पुराने ज़माने में स्त्री और पुरुष के काम बांटे गए । स्त्री गर्भधारण करती है। बच्चों को जन्म देती है। इसलिए बाहर के काम उसके लिए मुश्किल थे तो घर के कामों की जिम्मेदारी स्त्री के हिस्से में आई और परिवार के भरण पोषण की बाहर जाकर कमाने की जिम्मेदारी पुरुष की तय की गई । स्त्रियों ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और घर को स्वर्ग बनाने लगी । घर का बजट भी स्त्री ही देखती और छोटी छोटी बचत करती । हर काम हाथों से करती । गृहस्थी की गाड़ी प्यार और सहयोग से चलने लगी फिर अचानक पुरुष को घमंड होने लगा । उसे लगने लगा वो स्त्री को पाल रहा है, स्त्री उसकी गुलाम है और उसके बिना स्त्री कुछ नहीं । उसके बाद शुरू हुई पुरुष सत्ता या कहें पुरुषसत्तात्मक समाज । स्त्री बेचारी दिल से सोचती रह गई और पुरुष ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया । एक स्त्री के खिलाफ दूसरी स्त्री को खड़ा किया और शुरू हुई स्त्री पर जुल्म की दास्तान । कई पीढ़ियों तक ये सब चलता रहा और फिर एक दिन स्त्री में हिम्मत आना शुरू हुई, पुरुष के सामने खड़े होने की ।
स्त्री को अहसास हुआ कि जो पुरुष कर सकता है वो मैं क्यों नहीं ? पुरुष को अपनी कमाई का घमंड था स्त्री ने घर के भीतर और बाहर काम करके कमाने के रास्ते खोजे और पुरुष को बता दिया कि तेरे बिना भी मैं जी सकती हूँ । देवी को पूजने वाला पुरुष भले ही भूल गया था स्त्री की शक्ति को लेकिन स्त्री को अपनी शक्ति याद दिलाने में पुरुष का ही हाथ था । पुरुष को सिर्फ कमाना आता था लेकिन स्त्री को घर चलाना, बच्चों को संभालना, परिवार को संभालना सब कुछ आता था । पुरुष बिलबिलाया गुस्से में तमतमाया स्त्री के रास्ते में रोड़े अटकाये लेकिन अब वो स्त्री का रास्ता रोकने में नाकामयाब रहा । वक्त ने करवट ली जो स्त्री पुरुष के पीछे चलती थी वो पुरुष को पीछे छोड़ आगे निकलने लगी और पुरुष से ही स्पर्धा करने लगी । स्त्री अब हर वो काम करने की कोशिश करने लगी जिसे सिर्फ पुरुष करते थे और इसी बात का घमंड था । बराबरी की दौड़ में स्त्री का स्त्रीत्व खत्म होने लगा उसकी शर्म, पर्दा सब पीछे छूटने लगे अब वो भी पुरुष की तरह पहनावा पहनने लगी।
पुरुष की तरह जीने लगी, नशा करने लगी, उसके दिमाग में अब सिर्फ पुरुष को पछाड़ने की भावना ही थी और एक ही आवाज थी ‘वो कर सकता है तो मैं क्यों नहीं ? धीरे धीरे उसके सोचने का तरीका बदला दिल से सोचने वाली स्त्री भी पुरुष की तरह दिमाग का इस्तेमाल करने लगी और जिस दिन स्त्री ने दिल के बजाय दिमाग से सोचना शुरू किया उसी दिन से समाज और परिवार का गणित बिगड़ने लगा क्योंकि जिस स्त्री के लिए परिवार पहले था, आज वो स्वार्थी हो गई और सबसे पहले खुद की खुशी, खुद इच्छाओं को ऊपर रखना शुरू कर दिया । उसने भी पुरुष के खिलाफ पुरुषों को इस्तेमाल करना सीख लिया ।
आज स्त्री आजाद है, आत्मनिर्भर है, वो समाज को स्त्री सत्तात्मक बनाने की ओर अग्रसर भी है, लेकिन पुरुष की कमाई पर अपने अधिकार को छोड़े बिना वो खुद को मजबूत दिखाना चाहती है जो उसे मजबूत नहीं क्रूर बना रहा है । कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है, आज शायद वही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है पुरुष ने जो किया वही आज स्त्री कर रही है । स्त्री के इस बदलाव ने आज अखबारों की हेडलाइन बदल दी है – 30 वर्ष पहले की खबर – स्टोव फटने की वजह से एक लड़की 80 प्रतिशत झुलसी ससुराल वालों के जुल्म से तंग आकर लड़की ने जहर खाया, प्रेमिका के लिए पत्नी को रास्ते से हटाया।
आज की हेडलाइन – पत्नी के झूठे केस से तंग आकर एक इंजीनियर ने फांसी लगाई या प्रेमी के साथ मिलकर पति का कत्ल किया।
लेख काफी महत्वपूर्ण है अर्चना जी। आपने सामयिक और एक तरह से वर्तमान की समस्या को इस लेख में आकार दिया। परिवर्तन तो जरूरी था लेकिन परिवर्तन का प्रारूप बिगड़ गया।
यह लेख आज का ज्वलंत विमर्श का विषय है।
बधाई आपको एक महत्पूवर्ण विषय की और ध्यान केंद्रित करने के लिये।