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गीता पंडित की कहानी – मेरी ड्रेस कहाँ गयी

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स्कूल का पहला दिन लेकिन मेरी ड्रेस सबसे अलग है। मैं अचम्भित होती हूँ। सभी ने स्कर्ट और  हाफ़ बाजू का टॉप पहना हुआ है मगर मैंने शलवार और पूरी बाँह का कुर्ता। यह कैसे? मेरी ड्रेस अलग क्यों है? मुझे लग रहा है कि सब बच्चे मेरी हँसी उड़ा रहे हैं। मैं शर्म से ज़मीन में धँसी जा रही हूँ। मुझे रोना आ रहा है।

टीचर जी कुछ कह रही हैं मगर मुझे वह सब सुनाई नहीं दे रहा। मुझे केवल वह हँसी सुनाई दे रही है या गोल-गोल शरारत से घूमती हुई आँखें। जैसे पूरे स्कूल के बच्चों की आँखें एक साथ मेरा पीछा कर रही हैं।

मैं इंटरवल में भी अपनी क्लास से बाहर नहीं निकली। सब बच्चे अपना-अपना लंच बॉक्स लेकर बाहर चले गये हैं। अब वे एक दूसरे के साथ मिलकर लंच कर रहे हैं। अरे, वे तो ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए खेलने भी लगे। मैं क्लासरूम में ही हूँ और वहीं से यह सब देख रही हूँ।

मेरा मन भी मचल रहा है उनके साथ खेलने के लिये और लंच शेयर कर खाने के लिये मगर इस ड्रेस ने जैसे मन ही मार दिया। कैसे जाऊँ सबके बीच में? वे फिर से हँसी उड़ाएँगे तो… नहीं, नहीं…यहीं ठीक हूँ. मैं अपने आपमें और भी सिमटकर बैठ जाती हूँ.

क्लास का अकेलापन मुझे बेचैन कर रहा है. कितने मन से आज स्कूल आई थी लेकिन इस कुर्ते और शलवार ने सब बिगाड़ दिया.

टीचर जी ने भी तो प्रार्थना में कैसे कैसे देखा था। तब मैं समझ नहीं पाई थी लेकिन अब सब समझ रही हूँ.

मेरे पास भी लंचबॉक्स है जो मेरे बैग में झाँककर मुझे आवाज़ दे रहा है. मॉम ने मेरी पसंद का चीज सेंडविच बनाया था और हिदायत दी थी कि जरूर खा लेना. मेरे पेट में भी चूहे दौड़ रहे हैं..

लेकिन मैं नहीं खाऊँगी. मैं बैग की खुली चेन को पूरी ताक़त से खींचती हूँ ताकि वह लंचबॉक्स मुझे देखे ही नहीं.

मैं जैसे तैसे पूरी छुट्टी होने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। छुट्टी होती है लेकिन मैं सब बच्चों के बाद में निकलती हूँ ताकि किसी का भी सामना न करना पड़े…

स्कूल के गेट पर माँ खड़ी हैं. मैं नीची निगाह किये हुए हूँ. वह मेरी पीठ से बैग उतारती हैं। पानी की बॉटल अपने कंधे पर डालती हैं और पूछती हैं.
“क्या हुआ बेटा?
कैसा रहा पहला दिन?”

मैं उत्तर नहीं देती। बस उनके साथ स्कूल के गेट से आगे बढ़ जाती हूँ। वह फिर पूछती हैं।

“सबसे बाद में क्यों आईं अकेली? सारे बच्चे तो जा भी चुके.”

मैं तब भी नहीं बोलती। नीची नज़रें किये उनके साथ चलती रहती हूँ. घर पास में ही है, बिलकुल स्कूल के सामने वाली गली में.

घर पहुँचकर माँ सबसे पहला मेरा बस्ता खोलती हैं. लंच बॉक्स यूँ ही भरा देखकर आश्चर्य से पूछती हैं..

“अरे… यह तो तुमने खोला भी नहीं. घर में होती तो एक मिनिट भी इंतजार न करती. खा लेना चाहिये था. चीज सैंडविच तो तुम कितने चाव से खाती हो.”

इसके बाद ड्रेस बदलवाने के लिये वह मुझे कमरे में ले जाती हैं और बैड पर बैठकर मेरी ठोड़ी ऊपर उठाकर मेरी आँखों में झाँकने लगती हैं. मेरी आँखें आँसुओं से भरी हैं. यह देखकर वह डर जाती हैं.

