अपने सूटकेस को एक हाथ से खींचते हुए वह जा रही है। उसका दूसरा हाथ टैक्सी की खोज-खबर ले रहा है। उसके जाने से घर में आए खालीपन को मैं महसूस करती हूँ। उसकी अनुपस्थिति उसके बारे में बहुत कुछ कहती प्रतीत होती है। दीवार पर बरसों से लगी तस्वीरें एकाएक बातें करने लगती हैं- गीत गाते पक्षी, कुलाँचे भरते मृग, बछड़ों पर फेन टपकाती गाय और कानों में सींक फँसाती हुई जंगली लड़की! ये सब अपने-अपने फ्रेम की कैद से निकलकर अपनी मस्ती से मुझे जीवन को जीवन की तरह जीने के लिए उकसा जाते हैं। 
एक दिन इसी तरह टैक्सी से उतरकर अमायरा मेरे घर आयी थी। मेरी पेइंग गेस्ट बनकर। मैंने बहुत प्यार से उसका स्वागत किया था और उसने भी पूरे मान से उस प्यार का प्रतिदान किया था। मुश्किल से एक सप्ताह बीता होगा कि हमारी विरोधाभासी सोच घर के अनुशासन को ठेस पहुँचाने लगी। उसके हर कदम, हर काम से मुझे शिकायत होने लगी। ऐसा लगने लगा कि हमारा साथ महज छत्तीस का आँकड़ा है। हम दोनों जैसे दो अलग-अलग ग्रहों के प्राणी थे। वह आधुनिक परिवेश में जीती लड़की, मैं आधुनिकता को उलाहना देती पुरातनपंथी महिला। हमारे कमरे अलग-अलग दिशाओं में थे। घर के एक कोने में मेरा और दूसरे कोने में उसका कमरा था। उसके घर में आने और घर से जाने के बीच, हमारे रिश्तों के धागे उलझते रहे। एक दो नहीं, अनगिनत इत्ती-बित्ती-सी बातें घर के माहौल को खराब करती रहीं। कभी मेरी ऊँची आवाज तो कभी उसकी। हम दोनों के बीच बहसबाजी हो ही जाती।   
तुम यहाँ जूते मत रखा करो।”
यही तो जगह है जूते रखने की!”
यह मेरे जूतों की जगह है, तुम अपने कमरे में ले जाओ अपने जूते।”
वह जूते पहने अंदर जाने लगती। उसके जूतों के साथ बाहर से आयी मिट्टी एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाती। वे धूल के नन्हे कण दूर से मुझे बहुत चुभते। वह गंदे बरतन सिंक में रख देती। घंटों तक वैसे ही पड़े रहते। उसके गंदे कपड़े बाथरूम में लटकते रहते। उसका फोन जब भी बजता तो बहुत देर तक बजता रहता। ऐसा लगता जैसे वह जानबूझकर कर फोन करने वाले को प्रतीक्षा करवाती है। उसके फोन का रिंग टोन हर ओर से टकराकर मेरे कानों में फड़फड़ाता तो मेरा गुस्सा उतना ही तीव्र वेग से टनटनाने लगता। वह फोन उठाकर दरवाजा बंद कर लेती। बात करती रहती, कभी हँसती, कभी चुपचाप सुनती। मैं टोह लेने की कोशिश में रहती कि आखिर इतनी देर तक किससे बात कर रही होगी। बंद दरवाजे के सुराखों से शब्द बाहर न आते।
मैं और कुढ़ती। दो बरतनों की यह खड़खड़ाहट असल में दो पीढ़ियों की टक्कर थी। एक बरतन उस पुराने पीतल जैसा था जो समय के साथ-साथ काला पड़ने लग जाता है। था तो दूसरा भी पीला, मगर यह नया था। इसकी चमक सोने जैसी थी। नख से शिख तक चमकीला और आकर्षक। जाहिर-सी बात है कि पुराने बरतन को नया कभी रास न आता। हम दोनों की अपनी-अपनी जरूरतें थीं। मुझे पैसों की, उसे घर की। मुझे खाली घर काटने को दौड़ता था और उसे एक सुरक्षा कवच चाहिए था। हमें एक दूसरे का पूरक बनना था, मगर सब कुछ उलटा हो रहा था। मुझे सिर्फ अपने किराए से सरोकार रखना था मगर मैं इस सरहद के आगे बढ़ती रही।
