक दमघोंटू गंध आने लगी थी। दो-तीन घंटे तो उसी को साफ़ करने में निकल गये। इस बीच माँ पाँच बार पूछ चुकी थी । हर बार वही खाने की बात। बेटा कितना भी बड़ा हो जाए माँओं को उसके खाने के अलावा कोई और जरूरत दिखती ही नहीं। सोचिए कि जब किसी के प्यार में होने का ख़ूबसूरत अंदेशा टूट जाए तब खाने की क्या ही फिक्र होगी ? वैसे भी एक बैचलर आदमी के पास पेट भरने के बहुत सारे विकल्प रहते हैं। बड़े शहरों में तो और भी अधिक। जैसे मैगी, सैंडविच, खिचड़ी या स्वैगी या फिर ज़ोमटो से अॉनलाइन अॉर्डर। मैंने माँ को बता दिया था कि सब्ज़ी रोटी खा चुका हूँ। माँ का फोन तब से नहीं आया था।
यहां कुछ भी ऐसा नहीं था कि मुझे आने में ख़ुशी होती। एक मुंबई थी जो अकेले रहने पर वैसे ही काटती है जैसे कोई और शहर। एक नौकरी थी जिसे करने न करने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था भीतर में। सरकारी नौकरी बरकरार रखनी थी सो पैर खींच लाया।
काफी देर बाद जाकर मुझे पौधों की याद आयी। गमले अधिक नहीं थे। एक गुलाब था जो अमूमन हर कोई अपने आंगन या बालकनी में देखना चाहता है। पिछली बार जब माँ आयी थी तो एक तुलसी लगा गयी थी। और एक बैंगनबोलिया था जो उसने उस दिन लगाया था जब वह घर आयी थी पहली और अंतिम बार ।
उसे बैंगनबोलिया बहुत पसंद था। फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर वह अक्सर तस्वीरें डालती थी। मेरी सोसायटी में बैंगनबोलिया के अनगिनत गमले थे। उस दिन जब वह सोसायटी में आयी थी तो गुलाबी फूलों को देखकर उसके चेहरे पर गुलाबी रंग की बालसुलभ ख़ुशी नाच उठी थी। लगभग चालीस – पचास अलग-अलग कोनों से फोटो खिंचवाने के बाद ही ऊपर आयी थी। उसके आने के बाद यह फ्लैट पहली बार अपना जैसा लगा था। मेरे कोरे काग़ज़ जैसी ज़िन्दगी पर रंगभरे सम्भावनाओं की एक खिड़की खींच गयी थी।
उस दिन अचानक से उसका फ़ोन आया था छुट्टी के दिन। “गेस करो मैं कहाँ हूँ!”
“एक सेल्फी भेज दो मैं गेस करके बता दूँगा।“
“तुम भी न अभि!”
” अच्छा ठीक है मैं थोड़ी देर बाद भेजती हूँ पिक!” – और फिर उसने फोन काट दिया था। उसका फोन आते ही धड़कनें बेसब्र हो गयीं थीं। मैं प्रतीक्षा करने लगा था। फिर इंट्री गेट से फ़ोन आया था। “सर, कोई आपका गेट पर इंतज़ार कर रहा है। इधर ही मिलना चाहता है, क्या बोलूँ?” वॉचमैन ने बताया कि मेरे अॉफ़िस से किसी प्रदीप ने एक सामान देने के लिए भेजा है। और जब मैं गेट पर पहुँचा तो अचानक से वह निकल आयी थी। सारे दरबान हँसने लगे थे।
