Sunday, June 16, 2024
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डॉ. निधि अग्रवाल की कहानी – जहाँ हवा को भी पढ़ना आता है

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-3 से बागडोगरा की दो घंटे की विस्तारा एयरलाइन्स की फ्लाइट इतनी आरामदेह और सुकून भरी थी कि न तन थका न मन! दो घंटे बादलों में अठखेलियाँ करते विमान में  ही 1120 किलोमीटर की दूरी तय कर, दिल्ली के चिलचिलाते सूरज को बहुत पीछे छोड़, अब यहाँ बादलों की आँखमिचौलियों और रिमझिम बरखा से खुशगवार हुआ मौसम किसी के भी चेहरे पर एक सतत मुस्कान ले आने को पर्याप्त है। बागडोगरा के अपेक्षाकृत छोटे-से एयरपोर्ट से बाहर आकर पहले से ही बुक गाड़ी ढूँढने में कोई परेशानी नहीं हुई। बीस-पच्चीस साल का जीवंत युवक जीतू मेरे नाम का प्लेकार्ड लिए मुस्तैदी से खड़ा था। संकेत करते ही उसने आगे बढ़ कर मेरा सामान ले लिया और बिना किसी भूमिका के शुरू हो गया, 
“आप अच्छे दिन आए मैडम जी… कल तक खूब गर्मी थी यहाँ! मैं सोच रहा था कि बुकिंग तो ले ली, लेकिन हालत खराब हो जाएगा मेरा बागडोगरा की गर्मी से!”
अपनी ही बात पर एक निःस्वार्थ हँसी बिखेर, वह गाड़ी आगे बढ़ाता हुआ बोला-
“मैडम जी, चाय के बागान यहीं देख लीजिए। आगे फिर नहीं मिलेगा आपको। दार्जिलिंग आप जाएँगे तभी दिखेगा, नहीं तो टेमी में दिख पाएगा!”
मैंने खिड़की का शीशा नीचे कर सड़क के दोनों ओर लगे चाय के कोमल पत्तों को देखा। हाथ बाहर निकाल कर बारिश की बूँदों को हथेली में भर लिया।
‘पानी है… मत रोको …बहने दो।’
मैंने सहम कर हाथ अंदर कर लिया। काँच चढ़ा दिया। नहीं, यह जीतू ने नहीं कहा। वह तो फोन पर किसी से बात कर रहा है। रंग गोरा, छोटी आँखेंं जिनमें एक हँसी तैरती रहती है बात करता है तो यूँ लगता है कि हर शब्द की ऊर्जा से उसकी आँखों में लगे छोटे-छोटे बल्ब झिलमिल करने लगते हों। दीवाली पर लगी लड़ियों जैसे!
“कहाँ के रहने वाले हो?” मैंने पूछा।
“जहाँ आप जा रहे हो…कलिम्पोंग!” वह हँसा।
फिर आगे बोला, “मेरा बाबा लोग तो रहता था नेपाल बॉर्डर में। नेपाल बॉर्डर क्लोज हुआ… तब सब कुछ खत्म हुआ। मेरी मम्मी ने बोला पापा को अभी तो मेरे भाई के पास चलो उसको मदद करो होटल में।”
जीतू की कहानी पूरी होती इससे पहले ही तीस्ता और मेरी कहानी जुड़ गई, “यहाँ रोकना गाड़ी…” मैंने अधीरता से कहा।
“तीस्ता है मैडम जी… बंगाल की लाइफ लाइन।” उसने गाड़ी साइड लगाते हुए कहा।
मैं गाड़ी से बाहर आ गई और पुल पर खड़े हो कर अपने और तीस्ता के बीच की दूरी महसूस करने लगी लेकिन वह मुझे अपने पास… बहुत पास ,अपने भीतर ही बहती हुई महसूस हुई।
तीस्ता के जल पर सालों पहले लिखी गईं तहरीर पुनः उजागर होने लगीं।
“आज नदी कितनी उदास है!’ वह पानी को बेहद आहिस्ता से छूता हुआ बोला।” मानो तीस्ता की रुग्ण आत्मा को सहलाता हो।
 “उदास है?”
“हाँ बहुत उदास।” उसके स्वर में एक अनचीन्हा शैथिल्य था।
“उदासी का कारण?” मैंने जानना चाहा।
“उदासी एकांत की  पूँजी है, चेतना कारण साझा किए जाने से दरिद्रता अनावृत हो जाती है।”
आवाज की संजीदगी अंत तक यूँ गहरा गई कि उसके कोहरे में मेरी हँसी ओझल हो गई।
“फोटो ले लीजिए मैडम जी…!”