उसकी टिप-टॉप जीवन शैली से मुझे बहुत चिढ़ होने लगी थी। उसकी खरीदी हुई महँगी चीजों ने मुझे छेड़ना शुरू किया। एक दिन वह जूते खरीद कर लायी। मेरा अनुमान था कि वे पचास या साठ डॉलर के होंगे। लेकिन उसने उनकी कीमत दो सौ डॉलर बताया। मुझे लगा कि इस तरह बढ़ा-चढ़ा कर कीमत बताना सिर्फ मुझे नीचा दिखाने के लिए है। शायद झूठ बोल रही हो। ब्रांड का नाम देखकर सर्च किया तो पता चला कि सचमुच उसके जूते दो सौ डॉलर के थे। मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी एक जोड़ी जूतों पर पचास डॉलर से ज्यादा खर्च नहीं किए थे। जूतों पर इतना पैसा खर्च करने के लिए कितना बड़ा जिगर चाहिए! इस बित्ते भर की लड़की की हिम्मत तो देखो! ऐसे महँगे जूते पहन, पर्स लटका, धूप का चश्मा पहन, बन-ठन कर, इठलाती-सी मेरे सामने से निकलती तो सीने में तीर चुभते। उसकी तमाम चीजें अपने नाम का तमगा सुशोभित करती दिखतीं। उसके जाने के बाद मैं उन नामों को देखकर सर्च करती। उसके पर्स और धूप के चश्मे की कीमत पता करती। इन नैम ब्रांड चीजों की वेबसाइट से चीजों की कीमत देखकर मेरा मुँह खुला का खुला रह जाता। मैं हैरान होती रहती- “इन लोगों का बस चलता तो माँ-बाप भी नैम ब्रांड के ही पिक करते!”
मैं उसे कहती कुछ नहीं, पर उसके प्रति मेरा व्यवहार रूखा होता गया। उसकी चीजें दो सौ की हों या हजार की, ये उसकी अपनी रहन-सहन शैली थी। मुझे उसके निजी मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं था। वह अपनी जेब से अपना पैसा खर्च करती थी। फिर भी उसकी इस कदर की गयी फिजूलखर्ची मैं देख न पाती। जीवन भर नौकरी करने के बावजूद मैंने इस तरह कभी पैसा नहीं उड़ाया। ये तो अभी जमीन से उगी ही है जबकि मैं एक फले-फूले वृक्ष की तरह हर धूप-छाँव देख चुकी हूँ। 
उस नयी पौध और मेरी पक्की जड़ों की आपस में ठन गयी थी। न जाने क्यों उसका आत्मविश्वास, उसका सौंदर्य मुझे जलील करता प्रतीत होता। मैं उखड़ी रहती तो वह भला कैसे पीछे हटती। हम एक दूसरे को खटकने लगे थे, आँखों की किरकिरी की तरह। जितने समय वह घर में रहती, उसके द्वारा फैलायी अव्यवस्थाएँ बढ़ती रहतीं। उसकी लापरवाही और बिंदास स्वभाव मेरे धैर्य को चुनौती देता रहा। आखिरकार तंग आकर मैंने उसे घर खाली करने का नोटिस दे दिया। उम्मीद थी कि वह अनुनय-विनय करेगी। माफी माँगेगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह चौंकी जरूर मगर बगैर किसी बहस के उसने नयी जगह तलाशनी शुरू कर दी। मेरी शर्तों पर जीना उसे भी शायद स्वीकार न रहा होगा। उसका चुपचाप मेरी बात मान लेना भी मुझे आहत कर गया। मेरे घर में यह उसका पहला और आखिरी महीना था। उसकी बेपरवाही बढ़ती गयी और मेरी चुप्पी। उसे चले जाना था इसलिए खामोशी को विस्तार देती यह टकराहट गरमागरम बहस की तरफ़ न मुड़ पाई। मन ही मन हो रही लड़ाइयाँ ज्यादा तकलीफ देतीं। चिल्ला-चिल्ला कर निकलने वाली भड़ास भीतर जमा होती रही। घर का ज़र्रा-ज़र्रा कड़वाहटों का गवाह बन जाता। न जाने यह मेरी आँखों की परेशानी थी या मेरी कुढ़न! जो भी थी, बहुत कचोटती थी। शायद इसलिए भी कि जो मेरे पास नहीं है, वह उसके पास है। एक और बात जो मुझे उकसाती, और अधिक चिड़चिड़ा बनाती वह ये कि मैं बूढ़ी और वह युवा थी। उम्र के फासले युवा पीढ़ी से असहमति जताने की एक खास वजह है जो शायद हर उम्रदराज के मन में होती ही है। मैं भी उन्हीं में से एक थी। सुबह से शाम तक कई बातों पर असहमति, चुप्पियों को जन्म देती और उस मौन में कई गाँठें और बँधती चली जातीं। 