बुलबुले अब ख़त्म हो गए थे। हवा के ज़ोर से धूप थोड़ी नर्म थी। गाँव में इस समय जाड़ा शुरू हो गया था। लेकिन मुंबई में ऐसा कोई मौसम नहीं होता। यहाँ गर्मी और जाड़े का अंतर इतना ही है कि हवा में खराश कम हो जाती है और धूप में नमी बढ़ जाती है। मौसम गूँथे आटे – सा गीला महसूस होने लगता है । मैंने खाने का डिलीवरी स्टेटस चेक किया। स्वैगी का डिलीवरी ब्याय कभी भी आ सकता था।
उस समय वह बहुत ख़ुश थी। पर सिर्फ़ मुझसे मिलकर, ऐसा उस समय मैं पूरी तरह से नहीं कह सकता था। मुझे लग रहा था वह पहले से ही ख़ुश थी और अपनी ख़ुशी में मुझे शामिल करना चाह रही थी।
पता नहीं क्या कहते हैं उसे वो हाफ पैंट जैसी कुछ पहनी थी डेनिम रंग की और ऊपर एक फूलों के छाप वाली सफ़ेद राउंड नेक स्लीवलेस टीशर्ट। वह आधी दिखाई देती देह में कॉन्फिडेट लग रही थी और मैं उसे लेकर आशान्वित। काफ़ी देर तक वह हूँ-हाँ के साथ मोबाइल में लगी थी । दो-एक बार सेल्फ़ी भी उतारी थी । वो मेरे पास बैठी हुई बिज़ी दिख रही थी । मैं चाहता था कि मेरे पास होने तक उसका सब कुछ मेरा रहे । वो, उसकी व्यस्तता, उसकी बातचीत और उसका अटेंशन । मतलब ये थोड़ा तकलीफ़देह होता है जब कोई आपके पास हो बैठा हो और आप उसकी प्राथमिकता में न हो । कम-से-कम मुलाक़ात भर तो लोगों को एक-दूसरे के साथ रहना ही चाहिए ।
“अगर है तो तुम भी मेरे जैसा सफ़ेद टीशर्ट पहन लो और डेनिम ब्लू पैंट । मस्त फोटो खींच दूंगी।” फ़ेसबुक डीपी लगाने के काम आएगी। “- और वह हँस पड़ी थी। एक आशा जागी थी कि शायद वो मेरे साथ फोटो खीचायेगी । बीच में बैंगनबोलिया और दोनों तरफ़ खड़े हम ।
आजकल ऐसे चलन वाले कपड़े किसके पास नहीं होते!
उसने मेरे साथ कोई सेल्फी वेल्फी नहीं ली थी। हाँ, मेरे अकेले के सात-आठ फोटो जरूर लिए थे बैंगनबोलिया के गमलों के दायें बायें खड़े करवाकर। मुझे लगा था शायद अकेले में देखने के लिए ये तस्वीरें उसके काम आएँगीं। हालाँकि जैसा मेरा स्वभाव है, मैंने उसे सेल्फ़ी में आने के लिए पूछ नहीं पाया था। हाँ, वही शर्म के कारण । अगर पूछ लिया होता तो आज कुछ पास में होता भी। अभी कितना ख़ाली हाथ लग रहा है। मतलब जो अच्छा लगे उसके साथ एक फोटो ले लेना चाहिए चाहे मन करे न करे।
मैंने आज तक खाना बनाना नहीं सीखा। माँ अक्सर बोलती है कि दोनों साथ मिलकर खाना बनाना सीख लेना जब शादी करोगे। कहती है कि आजकल कौन शहरी लड़की खाना बनाना सीखकर आएगी। लड़की भी तो आजकल नौकरीपेशा चाहिए। कौन चाहता है आजकल पढ़ी लिखी लेकिन केवल दक्ष गृहणी पत्नी। सबको चाहिए नौकरी वाली लड़की । तभी तो घर आराम से चलेगा । जैसे घर संभालने में कुछ लगता ही नहीं! अब लीजिये। कोई किताबें, पढ़ाई और फिर नौकरी के साथ खाना बनाना सीखे भी तो कैसे! और लड़कियों को ही क्यों सीखना चाहिए? अंत में जोड़ देती है माँ ।
माँ को उसके बारे में अभी नहीं बताया था। बिना उससे बात किये बताता भी क्या?
