’’हमारे पास ज़मीन क्यों नहीं है?’’ बाबूजी की ज़मीन की बात पहली बार मैंने अपने सातवें वर्ष में उठाई थी जब मेरे जमींदार ताऊ हमारे घर पर बासमती, मूँग और उड़द की तीन बोरियाँ पहली बार लाए थे, ’मेरी ज़मीन की सौगात है…..’
मेरे दादा की मृत्यु उस समय हाल ही में हुई थी जो अभी तक हमारे लिए अनाज और दालें लाते रहे थे, ’तुम्हारी ज़मीन की हैं…..’
’’क्योंकि हमारे पास अपनी प्रिंटिंग प्रेस है,’’ एक थपकी के साथ बाबूजी ने मुझे अपने कंधे पर उठा लिया था।
उस समय उनके कंधे खूब चौड़े थे और काठी भी खासी मजबूत।
’’वह ज़मीन है?’’ ताऊ हँसे थे, ’’जो फसल उगाने की बजाय काले कागज उगलती है?’’
’’कागज काले नहीं करती,’’ बाबूजी नाराज़ हो गए थे, ’’उन पर मोती उकेरती है….’’
’’भाई नुकसान की बात बहुत करता है…..’’
ताऊ तब नहीं जानते थे बाबूजी का वह छापाखाना पैंतीस साल बाद इतनी ऊँची कीमत पर बिकेगा। सौ गुना लाभ के साथ।
’’सारी कीमत तो ज़मीन की है,’’ छापेखाने और उसके ऊपर बने मकान की खरीद का भाव बताते समय प्रॉपर्टी डीलर बोला था।
’’ज़मीन की?’’ मैं ठिठका था।
’’और क्या? ऊपर मकान एकदम खस्ताहाल है और छापेखाने की मशीनें बहुत पुरानी। आज की आॅफसेट और रोटो ग्रैव्यूर प्रिंटिंग और मल्टी कंप्यूटराइज्ड टाइपसेटिंग के ज़माने में यह लेटर-प्रेस सिस्टम वाली टू-कलर शीट फेड-फ्लैटबेड वाली सिलंडर प्रेस के कोई क्या दाम देगा?’’
’’हूँ…… हूँ……’’ मैंने सिर हिलाया था। बाबूजी की ज़मीन की धरातल उसकी समझ से बाहर थी। जिस ज़मीन को बाबूजी आखिर तक पकड़े रहे, वह ज़मीन न कभी बेची जा सकती थी, न खरीदी। उसकी लंबाई- चैड़ाई भी माप के बाहर थी।
वह अब मेरे अंदर घर किए बैठी है। लेकिन अफसोस, मैंने उसे घर दिया उन्हें खोने के बाद।
उन्हें खोने के दिन….
’’मैं डॉ0 दुर्गादास बोल रहा हूँ,’’ उस दिन ग्यारह बजे मुझे मेरे पोलिटेक्निक पर फोन आया।
’’बाबूजी आपके पास हैं?’’ माँ की मृत्यु के बाद ही से मुझे खटका था। बाबूजी की तकलीफ मुझसे पहले इन्हीं डी-थ्री अंकल (डाॅ0 दुर्गादास का उल्लेख हम इसी नाम से करते हैं) के पास पहुँचेगी।
’’हाँ, उन्हें दिल का दौरा पड़ा है। मैंने अपने नर्सिंग होम में दाखिल कर लिया है। आई0सी0यू0 के केबिन नं0 पाँच में। तुम्हें फ़ोरन आ जाना चाहिए….’’
’’मैं पहुँच रहा हूँ….’’
