छोटी सी छै-सात बरस की ‘महुआ’ हल्की होने घर के पिछवाड़े वाले सूखे नाले में नीचे दूर जाकर बैठी थी कि घर में चीख- चीत्कार मच गया! अब बीच में तो उठ नहीं पा रही थी सो बैठी रही। उनकी बस्ती में तो रोज ही कुछ ना कुछ लड़ाई झगड़ा चला ही रहता था, तो कुछ घबराने वाली बात नहीं थी। वह पेट से हल्की होकर वहीं बैठी पत्थर खेलती रही और गाने गाती रही। सामने खड़े धूप- छांव की आंख मिचौली खेलते जंगल ही जंगल थे। जब उसका मन भरमा गया, तो माई को आवाज लगाती वो ऊपर आहाते में आई। जमीन से उठाकर थोड़ी मिट्टी से उसने हाथ धोए और अपनी काली छींट की फ्राक से पोंछ लिए। घर के भीतर गई, तो वहां खून ही खून था। जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था। और सामने कटे पड़े थे उसकी माई, बाबू, भाऊ और छुटका बबुआ। वहां पड़ोस वालों की भीड़ लगी थी। वह हैरानी से आंखें फाड़े यह सब देखकर जोर-जोर से रोने लगी। इस पर सामने वाली बुढ़िया अम्मा ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और लगी पुचकारने! कोई कुछ बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था। रघुनाथ साहू फलौदा बाजार वालों की जवान बिटिया बीमार चल रही थी। बिटिया को झाड़- फूंक कराया तब भी ठीक नहीं हुई और गुनिया(जादू टोना करने वाला) ने बताया कि इस पर काला जादू हुआ है। महुआ की अम्मा से उसकी दोस्ती रही तो उन लोगों ने शक की बिना पर उसका सारा परिवार ही हंसिए से काट कर फेंक दिया। लेकिन बच गई थी इकलौती महुआ। पुलिस और थाने का तो वहां कोई काम ही नहीं था। वहां जादू टोने वालों का कानून चलता था।
छत्तीसगढ़ के इन गहरे और घने जंगलों में छोटी-छोटी बस्तियां बसी हैं जिन में जादू- टोना खूब चलता है! जिसे भी थोड़ा शक हुआ या घर में बीमारी आई तो दरवाजे पर सात हरी मिर्च और नींबू धागे में टांग देते हैं कि घर को नजर ना लगे। डॉक्टर होने पर भी यह डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं। यह बैगा, गुनिया या पंडा के पास जाते हैं, जो झाड़- फूंक कर के ठीक करते हैं। आदिवासी इलाकों में यह सब तो चलता है आरंभ से ही। लेकिन जब से छत्तीसगढ़ बना है तब से तकरीबन कुछ हजार मामले लोगों के सामने आए हैं-जिन में हत्याएं, जिंदा जलाने और आत्महत्या के मामले अधिक हैं। शायद लोगों में क्रोध बढ़ता जा रहा है। यह जंगली इलाके में रहते हैं ,जहां संचार व्यवस्था भ्रामक है।
