Friday, June 21, 2024
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अरूणा सब्बरवाल की कहानी – कील

बाहर खिली – खिली धूप को देखते ही उसका मन बाहर जाने को मचल उठा ।उसने अपने पैटीओ से बाहर  देखा , पेड़ शांत थे लगता था वह भी चमकती धूप का आनन्द ले रहे थे । धूप से घास पर पड़ी ओस भी यूँ चमक थी मानो प्रकृति ने चमकते हीरों की वर्षा कर दी हो । सोचने लगी आज उसका मन इतना चहक क्यूँ रहा है ।उसने चाय का प्याला बनाया और टी वी पर न्यूज़ देखते ही ख़ुशी से उछल पड़ी, आज से लंदन में लॉक डाउन खुल गया है ऊपर से उसका कोविद टीके का दूसरा डोज भी लग चुका है ।बाहर जाने की सोच से ही उसका मन चहकने लगा । आज फिर एक वर्ष के पश्चात् वह  स्वतंत्र थी ।उसने गार्डन में  धूप की तपिश को महसूस किया , आसमान भी साफ़ था ,क्यूँकि लंदन का मौसम बहुत बेवफ़ा होता है ,दिल्लगी करता है ।कपड़े मौसम को देख कर ही डालने पड़ते हैं ।छाते का बोझ तो यहाँ अपने पर्स की तरह ढोना पड़ता है ।उसने लिस्ट बनायी , नाश्ता किया , तैयार हो कर निकलने ही वाली थी कि फ़ोन की घंटी बजी ,फोन उठाना नहीं चाहती थी किंतु दिव्या का नम्बर देख कर उससे  रहा नहीं गया ।
“हाय नीना ! कैसी है ? बहुत देर हो गयी है मिले , लॉक डाउन भी खुल गया है , मौसम भी चहक रहा है । फ़ायदा उठाते हैं मौसम का…मटरगसती करने  चलते हैं , क्या ख़याल है ? “।
“ क्यूँ नहीं … मैं तो पहले से ही तैयार बैठी हूँ “ ।
“ चल फिर मिलते हैं आधे घंटे में , हैरो के सेंट ऐन में “ ( हैरो लंदन में एक county है )।
दो तीन घंटे दोनो ने बहुत मस्ती की , ख़रीददारी भी की । लगता था पूरा स्टोर ही ख़रीद डाला ।जी भर के अगली पिछली बातें कीं । बुरी तरह से थक चुकीं थी दोनों । चल पड़ी दोनो ओम्कार के पापड़ी चाट खाने .
बात कुछ चार दशक  पहले  की है नीना और दिव्या दोनो दिल्ली कनॉट प्लेस में वीज़ा के दफ़्तर में मिलीं थी । बातों बातों में पता चला दोनो  लंदन में एक ही शहर में जाने वाली थी ।फ़ोन नम्बर का लेन -देन हुआ । जल्दी ही दोनो में  गहरी दोस्ती हो गयी । दोनो के घर एक ही सिटी में  होने के कारण दोनो परिवार  , लोहे के चुम्बक  की भाँति  जुड़ गए ।एक दूसरे के लिए प्रतिबद्ध होते हुए भी स्वतंत्र अस्तित्व रखते थे । देखते- देखते दिव्या दो बेटों की माँ बन गयी और नीना दो बेटियों की ।दिव्या के बेटे जल्दी ही अंग्रेज़ी सभ्यता से वशिभूत हो कर  उसी में  रंग गये । दिव्या ने उनके नाम भी अंग्रेज़ी रख दिए । नीना की बेटियाँ अपनी भारतीयता पर  बहुत गर्वित थीं ।  बच्चों की  बढ़ती ज़रूरतों के कारण दिव्या ने बड़ा घर तो ले लिया पर दोनो का स्नेह  वैसे का वैसा ही बना रहा । दोनो परिवारों का जीवन सहज रूप से चलता रहा ।
