Friday, March 13, 2026
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चंद्रकला त्रिपाठी की कहानी – सामना

दोनों बहनें सहसा अवाक हो उठी थीं। 
यह बात बहुत अचानक हुई थी। हुई क्या, इसको ऊपर से भहरा जाना ही कहा जाएगा। जैसे कुछ टूट पड़े।
दोनों ने पहले एक दूसरे को देखा था।
इस नज़र में तकलीफ जैसा कुछ था।
हुआ यह था कि, मां कुछ कहती हुई सहसा बिलख उठी थीं। कलेजा टूट कर मथ उठता है जैसे, वैसे ही। 
बिलखती हुई वह जो कह रही थी, वह पीड़ा से भरे हुए बयान जैसा था। और वह सब कुछ पिता के विरुद्ध था।
असहज हो उठीं दोनों।
उसकी नालिशों में पिता, एक निहायत बेदर्द पुरुष थे, अन्यायी जैसे। मां ऐसी हो उठी थी, जैसे किसी के पास अपने सारे ज़ख़्म खोल कर दिखाने के अलावा, कोई चारा न बचा हो।
यह जो भी था वह नालिशों से बहुत अधिक था।
मां का संयम टूट चुका था। और यह सहसा हुई कोई बात नहीं थी। बहुत दिनों से किसी तरह निभती हुई उसकी सहनशीलता ने, उस दिन क्यों उसका साथ छोड़ दिया था। यह समझना कठिन था उनके लिए।
वे दोनों बहनें एक दूसरे की ओर देखने से बच रहीं थीं। उस समय, बरामदे में मां और उनके अलावा कोई नहीं था। कोई होता तो मां को शायद बड़ी हिकारत से देखता और कहता, ‘यह कोई वक्त है यह सब उघारने का’
पिता थे, अपने उस कक्ष की पतली सी खाट पर, जिसे सालों पहले उन्होंने अकेले सोने के लिए चुन लिया था। 
मां का बयान अब धिक्कारो की तरफ मुड़ चुका था और दोनों बहनें बेहद सांसत में होना महसूस कर उठी थीं। शायद वहां उस समय कोई बाहरी मौजूद होता, जैसे कि अक्सर ही हुआ करता है, तो वह इतना सब कहती ही नहीं।
आज भी वह न जाने क्या होकर ऐसा कुछ कहने पर आ गई है कि अमला विमला नाम की उसकी ये दोनों बेटियां भारी असमंजस में आ गई हैं।
बाल बच्चे वाली हैं दोनों। एक इस शहर में है, और अक्सर ही आ जाया करती है। दूसरी बेटी आजकल दूर हैदराबाद में है। सालों बाद यहां आई है। अभी शाम तक दोनों चली भी जाएंगी। यहां ठहरना नहीं होता किसी का भी। यह गांव का जीवन है। सूना और ठहरा हुआ है यह। शहर की सुविधाएं तो जुट गई है यहां, मगर गति और चमक नहीं है। दिन रात एक ठहरे हुए ढर्रे में बीत जाते हैं, मगर जैसे किसी तारीख के बिना एकरस भाव में। हां, मौसमों में बदली हुई सिफ़त हुआ करती है ज़रूर, किंतु वह भी मनहूसियत में बसा हुआ करता है। अंधेरा कहीं अधिक अंधेरा हो जाता है तो जाड़ा गर्मी बरसात में भी इस अधिक की समाई महसूस हुआ करती है। 
दरअसल, शहर में अच्छी ख़ासी सुविधाओं वाले जीवन का सब कुछ बटोर कर, पिता ने गांव में रहने का जब फैसला किया था, तो किसी से कोई राय नहीं ली थी। सारी ज़िन्दगी वे, जैसे अपने रिटायरमेंट का इंतज़ार कर रहे थे और शहर में कोई ठिकाना बस इसीलिए नहीं बनाया। इसे वे अपनी जायदाद कहा करते। वैसे भी, वे यहां जिस तत्परता से बस उठे थे। यहां के समाज में उनकी ख़ास जगह बन गई थी।
घर के बाहर वाले हिस्से का स्वतंत्र सा कमरा, बैठक बन चुका था। वहां अख़बार आने लगा था। गांव के बुजुर्ग जुटने भी लगे थे। जीवन में, इतनी ही सक्रियता चाहिए थी उन्हें। सबेरे सैर के लिए नहर की ओर निकल जाते और अपना खेत खलिहान भी देख आते थे। यह सब कुछ उनके संतोष का सामान था। उनके काम भर का बहुत कुछ था यहां, सबसे बढ़ कर इत्मीनान था। इससे अधिक उन्हें कुछ न चाहिए था और न ही अन्य किसी की चाहना का, कोई बोध था उन्हें।
