पारसनाथ बाबू अलसाये और उदास से लेटे हुये थे। हालांकि कोई और दिन होता तो इतनी सुबह तक वो तैयार हो जाया करते थे। बरसात के महीने में बादल यहाँ-वहाँ लुका छिपी करके निकल जाया करते थे। पछुआ हवाओं ने फसलों पर तो अपनी वक्रदृष्टि डाल रखी थी, साथ ही साथ बढ़ती उमस ने चरिंद-परिंद सभी को परेशान कर रखा था।
सरकारी रूप से बाढ़-प्रभावित क्षेत्र घोषित होने के बावजूद इस साल जबरदस्त सूखे के आसार थे। बीती रात हो हालांकि बारिश ज्यादा तो नहीं हुई थी, लेकिन यहाँ-वहाँ कीचड़ नजर आने लगा था। मन की दुश्वारियों से परेशान पारसनाथ बाबू ने उमस की तकलीफ सहते हुये आँखे मूंदे पडे़ रहना बेहतर समझा, मगर मक्खियों-मच्छरों की भिनभिनाहट से आजिज आकर उन्हें आँखे खोलनी पड़ी।
कमरे की सरसरी मुआयना करने पर उन्होंने पाया कि बिजली जा चुकी है और टेबुल फैन निष्प्राण हो चुका है। वो उठकर बैठ गये और बगल में सोई पड़ी अपनी पत्नी की ओर देखा।
उनकी स्थूल काया वाली पत्नी घोड़े बेच कर सो रही थी उनकी धर्मपत्नी यानी
कांता देवी के कपड़े अस्त-व्यस्त थे, और सोते वक्त उनकी नाक से ‘‘हुम्म-हम्म” की अजीब स्वर की स्वर लहरियां निकल रही थी।
दरअसल कांता देवी नजले की मरीजा थीं, इससे उनके श्वास के आवागमन की खरखराहट और नाक से लुढ़क आये द्रव ने उनके चेहरे की विद्रूपता और भी बढा दी थी।
पत्नी का सम्पूर्ण अवलोकन करने के पश्चात पारसनाथ बाबू न जाने क्यों चिढ़ गये और कांता देवी की तरफ उन्होंने पीठ कर ली।
वे बुदबुदाये –
“क्या खाक शासनादेश आया है? तो मंत्री की यह घोषणा भी फर्जी ही निकली की रात और सवेरे का टाइम बिजली की कटौती से मुक्त रहेगा। इस शासन से तो पब्लिक को सिर्फ घोषणाओं की घुट्टी मिली है बस। वाह रे शासनादेश”।
‘‘कैसा शासनादेश? क्या भर्ती पर स्टे का कोई शासनादेश आया है”।
पारसनाथ बाबू की पत्नी ने खरखराते स्वर में पूछा?
पारसनाथ बाबू झल्लाते हुये बोले –
‘‘स्टे का नोटिस आता है, शासनादेश नहीं। जब कुछ जानती बूझती नही हो तो फिर क्यों हर मामले में टांग अड़ाती फिरती हो”।
“जानती क्यों नहीं हूँ, क्या मैं अनपढ़ हूँ? इनता तो मुझे भी पता है कि स्टे-विस्टे क्या होता है? मैं खुद मैट्रिक पास हूँ, और मेरे बप्पा भी सरकार की सेवा जिन्दगी भर किये हैं। इतना तो हम सब बहनें जानती-समझती हैं” वो तुनक कर बोली।
पारसनाथ बाबू तपाक से बोले-
‘‘तुम और तुम्हारी बहनें, हुंह…………। अब मेरा मुंह मत खुलवाओ कि किस तरह से दूसरों ने तुम लोगों की कापियां लिखी और पैसा कौड़ी देकर पास हो पायी थी। अगर इतनी ही सब मेधावी थीं, तो क्यों नहीं तुम्हारी भतीजियां आठवीं से आगे पास हो पायीं और रही बात तुम्हारे बप्पा की तो वे चपरासी थे, डी0एम0 नहीं, जो मुझ पर इतना रौब झाड़ रही हो”।
कांता देवी को यह बात खासी नागवार गुजरी थी कि पारसनाथ बाबू की इतनी हिम्मत कि वह इस मामले में वो उनके बाप को बीच में लायें। उन्हें याद नहीं पड़ता था कि इससे पहले इतनी अकड़ से पारसनाथ बाबू ने कब उनसे बात की थी?
