Wednesday, May 22, 2024
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दिव्या शर्मा की कहानी – नदी खामोश हो गई

“तुम लौट आए बिट्टू, कितनी प्रतीक्षा कराई।” एक रहस्यमयी सी आवाज़  पेड़ के झुरमुटों से निकल मेर कानों में पसर गई। कदम जैसे रुक गए। अपनी नजरों को आवाज़ की ओर भेज इंतजार करने लगा आवाज़ की सूरत देखने का। अभी नज़र ने चेहरे को छुआ भर था कि खनक फिर सुनाई दी
“इतने वर्षों में तुम्हें एक बार भी मेरी याद न आई!” 
दिल धड़का और जोर से धड़का। हथेलियों पर पसीना बहने लगा। मैंने पसीने को दूर झटक दिया। स्वर में कुछ कठोरता भर प्रश्न किया,
“कौन हो तुम?” 
“हा..हा…हा…मैं एक स्त्री हो सकती हूँ, एक अप्सरा या एक यक्षिणी…लेकिन तुम कौन हो? मेरे एकांत में यूँ घुसपैठ क्यों कर रहे हो?” मेरे सवाल के जवाब में  उसका उतरा सवाल  दिल के अंदर कुछ खोदने लगा।
“मैं पुरुष, प्रेत या यक्ष… कुछ भी हो सकता हूँ। तुम्हारे एकांत में घुसपैठ का इरादा नहीं। लेकिन तुम्हारी आवाज़ मेरे दिल में अतिक्रमण कर चुकी है। बस एक बार सामने आओ… कौन हो तुम? इस वीराने में इस अंधकार के बीच यहाँ !” 
“वीराना इतना बुरा तो नहीं! वैसे बहुत समय लगा दिया यहाँ तक आने में! कहाँ छोड़ आए थे खुद को?”
“हाँ… जैसे एक शताब्दी बाद लौटा हूँ, इन जंगलों में। पर देख रहा हूँ कुछ बदल गया है। मेरा बचपन जिन दरख्तों के साथ खेला था, वह अब कहीं गुम हो गए हैं। तुमने देखे वह दरख़्त?” मेरा इतना कहना भर था कि एक सिसकी हवा में उड़ने लगी। मैंने अपने दोनों हाथों को आसमान की ओर उछाला और सिसकी को मुठ्ठियों में कसकर  दबोच लिया।
“छोड़ दो बिखर जाने दो इसे। शायद मेरा दर्द कोई सुन ले।”  वह आवाज़ उदास हो बोली।
“मुझे कहो मैं सुन रहा हूँ न!”  मैंने कहा तो एक खामोशी चारों ओर पसर गई। उसकी जकड़न धीरे-धीरे मेरा दम घोंटने लगी। मेरी बेचैनी मेरे माथे पर पसीने सी उभर आई।
“चुप क्यों हो गई! मेरा दम घुट रहा है। कुछ बोलो… कुछ बोलो।”  मैं लगभग चीख पड़ा।
लेकिन वह आवाज़ वहाँ नहीं थी। एक हवा मुझे छूने लगी। उसका स्पर्श मेरी देह पर कुछ लिखने लगा।
“मैं तुम्हें अपने करीब देखना चाहता हूँ।” मेरे स्वर में याचना थी किन्तु खामोशी अब भी मेरे करीब थी। आसमान में न तो सूरज था और न ही चाँद। लालिमा थी जाने किसने सिंदूर बिखेरा था।
मैं पीछे लौटने लगा। इतना पीछे की मेरे पैर घुटने से मुड़ गए। घास पर रेंगते जैसे चौपाया बन गया।
हाँ! घास ही तो थी मखमली सी। मखमली घास पर ही तो बैठा हूँ मैं, फिर मेरे कदमों के नीचे यह कांटे? आह! तुम कौन सी मखमली घास की बात कर रही थी एक बार तो कह देती।
“ऐ बिट्टू… चल नहला दूँ तुझे। आ जा मेरा राजा बेटा।” दो हाथों के बीच मैं नदी के किनारे शीतल जल में भीगने लगा। माँ के दो हाथ।
जल! मेरे चारों ओर जल…। माँ ने अपनी 
 कमर पर मुझे बैठाकर एक मटका सिर पर रख लिया और चल पड़ी। नदी ने जोर से अपने आँचल को हिलाया।
अब मैं खुद नहाना सीख गया था। नदी में गोता लगाकर उस पार जाना भी। उस पार रहती थी सरिता बहू। मैंने सुना था वह अकेली थी। किसी ने उसके पति को मार कर नदी में डाल दिया था। वह रोज़ नदी किनारे आती थी। लोग कहते थे थोड़ी बावली हो गई है। उसे लगता है कि उसका मरद नदी से एक दिन बाहर निकल कर आयेगा। नदी सरिता के सामने ख़ामोशी से बहती थी। सरिता बहू भी तो ख़ामोश रहती थी। लेकिन मुझे कुछ न कुछ खाने को पकड़ा देती थी। एक रिश्ता जुड़ गया था मेरा सरिता बहू के साथ।