जैसे पत्नी के, अपनी चाहना से उलट होने का। बाक़ी गतिविधियों के लिए स्मार्ट फोन था, टीवी थी।
जैसे यह बहुत सूखी और तेज़ हवा का मौसम है। सब कुछ बहुत सूना लग रहा है। दोनों बहनों को हर मौसम के वे दिन याद थे जब यह घर बहुत गुलज़ार हो उठता था। रिश्तेदारों से भरा हुआ। अब तो सभी, किसी न किसी शहर में सैटिल हो चुके हैं। सबने ज्यादातर अस्पताल और रेलवे स्टेशन से नज़दीकियां देख कर छोटे बड़े मकान बनवा लिए हैं। इन दो बहनों के दो भाई भी, देश के बड़े शहरों में संपन्नता सहित रह रहे हैं, उनके बाल बच्चे भी शहरी हैं।
पिता से उनके संबंध, लगभग दूरी वाले इसलिए हैं कि, पीठ पीछे वे उनकी सनक पर बात करते हैं और सामने से, हर बात पर सहमति दिखाते हैं।
मां के सामने, अपनी लाचारी बताते हैं मगर मां!
वह सब समझ लिया करती है।
गांव में उसके मेलजोल के लोग, अक्सर कभी अनाज पानी तो कभी कुछ नकद मांगने आ जाते हैं, जिसे जान लेने पर पति की तरफ से फटकार ही मिला करती है।
उन्हें समझ में नहीं आता कि वे अनपढ़ और निकम्मी औरतें, कैसे उन्हें मूर्ख बना जाती हैं।
यह भी कहते कि, ‘एक पैसा कभी कमाई होती, तो जानती कि कैसे यह सब समझा जाता है!’
पत्नी को, यहां की दुनिया में बाहरी तो समझते थे वे और यह भी कि उसे यहां का कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
वह तो सबसे ज़्यादा शहरी हुई। उस ज़माने की शहरी जो शहरातियो में तीसरी पीढ़ी थी। संसार का सबसे प्राचीन नगर जब शहर बनने लगा था, तब के बसे थे उसके पुरखे।
अपनी बेटियों को मां ने जब अमला विमला नाम दिया तब इस गांव में लीलावती कलावती नाम रखे जाते थे।
उसका खुद का नाम कमला था। आठवीं पास थी वह। पढ़े लिखे आदमी से ब्याही गई थी।
पति की इसी योग्यता से उसे हासिल हुई थी वह। मगर उसके हिस्से में यह गांव आया जो अंग्रेजों के ज़माने के एक मजबूत पुल से शहर से जुड़ता था और जिससे होकर वह दुनिया भर में अपनी गृहस्थी सहित घूमती रही मगर लौट कर फिर इस गांव में चली आई। पति की यह मंशा उसे कभी मालूम न हुई थी।
उसे ज़िंदगी भर किसी और से कुछ कहने का अभ्यास न हुआ। उसकी गृहस्थी सम पर भले ही नहीं थी मगर गृहस्थी तो थी। जीवन भर साथ साथ रहने में ढला हुआ दांपत्य था उसका।
अपने संबंधों में मायके से लेकर ससुराल तक वही हुई, जो पति की नौकरियों पर साथ रही। जहां जहां पति की बदली हुई वह भी साथ साथ जाती रही। बच्चे हुए। एक नहीं चार बच्चे हुए। 
वक्त की कोई नाप होती तो यही होती कि बच्चे जनमे बड़े हुए और उनका भी घर बसा। उनके बसे हुए घरों में उसका अपना कोई हिस्सा उसने तो नहीं चाहा। वह तो शायद अपने मन को मार कर जीने में ढली हुई स्त्री थी जो आज सारे बांध तोड़ कर न जाने क्या क्या और क्यों कहती जा रही है। वह धीरे धीरे होश खो रही है शायद।
और ये अमला विमला, एक साथ घिरती जा रही हैं। अमला के चेहरे पर नाखुशी गाढ़ी होती दिखी। उसके लिए मां का ऐसे सब उगलते हुए कहना भारी सांसत है।
‘इसमें ऐसा क्या है, जो नया है?