बैगा लोग झाड़ -फूंक , तंत्र-मंत्र के नाम पर ठगते हैं क्योंकि लोग शिक्षित नहीं हैं। उधर महुआ का रो- रो कर बुरा हाल था। उसकी मौसी रात के अंधेरे में आकर उसे ले गई ; नहीं तो उसे भी मार दिया जाता। भय के साए में नन्ही महुआ जीने लग गई थी। अब वह अपने घर से दूर सुकमा बस्ती में थी। वहां भी एक पति-पत्नी को जिन पर जादू टोने का संशय था– लोगों ने नुकीले हथियार से उनके सिरों को गोदा और उनको मार दिया गया था । चारों ओर छोटी-छोटी बस्तियों में आदिवासी आबादी बहुत अधिक है! सरकार ने सरकारी डिस्पेंसरी भी खोली हैं ,लेकिन वहां कोई जाता नहीं है। किसी भी स्त्री को डायन मान लिया जाता है उसे ‘टोइन’ कहते हैं! फिर तो चाहे उसे पत्थरों से मार डालते हैं। बहुत गहराई तक बातें सामने आती है। जब तक विकास का प्रकाश नहीं पहुंचेगा तब तक अंधविश्वास पर इनका विश्वास कायम रहेगा। संचार की व्यवस्था भी नहीं मिलती है। जिस स्त्री के बच्चा नहीं होता , वह बांझ कहलाती है, लेकिन वहां उसे टोइन या डायन मान लिया जाता है। इन लोगों को शिक्षित होने का कोई जरिया नहीं बन पाता है क्योंकि यह शिक्षित होना ही नहीं चाहते हैं।
महुआ की सहेली फूला उसके साथ जाकर जंगल से लकड़ियां ले आती थी। वह भी दस बरस की थी। यह गौड़ आदिवासी लोग हैं। इन सब का मुख्य धंधा जंगल की कटाई करना या लकड़ी उठाकर बाहर टाल में रखना है। पूर्णमासी की रात आने पर वहां की सब जवान लड़कियां इकट्ठी होकर कमर में हाथ डालकर पैरों में चांदी की हंसिया डालकर, सर में तेल लगाकर कसकर बालों का जूड़ा पीछे बनाती हैं। उस पर बांस के पतले तिनके सजाकर बिना ब्लाउज के पट्टी वाली सफेद धोती (साड़ी) पहनकर हाथों में ढेर- ढेर चूड़ियां डालकर नृत्य करती हैं और बीच में जवान लड़के ढोल बजाते हैं। वह ताल में ढोल बजाते हैं और यह ताल में गाती हैं। महुआ और फूला महीने भर इस दिन का इंतजार करतीं। सरगुजा जिले में गोंड समुदाय के जीवन में नाचना-गाना और बजाना एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां तरह-तरह के नृत्य होते हैं जैसे कर्मा,सैला, सुआ, गुदुमबाजा और ढेमसा।
कर्मा– में लड़के और लड़कियां इकट्ठे नाचते हैं गोला बनाकर। सज धज कर, लाल, पीले ,हरे कपड़े पहन कर। और गाते हैं…
“आधी रात ना जाओ भैया रे
लड़कों लड़की नाचे आधी रात को ना जाओ रे भैया आधी रात को!”
सैला–यह गोंड जाति का सर्वप्रिय नृत्य होता है जो शरद ऋतु की चांदनी रात में होता है और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इसमें भी पुरुष और स्त्रियां इकट्ठे होकर गोले में नाचते हैं। पुरुष मध्य में वाद्य यंत्र बजाते हैं, स्त्रियां उनको घेरा डालकर नाचती हैं और मधुर गीत गाती हैं।
सुआ–कृषि की फसल पकने पर प्रसन्नता की लहर उठती है जब, तो यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है। आदिवासी अपनी फसल अपनी ही बस्तियों के आसपास उगाते हैं।
गुदुमबाजा–यह ढुलिया उपजाति का एक पारंपरिक नृत्य है। जो विवाह आदि अवसरों पर किया जाता है।
इस तरह से गोंड जीवन का यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा है अक्सर धार्मिक, सामाजिक और कृषि उत्सवों में गोंड आदिवासी मांदरी भी डंडों के साथ खेलते हैं।
