‘कामायनी‘ युग प्रवर्तक महाकवि प्रसाद जी की प्रख्यात कृति है । इसके महाकाव्य के संबंध में विद्वानों में मतवैभिन्नय मिलता है । आचार्य शुक्ल ने इसमें चित्रात्मकता एवं लाक्षणिकता के आधार पर इसे छायावादी कृति माना है। (1) शांतिप्रिय द्विवेदी के मतानुसार -” सब मिलाकर यह काव्य वर्तमान छायावाद का उपनिषद है, पिछले युग के कवित्व का अंतिम स्तूप है । नवीन युग इसके आगे है । ” (2) गजानन माधव मुक्तिबोध की स्थापना है -” छायावादी काव्य में ‘ कामायनी ‘ ही एक ऐसा ग्रंथ है जो समाज और राजनीति के क्षेत्र में नए साहस प्रयासों को लेकर आगे बढ़ता है ।“(3) वस्तुत: कामायनी में अपने सृजन कालोपयुक्त वैशिष्ट्य अवश्य मिलता है तथापि वह केवल छायावादी रचना नहीं है। छायावादी कवि जगत –जीवन से निस्पृह रहते हुए केवल स्वानुभूति की विवृति करते रहे किन्तु प्रसाद जी ने चिंता , आशा , श्रद्धा सर्ग में अपनी सुख–दुख आत्मानुभूतियों को व्यक्त करने के अतिरिक्त जीवन और जगत का व्यापक अंकन किया है। वे अपने सामयिक युग एवं उसमें परिव्याप्त समस्याओं से भलीभांति अवगत ही नहीं एक सीमा तक उनके भुक्तभोगी भी थे। भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने वाली आंग्ल कूटनीतियों का उन्होंने घोर विरोध ही नहीं किया बल्कि पराधीनता की लौह श्रृंखलाओं को तोड़कर अपने अपहृत अधिकारों एवं स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रेरणा दी। उन्होंने युगीन समाज एवं राजनीति में से ही उन प्राण तत्त्वों की खोज की जिनसे समस्त विभीषिकाओं का समाधान किया जा सके।
द्विवेदी युगीन अतिशय नैतिकता के विपरीत छायावादी कवियों ने नारी के बाहरी सौन्दर्य के रेखांकन में अधिक रुचि ली। उन्होंने प्रकृति पर भी नारी भाव का आरोपण किया । यद्यपि वे नारी के आंतरिक सौन्दर्य , उसकी हृदयगत उदात्तता के प्रति उदासीन नहीं रहे तथापि उनके द्वारा अंकित किए गए ऐसे चित्र अत्यल्प हैं। प्रसाद जी ने कामायनी में श्रद्धा के बाहरी सौन्दर्य के साथ ही उसके संवेदनात्मक एवं प्रेरणादायक रूप का भी वर्णन किया है । श्रद्धा के अंतवर्ती सौन्दर्य चित्रों में उन्होंने मांसलता का बहिष्कार किया है तथापि मनु एवं श्रद्धा के दांपत्य प्रेम प्रसंग में ( ‘ काम ‘ भावना ) उसका सन्निवेश हो गया है । ऐसे स्थलों पर उनकी चेष्टा उन्हें सांकेतिक अभिव्यक्ति देने की रही है।
यथा –
” उषा सुनहले तीर बरसाती
जय लक्ष्मी सी उदित हुई ।“
तथा
” आह शून्यते ! चुप होने में तू क्यों इतनी चतुर हुई
इन्द्रजाल जननी! रजनी तू क्यों अब इतनी मधुर हुई।“
पंक्तियों में प्रकृति मानवीय भावों से संयुक्त है । वह एक चेतन सत्ता है जो अपने रमणीय रूप में आह्लादिका है तो रौद्र रूप धारण कर विध्वंसक भी हो जाती है । कल्पनाधिक्य छायावादी काव्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। प्रसाद जी छायावाद के प्रमुख प्रकाश स्तंभ थे अतः उनकी कामायनी में ऐतिहासिक पौराणिक कथावलंब के साथ ही कल्पना का उन्मुक्त प्रयोग मिलता है। स्वयं कवि की तद्विषयक स्वीकृति अवलोकनीय है _” कामायनी की कथा श्रृंखला मिलाने के लिए कहीं – कहीं थोड़ी बहुत कल्पना को भी काम में ले आने का अधिकार मैं नहीं छोड़ सका हूं। “(4)
विवेच्य कृति का समापन जिस अखंड आनंद की भावभूमि पर हुआ है वह उसके दर्शन प्रधान , आध्यात्मिक कृति होने के भ्रम का कारण बना है। वस्तुत: प्रसाद जी शैवों के प्रत्यभिज्ञादर्शन से प्रभावित थे। उनका विश्वास था कि इसमें ही उस अखंड आनंद की उपलब्धि संभव है जो मानव मात्र का काम्य है , उसका साध्य है वही उसे इस आपाधापी और समस्या संकुल जीवन की घुटन से त्राण दिला सकता है। निवृत्ति या पलायन उनकी दृष्टि में कायरता का पर्याय था । बौध दर्शन के दुखवादी, क्षणिकवाद तथा शून्यवाद के अनुरूप प्रारंभ में देव संस्कृति का जल में विलय मनु को चिंतित और दुखी करता है। नश्वरता दुःख का मूल होती ही है अतः मनु का ‘ भीगे नयनों ‘ से जल प्रवाह देखना अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती। ‘ कामायनी ‘ में ऐसी भावपूर्ण स्थल पर्याप्त है। यथा अपने पालित मृग छौने की निर्मम बलि से श्रद्धा आहत होती है। कृति के उत्तरार्ध में इड़ा का श्रद्धा के प्रति समर्पण भी भावपूर्ण है। मनु की अवसाद पूर्ण स्थिति बहुत समय तक नहीं रहती।
श्रद्धा और इड़ा द्वारा प्रेरित करने पर मनु पुनः कर्मठ बनते हैं। इस संदर्भ में श्रद्धा की उक्ति है–
” तप नहीं केवल जीवन सत्य
करूणा यह क्षणिक दीन अवसाद
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद । “
अपनी भ्रांति दूर हो जाने पर मनु भी मानने लगते हैं कि–
“चिति का विराट वपु मंगल,
यह सत्य, सतत, चिर सुन्दर।“
इस संदर्भ में महादेवी वर्मा की स्थापना है -” छायावाद युग की सबसे सुंदर कृति होने पर भी ‘ कामायनी ‘ का लक्ष्य ना अरूप की छाया है ना निराकार का रहस्य ।“(5 ) इसके अतिरिक्त प्रसाद डार्विन के विकासवाद से भी प्रभावित थे। ‘कामायनी ‘ में मनु श्रद्धा के सहयोग से देव संस्कृति से इतर मानव संस्कृति का विकास करते हैं । गुरुत्वाकर्षण , गतिशीलता , विद्युत्करण आदि के तत्व भी कृति में हैं । प्रसाद भौतिक वाद के पक्षधर नहीं थे इसीलिए मनु द्वारा भौतिकतावादी विचारानुरूप की गई सारस्वत नगर की पुनर्व्यवस्था भी वर्ग संघर्ष के साथ नष्ट हो गई । अतिशय बौद्धिकता और तर्कशीलता के प्रति प्रसाद की निष्ठा नहीं थी क्योंकि अंत में उन्होंने उसे भी श्रद्धा से समन्वित कर दिया है । अतः ‘कामायनी ‘ एक विशुद्ध आध्यात्मिक या दर्शन प्रधान कृति नहीं है ।