“बिट्टू, अगर एक दिन मैं तुझे यहाँ न मिलूं तो तू मुझे खोजेगा?” एक दिन सरिता बहू ने कहा।
“तुम कहीं जा रही हो क्या सरिता बहू?” उसकी बात कुछ अजीब लगी मुझे।
“बहू क्यों बोलता है रे पागल! तुझसे बड़ी हूँ मैं।” मेरे सिर पर हाथ मारकर वह बोली।
“सब बहू बोलते हैं तो मैं भी बोलता हूँ और मुझे अच्छा लगता है।” इतना कहकर मैंने नदी में छलांग लगा दी और अपने गाँव की ओर तैर चला।
नदी बहती रहती। मेरा बचपन बीत रहा था और बीत रहा था जैसे नदी का यौवन।
 देख रहा था कि पास खड़े दरख्तों पर चहचहाते पक्षी बार-बार नदी की ओर रुख़ करते और फिर आसमान को  छूते हुए वापस डाल पर बैठ जाते। उनके रास्ते कुछ लम्बे थे। वैसे इतना सरल भी नहीं होता लम्बे रास्तों पर चलना। मैं उड़ना चाहता था इसलिए अक्सर चलते हुए चला आता था, नदी के इस दरख़्त के नीचे।
“नदी में आज फिर कोई मरा जानवर डाल गया।”  आटे में अपनी उंगलियों को धँसा कर माँ ने कहा-
“उसकी पवित्रता भंग करने पर तुले हैं लोग। कैसे बचेगी नदी! एक दिन देखना दुनिया ढूँढती रह जायेगी। लेकिन नदी ख़ुद को सिकोड़ कर नष्ट कर लेगी।”  पिताजी की आवाज़ में रोष था।
इतनी विशाल नदी ख़ुद को कैसे सिकोड़ सकती है? इस प्रश्न का उत्तर मैंने बहुत तलाशा। अपनी दूसरी कक्षा की पुस्तकों में मैंने सूरज-चंदा और नदी को देखा। लेकिन उत्तर नहीं मिला।
उस पार कुछ शोर था, जो इस पार तक चला आया। मैंने भी कुछ सुना। सरिता बहू गाँव से लापता हो गई। सबने कहा भाग गई किसी के साथ। गाँव बिरादरी बदनाम कर।
एक दिन पिताजी की नाव में बैठा मैं जल को देख रहा था कि तभी उनके हाथ में थमे लम्बे बाँस से कुछ टकराया।
उन्होंने जाल डालकर देखा।
एक गली हुई देह नदी से बाहर निकली।
“सरिता…! हे भगवान तो नदी ने शरण दी  इसे।”
किनारे पर शोर सुनाई देने लगा।
“मर गई कुलक्षिणी… पेट के बच्चे को लेकर ही डूब गई।” यह शांता ताई थी।
“मरती नहीं तो क्या करती? जाने किसके नीचे न जाने कितनी बार सोई होगी करमजली।” यह मुन्नी काकी थी। जिसकी छातियों पर फूल बना था।
“मैंने बस एक बार कलाई पकड़ी थी इसकी। मटका सिर पर मार दिया था मनहूस ने। ख़ुद को बड़ी पारस समझती थी।” उस लाल दाँत वाले आदमी ने कहा।
जितने मुँह कितनी बात। मेरे कान सुन रहे थे और मेरी आँखें सरिता बहू की निर्जीव देह पर टिकी थी। मैंने खोजा क्यों नहीं सरिता बहू को! आत्म ग्लानि से हृदय रोने लगा। मैं चिल्लाना चाहता था। लेकिन भीड़ बहरी थी, लेकिन वाचाल खूब थी।
“पवित्रता भंग करने वाले को कुछ नहीं कहोगे तुम लोग? सब जानते हो इस बच्ची के साथ क्या हुआ। लेकिन इसे ही दोष दे रहे हो!!!”  पिताजी जोर से चिल्लाए।
पर किनारे खड़ी आवाजों के शोर में पिताजी की आवाज़ दब गई।
“पवित्रता नष्ट हो गई सरिता की… अब गाँव को शाप लगेगा। प्रकृति बदला लेगी।” मुझे घसीटते चलते पिताजी लगातार बड़बडा रहे थे। एक बात मैं समझ गया था कि पवित्रता नष्ट होने पर सरिता आत्महत्या कर लेती है। गाँव को शाप लगता है। मैंने नदी को देखा। उसके जल में मरा हुआ जानवर अब भी पड़ा था।
पिताजी का हाथ छुड़ाकर मैं नदी की ओर भागा। उस जानवर को खींचने की कोशिश करने लगा।
