Saturday, May 16, 2026
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अनघा जोगलेकर की कहानी – राधा की बावड़ी

मुझे ऐतिहासिक इमारतें, किले, म्यूजियम देखने में बड़ी दिलचस्पी थी। मैं नौकरी बैंक में करता था लेकिन जब भी छुट्टी मिलती कोई-न-कोई ऐतिहासिक जगह जरूर घूम आता। किले मुझे अपनी ओर खींचते। किसी-भी किले के मुख्य दरवाजे से लेकर उसके शीर्ष तक का सारा नक्शा मेरी आँखों में खिंच जाता। वहाँ घूमते हुए मुझे तत्कालीन राजा, रानी, राजकुमार, राजकुमारियाँ, सैनिक, मंत्री सब जीवित होते से लगते। मैं पूरा दिन इन किलों में घूमकर बिता सकता था। 
मेरे दोस्त हमेशा मेरी फिरकी लेते हुए कहते, “यार, तू कहाँ बैंक में आ गया ! तुझे तो पुरातत्व विभाग में ही होना चाहिए था।”
खैर… दोस्तों की बात एक तरफ लेकिन यह अफसोस तो मुझे भी हमेशा रहा कि मैं अपने शौक को अपना प्रोफेशन न बना सका।
वैसे मुझे गांवों से भी खासा लगाव था। मेरा बचपन गांव में ही बीता था… शायद इसलिए।
मुझे अच्छे से याद है मेरा गांव। तब मैं काफी छोटा था फिर भी गांव के वे खेत, हरी-हरी घास चरती गाएं, उनके गले मे बंधे घुंघरुओं की आवाजें, शाम होते ही चहचहाते पक्षियों का अपने घोंसलों में वापस आना… सब जैसे मेरे मन पर छपा हुआ था।
और हाँ… मुझे गांव की एक खास जगह भी याद है। गांव का हर रास्ता… उस खास जगह से ही होकर गुजरता। कभी किसी को कहीं भी जाना हो जैसे… किसी को फलां के घर जाना हो तो ‘राधा की बावरी’ के दाएं होकर जाना या कभी मंदिर जाना हो तो राधा की बावड़ी से  गोल चक्कर लगाकर जाना… हर व्यक्ति हर एक जगह को राधा की बावड़ी के रेफरेंस में ही बताता। कभी कहीं भी जाने के लिए राधा की बावड़ी एक लेंड मार्क-सी बन चुकी थी। 
मुझे आज भी याद है कि मैं अकेले कभी-भी राधा की बावड़ी पर नहीं गया था। लेकिन जब दादाजी के साथ होता तो उस बावड़ी के पास से निकलते समय उसमें झांकने का बड़ा मन करता। 
उस बावड़ी के पास ही एक बड़ा-सा पीपल का पेड़ था। उसकी लंबी-लंबी लटकी हुई जड़ें और हवा के वेग से झूलती शाखाएँ उस बावड़ी के माहौल को थोड़ा डरावना बना देती थीं। मैं डर के मारे दादाजी का हाथ जोर से पकड़ लेता तो वे मुस्कुरा देते और मुझे गोद में उठा लेते। मैं भी उनसे लिपट जाता कि कहीं गलती से भी बावड़ी की राधा मुझे देख न ले। बहुत मन करता कि पूछुं… उसे राधा की बावड़ी क्यों कहा जाता है… लेकिन कभी किसी से पूछने का मेरा साहस ही न हुआ? 