छायावाद में द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता का स्थान सांकेतिकता , लाक्षणिकता एवं व्यंजनात्मकता ने ले लिया था। कवियों ने व्याकरण की श्रृंखलाओं में जकड़ी भाषा को मुक्त कर उसे माधुर्य से मंडित किया । उन्होंने अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में समर्थ भाषा रूप को अपनाया , अलंकारों से अलंकृत किया तथा संगीत की स्वर लहरियों से समन्वित किया । यद्यपि प्रसाद जी ने सभी अलंकारों का यथोचित यथास्थान प्रयोग किया है तथापि रुपक के प्रति उनका रुझान स्पष्ट दिखता है। ‘ कामायनी ‘ को विशुद्ध रुपक काव्य भी नहीं माना जा सकता । इसके ऐतिहासिक आधार तथा द्वयअर्थक कथा के सुनियोजन एवं सफल निर्वाह के लिए रुपक का अवलंब लिया गया है। इससे मूल कथा में कोई अंतर नहीं आया है। प्रसाद जी का अभिमत है कि -” यह आख्यान इतना प्राचीन है कि इतिहास में रूपक का अद्भुत मिश्रण हो गया है इसलिए मनु , श्रद्धा और इड़ा अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए सांकेतिक अर्थ को भी अभिव्यक्त करें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं । मनु अर्थात मन के दोनों पक्ष– हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमशः श्रद्धा और इड़ा से भी सरलता से लग जाता है । “( 6) मनु मन की संकल्पनात्मक _ विकल्पात्मक स्थिति का , आकुल– किरात मानव की पाशविक विकृतियों का , देवगण अहं और विलास का , बलि – पशु छौना निरीह मानव का , वृषभ धर्म का प्रतीक होकर रूपक तत्व को विकसित करते हैं । घटनाएं और घटनास्थल भी सांकेतिक अर्थ देते हैं यथा _ जल प्लावन वासना का , सारस्वत नगर भौतिक समृद्धि का , मानसरोवर कैलाश समरसता और अखंड आनंद को व्यंजित करते हैं । सभी सर्ग मानव मन की विभिन्न चित्तवृतियों के अनुसार नियोजित हैं । वस्तुतः रुपक तत्व की समाहिती होने पर भी ‘ कामायनी ‘ रूपक काव्य नहीं कही जा सकती क्योंकि उसमें रुपक की संभावनाओं का संकेत मात्र मिलता है। स्पष्ट है कि ‘ कामायनी ‘ छायावादी काव्य कृति आध्यात्मिक अथवा दर्शन का विश्लेषण एवं रूपक काव्य नहीं है । वह प्रसाद जी का उत्कृष्ट महाकाव्य है अतः उसी के निकष पर उसका परीक्षण अभीप्सित है।
संस्कृताचार्यों भामह , रूद्र , दंडी आदि ने सर्वप्रथम महाकाव्य पर विस्तार से विचार कर उसके लिए मानदंडों का निर्देश किया । आचार्य विश्वनाथ की तदविषयक स्थापनाएं स्पष्ट और स्वीकृत रहीं । उन्होंने उदात्त को महाकाव्य की महत्त्वपूर्ण अनिवार्यता माना तथा विषय , चरित्र व अभिव्यक्ति की दृष्टि से अपने विचार व्यक्त किए जिन्हें निकष के रूप में परवर्ती काव्यशास्त्रियों एवं महाकाव्यकारों द्वारा स्वीकृत किया गया है। उनकी मान्यतानुसार महाकाव्य महत काव्य है अतः उसका कलेवर भी वृहद होता है। उसकी कथा प्रख्यात पौराणिक, ऐतिहासिक होनी चाहिए। मुख्य कथा के अतिरिक्त उसमें प्रासंगिक आवान्तर कथाएं तथा देश–काल, प्रकृति आदि से सम्बन्धित प्रसंग भी होने चाहिए। प्रकृति के विभिन्न रुपों_ आलंबन, उद्दीपन , पृष्ठभूमि , उपदेशक , आवश्यकतानुसार अनुरूप होने चाहिए। युगधर्म की अभिव्यक्ति महाकाव्य की महती आवश्यकता है । महाकाव्यकार को सामयिक , सामाजिक , राजनीतिक समस्याओं का विवेचन और समाधान प्रस्तुत कर अपनी कृति को प्रासंगिकता प्रदान करनी चाहिए। संपूर्ण कथा कम से कम 8 सर्गों में विभक्त होनी चाहिए जो मुख्य कथा के क्रमिक विकास में सहायक हो। प्रारंभ में मंगलाचरण , सज्जन प्रशंसा एवं खल निंदा की योजना होनी चाहिए । महाकाव्य का उद्देश्य महान, धर्म –अर्थ –काम– मोक्ष में से किसी एक अथवा एकाधिक की प्राप्ति होनी चाहिए जिसका स्पष्टीकरण एवं प्राप्ति अंत में आवश्यक हो जानी चाहिए । उदात्त कथा के अनुरूप महाकाव्य का नायक भी क्षत्रिय , राजा , वीर , धीरोदात्त होना चाहिए । कृति में आद्यन्त विद्यमान और अंत में उसका फल की प्राप्ति का भोक्ता होना भी अनिवार्य है। उसके अतिरिक्त अन्य गौण पात्रों तथा उनकी प्रतिस्पर्धा करने वाले खल पात्रों की नियोजना होनी चाहिए जो अंत में पराजित होते तथा मृत्यु को प्राप्त होते हैं । सभी पात्रों को नायक के उत्कर्ष में सहायक होना चाहिए। महाकाव्य की भाषा शुद्ध , परिष्कृत , श्रृंगार –वीर– शांत त्रिविध रूपों में से एक अंगी रस में प्रतिष्ठित तथा शेष गौर रूप में नियोजित हो । अंगी रस का कृति में आद्यन्त विद्यमान होना , प्रमुख पात्रों की मूल वृत्ति से एक रुप तथा मूल प्रभाव की व्यंजक होना भी अपेक्षित है । प्रत्येक सर्ग में एक छंद का प्रयोग होना अनिवार्य है तथा सर्गान्त में छंद परिवर्तन की सूचना के साथ आगामी कथा की सूचना दी जानी चाहिए ।
प्रसाद जी ने संस्कृत काव्यशास्त्र में निर्दिष्ट महाकाव्य की अहर्ताओं का यथासंभव निर्वाह करने के साथ ही ‘ कामायनी ‘ में कतिपय मौलिक उदभावनाएं भी की है । प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति अपूर्व निष्ठा रखने वाले प्रसाद जी उसके मर्मज्ञ आख्याता भी थे। ‘ कामायनी ‘ उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि तथा महाकाव्यात्मक कृति है । इसमें उन्होंने ‘ शतपथ ब्राह्मण ‘ के आठवें अध्याय में वर्णित जलप्लावन की कथा को पृष्ठभूमि के रूप में अपनाया है । नारद पुराण, जैमिनीय ब्राह्मण , मत्स्य पुराण , भागवत पुराण इत्यादि धर्म ग्रंथों तथा देशी–विदेशी मिथकों में भी यह कथा उल्लिखित मिलती है। स्वयं कवि ने विवेच्य ग्रंथ की भूमिका में लिखा है _ ” आर्य साहित्य में मानवों के आदि पुरुष मनु का इतिहास वेदों से लेकर पुराणों और इतिहासों में बिखरा हुआ मिलता है। ” (7) इनमें विकीर्ण , विरल एवं विश्रृंखल कथा सूत्रों को सम्बद्ध करने के लिए कवि ने कल्पना से मौलिक प्रसंगों की उद्भावना की तथा उन्हें अधिक विश्वसनीय , सरस और रोचक बनाया है। पुराणों में जल प्लावन एक नैसर्गिक आपदा के रूप में लिपिबद्ध है। विदेशी मिथकों में मानव की नास्तिकता तथा पापकृत्यों का दुष्परिणाम मानी गई है किन्तु प्रसाद जी ने ‘ कामायनी ‘ में मदान्ध देवताओं की निर्बन्ध उच्श्रृंखलता, अहं को इसका कारण माना है। पंद्रह सर्गों में विभक्त ‘कामायनी ‘ को अध्ययन की सुविधा के लिए चार खंडों में विभक्त किया जा सकता है । प्रथम खंड में जल प्रलय में देव संस्कृति के जलमग्न होने , मनु द्वारा उसके कारणों पर चिंतन करने तक की कथा है।