अचानक एक दिन हार्ट अटैक आने के कारण नीना के पति का देहांत हो गया । लड़कियाँ अभी स्कूल में ही थीं ।उसे लगा, किसी बियाबान जंगल के बीच किसी छोटे से स्टेशन पर उसकी ट्रेन रुक गयी है और अनजान यात्रियों के बीच में एकदम  अकेली हो गयी है ।दिव्या भी अब उसके पास  नहीं  रहती थी । कुछ ही महीने में उसका सहज जीवन कैसे उलट-पलट गया । धीरे -धीरे संभलने लगी किंतु एक चिंता उसे चित्ता की भाँति सताती रही कि समय आने पर लड़कियों के विवाह कैसे हो होंगे , एक तो उसके पति नहीं हैं , दूसरा उसका बेटा भी नहीं है ।वह सदा प्रभु से यही माँगती  रही कि अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिय उसे शक्ति प्रदान करें और समय आने पर उसकी बेटियों के लिये अच्छे रिश्ते मिल जायें । क्यूँकि हमारे समाज  की मान्यताएँ ही कुछ ऐसी है , एक  औरत वो भी विधवा ,वैसे ही दोयम दर्जे की मानी जाती है , और उसके बच्चों को भी दोयम दर्जे का माना जाता जाता है । अब आप कहेंगे हम तो ऐसे नहीं हैं ।नीना को याद है दो तीन लोगों ने ऐसा कहा था  ‘ ओथे मत्था की लाना , ज़ेड़े घर विच बन्दा न होवे , न पति है न ही मुंडा और न ही पैसा ‘।देखा जाए तो ओदी औक़ात ही की है  ? ।
        
कुछ वर्ष पश्चात् दिव्या के पति का भी देहांत हो गया ।दोनो सहेलियाँ बच्चों  की ज़िंदगी बनाने की ख़ातिर ख़ुद को मिटाती रहीं ।समय के साथ उसके बच्चे बड़े हो चुके थे ।दोनो बेटे नील और रिकी यूनिवर्सिटी में थे ।इधर नीना की दोनो बेटियाँ भी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थीं ।समय का चक्र अपनी अनवरता से चलता रहा । कितने वर्ष चौराहे पर लगी लाल , पिली , हरी बत्ती की तरह गुज़र  गये।
लंदन के आक्स्फ़र्ड, केम्ब्रिज के विश्वविद्यालों से पढ़े नील और रिकी को अच्छी नौकरी मिलने की ख़ुशी में दिव्या ने बहुत बड़ी दावत दी । रिकी और नील को देख कर नीना की ख़ुशी का ठिकाना न रहा आँखों में ख़ुशी की लहर दौड़ने लगी।रिकी की छः फ़ुट लम्बी देह ,क़ायदे से पहनी वेश-भूषा , चिर परिचित काली जैकेट और दर्पण जैसे चमकते जूते , उसे दूर से ही देख कर कह सकता था , एक आदर्श युवा । उसके साथ तीव्र बुद्धी वाला खड़ा नील कौन सा कम था , गोरा चीट्टा , चौड़ा सीना,  ऊँचे  कद का अदब क़ायदे वाला बाँका जवान लोगों के स्वागत के लिए खड़ा था ।
दिव्या भी नीना की बेटियों  को देखते ही अपने आप पर क़ाबू न पा सकी ।दोनो लड़कियाँ ख़ूबसूरती की हदें पार  कर चुकी थीं ।उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गयी ।दोनो ही गोरी चिट्टी लम्बी ,व्यक्तित्व में बहाव , चपलता ,ज़िन्दादिली , भविष्य की ललक ।आत्मविश्वाश से  भरपूर ।गालों पर ख़ूबसूरत गड्ढे खबसूरती को चार चाँद लगा रहे थे । बिलकुल फूल जैसी ।सोचने लगी फूल की सुगंध जिस तरह अच्छी लगती है ,  इसमें कोई अस्वाभिक बात भी नहीं ।लेकिन फूल अच्छा लगे , बस उसे हाथों में लेने का मन करे ऐसा भी तो हो सकता है ।ऐसा मेरे पहली बार साथ हो रहा है क्यों ? दिव्या दोनो बेटियों को मन ही मन में बहुएँ बनाने के सपने देखने लगी ।स्वाभाविक था ।