वह ऑफ़िस में मेरी जुनियर थी। धीरे-धीरे दोस्त जैसी बन गयी थी। लेकिन उसमें मुझे कुछ और भी गुण दिखते थे। भविष्य के जीवन साथी के। इसके कारण भी थे। वह मेरे साथ बहुत खुली हुई थी। जब भी कुछ लाती तो खाने के लिए जरूर देती। हँसने बोलने में कुछ भी संकोच नहीं। अधिकारवश मेरा ख्याल भी रखती। बातचीत करते – करते कभी-कभार मेरा हाथ भी पकड़ लेती । वो होता है न बातों के प्रवाह में । ये सब लक्षण साधारण भी हो सकते हैं लेकिन मैं जिस उम्र और आवश्यकता में था यह विशेष भी हो सकते थे । यही सोचकर मैंने अपने मन को थोड़ी ढ़ील दे दी थी।
“तुम्हें खाना बनाना आता है?” – उसने रेलिंग पर झुके हुए पूछा था। छब्बीस साल की उसकी पिंडलियाँ धूप में सोने सी चमक रही थीं। मैं भी अपने आप को रेलिंग पर झुका लिया। दोनों एक साथ अगर इस फ्लैट में रहें तो कितना हसीन लगे यह सोसायटी – मेरे अंदर के दबे सपने ने अंगड़ाई ली थी। इस सोसायटी में उसके जैसी एक भी लड़की नहीं थी। मेरे दोस्त इसे ग़रीबों की सोसायटी कहते थे। हालाँकि मैं ख़यालों में कितनी बार चाहा था कि वो मेरे फ़्लैट में आ जाए । आ जाए तो कैसा हो! पर सचमुच में आ जायेगी एक दिन बिना बताये, यह सच में नहीं सोचा था। वो आयी, इस बात की ख़ुशी बेतहाशा थी । और ख़ुशी में अक्सर मेरी आवाज़ लरज जाती है । हालाँकि आज मैं उससे सारी बातें कर लेना चाहता था । हम दोनों से संबंधित ।
“सब्ज़ी बना लेता हूँ पर रोटी टेढ़ी हो जाती है और भात गिला।” – मैंने बोला और इस पर हम दोनों हँस पड़े थे। फिर मैंने सब्ज़ी बनायी और उसने चावल। मुंबई में पहली बार किसी लड़की के हाथ का बना खाना खाया था। चावल थोड़ा और पकता, पर ठीक है उसने कोशिश तो की ही। किचन में वह मेरे साथ बिल्कुल नॉर्मल थी। उसके हाथ, बाँह, कमर और केश मुझसे स्पर्श हो रहे थे। जनाना गंध मेरे कमरे और मेरी सांसों में आना जाना कर रही थी। पता नहीं उसकी क्या मर्जी थी लेकिन मैं उसके साथ जितनी जल्दी हो सके, शादी करना चाहता था। हाँ, लेकिन अभी पहली ज़रूरत मुझे उसके साथ संसर्ग की हो रही थी। मैं ग़लत भी हो सकता था और कहीं उसे इंकार हो, यह सोचकर मैं संयमित रहा। यहाँ मैं बता दूँ कि मैं उससे प्यार करने लगा था और उसके शरीर की चाहना उसी प्यार का एक हिस्सा था। कोई गुलाब मेरे जीवन में खिलने लगा था ।
खाना अच्छा नहीं था। अॉनलाइन खानेवाले भी बाज़ दफ़ा चूना लगा जाते हैं। सर्व करनेवाले रेस्तरां की रेटिंग मैंने कम कर के डाल दिया ताकि अगली बार उसे गुणवत्ता का ख्याल रहे। घर से आने के बाद कुछ दिन तक बैचलर खाना चित पर नहीं चढ़ता, लेकिन पेट के लिए जितना जरूरी है बिना खाये रहा भी नहीं जा सकता। ख़ैर, अब कुछ देर के लिए मेरा पेट भरा था। दिन में नींद तो मैं आमतौर पर नहीं मारता। चलिए किचन में चाय ही चढ़ा लेता हूँ ।
