बात कभी ऐसे क्षण में सामने आती है कि आदमी जैसे गूंगा हो जाता है | उसके मुख से शब्द ही नहीं निकलते | यूँ तो जी जीने में हज़ार किल्ल्तें हैं ,कौन पूरे होशो-हवास में अपने दिल की कली खोल फूल की सुगंध से सबको परिचित कराता है| कुछ न कुछ छिपा ही तो जाता है आदमी ! 

उसे लगता था रमेश शर्मा उसके बहुत अच्छे,बहुत क़रीबी मित्र हैं | देखा जाय तो क़रीबी थे भी किन्तु उसकी किसी और से मित्रता देखकर उनका मन-मयूर नाचने की जगह अपने पँख फड़फड़ाकर निढालहो जाता था | 

तो डॉ.साहब क्या मामला है ? आज फिर बॉस  के साथ चैंबर में नाश्ते का प्रोग्राम है क्या ?” बॉस यानि व्यंग्यात्मक लहज़े में शर्मा

इंस्टीट्यूट में सब एक-दूसरे के अच्छे मित्र थे और डॉ. मधु वर्मा के सब ही स्नेही थे पर रमेश शर्मा जाने क्यों समीर अस्थाना से हमेशा ही चिड़े रहते | मधु के समीर अस्थाना के साथ कई प्रोजेक्ट्स होते और उसका काफ़ी समय अस्थाना के साथ व्यतीत होता | खुले दिल का आदमी था  वह और बला का कॉन्फिडेंस था बंदे में ! उसके साथ काम करना सबको अच्छा लगता |  

यूँ आदमी तो इंटैलिजेंट है शर्मा पर इनफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स से मार खा गया –” समीर जब भी उसके साथ होता, ज़रूर कहता | फिर चुहल की चींटियाँ उसके दिमाग़ में सुरसुराने लगतीं |  

तो आज नाश्ता शर्मा के साथ करना है अपने चैंबर में या फिर यहाँ  मंगवा लिया जाए ?” 

समीर का घर  कैम्पस में ही था ,वह हर रोज़ दोपहर घर जाता और खाना-वाना खा-पीकर , आराम करके अपने चैंबर में वापिस आता | पर मधु को छेड़े बिना न रहता ,हर दूसरे दिन का मखौल ! 

क्यों ? मालिनी आपका वेट नहीं कर रही होगी ?” मधु चिढ़ते हुए मुस्कुराकर पूछती

सोच रहा हूँ आज यहीं कैंटीन से नाश्ता मंगवा लिया जाए ,मालू को फ़ोन कर दूंगा |” वह मुस्कुराते हुए कहता

 “कोई बकवास नहीं  ,आप जाइए घर ,मुझे पता है आपकी पसंद का खाना लिए वो बेचारी बैठी है | ” 

हूँम — तो मेरे बैरी के साथ बैठने का इरादा है —“वह ठठाकर हँसता और मधु उसकी बात का जवाब दिए बिना मुस्कुराती हुई अपना बैग संभाले उसके चैंबर से बाहर निकल जाती

दोनों आजकल एक नए प्रोजेक्ट पर काम कर  रहे थे तो  दो-चार बार तो मिलना हो ही जाता दिन भर में | समीर अस्थाना का चैंबर इंस्टीट्यूट के काफ़ी अंदर था जबकि मधु का लैंग्वेज डिपार्टमेंटगेट के अंदर बगीचे को पार करते ही था |      

मधु को समीर के साथ कभी कुछ प्वाइंट्स डिस्कस करने तो कभी गप्पों के बहाने उसके चैंबर तक दिन में कई बार जाना होता या वह भी आ जाता |वैसे काम में क्या गप्पें होती नहीं थीं ? समीर अस्थाना हो और वातावरण में चुप्पी —! अविश्वसनीय !