अपमान की पीड़ा या क्रोध की अतिरेकता के कारण उनका चेहरा लाल हो गया था। गहरे सांवले और चेचक के दागों से अटे पड़े कांता देवी के चेहरे पर नराजगी के भाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे।
मगर माहौल की नजाकत को भॉपते हुये क्रोधित होने के बजाय उन्होंने रोना शुरू कर दिया। हालांकि वो “ ऊं,ऊं करके विशेष प्रकार का रूदन कर रही थीं, मगर उनके गले की खरखराहट से पारसनाथ बाबू भिन्नाते हुये बोले-
“ बन्द करो ये रांड़-रूदन, कोई मर गया है? सुबह-सुबह बच्चे देखेंगे तो क्या कहेंगे?’’
तिरिया के इस रूदन रूपी ब्रह्मास्त्र से पारसनाथ बाबू असहाय हो गये। वो जानते थे कि कांता देवी को वो जितना ही समझायेंगे, उनका रूदन उतना ही तेज पड़ता जायेगा। मुकाबला करने या हावी होने के बजाय पारसनाथ बाबू ने हथियार डाल देना मुनासिब समझा।
वो थके स्वर में
बोले –
“ अच्छा ठीक है, अब चुप भी करो भई। दरअसल रात को तुमने इतनी देर तक जगाये रखा। सड़क पर इतना कीचड़ था, और तुमने फर्जी दो किलोमीटर तक चलवा दिया। चार घंटे ही सोया था, तब तक ऑख खुल गई। मेरा गुस्सा बिजली पर था, जो तुम पर उतर गया”।
“ तो तुम सौती (सौतन) की रिस (क्रोध) कठौती पर कर रहे हो। बिजली चली गयी तो इसमें मेरी क्या गलती है, और रात को बाहर जाकर न बतियाते, तो क्या यहां कमरे में बतियाते। बच्चे सुनते तो ‘‘ वो हुमक कर बोलीं।
“ वैसे बच्चे सुन भी लेते, तो ठीक ही होता। आखिर उन्हें भी तो पता चलता कि उनकी मम्मी कैसी हैं “?
पारसनाथ बाबू व्यंग्य से
बोले।
कांता देवी आहत स्वर में
बोलीं –
“ फिर तुम्हारे ताने शुरू हो गये। आखिर हमारे सामने हमारा बुढ़ापा और तुम्हारा रिटायरमेन्ट मुंह बाये खड़ा है। इन नौकरियों की भर्ती बार-बार नहीं होनी है। हमारे और भी बच्चे हैं। हमें उनके बारे में भी सोचना है। क्या ये सब मेरे ही पेट में जायेगा? तन-पेट काटकर मैं पैसा-पैसा जोड़ती हूँ, अपनी बेटियां के लिये ही तो। जिन्दा रहने के लिये दो रोटियों और दो धोतियों के अलावा मैं तुम्हारे घर से लेती ही क्या हूँ”?
