Wednesday, June 12, 2024
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डॉ. गरिमा संजय दुबे की कहानी – मरहम

पुरातत्व  विभाग में हडकंप मचा हुआ था कोई ऐसा कैसे कर सकता है | ऐसी हिमाकत हुई भी कैसे | “कोई मूर्तियां चुराता, कहीं बेच देता तो बात  समझ में आती है, पर अजीब मूर्खता की बात कर रहा है रामसिंह, यह तो सरासर आपराधिक प्रकरण है, सांस्कृतिक धरोहर के साथ खिलवाड़ है, कितना मुश्किल है इन पत्थरों को सहेजना”, पुरातत्व  विभाग के बड़े अधिकारी कश्यप जी के सामने जब यह मामला उजागर हुआ तो वे पहले तो चकित हुए फिर क्रोधित, तुरंत ड्राइवर को बुला साँची चलने को कहा, वहाँ  के अधिकारियों को उनके पी. ए. ने पहले ही खबर भिजवा दी थी | भोपाल से एक सवा घंटे में गाड़ी साँची पहुँच चुकी थी |
 सीधे संग्रहालय पहुँचे अधिकारी तनतने, भुने से खड़े थे और रामसिंह सर नीचा किये, कश्यप जी ने पहुँचते ही कहा-  “दिखाओ क्या हुआ है” | अधिकारी उन्हें जब अंदर ले गए और रामसिंह की करामात दिखाई तो कश्यप जी भी दंग रह गये, मूर्तियों को देख कर, सर पकड़ कर बैठ गए– “अरे रामसिंह क्या और कैसे किया यह सब” वे चीखे  | उनकी चीख से सारा संग्रहालय थर्रा गया रामसिंह पूर्ववत सर झुकाए खड़ा था | वे आये और उसका कन्धा पकड़ कर झकझोरते हुए कहा- “अब कौन जवाब देगा तुम्हारी इस हरकत का, कही प्रेस को खबर हो गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे, तुम बीस साल से यहाँ काम कर रहे हो फिर, अच्छी खासी छवि है तुम्हारी फिर एन सेवानिवृति के पहले यह क्या किया? बोलो, बोलते क्यों नहीं” | उसका मौन देख कर माथे पर हाथ रख वे परेशानी में इधर उधर टहलने  लगे | वहाँ   के सुपर वाईज़र ने कहा- “सर मंत्रीजी को भी खबर तो करनी पड़ेगी, इतनी बड़ी बात कैसे ……..”| वे बोले- “हाँ अभी तो तुम यह कमरा सील करवा दो, मैं  साहब से बात करता हूँ , और इसे कहीं जाने मत देना” रामसिंह की तरफ एक चुभती सी नज़र डाल वे आफिस में घुस गए | बड़ी देर तक मंत्रीजी से बात चली, फिर वे जरूरी आदेश दे मंत्री जी से मिलने निकल पड़े |
 वे रामसिंह को लम्बे अरसे से जानते थे | वहीँ के रहने वाले थे और लम्बे समय बाद अपने गृह नगर के पास पदोन्नति पा लौटे थे | आने पर सबसे पहले रामसिंह से ही सामना हुआ था | पिता का  एक छोटा होटल था साँची के  पास, पिता चाहते थे होटल व्यवसाय को ही उनका बेटा आगे बढ़ाये , लेकिन साँची के आसपास बिखरे इतिहास ने उनमे ऐसी जिज्ञासा भरी कि पुरातत्व  और इतिहास को पढ़ने का निश्चय कर वे पुरातत्व  विभाग में ही नौकरी पा गए | इस रामसिंह के पिता भी यही काम करते थे | किशोरावस्था  में रामसिंह और कश्यपजी इन्ही पत्थरों में घूमते रहते  रामसिंह कहता- “बाबू तुम्हे कुछ सुनाई  देता है,  ये पत्थर कितना कुछ कहते हैं” | वे हँसते “भला पत्थर भी कुछ बोलते हैं” , पर रामसिंह तो मानो पत्थरों की भाषा जानता था उनसे बतियाता था | कश्यपजी उसे अपनी विज्ञान सम्मत  बुद्धि से समझाते,  इतिहास और पत्थरों का विज्ञान | पर बुद्धि और भावना का मेल बहुत सहज तो नहीं सो दोनों अपनी अपनी तरह से  पत्थरों को आंकते | वक्त आगे बड़ा और कश्यप जी अपनी नौकरी के सिलसिले में देश भर और विदेश में घूमे , पुरातत्व  पर उनकी रिसर्च ने उन्हें प्रसिद्धि और पैसा दोनों ही दिलवाया | छुट्टियों में साँची आते तो स्तूप देखने जरूर जाते | रामसिंह वहीँ संग्रहालय में  नौकर हो गया था | कुछ सालो बाद उन्हें पता चला था कि जब संवेदनशील माहौल था, वह मंदिर शिवलिंग पर जल चढ़ाने जा रहा था, विधर्मियो की उन्मादी भीड़ ने हमला कर दिया था, उस दंगे में उसका एक पैर  और एक आँख चली  गयी थी |