भारतीय ग्रंथों में मत्स्य की सींग में बंधी मनु की नौका हिमालय पहुंचती है । प्रसाद ने इस तथ्य को यथावत स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे जानते थे कि आधुनिक बौद्धिक मानस इसे स्वीकार नहीं कर पाएगा अतः उन्होंने मत्स्य के प्रबल आघात से नौका के पर्वत पर पहुंचने की परिकल्पना की है।
काम की पुत्री श्रद्धा का मनु से सम्पर्क, उनका परस्पर आकर्षण, श्रद्धा का स्वयं को समर्पित कर निराश और निष्क्रिय मनु को पुनः कर्मरत करना तथा उनके पुत्र के जन्म की कथा दूसरे खंड में है। ‘ भागवत पुराण ‘ में भी मनु– श्रद्धा के सम्पर्क सहवास से मानव सृष्टि के विकास तथा उसके दस पुत्रों का उल्लेख मिलता है। विदेशी मिथकों में भी आदम –हव्वा(Adam-Eva )स्त्री– पुरुष के परस्पर संबंध से ही मानव सृष्टि का विकास हुआ माना गया है । प्रसाद जी ने श्रद्धा को मनु की प्रेमिका या पत्नी ना मानकर ‘ काम ‘ की पुत्री माना है जो ‘लज्जा ‘ की सम्मति से ही मनु से दांपत्य संबंध स्थापित करती है । गर्भवती होने पर वह एक सामान्य नारी की भांति ही अपने भावी शिशु के निमित्त साधन एकत्र करती है तथा मनु के पलायनोपरांत दुःखी होती है । प्रसाद जी मनु द्वारा किए जाने वाले यज्ञ को भी पुत्र प्राप्ति के लिए ना मानकर उनकी देव प्रकृति के अनुकूल मानते हैं। अपने एकाधिकार का विभाजन उन्हें सह्य नहीं होता । उनकी कर्तव्य विमुखता, निर्ममता और स्वार्थी प्रवृत्ति उन्हें अपनी ही संतान के प्रति शंकित बनाती है । श्रद्धा का तकली काटना, वस्त्र बुनना व मनु को अहिंसा का उपदेश देना गांधीवादी प्रभाव माना जा सकता है । कवि द्वारा किए गए परिवर्तन समयोचित हैं। प्रसाद जी ने समर्पण से पूर्व श्रद्धा में काम, इच्छा और लज्जा की नारीयोचित भावनाओं का उदय दिखाया है । उन्होंने मनु– श्रद्धा का केवल एक पुत्र माना है जो आगे चलकर मानव सृष्टि का विकास करता है। प्रसाद अपने युग के अतीत और वर्तमान स्थितियों से अवगत थे तथा उनके प्रति पूर्ण जागरुक भी थे अतः उन्होंने प्राचीन मिथकों को वर्तमान के ज्ञान से संग्रहित कर पाठक के लिए सुपाच्य बनाया है।
तीसरे खंड की कथा मनु द्वारा उजड़े सारस्वत नगर की बौद्धिक पुनर्व्यवस्था करने , इड़ा से अनाचार करने के कारण प्रजा के संघर्ष करने , तथा नगर के विनाश से लेकर इड़ा– श्रद्धा के संपर्क तक विस्तृत है । इस अंश में भी कवि ने अपनी मौलिक उद्भावनाएं अभिव्यक्त की हैं। पुराणों में इड़ा मनु के मैत्रावरुण यज्ञ से उत्पन्न पुत्री मानी गई हैं किन्तु प्रसाद जी ने उसे सारस्वत प्रदेश की स्वामिनी के रूप में अंकित किया है क्योंकि उनकी दृष्टि में पिता के रूप में मनु का उससे अनाचार करना ना केवल लौकिक दृष्टि से निंदनीय था अपितु नायक के रूप में मनु का चारित्रिक स्खलन भी होता। मनु का सारस्वत नगर जाकर इड़ा के सहयोग से उसे पुनः व्यवस्थित करना, स्वामित्व के अहं से पूरित हो इड़ा पर अनाचार करना , कुपित प्रजा के संघर्ष में मनु का आहत होना आदि घटनाएं श्रद्धा द्वारा स्वप्न में देखी जाती हैं जिससे व्यथित हो वह सारस्वत नगर जाती है और इड़ा से मिलती है । कवि ने पुराणों में वर्णित प्रजापति और देवों के संघर्ष को मान्यता ना देकर सारस्वत प्रदेश की प्रजा द्वारा संघर्ष कराया है। देव कोप का उल्लेख भी आकाशवाणी के रूप में हुआ है जो अधिक विश्वसनीय है ।
चतुर्थ खण्ड में मनु का श्रद्धा के साथ हिमालय पर्वत पर जाना , नटराज के दर्शन करना , भाव– ज्ञान– क्रिया के तीन गोलको के समन्वय द्वारा ज्ञान की प्राप्ति कर अखंड आनंद की उपलब्धि करना वर्णित है । शिव –तांडव तथा त्रिपुर दाह की ऐतिहासिक कथा शैवागमों में भी स्वीकृत है । प्रसाद जी ने मनु के अवसाद के निवारणार्थ एवं आनंदोपलब्धि के लिए शिव के वास कैलाश को चुना है। श्रद्धा–मनु की आधिकारिक कथा के अतिरिक्त आकुली– किरात , सारस्वत नगर , इड़ा और मानव संबंधी प्रासंगिक कथाएं भी नियोजित है जो मुख्य कथा को पुष्ट व विकसित करती हैं । कथारंभ में मंगलाचरण , सज्जन प्रशंसा, खल निंदा का नियोजन नहीं हुआ है । ‘ हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर ‘ तथा अंतिम तीन सर्गों में व्यक्त आध्यात्मिक विचारधारा मंगलाचरण की मान्यता को पूर्ण करती है। श्रद्धा की प्रशंसा तथा आकुली– किरात असुरों की निंदा और वध को सज्जन प्रशंसा व खल निंदा के रूप में स्वीकारा जा सकता है । संस्कृत काव्यशास्त्रियों द्वारा एकरसता के परिहार्य के लिए प्रत्येक सर्ग के अन्त में छंद परिवर्तन तथा औत्सुक्य सृष्टि के लिए आगामी सर्ग की कथा का संकेत करने का निर्देश दिया गया था जिसे कामायनीकार ने स्वीकार नहीं किया है । केवल सर्गान्त में आगामी सर्ग की संकेतात्मक सूचना देने का ही पालन किया है।