एक दिन दिव्या ने बातों- बातों में परोक्ष रूप में  नीना की बड़ी बेटी , रुचि का हाथ अपने बड़े बेटे नील  के लिए इशारा किया ।नीना के लिए भला इस से अधिक प्रसन्नता की बात क्या हो सकती थी ।उसके मन की मुराद पूरी हो गयी। नीना ख़ुश थी  ,कि उसकी बेटी उसकी सबसे प्यारी सहेली के घर ब्याही जायेंगी ।दिव्या ने नीना की ओर समर्थन की दृष्टि से देखा  और बोली 
“ घर वालों से बात कर लेना “। 
“ ठीक है “ पल भर को नीना को लगा , जो चाहती थी भगवान ने उसे थाली में परोस कर दे  दिया।ख़ुशी से  उसके कानों में शब्द भनभना रहे थे । इतना हर्ष विश्वास से परे था ।गला ठीक से साथ नहीं दे रहता था ।दिल में एक झुरझुरी सी होने लगी ।पल भर को नीना को लगा बेटी  मेरी  है , किसी से भला पूछने की क्या आवश्यकता है ? फिर सोचा  घर के बड़ों से बात करना तो बनता है और इतनी बड़ी ख़ुशी  बाँटनी भी चाहिए है ।उस रात उसे ख़ुशी के मारे  नींद नहीं आयी । सुबह चिड़ियों की चिरपिराहट के मधुर संगीत  का आनन्द लेने लगी । कुरमुरी सुबह थी । सूरज अपनी पूरी गोलाई और लालिमा के साथ मौजूद था । उसकी चाँदी सी  क़िरणे चारों तरफ़ ख़ुशियाँ बिखेर रहीं थीं । उठते ही ख़ुशी में उसने अपनी सासु जी  को फ़ोन किया …. ।
“ ममी जी ,ममी जी , ख़ुशख़बरी है । रुचि के लिए परफ़ेक्ट रिश्ता आया है , जाने पहचाने लोग हैं , लड़का बहुत पढा लिखा और बढ़िया नौकरी में हैं “।
“ कौन हैं ?  केडे पिंड तो हैं ? की जात है ?” एक ही साँस में उन्होंने हज़ारों प्रश्नों  की  बौछार कर डाली ।फिर नीना ने अपनी माँ और बहन से बात की , उनके भी वही प्रशन थे । वो प्रशन फंदे की तरह उसके गले में घूमने लगे । नीना ने विश्वास दिलाया , कि वह हमारी तरह हिंदू हैं , दिल्ली से हैं , हमारे जैसा ही उठना- बैठना , खाना- पीना  ही है । पर सासु जी कहाँ माननें वाली थीं । समानता में विश्वास रखने वाली नीना दुविधा में थी, जिसने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं था    ।सासु जी के छोटे -छोटे से सवालों ने उसे मिट्टी में मिला दिया ।
“ मेरा मुँड़ा ज़िंदा नईं , ते की होया , अस्सी ते हाँ , पोतियाँ सुट्ट थोड़ी देनियाँ ने , “।इतना कह कर फ़ोन रख दिया ।
नीना चिंतित थी “ कि कैसे पूछूँगी दिव्या से ? क्या पूछूँगी ?” कैसे ,क्या ? उन प्रश्नो का उत्तर तो नीना भी नहीं जानती थी ।इसी सोच में दो सप्ताह बीत गए ।
इधर दिव्या  के दिलो दिमाग़ पर रुचि  छाई हुई थी ।सोचने लगी ,बस नीना के हाँ करने कि देर है मैं तो मंदिर में लावाँ – फेरे दिला कर रुचि को ढायी कपड़ों में घर ले आऊँगी । 