दो मानसिकताओं की इस टक्कर में बहुत कुछ टूट कर चूर-चूर होता गया। शिकायतों के पुलिंदे भारी होते रहे। यह मानसिक खींचतान पूरे महीने चलती रही। आज शाम उसे चले जाना था। उसने कोई नयी जगह तलाश ली थी। हालाँकि उस समय मैं अखबार में खुद को डुबोए रखने का स्वांग कर रही थी पर नजरें उसी पर थीं। वह उदास थी, चाल बोझिल और चेहरे से रौनक गायब थी। रोज की तरह तैयार नहीं थी वह। बगैर मेकअप के उसका चेहरा बहुत कुछ कह रहा था। मेरी खीज स्वाभाविक ही कम हो आयी। फिर भी मैंने तीखे स्वर में उससे कहा- “कुछ कहना चाहती हो तो कह दो।” मैं शायद यह सुनना चाहती थी कि उसे मेरे घर में रहना अच्छा लगा।
उसने मेरी आँखों में देखा। शायद वह ये तय करना चाहती थी कि मैं सुनने को तैयार हूँ या नहीं, “मेरा अतीत आज मेरे पीछे फिर से पड़ा है।” यह कहते हुए वह सुबकने लगी। जैसे किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। वह अपनी आपबीती बताने लगी थी। एक सतायी हुई लड़की थी वह। उसके माता-पिता एक्सीडेंट में चल बसे थे तो चाचा ने सारी जायदाद हथिया ली। वहाँ तक तो फिर भी ठीक था लेकिन वह प्रताड़ित भी करता रहा। कई दु:ख-दर्द अपने भीतर समेटे हुए वह अपने ही घर से निकल गयी। छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा करती रही थी वह। 
मैं उसे अवाक देख रही थी। बगैर मस्कैरा और आई लाइनर के उसकी बोझिल-सी आँखें धार-धार बह रही थीं। उसकी नाक लाल हो गयी थी। हथेलियाँ बार-बार उन आँसुओं की बाढ़ को रोकते हुए लकीरों के भीतर छुपे सच को बयाँ कर रही थीं। सच को उकेरते उसके शब्द वज्रपात कर रहे थे। दिल दहल रहा था। इतने दिनों का मेरा जमा हुआ गुस्सा और खीज उसके आँसुओं की बाढ़ के साथ-साथ यूँ बहते जा रहे थे मानो इसी दिन का इंतजार रहा हो उन्हें। वह बहुत कुछ कह रही थी, इधर मैं धीरे-धीरे अतीत में खोने लगी थी।
पहले भी ऐसा ही हुआ था। कई वर्ष पहले की वे घटनाएँ एक-एक करके मस्तिष्क में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगीं। तब शायद बात आयी-गयी हो गयी थी। एक कक्षा से दूसरी कक्षा तक दौड़ लगाते मुझे समय भी कहाँ था कि अपने छात्रों की बाहरी और भीतरी जिंदगी को सुनती-समझती और उनके मसलों पर गौर करती। उन युवा छात्रों की ऊपरी चमक-दमक देखकर हमेशा ऐसा लगता कि वे सब बहुत खुश हैं। उन्हीं में से कोई जब ऑफिस में किसी काम से आता तो वह थोड़ा खुलकर अपने बारे में बताता। उनकी बातें सुनकर, उनकी परेशानियों का अनुभव करके लगता कि इनका ऊपरी ताम-झाम एक बनावटीपन है। मूव ऑन की तर्ज पर जीते ये युवा आगे की सोचते हैं। पीछे का भुलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन तब मैं इस सच को स्वीकारती नहीं थी। मेरी सोच आगे बढ़ ही न पाती, सुई एक ही जगह अटकी रहती- “यह सब नाटक है।” मेरे उस दिमागी ढर्रे को बदलना असंभव था। 