मेरे पोलिटेक्निक से छापेखाने की दूरी बीस किलोमीटर से कुछ ऊपर ही थी। बल्कि इसी दूरी का हवाला देते हुए मैंने बाबूजी का मकान छोड़ दिया था। जिस साल मुझे इस पोलिटेक्निक में अध्यापन-कार्य मिला था और यहाँ के छात्रावास का एक कमरा मुझे सहज में मिल गया था। मेरे विवाह के उपरांत फिर यहाँ के आवास-क्षेत्र का एक फ्लैट ही मुझे नियमानुसार अलाॅट कर दिया गया था। और माँ और बाबूजी से पारस्परिक दूरी बनाए रखने का यह दोहरा कारण बन गया था।
असली कारण कुछ और था।
असल में अपनी किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते माँ और बाबूजी के प्रति मेरी बचपन की आस्था लड़खड़ाने लगी थी।
माँ के गैर-हिंदू होने के भेद को समझ लेने के कारण।
और यह समझ मेरे कुछ परिचित ठाकुर-परिवारों और बाबूजी के परिवारजन के माँ के प्रति अलगाव-भरे व्यवहार से उपजी थी और साल दर साल बढ़ती चली गई थी…..
एक नए भय के साथ, ईसाई धर्म की माँ के बेटे होने के नाते विशुद्ध यह ठाकुर लोग कहीं मुझे अलग न छिटक दें?
एक नए क्रोध के साथ, बाबूजी ने उन्हें मेरी माँ बनाकर क्यों मुझे वंशागत कुलीनता से वंचित कर दिया?
एक नई वितृष्णा के साथ, बाबूजी के निरीश्वरवाद के प्रति, माँ के यीशु मसीह को अपना ईश्वर मानने के प्रति……
फिर माँ और बाबूजी से विमुख होकर मैं अपने ताऊ-ताई की ओर घूम पड़ा था। अपने विवाह की व्यवस्था और आयोजन के लिए भी मैंने उन्हीं को आगे किया था। मेरी पत्नी उन्हीं की देखी-भाली विशुद्ध प्रजनित ठाकुर-परिवार से रही, जिसे माँ को एक गृहस्वामिनी के अधिकार देने स्वीकार्य नहीं थे।
नर्सिंग होम के आई0सी0यू0 के बाहर सबसे पहले मुझे अपना पुराना नौकर कुंदन दिखाई दिया और बाद में बाबूजी के छापेखाने के पाँचों कर्मचारी।
सभी सकते में थे।
’’बाबूजी कैसे हैं?’’ मैंने पूछा।
’’कुछ मालूम नहीं,’’ कुंदन ने कहा।
मैं केबिन नं0 5 में बढ़ लिया।
डी-थ्री अंकल एक समूह के साथ वहाँ बाबूजी का ब्लड-प्रेशर माप रहे थे।
मैंने उनकी दिशा में अपने हाथ जोड़ दिए।
उन्होंने अपना सिर हिला दिया। चिंतित मुद्रा में ।
बाबूजी अचेत थे। मगर उनके हाथ और पैर सिहर रहे थे। शायद अपने से संबद्ध ई0सी0जी0 मशीन के कारण जिसकी स्क्रीन पर एक ग्राफ निरंतर उछल रहा था।
’’ब्लड-प्रेशर अभी काबू में नहीं आ रहा,’’ डी-थ्री अंकल ने अपनी ब्लड-प्रेशर की मशीन समेटते हुए कहा, ’’अगले चार घंटे पूरी चौकसी रखनी होगी….’’