फ़ोन की घंटी बज रही थी , दिव्या का नम्बर देख कर वह सोचने लगी “ कैसे पूछूँगी दिव्या से “ उसने फ़ोन नहीं उठाया ।उसका फिर फ़ोन आया  ‘ नीना दिन अच्छा है , चल शॉपिंग चलते  हैं , वहीं हल्का सा लंच कर लेंगे ‘ रास्ते में  मंदिर में माथा भी टेक लेंगे । नीना की साँस में साँस आयी ।लंच के पश्चात् दोनो मन्दिर की ओर चल दीं ।
 “ दिव्या कहाँ जा रहे हैं ,मन्दिर तो इस ओर नहीं है ? “ ।
“ हमारा मन्दिर इसी तरफ़  है …”।
नीना हैरान थी , इससे पहले वह गुरुद्वारे जा चुकी थी राम मन्दिर जा चुकी थी , चर्च जा चुकी थी , इस ओर कभी क्यूँ नहीं आयी  ? मन्दिर के बाहर लिखा था ‘ रवि दास मन्दिर ‘ नीना भी दिव्या के साथ माथा टेक कर बैठ गईं ।वहाँ उसे एक अजीब सा एहसास हो रहा था ।
“ नीना यह हमारा मन्दिर है ।दलित समाज के लोग यहीं आते है । यही बताने के लिए मैं तुम्हें यहाँ लायी हूँ । तुम्हें यह बताना बहुत ज़रूरी था …ममी को  ज़रूर बता देना कि हम लोग रविदास समुदाए से है । समाज के अनुसार हम दलित श्रेणी में आते हैं  “। दिव्या ने कहा … वह समाज की दक़ियानूसी मानसिकता से परिचित है ।
“ तो क्या हुआ , इसमें क्या बड़ी बात है , क्या फ़र्क़ पड़ता है … ? मन्दिर तो मन्दिर है । हम तो एक दूसरे को बहुत नज़दीक से जानते हैं “।नीना ने विश्वास दिलाते कहा …।
“ फिर भी…. रिश्ते स्थापित करने से  पहले ऐसी  बातें ही स्पष्ट हो जानी चाहिएँ । मैं नहीं चाहती यह बात हमारी दोस्ती को संकुंचित कर दे ।दिव्या ने नीना के हाथ पर हाथ रखते स्नेह से कहा “।क्यूँकि दिव्या नीना के स्वच्छंद विचारों से भली प्रकार से परिचित थी और यहाँ तो उम्र भर के रिश्ते का  प्रश्न था ।कुछ क्षण संवादहीन गुज़रे…दिव्या नीना की   चुप्पी में अर्थ ढूँढने लगी ।
दिव्या की बातों ने नीना को  असमंजस में डाल दिया …  दिव्या जैसी बातें कर  रही थी , यह उसकी समझ से बाहर था ।किसी से पूछ भी नहीं सकती थी …उसकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी …उन दिनों इंटर्नेट भी नहीं था नहीं तो गूगल मास्टर जी से ही पूछ लेती ।
दो सप्ताह बीत गए , इस से पहले नीना घर फ़ोन करती ।सासु जी का ही फ़ोन आ गया ।दिव्या ने जो बताया नीना ने उन्हें बता दिया ..सासु जी तो बस राशन- पानी ले कर चढ़ गयीं ।” तुझे पता भी है , कहाँ रिश्ता करने जा रही थी ।दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया …उनसे हमारा कोई मेल नहीं …सोचना भी मत … मेरे बेटे कि निशानी है ।उसका तो नाम मिट जायेगा …” सासु जी ने कटुता से  तमतमाते  कहा । उस से आगे नीना सुन नहीं पायी ।
नीना का सर चक्करधानी की तरहें घूमने लगा …उसकी समझ से बाहर था । अभी उसे अपनी माँ और बहन के विरोधाभास के युद्ध का सामना करना बाक़ी था ।वही हुआ जिसका उसे डर था  । माँ तो पल्ला झाड़ते बोली….