कार  एक झटके से रुकी वे वर्तमान में लौटे और मंत्रीजी से मिलने पहुंचे | पूरी बात जानकार मंत्रीजी ने एक जांच कमिटी’ बना कर जांच करने का आदेश दे दिया जिसके अध्यक्ष स्वयं कश्यपजी थे |
अगले दिन कुछ और अधिकारियों को साथ ले वे साँची पहुंचे कमिटी को विस्तृत जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था –“शर्मा जी रामसिंह को बुलाईये “ वे बोले”|
रामसिंह अपनी बैसाखियों के सहारे धीरे धीरे चलता हुआ वहाँ   पहुंचा , आशा के विपरीत उसके चेहरे पर भय नहीं था बल्कि वहाँ  एक संतुष्टि थी किसी काम को पूरा करने की |
उन्होंने रामसिंह से पूछा- “ रामसिंह क्या तुम हमें बताओगे कि तुमने ऐसा क्यों किया l, क्या तुम नहीं जानते कि पुरातत्व  महत्व की वस्तुओं के साथ छेड़ छाड़ करना अपराध है बताओ तुमने ऐसा क्यों किया”|
रामसिंह कुछ देर चुप रहा फिर बोला –“ मूर्तियों ने ही हमसे कहा था ऐसा करने को”|
उनके हाथ से पानी का गिलास गिरते गिरते बचा, वे झुंझला उठे- “क्या बकवास करते हो, पत्थर भी कभी बोलते है”?
“हाँ, सर बोलते है कोई सुनने वाला हो तो”- वह कही खोया सा बोला |
दूसरे अधिकारी ने व्यंग्य से मुस्कुराते हुए कहा- “अच्छा क्या कहते हैं,  यह पत्थर तुमसे”?
“सबकी अपनी अपनी कहानी है साहब आपकी हमारी तरह” वह उसी भाव से बोला |
कश्यपजी ने थोड़ी नरमी दिखाते हुए पूछा-“ क्या पूरी बात बताओगे रामसिंह”?
“हाँ    हाँ    साहब क्यों नहीं”- वह चहका,  फिर उसने बताना शुरू किया बचपन इन पत्थरों के साथ ही बीता, माई बापू दिन  भर खुदाई करते थे और हम इन  पत्थरों से बतियाते और कोई तो होता नहीं था |  सरकारी स्कूल से मेट्रिक किया और  यहाँ नौकर हो गए, अंदर दिनभर मूर्तियों के बीच बैठ कर या तो उन्हें देखते या आने जाने वालों को, कभी कभी रात की ड्यूटी भी कर लिया करते हैं साब जी | बैठे बैठे हम सोचते साब कि ये मूर्तियाँ भी कितनी भाग्यशाली हैं,  यहाँ इंसानों के रहने को घर नहीं और पत्थर होते हुए भी यह ए. सी में रहती हैं, पर हमें क्या पता था कि ये भी बड़ी दुखी हैं |  एक रात हमें यहाँ  खटर पटर और लोगों के बोलने की आवाजें आने लगी, पहले मुझे लगा चोर है लेकिन देखा चौकीदार जाग रहा था, लेकिन उसे कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी वह पीकर मस्त पड़ा था ।
फिर यह आवाज़ें  कैसी, हमने अंदर  के एक कमरे में जहाँ हम दिन भर बैठा करते थे, झांक कर देखा तो क्या देखते हैं साहब,  सारी मूर्तियाँ अपनी अपनी जगह से उतर कर एक जगह इकठ्ठी हो गई थीं , और अपना अपना दुःख एक दूसरे को सुना रही थीं , किसी का पैर नहीं था, किसी का हाथ नहीं था, किसी की नाक किसी का कान, किसी की आँख और किसी का पूरा का पूरा चेहरा ही बिगाड़ दिया गया था |
जिन मूर्तियों के सर नहीं थे उनके धड़  अपने सर  लगा कर खुश होना चाह रही थीं  लेकिन उनका दर्द था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, वे रो रो कर अपनी बर्बादी की कहानी कह रही थीं,   जैसे हमारा एक पैर और आँख नहीं है, वैसे ही इन मूर्तियों का भी कोई न कोई अंग बिगड़ा हुआ  था |