‘‘तो अपने बाप के घर से ले आ और जब मुझसे बहस मत करो। जाकर मंजन-वंजन करो, तुम्हारे मुंह से बदबू आ रही है” इतना कहते हुये पारसनाथ बाबू उठे और तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गए।
कांता देवी को यूं एकाएक कमरे से पारसनाथ बाबू के चले जाने की उम्मीद नहीं थी। वो स्त्रियोचित लक्षणों से सुसज्जित फिर कोई शब्द बाण मार्मिक ढंग से चलाना चाह रही थीं, तब तक पारसनाथ बाबू चले गये। बीती रात उन दोनों प्राणियों पर बहुत भारी गुजरी थी। रात ही क्यों, पूरा हफ्ता ही उन दोनों का अन्तर्द्वन्द में गुजरा था।
जो बात कांता देवी को वाजिब और जरूरी लगती थी, वही बात पारसनाथ बाबू को वाहियात और पाप लगती थी।
इस शीतयुद्ध की शुरूआत विगत दो महीनों से हो चुकी थी। दरअसल पारसनाथ बाबू स्वास्थ्य विभाग में वरिष्ठ लिपिक थे। आजकल निदेशालय से जुडे़ हुये थे। वो एक प्राइमरी मास्टर के सुपुत्र थे। बाप ने पढ़ाई-लिखाई तो ज्यादा नहीं कराई थी, मगर नैतिकता एवं मानवता के पाठ खूब पढ़ाये थे। हालांकि अभी इस संसार में ऐसी कोई घुट्टी नहीं बन सकी है, जो व्यक्ति को नैतिक एवं सदाचारी बना सके। बाप की मेहनत और सरल, जुझारू व्यक्तित्व के साये में पले-बढ़े पारसनाथ बाबू को रामचरितमानस का एक बड़ा हिस्सा कंठस्थ था।
उनकी बाते एवं उद्धरण दोहों, चौपाइयों से शुरू होकर नीतिशास्त्र की बातों पर आकर समाप्त होत थे। इस युग में ऐसे मलाईदार विभाग में उनके जैसा धर्मभीरू व्यक्ति का होना कौओं की जमात में हंस के होने के माफिक था। वे परिश्रमी और ईमानदार तो थे ही, साथ में साहबों के मुंह लगे भी थे। मगर वो अपनी पहुंच और रसूख को प्रायः छिपाकर रखते थे, ताकि लोग-बाग उनके जरिये महकमें के साहबों से अनुचित सिफारिशें न करवा सकें।
सबसे ज्यादा दबाव तो उन पर अपात्र लोगों को मेडिकल स्टोर का लाइसेंस दिलाने के बाबत होता था। मगर अपनी पत्नी से वो अपनी पहुंच को छिपा न सके, और यही बात उनके जी का जंजाल बन गया थी।
साल के शुरूआत में जबसे चपरासियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी। तब से नौकरियों में लेन-देन का खेल ‘‘खुला खेल फर्रुखाबादी” की तर्ज पर चला आ रहा था। साहबों की नीयत लोगों को नौकरियां देने की थी, और जाहिर तौर पर उनसे कुछ शुकराना पाने की उम्मीद पाले बैठे थे।
चपरासियों की भर्ती के लिये योग्यता का कोई मापदंड नहीं था। निश्चित तिथि में जितने भी फार्म जमा हो गये, वे सभी वाजिब हकदार थे। फार्म में त्रुटि न हो जाये, इसलिये लोगों ने बाकायदा पढे़-लिखे लोगों से फार्म भरवाये। इसी आग में घी का काम किया अफवाहों के जरिये आये उस शासनादेश ने, कि सात साल की नौकरी के बाद उच्च शिक्षित लोग बाबू बना दिये जायेंगे।
फिर तो एम0ए0, एम0एस0सी0 वालों तक के फार्म पड़ गये। वैसे भी आजकल के जमाने में दस्तखत करना और साइकिल चलाना कौन नहीं जानता? अधिकारियों की दुविधा तब और बढ़ गयी, जब चपरासी की नौकरी के लिये मंत्रियों तक के फोन आने लगे। अब जाहिर तौर पर मैदान में बडे़ खिलाड़ी भी कूद चुके थे, जिन्होंने आपसी प्रतिस्पर्धा में अपनी तरफ से ही दस-बीस हजार रूपयों में प्राप्त होने वाली नौकरी का रेट डेढ़ दो लाख तक पहुंचा दिया था।
फिर तो ये भर्ती न हुई, सेहत महकमें के जी का जंजाल हो गयी। साहबों को सूझ ही नहीं रहा था कि वे क्या करें?