जीतू की आवाज का सूरज उगा। बर्फ के तन पिघल गए। मैंने अपना काला चश्मा आँखों पर लगाया और वापस कार में बैठ गई। पिघली बर्फ का गीलापन आँखों में तैरने लगा। सिलीगुड़ी में बारिश बढ़ने से सड़कें और खाली हो गई थीं। गाड़ी निर्बाध गति से आगे बढ़ रही थी और मेरा मन पीछे। गाड़ी के फ्रंट मिरर से लटकी छोटी-सी एक घंटी विंडचाइम जैसी  लहरी उत्पन्न कर रही थी जो रह रह कर स्टीरियो पर चलते गीत में समा जाती।
‘चेतना, संगीत सुनो न तब आँखेंं बंद कर लेनी चाहिए। आँखेंं मन भटकाती हैं। मन की आँखों से देखोगी तब हर धुन मूर्त रूप ले लेगी।’
मैंने आँखें बंद कर ली।
‘यू नो यू लव मी आई नो यू केयर
जस्ट शाउट व्हेनेवर एंड आई विल बी देयर
यू आर माय लव यू आर माय हार्ट
एंड वी विल नेवर एवर एवर बीअपार्ट’
गाना आगे बढ़ता गया और मैं एक ही पंक्ति पर रुकी थी- ‘जस्ट शॉउट व्हेनेवेर एंड आई विल बी देयर।’
“अभीक!”  मैंने बुदबुदाया और रुलाई से साँस रुक जाने के कारण  खिड़की खोल ली।
“मैडम जी!” जीतू ने पीछे मुड़कर देखा और गाड़ी साइड लगा दी।
“आप पहली बार पहाड़ आए हैं क्या?” वह पानी की बोतल मुझे पकड़ाता हुआ बोला। 
मैंने बोतल लेकर मुँह-आँख  धोए। स्मृतियों में बची राख में से एक शोला फड़फड़ाया। गले मे पड़े स्कार्फ से मुँह पोंछते हुए मैंने कहा,  “नहीं दूसरी बार।” और एक गहरी साँस ले, वापस अपनी सीट पर जा बैठी।
“कुछ लोगों को बहुत दिक्कत होती है। सिर घुमा देता है न रास्ता।” वह बोला।
जीवन से अधिक तो नहीं घुमाता, मैंने सोचा। पीछे सीट पर सिर टिका बाहर देखने लगी प्रकृति से बड़ा हीलर और कौन है। नीले, लाल, हरे गहरे रंग और खूबसूरत फूलों से सुसज्जित घर और चारों तरफ फैली हरियाली से गुजरती हुई मेरी निगाहें मानो चिह्नित कर लेना चाहती थी कि इन पाँच सालों में यहाँ क्या-क्या बदल गया है।
“दो दिन में आप कलिंपोंग अच्छे से देख लेगा मैडम जी। लोग गंगटोक जाते हैं पर मैं बोलूँ जितना शांति यहाँ है और किधर नहीं।”  
मैं उसकी बात पर बस मुस्करा कर रह गई। कोई जवाब न पा, उसने बैक व्यू मिरर पर नज़र डाल मेरे प्रति आश्वस्त होना चाहा।
“अब अच्छा लग रहा है आपको? कोई दिक्कत हो तो मेरे को बोलो आप, मैं गाड़ी रोकता हूँ।”
“नहीं मैं ठीक हूँ। तुम्हें चाय पीनी हो तो कहीं रोक लेना।”
जीतू शायद मेरी अनुमति का इंतजार ही कर रहा था। मेल्ली पर दोनों ओर की छोटी-छोटी दुकानों पर से एक पर उसने गाड़ी लगा दी। दुकानों के पीछे की ओर तीस्ता बह रही थी… प्रेम में ठुकराई हुई,  विरहणी सी उदास… उपेक्षित!
‘मेल्ली का अर्थ जानती हो,चेतना? श्मशान…. जहाँ मुर्दों  को दफनाया जाता है।’
उपेक्षित प्रेम भी तो मुर्दा ही हो जाता है। दफ़न कर देना चाहिए उसे। मैंने सोचा।
“आप क्या लेंगी मैडम जी?” जीतू का स्वर था।
फोन पर गाड़ी के रेट पर अडिग रहने वाला जीतू अब मेरी छोटी-छोटी सुविधा का ध्यान रख रहा था।
“बस एक कप चाय।” मैंने ग्राहकों  के लिए रखी गई कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
स्टॉल पर मैगी बनाती महिला, पहाड़ी महिलाओं के मुकाबले ऊँचे कद की थी। ढीला पजामा और टी शर्ट पहने। सिर पर रेशमी रुमाल बंधा था। मुस्तैदी से सबका आर्डर लेती… बनाती… हिसाब करती। पहाड़ों  की महिलाएँ छुईमुई नहीं होतीं, पहाड़-सी ही अडिग होती है उनकी जिजीविषा। मुझे अपनी ओर देखता पा मुस्कुराई और बोली,
“चाय और मैगी?”
मैं ‘नहीं’ बोलती उस से पहले ही स्मृतियों में हलचल हुई।
‘खा लो, पहाड़ की ठंडक में गर्म मैगी से लज़ीज़ और कुछ नहीं । इससे अधिक ज़हर तो तुम्हारी दिल्ली की हवा में घुला है।’
मेरे मौन को स्टॉल की स्वामिनी ने स्वीकृति ही समझा और एक गिलास में चाय और एक प्लेट मैगी मेरे सामने रख अन्य पर्यटकों पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया। जहाँ इंकार मुखर न हो वहाँ सदा सहमति स्वीकार लेना इतना ही सहज होता है क्या? मैंने सोचा और प्लेट में रखे प्लास्टिक के छोटे से फोर्क से मैगी खाने लगी। मैगी से जुड़ी यादें कसक बढाने लगीं।कुछ गीत, कुछ बातें, कुछ महक, कुछ व्यंजन, कुछ स्मृतियों का अनुबंध यूँ दृढ़ हो जाता है कि उनका पृथक अस्तित्व अधूरा महसूस होता है। पल बीत जाने पर भी वह प्रेम के स्वाभाविक उद्दीपक बन जाते हैं। जाने कभी पावलाव ने इन पर प्रयोग किए या नहीं। किए भी होंगे तो प्रेम में निरीह मनुष्य सीख ही लेता है कला, अनुक्रिया नियंत्रित करने की, जबकि सत्य यह है कि प्रेम के संदर्भ में अनुक्रिया का विलोप असंभव ही रहता है।
“मैडम जी चलें। आप तो खाए ही नहीं। चाय भी ठंडा हुआ। दूसरा बनवा दूँ ?” 
“नहीं-नहीं अभी मन भी नहीं है। चलते हैं।” मैंने उठकर पर्स से पैसे निकाल स्टॉल की महिला की ओर बढ़ाए। 
“हो गया।” वह हँसी और जीतू की तरफ संकेत किया
“अरे नहीं, नहीं, उसके वापस कर दीजिए यह रखिए।”
लेकिन उसने सुना ही नहीं और मोमोज़् बनाने में व्यस्त हो गई। मैंने असमंजस में पैसे जीतू की तरफ़ बढ़ाए। वह कार का दरवाज़ा खोलता हुआ बोला-
“बैठिए मैडम जी!”
