Tuesday, July 16, 2024
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अरूणा सब्बरवाल की कहानी – कहा-अनकहा

अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था ।दोपहर के बारह बजने वाले थे ।घड़ी  की सुई अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जा रही थी । उसका तो नामोनिशान नहीं था ।ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ ।वह तो सदा एक घंटा पहले ही यहाँ आ बैठता है ।आज ऐसा क्या हो गया है ? उस दिन उसकी सोशल वर्कर कह रही थी , कि जब से उसने आपकी सर्जरी में आना शुरू किया है ,यहाँ आने की बड़ी बैचेनी से प्रतीक्षा करता है ।अब तो उसके व्यवहार में भी ग़ज़ब का परिवर्तन आ गया है। अब वह झूमता है ,गाता है , नाचता है , हँसता है , सब बातों को ध्यान से सुनता है । यूँ कहिए उसका पूरा ट्रान्सफ़ॉर्मेशन ही  हो गया है ।
बेशक उसकी अपॉंट्मेंट मेरे साथ हो या न हो , जब  भी वह मेरे कमरे के सामने से निकलता है , धीरे से मेरे दरवाज़े पर दस्तक दे , उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही , थोड़ा सा दरवाज़ा खोल अपना गोल -गोल चेहरा , उस पर भींची – भींची आँखें और चेहरे पर चंद्रमा जैसी हँसी फैला , अँगूठा दिखा ‘ओ के मिस ‘ कह कर चला जाता है ।मुझे देख कर पल भर के लिए उसकी ज़िंदगी  मुस्कुरा उठती है ।कितनी मासूमियत है उसके चेहरे पर , कितनी निर्मल और स्वच्छ है उसकी हँसी ।छल कपट की गन्ध तो जैसे उसके पास से  गुज़री तक न हो कभी । मुझे उसकी अब चिंता होने लगी थी । मरीज़ों की लिस्ट समाप्त होते ही मैने रिसेप्शन डेस्क से पुछा ‘ लिज़ तुमने जॉर्ज को देखा है क्या ?’।
‘ मिस डेज़ी, आज तो जॉर्ज की अपोईंटमेंट नहीं है ।’
‘ आज मंगलवार है उसे लिस्ट पर होना चाहिए था ।’
‘ मिस डेज़ी जॉर्ज तो पिछले सप्ताह भी क्लीनिक के अंदर तक  भी नहीं आया था । बाहर से ही  वापस चला गया था । पिछले सप्ताह जब मैंने बाहर शोर सुना तो , बाहर जॉर्ज अड़ियल बच्चे की तरहें ज़िद पकड़े बैठा था कि मैं अंदर नहीं जाऊँगा , मिस विलियम ने बहुत समझाया , किंतु वह टस से मस नहीं हुआ , ज़ोर ज़ोर से बड़बड़ाता और पैर पटकता रहा , मुझे कहने लगा ,अब मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता ।मैं अंदर नहीं जाऊँगा ।’
‘ मिस डेज़ी तो तुम्हारी दोस्त है’ सोशल वर्कर ने कहा ।
‘ नहीं , नहीं अब वह मेरी दोस्त नहीं है ।’
‘लेकिन तुम्हें तो वह बहुत अच्छी लगती है ।’
‘ नहीं   अब नहीं ,अच्छी लगती ।’
‘ प्लीज़ जॉर्ज ,तुम एक अच्छे लड़के हो , चलो मिस डेज़ी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है ‘।
‘ मुझे इसकी परवाह नहीं । अब मैं उस से नफ़रत करता हूँ , मुझे अब यह जगह भी नहीं अच्छी लगती ।’
जॉर्ज सभी को धक्के मार रहा था , पता नहीं उसमें इतना ज़ोर कहाँ से आ गया था , उस वक़्त ‘।