’’क्या रीडिंग है?’’ मैंने पूछा।
’’220/140। लगता है इधर अपनी ब्लड-प्रेशर की दवा ठीक से नहीं लेते रहे।’’
’’शायद,’’ मैं झेंप गया। बाबूजी के ब्लड-प्रेशर की मुझे अभी तक कोई जानकारी नहीं रही थी। इधर उन्हें मिले हुए मुझे कई महीने हो चले थे। फोन पर यदा-कदा जब उनसे बात होती भी थी, तो उनकी आवाज़ में मैंने हमेशा पहले वाला दम, पहले वाला जीवट और पहले वाला आक्रमण ही पाया था।
’’मेरे साथ आओ,’’ डी-थ्री अंकल ने मुझे अपने पीछे आने का संकेत दिया।
’’जी, अंकल,’’ मैंने कहा।
’’जब तक मेरे ये दो डाॅक्टर और यह नर्स बने रहेंगे,’’ उन्होंने पीछे रह गए अपने समूह की ओर संकेत दिया।
’’यस सर…..’’ समूह ने हामी भरी।
’’बाबूजी बचेंगे तो?’’ जैसे ही हम केबिन से बाहर हुए मैं पूछ बैठा।
’’मालूम है?’’ उन्होंने अपनी बाँह से मेरी पीठ घेर ली, ’’जब तुम्हारी माँ के बारे में मैंने उन्हें कहा, शायद वे अब बचेंगी नही ंतो वे क्या बोले?….बचेगी कैसे नहीं। वह मेरे अंदर हमेशा बची रहेगी। उन्हीं की बात दोहराऊँगा, वे जरूर बचेंगे। तुममें। मुझमें। उनका हौसला बचा रहेगा। तुम्हारे साथ। मेरे साथ। मालूम है? उनका हौसला कैसा हौसला था? सिविल सर्विस में बैठे। नहीं आए। आगे बढ़ लिए। छापाखाना खरीदा। नहीं चला। मगर वे उसे चलाते चले गए। बिना झुके। ईसाई लड़की से प्रेम हुआ तो उससे शादी कर ली। परिवार ने विरोध किया तो कचहरी में जाकर रजिस्ट्रार से शादी का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया। पूरी जिम्मेदारी के साथ। कैंसर उसे लील ले गया तो उसे उसकी इच्छानुसार कब्र दी। पूरी धज से। दुनिया की ऐसी की तैसी। हौसला है, हौसला। अटूट और मजबूत। कोई कितने भी हथियार खड़खड़ाए आप अपने हथियार सीध में मिलाते चले गए….’’
डी-थ्री अंकल बाबूजी के गाँव के थे और अपनी डाॅक्टरी की पढ़ाई के दिनों तक मेरे दादा के आश्रित-राज्य के लाभ-भोगी भी रह चुके थे। बेशक अपनी पढ़ाई खत्म करते ही वे अपने भावी ससुर के संरक्षण में चले गए थे जो उन्हें स्थानीय मेडिकल काॅलेज में पढ़ा चुके थे और रिटायर होने के बाद अपना यह नर्सिंग होम खोल लिया था। यहीं से डी-थ्री अंकल ने इस छापेखाने के बिकने की संभावना की सूचना बाबूजी को दी थी। छापेखाने का पुराना मालिक इसे बेचकर टी0वी0 की एजेंसी खरीदना चाहता था। इधर बाबूजी भी उस साल के आते-आते स्थानीय यूनिवर्सिटी में एम0ए0 कर लेने के बाद सिविल सर्विस परीक्षा में दो बार विफल हो चुके थे और उन दिनों अपने लिए कोई विकल्प खोज रहे थे। ऐसे में इस छापेखाने को चलाने का प्रस्ताव उन्हें भा गया था। मेरी माँ से भी बाबूजी इसी नर्सिंग होम में मिले थे जहाँ वह एक नर्स का काम करती थीें।
’’दौड़कर यह दवा और एंजेक्शन ले आओ। फिर आॅक्सीजन का प्रबंध करना होगा….’’
’’जी, अंकल….’’
’’बाबूजी कैसे हैं?’’ आई0सी0यू0 के बाहर डेरा डाले छापेखाने के आदमी और कुंदन मुझे देखते ही मेरी ओर बढ़ आए।
’’कुछ पता नहीं,’’ मैं एक शून्य में विचर रहा था, ’’अभी तो कुछ सामान लाना होगा…..’’