खाना खाने के काफ़ी देर बाद तक वह रूकी रही थी। रूकी क्या रही मुझे तो साफ़ याद है कि दो बार उसने अदरक कूटी चाय भी बनाई थी। सुडौल, मांसल ऊँगलियों से चाय छानती वह मेरे कंधे तक आ रही थी। उसके सिल्की बाल मेरे कंधे से कई बार छू गए थे । मेरी योजना में एक अच्छी विवाहित जोड़ी की संभावना बनने लगी थी। उसने स्टाइलिश छापे वाली पीली नेलपालिश लगायी थी ऊँगलियों में। चाय सोफ़े के सामने रखकर वह बिल्कुल बग़ल में बैठ गयी थी। पुरुष जिन भंगिमाओं में मनचाहा स्वीकार खोजते हैं स्त्रियों को बहुत बार उन बातों की तरफ ध्यान भी नहीं जाता। ऐसा मैंने कहीं पढ़ा था । अगर मैं श्योर होता तो इस समय बिना इज़ाजत उसका सिर अपनी गोद में रख लेता। उसके बालों को अपनी ऊँगलियों से सहलाता। उसके गाल देखने में बिल्कुल बैगंनबोलिया के फूल जैसे झीने और कोमल लगते थे । उसके होंठों पर शायद अपने होंठ भी रख देता। लेकिन अभी बात दूसरी थी। एक तो वह बिना बुलाए आयी थी और मैं उसके उद्देश्य से अनभिज्ञ था। दूसरी बात कि हमारे बीच अभी स्वीकार की अनुपस्थिति थी। यों नज़र से वह मेरे बिल्कुल पास थी, फिर भी अधिकार से मेरे न जाने कितनी दूर। बिल्कुल किसी अपरचित जैसा । “कैसा लगा घर मेरा?” – मैंने तब बात बढ़ाया था।
“बहुत अच्छा है। आई लाइक इट ” – उसने जवाब नहीं हौसला दिया था।
“लेकिन बैचलर के लिए बहुत बड़ा है। किसी को पार्टनर रख लो। कुछ पैसे भी आ जाएँगे।”-मुझे लगा वह साथ रहने पर विचार कर रही थी।
“पैसों की मुझे कमी नहीं।” – मैंने हँस दिया था। तब तक वह अपने मोबाइल में उतर गई थी। यह उसकी आदत थी शायद । बातों के बीच मोबाइल देखने लगना ।
बाहर धूप कड़ी हो गई है । कपड़े धोकर धूप में डाल दिया है । सूख जाए तो बस अब आयरन करने की टेंशन रहेगी। पर बिजली तो कटी पड़ी है । इतने दिनों में बिजली कम्पनी मीटर खोल ले गयी होगी । कल ऑफ़िस भी ज्वाइन करना है। अॉफ़िस से लम्बे अवकाश ने ऑफ़िस जाने की आदत भी तो छुड़ा दी है। याद आया ऑफ़िस से उसका भी ट्रांसफर हो गया है । अब देखिए कि यह बात याद आयी और मुझमें ख़ाली – ख़ाली – सा कुछ, निर्वात जैसा बनने लगा है।
हम पुरुष जिन कामों को जंजाल समझते हैं लड़कियाँ उसे पट से अंजाम दे देती हैं। मैं जो सोच रहा था वह वही हँस – हँसकर पूछे जा रही थी।
“शादी – वादी कर रहे हो या अभी अकेले ही रहना है।” – मोबाइल देखते – देखते उसने पूछा था। – मुझे लग रहा था वह समय आ पहुँचा था ।
जिसके साथ जीवन जीने के सपने देख रहा था उसी के तरफ़ से जीवन के महत्वपूर्ण सवाल आ रहे थे। उसकी बातों से कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था। मैं क्या बोलूँ इसी ओहपोह में था। पर इस ओहपोह से निकलना भी चाहता था। पिछले एक साल से इस सवाल से जूझ रहा था । आज उत्तर मिलने की सम्भावना बन रही थी ।
“ सोच तो रहा हूँ लेकिन सोचने से क्या होता है?”
“सोचने के बिना भी तो नहीं होता।“
“अच्छा चलो सोच लिया। फिर?”
“लड़की देखो, बात करो, घर पर बोलो और क्या!”
“लड़की को भी तो पसंद आना चाहिए।“
“अरे सब हो जाता है, पहले कोशिश तो करो!”
“वही तो कर रहा हूँ।“
“क्या?”