पच्चीस वर्ष के नौजवान शरीर में एक दस वर्ष का जकड़ा बालक विद्रोह पर उतर आया था।
जॉर्ज का गठा-गठा शरीर, गोल – मटोल छोटा सा चेहरा , छोटी-छोटी गोल आँखें , पापड़ी जैसा चपटा नाक । उसकी आँखों की निश्छलता और उसके चेहरे पर स्थाई  मुस्कुराहट , उसके विनम्र 
स्वभाव को और लुभावना बना देती थी ।चाहे कितने भी दर्द में क्यूँ न हो , जहाँ से निकलता अपनी निश्चल मुस्कुराहट  बिखेरता जाता था ।भगवान ने उसके साथ बहुत बड़ा छल  दिया था । यूँ कहिए अन्याय किया था ।उसे सब बच्चों से  हट कर बनाया था । पेदायिशि डाउन- सिंड्रोम होने के करण वह स्पेशल एजुकेशनल नीड्ज़ सेंटर में रहता था ।वह सेंटर हमारी क्लीनिक से जुड़ा होने के कारण उन बच्चों के देखभाल करना हमारी ज़िम्मेदारी थी ।हमारी ज़िम्मेदारी थी कि हम जॉर्ज और उसके साथियों की सोशल डिसबिलिटीज़ में सुधार ला के उन्हें इस क़ाबिल बनाएँ की वह  वह मुख्यधारा में एड्जसट हो सकें ।जॉर्ज हर मंगलवार को मेडिकल चेक अप के लिये आता था ।एक सप्ताह डॉकटर
के पास दूसरे सप्ताह नर्स के पास बी.पी .वज़न , ख़ून टेस्ट और छोटी-मोटी समस्याओं के लिये ।
आज मेरी क्लीनिक में जॉर्ज पहली बार अपनी सोशल वर्कर के साथ आया था । दोनो कमरे में बैठे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे । मिस विल्लीयम तो अख़बार पढ़ने लग गयी और जॉर्ज अपने दोनो हाथ घुटनों में दबाये कुर्सी पर बैठा आगे – पीछे झूम रहा था ।
‘ जॉर्ज टॉमस ‘ मैंने पुकारा ।
‘ एस मिस ‘जॉर्ज बच्चों की भाँति अपना हाथ उठा  कर के बोला फिर जल्दी  से अपना हाथ घुटनों में छिपा लिया ।
‘ गुड मोर्निंग जॉर्ज ‘
सिकुड़ के बैठे- बैठे ही उसने सिर हिला कर धीरे से कहा ‘ गुड मोर्निंग मिस ।’
‘ जॉर्ज अंदर आओ, बैठो ‘मैंने कुर्सी की ओर इशारा करते कहा । वह सिकुड़ के कुर्सी पर बैठ गया  
‘ जॉर्ज अगर तुम शर्माते रहोगे , तो हम दोस्त कैसे बन पाएँगे ?’ मैंने कहा ।
‘डॉक्टर तुम मेरी दोस्त बनोगी’? वह धीरे से फुसफुसाया ।
‘ हाँ हाँ , क्यूँ नहीं ‘ उसके नोट्स मैं उसके आने से पहले ही पढ़ चुकी थी ।
‘ जॉर्ज प्लीज़ दायीं बाज़ू से अपनी क़मीज़ ऊपर करो , तुम्हारा ब्लड -प्रेशर चेक करना है , फिर तुम्हारा  वज़न ‘।
उसने हिला कर कहा ‘ ओ. के मिस ‘।
अपना काम समाप्त होने पर मैंने कहा ‘ जॉर्ज अब तुम जा सकते हो ।रिसेप्शन से दो हफ़्ते की अपॉंट्मेंट ले लेना ‘ वह अभी तक  सर नीचा किये बैठा था ।
‘ चलो जॉर्ज ‘ मिस विल्लीयम के साथ वह ऊठ कर सिर नीचा किये बाँय -बॉय करता चला गया ।
हर दूसरे मंगलवार को वह निरंतर आता रहा । धीरे -धीरे वह कपड़े की तह की भाँति खुलने लगा था ।अब तो वह मंगल की दिनचर्या से  वाक़िफ़ हो चुका था ।
‘ जॉर्ज आज तुम बड़े स्मार्ट लग रहे हो ‘।
‘ थैंक यू मिस ‘ उसने मुस्कुराते कहा 
‘आओ वज़न देखते है ‘।