कोई पैसा लिये खड़ा, कोई सिफारिश लेकर हाजिर और बाद में कोर्ट की जवाब देही भुगतनी पडे़गी, वो अलग
से।
गुजरे बरसों में सूबे मे शायद ही कोई ऐसी बड़ी सरकारी भर्ती हुई होगी, जिसे अदालत में न घसीटा गया हो। उसी मुहिम का हिस्सा बनी इस सरकारी भर्ती ने पारसनाथ बाबू की मुश्किलें बढ़ा दी थी। पारसनाथ बाबू विभाग की जिम्मेदारियों से नहीं, अपितु पत्नी के दबाव से परेशान थे।
पारसनाथ बाबू की कुल जमा छः संताने थीं। उन्हें कोई पुत्र नहीं था। मां बाप के इकलौते पारसनाथ बाबू की पहली सन्तान उनके विवाह के अठारह वर्षों बाद पैदा हुई थी। जाहिर था, कि उसकी परवरिश बडे़ लाड़-प्यार से की गयी और उसका नाम रखा गया बब्लरानी प्यार से सब बब्लरानी
को ‘‘बब्बो’’ कहकर पुकारते थे।
मगर ईश्वर ने संतान के लिये की गई पारसनाथ बाबू और उनकी पत्नी कांता देवी की प्रार्थना को शायद आधे-अधूरे मन से ही सुना था। क्योंकि तमाम व्रतों, उपवासों एवं पूजा- अर्चना के बाद पैदा हुई बब्बो एक मंदबुद्धि बालिका थी।
उसकी विशेष परवरिश के हर संभव प्रयास किये गयें, और उसी के तहत उसे पांचवी दर्जे के बाद स्कूल नहीं भेजा गयां ये और बात थी कि उसके नाना ने किसी और लड़की को परीक्षा में बैठाकर उसे आठवीं की मार्कशीट दिला दी थी।
लेकिन बोर्ड परीक्षा के फार्म और प्रमाण पत्र में फोटो चस्पा किये जाने की अनिवार्यता के चलते बब्लरानी के नाना उसे मैट्रिक न पास करा सके। पूर्ण युवती बनने के पूर्व ही बब्लरानी के विवाह के प्रयास किये जाने लगे।
काफी तजबीज करने के बाद ठीक बब्लरानी के जोड़ के एक लड़के से उसकी शादी तय कर दी गयीं। अब तक मां बाप के लाड़-प्यार के साये में पली-बढ़ी बब्लरानी को घर गृहस्थी कायदे से चलाने के लिये उसकी मां कांता देवी ने काफी अभ्यास करा दिया था। मगर इस फर्क की तासीर क्रिकेट के उस मैच के मानिंद ही था, जैसा कि अभ्यास मैच और वास्तविक मैच के बीच स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती थी।
मौंजू बात ये थी कि जिस प्रकार बब्लरानी के मां बाप अपनी बेटी की आंशिक मंदबुद्धिता छिपा ले गये थे। वैसा ही खेल लड़के की तरफ से भी खेला गया। दरअसल छः बच्चों की मां और कर्कशा कांता देवी के आगे पारसनाथ बाबू की एक न चलती थी।
सीधे, सरल और धर्मभीरू पारसनाथ बाबू को उस कर्कश, चंचला स्त्री कांता देवी ने काफी दबा रखा था। पारसनाथ बाबू बब्लरानी का विवाह पूर्ण परिपक्व हो जाने के बाद तथा ये बात बताकर करना चाहते थे कि उनकी लड़की आंशिक रूप से मंदबुद्धि है। मगर
कांता देवी बब्लरानी का विवाह जल्द से जल्द तथा ये तथ्य छुपाकर करना चाहती थी कि उनकी बेटी अधपागल है।
पारसनाथ बाबू के विरोध के बावजूद कांता ने अपने गांव की एक सहेली के जरिये बब्लरानी के रिश्ते की बात चला रखी थीं।
दुलारी देवी ने पयागपुर जाकर उस लड़के देवी प्रसाद का न सिर्फ मुआयना किया था, बल्कि वो घंटा दो घंटा देवी प्रसाद की इलेक्ट्रानिक की दुकान पर बिताकर लौटी थीं। अपना परिचय दिये बगैर और अपना मंतव्य बताये बिना उन्होंने आस-पास के दुकानदारों से दरयाफ्त करके इस बात की तस्दीक कर ली थी कि मिस्त्री से दुकानदार बने देवीप्रसाद की कमाई में उनकी बब्बो राज रजेगी।