 “बेटा वही कर जो तुम्हारी सास कहती हैं “।  किंतु बहन और भाई ने अच्छी क्लास ली । 
“ दीदी होश में तो हो ? क्या नयी रीत चलाने चली  हो “।बहन तल्ख़ी से बोलती जा रही थी ….क्या आपने सोचा है इसका परिणाम क्या होगा ?…जब विवाह के कार्ड में लोग , उनके रिश्तेदार नाम देखेंगे ,बिरादरी वाले, ससुराल वाले , मायके वाले ,मोहल्ले वाले क्या सोचेंगे ।न जाने हमारे परिवार को क्या क्या सुनना पड़ेगा । तुम्हारे साथ हमारा भी बिरादरी से देश निकाला हो जाएगा ।हाँ अगर लड़की को अपने घर लाते तो और बात थी ।छोटी  के लिए रिश्ते में मुश्किल आएगी ।तेरे सब किए कराये पर पानी पड़ जाएगा ।दुनिया कहेगी कि माँ से बच्चे संभले नहीं तो बेटी को कहीं भी धकेल दिया ।सोच अगर रुचि के पिता विनोद ज़िंदा होते तो, वो यह  निर्णय लेने लेते ।शेष तेरी मर्ज़ी है “। वह एक ही साँस में बोलती गयी ।नीना के सोच की शक्ति कुन्द हो चुकी थी ।वह कुछ क्षण बाद बोली …..
“  प्यारी बहना , तुम्हीं बताओ,  क्या फ़र्क़ पड़ता है ।याद है हमारे ब्लाक में तो मद्रासी, बंगाली , सिंधी , गुजराती ,पंजाबी , ईसाई सब मिल के रहते हैं । फिर रविदास समुदाय ( धर्म ) के बारे में कभी सुना ही नहीं , न ही स्कूल और न ही कॉलेज में कभी देखा  था । हाँ यह याद है कि सासु जी जमादारनी के आते ही एक तरफ़ हो जाती थीं ।तुझे पता है न ? लक्ष्मी जो हमारे यहाँ बर्तन और सफ़ायी करती थी वह तो मेरी सहेली थी । हम मिल कर शरारते करते थे ।  हमें सामने वाले को चिडाने में कितना आनन्द आता था , जब अपने सफ़ेद बाल उखाड़ता था । पापा जी ने तो कभी मना नहीं किया था , कि लक्ष्मी से दोस्ती मत करो ।
“ मेरी बहन ध्यान से सुन  तुम पापा जी की बात भूल गयी , उनका आदेश था कि  जब घर पर कोई  भी भिखारी माँगने आए , तो उसे अंदर कमरे में पंखे के नीचे बिठा कर रोटी खिलाओ , तब क्या हम भिखारी से  पूछते थे कि उसकी जात क्या है ? नहीं न ….? अब क्या बदला है । दादी जी के घर में,  वह कालू राम जिसके हाथ का बना हम खाना खाते थे ? हमारे साथ ताश खेलता था ।तुम अपने -अपने घरों में ही  देख लो , तुम्हारी नौकरनियाँ ( मेडेंज़) क्या उनसे पूछते हो तुम्हारी जात क्या है ? ।अगर पता भी हो तो , ग़लत भी तो हो सकता है । कम से कम मेरी सहेली ने सच तो बताया है ।तुम्हें याद  होगा पापा जी जात पात और रंग भेद के कितने विरुद्ध थे ।इंसानियत में विश्वास रखते थे । मानवता उनका धर्म था । कहते थे नीना बेटा इस राह से कभी भटकना नहीं ।किसी को तो ईंन रूढ़ियों को तोड़ने में पहल करनी होगी । पहल मैं ही क्यूँ न करूँ ?….”।