पता ही नहीं चला कब महुआ बड़ी हो गई और उसकी मौसी ने बेमेतरा के ‘हरदी’ गांव के एक आदमी ‘कचरू’ से खेत की जमीन लेकर महुआ को उसके साथ ब्याह के बिठा दिया। गुदुमबाजा नाच- गाने और गीत- संगीत के माहौल में महुआ की विदाई हुई, तो फूला से बिछुड़कर वह बहुत रोई। बहुत कुछ कहना चाह कर भी वह कुछ कह नहीं पाई अपने मन की बातें। उसे लगा वक्त के खंडहरों में यादों की सिलवटें बाकी हैं । डर की गुफाओं में खामोश इबारतें बाकी हैं। हवा में बोझिलपन था। कुछ ना कह सकने के कारण उसके चेहरे पर सनसनी और आंखों में भय था। न जाने कौन मर्द है, कैसा होगा, किस्मत उसे कहां ले जा रही है अनजान जगह पर! कचरू ही अब उसके जीवन का एक सहारा बन गया था। हरदी गांव कुछ बड़ा था जंगल में आदिवासी बस्तियों से खुला हवादार। लेकिन पूरी तरह जंगल से आच्छादित । कचरू अकेली जान एक कमरे के घर में रहता था और महुआ को वहां जाकर अच्छा लगा। कचरू मेहनती था। जंगल से कटी लकड़ी बाहर लाता था और पैसा मिलने पर महुआ को लाकर पकड़ा देता था। हॉट वाले दिन जब बाजार लगता था तो उसको मनपसंद खुशबूदार साबुन,खुशबू वाला तेल,पायल- बिछिया मोटे मोती के हार-श्रृंगार लेकर देता था। साथ की खोली में रहने वाली लछमी भौजाई (भाभी), जिसका बदन खूब गदराया हुआ था वह बहुत चिढ़ जाती थी यह सब देखकर। वह कचरू पर डोरे डालती थी। महुआ देख कर सब समझ जाती थी। पर वह अपने काम से काम रखती थी।
जहां कचरू तंदुरुस्त जवान था, वहां लछमी का ‘बेरुवा’ दुबला- पतला मर्द था। महुआ भी दुबली- पतली छोटे कद की थी। अपना आंगन लीप-पोत कर रखती थी और कचरू को बढ़िया गरम-गरम भात के संग दाल-सब्जी परोसती थी। एक दिन मुंह अंधेरे उठी तो देखती है कि कचरू ओके पास नहीं है। सोची कि कहीं जंगल पानी दूर गया होगा। जब खाए के समय तक नहीं आया तो ओका जिया घबरा गया। उसने पड़ोस में देखा कि बेरुवा भी मुंह लटकाए अपनी खोली के बाहर बैठा है। वह भीतर जाकर खोली बंद कर के जोर-जोर से दहाड़ मार कर रोने लगी और लछमी को कोसने लगी। वह उसके कचरू को अपने साथ भगाकर नामालूम कहां ले गई थी। कुछ दिन तो वह उसकी राह देखती रही, लेकिन अब गुजारा मुश्किल था। हाट से ताला खरीद कर उसने अपनी खोली को ताला लगाया और एक झोले में जरूरी सामान और दो धोती डालकर वह घर से निकल पड़ी। बचपन से लेकर अब तक उसको दुनिया की कोई समझ नहीं थी। वह पैदल ही शहरी आबादी की तरफ मुड़ गई। उधर कुछ डाक बंगले और दूर-दूर बने बंगले दिखाई दे रहे थे। एक पीपल के पेड़ के नीचे हनुमान जी की मूर्ति देखकर वह रुकी और उनके चरणों में विनती करके आगे चली तो एक बूढ़े बाबा मिल गए। किसी से भी ना बतियाने वाली महुआ उनसे पूछ बैठी,
“बाबा, यहां कहीं कोई काम मिल सकता है क्या?”
बाबा बोले,” कहां की रहने वाली हो?”
“यहीं रहती हूं बाबा!”