मशीन पर चढ़ते ही उसने  पढ़ना आरम्भ कर दिया और बोला ‘ मिस यह दो-दो नम्बर क्यूँ है ?’।
‘ एक किलोग्राम और दूसरा पाउंडस ‘।
‘ यह पैसों वाला पाउंड्ज़ है क्या ‘?।
‘ नहीं ,  यह वज़न के संदर्भ में आता है ।’
उसने अपने भोलेपन और लुभावने आचार – व्यवहार से सबका मन जीत लिया था ।
‘ मिस विल्लीयम आज से आप बेशक जॉर्ज के साथ मेरे कमरे में मत आना , उसे थोड़ा आत्मनिर्भर होने का मौक़ा देते हैं ‘ डॉक्टर ने सोशल वर्कर से कहा 
‘ मिस डेज़ी जैसा आप ठीक समझें , मैं उसका बाहर इंतज़ार करूँगी ।’
उस दिन के बाद जॉर्ज ने अकेले ही आना आरम्भ कर दिया ।
कमरे में दस्तक होते ही  मैंने कहा ‘ अंदर आओ जॉर्ज ।’
‘गुड मॉर्निंग मिस ‘।
‘ गुड मोर्निंग,  बैठो ‘।
बी. पी. लेते समय वह मेरी बी. पी.मशीन को ग़ौर से टकटकी लगाए देख रहा था ।
‘ मिस डेज़ी क्या मैं इसे हाथ में ले सकता हूँ ?।’
‘ क्यूँ नहीं , पर इसका कोई बटन मत दबा देना ‘। 
जब भी मैं उसका बी .पी. चेक करती हूँ तो वह बड़ी उत्सुकता से उसे ऊपर नीचे चढ़ता-उतरता देखता रहता था ।
जॉर्ज हर  बार अपनी बनाई हुई चीज़ मुझे दिखाने के लिए ज़रूर लाता , एक दिन वह अपनी किताब लाया और कहने लगा मिस ‘ मैं यह किताब पढ़ सकता हूँ ।’
‘ बड़े होशियार हो गए हो जॉर्ज ।’
अपनी प्रशंसा सुन कर  भला कौन  ख़ुश नहीं होता ,  मेरा इतना कहना था कि वह दीवारों पर लगे पोस्टर पढ़ने की कोशिश करने लगा ।
‘ बड़े उत्साह से बोला मिस डेज़ी एक दिन मैं आपकी तरह डॉकटर बन जाऊँगा ।’ अब रेल की भाँति उसके जीवन में गतिशीलता आनी शुरू हो गयी थी ।
‘ अब तो जब तुम मेरा बी . पी . चेक -अप करोगे तब मुझे ख़ुशी होगी ।’
‘ हाँ मिस ज़रूर करूँगा ‘।
‘ जॉर्ज अब तुम जाओ।  मिस विल्लीयम तुम्हारा इंतज़ार कर रही है ।’ वह अँगूठा दिखा के चला गया ।उसके आत्मविश्वास को देख कर मुझे अपनी सफलता का एहसास होने लगा ।अब वह अपने भविष्य के बारे में सोचने लगा था ।मैं जल्दी  से अपना बैग उठा कर चल दी , आज मुझे अपने मंगेतर से मिलना था ।जैसे ही घर पहुँची मेरा मंगेतर पीटर मेरा इंतज़ार कर रहा था ।
‘ हाय पीटर , माफ़ करना थोड़ी देर हो गयी है ।’
‘ क्या बात है।  बड़ी ख़ुश लग रही हो ?।’
‘ सोचो क्या हो सकता  है ? आज जॉर्ज नर्स बनने की बात कर रहा था ।उसमें भी इच्छाएँ उभरने लगीं हैं ।’
‘ डेज़ी प्लीज़ ,इस वक़्त तुम क्लीनिक में नहीं , मेरे साथ हो । कोई रोमांटिक बात करो हमारी शादी होने वाली है । वैसे भी बहुत काम करने हैं ।शादी के लंच का मैन्यू भी तो बनाना है ।’ 
‘ ठीक है ,कल  शुक्रवार है , वीकेंड में करेंगे ।’
‘ पूरा वीक एण्ड तो हमें शादी की तैयारियों में लग गया ।  पीटर अपने घर चला गया ।’
अब तक सर्दियाँ शुरू हो चुकी थीं , ज़ुकाम ,बुखार, और फ़्लू के टीके लगवाने के लिये लम्बी  क़तार लगी थी । आज सर्जरी का ओपन डे था , फ़्लू टिके के लिए अपॉंट्मेंट की कोई आवश्यकता नहीं थी ।क्लीनिक में व्यस्थता के कारण ,न जाने समय कहाँ उड़  गया ।इतने में दस्तक हुई ,मैंने घड़ी देखी 