बेबी डॉल-सी दिखती वह छात्र वमिका, परीक्षा में आए कम अंकों को लेकर रोती तो मुझे लगता कि यह सब बहाना है। पढ़ाई से यह दूर भागना ग्लैमर की दुनिया का लालच है। सजने सँवरने में अपना कीमती समय बरबाद करती है यह लड़की। काश! मैं उसके साथ सख्त न होती। उसके मेक-ओवर को इस क्रूर दुनिया से लड़ने का हौसला समझती और दाद दे पाती। जिन्हें मैं शिक्षित कर रही थी, वे मुझे भी लगातार कुछ दे रहे थे। शिक्षा के बदले शिक्षा। रोज़ गुरु दक्षिणा मिलती थी, जिसे शायद आज मैं स्वीकार कर रही थी। ढेर सारी परेशानियों के हुजूम के बीच रहने के बावजूद उन लड़कियों के व्यक्तित्व पर कोई फर्क न पड़ता। कई कामों को अंजाम देते उन हाथों ने कभी यह शिकायत न की कि बहुत परिश्रम करने के कारण खुरदरापन घर कर गया है। उँगलियों व नाखूनों को वैसे ही सुंदर बनाए रखने के लिए जो प्रयास किए जाते वे सचमुच खुद के साथ न्याय करते। रिश्तों के रूखेपन का असर बालों को कभी रूखा न होने देता। बेतरतीबी से बिखरे बाल बिखरी जिंदगी का हाल कभी बयान नहीं करते। हमेशा स्मूथ रहते, कोमल व मुलायम, रेशम जैसे लहराते बल खाते, जिन्हें देख लगता कि जीवन की गाड़ी स्मूथ चल रही है। सजी हुई आँखें अपने भीतर के दर्द को इस तरह ढाँप लेती कि बाहरी दुनिया उन आँखों की सुंदरता में खो जाती। 
यह भ्रमित करता व्यक्तित्व आज सामने है जब मैं अमायरा की दर्द भरी कहानी सुन रही हूँ। कहानी नहीं, सच्चाई! युवा सोच की सकारात्मकता ने मुझे हिला दिया। यह युवा लड़की मेरी तरह अतीत को अपने इर्द-गिर्द लपेटकर बैठी न रही। खुद को उसकी जकड़ से मुक्त किया। इसकी जगह मैं होती तो टूट जाती, बिखर जाती। शायद उसने अपने जीवन के पहले कुछ वर्षों में ही खुद को समेटना सीख लिया। कह रही थी- “मेरी कोई गलती थी ही नहीं तो मैं खुद को क्यों दोष दूँ? खुद के साथ अन्याय क्यों होने दूँ?” 
उसे सुनते हुए फिर से मैं अपने में गुम हो गयी। यह सोचते हुए कि आज भले ही यह चली जाए लेकिन पीछे बहुत कुछ छोड़कर जाएगी। इसकी उपस्थिति में जितनी बार दिल टूटा था, उससे हजार गुना अधिक अब उसी से जुड़ जाएगा। चंचल-नटखट कुलाँचे भरते मृगों की तरह अमायरा, वमिका और वे सारे छात्र, आँखों की कोरों में समा गए थे। अपने दर्द को अपनी तिजोरी में रखने की कला मुझे सिखाते हुए। सामने लगी तस्वीरें फिर से कानों में कुछ गुनगुना रही थीं- थके पैर, कमजोर आँखें, काँपते हाथ, अलसाया शरीर और झूठे अनुभव अब मन को दुर्बल न बना पाएँ। बस जीते रहें, अपने मन के महलों में, अपने वैभव के बीच, दूसरों को दिखाते हुए, अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर। सचमुच उन युवाओं की तरह कुलाँचे भरने के लिए मन बहुत बेताब था। 
मेरी तंद्रा टूटी। वह मुझे विदाई झप्पी देकर कह रही थी- “मैं आपको मिस करूँगी।”
उसके सिर पर हाथ रखकर शायद मैंने भी यही कहा था- “मैं भी तुम्हें बहुत मिस करूँगी।”
वह सूटकेस खींचते हुए आँखों से ओझल गयी।

डॉ हंसा दीप की कहानी - कुलाँचे भरते मृग 3

डॉ हंसा दीप यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत हैं। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। चार उपन्यास व पाँच कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी व पंजाबी में पुस्तकों का अनुवाद। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020। 

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