कौन सा पति मन के मीत टाइप होता है भला! आदमी की ज़िंदगी, सिनेमा तो होती नहीं, और गृहस्थी में तो पिसने का ही नियम है, वे कौन सी राजपाट में हैं, उनका जीवन भी तो वैसे ही सह लह कर ही बीत रहा है! अब इतना जीवन बीत जाने के बाद, अपनी बेटियों के आगे पिता का सब दबा ढँका खोल कर रख देना! यह क्या अच्छी बात है?’
उसने पूछती हुई निगाह से विमला को देख लिया, और फिर मां को देखने लगी। उसका थरथराना महसूस करना विपत्ति की तरह लगा उसे। विमला ज़्यादा विचलित हुई। वह मां की आकुलता को समेटना चाहती थी। उसकी छटपटाहट में गल रही थी वह।
वे उस विशाल कमरे के बाहर बरामदे में पड़ी चौकियों पर बैठे हुए थे। मां जहां थी वह जगह खिड़की से सटी हुई थी और खुले हुए पल्ले से सब कुछ भीतर जा रहा था। उसका बिलखना भी।
पिता सुन रहे होंगे सब।
लड़कियों पर यही भारी होकर गिर रहा था। पिता को सब ऐसे सुनते हुए महसूस करना कि यह उनकी बेटियां भी सुन रही होंगी। वह सब जिसके भीतर से वे एक संवेदनहीन पुरुष की तरह दिखाई दे रहे होंगे। उनका केयरिंग पिता होना विलुप्त होता जाएगा जो अभी कुछ देर पहले तक था, जब वे अपना दोपहर का खाना निबटा कुछ देर सहन में टहल कर भीतर लेटने के लिए चले गए थे। कुछ थोड़ा सा अप्रिय संवाद मां के साथ घटा था। उसमें व्यंग्य था। उसके निशाने पर मां थी। वह आम घटना थी जो हमेशा उसके साथ घटती थी जिससे थोड़ा बुरा मान कर वह चुप हो जाती थी और जल्दी ही सहज हो जाती। घर के किसी निर्जीव पड़े सामान को सुनाती हुई कहती कि ‘तुम्हारी तरह पत्थर क्यों नहीं हो जाती!’