‘अन्दर आ जाओ जॉर्ज ।’
‘ गुड मोर्निंग मिस ‘जॉर्ज ने बड़े आत्मविश्वास से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया ।उसका दूसर हाथ अभी तक उसकी जेब में ही था और बाज़ू सट कर शरीर से चिपका था ।
दो बार कोशिश करने पर भी जब मुझे ख़ून लेने के लिय नाड़ी नहीं मिली , तो मैंने उसे दूसरा हाथ देने के लिए कहा ।
दूसरा हाथ तो क्या देना था , सर हिलाते उसने उस बाज़ू को अपने शरीर के साथ और चिपका लिया ।
‘ जॉर्ज प्लीज़ मुझे टेस्ट के लिय ख़ून चाहिये।’
उसने झिझकते -झिझकते जैसे ही अपना दूसरा हाथ जेब से निकला , उसके हाथ में एक जंगली डेज़ी  के फूलों का छोटा सा गुच्छा था ।वह गुच्छा मेरी ओर बढ़ाते फुसफुसाते बोला 
‘ मिस डेज़ी यह आपके लिये है ।’
‘ थैंक यू जॉर्ज इस ख़ूबसूरत फूलों के लिए ।सुबह – सुबह कहाँ से लाए हो इतने सुंदर फूल ।’
‘ मिस ए.टी.सी. (अडल्ट ट्रेनिंग सेंटर ) के गार्डन से ।’
वह डेज़ी फूलों की तरह मुस्कान बिखेरता चला गया । आज उसने मेरे दिल को थोड़ा ओर छू लिया था ।यूँ कहिए मेरे दिल में थोड़ी और जगह बना चुका था ।क्लीनिक के पश्चात् मुझे पीटर के साथ मिलकर अतिथितियों के बैठने का इंतज़ाम करना था ।जैसे ही घर पहुँची पीटर इंतज़ार के रहा था ।
‘ सॉरी पीटर ,बहुत ट्रैफ़िक होने के कारण देर हो गयी ।’
‘ डेज़ी आज तुम्हारी मुस्कुराहट कुछ कह रही है ?।’
‘ठीक कह रहे हो , आज मेरे चाहने वाले ने मुझे फूलों का गुलदस्ता दिया है ।’
‘ मैं भी तो देखूँ तुम्हें चाहने वाला दूसरा कौन है ?’।
‘ यह देखो ।’
‘ पीटर ज़ोर से हँसता हुआ बोला तुम इन जंगली फूलों को गुलदस्ता कहती हो डीयर ?।’
‘ प्लीज़ ,पीटर मज़ाक़ उड़ाओ बेचारे का , यह सोचो कि उसने कितनी मेहनत की होगी , सुबह -सुबह फूल चुनने में ।’ 
‘ डेज़ी कभी -कभी इतनी भावुक क्यूँ हो जाती हो ? चलो अब जल्दी करो बहुत सारे कम करने हैं ।पहले अतिथियों की लिस्ट बनाते हैं ।’
‘ पीटर वह शाम को घर पर भी बना सकते हैं ,चलो पहले फ़्लैट का काम करते हैं । वहीं पिज़्ज़ा मँगा लेंगे ।’ उस रात मैंने और पीटर ने फ़्लैट का पूरा काम समाप्त के दिया।  अब केवल फ़र्निचर की डेलिवरी बाक़ी थी ।
अब तो मुझे जॉर्ज का इंतज़ार रहता ।वह बाक़ी मरीज़ों से हट कर था ।अब तो सोशल वर्कर भी उसे बाहर ही छोड़ जाती और बारह बजे आ कर ले जाने लगी थी ।
दरवाज़े पर दस्तक हुई ‘ कम इन जॉर्ज ‘।
‘ गुड मोर्निंग मिस ‘ वह ख़ुद ही बी .पी चेक के लिए अपनी क़मीज़ की बाज़ू ऊपर करने लगा ।
‘ जॉर्ज आज बी . पी चेक नहीं करना है ।अभी – अभी कम्प्यूटर में तुम्हारी रिपोर्ट देखनी है ।मुझे कम्प्यूटर में झूझते देख कर , जॉर्ज से रहा नहीं गया और बोला 
‘ मिस क्या मैं इसे ठीक कर सकता हूँ ?’