“यह कह कर रहा है, तेरी हथेलियों में दुर्गंध बस जायेगी।” उन्होंने मेरे हाथों को झटकते हुए कहा।
“नदी की पवित्रता नष्ट न हो पिताजी। हमें बचाना होगा न नदी को। यदि आत्महत्या कर ली तो!”  मैंने अपनी शंका रखी।
“तेरी हथेलियों पर दुर्गंध लग गई देख कैसी मलिन!” पिताजी मेरी हथेलियों को नदी के जल से धोने लगे।
“दुर्गंध को नदी कैसे हटाएगी? वह तो अपवित्र हो गई न! सरिता बहू की तरह।” सवाल पिताजी के कानों में आया तो वह लड़खड़ा गए।
मेरी हथेलियों को झटक नदी में पड़े जानवर को खींच कर दूर फेंक दिया।
तभी एक हुजूम हमारे निकट उमड़ आया और जोर से चिल्लाया।
“छी मलेच्छों… तुमने बिरादरी की नाक कटा दी। लाश ढोने का काम कर जाति का त्याग कर दिया!” 
“मैंने बस नदी को बचाया है, ताकि तुम्हें जल मिलता रहे।” पिताजी बोले।
“नदी की नियति है। सबकी विष्ठा को ग्रहण कर मानव जाति का कल्याण करे। लेकिन तुमने अपने संस्कारों की हत्या कर दी। अब तुम हमारे बीच रहने योग्य नहीं।तुम्हारा त्याग किया जाता है।” एक आदमी बीचोंबीच खड़े होकर बोला।
“पवित्रता की रक्षा संस्कारों की हत्या से श्रेष्ठ है… सुना है तुम्हारे बेटे ने सरिता को बच्चा दिया था!” पिताजी आक्रोश से बोले।
बीचोंबीच खड़ा आदमी जाने क्यों जोर-जोर से हिलने लगा। उसके गले से घों-घों की आवाजें आने लगी।
“क्षमा क्षमा…गाँव पर संकट आया है क्षमा क्षमा।” हुजूम बीचोबीच खड़े आदमी के चारों ओर घुटने टिकाकर बैठ गया।
“शाप लगेगा… सारी बिरादरी को… इस आदमी के कारण… शाप लगेगा।”  बीचोबीच खड़े आदमी ने अपने शरीर को अजीब तरह से ऐंठा दिया और पिताजी की ओर उंगली उठा दी।
हुजूम मेरे पिता के करीब था। पिताजी के शरीर पर पड़ते प्रहार, मेरी पीठ रोक नहीं पा रही थी। वह दर्द से करहा रहे थे। देह पर पड़ती चोटें उन्हें अधमरा करने लगी। मैं रो रहा था, चिल्ला रहा था। मैंने देखा नदी की लहरें ऊपर उठ रही थी और चीख रही थीं। लेकिन हुजूम पिताजी को निर्दयता से तोड़ता रहा।
“तू बचाना बिट्टू… तू नदी को बचाना…।” पिताजी के शब्द मेरे कानों में पड़ते रहे। उनकी आँखें बंद थीं, लेकिन आवाज़ गूंज रही थी। हुजूम जा चुका था।
माँ, पिता की देह के साथ लिपटी पड़ी थी। खामोश… इतनी ही ख़ामोश जितनी ख़ामोशी आज यहाँ पसर गई है। एक छटपटाहट मेरे मन को कचोटने लगी। दिमाग के गलियारे में पिताजी की निर्जीव देह और गाँव की छूटती गलियाँ थीं।
“माँ सरिता बहू को क्या हुआ था। उन्हें सब गालियां क्यों दे रहे थे?” मेरे मन में दबी जिज्ञासा माँ के सामने आ गई।
माँ चुप हो गई। तभी दरवाजे पर ज़ोर-ज़ोर दस्तक हुई।
“कौन है?” मैंने पूछा और दरवाजे की ओर बढ़ गया।
“न बिट्टू… दरवाजा न खोलना।” मेरे हाथ को पकड़ माँ ने रोक लिया।
दस्तक और तेज़ हो गई।
“मैं हूँ भई। सुखराम, दरवाजा खोलो।” बाहर से मकान मालिक की आवाज़ आई।
“पर माँ देखना तो होगा न कि इस समय काका क्यों आए!”  मैंने कहा तो माँ ने मेरे मुँह पर हथेली रख मुझे बोलने से रोक दिया।
“इतनी रात को आने वाली आवाज़ किसी काका या बाबा की नहीं होती बिट्टू। यह नदी में मरे जानवर डालने वाला हो सकता है। तू चुपचाप पड़ा रह।” माँ ने फुसफुसाते हुए कहा।
मेरे दिमाग में आश्चर्य फैल गया। शहर में भला कौन नदी में जानवर डालेगा!