“तुम मुझसे छोटे हो तुम से कैसे ले सकती हूँ?”
“मैडम जी, अगली बार आप सर जी के साथ आना तभी मैं ले लूँगा।” अपनी बात कह स्वयं ही हँस लेना जीतू की आदत में शुमार है। उसकी निर्मल हँसी पूरी कार में भर गई।
फिर वही स्वर गूँज उठा, ‘जाने क्यों हम हँसने के लिए भी अन्यों की प्रतिक्रिया  तलाशते हैं और रोने को एकांत, जबकि रोने को एक कंधा सुलभ होना चाहिए और हँसी अकेले में भी स्थगित नहीं की जानी चाहिए!’
लगातार बारिश से ठण्ड अब जोर पकड़ रही थी। मैंने हैंडबैग से शाल निकाल कंधे पर फैला लिया। जीतू ने कार का वार्मर चला दिया। कलिम्पोंग पहुँचते हुए एक बज चुका था। होटल पर मुझे छोड़ कर वह बोला,
“मैडम जी दो घंटे बाद आता हूँ।”
“नहीं आज मुझे कहीं नहीं जाना। कल सुबह ही आना।” 
मैंने कार में बिखरी उसकी मुस्कान से कुछ कण उठा अपने होठों पर सजा लिए
जरूरत हो तो फोन करना मेरे को आप। मैं थर्टी मिनिट्स में ही आ जाएगा, मैडम जी।” वह इंजन स्टार्ट  करता हुआ बोला।
जीतू की उन्मुक्त हँसी की जगह अब व्यावसायिक अदब ओढ़े होटल के स्टाफ ने ले लीरिसेप्शन पर औपचारिकता पूरी करके मैंने आई. डी. पर्स में रख ली जूही की रंगत लिए यौवना ने गुलाबी मुस्कान के साथ कहा, “लंच टाइम तीन बजे तक है मैम।”
एक निर्देश को मुस्कान की पैरहन पहना, विनय का रूप दे देना ही हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की विशेषता है
“मैं रूम में ही आर्डर करना चाहूँगी।” मैंने स्पष्ट किया
“जी, आप ०६ पर कॉल कर दीजिएगा।”
वही औपचारिक मुस्कान जैसे कोई एल. ई. डी. बल्ब… स्विच दबाया, उजास फ़ैल गया… ऑफ किया तो बल्ब के अस्तित्व का अहसास तक नहीं होताऔर जीतू की मुस्कान जैसे अँधेरी रात में जलता कोई घी का दीपक! बुझ भी जाएगा तो उसके अस्तित्व की सुगंध देर तक वातावरण में तैरती रहेगी। होटल के स्टाफ के पीछे-पीछे चलते मैं अपने कमरे तक पहुँच चुकी थी। चारों ओर पहाड़ियों से घिरा यह रिजॉर्ट तन-मन की थकान मिटाने को उपयुक्त चयन था। नहाने के लिए गर्म पानी टब में भर ही रही थी कि माँ का फोन आ गया।
“पहुँच गई सकुशल? कोई दिक्कत तो नहीं? खाना खाया?”
वही प्रश्न जो दुनिया की हर माँ अपने दूर गए बच्चे से करती है और फिर वही बात जो पिछले एक महीने में अनगिनत बार कह चुकी है। 
“दिल्ली की नौकरी छोड़ इतनी दूर जाने का क्या औचित्य है…?”
माँ को कैसे समझाती कि विगत का बोझ मन पर लादे अब और नहीं भागा जाता। शरीर थकने लगा है। गरम पानी की तपन से कसाव कुछ ढीला हुआ। जींस-टॉप पहनी, उधर कॉफी के लिए पानी गर्म होने रखाड्रायर से बाल सुखाते शाम के चार बज चुके थे।
कमरे का एकांत अपनी गिरफ्त में लेने लगा तो जैकेट उठा होटल के बाहर निकल आई जानती थी कैक्टस गार्डन यहाँ से पास ही है। किसी के पास लौटने की चाह हमें उस हर जगह खींच ले जाती हैं, जहाँ से हम कभी साथ गुजरें हों। सोचा पैदल ही चली जाऊँगी लेकिन बाहर गेट पर ही जीतू मिल गया। वहाँ पहुँचे तो वह बंद हो चला था लेकिन बाहर दरवाजे पर खड़ी महिला ने टिकट दे दिया कैक्टस की कितनी प्रजातियाँ यहाँ हैं। अभीक के साथ जब पहली बार यहाँ आई तब देख कर चौंक पड़ी थी।
“काँटों को उगाने के लिए इतना श्रम!”
वह ठहर गया था। बोला था,  “जब जीवन से प्रेम की नमी लुप्त होने लगती है तब कतरा-कतरा सहेजने को काँटा बन जाना पड़ता है। कभी काँटों में फूल नहीं खिलते देखे तुमने?”