शर्मा इस बात से बहुत चिढ़ता कि भई एक तो अस्थाना वैसे भी अपने डिपार्टमेंट का हैड था और अन्य कई महत्वपूर्ण फैकल्टीज़ में उसे सलाहकार कमेटी में रखा गया था , पूरे इंस्टीट्यूट में उसका दबदबा था | लोग उसकी इंटैलीजैंस और सही निर्णय के क़ायल थे | वह सैल्फ़ -मेड‘, ‘वैल- रैड‘  था और किसी न किसी समय उसकी ज़रुरत सब फैकल्टीज़ को पड़ जाती थी

शर्मा भी यूँ तो वाकई इंटेलीजेंट था पर उसका अधिक समय ताका-झाँकी में लगा रहता | इसका ये हो रहा है ,उसका वो हो रहा है | अरे ! इतना समय किसी क्रिएटिविटी में लगाते  तो अस्थाना से चिढ़ने की ज़रुरत न पड़ती और प्रमोशन के लिए भी किसीसे चिढ़ना न पड़ता | पर   होते हैं न कुछ लोग ऊत खोपड़ी  !         

मधु के चैंबर से जुड़ा हुआ बैनर्जी का  कमरा था जिसका दरवाज़ा वैसे तो पीछे की ओर था किन्तु पीछे घूमकर जाने की जगह बैनर्जी मधु के चैंबर से ही होकर अपने विशाल कमरे में जाते | हाँ,काफ़ी बड़ा कमरा दिया गया था उन्हें | इंस्टीट्यूट के सारे अंग्रेज़ी के काम करने के लिए उनके पास ख़ासा स्टॉफ़ था ,जिनकी मेज़ें उनके हॉलनुमा कमरे में लगा दी गईं थीं

कई बार मधु सोचती वैसे हम राजभाषा की,राष्ट्र भाषा की बातें करते हैं और वैसे हिंदी के लिए स्टॉफ़ से लेकर जगह भी कम और शुरू शुरू के दिनों में लोग  पीछे से उसे ओ ! दैट साड़ी वाली बहन जीपुकारते जैसे वह  कोई अजूबा  हो | वो अलग बात थी कि मधु पर इस बात का कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ा  ,शुरू-शुरू में कुछ अजीब सा लगा था लेकिन उस पर कुछ ही दिनों में बुद्धिशालीका ठप्पा लग गया और लोग अंग्रेज़ी व हिंदी भाषा से संबंधित किसी भी समस्या को लेकर उसके पास आने लगे

बैनर्जी बड़े  मज़ेदार व्यक्ति थे | अपनी बाँग्ला  मिश्रित ज़बान में वो जब उससे बात करते ,एक बच्चे की भाँति मासूम लगते

नॉक नॉक —” दरवाज़े के पास आकर वे करते | हिना ,मधु की पी.ए दरवाज़े के ठीक सामने बैठती , सबसे पहले उसका ध्यान ही जाता

मे आई कम-इन मैडम ?” तब तक मधु  का चेहरा भी उठ जाता और वह मुस्कुराकर कहती ,

आप दिन में कितनी बार —-वैसे ही क्यों नहीं चले जाते आप इधर से —?”

नो –नो ,बैड मैनर्स —-“अपना हाथ हास्यास्पद मुद्रा में घुमाते ,उसकी मेज़ के पास आकर रुकते ,कुछ सूँघने की कोशिश करते और बड़े नॉटी स्वर में पूछते —

बाई द वे ,मैडम डॉ.श्रीमती मौधु  वर्मा,आज आप स्वीट में क्या लाया हैं ? बहुत अच्छा स्मैल,वेरी स्वीट स्मैल —-” करते हुए आगे बढ़ जाते

एक ये बैनर्जी ही थे जो हर बार  मैडम डॉ. श्रीमती मौधु वर्मा कहकर उसे पुकारते | कई बार वह सोचती भी कि इतने बड़े इंस्टीट्यूट में जहाँ उसे सब केवल मधु के नाम से पुकारते हैं वहाँ ये मि. बैनर्जी —-कमाल के बंदे थे ! उन्होंने उसके द्वारा बनाई गई एक रैसिपी का नाम ही डॉ.श्रीमती मौधु वर्मा स्वीटसे जैसे पेटेंट कर दिया था | उसकी बनाई हुई मिठाई खाकर वो अक़्सर अपनी पत्नी का ज़िक्र करना न भूलते —