उसकी बात किसी को सुनाई दे, ऐसे न कहा करती थी वह। खुद को बहलाती हुई यह भी कहती कि, ‘रात गई, बात गई।’
आज बात उसकी जमी हुई छाती तोड़ कर निकलती चली आ रही है और उसकी जायी हुई दोनों लड़कियों को हिला देना चाहती है वह।
उसके पास नालिशें भर नहीं हैं। धिक्कार है। लगातार बढ़ता हुआ ऐसा धिक्कार कि असह्य होता जा रहा है। अच्छा नहीं लग रहा है यह अब।
कमरे में पिता के होने की कोई आहट नहीं सुनाई दे रही है मगर, अमला विमला इस अहसास से ढक सी गई हैं। यह उनका मायका है। यहां आते रहने की बात अब उनकी जिम्मेदारियों में शामिल है।
ऐसे आती हैं कि दिन भर रह कर शाम को निकल जाएं और थोड़ी रात होते होते शहर में अमला के घर पहुंच जाएं। अमला यहीं है।
गांव से तीन घंटे के रास्ते पर है, और आने जाने के छः घंटे कभी कभार निकाल लेती है वह। पिता के गांव में ऐसे रहने के फैसले को उन्होंने ठीक नहीं माना था, मगर पिता से भला कुछ कहना आसान था क्या?
मां, जो उनकी नौकरी पर अब तक बहुत सुख में रहती आईं, सबको तो यही लगता था अब इस गांव में आ पड़ी हैं। गांव में यह एक खुला हुआ सा विशाल घर है और जो बाहर है वह सिर्फ पिता का है। मां के पास भीतर की रोज़ घूम घूम कर घेरती हुई दिनचर्या है जिसमें कभी कभी बस अमला आ जाती है।
बहुत दिनों बाद आज दोनों आईं हैं।
बाहर गांव है। अच्छा खासा बढ़ता बदलता हुआ गांव जिसमें वह बहुत कम जाती है। उस बाहर से उसका आज तक मेल नहीं हुआ। बहुत कम जब कभी निकलती है तब भी जाने की जगहें बस दो चार हैं। अधिक से अधिक काली माई, सत्ती माई या किसी बाबा के मंदिर तक। किसी के घर जाना, उन्हें नहीं रुचा। वह गांव वालों के रख रखाव से अलग रही है और इस धूर मिट्टी में भी अपने सलीके में रहती है। उसका दिन गुज़र ही जाता है। खाली होकर कुछ पढ़ती हैं। पिता आसपास हुए तो कुछ अपने मन का करते हैं। घर के पीछे खासी हरी भरी जगह है जहां सब्जियां उगाते, खरपतवार साफ करते वह खुश रहते हैं। उनके हिसाब से बस अभी उन्हें जीने को मिला है। वे अपने कंधे से गुलामी का जुआ उतार चुके हैं और खासकर किसी के भरोसे नहीं रहना चाहते। मां के लिए यहां के जीवन का ठहरापन बहुत अधिक है। उसके दिल में गुलाम होने की और घुटते हुए रहने की बात भरती जा रही है। अमला विमला को सब कहने पर वे सहसा क्यों चली आईं, और इस जीवन से बेजारी में कहां क्या और कितना इकठ्ठा हुआ, सब्र कैसे टूट गया और बेटियों से न कहने लायक भी वह कहती गई यह सब अकस्मात तो था ही बहुत भारी भी था मगर उधर वह अपने को कहीं से भी समेटने के लिए तैयार नहीं थी।
दोनों लोगों में बात से अधिक अब लड़ाई होती है।
यहां रहने से सब कुछ से कट जाना वह भी इस बुढ़ौती में, केवल खेत बारी बचाने के लिए जो सिर्फ तब तक है जब तक वे जीवित हैं क्योंकि किसी को भी उसे संभालने के लिए गांव में न आना है और न रहना है, यह सब उन्हें सख़्त नापसंद है। इस नापसंदगी को पकड़ कर पिता की सारी बातें जो उन पर अत्याचार की तरह होती रही थीं वह कहने लगी हैं वे।
कहती हैं और रोती हैं।
उसमें कितनी तो स्त्री पुरुष के बीच की बेहद गोपन बातें हैं।
विमला को उन बातों का मर्म समझ में आता जा रहा है और वह चुप होती जा रही है।
अमला नाराज़ है।
पूछ रही है – ‘अब इस उम्र में तुम क्या फरियाना चाहती हो अम्मा! लौट कर क्या आने वाला है। कौन सा पति ऐसा नहीं है बताओगी। हमने कभी कुछ नहीं कहा, कि कहने से कुछ होने वाला नहीं था और उसी में खप कर रहने लगे। हंस बोल कर बिताने लगे तो तुम सोचती हो कि बाऊजी ही इतने निष्ठुर हैं। इन्हें यहां छोड़ कर जा सकती हो कहीं और जाओगी तो क्या ऐसे अधिकार से रह पाओगी?’