तब मन सुख से भरा था। कहाँ समझ पाती थी उसकी बातें जब नमी खो गई, तब काँटों से प्रेम हुआ
होटल वापस आने पर काफी का मग ले बालकनी में बैठी रही। दूर गुलमोहर के बड़े पेड़ पर एक बादल लटका हुआ था। बादलों के होने से साँझ जल्द ही गहराने लगी थी। अदृश्य सूरज की लालिमा ज़रूर बादलों के पीछे से यूँ झाँक रही थी जैसे किसी बंगाली सुंदरी के घने काले बालों के बीच दुर्गा पूजा के लिए लगाया गया सुर्ख सिंदूर। इस लालिमा के श्यामल हो जाने तक मौन से संवाद करती रही। समय देखा नौ के ऊपर हो चला था 
यहाँ माँ तो थी नहीं कि भोजन के लिए मनुहार करेगी। कमरे के अकेलेपन को वहीं लॉक करके डाइनिंग रूम में आ गई पर्वतीय इलाकों में बने होटलों में काफी चढ़ाई-उतराई हो ही जाती है, न चाहते हुए भी। अनजान लोगों की भीड़ में खाना खाते हुए अधिक अकेलापन महसूस हुआ। डायनिंग हॉल के बाहर से दिखती पहाड़ियों पर छोटे-छोटे तारों से चमकते घर और तारीकाविहीन अधवान्त आकाश। एक तारा मुझे अतीत में खींच ले गया।
***
दिल्ली में जून की गर्मियों की यह एक उमस भरी सुबह थी जब भारतीय आर्मी की 27-माउंटेन डिवीजन में मेजर-जनरल विक्रांत शर्मा अपनी प्यारी भांजी को दिल्ली से लौटते हुए साथ लिवा लाए थे मम्मी और मामा की आँखों में गुप्त संदेशों को पूर्णतः डिकोड न कर पाने के बाद भी कुछ संशय मन में उपजने पर भी मैं सहर्ष इसलिए चली आई थी क्योंकि  भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके की खूबसूरती और रहस्यमयी हवा मुझे सदा रोमांचित किया करती है।
अगली ही शाम ऑफिस क्लब की वीकेंड पार्टी के लिए मामी ने मुझे लाड़ से सजाया और गहरे मरून, ऑफ शोल्डर गाउन के साथ मामी के डायमंड डैंगलर्स पहन मैंने खुद को 6 फुट 3 इंच लंबे कैप्टन अभिजय के साथ ‘अगर तुम साथ दो’ पर थिरकते पाया। अभिजय के कंधे पर हाथ रख जाने क्यों मेरी नज़र एक अनजान चेहरे पर ठहर जाती थी या फिर उस अनजान चेहरे की निगाहें मेरे चेहरे पर अनवरत टिकी थीं। 5 फुट 3 इंच की मेरी हाइट और चार इंच की हिल्स के बावजूद भी अभिजय की ऊँचाई से आँखेंं मिलाए रखना मेरे लिए सहज न था। कुछ चेहरों का ओज ऐसा होता है कि उनके प्रकाश में आपके अँधियारे और मुखर हो जाते हैं। 
“ही इज द मोस्ट वांटेड बैचलर हेयर!” मामी ने फुसफुसाया था 
भीतर एक डर ने करवट बदली और मन जागृत हो बैठा। अक्सर होता है मेरे साथफिल्म का सबसे प्रसिद्ध गाना नहीं…. बैकग्राउंड में बजा, कोई धीमा गीत दिनों तक लूप में बजता रहता है। मुख्य कलाकार से ज़्यादा कोई सहयोगी कलाकार मेरी नज़र बाँध लेता है। रोशनियों में अँधेरों को तलाशने की यह अनसुलझी विकलता सदा मुझे हैरान किया करती है। मैंने अपना कोना तलाशा। स्वागत एक हाय से हुआ।
“आप ..?”
“हाय अनइम्प्लॉयड अभीक… अभिजय’स चाइल्डहुड फ्रेंड” उसने हाथ बढ़ाया।
“हाय, अनइम्प्लॉयड चेतना! अभिजय’स जस्ट मेड फ्रेंड।” कहते हुए एक बड़ी मुस्कान चेहरे पर स्वतः चली आई।
“यू लुक ब्यूटीफुल व्हाईल डांसिंग।”
“ओहो.. रियली?” एकांत तलाशते मिलने वाली प्रशंसा असहज कर रही थी।
“लेकिन एकांत में बैठ प्रकृति की धुन पर ब्रह्मांड का नृत्य महसूस करती हुई किसी साधिका-सी लगती हो।”
मेरा चेहरा सफेद पड़ गया। कोई आपको अनावृत कर भीतर तक झाँक ले, यह एक बड़ी आपदा की आहट प्रतीत होती है।
“सी यू ..बाय!”