“ प्यारी नीना दीदी क्या आपने ठेका लिया है समाज को सुधारने का ? दिल्ली छोटे बड़े क्लर्कों का मेट्रोपॉलिटन शहर है ।जहाँ देश के सभी जात ,पात धर्म के लोग एक समुदाय की भाँति रहते हैं ।आप को क्या  पता होगा  ,पढ़ायी समाप्त होते ही लंदन चली गयीं  । दिल्ली आतीं भी हो  ,एक महीने के लिए ।लगता है पूरी अंग्रेज़ बन गयी हो । लंदन में सब चलता होगा , जात पात का सवाल ही नहीं उठता होगा । किंतु यहाँ नहीं , रिश्ते जोड़ने के वक़्त ,यहाँ तो पहला प्रश्न जात बिरादरी का ही होता है ….“।
नीना दीदी “ शांत हो कर ध्यान से सुनो यहाँ बात दूसरी है ।यहाँ बात विवाह की हो रही है ।रिश्ते जोड़ने की हो रही है । दो बच्चों में नही, दो परिवारों में ।सोचो आपकी बेटियाँ  ख़ूबसूरत  हैं पढ़ीं लिखी हैं , अच्छे ही नहीं बहुत लड़के मिल जाएँगे । इतनी जल्दी भी क्या है । तुमने रुचि से पूछा है क्या ….? उसे नील पसंद है क्या ? हो सकता है  नील उसे पसंद ही न हो ? शायद उसके मन में कोई ओर ही हो ? ।बात गम्भीर है ।ठंडे दिमाग़ से सोचना ।चल अब बस करती हूँ,  बहुत उपदेश दे दिया … “ ।बहन ने तो नीना का व्यक्तित्व ही हिला कर रख दिया था ।
 बहन की बातें सुन कर नीना का शरीर सूखे पत्ते की तरह तैरने लगा । उसे लगा जैसे ज़मीन उसे अपनी ओर खींच रही थी ।सारी ख़ुशी पल में मिट्टी में मिल गयी ।उसके भीतर ख़यालों का बबन्डर उठ रह थे ।वह सवालों के चक्रव्यूह में उलझ गयी ।सोचने लगी , क्यूँ मैं असमर्थ हूँ फ़ैसला लेने में  ? क्यूँ उलझी रहती हूँ बेकार की बातों में ? फिर उन धागों को सुलझाने में वक़्त बिता देती हूँ ? काश रुचि के पापा ज़िंदा होते ? यह पिता भी क्या चीज़ होते हैं ? बच्चों के पीछे ढाल , एक ऐसा शस्त्र जिसे कोई भी तीर  ,कोई भी तलवार ,कोई भी भाला बेंध नहीं सकता । बहन की बातों ने एक बार फिर उसके मस्तिषक में  उत्पात मचा दिया । उसे अपनी सोच पर शंका होने लगी ।वह रूढ़ियों और आदर्शों के बीच पिस रही थीं। जो कील सी चुभती जा रही थी जो , हमारे  समाज के कड़वे सच को दर्शा रहीं थीं ।आज पहली बार नीना निर्णय लेने में असमर्थ थी ।नीना के लिए लड़कियों का भविष्य ही उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था ….।
नीना का स्वयं पर विश्वास डावाँडोल होने लगा , बहुत उलझन में थी । दिव्या को उसके उत्तर की प्रतीक्षा थी ।पल भर को उसने सोचा अगर नील का सर नेम  बताया ही न जाए तो …? “ फिर  ख़ुद ही बड़बड़ाने लगी छी ..छि…छी…ऐसा कैसे सोच सकती हूँ। उसका अपना अस्तित्व है , विशिष्टता  है । नहीं…नहीं यह नमुमकिन है ।
बार-बार उसके मस्तिष्क में अपनी बहन की बातें गूँज रही थी ।एक बेटी को तो ब्याह देगी ,दूसरी का क्या होगा ….?
