Sunday, June 23, 2024
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डॉ. मनोज मोक्षेंद्र की कहानी – हड़बड़ी

वह यक-ब-यक बेड से उठा जैसे कि कोई भयानक सपना देखकर जगा हो। तभी उसने घड़ी पर निग़ाह डाली तो उसे जैसे बिजली का तेज झटका-सा लगा। वह चिल्लाने लगा, “रूचि, मेरी कमीज कहाँ है? पैंट पर इस्तरी क्यों नहीं करवाई और मोबाइल रिचार्ज पर क्यों नहीं लगाया–अरे, इसकी बैटरी तो १३% दिखा रही है?”
रूचि उसकी इस हड़बड़ाहट पर घबड़ाई भी और संजीदा भी हुई। पहले तो उसने सोचा कि धीरज ने कोई बुरा सपना देखा होगा क्योंकि वह रातभर उसके बाजू में ही लेटी हुई थी। सपने में उसकी बड़बड़ाहट सुनकर वह पलभर को चैन से सो भी नहीं पाई थी। 
उसने कहा, “आज आपको कहाँ जाना है?आज तो सन्डे है।”
वह बिफर उठा, “कहाँ जाना है–कहाँ जाना है? अरे, सन्डे है तो क्या हुआ, मुझे अभी एक ज़रूरी काम से निकलना है। काम भी ऐसा है कि उसे टाला नहीं जा सकता। बस, मैं पांच मिनट में तैयार होता हूँ, तुम मेरा बैग रामू से कार में रखवा दो।”
“पर, आज तो सन्डे की वज़ह से ड्राइवर भी छुट्टी पर है।” रूचि फिर बोल पड़ी। 
“तो क्या हुआ? क्या मैं कार चलाना नहीं जानता? क्या मैं कार चलाकर किसी ज़रूरी काम पर नहीं जा सकता? पूरे २६ साल तक मैंने कार चलाई है। जब सैलरी दोगुनी हुई तभी तो ड्राइवर रखा। वर्ना, ड्राइवर मुझसे बेहतर कहाँ कार चलाता है? ड्राइविंग सीट पर तो वह बैठता है; पर, गाइड मैं उसे करता हूँ। अच्छा तो अब बात का बतंगड़ मत बनाओ और बतंगड़ेपन को बहसा-बहसी की अंधी गलियों में मत धकेलो। बस, कार में मेरा सामान रखवा दो और रामू से कह दो कि कार के शीशे साफ़ कर दे। बस्स!” एक सांस में बोलने के कारण, उसकी सांस फूलने लगी। 
“लेकिन, आप कुछ खाए बगैर जाएंगे? मुझे रात को सोने से पहले बता दिया होता तो भोर में उठकर आपके लिए टिफिन तैयार कर देती। इतनी जल्दी में तो चाय भी नहीं बन पाएगी।” रूचि के माथे पर चिंता के बल पड़ गए। आख़िर, वह उसका ख़ैरख़्वाह चाहने वाली पत्नी है। 
“बस भी करो, नाहक टर्र-टर्र किए जा रही हो। क्या करना है मुझे, टिफिन-चाय का? कहीं भी चाय सुड़क लूंगा, कहीं भी खा लूंगा–समोसा, पिज्जा, सैंडविच, ब्रेड पकौड़ा, वग़ैरा-वग़ैरा। लेकिन, तुम मुझे बतंगड़ेपन में ऐसे क्यों घसीट रही हो? बंद करो बकवास एन्ड लेट मी डू व्हाट आई वांट टू।” वह तिलमिला उठा। 
जब तक धीरज ब्रश-कुल्ला करके कपड़े बदलता, रूचि ने येन-केन-प्रकारेण चाय तो तैयार कर ही ली। फिर, उसने प्लेट में बिस्कुट रखते हुए उसके आगे टेबुल पर सरका दिया। 
वह भन्नाते हुए चिघ्घाड़ उठा, “तुम्हें चाय-बिस्कुट की पड़ी है, पर मुझे तो देर में देर हो रही है। सब तुम्हारी बदौलत। न तुम बहसा-बहसी करती, न मुझे देरी होती। जानती नहीं हो, आज मुझे कितना ज़रूरी काम करना है? अगर नहीं कर पाया तो समझ लो, मेरा पत्ता साफ़। मेरा भविष्य काली रात में समां जाएगा। फिर, तुम्हारा क्या होगा, बच्चों का क्या होगा? सब चौपट हो जाएगा।” वह अंगारे की तरह बरस रहा था। 
उसका मूड देखकर, रूचि पूछ भी नहीं पाई कि ‘ऐसा कौन-सा ज़रूरी काम आन पड़ा है कि सिर पर पैर रखकर भाग रहे हैं। इतने सालों से तो इतना ज़रूरी काम कभी नहीं आन पड़ा। बड़ी तसल्ली से, आराम से, लेट-लतीफी से ‘आसमां पे है ख़ुदा औ’ ज़मीं पे हम’ गाते हुए निकलते रहे हैं। क्या इतना ज़रूरी काम है कि चाय की एक घूंट भी नहीं सिप कर सकते?’ लिहाजा, रूचि उसे जाते हुए देखकर यह भी नहीं कह पाई कि ‘अरे, आपने शर्ट तो उलटी पहन रखी है…और जो चश्मा लगा रखा है, वह नज़र का चश्मा है ही नहीं। क्या किसी फैशन-शो में जाना है? आखिर, इस चश्मे से तो आपको कुछ भी नहीं दिखेगा, फिर अपना ज़रूरी काम कैसे निपटाओगे?’ पर, भागते हुए धीरज को न तो उलटी शर्ट का, न गलत चश्में का ही ख्याल रहा। वह फ़्लैट से निकलकर, फटाफट लिफ्ट में आगे खड़े लोगों को धकियाते हुए पहले अंदर घुस गया। उसकी इस बदतमीज़ी पर लोगबाग उसे खरी-खोटी सुनाते रहे; पर, उस पर उनकी बातों का कोई असर नहीं होने वाला था। शायद, उसे समझ में भी नहीं आया कि वे अपनी शिकायत उससे नहीं, बल्कि किसी और से कर रहे हैं।