कामायनी की कथा केवल एक राजवंश , देवपुरुष अथवा राष्ट्र विशेष से संबद्ध ना रहकर संपूर्ण मानव जाति के विकास की गाथा बन जाती है और यही कथानक की अखंडता एवं उदात्ता का रहस्य भी है । डॉ नगेद्र की दृष्टि में – ” कामायनी के कथानक की गरिमा इन प्रसंगों में उतनी नहीं है , जितनी कि मनु (मानव) के अहंकार के विस्तार अथवा बुद्धि पर पूर्ण अधिकार करने के लिए मानव – चेतना के निर्बाध प्रयास में अथवा आत्मा की तीन प्रवृत्तियों के प्रतीक त्रिलोक के दर्शन से मानव चेतना द्वारा सामरस्य की सिद्धि में है। बाह्य दृष्टि से देखने पर ये घटनाएं अपनी अमूर्तता के कारण अनाकर्षक प्रतीत होती है किन्तु वर्तमान युग में जिस प्रकार मानव चेतना बुद्धि पर अबाध अधिकार प्राप्त करने का प्रयास कर रही है उसे देखते हुए इससे प्रबलतर घटना की कल्पना करना संभव नहीं है ।“(8) कामायनी की कथा एक राजवंशी पुरुष अथवा राष्ट्र से सम्बद्ध नहीं है। यह संपूर्ण मानव जाति के विकास की गाथा है । संदर्भानुसार तदयुगीन राजनीति, समाज का आकलन इस प्रकार हुआ है कि पौराणिक संस्कृति का सत_असत पक्ष स्वत: रूपायित होता गया है । अंत में समस्त विरोधी तत्वों के समन्वय से समरसता का आख्यान किया गया है। प्रत्येक सर्ग मानव की विविध चित्तवृत्तियों से संबंधित है तथा उसी आधार पर उसका नामकरण भी हुआ है यथा ‘ चिंता ‘ सर्ग में मानव मन में सुषुप्त रूप से विद्यमान चिंता मनोभाव के उदय और विकास का चित्रण,जलप्रलय तथा देव संस्कृति के विनाश से चिंतित मनु के माध्यम से किया गया है। कवि ने स्पष्ट कर दिया है कि मृत्यु ही चिर सत्य है,अमरत्व की कल्पना मिथ्या है। प्रलयोपरांत घटता जलस्तर मनु में विनष्ट देव संस्कृति के पुनरुत्थान की आशा जगाता है ।
‘काम‘ मानव मन की मूल वृति है । काम सर्ग में श्रद्धा का सामीप्य, सौन्दर्य और निस्वार्थ समर्पण मनु की इस प्रवृत्ति को उकसाता है । ‘ लज्जा ‘ सर्ग में कवि ने नारी की अंतर्वृत्ति लज्जा का मानवीयकरण किया है । मनु को समर्पण करने से पूर्व श्रद्धा स्वाभाविक लज्जा से भर जाती है । वह सहज विश्वासी है अतः मनु द्वारा पुनः हिंसा न करने का वचन देने पर उन्हें सर्वस्व समर्पण कर देती है। मनु की ईर्ष्या, एकाधिकार की भावना , निष्ठुरता, निर्ममता तथा सुख लिप्सा की वृत्ति ईर्ष्या सर्ग में दिखाई देती है।काम के शाप से चिंतित मनु को इड़ा का सहयोग एवं प्रोत्साहन सक्रिय करता है। वे सारस्वत नगर की बौद्धिक संरचना करते हैं किंतु एकाधिकार और स्वामित्व की महत्वाकांक्षा उनकी विलासी वृत्ति को उकसाती है। वे इड़ा से अनाचार करने के लिए उद्यत होते हैं। श्रद्धा का ममत्व तथा विरह जन्य कातरता इड़ा सर्ग में स्पष्ट हो जाती है।
निर्वेद सर्ग में सभी पात्र निर्वेद भाव से युक्त है । प्रजा नगर के धवंस होने पर अव्यवस्थित और समृद्धि हीन होने के कारण ; इड़ा स्वराज्य के पूर्णतः ध्वंस होने तथा मनु की अनियंत्रित उच्छृंखलता से क्षुब्ध और आत्मग्लानि पूरित श्रद्धा आहत मनु की पीड़ा से मर्माहत, किंकर्तव्यविमूढ़, दुखी और कातर होती हैं। मनु भौतिक नश्वरता से संत्रस्त हो सारस्वत प्रदेश की प्रजा से प्रतिशोध लेने के लिए संकल्पित होते हैं । कवि प्रतिकूल परिस्थितियों में मनुष्य में होने वाले अन्तर्द्वन्द और विभिन्न संवेगों के मनोवैज्ञानिक अंकन में सफल रहे हैं । ‘दर्शन ‘ सर्ग में भी पात्र पूर्णत: शांत नहीं हो पाते। मनु का पुनः पलायन श्रद्धा को विस्मित करता है । इड़ा स्वयं को सारे संघर्षों के लिए उत्तरदायी मानकर उदिग्न होती है। श्रद्धा उसे केवल बुद्धि और तर्क के स्थान पर नारीयोचित गुणों__कोमलता , उदारता, त्याग , ममता , क्षमा आदि को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। ‘ रहस्य सर्ग ‘ में मनु शांत और लोकमंगल की भावना से संयुक्त हो अखंड आनंद को प्राप्त कर लेते हैं । उनके अतिरिक्त श्रद्धा, इड़ा , मानव सभी लोकोत्तर आनंद से सराबोर हैं ।
‘कामायनी ‘ में प्रकृति अपने पूरे नैसर्गिक सौन्दर्य एवं उपदेशक और अलंकृत रूपों में चित्रित हुई है । कामायनी का कथानक प्रकृति के सुरम्य अंचल में विकसित हुआ है । ‘आशा सर्ग ‘ की मनोरम प्रकृति मनु में पुनः आशा का संचार करती है। ‘ रहस्य ‘ तथा ‘आनंद ‘ सर्ग में भी उसका सौंदर्य मंडित रूप मिलता है । ‘आनंद ‘ सर्ग में पवित्र तपोवन , मानसरोवर , पर्वतीय प्रकृति शांति प्रदान करते हैं। ‘चिंता ‘तथा ‘ स्वप्न ‘ सर्ग में प्रकृति का उद्दीपक और रोष रंजित रूप चित्रित है । देवताओं की सीमाहीन उच्छृंखलता से क्षुब्ध प्रकृति झंझा अनावृष्टि के रूप में उन्हें सचेत करने में सफल न होने पर प्रलयंकारी जल प्लावन का रूप धारण कर संपूर्ण देव संस्कृति को निगल जाती है । उसकी सारी कीर्ति , दीप्ति और शोभा का नाश कर देती है। ‘ स्वप्न ‘ सर्ग में प्रकृति पुनः उद्दीपक रूप धारण करती है । मनु का इड़ा के प्रति अनाचार उसे क्षुब्ध करता है । वह देव प्रकोप का कारण बनती है । अपने उद्दीपक रूप में भी प्रकृति सर्वत्र विधवंसात्मक ही नहीं रही है । ‘वासना ‘ सर्ग में वहीं मनु और श्रद्धा के मिलन की पीठिका बनती है ।
प्रसाद छायावादी कवि थे अतः प्रकृति के प्रति उनका स्वाभाविक आकर्षण था । उन्होंने प्राकृतिक पदार्थों को रुपकात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है । ‘ काम ‘ सर्ग में प्रकृति का प्रतीकात्मक रूप छायावादी लाक्षणिक और कलात्मकता से युक्त है। प्रसाद जी का जीवन विषमताओं का पुंज था। अबोधावस्था में पिता और अग्रज का , युवावस्था में पत्नियों का निधन , पारिवारिक समृद्धि का ह्रास और ऋण के बोझ ने उन्हें तोड़ा किंतु वे हारे –रुके नहीं और कर्तव्य पथ पर दृढ़ता से चले। निष्क्रियता उनपर हावी नहीं हो पाई। देवसंस्कृति के विनाशोपरान्त मनु की निष्क्रियता , चिंता , किंतु श्रद्धा की प्रेरणा से सक्रिय होने के वर्णन में उनका अपना ही जीवन प्रतिबिंबित होता दिखाई देता है। वे अपने युग की स्थिति से भी पूर्ण अवगत थे । उन्होंने यज्ञों में की जाने वाली जीव हिंसा का विरोध श्रद्धा के माध्यम से किया