“पर माँ यहाँ नदी कहाँ है?उसे तो हम गाँव में छोड़ आए।” मैंने धीरे से कहा तो माँ छत को ताकने लगी। दरवाजे पर होती दस्तक अब बंद हो चुकी थी। रात थी तो नींद भी थी, लेकिन साथ थे सवाल। पिताजी की मौत और सरिता बहू की गली देह के सवाल।
शहर यूँ तो किसी को ज्यादा जानता नहीं था और यही बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद थी। यहाँ जात नहीं थी और न ही बिरादरी। बिरादरी जो मेरे पिताजी की हत्यारन थी। मेरी बढ़ती उम्र ने मुझे कब बिट्टू से सारंग बना दिया पता नहीं चला।
उस दिन मैंने माँ को ध्यान से देखा। वह अपनी साड़ी को पीठ पर और ढंग से लपेट रही थी। हालांकि गुंजाइश नहीं थी कि साड़ी उनकी पीठ को और ढके क्योंकि पीठ पहले से ही अपने को छिपाए आवरण में बंद थी। वह आँचल को खींचकर और कस रही थी।
“बिट्टू मुझे लम्बी साड़ी लाकर देना। इतनी लम्बी की मेरी पूरी देह उसमें समा जाए। देख न यह कितनी छोटी है मेरी छाती मेरी पीठ सबको दिखाई दे जाती है।” माँ ने बेचैनी से कहा।
“पर माँ…आपकी पीठ तो ढंकी है! क्यों परेशान हो माँ?” मेरे मन में आशंका थरथराने लगी।
“तू अब बिट्टू मत बनना। बड़ा हो जा और सुन नदी को जब बचाएगा, तब सरिता को भी बचाना। बचाएगा न तू!” माँ ने मेरी हथेलियों को अपनी हथेलियों के बीच रखकर पूछा।
“वादा करता हूँ माँ। तुम बस परेशान न होना। देखो तो अब मैं बड़ा हो गया हूँ। देखो मैं सारंग हूँ तेरा सारंग!” मेरी बात माँ के कानों में गई कि नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन माँ की आँखें मुझे आज सफेद लग रही थी।
“तुझे पता है स्त्री भी नदी होती है। उसके भीतर भी मरे हुए बदबूदार जानवर उतार दिए जाते हैं। स्त्री भी रुक जाती है रे… दूषित हो जाती है।” माँ बोली और जाने क्या-क्या बोली।
मेरा गला सूख रहा था। लेकिन जल मेरे करीब न था। मैं उठा और माँ के लाए मटके की ओर बढ़ गया। गला सूख रहा था मेरा लेकिन माँ जा चुकी थी…। अफ़वाह फैली… मैंने भी सुनी। माँ को किसी ने अपवित्र किया था।
उस दिन के बाद से मेरी देह में असंख्य चीटियाँ रेंगने लगी। जो मुझे रोज़ अपने डंक चुभोती। मुझे याद आता पिता का जाना। माँ का चुप हो जाना और गाँव में बहती नदी।
“कहाँ खो गए तुम?” वह खनकती आवाज़ फिर मेरे कानों में पड़ी।
शरीर पर रेंगती चीटियों को झटक मैं वर्तमान में लौट आया।
“तुम कहाँ चली गयी थी अचानक यूँ! मुझे बताओ न यहाँ मौजूद दरख़्त कहां चले गए और एक नदी… यहाँ बहती थी वो…!” 