विमला बस उसे देख रही थी।
कैसी निकल आई यह शाम कि मां बेटियां दो स्त्रियां हो उठीं।
भीतर है जो पुरुष, वह पता नहीं, कितना पति या पिता बन कर यह सुन रहा होगा।
अमला में हमेशा पिता के प्रति पक्षपात था। वह उन्हें सही क्यों समझती थी शायद इसलिए कि पिता उन्हें ग़लत बताने को बड़ी बुद्धिमानी के साथ आजमाते थे। उनके लिए तब वे बहुत ज़्यादा और बेमतलब ही बोलने वाली हैं और उन्हें कोई काम नहीं है। इसके अलावा भी उसे मां के स्वभाव का कुछ खलता था। वे एक प्रकार के उच्चता भाव को जताती रहती और पिता के रहन सहन में खोट बताने से बाज नहीं आती थीं। उनके दांपत्य में यह एक कठिन बात थी जो जब तक महसूस हुई सामान्य झगड़े में ही रह गई और मां ने भी कह कर और कोस कर गृहस्थी संभालने में कोताही कभी नहीं की। पिता ऐसे मौकों पर अतिरिक्त खामोश दिखाई देते। बेपरवाह भी। विमला को मां तब बहुत निरीह लगती जैसे कोई बेआसरा छटपटा रहा हो।
उसे याद है कि अपनी समझ भर मां को समझाती भी थी।
मां ने एक बार कहा था कि वह पढ़ लिख रही है, लायक बन रही है तो बहुत समझ कर ही शादी के लिए हां करे।
विमला तब उन्हें देखती रह गई थी।
वह हॉस्टल से घर आई थी।
मां को हर समय काम में लगा देखती तो सोचती इतना खप कर काम करना तो उससे न हो पाएगा।
मां ने कहा कि यह तो उसके हाथ में है।
उसने तभी हंस कर पूछा था कि ‘तुम काम वालियों से क्या बात करती हो अम्मा!’
उस दिन बहुत रात हो गई थी और बर्तन धोने वाली सरोज रात के बर्तन धोते हुए मां से न जाने क्या क्या कहती जा रही थी। वह ऊपर के कमरे में थी जिसमें आंगन की ओर बड़ी सी खिड़की थी और उसे बात तो नहीं मगर आवाज़ पूरी सुनाई दे रही थी। मां ने हंस कर कहा था कि- ‘एक काम वाली दूसरी काम वाली से बात कर रही थी, यही तो’
वह अपनी मेहनत से चूर चूर हुई कभी रो भी पड़ती थीं मगर यह केवल उसी को पता हुआ।
उसी से मां ने बताया था कि उनके पिता ने जब पिता को उनके लिए चुना था तब बताया था कि लड़के को उन्होंने कुएं से पानी भरते पहली बार देखा था।
वे थोड़े असमंजस में थे मगर फिर सोच लिया था कि वह तो नौकरी में रहेगा और उनकी बेटी भी साथ रहेगी। गांव में भला क्यों रहेगी वह।
मां से पूछा था उसने कि ‘गांव अगर ससुराल न होती तो क्या उसे पसंद न होती फिर भी’ 
मां ने कहा कि वह नहीं समझेगी।
अभी अभी जो बहुत टूट कर उसने कह दिया है, दोनों बड़ी लज्जा से भर गई हैं मगर बहुत कातर हो उठी हैं, धीरे धीरे यह इतनी गहरी बात होती गई है कि, अमला भी।
उसे इतनी यातना पहली बार समझ में आ रही है।
मां तब सिर्फ सत्रह साल की थी। अपने मायके में थी और गोद में उसकी पहली संतान थी।
अचानक उस बच्चे का मुंह उसके स्तन से हट गया था। उसने सोचा था कि उसका पेट भर गया है। उसका निश्चल पड़ जाना उसे समझ में नहीं आया था, और वह बच्चा मर चुका था।
पिता ने मां से बात करना बंद ही नहीं किया था बल्कि कहा कि तुमने मेरे बच्चे को मार डाला।
मां विक्षिप्त हो चुकी थी।
बहुत दिनों तक वहीं थी, अपने मायके में और बहुत बाद में सब कुछ ठीक हुआ था।
मगर यह सदमा उसके भीतर बंद हो गया था।
आज वह यह सब खोल कर बैठी है जिसे उसने इन लोगों को कभी नहीं बताया। वह पूछती जा रही थी कि, कोई मां अपने बच्चे को मार सकती है क्या? 