लोग थू …थू …थू ….करेंगे ,कहेंगे सर पर बाप नहीं , बेटी को छोटी  जात वालों से बाँध दिया ।सबकी नकारात्मक सोच नीना पर हावी हो गयी ।सोचने लगी किस- किस की बात का उत्तर दूँगी …जो बात कही  जाती है….या उसका ….जो न, कह कर भी , जिसका  स्वर सबसे ऊँचा होता है । 
सदा ढ़ेढ  समानता में विश्वास रखने वाली नीना आज विवश थी । शशोपंज में थी । आज मना करने के लिए भी उसे अल्फ़ाज़ नहीं मिल रहे थे ।नीना के दिमाग़ में यह बात घर कर गयी थी कि आज तक दिव्या के साथ जो ग़लत हुआ है वही उसकी दोषी है ।वह रूढ़ियों और और आदर्शों की बीच पिस रही थी । उसके प्रश्न अभी वहीं के वहीं खड़े थे ।इन उगते प्रश्नों ने उसके अस्तित्व को हिला कर रख दिया था ।वह कन्फ़्यूज़ थी ।उसे लगा ख़ुशी आँधी की तरह आई और तूफ़ान की तरह गिरा कर चली गयी ।
 जिस स्थिति को वह टालती जा रही थी ,एक दिन  वही शाश्वत सच उसके सामने आ खड़ा हुआ । नील का फोन आया कि  वह नीना  से मिलना  चाहता है । कुछ क्षण चुप्पी में गुज़रे , थोड़ी देर बाद नीना ने नील से पूछा
“ कोई काम है बेटा ? “
 नील शर्माया  फिर उसने  झिझकते हुए कहा …” आंटीजी मुझे आपसे कुछ माँगना है …” ।
नीना चुप रही भीतर से घबरा रही थी कि कहीं …….? 
नील नीना के पास बैठ गया और उसका हाथ अपने हाथ में ले कर शर्माते बोला  “आंटी जी …दरसल …मुझे रुचि बहुत पसंद है …. मैं रुचि से, बहुत प्यार करता हूँ …उसे बहुत ख़ुश रखूँगा ” ।
 नील अभी बात पूरी  भी नहीं कर पाया था कि ….नीना सकपका गयी ,उसे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था , उसके दिमाग़ में घर वालों की बातें सायं-सायं करने लगीं । सोचने लगी जिसका डर था वही हो रहा है ।हापड्डी -धापड्डी में सच बोलने की हिम्मत तो नहीं जुटा नहीं पायी , और  झूठ बोलने से ख़ुद को रोक न सकी ,झट से नील से हाथ छुड़ा कर , उस से नज़रें चुराते बोली …..
 “ नील बेटा , रुचि ….रुचि  किसी ओर को चाहती है “ । नील तो चुप – चाप  चला गया ।
नीना ने झूठ तो बोल दिया , ख़ुद अपराध बोध  की कील दिल पर ठुकने लगी वह सोच की गहरी खाई में डूब गयी , सोचने लगी आज समाज जीत गया , और सिद्धांत हार गए। शायद मैंने ही अपने लिए बहुत सी गलतफहमियाँ पाल रखीं थीं । क्या मैं सच में इसी ह्रदय हीन समाज की सदस्य हूँ ? अपराध बोध ने उसके मस्तिष्क में उत्पात मचा दिया ।दरवाज़े में लगी चाबी ने उसकी सोच को विराम लगाया ।
“ मम्म , आइ एम हियर , वेयर आर यू “ रुचि ने कपड़े बदल कर नाश्ता किया ।बातों ही बातों में म्म्म की दिनचर्या के बारे पूछा किंतु नीना ने रुचि से नील का ज़िक्र तक नहीं किया ।रुचि हैरान थी कि अभी तक म्म्म ने बताया क्यूँ नहीं , चुप क्यूँ है ? उसे चिंता होने लगी  रुचि की उत्सुकता  बढ़ती जा रही थी , जुगाड़ लगाने लगी कि कैसे म्म्म के साथ अकेले में बात की जाए । मौसम अच्छा था मंद-मंद हवा चल रही थी अभी तो बहुत रोशनी थी , ( लंदन में गर्मियों में रात के साढ़े दस बजे तक अंधेरा नहीं होता ) ।रुचि अपनी म्म्म के सैंडल  उसके सामने रखते बोली ….“ म्म्म लेट्स गो फ़ोर आ वॉक “ 