“नदी की मृत्यु हो गई तो दरख्तों ने भी ख़ुद को नष्ट कर लिया। अब यहाँ कोई नदी नहीं।” आवाज़ कुछ मरघट से आती हुई लगी।
“नजदीक मरघट है क्या?” मैंने कहा तो वह फिर जोर से हँस पड़ी।
“हाँ यह पूरा गाँव मरघट है। तुम तो चले गए थे मुझे छोड़कर। मेरी देह में न जाने कितनी विष्ठा न जाने कितने शव उतार दिए गए। मैं लाचार अपनी दुर्दशा पर रोती रही। कोई न था, मेरी पीड़ा को सुनने वाला।” उस आवाज़ ने फिर से सिसकी भरी।
मेरी आँखों ने कुछ विस्तार लिया, और कदम बढ़ने लगे। एक सूखा पेड़ एकांत में जाने किसकी प्रतीक्षा में खड़ा था। मैं भी उसके निकट चला गया। एक अजीब सी दुर्गंध मेरे नथुनों से गुज़र, मेरे चैतन्य को लोप कर गई। मेरी आँखें बंद हो गई और मैं जमीन पर गिर पड़ा।
बंद आँखों में सरिता बहू माँ के साथ खिलखिला रही थी। लेकिन नदी उदास थी। मैंने अपना हाथ माँ की ओर बढ़ाया। मेरी हथेलियों पर कुछ तरल बह रहा था। कुछ जाना पहचाना तरल।
“जल! नदी का जल…।” हाँ मेरी आँखें अब बंद न थीं। वहाँ जल था। सूखे ठूँठ की शिराओं से बहता जल। किन्तु यह नदी का जल था, जो मेरी रोम-रोम में बसी थी।
“तुम जिंदा हो… तुम जिंदा हो!” मैं खुशी से चिल्लाया।
“मैं मृत हूँ जिंदा नहीं हूँ बिट्टू… अभिशप्त हूँ।” आवाज़ अब मेरे करीब थी। मैं देख सकता था कि नदी अपनी बची हुई साँसों को समेटकर मुझसे बातें कर रही थी।
“अभिशप्त! दूसरों को जीवन देने वाली। अभिशप्त कैसे हो सकती है!”  मैं आश्चर्य से बोला।
“सरिता जैसी अनेक स्त्रियों की हत्या को मेरे जल में छिपाया गया… । मैं चाहती थी कि सब सुने। उन स्त्रियों ने मुझसे शरण नहीं माँगी थी। बल्कि अपनी हत्या के चिन्ह को मिटाने वह मुझमें समा गईं।” 
“इसलिए तुमने गाँव को शाप दे, खुद को समेट लिया?” मेरी शंकाओं का निर्मूलन एक उत्तर में था।
“चाहती तो तांडव करती ,किन्तु माँ हूँ न! और माँ अपनी संतान को दंड तो दे सकती है, लेकिन उसे मृत्यु नहीं दे सकती।” नदी के स्वर में पीड़ा का सागर था। लेकिन सागर तो पुरुष है। वह स्त्री की पीड़ा को समझने योग्य हृदय रखता होगा!  मन में फिर से प्रश्न अपनी निद्रा त्याग उठने लगे।
मेरी देह में रोंये खड़े होने लगे। आँखों से बहते अश्रु, अपनी माँ की मृत्यु का शोक व्यक्त करने लगे। मेरे पैरों के नीचे बहता जल यकायक लोप हो गया। मेरे शरीर से ताकत खत्म होने लगी। टाँगें कंपन करने लगीं। यूँ लगा जैसे मैं अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुका हूँ। अपने शिथिल होते कंधों को फिर से खड़े करने की जद्दो-ज़हद में, मैं जोर से चीखने लगा।
“तुम नहीं जा सकती तुम्हें वापस आना होगा। मेरे लिए, इस गाँव के लिए तुम्हें वापस आना होगा।”
अपनी हथेलियों में ठूंठ को पकड़कर जोर से हिलाते हुए मैं रो रहा था। लेकिन वहाँ कोई नदी मुझसे बात करने के लिए नहीं थी।
मैं तब तक ठूंठ को हिलाता रहा जब तक कि वह टूट कर गिर न गया। उस वीराने में बस मैं था और मेरे आँसू।
आज भी उस नदी के इंतजार में…।
दिव्या शर्मा
फोन नंबर- 7303113924
दिव्या शर्मा
दिव्या शर्मा
संपर्क - sharmawriterdivya@gmail.com
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2 टिप्पणी

  1. एक लंबे अंतराल के बाद तुम्हें कहानी के रूपक में पढ़ा दिव्या। इसमें कोई दो मत नहीं कि भावनाओं को तुमने बहुत ही मार्मिकता के साथ कहानी में भी पिरोया है। नदी का खामोश होना चिंता का विषय है।काश लोग नदी की महत्ता समझ पाएँ।
    एक अच्छी कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ दिव्या !एवं शुभकामनाएँ भी।

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