ग्लास में बची शैम्पेन को एक घूँट में खत्म करते हुए मैंने कहा। वापस लौटते हुए उसकी आँखों की ऊष्मा पीठ पर महसूस होती रही एक अनकही चाह के विपरीत पदचाप सुनाई नहीं दिए।
अगली सुबह अभिजय को ब्रेकफास्ट टेबल पर देख कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मुझे देख वह खड़ा हुआ और मेरे लिए चेयर खींची।
‘ट्रू जेंटलमैन…’ मैंने सोचा और शुक्रिया कहते हुए एक पूरी नज़र उस पर डाली। व्हाईट टी-शर्ट और ब्लू जीन्स में वह दिलकश दिख रहा था। वह मेरे बिल्कुल सामने बैठ गया और जाने क्यों मैंने हाथ बढ़ा कर उसके गीले बालों को छू लेना चाहा। दिन की उजली रोशनी में  चोरी से उसे देखा और पाया कि उसकी चंचल निगाहें मुझे अपनी ज़द में लिए हैं तब अनचाहे ही खुद पर गुमान हो उठा। उसकी तिरछी मुस्कान कह रही थी, ‘ यू कांट एस्केप माय चार्म।’
“चुप चुप बैठे हो ज़रूर कोई बात है….. ” यह मामा का सुरीला स्वर था।
“लेट मी इंट्रोडयूज़ यू बोथ अगेन।”
“अभिजय …. चेतना।”
“चेतना…. अभिजय।”
“मामा….” मैंने उन्हें आँखें दिखाईं।
“दो यंग बच्चे ऐसे चुप बैठते हैं क्या? जाओ दोस्तों के साथ घूमो फिरो।” 
“अभिजय… प्लान अ नाइस डे फ़ॉर हर। चेतना को खुश रखना अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी।”
“यस सर… ” वह सैल्यूट करता खड़ा हो गया। एक हँसी की लहर से कमरा जगमगा गया।
अगले कुछ दिन अभिजय और उसके दोस्तों के साथ   पैराग्लाइडिंग, राफ्टिंग और ट्रेकिंग करते बीते। शामें अधिकतर हमारी अकेले की होतीं।
वह वीकेंड पार्टी थी। अभिजय एक फोन सुनने बाहर गया था और मैं अभिजय के जोक्स पर हँसते, भीग चली आँखों को पोंछ रही थी जब अभीक मेरे पास आया और बोला- 
“यू डोंट लव हिम।”
“एक्सक्यूज़ मी!” मेरा चौंकना स्वाभाविक था। मेरी नज़रें उसके चेहरे पर गड़ी थीं। साधारण कद-काठी, साधारण रंग-रूप, कुछ असाधारण है तो बस पल-पल पड़ताल करती गहरी आँखें जो जब मुझपर टिक जाती हैं तो मेरी नज़रों को भी अनजाने बाँध  लेती हैं।
“तुम अभिजय से प्यार नहीं करती।” उसकी आँखें भी मेरे चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं।
“जल्द ही हमारी सगाई की अनाउंसमेंट होने वाली है।” मैंने सफेद झूठ बोला।
“यह खबर सबसे पहले अपनी निगाहों को सुनाइए। वे जाने क्यों मुझे खोजा करती हैं।” वह इत्मीनान से कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।मैं उसकी इस धृष्टता से तिलमिला गई थी।
“तुम्हें नहीं खोजा करतीं… बल्कि यह खोजती हैं कि तुम मुझमें क्या खोजा करते हो।” मैंने तल्खी से कहा।
“हम्म… तब तो यह ज़रूरी है कि हम इन निगाहों को कुछ समय दें और इस खोज को किसी मुकाम पर पहुँचाएँ।” चुनौती उसके स्वर में हावी हो गई  थी।
“आर यू असकिंग मी फ़ॉर अ डेट?” मैं उसकी हिम्मत पर हैरान थी।
“नहीं! मैं तुम्हें तुमसे मिलने के लिए कह रहा हूँ। सच से कब तक भागोगी?”
‘उफ्फ! जटिलताओं के बिना प्रेम सम्भव क्यों नहीं हो पाता?” मैंने मन में सोचा।
“एक्सक्यूज़ मी!” मैंने खड़े होते हुए कहा और सामने से अभिजय को आता देख कुछ निश्चिन्त हुई।
अभिजय की बॉर्डर पोस्टिंग आ चुकी थी। सब चाहते थे कि उसके जाने से पहले एंगेजमेंट का अनाउंसमेंट कर दिया जाए। उसके पेरेंट्स भी अगले वीकेंड आने वाले थे। मैंने कहा था कि मुझे समय चाहिए। मैं अभी किसी कमिटमेंट के लिए तैयार नहीं थी। सब हैरान थे। मामी ने कहा- 
“यू बोथ मेक अ लवली पेअर। खुश दिखती हो उसके साथ!”
“इंतजार करूँगा।” मेरा माथा चूमते हुए अभिजय ने कहा।
मैं चाह कर भी कोई आश्वासन न दे सकी। सजल नयन उसे अनझिप देखते रहे। आँखों में वही चंचलता.. वही मनोहारी रूप। इससे बेहतर कोई लड़की कुछ पा सकती है क्या?
मैं खुद पर हैरान थी। बस जल्द से जल्द दिल्ली जाना चाहती थी जहाँ दो जोड़ी आँखें मेरी आँखों का पीछा न करें। मैं अभिजय और अभीक से दूर जाना चाहती थी …मैं स्वयं से भी बहुत दूर जाना चाहती थी, पर मामा ने कहा कि अभी गईं तो तुम्हारी माँ जान ले लेगी तुम्हारी। गुस्सा शांत होने दो।
अभीक मिलना चाहता था। अभिजय की अनुपस्थिति में उससे मिलना मुझे अनुचित लग रहा था पर वह सुबह ही आ गया। जाने से पहले अभिजय मिलने आया लेकिन अभीक को देख बिना कुछ कहे ही लौटने लगा।
“सुशांत और प्रिया भी आते होंगे। जाने से पहले सब मिलना चाहते थे।” मैं अपने झूठ पर चकित थी।
“उनसे रात ही मुलाकात हो गई थी। तुम्हें ही बाय कहने आया था।” अभिजय ने दरवाज़े पर ठिठक कर कहा। सलोने मुख पर म्लानता का दोष मुझे था।
अगले दिन मैं अभीक के साथ एक अनजान सफर पर थी। मैंने ‘हाँ’ कब कहा था, पर इनकार भी तो नहीं किया था। गाड़ी एक कच्चे रास्ते पर उतर चली थी। उसने गाड़ी पार्क की। एक पथरीले रास्ते को पार कर हम नदी के किनारे पहुँचे।
“रँगीत और तीस्ता … दो प्रेमियों का मिलनस्थल है यह लवर्स पॉइंट।” उसने संगम की ओर इशारा करते हुए कहा।
“रंग देखो दोनों के अलग … स्वभाव भी।” निगाहें अभी भी नदी के जल पर ही टिकी थीं।
“तुम्हारा और मेरा स्वभाव तो मिलता है … रंग भी।” मैंने मुस्कराने का प्रयास किया।
मेरी मुस्कान उसके लबों को न छू सकी। लगा कोई नितांत अपरिचित सामने खड़ा है।
“जानती हो खेल-खेल में यह दोनों मैयल लियांग से मैदानों की ओर बह निकले थे। तीस्ता तब रोगनयु कहलाती थी। रँगीत को रोगनयु का रेस जीत जाना रास नहीं आया। पुरुष अहम आहत हुआ। वह चिल्लाया…. तीस सी ता ?( तुम कब आईं?)…और वापस लौट चला।”
यह कहानी कैसे हमारे उलझे समीकरणों को सुलझा सकती थी मेरे लिए समझना संभव नहीं हुआ।
“तब तीस्ता ने मनुहार की… मनाया और उसे साथ ले, आगे बढ़ी।” अभीक की आवाज़ मुझसे दूर हो रही थी।
“मैं तीस्ता क्यों नहीं बन पाई। सिक्किम आकर मैंने अमरकंटक की कहानी दोहरा दी। बस पात्र बदल गए। नर्मदा, सोनभद्र और जुहिला की कहानी में मैं सोन बन गई न?” मैंने अभीक की आँखों में उत्तर तलाशा एक अटल मौन हमारे मध्य खड़ा रहा। अभीक मेरे लिए अनसुलझी पहेली ही रहेगा सदा। मैं व्यथित हो चली।
“चलो, मुझे पैकिंग भी करनी है। कल की फ्लाइट है।” मैंने उठते हुए कहा।
वह चौंका फिर सम्भलते हुए बोला- “कुछ दिन और नहीं रुक सकती?”
