1- ‘क’ से ‘कमल’, ‘क’ से ‘कश्मीर’

‘क’ से ‘कमल’ वाले इस देश में
‘क’ से ‘कश्मीर’ भी हो सकता है
पर उसके लिए आँखों को
थोड़ा सजल करना होगा
हृदय में उतरना होगा
दिमाग की परतों को कुतरना होगा
और अपने ही अंतस को भेदना होगा

कश्मीर कहने के लिए जीभ को
चलना नहीं ठहरना होगा
कानों को जन्नत की चीखें सुननी होंगी
कर्फ्यू जैसी शांति से गुजरते हुए
आत्मा को किसी असह्य शोर से गुजरना होगा
नाक को बारूद की गंध का अभ्यस्त होना होगा

कश्मीर कहते हुए खून की बहती दरियाओं की
कल्पना नहीं हकीकत से रूबरू होना होगा
चेनाब- झेलम के आंसुओं में डूबना-उतराना होगा
खिड़की से स्कूल की अलंघ्य राह तकते बच्चे की नजरों से
छिटक रहे शून्य को पकड़ना होगा
फिर उसे अंतरिक्ष में गेंद की तरह उछालना होगा
इस उम्मीद में कि क्या पता उसका मन कुछ देर को बहल जाए

कश्मीर कहते हुए उस काल कोठरी के किवाड़ को
खटकाना नहीं तोड़ना ही होगा
जिसके ताले की चाबी
कुछ जिन्न लिए उड़ रहे हैं हमारे सिरों के ऊपर
चौबीसों घंटे अट्टहास करते हुए
जो पूरे दक्षिण एशिया को मग्न किये रहते हैं अपने करतब से
वे आपस में करते हैं नूराकुश्ती, छीना-झपटी
कभी चाबी एक के हाथ कभी दूसरे के
पर नीचे नहीं गिरने देने की उनमें है आम सहमति
जनता उन्हें देख-देख उछलती है, उबलती है,
भिड़ती है, मरती है, मारती है
अंत में अपने खाली हाथ देख फिर से उन्हें निहारती है
ऐसा करते हुए सत्तर बरस बीत भी चुके हैं

कश्मीर कहने से पहले बहुत कुछ कहना होगा
दुहरानी होगी संविधान की प्रस्तावना
कुछ टूट चुकीं राष्ट्रीय प्रतिज्ञाएं
गाने होंगे शाँति के भुला दिए गये गीत
मजहब से अलग बुना गया देशराग
रोना होगा जार-जार
चीखना होगा अताताई की आँखों में डाल आँख

इसलिए आसान है ‘क’ से ‘कश्मीर’ नहीं ‘कमल’ कहना
ओढ़ कर चुप्पी मुर्दों सा असीम शांति से भरे रहना ।

2- कश्मीर की औरतें

मुझे मुहब्बत सी हो गई है
कश्मीर की औरतों से
यह मुहब्बत बढ़ती ही जा रही है
देखकर उनकी खौफज़दा आँखें
हाँ दुख के समय मुहब्बत बढ़ ही जाती है

उनकी खौफज़दा आँखें
मुझे मेरी मरहूम बूआ की आँखों सी लगती हैं
उन दिनों जब
फूफा अपनी लाइलाज बिमारी में
गिन रहे थे अंतिम सांसें
वह गिनती भर ही झपकाती थी पलकें
वो भी बार-बार भर आने पर ही
फूफा गये क्या
खुली ही रहीं उसकी खौफज़दा आँखें
बूआ मुझे बहुत प्यारी थी

कश्मीरी औरतों की आँखों में
मुझे दिखती है अपनी छोटी और प्यारी बहन की आँखें
बचपन में बाढ़ से जब डूब गये थे
खेत, खलिहान, सड़क, मकान
और उसकी आँखों में खौफ तारी था
वह कहती थी- अब नहीं बचेंगे भइया
मिल नहीं पाऊँगी अब अपनी स्कूल की सहेलियों से
मैं थामे रहता था उसकी कोमल हथेलियों को
लेकिन जब बाढ़ का पानी उतरा
उतर गया खौफ भी उसकी आँखों से
पर कश्मीरी औरतों को बाढ़ के पानी ने नहीं
सत्ता की बाढ़ ने घेरा है
जो न जाने कब उतरे

कश्मीरी औरतों से मैं मिलना चाहता हूँ
और बताना चाहता हूँ कि
मेरी माँ की आँखों की तरह ही हैं उनकी आँखें
जिनमें खौफ अक्सर हो जाता है दृश्यमान
सोचकर- मुस्तकबिल, कल की धुंधली छाया
जवान बेरोजगार बच्चों का उदास चेहरा
और बंदूक की नली
मैं कहना चाहता हूँ कि- ऐ कश्मीर की औरतों,
मेरा प्रेम आना चाहता है
तुम्हारी आँखों और उनमें पसरे खौफ के बीच
बनकर उम्मीद और साहस
जैसे अक्सर आता है
मेरे घर की प्यारी औरतों की आँखों में।

2 टिप्पणी

  1. Reading your poems on Kashmir is really a thrilling experience to me as you have expressed the pain and pangs of the people there with utter delicacy and ample sensibility. Great work . Keep it up…..One of your face book friends ….Dilip Kumar Arsh ( now Dilip Darsh)

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