’’आप हमें बताइए,’’ सभी लगभग एक साथ बोल पड़े, ’’हम सब कर लेंगे। आप बाबूजी के पास बैठिए…’’
’’और खरीद के रूपए?’’ अपनी जेब से मैंने अपना बटुआ निकालकर खोल लिया।
’’अभी कुछ मत दीजिए, भैया जी,’’ कुंदन ने कहा, ’’इस इलाके का चप्पा-चप्पा बाबूजी को जानता है। मानता है। हम रामप्रसाद के साथ विंध्याचल को भेज देते हैं और ये सारा सामान अभी लाए देते हैं……’’
डी-थ्री अंकल की पर्ची मैंने ने बढ़े हाथों में थमा दी।
’’आज सुबह ही से बाबूजी का जी अच्छा नहीं था,’’ कुंदन ने मुझे स्निग्धता दिखाई, ’’अम्मा की आलमारी खोले बैठे थे। चाय नहीं पी। नाश्ता नहीं किया। नहाए नहीं। आठ बजे हमें फूल लिवाने भेज दिए। हम समझ लिए, अम्मा की समाधि पर आज फिर जाएँगे। पत्नी के ऐसे भक्त हमने बिरले ही देखे हैं…..’’
’’साढ़े आठ के करीब हमारे पास आए हैं।’’ एक प्रेसमैन भी शुरू हो लिया, ’’हाथ का मेक-रेडी फार्म हमें थमाए हैं, फिर चेस में जब हम ले-आउट जमाने लगे हैं तो हमसे बोले हैं, लाॅक-अप करते समय कलर वाले फार्म की अंडर-ले का जरूर ध्यान रखना, कोई तस्वीर आउट आॅव रजिस्टर न होने पाए, इस फार्म की तैयारी में मैंने बहुत घंटे खपाए हैं। और हम हँसे हैं, मेक-रेडी का यह चक्कर अब छोड़िए, नई मशीनें लाइए और इलैक्ट्रोनिक पेज मेकअप शुरू करवाइए….’’
’’और बाबूजी ने क्या जवाब दिया?’’ मैं उत्सुक हो लिया। दो-तीन साल पहले जब मैंने उन्हें यह सुझाव दिया था तो वे मुझ पर झपट पड़े थे, ’जब यह छापाखाना मेरे साथ खत्म ही होने वाला है तो तुम इसकी फिक्र क्यों रखते हो?’
’’जवाब वही पुराना,’’ वह प्रेसमैन गंभीर हो गया, ’’ये मशीनें मुझे पहचानती हैं और मैं इन्हें। इस जवाब पर सिलंडर का प्लेट लगा रहे विंध्याचल भी हँस दिए हैं, नई मशीनें भी पहचान लेंगी। आप उन्हें लाइए तो। शहर के प्राइम कमर्शियल एरिया पर आपका छापाखाना खड़ा है। इसका एक-चौथाई हिस्सा भी बेचेंगे तो उन मशीनों की खरीद निकल आएगी। और बाबूजी झल्लाए हैं, चलो, अभी तो काम शुरू करो….’’
’’फिर करीम रबर रोलर पर इंक लगाए हैं,’’ दूसरा प्रेसमैन बोला, ’’और रशीद फाउंटन को एडजस्ट करने में लग गए हैं। और इधर हम ग्रिपर्ज से डिलीवरी करने को अपनी ट्रे तैयार किए हैं और सोच रहे हैं, बाबूजी प्रेस का बटन अभी दबाए कि दबाए, कि तभी देखते हैं वे एकाएक फर्श पर बैठ लिए हैं और डाॅ0 साहब का नाम पुकारे हैं, ’डी0डी0’ और रामप्रसाद नर्सिंग होम की तरफ दौड़ पड़े हैं…….’’