है। युगीन वैज्ञानिक प्रगति तथा अतिशय बौद्धिकता से मानवीय गुणों के ह्रास से भी अवगत थे। सारस्वत प्रदेश की अतिबौद्धिक, वैज्ञानिक संरचना अस्थित सिद्ध होती है । श्रद्धा द्वारा उन्होंने इड़ा को दया , माया , ममता , विश्वास , क्षमा , त्याग आदि गुणों को अपनाने की प्रेरणा दिलायी है । बुद्धि , हृदय और कर्म के समन्वय पर बल दिया है। कामायनी की रचना करते समय प्रसाद जी एक विशिष्ट ध्येय से परिचालित रहे । मनुष्य की बुद्धि , भावनाओं और कर्म में कोई तालमेल ना होने से ही वह दुखी होता है यह तथ्य वे भलीभांति जानते थे अतः वे इसके समन्वय के पक्ष में थे जिससे मनुष्य जीवन व्यापी समस्याओं से मुक्त हो शांति पा सके। मानव की अदम्य शक्ति और सामर्थ्य पर उन्हें पूर्ण विश्वास था । अतः उन्होंने उसे दर्शन के माध्यम से समझाने का प्रयास किया तथा उसकी शुष्कता के परिहार के लिए उसे व्यवहारिक जीवन से संबद्ध किया । उनके लिए दर्शन केवल बुद्धि का विलास न होकर मानव के अन्तरतम में निहित अन्तर्दृष्टि एवं बुद्धि का प्रतिफलन था। यद्यपि वे बौद्ध , गांधीवादी विचारधारा से भी प्रभावित थे तथापि बौद्ध धर्म की निष्क्रिय , पलायन वादी प्रवृत्ति अतिशय दुखवादी को स्वीकार नहीं करते थे । उनकी दृष्टि में निवृत्ति मार्ग वास्तविक आनंद की प्राप्ति में बाधक होता है। बलात दमित आकांक्षाएं एवं इच्छाएं समय– समय पर उभरती है और व्यक्ति को व्यथित करती रहती है अतः मनुष्य के लिए प्रवृत्ति मार्ग का ग्रहण ही श्रेयस्कर है । वस्तुत: निवृत्ति एवं प्रवृत्ति मार्गों का समन्वित रूप ही वास्तविक आनंद का प्रदाता होता है । उन्होंने श्रद्धा द्वारा अपना मंतव्य व्यक्त कराया है_
“तप ही नहीं केवल जीवन सत्य।
करुणा यह क्षणिक दीन अवसाद
तीव्र आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आहृलाद । “
प्रसाद जी शैवागम के प्रत्यभिज्ञा दर्शन से सर्वाधिक प्रभावित थे। तदनुरूप उन्होंने मनुष्य को भाव , ज्ञान , क्रिया की त्रिविध भावनाओं में एकरूपता लाने की प्रेरणा दी ।अतिबौधिकता , तर्कमयता विज्ञान की देन है तथा स्वयं में अपर्याप्त और मानवीय गुणों का ह्रास करती है। उन्होंने अपने जीवन दर्शन (प्रत्याभिज्ञादर्शन )के अनुरूप आत्मा ( चिति, महाचिति ) की पवित्रता पर बल देते हुए संपूर्ण विश्व को परम सत्ता का व्यक्त रूप माना है। जीवन के प्रारंभ में जीव बद्धावस्था में अकर्मण्यता, जड़ता , मिथ्याभिमान , स्वार्थ से ग्रस्त होता है किंतु प्रयास करने पर इससे ऊपर उठ सकता है । उन्होंने तीन गोलकों ( भाव, ज्ञान, क्रिया ) की कल्पना की जो परस्पर दूर थे पर श्रद्धा की संयमित से एक हो गए । यह समरसता ही अखण्ड आनंद की स्थिति है जिसमें स्थित मनुष्य विश्व मंगल के भाव से पूरित होता है। कवि अंतिम ‘आनन्द‘ सर्ग में अपने उद्देश्य के स्पष्टीकरण में सफल रहा है। यद्यपि प्रसाद ने महाकाव्य के कथानक संबंधी शास्त्रीय मानदंडों को यथावत स्वीकार ना कर अपनी मौलिक उद्भावना की है तथापि उनके कारण कथानक की उदात्ता में कोई कमी नहीं आई है । कथा के उदात्ता में पात्रों की भी अहम भूमिका होती है। उनका भी उदात्त होना अनिवार्य है । दृढ़ता, वीरता, उत्साह, परदुखकातरता, आदि उदात्त मानवीय भावों से युक्त उच्च कुलीन राजवंशी , क्षत्रीय, ऋषि, पात्र महाकाव्य में नायकत्व को प्राप्त करते हैं । वे कृति में आद्यन्त विद्यमान रहते हैं । सब छोटी–बड़ी घटनाओं के केंद्र होते हैं। वे कल पात्रों के साथ हुए संघर्ष में विजयी होते हैं और अंत में फल को प्राप्त करते हैं।
कामायनी के नायकत्व को लेकर विद्वानों में मतभेद मिलता है। कुछ मनु को नायक मानते हैं तो अन्य श्रद्धा को। मनु ऋग्वेद में महर्षि माने गए हैं किंतु कवि ने उन्हें देवताओं के अग्रज माना है। देवताओं की भांति ही उनमें अहंकार , स्वार्थ , विलासिता , निष्ठुरता , विश्वासघात आदि दुष्ट प्रवृत्तियां मिलती है। मानवीय विकास के प्रथम सोपान से संबद्ध कृति में पूर्ण मानव की परिकल्पना संभव भी नहीं थी । उनके संबंध में कवि की उक्ति है _” मन्वंतर के अर्थात मानवता के नव युग के प्रवर्तक के रूप में मनु की कथा आर्यों की अश्रु श्रुति मे दृढ़ता से मानी गई है ।“(9) इस रुप में वे ‘ कामायनी‘- मनुष्यता के महाकाव्य के नायक हैं जिनके और श्रद्धा के सहयोग से मानव की उत्पत्ति और नई मानव सृष्टि का विकास होता है । कृति के प्रारंभ में वे देव विरासत से वंचित किए गए प्राणी हैं जो स्वयं को अमरता के जीवित किंतु भीषण जर्जर दंभ के रूप में पाकर निराश और दुखी हैं । देवों की समृद्धि , वैभवपूर्ण संस्कृति का ध्वंस उनमें नश्वरता और मृत्यु की शाश्वतता व जीवन को उसका एक क्षुद्र अंश होने का विचार उत्पन्न करता है । जलस्तर का घटना और प्रकृति का पूर्ण सौन्दर्य में व्यक्त होना उनमें मानव बुद्धि नश्वर होने के अहसास के स्थान पर उत्कट जिजीविषा को जगाता है । वे गुफा में रहते हुए अपनी जीवनचर्या प्रारंभ करते हैं। यज्ञ करते हैं और अवशिष्ट अन्न को अपने सदृश्य जीवित बचे व्यक्ति के लिए रख देते हैं। देवत्व के संस्कार बीज उन में अपशिष्ट थे। अनुभूति और चिंतन का व्यापकत्व उनमें अकेलेपन का बोध उत्पन्न करता है । श्रद्धा के अतुलनीय सौन्दर्य से अभिभूत वे उसके साथ रागात्मक संबंध स्थापित करने के लिए लालायित होते हैं। आकुली किरात कटी कुसम्मति से श्रद्धा के पारित पशु की बलि देते हैं और श्रद्धा से फिर कभी हिंसा न करने का झूठा वचन देते हैं । वे अत्यंत स्वार्थी हैं। श्रद्धा के गर्भस्थ शिशु को अपने एकाअधिकार में हस्तक्षेप करने की कल्पना से ही उनका पूर्ण स्वामित्व का अहंकार इतना दीप्त हो उठता है कि वे श्रद्धा को निस्सहायावस्था में अत्यंत निष्ठुरता से त्याग देते हैं। उनकी यह कर्तव्य विमुखता कालांतर में भी बनी रहती है जब वे सारस्वत नगर में सुषुप्त श्रद्धा एवं मानव को छोड़ कर चले जाते हैं क्योंकि उसके रहते वे अपना विरोध करने वाली प्रजा से प्रतिशोध नहीं ले सकते थे।