“कोशिश और क्या। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”
न जाने कहाँ से इस दफ़े आख़िरी हिम्मत आ गई थी।
इतनी देर में पहली बार उसने पाला बदला था। और मोबाइल देखती उसकी आँखों में पहली बार एक कड़वी अजनबीयत उभर कर मुँह चिढ़ाने लगी थी। मैं लूटा-पिटा महसूस करने लगा था। अब मेरे पास मेरा सुरक्षित सवाल भी नहीं बचा था। अगर वह मना करती तो मेरे अंतरंग सवाल भी नष्ट हो जाते । उसने पहली बार मेरी नज़र से अपने बदन को देखा था और सिमट कर बैठ गई। पैंट के बाहर का बचा हुआ बदन अब मुझसे शर्माने लगा था । अनायास की उत्तेजना से उसके रोयें खड़े हो गये थे।
“कशिश, कुछ बोलो भी… “
“अभि, आई एम कमिटेड!” – मैं ख़ुशी से उदासी की तरफ़ लौट रहा था – “और इस वक़्त मैं उससे मिलने ही इधर आयी हूँ। वह अभी घर पर नहीं है तो तुमसे मिलने आ गई।“” – वह बिना रुके धीरे स्वर में बोल गयी थी ।
देखिये, उसकी याद में कैसे खो गया मैं ! मेरी चाय सुखकर चौथाई से भी कम रह गयी है ।
“कशिश, आई लव यू मोर दैन एनिथिंग!”” – मैं उस दिन यह कहते हुए कितना झूक गया था । लेकिन वह तो पहले से ही दूसरी ओर झूकी हुई थी।
कुछ भी तो नहीं भूला मैं । जैसे कोई पसंदीदा फ़िल्म के सीन याद रखता है वैसे मुझे भी सब याद है । हालाँकि मुझे ज़रा भी आभास होता तो मैं उसे इस तरह बोलकर उदास और परेशान ना करता । कम-से-कम इस पहली और शायद आगे और भी सम्भावित मुलाक़ातों को बर्बाद नहीं करता । पर जिससे प्यार हो जाए उससे सिर्फ़ दोस्ती करके रह पाना, मुझे तो नहीं जमता । अच्छा हुआ जो उसने मुझे ब्लॉक कर दिया था । उन दिनों मैं कितना लप गया था उसकी चाहत में । इतना झूका था कि रीढ़ सीधी ना रह सकी थी । पर जब आप प्यार में होते हैं तो प्यार के अलावा कोई बात कैसे सोच सकते हैं । ये तो बाद ही में मालूम होता है ना कि दरअसल में यह प्यार नहीं ग़लतफ़हमी थी । और मैं था भी प्यार में पागल एक मामूली –सा आदमी ।
“लेकिन मैं नहीं करती अभि ! वी आर जस्ट फ्रेंड!” डोन्ट एक्स्पेक्ट मोर दैन दिस।“ – उसने अपनी नेलपालिश वाली गुलाबी ऊँगलियों वाले हाथ मेरे हाथों पर रख दिये थे । उसका इंकार भी कितना निर्दोष और अपना था । एक कोमल छूअन हाथों से चलकर सीने तक फैल गयी। इस कोमलता में दर्द के छोटे – छोटे क्रूर काँटे थे जो मेरी समस्त संभावनाओं को छीलते हुए मेरे अतीत में धँस गए थे । हालाँकि मेरी आशा ख़त्म नहीं हुई थी । न जाने कितने मैसेज़ और मिस्ड कॉल मेरे नाम के उसके मोबाइल में दर्ज़ होंगे । उसने हर बार इंकार किया था । उसकी क्या ग़लती थी । कोई कितने दिन ऐसे में लिहाज़ करेगा । ऊबकर उसने हर जगह से मुझे अंफ़्रेंड कर दिया था । बाद में तो उसने नम्बर भी बदल दिया था ।
उस समय और कुछ नहीं सूझा था। मैं सीधा घर लौट गया था।
हालाँकि चार महीने हो चुके हैं लेकिन अकेले होने पर पूरी मुलाक़ात ताज़े दर्द –सा बदन में एक बार दौड़ ही जाता है । अब तो खैर मेरा भी ट्रांसफ़र हो चुका है, नहीं भी होता तो मुझे लगता है यह घर बदल लेता । काटने को दौड़ता है हर बार जब उसकी याद आती है । पर सच कहूँ तो उसके आने की ख़ुशी और जाने का ग़म जाता ही नहीं है।
इस बैगनबोलिया का क्या करना है, अभी नही सोचा है । फ़िलहाल सोचूँगा भी नहीं वरना इतनी मेहनत की चाय फिर ठंडी हो जायेगी । और फिर बंद पड़ी बिजली भी तो चालू करवानी है ।
हाँ, उस दिन अपनी इंकार और अतीत हो चुके मुलाक़ात की गंध मेरे सामने रखकर कशिश तुरंत ही चली गई थी क्योंकि उसका व्यॉय्फ़्रेंड घर आ चुका था । नहीं तो, मुझे लगता है, वो कुछ देर और ठहरती मुझे समझाने और दिलासा देने के लिए । हालाँकि मुझे अभी भी कई बार लगता है कि कुछ देर पहले वह यहीं थी, मेरे साथ बालकनी पर झूकी हुई। सोने – सी अपनी पिंडलिया धूप में चमकाती हुई ।

3 टिप्पणी

  1. बहुत प्यारी कहानी है , यूँ के वो कहानी है ही नही ,यूँ के अपनी सी पुरानी बात लगे।

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