 “नहीं, बस समर वेकेशन के लिए ही तो आई थी।”
“सब कुछ यूँ ही बिखरा छोड़ कर चली जाओगी क्या?”
‘उलझाया किसने?’ कहना चाहा पर अब मौन मेरे पक्ष में था।
“कलिम्पोंग को पहले डलिंगोट कहते थे। लेप्चा में अर्थ हुआ- खेलने की जगह। ग्रीष्मकालीन क्रीड़ा स्थल …. मनबहलाव का स्थान!” उसकी आँखें अब मुझ पर टिकी थीं।
जाने क्यों मुझे लगा यह मुझे लक्षित करके कहा गया है, जबकि सत्य यह था कि खेल विधाता ने खेला था… मैं अनचाहे  मोहरा बन गई थी। घर जाकर ज़िद करके अगले दिन का टिकिट बुक कराया। मना करने पर भी  अभीक एयरपोर्ट तक साथ आया।
“वो प्रेम ही क्या जो अपना अधिकार न जता पाए चेतना। प्रेम सदा त्याग ही नहीं माँगता कभी-कभी संघर्ष भी माँगता है।”
प्रेम का यह त्रिकोण पाइथोगोरस थ्योरी से भी अनसुलझा  रहा। मैं स्वयं से  लड़ती रही। नर्मदा की तरह चिरकुंवारी होने का प्रण न भी करने के बाद कभी किसी से फिर मन बँध नहीं पाया। मैं अपराधबोध से उभर न सकी। फाइट , फ्लाइट, फ्राइट में से फ्लाइट को चुन, मैंने नया नम्बर लिया और वह सिम तोड़ डाली। साथ चलने का प्रयास करते तीन जीवन, तीन भिन्न दिशाओं में चल पड़े थे। हमारे रास्ते फिर कभी नहीं टकराए।  रिटायरमेंट के बाद मामा  नोएडा आ चुके थे। उनसे पता चला अभीक की कोई खबर नहीं है। मन में कुछ डूबा।
“और अभिजय ? वह कैसा है?” जिक्र छिड़ा तो डरते- डरते पूछ डाला।
” तीन साल पहले शादी की उसने। एक बेटी है गोलू-मोलू सी। इंतजार किया तुम्हारे उत्तर का उसने! पर तुमने संवाद का कोई मार्ग नहीं छोड़ा था। इट वाज़ वाइस टू मूव ऑन।”
“यस, यस। इट वाज़… आई एम हैप्पी फॉर हिम।”
“तुम भी आगे बढ़ो।” वह स्नेह से मेरा कंधा थपथपाते बोले।
 “आई नीड योर हेल्प मामा!” मैं  थक चुकी थी।
“सदा तुम्हारे साथ हूँ मेरी बच्ची।” वे मेरा माथा चूमते बोले।
***
 डेलो और दूरबीन पहाड़ियों को जोड़ती हुए रिज़ पर बसा कलिम्पोंग, सिक्किम से तीस्ता नदी द्वारा विभक्त हो जाता है। आज इस नदी के एक ओर मैं विगत की यादें समेट रही हूँ और कल तीस्ता के उस ओर अपने भविष्य के उत्तरों की तलाश में भटकूँगी।
सुबह सुशांत और प्रिया आए। उनकी दुनिया मे जल्द ही एक नन्हा फरिश्ता आने वाला था। इन पाँच सालों में कितना कुछ बदल गया था। उनसे भी कोई सम्पर्क नहीं था अभीक का। सुशांत ने अभिजय को फोन मिलाया। अभिजय ने आगे कई और फोन… पता चला कि चार महीने पहले आख़िरी बार जब बात हुई तब वह ज़ोंगू के लिए निकल रहा था।
‘ज़ोंगू …स्वर्ग का द्वार!’ मैंने याद किया।
मुझे कल मणिपाल यूनिवर्सिटी के  ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस विभाग में जॉइनिंग लेनी थी। इसके बाद ज़ोंगू निकलना तय हुआ। सुशांत और प्रिया साथ आना चाहते थे लेकिन प्रिया की अवस्था देखते हुए मैंने इनकार कर दिया।
जीतू आ चुका था। सुशांत और प्रिया के साथ नाश्ता कर, मैं भी आगे के सफर की ओर चल दी। जब  सफर शुरू किया हल्की धूप खिली थी लेकिन अब सड़क के किनारे बहता बारिश का पानी जीप से रेस लगा रहा था। तेज हवा के साथ बारिश की बूँदें मुझे भिगा रही थीं। सड़क के किनारें लगे बड़े झंडे  दरचोग और यहाँ- वहाँ बँधी रंग-बिरंगी झंडिया ‘लूंगा- ता’ पर लिखी प्रार्थनाओं को छू कर आती  हवा में काश मेरी भी प्रार्थना सम्मिलित हो जाती। तीस्ता अब फिर मेरी हमसफ़र थी। किसी मोड़  पर साथ छूटता तो किसी मोड़ पर पुनः हाथ थाम लेती। उसकी उदासी और गहरा चुकी थी। नदी की उदासी अब मैं पहचानती थी। अभीक ने पूछने पर नहीं बताया था फिर कुछ दिन बाद स्वयं ही तीस्ता के किनारे बताया था।