माँ बेटी दोनो घर के आस – पास की हाई स्ट्रीट में टहलने लगी ।कुछ दुकाने  देखीं ,कुछ विंडो शॉपिंग की , बातों ही बातों में रुचि ने अपने पूरे दिन का ब्योरा दे दिया , किंतु नीना टस से मस नहीं हुई । अचानक  रुचि ने देखा नीना थोड़ा लँगड़ा रही थी ।
“ आर यू ओ के म्म्म ? पैर में क्या हुआ है , लँगड़ा क्यूँ रही हैं ? “ ।
“ मेरे सैंडल में कील जैसा कुछ चुभ रहा है , सामने बैंच है , चलो ,थोड़ी देर बैठ जाते हैं ” ।
दोनो चुप -चाप बैंच पर बैठ गयीं ।चुप्पी को भंग करते हुए रुचि बोली 
 “ म्म्म आपने बताया नहीं कि आज नील आया था , प्लीज़ मना मत करना ,मैं नील से बहुत प्यार करती हूँ , उस से शादी करना चाहती हूँ “।
“ पर बेटा लोग …..? “। 
म्म्म की बात सुनकर रुचि की आँखें आश्चर्य से फैल हुईं गयीं , मुँह खुला का खुला रह गया क्यूँकि  माँ के इस रूप से वह परिचित नहीं थी । उसने अपनी माँ को सकारात्मक सोच के साथ  सदा आगे के बारे में ही सोचते देखा था ।बोली…
“म्म्म…आप कब से इन लोगों के बारे में सोचने लगीं …..? कैसी बातें कर रही हैं ? क्या फ़र्क़ पड़ता है ।नील इंसान है, बहुत अच्छा इंसान है “ ।दोनो मैं चुप्पी चहल कदमी करने लगी ।
“ चलो बेटा , अब घर चलते हैं “ ।
रुचि को याद आता है कि म्म्म के सैंडल में उसे कुछ कील  चुभ रही है ।
“ म्म्म अपना सैंडल दिखाओ , नहीं तो कील चुभता रहेगा ….” ।उसने , सैंडल के भीतर हाथ फेरते एक चुभता स्टेपल महसूस किया , अपने ट्वीज़र से स्टेपल निकाल  कर बोली , “ यह लो म्म्म ,अब कोई कील नहीं चुभेगा “। 
नीना  मंद मंद मुसकायी , उसकी आँखों में गर्वमिश्रित आश्वासन था।


अरुणा सब्बरवाल
अरुणा सब्बरवाल
संपर्क - arun.sabharwal45@gmail.com
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2 टिप्पणी

  1. अरुणा सब्बरवाल की कहानी कील बहुत सम्वेदनात्मक परिकल्पना पर लिखी गई है ।
    रूढ़ियों और परम्पराओं के बीच नए सोच की दुविधा से बुनी गई कहानी ,सहज सम्वादों में
    अपने शीर्षक को स्पष्ट करती है ।कील शीर्षक अपनी सार्थकता को अभिव्यक्त करता है ।
    कहानी का अंत पाठक को ख़ुद समझना होगा अरुण जी को शुभकामनाएं ।
    Dr Prabha mishra

  2. अरुणा जी की कहानी “कील” ने खासा प्रभावित किया।कहानी की कथावस्तु प्रभावी है,लेखिका अपनी सहज , सरल भाषा में अपनी बात कहती,अपने संग -संग पाठक को लेकर चलती , बांधे रखती हैं।सबसे बड़ी सुंदरता ये है कि अरुणा जी ने,अपनी बात कहने के लिए कील को बहुत प्रभावी बिंब के रूप में सुंदरता से इस कहानी में उपयोग किया है।लेखिका एक सिद्धहस्त कहानीकार हैं,उन्हें अनंत शुभकामनाएं

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