देवी प्रसाद शक्ल -सूरत से कुछ खास नहीं दिखता था और तमाम दरयाफ्त के बाद कांता देवी महज इतना पता लगा पायी थी कि पयागपुर में वो एक इलेक्ट्रनिक्स की दुकान का स्वामी था, जो शायद साझे में थी। आखिरकार वो इस बात से मुतमईन हो ही गयी कि देवी प्रसाद ही उनकी बब्लो के लिये उचित वर है।
अलबत्ता अपने विश्वस्त सूत्रों के जरिये किये गये सर्वे पर वो अपना सहेली से आश्वासन की मौखिक मुहर लगवाकर ही लौटी थीं।
हमारे भारतवर्ष के देहात सिर्फ खेती-किसानी और दरिद्रता के ही नहीं परिचायक हैं, बल्कि यहां ठलुहाई भी बडे़ आला दर्जे की होती है। जब
कांता देवी अपने दामाद की तलाश में पयागपुर के दौरे पर आयी तो देवी प्रसाद की मदद के बाबत तमाम ठलुओं ने ऐसा ताना-बाना बुना था, जिसमें कांता देवी जैसी चालाक स्त्री भी फंस गयीं।
स्वयं को काफी होशियार समझने वाली कांता देवी ने इस बाबत सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस-जिस से उन्होंने देवी प्रसाद की दुकान के बाबत दरयाफ्त की, उन ठलुओं ने पूर्व निर्धारित योजना के तहत देवी प्रसाद की शान में ही कसीदे
गढ़े।
आखिर देवी प्रसाद के पक्ष में माहौल करने की एवज में उन्हें जोरदार मांसाहारी दावत और दारू जो मिली थी। खुद को काफी चतुर एवं सदैव दूसरों से ज्यादा बुद्धिमान समझने वाली कांता देवी आखिर इस जाल में जाने-अनजाने फंस ही गयीं।
मगर ये पोल उन पर जब तक खुलती तब तक बब्लरानी तीन बच्चों की मां बन चुकी थीं। ये सब जानकर -बूझकर भी
कांता देवी सिर्फ तिलमिलाकर ही रह गयी थीं, क्योंकि उनका अपना सिक्का भी तो खोटा था। वास्तव में देवी प्रसाद की पहचान एक अल्लाम गंजेड़ी की थी, और वो उस इलेक्ट्रनिक्स शाप का मालिक नहीं था बल्कि वहां सिर्फ नौकरी करता था।
बड़ी होशियारी से अपने सास के दौरे के पूर्व उसने
‘देवी इण्टर प्राइजेस’ का बोर्ड लगवाया था, और ऐसे शातिराना तरीके से गोटियां फिट की थी कि उसी के ‘ठलुआ क्लब’ के लोग ही कांता देवी से मिलें उसके पक्ष में बयान दें। सबको झांसा देने वाली कांता देवी खुद एक नशेड़ी के झांसे में आ गईं।
बाद में देवी प्रसाद एक नकारा पति और अल्लाम नशेड़ी ही साबित हुआ था। देवी प्रसाद दिन भर गांजा पिये धुत रहता था और रात भर पत्नी को हलाल करता था। धीरे-धीरे उसने बब्लरानी के सारे जेवर गहने बेच डाले।
पति और उसके जुल्मोसितम तक ही बात होती तो गनीमत थी, मगर देवरानी और ननद के तानों ने बब्लरानी का जीना दुश्वार कर दिया था। कभी प्यार से बब्बो कही जाने वाली बब्लरानी ससुराल में प्रायः पगली के नाम से ही सम्बोधित की जाने लगी थी।
नतीजतन पानी सर से ऊपर गुजरता देख बब्लरानी ने अपने मासूम बच्चों सहित मां बाप के घर में शरण ली। बब्लरानी अपने साथ फिर्फ संवेदनाये ही नहीं लाई थी, बल्कि तीन बच्चे भी लाई थी, जिन्हें भूख मुसलसल सताती रहती थी।
दुख की घड़ी में वो मायके में शरण मांगने आई थी, मगर उसकी कुंवारी बहनों की नजरें बता रही थी कि इस बार बब्लरानी का आना उन्हें रास नहीं आया था।
बब्लरानी की बहनों के चेहरों पर चिन्ता तो बराबर नुमाया हुआ करती थी, मगर वो बब्लरानी के भविष्य को लेकर नहीं अपितु इस बात की थी कि बब्लरानी तीन प्राणियों समेत मुस्तकिल रूप से इस घर में रहने को आ धमकी है।