“ओह… क्या हुआ मेरी बच्ची को?
कहीं किसी ने…?”

फिर वाक्य अधूरा छोड़कर मेरे हर अंग को अच्छी तरह देखने लगती हैं। मैं समझ नहीं पाती कि वह क्या तलाश रही हैं। फिर मुझे अपने सीने से चिपकाकर एक लम्बी श्वास छोड़ती हैं ।

मुझे उनसे चिपककर अच्छा लग रहा है लेकिन मैं तो माँ से क्रोधित हूँ  मुझे माँ ने इस तरह के कपड़ों में स्कूल क्यों भेजा जो सबसे अलग थे.
मुझे ड्रेस में जाना था.
सब ड्रेस में थे.
एक मैं ही ड्रेस में नहीं थी.
क्यों नहीं थी?
यह तो माँ ने ही सिलवाई थी दर्ज़ी चाचा से…फिर?

दर्ज़ी चाचा बहुत बुरे हैं. उन्हें तो सिलना आता ही नहीं है. ये… ये.. ड्रेस है ? ऊपर का और नीचे का इतना लम्बा… सबने तो छोटा-छोटा पहना हुआ था  हाँ, टॉप और स्कर्ट क्यूँ नहीं सिले मेरे जिसमें मोज़े वाली टाँगें कितनी अच्छी लग रही थीं और वो चमचमाते काले जूते.
मेरे तो जूते तक ढके हुए हैं इसमें.
अब दर्ज़ी चाचा से कभी कुछ नहीं सिलवाऊँगी.

माँ तो जानती ही होंगी.
माँ ने क्यूँ नहीं बताया उन्हें कि कैसी सिलनी है? ऐसी क्यूँ सिलवाई ?
औरों जैसी क्यूँ नहीं सिलवाई?
माँ भी बहुत बुरी है.
मेरी कितनी हँसी उड़वाई.
अगर मैं ड्रेस पहनकर जाती तो क्या कोई भी मेरी तरफ़ ऐसे देख सकता था जैसे वे सब उस समय देख रहे थे.
इसलिये मैं कसमसाकर उनसे अलग होकर बैड के दूसरे कोने पर चली गयी और उनकी तरफ़ पीठ करके लेट गयी.

माँ तो सोच  रही थीं कि मैं  दौड़कर खिलखिलाती हुई घर आऊँगी और स्कूल की बातें कर करके उनकी नाक में दम कर दूँगी लेकिन यह तो उसके उलट हो रहा है.

अब तक माँ समझ चुकी थीं कि ज़रूर कोई बात है जिसके कारण मैं परेशान हूँ.

वह धीरे से मेरे पास खिसककर आईं और मुझे अपनी तरफ़ पलटकर मेरा सिर अपनी गोद में रखकर मेरे बालों पर प्यार से हाथ फिराती हुई कहने लगीं.

“तुम तो मेरी बहादुर बेटी हो. तुम्हारा रोना अच्छा नहीं लगता.”

“मैं बहादुर वहादुर नहीं हूँ और हाँ माँ, अगर तुम मेरी जगह होतीं तो क्या तुम दुखी न होतीं और फिर मैं क्या जानबूझकर रो रही हूँ या मुझे रोना अच्छा लगता है.
यह तो तुम हो जिसने मुझे रुलाया है. कट्टी, कट्टी कट्टी…जाओ तुमसे कभी नहीं बोलूँगी. मैं अंदर ही अंदर सोचे जा रही हूँ. मेरी चुप्पी देखकर वह बोलीं

“नाराज़ हो यह तो मैं जान गई हूँ लेकिन क्यों नाराज़ हो यह मैं नहीं समझ पा रही. अब जब तक बताओगी नहीं तो मैं कैसे जानूँगी.”