आपको मालूम डॉ. श्रीमती मौधु वर्मा —कौमुदिनी हमेरा स्टमक देखकर बहूत क्रोध कौरता , कहता–एतना खाते हो ,जौल खाबो —अब भई ,जौल से ये हमारा गोल-मटोल स्टमक कैसे भरे?ये हमको तो मालूम नहीं –” और खूब सारी मिठाई मुँह में भर लेते | बेहद शौकीन मिठाई के !           इंस्टीट्यूट का पूरा माहौल बेहद खुला हुआ और खुशनुमा था |विदेशी छात्रों की भीड़ लगी रहती डिज़ाइनिंग की विभिन्न कक्षाओं में प्रवेश लेने के लिए शर्मा जैसे लोग अपनी खिंचाई करवाते रहते और अस्थाना जैसे लोग कोई न कोई प्वॉइंट ले ही आते शर्मा की या किसी और की खिंचाई करने का |

मधु का चैंबर आम चैंबर्स से कुछ बड़ा था , दो-चार लोग आराम से बैठ सकें | इतनी जगह और काफ़ी  सुविधाजनक व्यवस्था थी उसमें | सब कुछ बहुत सिस्टेमेटिक ! उसकी पी. ए और भी होशियार और  चौकन्नी ! मज़ाल थी किसी डिपार्टमेंट की कोई फ़ाइल वह चूक जाए ! 

चैंबर काँच से बंद था जैसे आम चैंबर्स होते हैं ,पर वहाँ से सड़क पर आने वाली हर सरगर्मी दिखाई देती |समय खाली होने पर इंस्टीट्यूट के चार रास्तों पर से निकलने वाले ट्र्कों का चाल धीमी करके  चौराहे पर खड़े सिपाही की  मुट्ठी में कुछ ठूँसते हुए आगे बढ़ जाना ,वाह ! मधु को दृश्य देखकर मज़ा आ जाता और वह हिना के साथ मिलकर खूब ठहाके लगाती  |  

चैंबर के बाहर ख़ासी खुली हुई जगह थी , ख़ाली समय में वहाँ पड़े हुए मूढ़ों पर बैठकर चाय का लुत्फ़ लिया जाता जो वहाँ प्रतीक्षा करने वालों के लिए रख दिए गए थे | यह एक वरांडा सा था जिसके बाहर भी काफ़ी खुली जगह थी और जहाँ फूलों के खूबसूरत पौधे व बेलें लगी हुई थीं | बाहरी दीवार इंस्टीट्यूट की बाउंड्री-वॉल थी जो कँटीली तारों से ढकी हुई थी, जिसके बारे में कभी -कभी मधु बैनर्जी से कहती कि उसे सड़क पर पटक दिया गया है

हमको देखिए न, डॉ.श्रीमती मौधु वर्मा ,कहाँ पड़े हैं —बीलकूल पीछे ,डस्टबीन का माफ़क —” फिर  ज़ोर से ठठाकर हँसते

लेकिन एक बात है ,हमको वो कौमरा न मिलता तो  बार-बार आपके कौमरे में से आने का बहाना कैईसे होता ?”  

क्या मि.बैनर्जी —आपको बहाने की क्या ज़रुरत है ,वैसे ही आ सकते हैं ! ” 

आप कुछ बातों को नहीं समझेगा —हम तो  एक शौरीफ़ इंसान !” और उधर से मुस्कुराते हुए यह कहते निकल जाते

ओ ! गैटिंग लेट ,आइ हैव ए मीटिंग विद विशाल एट थ्री ,एक्ज़ेक्ट आफ़्टर टी,हैव टू कलैक्ट सम फ़ाइल्स ऑल्सो —” ऐसे ही वो हिंदी में बातें करते-करते अंग्रेज़ी पर उतर आते | इंस्टीट्यूट में सब एक-दूसरे का नाम लेकर बुलाते ,यहाँ तक कि ड्राइवर भी डायरेक्टर का नाम लेता |विशाल कोशी, इंस्टीट्यूट का डायरेक्टर था जो सबकी खाट खड़ी रखता | वैसे सब अपने काम के लिए फ्री थे किन्तु जो जिसका काम था ,उसकी पूरी ज़िम्मेदारी थी उसे पूरा करने की,कोई बहाना न चलता,नहींतो प्रमोशन क्या —इज़्ज़त का भी ज़नाज़ा निकल जाता | शर्मा बेचारा इसी चक्कर  में  गुलाटियाँ खाता रहा था हमेशा