वह तो तब इतनी नासमझ थी कि, उसे उसके मर जाने का भी पता नहीं था।
पिता अब अचानक बाहर आ गए थे, और किसी तरफ देखे बिना पीछे वाले बगीचे में चले गए।
दोनों बहनें स्तब्ध थीं।
अमला का तो मुंह सूख आया था।
और विमला रोने लगी थी। उसका मन हुआ मां को अपने कलेजे से लगा ले और उसका छटपटाना सब बांट ले।
धूप आंगन से जा चुकी थी। बहनें आज रात रुकने वाली थीं। वे मां के दुखों से इतना आमने सामने पहली बार मिली थीं और बहुत विचलित थीं।
मां के दुःखों में पिता अपराधी की तरह दिख रहे थे। विमला का कलेजा जैसे टूटने लगा।
उसे जो चुप्पी लगी वह लगी ही रही। मां यह देखने के लिए उनके पास आईं कि वे ठीक से सोई तो हैं। अमला उठ बैठी, मां से पूछने लगी- ‘सोई नहीं तुम अम्मा!’
‘सोना ही है, आज ऐसे तुम लोगों से पता नहीं क्यों इतना सब बलबला कर कहने लगी। मन भारी हो गया है। कितने दिनों पर आई तुम दोनों, और मैं अपना न जाने क्या क्या ले बैठी।’
विमला ने मां का अफसोस सुना। उसका मन हुआ कि मां को अपनी गोद में समेट ले।
मगर चुप पड़ी रही।
सोचती रही कि कितना अजीब होता है किसी स्त्री को, उसके नंगे दुखों में देख लेना। 
उसने अपना कलेजा भींच लिया। उसमें आज बहुत दर्द उतर आया था।

चंद्रकला त्रिपाठी
संपर्क : vntchandan@gmail.com
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3 टिप्पणी

  1. एक बेहद संवेदनशील कहानी है चंद्रकला जी आपकी। सारा दृश्य एक फिल्म की तरह गुज़र गया।एक समय था जब कम उम्र में शादी हो जाती थी। हमने संयुक्त परिवार का रहन-सहन देखा है। तब लगभग सभी घर संयुक्त परिवार की तरह ही थे ऐसा लगा उन सभी परिवारों में से किसी एक किरदार की कहानी हम पढ़ रहे हैं जो नौकरी पर चले गए थे और लौट के फिर अपने गांव में आ गये। पत्नी रूप में एक स्त्री को बहुत कुछ सहना पड़ता है ।वह बहुत अधिक समझौतों के साथ जीवन जीती है। कहानी में मांँ का क्रोध अपना बाँध छोड़कर बह गया। सहनशीलता जब अपने हद से गुजर जाती है तो बहुत सारी रहस्य बेपर्दा हो जाते हैं।
    बहुत मार्मिक कहानी है बहुत-बहुत बधाइयां आपको स्त्री के इस स्वरूप से परिचय करवाने हेतु।

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