मैंने झिझकते हुए कहा ‘ मुझे थोड़ी ओर कोशिश करने दो ।’ कोशिश करते – करते मैं हताश हो चुकी थी , मेरे पास और रास्ता नहीं था मैंने कहा 
‘ठीक है जॉर्ज ।’ और मैं उसके साथ वाली कुर्सी  पर बैठ गयी , न जाने उसने कौन सा बटन दबाया  मेरा कम्प्यूटर चल पड़ा।’
जॉर्ज अपनी सफलता पर ख़ुश हो कर ख़ुद ही तालियाँ बजाये जा रहा था
‘मैंने ठीक कर दिया …मैंने ठीक कर दिया ।’ वह सदैव अपनी तरफ़ मुझे प्रभावित करने की कोशिश करता रहता ।उसकी ख़ुशी उसके पूरे शरीर पर झलक रही थी -मानों एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ कर आ रहा हो ।
इधर मैं बहुत व्यस्त थी , शादी की अब केवल कुछ ही हफ़्ते रह गये थे और अभी तक शादी को जोड़ा भी तैयार नहीं था ।केक के ऑर्डर में भी कन्फ़्यूज़न हो रहा था । चर्च के पादरी की भी कॉन्फ़र्मेशन नहीं हुई थी ।फूलों का भी ऑर्डर भी देना था ।फिर क्लीनिक में भी आना था ।
आज जॉर्ज को शादी की छुट्टियों से पहले आख़िरी बार मिलूँगी ।मैं रिसेप्शन में उसे ख़ुद लेने चली गयी ।
जॉर्ज वहाँ नहीं था ‘ लिज़ आज जॉर्ज नहीं आया क्या ?।’
‘ देखा नहीं , वह तो हमेशा एक घंटा पहले ही आ जाता है , शायद बाथरूम गया होगा ।’
‘ मिस डेज़ी आज तो जॉर्ज ख़ुशी से गुनगुना रहा था , कह रहा था की मिस के लिए ख़ुशख़बरी है ।बहुत उत्साहित था । जब मैंने पूछा क्या ख़ुशख़बरी है तो बोला 
 ‘ तुम्हें नहीं , मिस डेज़ी को ही बताऊँगा ।’
‘ ठीक है जब वह बाथरूम से आए , उसे मेरे कमरे में भेज देना ।’
‘ कम इन जॉर्ज , तुम्हारी मुस्कुराहट कुछ कहना चाहती है ।लौटरी निकली है क्या ? ‘। 
‘ नहीं नहीं मैं जुआ नहीं खेलता , मिस ।’
 ‘ मैं भी तो सुनूँ, ऐसी क्या बात है ।’
 मिस अथॉरिटी के लोग कहते हैं , अब तुम आत्मनिर्भर हो गये हो । अकेले रह सकते  हो । अगर मैं ऐसे ही अच्छा काम  करता रहा , तो वे लोग मुझे मेरा अपना फ़्लैट ले देंगे ।वे मुझे शोप्पिंग करना , खाना बनाना ,घर की देखभाल करना,सब कुछ सिखाएँगे । वहाँ मैं अपनी मर्ज़ी से सोऊँगा,उठूँगा , जब चाहे ,जितना चाहे खाऊँगा ।वह मेरा अपना घर होगा ‘ कुछ रुक के बोला । 
‘ मिस अगर मैं तुम्हारे लिए खाना बनाऊँगा तो क्या तुम मेरे घर आओगी ?’।
‘ हाँ , हाँ , ज़रूर ,अगर तुम पकाओगे ।’
‘ मिस ….मिस …वह अपनी अंगुलियों से खेलता बोला एक बात कहनी है ।उसने शर्माते कहा ‘।
‘ हाँ बोलो ।’
‘ मिस आप बहुत अच्छी हैं ।’
‘ क्यूँ ऐसा क्या कर दिया मैंने ?।’
‘ मिस , यू ट्रीट मी लाईक ए मैन ।’
 इतना कह कर वह शर्माते हुए कमरे से बाहर चला गया ।उसके दिल में जज़्बात आहट देने लगे थे 