शुरू-शुरू में  मधु को इस प्रकार से नाम लेना बड़ा अजीब लगता ,धीरे-धीरे उसे भी आदत पड़ गई |आदमी अपने वातावरण में घुल-मिल न सके तो अपने को अजनबी ही पाता है|  |

 शर्मा बैनर्जी से भी चिढ़ता ,क्या बकवासबाज़ी करता रहता है ! 

यार ,तुमको ये सब बकवास लोग ही क्यों मिलते हैं ?” वह जब कभी उसके चैंबर के बाहर  मूढ़ों पर बैठकर गप्पें लगाते लोगों को देखता ,ये संवाद ज़रूर फेंकता | मधु इस प्रकार की बातों पर ध्यान न देती तो शर्मा और भी ठिनकने लगता |मधु सोचती ,वह भी तो यहीं बैठकर उसके साथ चाय पीते हुए गप्पें मारता है ,उसका क्या

यह आदमी के चरित्र की बड़ी ख़ासियत है कि वह दूसरों की जिन बातों से चिढ़ता है ,वही बातें जब उसके चरित्र में होती हैं ,उन्हें वह नेग्लेक्ट करता है या उसे अपने चरित्र में वे बातें दिखाई ही  नहीं देतीं या अपने चरित्र में वह उन्हें बड़ी खासियत से दिखाने की कोशिश करता है

अब ऐसे चिड़ंतू आदमी का किया क्या जाए ? ठीक है सच तो यह था कि शर्मा ,अस्थाना और बैनर्जी सभी उसके अच्छे मित्र थे और वे सभी मधु  को मन से रिगार्ड करते थे ,वह तो करती ही थी अपने सभी कुलीग्स का रिगार्ड  |  

मधु में कुछ दिनों से एक नई कमज़ोरी ने जन्म लिया था जो उसके कुलीग्स की समझ से बाहर थी इंस्टीट्यूट में आकर वह कम से कम दिन भर में दो -तीन बार तो घर पर फ़ोन करके किसी  शैली की ख़बर पूछने लगी थी | शैली ने खाना खाया ? शैली खेली ? शैली उदास तो नहीं थी?अरे ! शैली को उलटी हो गई ? डॉक्टर के पास ले गए ? हल्का खाना देना

जब भी मधु ख़ाली होती अपने घर में पूरे दिन रहने वाले सेवक रामजी से ज़रूर बात करती | कुलीग्स के लिए जैसे कोई नया शगूफ़ा शुरू हो गया था | मधु के बच्चे तो बड़े हो चुके थे ,दोनों बाहर हॉस्टल में पढ़ते | मधु व मि. वर्मा के काम पर निकल जाने के बाद घर में खाना बनाने वाली सरिता भी चली जाती | दिन भर अकेले रह जाते रामजी और मि. वर्मा की सत्तर वर्षीया माँ | फिर ये ऐसा कौन शैली नाम का प्राणी परिवार में सम्मिलित हो गया था जिसके बारे में मधु इतना कंसर्न थी | इतनी बार तो किसीने उसे अपनी सास के बारे में भी पूछताछ करते हुए नहीं देखा था | वो अलग बात थी कि इस उम्र में वे खूब स्वस्थ व व्यस्त रहती थीं | कभी ज़रुरत पड़ती उनका ही फ़ोन आ जाता| कहीं परिवार में कोई बच्ची गोद  तो नहीं ले ली गई ? जितने मन ,उतनी अटकलें !  