मनु में सृजनात्मक प्रतिभा और बुद्धि की कमी नहीं है । वे पूर्ण ध्वंस नगर का बौद्धिक पुनर्निर्माण करते हैं और प्रजा को प्राकृतिक संपदा के दोहन से परिचित कराते हैं किंतु अपनी उन्मत्त वासना एवं आत्म विस्तार की महत्वाकांक्षा की प्रवृत्ति के कारण उसी राज्य के पुन: ध्वंस का कारण भी बनते हैं । मनु में बार बार दुष्प्रवृतियां प्रबल होती हैं जिससे वे एक नितान्त दुर्बल चरित्र प्रतीत होते हैं एवं उनमें नायकोचित ऊर्जा का अभाव प्रतीत होता है । जहां इड़ा को स्वंय पूर्ण और क्षमता वान कहना उन्हें अच्छा लगता है , वहीं उससे क्षुब्ध होने पर उसे मायाविनी एवं मूर्तिमयी , अभिशाप तथा प्रजा को प्रकृति के पुतले कहकर ताड़ित करते हैं । आहत अवस्था में श्रद्धा का सामीप्य और सुश्रुषा उनमें अनुताप और कृतज्ञता जागृत करती है किंतु यह भाव भी क्षणिक रहता है।
कवि को अपने उद्देश्य– विश्व मंगल तथा अखंड आनंद की सिद्धि के निमित्त मनु के चरित्र का उत्थान दिखाना अनिवार्य था अतः कृति के अंत में शिव तथा त्रिपुर दर्शन करने और श्रद्धा द्वारा उनका महत्व जाने के पश्चात विश्व मंगल की भावना से युक्त , सुख दुख से निस्पृह , साधु पुरुष हो जाते हैं और धीरोदात्त नायक की श्रेणी में प्रतिष्ठित होते हैं । कृति में आद्यन्त उनकी विद्यमानता , छोटी बड़ी सभी घटनाओं का संचालक होना तथा अनर्थ में फलागम की प्राप्ति (अखंड आनंद) भी महाकाव्य के नायक के लिए अभिप्रेत विशिष्टाओं के अनुरूप है।
अन्य पात्रों में श्रद्धा , इड़ा , मानव , आकृलि किरात हैं। ऋग्वेद में श्रद्धा महर्षि रूप में वर्णित हैं किंतु प्रसाद जी ने उसे कामदेवता की पुत्री के रूप में नियोजित किया है। कलात्मक अभिरुचि के साथ ही अद्वितीय सौंदर्य से युक्त श्रद्धा में दया –माया –ममता –अगाध विश्वास – निस्वार्थ समर्पण तथा साहस है । वह जीवन की प्रतिकूलता में घबराती भागती नहीं । दुःखी – विस्मित और कातर होती है किंतु पुनः अपनी सारी शक्ति समेटकर कर्तव्य पथ पर चल पड़ती है । उसके चरित्र की उदात्ता इड़ा को भी प्रभावित करती है तथा मनु की निष्क्रियता दूर कर कर्मठ बनाती है।श्रद्धा हिमालय आरोहण ‘रहस्य सर्ग‘ में मनु के थकने पर उन्हें साहस बंधाती है और निरंतर उनके साथ रहते हुए उन्हें अखंड आनंद की भोक्ता बनाती है । एक प्रकार से वही कृती की नायिका भी है जिसके आधार पर कृति का शीर्षक है । कवि ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा , सौंदर्य चेतना तथा उर्वर कल्पना से उसे रचा है और कृति में प्राण स्वरूप प्रतिष्ठित किया है। इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। वह सारस्वत प्रदेश की पूर्व स्वामिनी है। वह बुद्धि मती और तर्कशीला, निर्भीक व साहसी है। मनु के सहयोग से वह अपने विध्वंस राज्य को पुनः स्थापित करती है। मनु के अतिचारी से स्वयं की रक्षा करने और उन्हें उनकी गलतियों के लिए ताड़ित करने में संकुचित नहीं होती। वह विनीत और गुणग्राही है। श्रद्धा की समर्पण भावना तथा मधुरिमा से प्रभावित होकर उससे दिशानिर्देश लेती है और उदिग्नता से मुक्त होती है। वह सारस्वत संघर्ष में मनु के आहत होने के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर क्षमा याचना करती है और उसकी सम्मति के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करती है। मानव के साथ मानव सृष्टि के विकास में सहायक बनती है और अंत में विश्व मंगल की भावना से प्रेरित हो अखंड आनंद की उपलब्धि करती है। श्रद्धा और इड़ा का समन्वित रूप मानव है। वह श्रद्धा का पुत्र है और इड़ा द्वारा पालित पोषित होता है। शैशव सुलभ चांचल्य से युक्त जहां श्रद्धा के प्रति मातृप्रेम से युक्त है वहीं उसकी आज्ञा शिरोधार्य कर इड़ा के साथ रहता है और मानव सृष्टि का विकास करता है । आकुली – किरात खल पात्र हैं। जलप्रलय से अवशिष्ट ये आसुरी वृत्तियों से युक्त हैं तथा मनु को मृगया , बलि जैसी हिंसात्मक कृत्यों में प्रवृत्त करते हैं। सारस्वत संघर्ष में ये वहां की प्रजा का नेतृत्व करते हैं किंतु अंत में पराजित होते और मारे जाते हैं । चरित्रोद्घाटन के लिए कवि ने नाटकीय कथात्मक एवं काव्यात्मक प्रविधियों का सफल प्रयोग किया है। मनु , श्रद्धा और इड़ा के संवादों से उनके चरित्र पर प्रकाश पड़ता है। आवश्यकतानुसार कवि ने स्वयं भी उनका चरित्र उद्घाटित किया है।
‘कामायनी‘ में महाकाव्योचित अभिव्यक्ति की उदात्ता भी मिलती है। प्रसाद जी शब्दों के पारखी तथा उनके प्रयोग में दक्ष थे। साहित्यिक भाषा प्रयोग के पक्षधर होने के कारण उन्होंने सामान्य , साहित्यिक , प्रचलित एवं दार्शनिक सभी प्रकार के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है किंतु उनकी रुचि सरल शब्दों में अधिक थी । उनके द्वारा प्रयुक्त तद्भव शब्द अधिकांशतः संस्कृत तत्सम शब्दों के ही तद्भव रूप हैं यथा सुहाग ( सौभाग्य) नखत (नक्षत्र) भूख (बुभुक्षा)। देशज ,स्थानीय , अनुरणनात्मक एवं विदेशी शब्दों के प्रयोग भी उन्होंने यथाअवसर किए हैं। ‘ कामायनी ‘ में देशज और विदेशी शब्द अत्यल्प है । उर्दू के कुछ शब्द अवश्य मिल जाते हैं । नारी सौंदर्य के वर्णनों में अनुरणनात्मक शब्दों ( रिमझिम , झिलमिल ,सन– सन) पुनरुक्ति शब्दों ( राशि– राशि , क्षण– क्षण , दूर– दूर ) का बाहुल्य मिलता है । काशी में प्रचलित शब्दों (झिटका , छकना ) इत्यादि का भी उन्होंने प्रयोग किया है। अनुनासिक शब्द चयन तथा वर्ण परिवर्तन की प्रविधि भी उन्होंने अपनायी है तथा भाषागत लालित्य एवं माधुरी की सृष्टि के लिए शब्दों को विकृत किया है।