सो बाकी पांचो बहने अब बब्लरानी से स्नेह नहीं अपितु ईर्ष्या किया करती थी। मां की मौन-सहमति पर बहनों के बढ़ते तानों के बीच ही पिछले तीन वर्षों से बब्लरानी के दिन गुजर रहे थे। इस दौरान देवी प्रसाद हर दस पंद्रह दिन पर आता था, मगर उसके आने-जाने से घर में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।
इन तीन सालों के दौरान बब्लरानी दो बार गर्भवती भी हुई। मगर उसकी मां ने उसका गर्भपात करवा दिया। तीन पुत्रियों के बाद लड़के की आस लगाये देवी प्रसाद के लिये ये सब किसी सदमें से कम नहीं था। मगर बब्लरानी पर न अब उसका आधिपत्य रह गया था, न नियन्त्रण।
वो पूरी तरह से अपनी मां के बस में थी। कभी कभार जब नशा देवी प्रसाद पर हावी नहीं होता था तब उसके अन्दर छुपे हुये पुरूष का अहं जागृत होता और वो बब्लरानी को विदा कराने की बातें भी करता था।
मगर कांता देवी की घुड़कियों से उसकी रूह फना हो जाया करती थी। अब तक देवी प्रसाद अपने रोजी-रोजगार को तिलांजलि दे चुका था। इसी दौरान चपरासियों की भर्ती भी शुरू हो गयी।
साहबों के मुंहलगे, स्वच्छ एवं ईमानदार छवि के पारसनाथ बाबू के लिये अपने निठल्ले दामाद देवी प्रसाद को चपरासी बना देना कोई बड़ी बात न थी। वो भी बगैर घूस-पात के, मगर इसमें अड़चनें थी तो सिर्फ
कांता देवी की तरफ से।
उनके पहले तर्क में कुछ दम था जरूर, कि देवी प्रसाद नशेड़ी है। उसकी नौकरी लगवा भी दो, तो कल को उसने नौकरी छोड़ दी तो……….?
इसीलिए कांता देवी का ये तर्क था कि देवी प्रसाद के बजाय ये नौकरी बब्लरानी की लगवाई जाये। मगर बब्लरानी के लिये तजबीज की गयी इस नौकरी की सबसे खतरनाक शर्त
कांता देवी ने ये लगा रखी थीं कि पारसनाथ बाबू इस नौकरी के लिये देवी प्रसाद से डेढ़ लाख वसूलें।
पहली बार जब ये प्रस्ताव दुलारी देवी ने पारसनाथ बाबू के सामने रखा था, तो वो अपना आपा तक खो बैठे थे। मगर वो जानते थे कि उनकी कर्कश पत्नी जिस बात के पीछे पड़ जाती है, उसे मनवा कर ही दम लेती है।
अपनी नीति का खुलासा करते हुये कांता देवी यूं तर्क देती थीं-
“ हमने भी तो देवी प्रसाद का दहेज दिया था, वो भी गिनकर पूरे एक लाख। हालांकि उसके बाप को दिया था, मगर माना गया तो बब्लरानी के ही नामे में। फिर इस नौकरी के साथ बब्लरानी और देवी प्रसाद की पूरी गृहस्थी सेटल हो जानी थी। तब क्यों ना देवी प्रसाद से वो ये रकम वसूलें। क्योंकि उनके और भी लड़कियां थी और बुढ़ापा भी सामने था। पुत्र भी तो नहीं था इसलिये बुढ़ापे में रूपया पैसा ही साथी था। सो क्यों ना इस मौके को कैश किया जाये “।
पारसनाथ बाबू ने कहा-
‘‘पर देवी देगा कहां से”?
कांता देवी ने तत्काल कहा-
‘‘जहन्नुम से लाकर देगा। नौकरी चाहिये तो खेत बेचे, बाप से कर्जा निकलवाये, वो अगर पैसे नहीं देगा तो मैं बब्लरानी को विदा नहीं करूंगी। वो भर्ती (पूंजी) लगायेगा तभी पैसे का सुख पायेगा। वरना बब्लरानी के साथ रहना उसे नसीब नहीं होगा। वैसे अगर वो पैसे नहीं देगा तो बब्लरानी को पाल हम रहे है तो उसकी तनख्वाह कौन लेगा”?
पारसनाथ बाबू ने चौंकते हुये पूछा –
‘‘यानी अब हम बेटी की तनख्वाह उठायेंगे और दामाद से घूस वसूलकर उससे अपनी दूसरी बेटी का ब्याह करेंगे। यही कहना चाहती हो ना तुम”?