’’और हमसे जो अम्मा की समाधि के लिए फूल मँगवाए हैं, हम वे फूल लिए हक्के-बक्के खड़े हैं,’’ कुंदन ने कहा, ’’जब डाॅ0 साहब अपने नर्सिंग होम से बाबूजी के लिए स्ट्रैचर मँगवाए हैं……’’
तीसरे घंटे जब बाबूजी की चेतना लौटी तो उस समय मैं उनके साथ था। अकेला।
इस बीच आॅक्सीजन का प्रबंध भी हो चुका था।
मुझे देखते ही बाबू जी मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ा दिए। उन्हों ने जब भी मुझसे सुलह करनी होती वे ऐसी ही अंग्रेज़ियत दिखाया करते।
’’डी-थ्री अंकल को बुलाऊँ?’’ आगे बढ़ा हुआ उनका हाथ मैंने अपने दोनों हाथों से ढाँप लिया।
’’नहीं, अभी नहीं,’’ उनका स्वर बहुत धीमा, बहुत कमज़ोर था, ’’एलिस की आज बरसी है…..पहली बरसी…..’’
माँ का नाम एलिस था।
’’हाँ,’’ मैंने कहा।
माँ के अंतिम संस्कार पर हुई अपनी बहस मुझे याद आ गई। मैं माँ का दाह-कर्म करना चाहता था। मगर बाबूजी उन्हें कब्रिस्तान में दफनाने पर अड़े रहे थे, ’एलिस अपने आखिरी दम तक यीशु को अपना ईश्वर मानती रही है, और मैं सिर्फ उसी के लिए जवाबदेही रखता हूँ, किसी भी दूसरे जन के लिए नहीं…..’ फिर मेरी ताई ने आगे बढ़कर मुझे मेरी पत्नी और बच्चों के सामने याद दिलाया था, ’अपनी शादी के समय भी इन्होंने अपने मन की मानी थी, पूरे परिवार की अवमानना करते हुए कचहरी में जा शादी रचाई थी।’ और मैं ज़मीन में गड़ गया था। मेरी बेटी उस समय अपने चौदहवें साल में दाखिल हो रही थी और बेटा ग्यारहवें साल में।
’’एलिस के लिए तुम्हें आज कुछ करना होगा,’’ बाबूजी फुसफुसाए, ’’उसे तुम्हें अपने दिल में जगह देनी होगी। अपने अंदर तुम्हें अपना बचपन बचा रखना होगा….’’
बिना मुझे कोई चेतावनी दिए बाबूजी की दिशा से एक उछाल मेरे कलेजे में आन उतरा। मेरी समूची देह में एक थरथराहट, एक तड़पड़ाहट दौड़ाता हुआ।
मेरे अंदर कुलबुला रही सुबकियाँ बाहर निकल भागीं……
और मैं रोने लगा…..
माँ के लिए…..
बाबूजी के लिए…..
अपने लिए…..
’’क्या हुआ?’’ बगल वाली केबिन से एक नर्स वहाँ आ पहुँची।
’’बाबूजी को देखिए,’’ मैंने अपने को सँभाला।
नर्स ने स्क्रीन पर अपनी नज़र दौड़ाई।
वहाँ तरंगें कलैया मार रही थीं।
नर्स उसी पैर लौट ली।
अगले ही पल डी-थ्री अंकल केबिन में अपने समूह के साथ चले आए।
’’आक्सीजन मास्क लगाना होगा,’’ उन्होंने अपने समूह को संबोधित किया।
आक्सीजन के बावजूद बाबूजी लौट नहीं पाए।
प्राणविहीन उनकी देह के साथ वह रात मैंने छापेखाने वाले मकान पर बिताई।
कुंदन ने दो-एक बार कहा भी कि सुबह तक वह भी बाबूजी के पास रहना चाहेगा मगर मैंने उसे नीचे बने उसके कमरे में वापस भेज दिया।
मेरे मोबाइल पर मेरी पत्नी ने भी मेरा वहाँ साथ देने का प्रस्ताव मेरे सामने रखा परंतु उसे भी मैंने टाल दिया।
मुझे वह रस्सी अकेले में उस खूँटे से बाँधनी थी जिसे इतने साल मैं दाँव पर रखे रहा था।
एक सतही खूँटे के बल उछलने के लोभ में।
दीपक जी ..तुलना तो नही कर रही पर इतना अवश्य कहूंगी कि आप भी अपनी रचनाकर्म की पक्की हैं … पूरा गहन शोध/ अध्ययन करती है लिखने से पहले.. कहानी मेडिकल ग्राउंड से हो या किसी वर्ग विशेष के दैनन्दिन जीवन की पृष्ठभूमि से … कोई तर्क, तथ्य,संदिग्ध नही होता ..बिल्कुल हमारे आदरणीय संपदक महोदय के साप्ताहिक संपादकीय की तरह ….. कहानी भारतीय ज्ञान पंरपरा के अभीष्ट को निभाती मालूम पकड़ी.. passion, secularism, dedication ,Emotions सब रस मिलते हैं सहृदय को आपकी रचना में … कमाल के होते है आपके कथांत … त्रासदी को भी सुखांत बना देते हैं … एलोपैथिक दवाई की तरह….. पुन: एक बढिया कहानी पढ़वाने के लिए आभार …आपका भी पुरवाई के प्रतिष्ठित आभासी मंच का भी …
आदरणीय दीपक जी!