फिर, जैसे ही लिफ्ट बेसमेंट की पार्किंग में रुकी, वह आगे खड़ी एक लड़की के पैर को रौंदते हुए बाहर निकला और लगभग भागते हुए अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर धचक कर बैठ गया। कार को पार्किंग से निकालते हुए उसने आगे की दो-दो गाड़ियों को पछाड़ा और एक कार को पीछे से धकियाते हुए और उसमें बैठे आदमी को गुरेरते हुए एकदम से आगे आ गया – गोयाकि वह किसी पार्किंग में नहीं, खुली चौरस सड़क पर गाड़ी भगा रहा हो। बहरहाल, कॉलोनी के गेट पर चौकीदार की ‘बाबूजी सलाम’ को नज़रअंदाज़ करते हुए वह जैसे ही थोड़ी दूर चला था कि एक बिल्ली उसके पहिए की दबोच में आकर टें बोल गई जबकि मोहल्ले के कुछ देसी किस्म के आवारा कुत्ते उसकी कार को भौंकते हुए काफी दूर तक उसका पीछा करते रहे। धीरज को इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं रहा कि उसने एक अपाहिज भिखमंगे को कार की चपेट में ले लिया है और एक ठेली वाले की ठेली को धक्का मारकर उसकी सारी सब्जियां सड़क के हवाले कर, बिखेर दी हैं। लोगबाग चींखते-चिल्लाते रहे ‘पकड़ो-पकड़ो’. ‘कार का नंबर नोट करो’ और ‘थाने भागकर रपट लिखवाओ।’ लेकिन, धीरज के सामने तो रविवार के दिन अपने निहायत ज़रूरी काम को अंजाम देने मंज़िल तक पहुँचाना था। 
सड़क पर ट्रैफिक इतनी ज़्यादा थी कि गाड़ी अस्सी-सौ की स्पीड नहीं ले पा रही थी। तभी मेट्रो स्टेशन के सामने से गुजरते हुए उसे यक-ब-यक ख्याल आया कि क्यों ना, अपनी बीएमडब्ल्यू गाड़ी को बाहर पार्क करके बाकी का सफर मेट्रो ट्रेन से किया जाए। इससे उसे दो फायदे होंगे; एक तो जल्दबाजी में उसकी कार का कोई एक्सीडेंट नहीं होगा; दूसरे, वह और जल्दी अपनी मंजिल तक पहुँच जाएगा। 
सो, उसे ध्यान भी नहीं रहा कि उसने अपनी कार मेट्रो पार्किंग में न खड़ी करके सड़क-किनारे ‘नो-पार्किंग ज़ोन’ में खड़ी कर रखी है जबकि कार से निकलकर मेट्रो स्टेशन की स्वचालित सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने इस पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया; तभी ट्रैफिक पुलिस की गाड़ी हॉर्न बजाती आई और उसकी कार को ग़ैर-क़ानूनी रूप से सड़क पर खड़ा करने के कारण क्रेन से उठा ले गई। 
चुनांचे, उसने मेट्रो स्टेशन की लाइन में खड़ा होकर अपना बैग एक्सरे मशीन में डाला और भागते हुए उसे अपने साथ लेना भूल गया। पर, उसे अपनी पॉकेट में पड़े पर्स का ध्यान रहा जिसे उसने टटोला और राहत की सांस ली। वह तनिक ठहर कर सोचने लगा, ‘जब पर्स पॉकेट में है तो स्मार्ट कार्ड भी उसी में होगा। अच्छा, इतनी ज़ल्दबाज़ी में भी मैं सेफ और साउंड यहाँ तक आ गया। अब यहाँ तक आ गया हूँ तो मंज़िल तक तो पहुँच ही जाऊंगा।’
फिर, वह स्टेशन में प्रवेश करने के लिए एक कतार में खड़े कोई २०-२५ लोगों को फांदते हुए, एकदम आगे आ गया और एक आदमी से झगड़ पड़ा, “जी, आपके पीछे मेरा नंबर है ।’’ तब, वह वहां घुसने का प्रयास करते हुए एक तगड़े आदमी को बहुत मशक्कत से ढकेलते हुए और बड़बड़ाते हुए ‘कहाँ-कहाँ से पागल चले आते हैं। कोई एटिकेट्स नहीं, मैनर नहीं।’
उस आदमी ने बिगड़ कर एक भद्दी-सी गाली दी तो वह फट पड़ा, “ज़बान सम्हाल कर बोलो; जानते हो मैं कौन हूँ?”