हद्द हद्द है… माँ भी कितनी बुद्धू है. कुछ नहीं समझती. ख़ुद ने गलती की है और ख़ुद ही नहीं जानती. मैंने ऐसा कुछ कर दिया होता तो मुझे कितना डाँटती. हो सकता है मारती भी लेकिन मैं तो उनको डाँट भी नहीं सकती. बड़ी जो हैं वे. मैं मन ही मन और भी नाराज़ हो उठती हूँ. वह फिर बोलती हैं

“ठीक है मत बताओ. चलो खाना तो खा लें.”
मैं हिली तक नहीं. बल्कि अचम्भा कर रही थी कि माँ भी अजीब है. मैं नाराज़ हूँ और वह हैं कि खाने की बात कर रही हैं.
ड्रेस की बात कौन करेगा?
कब करेगा?
कल स्कूल कैसे जाऊँगी?
क्या यही पहनाकर भेजेंगीं?
कैसी है माँ?
अब तक भी ड्रेस की बात नहीं कर रही है.

“अच्छा बाबा मुझसे बात नहीं करनी तो मत करो लेकिन अपने पापा से तो कर लो. देखो वह भी आ गये. आज हॉफ डे जो था.”

पापा…
नहीं… नहीं
पापा से भी बात नहीं करूँगी. कपड़ा तो वह ही लाए थे. दर्ज़ी चाचा को भी उन्होंने ही बुलाया था. वहीं तो बैठे हुए थे जब दर्ज़ी चाचा मेरा नाप ले रहे थे.
उन्होंने क्यूँ नहीं कहा कि ड्रेस ऐसे सिलनी है जैसी दूसरे बच्चों की सिलवाई गयी थी.
उनके सबके पापा अच्छे हैं.
मेरे ही पापा ऐसे हैं जो यह भी नहीं जानते कि ड्रेस कैसे सिलवानी है.
पापा से भी कट्टी.
मैं नहीं बोलूँगी.

पापा मुझे गुदगुदी करने लगते है. मेरी हथेली से मेरी बग़ल तक दो उँगलियों से चलते हुए

“बछिया पा गयी, पा गयी, पा गयी, पा गयी  और ये पा गई…”

मैं न चाहते हुए भी खिलखिला पड़ती हूँ.
पापा जानते हैं कि गुदगुदी मुझे बहुत होती है और इसी बात का वह फ़ायदा उठा रहे हैं।

सच्ची पापा भी कितने शरारती हैं.
ये पापा लोग बहुत तेज होते हैं.
हम बच्चों को बुद्धु समझते हैं.

अगर मैंने अपनी ड्रेस सिलवाई होती तो वह ड्रेस होती. यह नहीं जो मेरे लिये बनवाई. मैं अंदर ही अंदर कुढ़े जा रही हूँ.

मैं फिर से उसी मुद्रा में आ जाती हूँ और मुँह फुलाकर बैठ जाती हूँ.

पापा मुझे अपनी दोनों बाहों में उठाकर ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर बैठ जाते हैं. मुझे अपनी गोद में बिठाकर मेरा चेहरा अपनी तरफ़ करके कहते हैं

“हाँ, तो अब बताओ. माँ को नहीं तो पापा से तो कह ही सकती हो.”

क्यूँ कहूँ?  पापा ने भी तो वही किया है जो माँ ने किया है. मैं अपने होंठों को भीँचकर उनकी तरह बटर-बटर आँखों से देखने लगती हूँ.

वह फिर कोशिश करते हैं.

“ओह… इतना गुस्सा. मैं तो डर गया बाबा रे.”

और कोई समय होता तो मैं हँसते हँसते लोटपोट हो जाती लेकिन यह समय वो वाला समय नहीं है.

मैं सचमुच में नाराज़ हूँ.
सच बात तो यह है कि अगर पापा डरते तो ऐसी ड्रेस मेरे लिये सिलने ही नहीं देते. झूठी मूठी कह रहे हैं. मैं उनकी बातों में आने वाली नहीं हूँ। मैं सोचे जा रही हूँ.

इसका भी कोई असर मेरे ऊपर न देखकर वह  मुझे बड़े प्यार से देखते हैं. अपने हाथों से मेरे बिखरे हए छोटे-छोटे बिखरे बालों को ठीक करते हैं  फिर मुझे अपनी गोदी से उतारकर सोफ़े पर बिठा देते हैं और खुद नीचे कालीन पर बैठकर मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहते हैं

“अच्छा, हम तो दोस्त हैं वोई वाले दोस्त..”

मैं याद करने की कोशिश करती हूँ मगर कुछ भी याद नहीं आता. आये भी कैसे मैं तो अपनी ड्रेस में उलझी हुई हूँ
मगर मेरे भिंचे होंठ अचानक से खुल जाते हैं और मैं बोल पड़ती हूँ

“कौन से वाले?”