“चेतना, सिक्किम में कई जल विद्युत बाँध बनाए जा चुके हैं। नदी की प्रवृत्ति है बहना, उसे रोकना विनाश लाएगा। नदी रुकेगी तो जीवन रुक जाएगा। ‘रन ऑफ द रिवर’ के नाम पर नदी को रोका जा रहा है। उसका मार्ग बदला जा रहा है। तुम जानती हो हिमालय नवजात शिशु है। सबसे कम उम्र का पहाड़; कोमल गात लिए! यह निर्माण गतिविधियाँ नहीं सह सकता। यहाँ मानसून में भी लैंडस्लाइड हो जाते हैं। यह मनुष्यों का हस्तक्षेप नहीं सह सकते। पहले की परियोजनाओं ने धोखा दिया है…. नदी कितनी ही जगह सिकुड़ गई। जहाँ पानी को रोका गया वहाँ के घर डूब गए। तुम देखना किसी दिन नदी लौटेगी। अपनी ज़मीन वापस माँगेगी।”
अल्पभाषी अभीक आज अनवरत बोलता था। मैं अपने मन की उम्र का आकलन कर रही थी। जानना चाहती थी कि वह सम्पूर्ण मृत्यु से पहले कितने आघात सह सकता है।
“हम तुम सिक्किम नहीं बनाते चेतना।  सिक्किम है लेपचाओ से… वे लेपचा जो कंजनजंगा की संतानें हैं। वे लेपचा जिनकी गर्भनाल माँ से नहीं प्रकृति से जुड़ी है। इस नाल को काटा तो माँ और बच्चे कोई नहीं बचेंगे।”
यह अभीक नितांत नया था मेरे लिए। अपरिचय की दीवार अचानक कहाँ से आ गई? मैं यहाँ बस पर्यटक थी। लेपचा और कंचनजंगा के दुख से निर्लिप्त मैं चिंतित थी तो अपने मन के द्वंद्व के लिए। अभीक की ये बातें मेरे भविष्य को कोई दिशा नहीं देती। अभिजय जा चुका था। वापस आ सकता था पर पुकारने की चाह नहीं थी। अभीक सामने था पर उसके साथ जीवन की कोई आश्वस्ति नहीं दिखती। न वह कोई आश्वासन देता है। मैं अभिजय की ओर बह रही थी। अभीक ने मुझे बाँध दिया। मेरी राह मोड़ दी। अब मैं अपने भीतर सिकुड़ रही थी। आनन्द की लहरों पर बहती मछलियाँ तड़प उठी थीं… दम तोड़ रही थीं।
अभीक अभी भी बोल रहा था,”यूनेस्को ने कंचनजंगा बायोस्फीयर रिजर्व में शामिल किया है लेकिन हम स्वयं क्या कर रहे हैं। हम देश की रक्षा के लिए पड़ोसी देशों से लड़ सकते हैं पर अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए अपने ही देश मे नहीं लड़ सकते।” वह निश्चित ही मुझसे नहीं कह रहा था। स्वयं को ललकार रहा था। मुझसे कहा भी हो तो मैंने सुना कब था। सुना भी हो तो यह सब सुनना तो नहीं ही चाहा था। जो सुनना था वह अनकहा ही रहा था। थकान उसके स्वर पर हावी होने लगी। मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला- “चलो चलें।”
मैं एक बार उसकी आँखों में झाँक परिचय के अवशेष तलाशना चाहती थी।
***
कार आगे बढ़ रही थी। मन पीछे। पाँच साल कम होते है क्या? चाहता तो ढूँढ़ सकता था। मामा से भी पूछ सकता था। नम्बर ही बदला था मैंने… शहर तो नहीं, घर तो नहीं। क्यों जा रही हूँ मैं? किस भरोसे पर?सेवन सिस्टर फाल्स पर जीतू ने गाड़ी रोकी। मेरी अरुचि पर वह चकित था। उसे कैसे समझाती कि अभी हर पल मेरे लिए कीमती है। उसकी मायूसी देखते मैंने कहा, “लौटते हुए रुकेंगे।”
 कार आगे बढ़ चली।। रास्ते की खूबसूरती मन का संताप हर ले रही थी। कुछ ठंडी हवाओं और कुछ भीगी स्मृतियों के मिले-जुले असर से रास्ते भर उनींदापन छाया रहा। नींद तब टूटी जब जीतू ज़ोंगू चेक पोस्ट पर परमिट दिखाने के लिए रुका और कार के आगे बढ़ने के साथ एक बार फिर मेरे मन का विचलन बढ़ा और साथ ही सड़क किनारे होर्डिंग्स भी। छोटे छोटे समूह पोस्टर लिए नारे लगाते हमें क्रॉस करते जाते।
 
“पानी है…रोको मत… बहने दो।”
“एक नदी पर कितने बाँध …. और न बाँधो  इसके पाँव।”
जीतू से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। वह खुद ही बताने लगा-
“जल विद्युत परियोजना के लिए बाँध का निर्माण ज़ोंगू में प्रस्तावित है जिसका आदिवासी विरोध कर रहे हैं। लेपचा भूख हड़ताल पर बैठे हैं और सरकार उनके खिलाफ कार्यवाही की चेतावनी दे रही है। मैडम जी जंगल लेपचाओं का ही है न। सरकार छीन ले रही है। अपनी मिट्टी से कौन प्रेम नहीं करता? आप बोलो।”
कहा था न, ‘प्रेम सदा त्याग ही नहीं माँगता कभी- कभी संघर्ष भी माँगता है।’ मैंने याद किया। वह अपने प्रेम के लिए संघर्ष कर रहा होगा और मुझे अपने प्रेम के लिए करना पड़ रहा है। पर मंज़िल कैसे मिलेगी? 