तभी किसी ने फब्तियां कसीं, “हाँ, हाँ, ये शहर के एमपी साहब हैं, पीएम से मिलने जा रहे हैं।”
जब धीरज ने उसे घूरकर देखा तो वह पसीने-पसीने होकर बगलें झांकने लगा। बेशक, अगर वह कुछ बोलता तो हाथापाई हो जाती।
वह थोड़ा नरम हो गया था; तभी तो वह प्लेटफार्म पर लाइन में कायदे से खड़े होकर इंतजार करने लगा। पर, कब तक? वह लगातार बड़ी बेचैनी से उचक-उचक कर लाइन में खड़े लोगों को आगे-पीछे देख रहा था और गिनता जा रहा था कि वह कतार में किस नंबर पर खड़ा है। तभी ट्रेन आ गई। उसने अपनी फुर्ती और जोर का भरपूर इस्तेमाल किया तथा भीड़ के धक्कमपेल का फायदा उठाते हुए एकदम से आगे आ गया और एक लड़की के वक्ष से टकरा गया।  
वह गाली देते हुए चींख पड़ी, “ये मनचले जानबूझकर भीड़ का फायदा उठाते हैं और लड़कियों से छेड़खानी करते हैं।”
गनीमत थी कि लड़की की चींख पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया; अन्यथा, धीरज का क्या हाल होता, यह भगवान ही जाने। 
पर, धीरज भी एकदम से बहटियाते हुए और नाक सुड़कते हुए अपने भोलेपन का परिचय देने की भरसक कोशिश कर रहा था। अंदर दाख़िल होते ही वह बुजुर्ग के लिए रिज़र्व कोने वाली सीट पर बैठे नौजवान से गुर्रा उठा, “देखता नहीं कि मैं बुजुर्ग हूँ? तुरत-फुरत सीट खाली करो, वरना…।”
उस नौजवान ने उसे घूरकर देखा, “वरना क्या कर लोगे? तुम कहीं से भी साठ साल के नहीं लगते। हट्टे-कट्टे हो,गाल-गला चिकना-चुपड़ा है और बाल भी काले हैं। ४०-४५ से ज्यादा तो हो ही नहीं।”
धीरज डपट पड़ा, “कह दिया तो कह दिया। पूरे ६५ साल का हूँ।”
नौजवान भी कमतर नहीं था, उसने गला फाड़ कर कहा, “अपना आधार कार्ड तो दिखाओ।”
धीरज आपे से बाहर हो गया, “तूँ कहाँ का अफसर लगा हुआ है जो मुझसे उम्र का सुबूत मांग रहा है?”
चुनांचे, अगर लोगबाग बीच-बचाव नहीं करते तो मारपीट की नौबत आ जाती। पर, धीरज ने भी उसे उसकी सीट से उठाकर ही दम लिया। तब, उसने तसल्ली से बैठकर मोबाइल पर कैंडी क्रश खेलते हुए अपनी यात्रा पूरी की। 
जब ट्रेन रुकी तो उसे अचानक ध्यान आया कि उसका स्टेशन तो आ गया है। वह एकदम से हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और लपककर ट्रेन से बाहर निकला और प्लेटफार्म पर भागने लगा। 
वह स्टेशन से निकलकर कूदता-फांदता हुआ सड़क पर आ गया और एक ऑटो-रिक्शा वाले को आवाज़ दी। वह आया तो उसमें इतनी तेजी से घुसकर, हचक कर बैठा कि ऑटो वाला बोल पड़ा, “सा’ब, थोड़ा आराम से।” 
धीरज घिसी-पिटी तकिया-कलाम जोड़ते हुए बोला, “ज़िन्दगी में आराम किस चिड़िया का नाम है?”