“वोई वाले… भूल गयीं”

मैं कोई भूलती-वूलती नहीं हूँ, भूलते तो आप हो, मैं कहना चाहती थी लेकिन बोल कुछ और गयी

“कौन से वाले?”

पापा ने इधर उधर देखा कि कोई है तो नहीं जब उन्हें तसल्ली हो गयी कि यहाँ कोई नहीं है तो वह धीरे से बोले

“पार्टी वाले दोस्त. वो जो हम दोनों ने छिपकर चॉक और स्लेट बत्ती की पार्टी की थी और एक दिन दीवार को खुरचकर भी खाया था. तब से हम पक्के वाले दोस्त बने थे ना. “

मैं जैसे सब कुछ भूल गयी और ख़ुश होकर पापा के गले में बाँहें डालकर बोली
“अरे हाँ, आप तो मेरे पक्के वाले दोस्त पापा हो.”

“ये हुई ना बात, फिर दोस्त पापा से तो कोई बात नहीं छुपानी चाहिये.“
“हाँ, यह तो है.“

“ठीक है तो बताओ अब, क्या बात है? क्यों मुँह फुलाकर बैठी हो दोस्त ?” पापा तो दोस्त पापा हैं। दोस्त को तो बता ही सकती हूँ अगर पापा दोस्त पापा ना होते तो सच्ची मुच्ची बात भी ना करती. अब कट्टी ख़त्म।  मन में यह सोचकर मैंने पापा का हाथ पकड़कर उन्हे अपने पास ऊपर सोफ़े पर बिठाया और उनसे एक प्रोमिज लिया
“दोस्त पापा, माँ को कुछ नहीं बताना है. ओके … प्रोमिज.”
“ओके… प्रोमिज.”

मैं कुछ पलों के लिये चुप हो गयी जैसे उनके प्रोमिज को स्वीकार करना चाह रही थी. इसके बाद मैंने पापा को नहीं दोस्त पापा को सब बताने का मन बना लिया.

लेकिन जैसे ही मैं कहने  जा रही थी कि अचानक ड्रेस वाली सारी बातें याद करके फिर से रुआँसी हो गयी और रोते हुए बोली, “दोस्त पापा, आप जानते हो आज मुझे ड्रेस पहनकर जाना था. सब बच्चों ने ड्रेस पहनी थी. एक मैं ही थी जो बिना स्कूल ड्रेस के थी.”
पापा समझ गए कि मैन यूनिफ़ोरम को ड्रेस कह रही हूँ. “अरे… सुबह तो ड्रेस में थीं जब मैं आपको स्कूल ड्रॉप करके आया था.”

“नो पापा… वह ड्रेस नहीं है. मेरी सबसे अलग थी. इत्ती लम्बी.” मैंने पैर फैलाकर अपने पाँवों को छूते हुए कहा.
“ओह…” वह सब समझ गये।“ 
बाँह और टांग पर ज़रा से काले दाग के कारण पूरी देह को ढकने के वह विरोध में थे लेकिन बीवी के सामने उन्हें झुकना पड़ा था जिसका परिणाम आज बेटी की खोयी हुई मुस्कराहट और शिकायत थी.

“हाँ, अब आई बात समझ में. बड़ी देर में समझते हो. सब बच्चे और टीचर भी मुझे अजीब तरीक़े से देख रही थीं.
सब मेरी हँसी उड़ा रहे थे.”
मैं रोते रोते बोले जा रही थी

“कोई मेरा दोस्त नहीं बना पापा.
कोई मेरे साथ खेला भी नहीं.
किसी ने मेरे साथ लंच भी नहीं किया.”

“ओ,ओ, मेरा बच्चा” यह कहकर पापा ने मुझे गले से लगा लिया.

“और हाँ, दोस्त पापा इंटरवल होने के बाद भी मैं क्लास में अकेली बैठी रही. मैंने लंच भी नहीं किया.”

“ओह!!! मेरी दोस्त तो बहुत स्ट्राँग है. ऐसी वैसी बातों से परेशान नहीं होती है.”

“हाँ, हूँ तो लेकिन आज तो सच्ची में बहुत परेशान थी.”

“अच्छा तो ये बताओ, अब क्या करें?”