कुछ समय बाद मैं पिताजी के साथ शहर आ गया। दादाजी भी गांव की सारी सम्पत्ती बेचकर हमारे ही साथ रहने लगे। हमारा गांव जाना बंद भी हो गया लेकिन… राधा की बावड़ी का रहस्य जानने की उत्सुकता मुझे सदा ही बनी रही। 
गांव की सुनहरी और थोड़ी- सी डरावनी… यादों को पीछे छोड़ते हुए मैं बड़ा होने लगा। लेकिन जब भी किसी किले या पुरानी इमारत का गाइड किसी बावड़ी की बात बताता तो मेरे मन के किसी कोने में छिपी राधा की बावड़ी मुखर हो उठती।
आखिर इस बार की छुट्टियों में मैंने गांव जाने का सोचा।
यूँ तो हमारा गांव बहुत दूर न था। कार से जाओ तो 7-8 घन्टे में गांव पहुँचा जा सकता था लेकिन… इन बरसों की दूरी ने हमें गांव से बहुत दूर कर दिया था। 
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सुबह रोज से थोड़ा जल्दी उठकर, सफर में लगने वाले सामान का बैग उठाकर मैंने कार में रखा और… “उस पुरानी बावड़ी का रहस्य किसी किले से कम न होगा”… यही सोचते हुए मैंने अपनी कार गांव की ओर मोड़ दी। 
मैं आज लगभग 25 साल बाद गांव आया था। चूंकि अब गांव में अपना कहने के लिए हमारा घर तो रह नही गया था इसलिए मैं सीधे माली काका के पास पहुँचा। माली काका मतलब… रघु काका। मेरे दादाजी की कोठी के माली और दादाजी के सबसे विश्वासपात्र नौकर। 
मुझे बचपन में उनसे बड़ा लगाव था। इसलिए उनकी छवि मेरे मन मे बसी हुई थी।
“रघु काका गांव में जरूर मिल जाएंगे”… यही सोच मुझे उनके पास ले आई थी। उन्हें देखते ही मैंने उनके पैर छुए तो उनकी बुरी हड्डियाँ चटक उठीं। उन्होंने ड़गमगाते कदमों से उठने की कोशिश की तो मैं खुद ही उनके पास बैठ गया। 
मुझे देख उनकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गयी । वे मेरे चेहरे पर कुछ ढूंढ रहे थे। बार-बार मेरे सर पर हाथ फेरते हुए वे मुझसे बहुत सारी बातें कर रहे थे। लेकिन मेरा मन तो राधा की बावड़ी पर ही अटका हुआ था। काका से मुझे स्नेह तो था लेकिन आज यहाँ आने का मेरा मकसद कुछ और था।  
मुझे अनमना-सा देख काका ने पूछा, “क्या हुआ? कोई बात है क्या मन में? बता तो।”
काका की अनुभवी आँखों ने मेरी बैचेनी पकड़ ली थी तो मैंने भी गोल घुमाकर कहने की जगह सीधे ही पूछ लिया, “काका, आपको वो राधा की बावड़ी याद है? वह बावड़ी अभी-भी वही हैं क्या?” 
राधा की बावड़ी के नाम पर ही मेरी आँखों में चमक आ गई थी। 
मेरे मुँह से राधा की बावड़ी सुन पहले तो काका सहम से गए लेकिन फिर मुस्कुराते हुए बोले, “अच्छा… तो तुझे उस बावड़ी की याद यहाँ खींच लाई है।”
काका की निश्छल मुस्कान से मैं सकुचा गया, “नहीं-नहीं काका, ऐसी बात नहीं। मैंने तो यूँ ही….”
“चल, मुझे सहारा दे। मैं ले चलता हूँ तुझे बावड़ी के पास,” इतना कह काका डगमगाते हुए उठ खड़े हुए।
बावड़ी का रहस्य खुलने के विचार से ही मेरे रोंगटे खड़े होने लगे। बचपन से ही वह मेरे लिए एक रहस्य बनी हुई थी जिसपर से आज पर्दा उठने वाला था।
कुछ देर बाद हम दोनों उसी पीपल के पेड़ के पास खड़े थे जिसके ठीक नीचे राधा की बावड़ी थी। आज पहली बार मैं उस बावड़ी में झांकने की हिम्मत कर पाया।
बावड़ी काफी गहरी थी। उसके घेरे में चारों ओर से सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। बीच-बीच में कुछ ऊंचे-नीचे चबूतरे भी थे जिन पर शायद कुछ छोटे-छोटे कमरे बने हुए थे। 
मैंने काका की ओर देखा, “काका! इसे राधा की बावड़ी क्यों कहते हैं? यह राधा कौन थी?” मेरे चेहरे पर कई प्रश्नचिन्ह टँगे हुए थे।
मेरा प्रश्न सुनते ही काका जैसे गहरी नींद से जागे लेकिन तुरन्त ही संभलकर मेरी बात टालने के अंदाज में बोले, “बेटा, घर चलें। मुझसे अब और खड़ा न रहा जाएगा?”