मूर्तियाँ कहतीं –  “कैसे हर बदलते युग में एक दूसरे की संस्कृतियों के निशान मिटाने के लिए हमें तोड़ा गया, यह सोच कर कि पत्थर है दर्द नहीं होगा, पर दर्द होता है, किसे कहे कौन हमारा दर्द समझेगा, कौन हमारे जख्मों पर मरहम लगाएगा?  क्या हम केवल मूर्तियां थीं, हम तो पहचान थीं किसी महान संस्कृति की, हमें नहीं उस संस्कृति को बर्बरता से रौंदा गया, सदा ही” ।
कह कह कर  मूर्तियाँ विलाप करने लगीं, उनके विलाप से भयानक दृश्य बन गया, हर कहीं चीत्कार, रूदन, विलाप, हाहाकार मचा हुआ था,
पहले मुझे लगा यह सपना है , पर आँख मसल मसल कर देखने के बाद भी मुझे मूर्तियाँ रोती दिखीं , सुबह होते होते वे सब फिर अपनी अपनी जगह पर जा कर लग गईं” इतना कहकर रामसिंह चुप हो गया | सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे | वह थोडा रुक कर बोला- “फिर तो यह रोज का काम हो गया साबजी, मैं  रोज उनकी बातें सुनता और सोचता मेरा एक पैर नहीं है मुझे तकलीफ होती है, वैसे ही इन मूर्तियों को भी होती होगी | एक दिन मैंने मूर्तियों से बात करने की सोची, जब मूर्तियाँ अपनी बाते कर रही थी तो  मैं  वहाँ पहुँचा दबे पाँव , पर मुझे देख वे फिर मूर्तियाँ बन गई , मैंने फिर भी उन्हें कहा मैं तुम्हे ठीक करूंगा… हाँ    मैं  तुम्हे ठीक करूंगा , मैंने देखा साब… मैंने देखा सब मूर्तियाँ एक साथ मुस्कुराई थी”|
शर्मा जी ने कश्यपजी के कान में कहा– “यह रोज मूर्तियों के पास जा जा कर कुछ बोलता तो रहता है, हमने सोचा आदत है, बुदबुदाने  की, माँ बाप ख़तम हो गए, शादी ब्याह हुआ नहीं,  कोई बात करने वाला नहीं इसलिए मूर्तियों से ही बात करने लगा था”|
कश्यपजी ने रामसिंह से कहा – “तुम्हे लगता है कि तुम्हारी इस बकवास पर कोई विश्वास करेगा क्या पत्थर भी बोल सकते है”?
“हाँ   मैं  बताता हूँ साब जी कैसे बोलते हैं आईये” , कहकर वह सबको लेकर उस कमरे में गया जहाँ वह बीस साल से  बैठा रहता था, “देखिए क्या आप नहीं सुन पा रहे हैं, यह मूर्ति एक नृत्यांगना की है पर इसके पैर नहीं  इसकी तड़प देखिए…, इधर आईए यह टूटा बर्तन और यह माँ की मूर्ति अपने बच्चे के लिए खाना बनाना चाहती है पर टूटे बर्तन  में कैसे …देखिए यह टूटे खिलौने किसी बच्चे के होंगे वह रो रहा है  खिलौने के लिए…,  यह धड़ जिसका सर नहीं है, माँग रहा है अपनी पहचान… , यह सन्यासी इसके सारे मंदिर, मूर्तियाँ तोड़ दी गई व्याकुल है अपनी पूजा साधना के लिए…,राजा की मूर्ति, शक्ति दंड तोड़ दिया गया शक्तिविहीन राजा…, और यह बिन राजा का नगर टूटा फूटा…, किसान का टूटा हल… मन भर रोता किसान…, टूटे फूटे वाद्य यन्त्र… यह रोता कलाकार…, खंडित शस्त्र, बिना इनके सिपाही कैसे लड़ें, तो वह भी व्याकुल…, कटे सर वाले महिला पुरुष और बच्चे बयां कर रहे है हिंसा की कहानी… , और सबसे बड़ा दुःख इस मूर्तिकार का जिसने न जाने कितने बरस लगाकर यह मूर्तियाँ बनाई थी, पर सब की सब मिटा दी गई तोड़ दी गई… , पहचान खत्म…