प्रसाद जी ने आवश्यकतानुसार शब्द–शक्तियों, वक्रोक्ति, प्रतीक , शब्दालंकारों , मुहावरों का प्रयोग कर भाषा को लालित्यपूर्ण बनाया है । वर्णात्मक स्थलों पर तथा जहां कथा के विभिन्न सूत्रों के परस्पर संयोजनार्थ उन्होंने अभिधा शक्ति के प्रयोग को ही उचित माना है यथा सारस्वत प्रदेश के इतिवृत्त तथा ‘आनंद सर्ग ‘ के प्रारंभिक छंदों में अभिधा शक्ति का ही अविलंब लिया है। आंतरिक अनुभूतियों के प्रकाशनार्थ लक्षणा और व्यंजना शक्तियों का प्रयोग किया है। भाषा वैविध्य की सृष्टि के लिए वक्रोक्ति के विभिन्न भेद, उपभेद प्रयुक्त हुए हैं। ऐसे स्थानों पर वर्ण विन्यास की वक्रता दर्शनीय है। यथा_ ” कल कपोल जहां बिछलता कल्प वृक्ष का पीत पराग ” शैव दर्शन के प्रतिपादनार्थ रुढ़ , सैद्धांतिक तथा कवि निर्मित प्रतीक माध्यम बने हैं। जैसे _ गोलक( ज्योतिष पिंड), अणु ( तुच्छ ) , भूमा ( समरसता की स्थिति ) कारण जलधि ( अहं ) आदि कुछ ऐसे ही प्रतीक हैं। नवीन प्रतीकों की नियोजना ने भाषा को अर्थ गाम्भीर्य प्रदान किया है ।
प्रसाद जी ने ‘कामायनी ‘ में शब्दालंकारों का अधिक प्रयोग किया है। अनुप्रास ,यमक , उपमा ,श्लेश , वीप्सा, पुनरुक्ति–प्रकाश , विशेषण विपर्यय आदि का उपयोग सौंदर्य तथा परिवेश चित्रण के लिए हुआ है। उदाहरण स्वरुप_
“धू–धू करता नाच रहा था
अनस्तित्व का तांडव नृत्य।“
माधुर्य , प्रसाद , एवं ओज गुणों का यथोचित यथास्थान प्रयोग कर कवि ने भाषा की श्रीवृद्धि की है तथा उसे भावानुकूल और रसानुकूल बनाया है। इस दृष्टि से ‘ लज्जा ‘ सर्ग में माधुर्य तथा ‘ चिंता ‘, ‘इड़ा ‘, ‘संघर्ष ‘ सर्गों में ओज गुण की अवस्थिति मिलती है । तत्सम शब्दों के बाहुल्य दर्शन के प्रतिपादन हेतु प्रयुक्त शब्दावली , कथानक की रुपकात्मकता ने प्रसाद गुण की अभिव्यंजना को कहीं–कहीं बाधित किया है किंतु ऐसे स्थल अत्यल्प होने के कारण उपेक्षणीय हैं । ‘कामायनी‘ में प्रसाद जी ने मुहावरों _( व्योम चूमना, दांव हारना , तिल का ताड़ बनाना ) का प्रयोग किया है जिससे भाषा में चमत्कार और प्रभावमयता आयी है। प्रसंग गर्भत्व की योजना भी इसी प्रकार की है_
“आज अमरता का जीवित हूं
मैं वह भीषण जर्जर दंभ
आह, सर्ग के प्रथम अंक का
अन्य पात्रों भय सा निष्कंप ।” (चिंता सर्ग)
डॉ नगेद्र को कामायनी में सर्वत्र अभिव्यक्ति जन्य औदात्त तथा क्षुद्रता के अभाव की प्रतीति हुई है । उनकी स्थापना है_” उसमें अद्भुत ऐश्वर्य एवं अलंकार विलास है ,लक्षणा व्यंजना का विचित्र चमत्कार है , कल्पना और भावना के अपूर्व वैभव के कारण शैली में मूर्ति विधान एवं बिंब योजना को अद्भुत समृद्धि मिली है। कामायनी की भाषा सर्वत्र ही चित्र भाषा है जिसमें तत्सम सचित्र शब्दावली का मुख्यत प्रयोग हुआ है। भाषा और अभिव्यंजना के इन असाधारण गुणों के फलस्वरूप कामायनी की शैली सामान्य से सर्वथा भिन्न हो गई है।“(10) अन्यत्र उनकी उक्ति है _” कामायनी की शैली सर्वत्र ही एक अपूर्व लोकोत्तर स्तर पर अवस्थित रहती है , उसमें क्षुद्रता का एकांत अभाव है । प्रयत्न करने पर संपूर्ण काव्य में एकाध अपवाद ही मिलेगा।“(11) डॉ नन्द दुलारे वाजपेयी ने भी डॉ नगेंद्र के मत की संस्तुति की है । उनके अनुसार_ ” प्रसाद की काव्य शैली में नवीनता और भाषा प्रयोगों में पर्याप्त व्यंजकता और काव्यानुरुपता है। प्रथम बार काव्योपयुक्त पदावली का प्रयोग कामायनी में किया गया है।“(12) उनकी भाषा शैली प्रसंगानुरुप तेवर बदलती है। लज्जा सर्ग में कोमल भावों की अभिव्यक्ति हेतु प्रयुक्त मृदुल, सरस भाषा, प्रलय वर्णन तथा सारस्वत द्वन्द के चित्ररत में ओज प्रधान हो गई है । प्रगीत तत्व उनकी भाषा में सर्वत्र विद्यमान है । कामायनी की मितव्ययी प्रतीकात्मक सुंदर भाषा विषयक डॉ द्वारका प्रसाद सक्सेना की स्थापना अवलोकनीय है_” प्रसाद जी ने लक्षणा और व्यंजना शक्तियों का प्रयोग करके कामायनी में उक्ति वैचित्र्य एवं अर्थ गांभीर्य दिखाने का सफल प्रयास किया है ….इसी कारण प्राय: कामायनी काव्य को क्लिष्ट कहकर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है परंतु तनिक काव्य के मर्म तक पहुंचने का प्रयास किया जाए और उसमे वर्णित लाक्षणिक एवं व्यंजना प्रधान गूढ़ वर्णनों को समझने की चेष्टा की जाए तो कामायनी में सर्वत्र भाव सौंदर्य के दर्शन होंगे।“(13)
कामायनी की रसयोजना भी उदात्त है । श्रद्धा के प्रति मनु का आकर्षण सौंदर्य जनित देहाकर्षण है अतः उसके गर्भवती होते ही वे उससे विरत हो जाते हैं। इसी प्रकार इड़ा के प्रति उनका अतिचार उनकी कामसक्ति है श्रृंगार ना होकर उसका आभास मात्र जो कृति के उत्तरार्ध में प्रसन्नता तथा कृतज्ञता में परिवर्तित हो जाता है अतः उसे अंगी रस नहीं कहा जा सकता। ‘ ईर्ष्या ‘ तथा ‘ स्वप्न ‘ सर्गों में श्रद्धा के पुत्र प्रेम में वात्सल्य की झलक मिलती है किंतु वह भी अंगीरस के रुप में व्याप्त नहीं है । ‘संघर्ष ‘ सर्ग में भयानक एवं रौद्र रस के कतिपय स्थल है किंतु पात्रों की मूल वृत्ति से असम्बद्ध होने तथा स्फुट व्याप्ति के कारण उसे भी अंगी रस स्वीकार नहीं किया जा सकता है । कामायनी एक चिंतनप्रधान काव्य है अतः उसमें वैसे बाहरी संघर्ष के लिए अवकाश नहीं था जैसा वीर रस के पारिपाक के लिए अपेक्षित है अतः उसे भी अंगी रस के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता । जल प्रलय से क्षुब्ध मनु के चिंतन में करुण , मनु द्वारा दी गई पशु बलि के प्रसंग में विभत्स, शिव तांडव एवं त्रिपुर वर्णन में अद्भुत रस की अवस्थिति मानी जा सकती है किंतु इनमें से किसी का भी पूर्ण परिपाक नहीं हुआ है । वस्तुत: कामायनी में प्रसाद जी ने श्रृंगार, वीर , शांत में से किसी एक को अंगी रस के रुप में नियोजित न करके तीनों से समन्वित शांत रस को अंगी रुप में प्रतिष्ठित किया है जो उनकी मौलिक उद्भावना है।