“क्या बात है काका? आप राधा को जानते थे क्या?” उनका इस तरह मौके पर आकर लौटना मेरे मन मे और प्रश्न खड़े कर रहा था।
आखिर काका मेरा कंधा पकड़कर वहीं बैठ गए। वे जहाँ बैठे थे वहाँ से बावड़ी की एक कमरे नुमा जगह दिखाई दे रही थी।
काका ने अपनी तर्जनी से उस ओर इशारा करते हुए कहा, “वहाँ रहती थी राधा।” 
मैंने अचकचाकर काका को देखा तो काका बोले, “एक जमींदार हुआ करते थे। उनकी ताकत और दौलत का नशा उनसे ज्यादा उनके बेटे पर चढ़ा हुआ था। वह गांव की हर एक लड़की को अपनी जागीर मानने लगा था। उन्हें पाना ही उसका एक मात्र काम रह गया था।” यह बताते हुए काका की एक-एक इस फड़क रही थी। उनका चेहरा गुस्से में लाल हो उठा था। अपने गुस्से पर काबू पाते हुए वे बोले, “लेकिन एक दिन….उसने राधा को देखा…”
“फिर क्या हुआ काका?” मैं अधीर हो उठा।
“राधा में न जाने ऐसा क्या था जो उससे मिलने के बाद जमींदार का बेटा पूरा बदल गया। वह राधा से प्रेम करने लगा। राधा ही उसका सबकुछ हो गयी और एक दिन… एक दिन वह राधा के साथ अपने पिता के सामने जा खड़ा हुआ।”
“……” मैं फटी फटी आँखों से राधा की कहानी सुन रहा था।
“राधा पेट से थी। उन दोनों को देखकर जमींदार आगबबूला हो उठे। और… और… उन्होंने राधा को इस बावड़ी में… उस… उस जगह पर कैद करवा दिया।”
“कैद?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ… कैद ! वे चाहते तो उसे मरवा भी सकते थे। लेकिन बेटे की आजीवन कुंवारे रहने की कसम के कारण शायद उन्हें राधा की कोख में पल रहे बच्चे ने ऐसा करने से रोक दिया था,” काका ने गहरी सांस ली। अपनी गीली हो आई आँखों को अपने गमछे से पोंछते हुए वे आगे बोले,
“धीरे-धीरे राधा के दिन भरने लगे। और एक दिन… एक दिन उसने एक सुंदर से लड़के को जन्म दिया। बच्चे को जन्म देते समय राधा जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। पूरा गांव जानता था कि राधा वहाँ कैद है और उसे मदद की जरूरत है लेकिन किसी की भी जमींदार के खिलाफ न आवाज उठाने की हिम्मत हुई और न ही राधा की मदद करने की।”
“जैसे ही जमींदार को राधा के बेटा पैदा होने की खबर मिली तो उन्होंने… उन्होंने अपने एक नौकर को बच्चे को लाने के लिए भेजा। वह नौकर बावड़ी की इन्हीं घुमावदार सीढ़ियों से उतरता हुआ राधा के कमरे तक पहुँचा और… और उस बच्चे को राधा से… छीन लिया….”
“और राधा?” मेरी आँखें भी नम हो उठी थीं।
काका की आँखों में फिर पानी भर आया, “उसके बाद राधा को किसी ने नहीं देखा। कोई कहता वह कहीं चली गई, कोई कहता उसने बच्चे से बिछुड़ने के बाद इसी बावड़ी में कूदकर जान दे दी। कोई कुछ कहता… तो कोई कुछ। लेकिन उसके बाद लोगों ने बावड़ी से पानी पीना छोड़ दिया था और यह बावड़ी… भूतहा-सी हो गई।” इतना कह माली काका चुप हो गए।
मैं काफी देर तक उन्हें देखता रहा। फिर धीरे से बोला, “माली काका! राधा आपकी बेटी थी न?”
माली काका की बूढ़ी आँखे और बूढ़ी हो गईं। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा और घर चलने के लिए कहा। मैंने उनका हाथ थाम लिया और हिम्मत कर पूछा, “और… और वह बच्चा?”
काका ने घबरा कर इधर-उधर देखा जैसे कोई उनकी बात सुन न ले। फिर मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोले, “वह बच्चा… वह बच्चा कुछ सालों बाद अपने पिता के साथ शहर चला गया बेटा और… और आज पूरे 25 साल बाद वापस आया है… अपनी राधा माँ से मिलने।”
मेरा दिल जोर से उछल पड़ा। मैं उनसे अपना हाथ छुड़वा तेजी से पीछे हट गया। मुझे इस झटके से उबरने में समय लगा। काका मुझे देखते रहे।
मैं थोड़ी देर बाद बोला, “तो क्या र… रा… राधा… म… अभी-भी जिंदा है?”
मेरे इस प्रश्न पर सकते में आने की बारी अब माली काका की थी। वे बड़ी कठिनाई से बोले, “वह नौकर जो राधा के बच्चे को उससे छीन कर ले गया था वह मैं…. मैं ही था… मैं राधा का अपराधी हूँ… म… मैंने… मैंने ही मालिक के कहने पर अपने हाथों से… अपनी बच्ची राधा को इस बावड़ी में….”
अब वहाँ एक पल भी और रहना मुझे गंवारा न था। मैं तेजी से अपनी कार की ओर बढ़ा। सीट पर बैठे-बैठे ही मैंने बावड़ी को प्रणाम किया और कार का एक्सलेटर दबा दिया।
राधा और राधा की बावड़ी का रहस्य तो मेरे सामने खुल चुका था लेकिन अपने पिताजी और दादाजी से राधा का हिसाब मांगने मैंने कार शहर की ओर मोड़ दी।
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