तो …तो इनकी  तकलीफ मुझसे न देखी गई मैं  मौका खोजने लगा इनके घावों पर मरहम लगाने का,  और मुझे मौका मिल गया, जब  इस कमरे का सीसीटीवी केमेरा खराब हो गया उस रात मैंने टूटे बर्तन की जगह नई हाँड़ी रख दी , स्टोन सीलर और प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से किसी की आँख…, किसी का कान, किसी की नाक और हाथ पैर धड़ जोड़ने की कोशिश करने लगा” रामसिंह रुका|
“तुम बेवकूफ हो,  क्या यह बात पता नहीं चलती, हर दिन मूर्तियों की नम्बरिंग और इमेज की जांच  होती है, जरा सा भी अंतर तुरंत पहचान में आ जाता है, तुम तो उन्हें नया रूप देने लगे ”- कश्यपजी चीखे |
“कोई बिगड़ी बात सुधारने में कैसा अपराध साबजी” रामसिंह कातर स्वर में बोला |
“इन खंडित मूर्तियों की ही कीमत है कटे पैर, टूटा हाथ, फूटी आँख की कीमत है” – कश्यपजी खीजकर  बोले|
“हमारा भी एक पैर और एक आँख नहीं है साबजी पर हमारी तो कोई कीमत नहीं है”,  वह बोला ।
छन्न से कुछ टूटा उनके अन्दर , “तुम क्या मूर्ति हो”?  इस बार स्वर कुछ धीमा था |
“नहीं इंसान हैं, पर टूटी मूर्ति, टूटे इंसान से ज्यादा कीमती,” वह हँसा |
 जाने कैसी हँसी थी, पर कश्यपजी कुछ कह नहीं पाए मन अजीब सा हो गया | कश्यप जी ने उसे जाने का कहकर अपने साथ आई विशेषज्ञों की टीम से मूर्तियों का परिक्षण करवाया,  अधिक कुछ बिगड़ा नहीं था जो कुछ था वह कुछ रसायनों की मदद से ठीक हो सकता था | कश्यपजी बड़े प्रभावशाली अधिकारी थे, इसलिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर किसी बडे़ दंड से उन्होंने रामसिंह को बचा लिया | मानसिक हालत ठीक न होने का कारण लिख रामसिंह को दो महीने पहले ही सेवा निवृत करने का निर्णय लिया गया और दंड स्वरूप इन दो माह की तनख्वाह काटने का आदेश दिया गया | बाकी लोगों को रवाना कर वे आफिस में बैठे सोचने लगे- “कितना अंतर है उनमे और रामसिंह में , वे जीवन भर मूर्तियों पर रिसर्च करते रहे दुनिया जहाँ की मूर्तिकला, हजारों मूर्तियों पर काम किया है उन्होंने उन्हें खोजने का, सहेजने का,   पत्थरों ने उन्हें भी पत्थर बना दिया था, पता तो उन्हें भी लग ही जाता था कि किस समय यह मूर्ति बनी और किस समय तोड़ी गई, ऑर्कियोलॉजिस्ट थे, पत्थरों की ज़बान जानते थे, इंसान झूठ बोल सकता है, प्रकृति नहीं, पत्थर तो अपने भीतर पूरा सच लिए रहते हैं, उनकी वैज्ञानिक पद्धतियां भी विध्वंस की तीवृता देख हैरान रह जाती थी ।
क्यों तोड़ी गई ये मूर्तियां, क्या केवल इसलिए कि कुछ लोग किसी आकार में, बुत में विश्वास नहीं करते थे,  इतनी घृणा कि तलवारों से हज़ार वार तक किसी किसी मूर्ति पर वे पाते, सिहर जाते कि ज़िंदा लोगों पर कितने वार हुए होंगें । लेकिन रामसिंह जैसी रॉ संवेदना नहीं थी उनकी, खरी, बीना साज सजावट की,  सच को सच के रूप में देखने की। उनकी बुद्धि ने लाभ हानि के न जाने कितने गणित में उन्हें उलझा दिया था और डाल दिया था उन्होंने इन भंजित मूर्तियों के सच पर झूठ का काला परदा, साथ ही अपनी आत्मा पर भी, घना काला परदा ताकि आ न सके सच्चाई की एक किरण भी कहीं से ।
 नौकरी, बुद्धि फिर कुछ और बातें कभी उस कड़वे सच को सामने नहीं रखने देती, विध्वंसक सच को शुगर कोटेड ही परोसा गया सदा । एक क्षण को ग्लानी से मुख म्लान हो गया, थोड़ी अपने आप से घृणा भी, जानें कितनी खोज और उसके परिणाम राजनीतिक दबाव और लालच में आकर फाइलों में खुद उन्होंने बंद कर दिए ।