जिन तत्वों से रस का अपकर्ष होता है उन्हें दोष माना जाता है । प्रसाद कृत कामायनी एक उत्कृष्ट महाकाव्य होते हुए भी सर्वथा दोष मुक्त नहीं कही जा सकती । उनके द्वारा प्रयुक्त विश्रब्ध , कर्षिता जैसे शब्द श्रुति कटुत्व दोष के अंतर्गत आते हैं। जहां बहुवचन संज्ञा शब्दों की क्रियाओं या सर्वनामों का एकवचन में या एक वचन का प्रयोग बहुवचन में हुआ है वहां च्युत संस्कृति दोष माना जा सकता है। लिंग निर्धारण के प्रति भी वे उदासीन रहे हैं यथा – ‘एक सजीव तपस्या जैसे पतझड़ में कर वास रहा।‘
कामायनी में कारकों का पूर्ण बहिष्कार अथवा व्याकरण विरुद्ध प्रयोग भी मिलता है क्योंकि ऐसे स्थल अर्थ प्रतीति में बाधक नहीं हैं अत: उनकी उपेक्षा ही उचित है। छान्दसिक आग्रह या लय के निर्वाह हेतु कवि ने निरर्थक शब्दों का भी प्रयोग किया है । इसी प्रकार आलिंगन, चुंबन आदि का प्रयोग अश्लीलत्व दोष है किंतु इनका प्रयोग मनु और श्रद्धा के समर्पण को पूर्णता प्रदान करने के लिए किया है । उन्होंने ऐसे स्थलों को सांकेतिक रूप देकर अभिव्यक्त किया है । दिनकर जी के मतानुसार_” कवि ने वासना व्यंजक विशेषणों का सर्वथा त्याग करके ऐसे विशेषण रखे हैं जिनसे स्वत: निष्कलुषता का वातावरण प्रस्तुत हो जाता है और इस वातावरण में श्रद्धा का जो रुप प्रकट होता है वह सचमुच ही स्पर्श से दूर और मन में अनिर्वचनीय स्फुरण उत्पन्न करने वाला है । “(14) दर्शन की पारिभाषिक शब्दावली के प्रयोग से भाषा में क्लिष्टता आई है तथा भावावेश में प्रयुक्त शब्दों_ प्यार ढोना, सौरभ सना से ग्राम्यत्व दोष आया है । छंदों के प्रयोग करते समय प्रसाद जी यति– गति के नियमों के पालन के प्रति सतर्क नहीं रहे हैं। इस प्रकार के दोष अत्यल्प है तथा इनसे कामायनी के औदात्त में ह्रास नहीं हुआ है ।
समाहार रूप में डॉक्टर प्रेमशंकर की स्थापना उद्धरणीय है_” लक्षण ग्रंथों का अनुसरण न करते हुए भी कामायनी अपने जीवन दर्शन , काव्य सौष्ठव , मानवीय व्यापार के आधार पर महाकाव्य का पद प्राप्त करती है । कामायनी महाकवि प्रसाद की सर्वोत्तम कृति के रूप में हिंदी में आई और एक निधि बनकर रहेगी।“(15)
संदर्भ…
1.देखिए, हिंदी साहित्य का इतिहास , रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ 93_94
2. युग और साहित्य , शांतिप्रिय द्विवेदी, पृष्ठ 281
3. प्रसाद का जीवन दर्शन–कला और कृतित्व , संपादक महावीर प्रसाद अधिकारी , पृष्ठ 207
4. कामायनी: एक नवीन दृष्टि , डॉ रमेशचंद्र गुप्त, पृष्ठ 109 पर उद्धृत
5.कामायनी: एक परिचय, भूमिका , महादेवी वर्मा , पृष्ठ 9 -10
6. कामायनी , आमुख, प्रसाद , पृष्ठ 4
7. कामायनी , आमुख, प्रसाद , पृष्ठ 4
8. कामायनी के अध्ययन की समस्याएं , डॉ नगेंद्र , पृष्ठ 18
9. कामायनी, भूमिका, जयशंकर प्रसाद
10.कामायनी के अध्ययन की समस्याएं, डॉ नगेद्र, पृष्ठ 22
11. कामायनी के अध्ययन की समस्याएं, डॉ नगेंद्र, पृष्ठ 22
12. आधुनिक हिंदी साहित्य, नन्द दुलारे वाजपेयी, पृष्ठ 79
13. कामायनी में काव्य संस्कृति और दर्शन , द्वारिका प्रसाद सक्सेना , पृष्ठ 250
14. पंत, प्रसाद व मैथिलीशरण, रामधारी सिंह दिनकर , पृष्ठ 48
15. प्रसाद का काव्य , डॉ प्रेमशंकर, पृष्ठ 443
रुचिरा जी!
आपका लेख
*कामायनी का महाकाव्यत्व : एक दृष्टि*
आज हमने पढ़कर पूरा किया।आपने कामायनी महाकाव्य को महाकाव्यत्व की कसौटी पर तौलते हुए उस पर अपनी दृष्टि डाली है।
आपकी दृष्टि की परिपक्वता नजर भी आई, समझ भी आई, दिखाई भी दी,और महसूस भी हुई।
गद्य के लेखन में प्रसाद काफ़ी क्लिष्ट है। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है अतः सबको समझने की दृष्टि से असहज लग सकती है। जिन्होंने उनकी पुरस्कार कहानी पढ़ी है वे जानते हैं।किंतु कामायनी में भाषा का परिमार्जन नजर आता है जो कामायनी के प्रति पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
प्रसाद हमारे प्रिय रचनाकारों में से हैं। और ऐतिहासिक साहित्य में हमारी रुचि भी है।
आपने इस महाकाव्य को सिर्फ महाकाव्य की विशेषताओं की कसौटी पर ही नहीं कसा है, बल्कि हर सर्ग का परिचय देते हुए कामायनी का लगभग परिचय ही दे दिया, ताकि लोगों में कामायनी को पढ़ने की रूचि जाग्रत हो, साथ ही लेख को ही नहीं अपितु ,कामायनी महाकाव्य को भी जब पढ़ा जाए तो उसे समझना सहज हो जाए।इसे पाठकों को पढ़ने की दृष्टि से सरल कर दिया।
कामायनी पर आपका यह पूरा लेख कामायनी महाकाव्य पर शोध की तरह है। बड़ी ही बारीकी से आपने इसकी खूबियों को व्यक्त किया है। हमारा तो वैसे भी प्रिय महाकाव्य है।बस यह है कि एक लंबा समय हो गया इसको पढ़े हुए। अभी कुछ महीने पहले गूगल में सर्च करके श्रद्धा सर्ग पढ़ा था। वास्तव में कामायनी महाकाव्य प्रसाद की लेखनी से, उनके लेखकीय कौशल से, शैली से और उनके कविता शक्ति व कवित्व संपदा से सृजित उनका उत्कृष्ट सृजन है। महाकाव्य लिखना इतना सरल नहीं होता और फिर कामायनी जैसा महाकाव्य। हमने देखा कि आपने महाकाव्य को महाकाव्य की विशेषताओं की कसौटी पर भी तौला है, लेकिन हमें सबसे अधिक पढ़ना अच्छा वहाँ से लगा जहाँ से अपने एक-एक सर्ग को संक्षेप में वर्णित किया है। एक कुशल समीक्षक की तरह आपने कामायनी को समीक्षित किया है। उद्धृत काव्य पंक्तियों नेभी मन मोह लिया है
आपकी सहयोगी पुस्तकों की लिस्ट देखी।
आपके परिश्रम को सलाम रुचिरा जी!