एक-दूसरे के प्रति मन में ख़राश रखने वाले भी आपस में खुसर-फुसर करने लगे थे | आख़िर ये शैली है कौन ? सब कुलीग्स उसके परिवार के सभी सदस्यों से भली-भाँति परिचित थे फिर ये नया सदस्य कहाँ से आ गया था ?जब-जब मधु से शैली के बारे में पूछा गया ,मधु ने मुस्कुराकर चुप्पी साध ली | वैसे भी अस्थाना का स्वभाव नहीं था किसीके बारे में अधिक उधेड़बुन करने का | उसने एकाध बार पूछा ,जब उसे उत्तर नहीं मिला उसने लैट गोकिया |जब मूड होगा अपने आप शेयर करेगी ,कुछ इस विचार के साथ !  बैनर्जी ने भी एकाध बार पूछा ;

डॉ. श्रीमती मौधु  वर्मा  ,क्या कोई नया मेंबर घर में आया है ?” 

बैनर्जी बड़े सभ्य पुरुष ,एकदम वैल मैनर्ड ,उनसे मधु को बेरुख़ी से बोलना कभी अच्छा नहीं लगा फिर भी मधु ने मुस्कुराकर उनके सामने भी चुप्पी साध ली थी | उन्होंने भी काम से काम रखना शुरू किया | बस ,एक शर्मा के मन में सबसे अधिक धुकर-पुकर हो रही थी | एक अजीब तरह के कोलाहल से उसका मन भरने लगा | इतने दिनों की दोस्ती और ये मैडम हमसे ही कुछ छिपा रही हैं ! उसे क्रोध भी हो आता ,जबकि क्रोध का कोई मतलब नहीं था | मधु की पी. ए  हिना  से पूछ-परख करने में भी शर्मा ने कोताही नहीं दिखाई

सर ! आप लोगों से मैडम ने कुछ शेयर नहीं किया तो भला मुझसे कैसे —?” और शर्मा उसके पास से भी अनुत्तरित आ गए

साला ,हम शैली न हुए —नहीं तो हमें पता न होता मैडम के मन में क्या चल रहा है ?’ एक दिन मधु के चैंबर के बाहर पड़े मूढ़ों पर बैठे चाय पीते हुए शर्मा बड़बड़ाए ,वो कभी भी कुछ भी कह जाते थे ,बहुत इर्रेलेवेंट ! 

आपने कुछ कहा मि. शर्मा ?” मधु ने भोला सा मुख बनाकर पूछा

नहीं —हम क्या कह सकते हैं मैडम ? हम कोई अस्थाना थोड़े ही हैं जो हमसे आप अपनी सीक्रेट शेयर करेंगी ?” 

हिना  मधु मैडम की ओर देखकर हौले से मुस्कुराई ,बहुत ऊँचे-नीचे हो रहे शर्मा सर ! कुछ इस टोन में ! बला का हुनर है चुप रहने का मधु मैडम में ,अगर बोलना न चाहें तो कोई उनके मुखारविंद से कुछ उगलवा नहीं सकता ! बस,हौले-हौले मुस्कान फेंकती रहेंगी | मज़ाल है जो एक शब्द भी बोल जाएं | वैसे हिना तो उनकी सदा हर बात की राज़दार रहती थी | जो बात वो किसी को न बतातीं ,हिना को वो भी पता होती

उस दिन बहुत सुहाना मौसम हो गया था ,लगभग चार बजे के करीब बादल घिर आए , हवा के शीतल झौंके लहराए और मधु के चैंबर के आगे पड़े सभी मूढ़े  भर गए | मधु का काम ख़त्म हो चुका था ,वह हिना के साथ बाहर आ बैठी ,पीयून चाय ले आया.इंस्टीट्यूट की कैंटीन में गर्मागरम पकौड़े बन रहे थे | अस्थाना आते हुए पकौड़ों का ऑर्डर दे आए | अचानक शर्मा भी पधार गए मि. बैनर्जी का तो रास्ता भी वही था सो वह भी अपने कमरे में जाने की जगह मूढ़ा  सरकाकर महफ़िल में जम गए