“अरे बुद्धु दर्ज़ी चाचा को डाँटो. उसने ड्रेस ऐसी कैसे बनाई? वही अब इसे ठीक करके देंगे.”

“चलो तो पहले दर्ज़ी चाचा की ही खबर लेते हैं. उन्होंने ड्रेमेरी दोस्त की ड्रेस ख़राब कैसे कर दी.”
मैं एकदम चहक उठी. मुझे विश्वास हो गया कि मेरे पापा दोस्त पापा ही हैं.

“लेकिन पेट में जो चूहे दौड़ रहे हैं, अब उनका क्या करें?” पापा बोले.

तभी माँ ड्राइंग रूम में प्रवेश करते हुए बोली. बहुत भूख लग रही है. मैं खाना खाने जा रही हूँ. किसी को खाना है क्या?”

मैंने हाथ उठाकर ज़ोर से कहा
“हाँ, मुझे चीज़ सेंडविच खाना है पापा को भी.” 
फिर पापा के कान में बोली

“है ना दोस्त पापा. पहले खा लेते हैं. मेरे पेट में तो सुबह से चूहे दौड़ रहे हैं.”
पापा ने हाँ में गर्दन हिलाई और मुस्करा दिये. तभी कुछ याद करती सी मैं बोली

“दोस्त पापा प्रोमिज याद है ना.”
“हाँ, याद है मगर एक बात बताओ”
“क्या”

“माँ तुम्हें प्यार नहीं करती ?”
“नहीं…”
“ऐसा कैसे कह सकती हो?”

“अगर माँ प्यार करती तो मेरी ड्रेस ऐसी नहीं सिलवाती। प्यार करने वाले रुलाते नहीं हैं. माँ ने आज मुझे बहुत रुलाया है. मेरी हँसी उड़वाई है इसलिये माँ से कट्टी.”

“अभी तो तुम कह रही थीं कि दर्ज़ी चाचा ने ड्रेस ठीक नहीं सिली तो माँ का क्या दोष.”
मैं सोच में पड़ गयी. पापा सही कह रहे हैं क्या?

“देखो दोस्त, माँ तुम्हारे सारे काम करती है. तुम्हारे बिना खाना तक नहीं खाती. फिर…”
“हाँ… यह बात तो ठीक है”
पापा सही तो कह रहे हैं. मुझे बुख़ार आया तो कैसे रोये जा रही थीं. मैं खेलते हुए गिर गयी थी तो कितना परेशान हो गयी थीं. उस दिन फुलझड़ी चलाते हुए हाथ जल गया था तो सब कुछ छोड़कर मुझे गोदी में लिये बैठी रहीं. मैं सोच रही थी और सोचते सोचते माँ के प्रति उमड़ते हुए प्यार को रोक न पाई. दौड़कर गयी और माँ के गले से लग गयी.

पापा दूर से ही यह देखकर ख़ुश हो रहे थे. फिर डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए मुझसे बोले

“अच्छा तो दर्ज़ी चाचा ने जो पिंक वाला फ्रॉक सिला था. उसे अब किसी और को दे देंगे. उन्हें सिलाई विलाई तो आती नहीं है.

“नहीं… वह बहुत अच्छा सिया है दर्ज़ी चाचा ने. मैं किसी को नहीं दूँगी.“

“तो लाल वाला दे देंगे वो गंदा सा सिया है.“

“नहीं, नहीं… वह मेरा सबसे प्यारा फ़्रॉक है. दर्दी चाचा ने उसे बहुत अच्छा बनाया है.“

“तो अब तुम ही फ़ैसला कर लो कि दर्ज़ी चाचा को सिलाई आती है या नहीं आती है.“

मैं असमंजस में पड़ गयी. क्या कहूँ. पहले की सब ड्रेस दर्ज़ी चाचा ने बहुत अच्छी सिली हैं लेकिन आज वाली… वह तो बहुत गंदी सिली है. अब गंदी को तो गंदी ही कहूँगी ना.

“पापा, दर्ज़ी चाचा को सिलाई तो आती है लेकिन जाने क्यों मेरी स्कूल ड्रेस अच्छी नहीं सिली. आप डाँटना मत. समझा देना.”

पापा माँ की तरफ़ देखकर मुस्करा रहे थे.
क्यों? समझ नहीं पाई.

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