कांता समझाते हुये
बोलीं-
‘‘इसमें चौंकने की क्या बात है? इसे आसानी से लो। हमने बेटी में भर्ती लगाई है, विवाह के इतने सालों बाद तक उसे पाला पोसा है। उसके बच्चों की भी परवरिश की है। अपना सब कुछ हम उसी पर लुटा दें क्या”?
पारसनाथ बाबू संशकित स्वर में बोले –
“ अगर साहबों तक ये बात पहुंच गयी और कल ये बात खुल गयी तब तो मारे शर्म के मैं जीते जी मर जाऊंगा। क्या मैं अपनी बेटी से नजरें मिला सकूंगा”?
कांता देवी दृढ़ स्वर में बोली- ‘‘ऐसा क्यों कहते हो? मैं भी तो उसकी मां हूं। क्या मैं उससे नजरें नहीं मिलाउंगी ? और साहबों तक ये बात कैसे पहुंचेगी? अगर कल को ये बात खुल भी गयी तो मैं सबसे निपट लूंगी। आखिर बब्लरानी को अपने ससुराल से कुछ न कुछ तो हासिल करना ही चाहिये”।
पारसनाथ बाबू प्रार्थना के स्वर में गिड़गिड़ाते हुए बोले-
‘क्यों मेरा लोक- परलोक बिगाड़ने पर तुली हो”।
कांता देवी शान्त स्वर में बोली –
‘‘तुम्हें कुछ नहीं करना है, सब कुछ तो मैं करूंगी”।
पारसनाथ बाबू ने शंकित स्वर में पूछा –
‘‘क्या करोगी तुम?
कांता देवी ने कहा-
‘‘उससे तुमको कोई मतलब नहीं, तुम बस इस मामले में कोई भी हां- ना मत करना, बिल्कुल चुप रहना। तुम्हें किसी को कोई जवाब नहीं देना है, वो सब मेरा सरदर्द है। कल मैंने समधी को बुलवाया है। भगवान के वास्ते तुम कल चुप रहना या घर से कहीं चले जाना”।
काफी देर तक ये शास्त्रार्थ चलता रहा, हालांकि कुछ समय पश्चात् कांता देवी ही बोलती गयीं और पारसनाथ बाबू सर झुकाकर हां हूं करते रहे।
अंततः खीझकर पारसनाथ बाबू कमरे से जाने लगे तो कांता देवी बोलीं-
“ तो क्या फैसला है तुम्हारा”?
पारसनाथ बाबू चुप रह गये।
कांता देवी ने माहौल को हल्का करते हुये कहा –
‘‘आज ही बिस्कुट नमकीन वगैरह लाकर रख दो। कल समधी आएंगे”।
पारसनाथ बाबू सुस्त स्वर में बोले ‘‘ठीक है”।
कांता देवी ने फिर प्रश्न किया “ तो बताया कुछ नहीं तुमने अपने फैसले के बारे में”? पारसनाथ बाबू ने दुलारी देवी को वक्र दृष्टि से देखा, दांत पीसते हुये और कुछ बड़बड़ाते हुये कमरे से बाहर निकल गये। दुलारी देवी के होंठो पर मुस्कान आ गयी। वे जानती थी कि जब पारसनाथ बाबू मन ही मन घुटने लगते हैं, तो उनकी बातों का प्रतिरोध नहीं कर पाते। दुलारी देवी यें बात भी बखूबी जानती थीं कि दिन- ब- दिन पारसनाथ बाबू का प्रतिरोध क्षीण पड़ता जायेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में वो अपने हमले तेज जो करने वाली थीं।
बड़ी सामयिक कहानी है आपकी दिलीप जी! पत्नी तो फिर पत्नी है। कुछ पत्नियांँ ऐसी ही होती हैं। स्वयं में भले ही कोई खूबी ना हो लेकिन पति की नकेल कस कर पकड़ रखने में सफल रहती हैं।
कम दिमाग बेटी की शादी करते समय गंभीरता नहीं रखी।
बेचारे पारसनाथ ! ऐसे ही कभी-कभी स्थितियाँ गले में फाँस की तरह अटक जाती हैं
कहानी में भर्ती शब्द नये अर्थ में प्रयुक्त हुआ।इसने ध्यान आकर्षित किया।
बधाई आपको दिलीप जी।