उसकी ऐसी बातों ने मुझे सोचने पर बाध्य कर दिया था ।मैं ख़ुश होने के स्थान पर चिंतित थी ।आज मेरे मन में प्रश्नों का तूफ़ान  उफ़ना रहा था ? सोचने लगी ‘ क्या मैं उस मासूम के दिल में अपने प्रति प्रेम की भावनाएँ तो नहीं जगा रही ? क्या मैं उसकी आशाएँ तो नहीं बाँध रही ? कही उसे धोखे में तो नहीं रख रही हूँ ?’।यह अंतरद्वन्द अब डेज़ी के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था ।
वह सोचती रहती की जॉर्ज की निर्मल मुस्कुराहट उसके दिल में ख़ुशियाँ बिखेर कर बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाती हैं । जॉर्ज में पनपते आत्मविशास को वह तोड़ना नहीं चाहती थी । थी तो सदा वह चाहती थी । अपनी सफलता पर प्रफुलित होते हुए भी तनिक उदास थी । वह सही निर्णय लेने में घबरा रही थी ।विचारों के साथ -साथ उसके विवेक ने सुझाया कि शादी के बाद वह जॉर्ज को किसी अन्य नर्स की लिस्ट में दल देगी ।
उस दिन जॉर्ज ख़ुशी – ख़ुशी अपने सेंटर वापस गया ।सेंटर में उसे काम करने के थोड़े पैसे भी मिलते थे , और दायरे में बाहर जाने की स्वतंत्रता भी थी ।उस दिन वह और उसके दोस्त सोशल वर्कर के साथ शोप्पिंग करने गए ।उसने अपने लिए एक नीली धारियों वाली क़मीज़ और मैचिंग टाई ख़रीदी ,ड्राई क्लीनर से अपना सूट उठाया फिर फूलों का गुलदस्ता और सब की  नज़रों से बचा कर रोल्ड की अँगूठी ख़रीदी ।सेंटर में पहुँचते ही उसने सब कुछ अपने पुराने सूट्केस में रख दिए ।
जॉर्ज के मन में भावनाओं का तूफ़ान मचल रहा था , मैं उसके लिए वो चाँदनी थी कि जिससे उसका अंतर्मन आलोकित तो हो सकता था , किंतु शांत नहीं हो सकता था ।उसमें युवावस्था की सब तम्मनाएँ इठलाने लगीं थी ।अब वह बहुत शांत हो चुका था , अपने में ही खोया रहता था ।अब तो ग़ुस्से के दौरे पड़ने भी बंद हो गए थे ।
वह नहीं जानता था की विधाता ने उसे ऐसा बना कर इस दुनियाँ मैं उसके लिए ऊँची -ऊँची दीवारें खड़ी कर दी है । उसके लिए सीमाओं के दायरे निश्चित कर दिए  गये हैं ।
इधर मिस डेज़ी की व्हाइट वेडिंग वहाँ के एक स्थानीय कैथोलिक चर्च में बड़ी धूम -धाम से हुई ।चर्च में शादी के पश्चात् हल्का सा नाश्ता । शाम को होटेल में रिसेप्शन ।रिसेप्शन से सीधे हनीमून पर जाने वाले थे ।हनीमून  के पश्चात सीधे फ़्लैट में पहुँचे ।
पीटर और डेज़ी दोनो की छुट्टियाँ समाप्त हो चुकीं थीं । सोमवार को डेज़ी को क्लीनिक जाना था ।वह थोड़ा पहले ही  चली गयी ।तीन सप्ताह के पश्चात उसे अपना कमरा भी तैयार करना था । मरीज़ों की लिस्ट भी देखनी थी ।डेज़ी ने जॉर्ज को समझाने की ठान की थी ।