एक बार गौर से उन्होंने पत्थर की उन मूर्तियों की तरफ़ देखा तो लगा, सचमुच गहन पीड़ा है, विलाप है, जैसे मूर्तियां उनसे भी कह रही हों, तुमने भी तो हमारा सच छुपाया, क्यों नहीं बताते दुनिया को कि किसने हमें चोट पहुंचाई, क्या केवल हमारे होने भर से कुछ बदल जाता, या क्या सोचा था हमें मिटा कर सचमुच कुछ मिटा पाया कोई, धरती के गर्भ से जब जब कोई पत्थर निकलेगा अपनी कहानी साथ लेकर आयेगा, नहीं नहीं मिटा सकोगे तुम हमारी पहचान, जैसे सारी मूर्तियां एक साथ जयघोष कर रही हों, उनका काल इतिहास सब उनकी आंखों के आगे दिखने लगा ।
घबराकर वे वहां से बाहर निकल आए ।
सोचने लगे, “मैं न जुड़ सका ऐसे जैसे वो जुड़ा है,
 रामसिंह, न मूर्तियाँ  बनाई, न सहेजी बस उनके बीच बैठ कर ही उनका हो गया | कितना फर्क होता है संवेदनाओं का | बड़ी अजीब बात है इंसान के क़त्ल की चर्चा तक नहीं ,और जानवरों के शिकार पर बवाल,  इंसान की सूरत बिगाड़ने, हाथ पाँव टूटने पर तत्परता नहीं और  पत्थर की मूर्तियों  के लिए ऐसी मुस्तैदी”  रामसिंग पर जिन्होंने हमला किया था, सब सच जानते हुए भी वे लोग बचे रहे उस पर सरकार हरकत में नहीं आई थी, और इन मूर्तियों के लिए…
 सच ही तो कहा था रामसिंह ने “इन खंडित मूर्तियों की ही क़ीमत है साब जी, उनके दर्द की कोई क़ीमत नहीं…”
हां यह केवल मूर्तियां ही नहीं हैं, जीवित इतिहास ही तो हैं, हर कहीं मुंह चिढ़ाता सा, विध्वंस और बर्बरता की कहानी सुनाता सा, शायद मुनष्य सभ्यता के विकास काल में निर्माण करता ही इसलिए है कि जब कोई बर्बर उसे मिटाने का प्रयास करे तो कोई मनुष्य तो ज़िंदा रहेगा नहीं बताने को, यह पत्थर कहेंगे कहानी उस आतंक की, और सचमुच पत्थर चीख चीख कर कहते हैं कहानी, जो पत्थरों के साथ इतने क्रूर हुए होंगें तो जीवितों की क्या दशा की होगी, मनुष्य की हिंसक वृत्ति ने”
सिगरेट का लंबा कश खींचते हुए,
सोचते सोचते उनके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक  मुस्कान आ गई “इस दुनिया में जहाँ इंसान इंसान को रोज टुकड़ों टुकड़ों में घाव दे रहा है, वहाँ    बेजान पत्थर की मूर्तियों के घावों पर मरहम लगाने वाला पागल नहीं तो और क्या है? जाने के लिए बाहर निकले तो रामसिंह सामने खड़ा था , अपने जेब से दो महीने की तनख्वाह निकाल कर उसके जेब के हवाले कर उसको गले से लगा लिया और धीरे से बोले- “होटल में चौकीदारी का काम निकाला है तुम्हारे लिए” और निकल पड़े मन में संतोष ले कर  कि आज उन्होंने भी एक भंजित मूर्ति के घावों पर मरहम लगा दिया है |
हां उन पत्थरों की मूर्तियों के घावों पर लगाने के लिए उनके पास कोई मरहम नहीं था ।
 “जानें कौन लगाएगा मरहम उन मूर्तियों के घावों पर”, रामसिंह सोच रहा था, या वे घाव ऐसे ही रीसते रहेंगे, या नए घाव दिए जाते रहेंगे और नासूर बन जायेंगें ।
डॉ. गरिमा संजय दुबे
डॉ. गरिमा संजय दुबे
सहायक प्राध्यापक , अंग्रेजी साहित्य , बचपन से पठन पाठन , लेखन में रूचि , गत 8 वर्षों से लेखन में सक्रीय , कई कहानियाँ , व्यंग्य , कवितायें व लघुकथा , समसामयिक लेख , समीक्षा नईदुनिया, जागरण , पत्रिका , हरिभूमि , दैनिक भास्कर , फेमिना , अहा ज़िन्दगी, आदि पात्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। संपर्क - garima.dubey108@gmail.com
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