आपकी कहानी पढ़ी-“बाबूजी की जमीन!”
बहुत ह्रदयस्पर्शी है।
हमारे वे रिश्ते जो बेहद-बेहद ही अंतरंग होते हैं, उनके प्रति हमारी आसक्ति अपरिमित होती है। वे रिश्ते टूटकर भी नहीं टूटते।साथ ही रहते हैं, बस दिखते नहीं ,लेकिन हर पल अंतर में महसूस होते हुए उपस्थिति दर्ज करते रहते हैं जीवन के हर कर्म के साथ जुड़े हुए, बातों में,मश्वरे में, सेवा में, हर कदम पर हाजिर।
धर्म की दृष्टि से हम नहीं मानते लेकिन संस्कृति की दृष्टि से अलग जब प्रेम विवाह होता है तो कहीं ना कहीं तो खटकता है। प्रेम इन सब परिभाषाओं से दूर रहता है। इसलिए वह नहीं समझता लेकिन सहधर्मियों के लिए इसे स्वीकार कर पाना बहुत मुश्किल रहता है। अंतर्जातीय विवाह में उतनी रुकावटें नहीं आती जैसा कि आजकल हो भी रहा है, किंतु जहाँ संस्कृति बदलती है वहाँ थोड़ी खटास अब भी है।
कुछ पुरुष अपनी सोच के प्रति बहुत दृढ़ होते हैं दीपक जी! जैसा इस कहानी में पिता को दिखाया गया! बच्चों को इतना नहीं लगता है, लेकिन जब इधर-उधर से कुछ सुनते हैं तो मन: स्थिति बदलने लगती है। बेटे के साथ यही हुआ।
पर ठीक है अंत भला तो सब भला। जब डॉक्टर साहब ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तब बेटे को अपनी माँ के प्रति अपनी गलती का एहसास तो हुआ।
कभी-कभी आवेश में हम लोग गलत निर्णय ले लेते हैं लेकिन जब गलती का एहसास होता है तो पश्चाताप के आँसू भी उस दुख को भुलाने में कामयाब नहीं होते। जीवन भर के लिये एक पछतावा साथ रह जाता है और पूरा जीवन उस पछतावे के साथ ही गुज़ारना पड़ता है।
जिस विषय को आपने कहानी के लिए चुना उस विषय से संबंधित सभी जानकारियाँ चाहे वह अस्पताल की हों या छापाखाने की; उनकी समस्त बारीकियों को समझकर लिखते हुए आपने इस कहानी को जीवन्त कर दिया।
जिस छापेखाने की कोई वैल्यू नहीं की जा रही थी, उस छापेखाने से इतर उसकी जमीन ने ही जो अप्रत्याशित दिया वह अकल्पनीय था। यहाँ शीर्षक ने स्वयं को सार्थक किया।
एक बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत- बहुत बधाइयाँ।