इधर जॉर्ज रोज़ कैलेंडर देख कर,जो दिन बीत जाता उसपे क्रॉस लगा देता । जैसे -जैसे मिस डेज़ी की छुट्टी क़रीब आने के दिन क़रीब आते-जाते उसका उत्साह बढ़ता जाता । कयी वर्षों के पश्चात् संदूक में पड़ा पुराण सूट निकल कर ड्राईक्लीन करवाया उसके साथ एक भी क़मीज़ और टाई ख़रीदी । शनिवार को बाज़ार जा कर फूलों का गुलदस्ता और एक कॉस्टूम अँगूठी ला कर संदूक में रख दी ।
सेंटर में सभी कर्मचारी हैरान थे की मिस डेज़ी ने जॉर्ज पर शायद जादू की छड़ी घुमा दी है ।वह हर वक़्त गुनगुनाता रहता है ।शादी – शुदा जोड़ों को देख कर ख़ुश होता है ।जने-खने पर अपनी फ़्लाईंग क़िसिज्ज लुटता फिरता । ओरों के शादी के वीडीयो देख के ख़ुश होता और गाने लगता ‘ हेयर क्मज़ द ब्राइड ‘ ।वह अब खुली  आँखो से सपने देखने लगा था ।
आज सुबह – सुबह नहा – धोकर तैयार हो गया आज डेज़ी तीन सप्ताह की छुट्टी के बाद क्लीनिक में आने वाली थीं।जॉर्ज ने , गहरे नीले रंग का सूट , नीली क़मीज़ और धारियों वाली टाई पहनी।उसने अपनी लिस्ट देखी कि उसे क्या क्या साथ लेकर जाना था । फूलों का गुलदस्ता , एक छोटी सी डिब्बी और वेल्कम कार्ड ।
    ‘ मिस विल्यम्ज़ , चलो देर हो जाएगी ,।’ जॉर्ज ने बैचेनी से कहा ‘ ।
     ‘कॉम डाउन जॉर्ज , अभी बहुत समय है ।’
     ‘जल्दी करो ।’जॉर्ज ने पैर पटकते कहा 
     हार कर मिस विल्यम्ज़ उसे साढे नो बजे क्लीनिक में छोड़ आयी ।जॉर्ज कुर्सी पर बैठा पैर हिलाता रहा ।कभी आगे – पीछे घूमने लगता , कभी अपने हाथ में पकड़े मुरझाये फूल तोड़ कर उहा- पोह डालने लगता ।घड़ी की सुई से उसकी निगाहें हटी नहीं ।
     जॉर्ज के हृदय की गति उसकी घड़ी की सुई अधिक तेज़ भाग रही थी ।आज वह एक साधारण नौजवान था ।वह एक ऐसे खिलोने की चाह कर बैठा था , जिसे वह न पा सकता था ,न छू सकता केवल दूर से ही देख सकता था ।
  पूरे साढे ग्यारह बजे जॉर्ज ने दरवाज़े पर दस्तक दी ।
‘ कम इन जॉर्ज , लव्ली तो सी यू , कैसे हो ?।’
‘ मी टू ,जॉर्ज ने उत्तर दिया ।’
‘वाह आज जॉर्ज बड़े डैशिंग लग रहे हो , क्या बात है , डार्क सूट, मैचिंग टाई , किसी डेट पर जा रहे हो क्या ? क्या नाम है उस लकी गर्ल का ?।’
जॉर्ज चुप रहा , उसकी घबराहट उसके चेहरे पर झलक लग रही थी ।फूलों का गुलदस्ता अभी भी उसने बाएँ हाथ में अपने पीछे छिपा रखा था ।
‘ बैठो तुम्हारा बी . पी. और  ब्लड टेस्ट करना है ।तीन सप्ताह हो गए हैं ।बी . पी. लेने के पश्चात्  जैसे ही डेज़ी बाएँ हाथ से नाड़ी ढूँढने लगी जॉर्ज को नज़र उसकी शादी की अँगूठी पर पड़ी , जॉर्ज कन्फ़्यूज़्ड था ।उसने अपनी जेब में हाथ डाला उसकी अँगूठी वहीं थी ।