आज बड़े दिनों बाद अस्थाना और शर्मा एक जगह इक्क्ठे हुए थे | हर बार की तरह जहाँ अस्थाना का मुखड़ा अपने चुलबुलेपन की नुमाइश कर रहा था वहीं शर्मा के चेहरे पर हमेशा की तरह अजीब सा कुढ़न का भाव पसरा हुआ था | सामने मेज़ पर पकौड़ों की बहार और ख़ुश्बू छा गई ,तरह-तरह के पकौड़े |कैंटीन के कुक बंसीधर का जवाब नहीं था कुरकुरे पकौड़े बनाने में ! पीयून ने सब तरह के पकौड़े सजा दिए और सब कुरकुरे पकौड़ों का आनंद लेने लगे |

बैठक में ठहाके लगते अस्थाना कनखियों से शर्मा का चेहरा पढ़ते जा रहे थे | कोई ऎसी बात न होती जिसका उत्तर शर्मा सीधे मुँह देता | कोई न कोई रिमार्क ! कोई न कोई आक्षेप सामने वाले पर प्रहार करता ही

मोबाइल पर रामजी का फ़ोन था ,इज़ाज़त मांग रहा था शैली को बाहर घुमाकर लाने  की | ठीक है ,मालूम नहीं पड़ा किसीको रामजी ने अपनी मैडम से और क्या कहा पर शैली का नाम सुनते ही मधु का मुख खिले फूल सा हो आया

अब तो बहुत हो गया मधु ,क्या कोई बच्ची गोद  ले ली है?’ शरारती अस्थाना ने पकौड़ों का स्वाद लेती मधु को फिर टहोका दिया | शायद ,उसका मूड आ ही जाए इस शैली नामक चैप्टर से पर्दा उठाने का |

हाय ! हम शैली न हुए ! —“कुढ़ते हुए शर्मा ने बड़बड़ाकर मधु की ओर देखकर एक  लंबी साँस भरी | शर्मा की इस आह और संवाद का मतलब कोई नहीं समझ पा रहा था

मधु और हिना के चेहरे पर मुस्कुराहट झिलमिलाने लगी | तभी गेट से मधु के पास फ़ोन आया ,मधु का सर्वेंट अंदर आना चाहता था | इंस्टीट्यूट की सिक्योरिटी बहुत टाइट थी ,बिना सूचना के और रजिस्टर में हस्ताक्षर किए बिना अंदर किसीके भी आने का सवाल ही नहीं उठता था |सबका ध्यान मधु पर लगा हुआ था ,समझ नहीं पा रहा था कोईआख़िर क्या कॉन्सपिरेसी है?

पाँचेक मिनिट में ही बगीचे के खिले फूलों की क्यारियों के बीच की पगडंडी से एक सायकिल नमूदार हुई जिसकी टोकरी में एक प्यारी सी श्वेत झक्कास पॉमेरेनियन डॉगी पधारी हुई थी

रामजी ने सबको नमस्ते करने के बाद डॉगी को टोकरी से नीचे उतार दिया जो दो-चार फूल के पौधों को कुचलती हुई मधु की तरफ़ भागी और आकर मधु से झगड़ा करने लगी ,कितनी लोट-पोट हो रही थी ,मधु की साड़ी में ! जैसे कोई नन्हा बच्चा अपनी माँ से नाराज़ हो

ओ ! शैली —–” मधु ने उसे लाड़ लड़ाया

 सबकी आँखें उस शैली नामक डॉगी पर जैसे चिपक गईं

कमाल है यार !तुम तो भई उल्लू बनाने में मेरे से भी ज़्यादा स्मार्ट हो –वैसे भई –हम शैली न हुए ,नहीं तो कोई हमारे बारे में भी इतनी पूछताछ करता —” आदत के अनुसार हो–हो करके अस्थाना मूढ़ा खिसकाकर खड़ा हो गया और शर्मा की तरफ़ देखकर आँख मार दी

सारे ठठाकर हँस पड़े थे, शैली मधु की गोदी में चिपकी हुई थी और शर्मा बगलें झाँकने लगा था

डॉ. प्रणव भारती
हिंदी में एम.ए ,पी. एचडी. बारह वर्ष की उम्र से ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. अबतक कई उपन्यास. कहानी और कविता विधा की पुस्तकें प्रकाशित. अहमदाबाद में निवास. संपर्क - pranavabharti@gmail.com

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