“मन अपनी मंज़िल पा ले तो हवा में छोड़ देना उत्तर। यहाँ हवा को भी पढ़ना आता है।” एयरपोर्ट पर मेरा बैग ट्रॉली पर रखते, उसने कहा था। 
मैंने अपना दुपट्टा उतारा। पर्स से मार्कर निकाल उस पर लिखा-
‘एक पत्र हवाओं के नाम… अभीक तुम कहाँ हो?’ और दुपट्टा खिड़की के बाहर लटका दिया।
ज़ोंगू में मेरे रहने की व्यवस्था सुशांत ने पहले ही पासिंगडन में (Passingdang) लेपचा होमस्टे में करा दी थी। मील का एक पत्थर कह रहा था ‘हैप्पीनेस – जीरो किलोमीटर’ क्या सच ही भाग्य मेरे पक्ष में है? चारों ओर हरियाली और पहाड़ों से घिरे  लकड़ियों से बने खूबसूरत घर किसी देवालय जैसे लगते हैं। मेरे मेज़बान अधेड़ उम्र के जिंदादिल युगल थे। प्रकृति यहाँ इस कदर अनछुई है कि मुझे लगा मैं जन्नत में  हूँ। ज़ोंगू को यूँ ही तो स्वर्ग का द्वार नहीं कहा जाता। बैम्बू का बना जरूर ही कोई अदृश्य पुल मैयल लियांग(ईश्वर की नगरी) को जाता ही होगा।
बादलों की छोटी बड़ी चादरें हवा में तैर रही हैं। इलायची की खुशबू हवाओं संग तरंगित होती है। पंछियों के स्वर पर तितलियाँ नृत्यरत हैं। चार घन्टे के सफर की थकान चार पल में उतर गई। जीतू ने कार से निकाल कर मेरा बैग कमरे में पहुँचा दिया। हवाओं के नाम दुपट्टा मैंने वहीं केले के झुरमुट में बँधवा दिया।
“हवाओं ने सन्देस अब तक पढ़ लिया होगा। ” जीतू ने उसका फ़ोटो क्लिक करते हुए कहा। 
“ग्रुप में डाल देता हूँ। मैम जी।” स्वर में आस की उमंग थी।
वेजिटेबल सूप  परोसते हुए ग्यात्सो ने बताया कि उनके पिता तेनजिंग से यह होमस्टे ही नहीं कंचनजंघा और ज़ोंगू को बचाने का संघर्ष भी उन्हें विरासत में मिला है। यह बड़ी सांत्वना है कि ग्यात्सो अभीक से मिले हैं। वह दो महीने पहले तक यहीं था। उन्होनें आश्वासन दिया कि वे अफ़ेक्टिड सिटिज़ेन्स ऑफ़ तीस्ता (एसीटी) के सदस्यों से पता लगाने का प्रयास करेंगे।
सूर्योदय, पंछियों के कलरव और निर्झर बहते झरनों के मधुर संगीत के साथ हुआ । ग्यात्सो चाहते हैं कि मैं थोलिंग मोनेस्ट्री जाऊँ। सौ साल पुरानी इस मोनेस्ट्री में क्या अभीष्ट प्राप्ति होगी? ग्यात्सो ने तेजी को मेरे साथ भेजा है। वह टूटी-फूटी हिंदी और अंग्रेजी बोल लेता है। लोहे के पुल को पार करते हुए हवाओं ने पुकारा-
 “चेतना!”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। अभीक दौड़ता हुआ आ रहा था। पास आ, हाँफता हुआ बोला- “तीस- सी- ता? मुझे तो लगा कि तुम्हें सदा के लिए खो चुका हूँ।” उत्तर देने को, कंठ अवरुद्ध था। आँसू बहने को आतुर हो चले पर साथ चल रहे तेजी की उपस्थिति के कारण उन्हें रोके रखना ज़रूरी था।
“पानी है… मत रोको , बहने दो!” वह बाँहों में भरता हुआ बोला।
“मेरे प्रेमी को रास्ते से हटा तुमने अपना रास्ता ही बदल लिया।” आँसुओ के बीच हँसी ने अपनी राह तलाशी।
“मन किसी और पर आ गया। क्या करता?” बेचारगी से भरा स्वर उसे बहुत दूर ले गया पर जल्द ही वह लौटा और मेरी आँखों में झाँकता हुआ बोला,
“उसकी सुंदरता से जलोगी तो नहीं?”
 
“नहीं, उसके चिर यौवन की दुआ करूँगी। “मैंने उसके कंधे पर सिर टिकाते हुए कहा।
मैं नहीं जानती कि यह लड़ाई कितनी लंबी चलेगी और जीत किसकी होगी लेकिन मैं यह समझ चुकी हूँ कि प्रेम का अर्थ मंज़िल पर पहुँचना नहीं, विषम राहों पर भी साथ बने रहना है।
डॉ निधि अग्रवाल
डॉ निधि अग्रवाल
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) में जन्म।वर्तमान में चिकित्सक के रूप में झाँसी में (उत्तर प्रदेश) कार्यरत। प्रथम कहानी- संग्रह 'अपेक्षाओं के बियाबान' विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन प्रथम काव्य संग्रह 'अनुरणन' प्रकाशनाधीन। संपर्क : ई-मेल: nidhiagarwal510@gmail.com 6386202712
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