तब, उसने अपना गंतव्य बताया तो ऑटो-रिक्शा दौड़ पड़ा। कुछ अंतराल के बाद, जैसे ही ऑटो बुद्धा गार्डन के सामने पहुंचकर रुका, धीरज छलांग लगाकर बाहर आया और एकदम से चलता बना। ऑटो वाला चिल्लाता रह गया, “सा’ब जी किराया?” पर, धीरज को तो उसका ख्याल ही नहीं रहा। चूँकि धीरज की चलने की गति बहुत तेज थी इसलिए वह जल्दी से बुद्धा गार्डन की झाड़ियों में खो गया। ऑटो वाला दौड़ा भी; पर, उसे पकड़ नहीं पाया। वह चिल्लाता रहा, “सा’ब, पैसा; सा’ब किराया; मैं गरीब आदमी हूँ। कम- से -कम पेट्रोल का पैसा तो देते जाओ।”
धीरज झाड़ियों की झुरमुटों से गुजरते हुए एक हरे-भरे टीले पर आ गया जहाँ एक लड़की बड़े उतावलेपन से इधर-उधर देख रही थी। धीरज ने पहुंचते ही लपककर उसका हाथ पकड़ लिया। 
वह हकबका कर, खिसियाती हुई मुस्कराई, “कितनी देर कर दी, धीरू?”
वह बोला, “डार्लिंग, कुल ३ मिनट ही तो लेट हूँ। टाइम देखो।”
पर, तुम्हें तो जल्दी आना चाहिए था। एकदम आखिरी टाइम पर आए हो? मैं चली जाती तो तुम क्या करते?”
“यहीं सिर पटक-पटक कर जान दे देता।” 
फिर, वह उसे अचानक आलिंगन में लेते हुए उसके गाल, होठ, आँखें, पेट, कमर, नितंब, घुटने और पाँव को बेतहाशा चूमते हुए पास वाली झाड़ी में लेकर लुढ़क गया। कुछ देर बाद, दोनों बाहर निकले। धीरज की बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि अब वह बिल्कुल सामान्य हो गया है। फिर, उसने लड़की को दोबारा जोर से आलिंगन में दबोचा और छोड़ दिया। 
वह बोला, “अगले सन्डे, फिर मिलते हैं।”
देर शाम, जब उसने अपार्टमेंट में कदम रखा तो रूचि को गेट पर ही इंतजार करते हुए पाया। वह बोल पड़ी, “अरे, तुम्हारी बीएमडब्लयु कार कहाँ है?”
वह अपना माथा पीटने लगा, “क्या मैं कार लेकर गया था? ओ माई गॉड! कार तो मेट्रो स्टेशन पर ही छोड़ आया।”
रूचि फिर बोल पड़ी, “और तुम्हारा बैग?”
वह माथा पकड़कर कुछ याद करते हुए बोला, “अरे बाप रे! वह तो एक्सरे मशीन में ही रह गया।” 
“अब क्या कीजिएगा?” रूचि बेचैन हो उठी।  
“उसमें मेरे कितने ज़रूरी कागज़ात थे,” वह बड़बड़ाने लगा। 
“क्या इतना ज़रूरी काम था कि लाखों की कार स्टेशन पर छोड़ आए और कीमती बैग भी, जिसे मैंने तुम्हारे बर्थडे पर गिफ्ट दिया था।”
वह बोला, “हाँ, काम ही इतना ज़रूरी था कि मुझे कुछ होश ही नहीं रहा।”
वह कार वापस लाने और बैग की तलाश में उलटे पाँव लौट गया। कहता गया कि, “देर भी हो सकती है। तुम बेशक, खाना खाकर सो जाना।”


डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र मूलतः वाराणसी से हैं. वर्तमान में, भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं. कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में इनकी अबतक कई पुस्तकें प्रकाशित. कई पत्रिकाओं एवं वेबसाइटों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हैं. एकाधिक पुस्तकों का संपादन. संपर्क - 9910360249; ई-मेल: drmanojs5@gmail.com
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1 टिप्पणी

  1. मुझे तो यह कहानी से अधिक किसी हास्य कलाकार के क्रिया कलापों काआंखों देखा वर्णन लग रहा था।
    ?????

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