“रसोई का काम जानती हो? यहां डाक बंगले की रसोई में एक लड़की की जरूरत है। अफसर लोग आते रहते हैं। खाना बना लेती हो तो काम मिल जाएगा।”
“जरूरत का खाना बना लेती हूं। कुछ नया बनाना हो तो सिखा देना मैं बना दूंगी। पर काम जरुर दे दो। अकेली जान हूं। मैं भी यही खा लिया करूंगी।”
यह सुनकर बाबा ने उसे काम पर रख लिया। धीरे-धीरे उसे बढ़िया खाना बनाना सिखा दिया। अफसर लोग आते, खाना खाकर खुश होकर टिप भी देकर जाते। इस के बाद वह रात को अपने घर सोने चली जाती थी। उसका जीवन पटरी पर आ चला था कि एक रात बाबा तो सोने चले गए लेकिन तभी चार-पांच जवान लड़के डाक बंगले पर आए और खाने को मांगा। वह भी रसोई समेट रही थी। बोली, “अब तो बंद करने का समय है! खाना नहीं है।”
“हमें बहुत भूख लगी है हमें तो खाना चाहिए! अभी खाना बना कर दो।”
मजबूरी में उसने खाना बनाना आरंभ किया। तब तक उनको सलाद काट कर दिया। उनमें से एक दो लड़के जो नशे में लगते थे उसके पल्ले को खींचने लगे। वह सिर पर पल्ला करती थी तो उसके सिर का पल्ला उतारने लगे। मयंक सबसे समझदार था उसने शेखर को मना किया। उल्हास भी नहीं मान रहा था। मयंक से बोले,” तुझे क्यों दर्द हो रहा है? तेरी क्या लगती है? जो मना कर रहा है। तू सलाद खा। अपने काम से काम रख। शेखर तो उसके पीछे-पीछे रसोई तक में चला गया। उसे कुछ ज्यादा ही चढ़ गई थी। मयंक को कुछ ठीक नहीं लगा और वह जाकर उसे वापस ले आया। तब तक दाल चावल बन गए थे तो सब खाने पर टूट पड़े। और खाना खाने के बाद फिर से महुआ की तारीफ करने लगे और उसकी साड़ी से छेड़खानी। अब मयंक का सब्र समाप्त हो गया था उसने शेखर को जोर से थप्पड़ लगा दिया। उल्हास ने आकर मयंक को जोर से धक्का दिया और बोला,” समझ नहीं आती? क्यों पंगा लेता है? तेरी बीवी को तो नहीं छेड़ रहे! तेरी कुछ नहीं लगती है तो तूं चुपचाप बैठ जा।”
राजवीर कब से बैठा तमाशा देख रहा था। उसने आकर महुआ के सिर से पल्ला उतार दिया और उसके मुंह को हाथ में पकड़ लिया। साथ ही ढिठाई से बोला,”बोल क्या लगती है तेरी? क्यों फालतू को लाल- पीला हो रहा है? बना ले इसको अपनी बीवी। हम सब माफी मांग लेते हैं।”
मयंक ने फिर भी आराम से बोला ,”यार इंसानियत भी कोई चीज होती है। क्यों एक अच्छी-खासी भली लड़की को तंग कर रहे हो? चलो, हम अपने-अपने घर वापस चलते हैं।”
महुआ बहुत घबरा गई थी। वह प्लेटें उठाने के बहाने वहां से किचन में गई और रसोई वैसी ही खुली छोड़कर अपने घर की ओर सरपट भागती चली गई थी। शहरी आबादी से दूर थोड़ी सी झोपड़पट्टियों का उनका गांव था। उसने सोच लिया था कि उसकी अपनी आदिवासियों की दुनिया ही भली है। वह अकेली ही वहां रह लेगी। जंगल से लकड़ी ले आएगी। कोई इन शहरी लोगों की भांति उस पर हाथ तो नहीं डालेगा।
सागर की तलहटी में जाने पर वहां माणिक- मोती होते हैं। उसी तरह जंगल की तलहटी में ढेरों तरह की वन संपदा बिखरी पड़ी है। स्वच्छ मीठे जल, भांति- भांति की जड़ी बूटियों , खनिजों , पत्थर , कोयले से जंगल भरे पड़े हैं। और सबसे बढ़िया वहां सीधे- सादे लोग रहते हैं, जो अकेली नारी की इज्जत पर आंच नहीं आने देते और ना ही कभी वहां किसी स्त्री की इज्जत लूटी गई है। छोटी से लेकर हर उम्र की औरत अकेले जंगल में, खेतों में काम करती है किसी को उसकी चिंता नहीं होती जबकि शहर के सभ्य समाज में नन्ही बच्ची को भी अकेले नहीं छोड़ सकते हैं। ऐसे असभ्य समाज से उसका जंगल भला है। वह अकेली जान अपने लोगों में सुरक्षित है। फिर क्या मालूम उसका कचरू ही कहीं वापस आ गया तो? वह उसका इंतजार करेगी मां की गोद जैसी अपने जंगल की तलहटी में रह कर…! कचरू घर लौट आए! वह आस का दीपक जलाए रखेगी….!
आदिवासियों के जीवन पर प्सर डालती सकारात्मक सोच की बहुत अच्छी कहानी।
प्रकाश जालती