जॉर्ज उलझन में था । यह अँगूठी तो उसने पहले कभी नहीं देखी ? उस अँगूठी ने उसके मन की वीना के तारों को इतनी ज़ोर से छेड़ा कि वह टूट के बिखर गए ।उसका दिल दिमाग़ कुछ और सोच रहा था , आँखे कुछ और दिखा रहीं थीं ।जॉर्ज निशब्द सा कुर्सी  पर बैठा था । 
जैसे ही डेज़ी अपनी कुर्सी से हाथ धोने के लिए उठी ,जॉर्ज की नज़र टेबल पर रखी डेज़ी और पीटर की शादी की तस्वीर पड़ी थी ।उसे एक से एक बड़े शूल चुभ रहे थे ।वह समझ नहीं पा रहा था कि अधिक दर्द कहाँ हो रहा है ।बेबस कल्पना से संसार से यथार्थ में आ चुका था ।मिस डेज़ी उसके जीवन में एक किरण ले कर आयी जो चमकने से पहले बुझ गयी ।वह नहीं जानता था कैसे अपने जज़्बातों को संभाले ।उसे मालूम नहीं थी सीमाएँ । इच्छाओं को दबाया जा सकता है, इससे वह अनजान था ।
‘ इतने चुप क्यूँ हो ? जैसे ही डेज़ी ने मुड़ के देखा । मिस डेज़ी के डेस्क पर पड़े शादी के कार्ड  पूरे कमरे में बिखरे पड़े थे ।और पीटर की तस्वीर उलटी पड़ी थी ।
ज़मीन पर मसले लाल फूलों का गुलदस्ता ।एक टूटी हुई लाल डिब्बी जिसमें से फ़ोल्ड गोल्ड की अँगूठी झाँक रही थी ।ऐसी पीड़ा से अनजान जॉर्ज अपना घायल मन कमरे से बाहर जा चुका था ।बिना कुछ कहे ।
अरूणा सब्बरवाल
Flat no 2, Russettings
Westfield Park
Hatch End HA5. 4JF
U.K
Sab_arun@hotmail .co.uk 
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1 टिप्पणी

  1. पूरी कहानी एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने से गुजर गई। कभी-कभी बहुत तकलीफ होती है,ऐसा लगता है कि भगवान इंसान को जन्म दे तो अच्छा ही दे शारीरिक या मानसिक रूप से भी स्वस्थ्य। हमने तो एक 7 साल के बच्चे को देखा था हमारे स्कूल में ही।इतना मासूम और बहुत सुन्दर।समर्थ परिवार।पर जब तक ठीक है तभी तक ठीक। वह सब याद आया।
    कहानी का विषय ही अलग है।पर एक बात तय है इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष बेहद मार्मिक है।
    ऐसा रोगी अगर उपचार के दौरान प्यार की राह पर चल भी पड़े तो यह स्वाभाविक ही है। पर यहाँ चिकित्सक की समझदारी अपेक्षित है।ऐसे उपचार में हर कोण से संभावनाओं पर भी नजर रहे ,यह जरूरी है वरना मरीज का पुरानी स्थिति में ही पहुँच जाने की संभावना बढ़ जाती है।
    एक जीवन्त कहानी के लिये बहुत-बहुत बधाइयाँ आपको अरुणा जी!

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