Wednesday, May 22, 2024
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सतीश उपाध्याय का व्यंग्य – गमले में अल्फांसो

इधर डीडी नगर  की कॉलोनी में ये आम चर्चा उफान पर थी कि मंजुला जी के गमले का  आम पक गया है। बारी बारी से आम को देखने वालों का यह कहना था कि गमले में ही पके  हुए आम का पीलापन  कुछ ऐसे टपक रहा है,  जैसे कृष्ण पीतांबर वस्त्र पहने हुए अपने पग बढ़ा रहे हों।
आम पर ही खास चर्चा इसलिए  भी होने लगी थी , क्योंकि उनके किसी परिचित  ने  उस पके हुए आम की फोटो उसके पैतृक गमले के साथ  सोशल मीडिया में शेयर कर दी थी। अब  केवल यह तय करना बाकी था कि आम की  यह प्रजाति कौन सी है?
गमले के करीब ही खड़े शंकर  ने कहा -मैं गूगल में सर्च कर तो लूं, लेकिन इसके पहले इस लटके हुए पके आम की थ्री डायमेंशन फिगर चाहिए और उन्होंने अपने मोबाइल से  पीले पड़ चुके आम की फोटो तीन बार अलग-अलग एंगल से क्लिक कर ली। फिर मोबाइल में पके हुए पीले आम की फोटो को जूम करके  बोले -फोटो देखकर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं ये यह आम कोई जनरल आम नहीं है बल्कि खास है। इसका चेहरा  किसी अवसाद से पीला नहीं हुआ बल्कि यह  नेचुरली मिठास का पीलापन  है।    गमले में ही पके  – पीले बड़े साइज की डाल से झूलते आम की फोटो व्हाट्सएप में वायरल होने के कारण अग्निहोत्री जी को भी पता चल गया था। वे शाम को ऑफिस से सीधे मंजुला जी के घर आ गए।
बोले -सही में आम पक गया, मंजुला जी बधाई हो। वैसे मैंने फोटो तो देखी है आम की, वो कोई विशेष प्रजाति है। यह कोई साधारण आम नहीं है बल्कि मैंगो है विशेष प्रकार का।
“हां यही तो पड़ताल करना है। आज आम पक गया कल टपकेगा भी, इसके पहले बस यह कन्फर्म हो जाए  कि ये आम किस प्रजाति का है।” मंजुला जी बोलीं।
कालोनी के सोशल वर्कर शंकर प्रसाद  बोले- बाये साइड से मैंने गमले के नीचे से नाईंन्टी डिग्री से एक जबरदस्त फोटो ली है। उससे समझ में  आ जाएगा कि यह कौन सी प्रजाति का आम  है। आप धैर्य रखिए,बस।
वैसे मेरा ख्याल है, यह आम, कोई चलताऊ आम नहीं है। कुछ खास ही है।-अग्निहोत्री जी उबासी  लेते हुए बोले।
वैसे मैंने आम विशेषज्ञों को फोटो तो सेंड कर दी है उनके अभिमत आने पर अंतिम निर्णय ले लेंगे और फिर  आम की प्रजाति तय हो जाएगी।
दूसरे दिन अग्निहोत्री जी ऑफिस जाने के पहले आम के संबंध में कोई नई बात जानने के लिए मंजुला जी के घर आ गए।
“कुछ पता चला?”
“अभी तो नहीं? जैसे ही पता चलेगा, सबको, मैसेज सेंड कर दिया जाएगा।”
“देखिए भूलिएगा नहीं, यदि मैं ऑफिस के काम में व्यस्त हो जाऊं तो फोन कर दीजिएगा। व्हाट्सएप में मैसेज कभी-कभी देख नहीं पाता हूं।”
“जी..”
“डिफनिट ?”
“हां हां भाई पक्का। आप विश्वास रखिए…”
अग्निहोत्री जी आम वार्ता के कारण आज आफिस टाईम से  5 मिनट लेट हो चुके थे वे तेजी से निकल गए।
इधर शंकर प्रसाद  जी ने चैट जीपीटी का भी सहारा लिया और सर्च किया-“उत्तम प्रजाति के आम”
देखते ही देखते कई प्रजाति के आम उनके स्क्रीन पर पल भर में आ गए। वे अपनी  तीन कोणों से अलग-अलग खींची गई आम की फोटो से, स्क्रीन में आए हुए आम की फोटो का मिलान करने लगे। लेकिन मंजुला जी के गमले में लगे आम की प्रजाति  फिर भी फाइनल न हो सकी।
फिर उन्होंने  सर्च किया-” आम की सबसे मशहूर प्रजाति का नाम बताइए”
फौरन नाम आ गया। आम की सबसे मशहूर प्रजाति है – अल्फांसो।
उनकी बांछें खिल गईं। आंखों में चमक आ गई। उन्होंने अपने मोबाइल में वो फोटो निकाली जो उन्होंने काफी मेहनत से खींची थी । पहले गमले के नीचे से आम के करीब 90 अंश के कोण वाली अपनी फोटो को अल्फांसो आम की प्रजाति से मिलान किया।
थोड़ा बहुत अंतर था, पर उनका दिल नहीं मान रहा था। फोटो काफी मेहनत से खींची गई थी इसीलिए उन्होंने माना कि – गमले वाले आम की फोटो दुनिया भर में मशहूर अल्फांसो आम की ही प्रजाति से मिलती जुलती है ।उन्होंने तुरंत अग्निहोत्री जी को फोन कर दिया।
“हैलो अग्निहोत्री जी,मुझको लगता है मंजुला जी के गमले में पके हुए बिग साइज के मैंगो की प्रजाति दुनिया भर में मशहूर अल्फांसो आम की ही प्रजाति है।” अग्निहोत्री जी जल्दी में थे। वे बोले- “ऑफिस पहुंचकर आपसे इत्मीनान से बात करता हूं और उन्होंने फोन काट दिया।”
कुछ देर बाद अग्निहोत्री जी का ऑफिस से फोन आ गया।
“जी, अब बोलिए, आप क्या कह रहे थे शंकर प्रसाद जी ?”
“जी मैं यह कह रहा था कि देखिए उलझन दूर हो गई है,  कन्फर्म ही हो गया है समझिये, यह मानकर चलिए कि आम की प्रजाति को मैंने खोज निकाला है। मेरी खींची गई 90 डिग्री की फोटो  दुनिया भर में मशहूर आम की प्रजाति “अल्फांसो” से हुबहू मिलती जुलती है। गमले का आम बाएं साइड से झूल रहा है और गूगल  और चैट जीपीटी  में जो अल्फांसो आम की फोटो दिखाई पड़ रही  है वह भी बाएं साइड से देखने पर सेम टू सेम दिखाई पड़ती है ,इसीलिए मुझे तो पक्का यकीन है कि गमले वाला पका आम अल्फांसो प्रजाति का ही आम है।”
अग्निहोत्री जी भी खोजी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वे अपने मोबाइल में ऑनलाइन मोड में ही आम  की फोटो लेकर दफ्तर के बड़े बाबू के पास चले गए और बोले – यह देखिए डीडी नगर की हमारी कॉलोनी के मंजुला जी के छत पर अल्फांसो प्रजाति का आम।
आम की प्रजाति उच्च कोटि की थी वह भी दुनियाभर में मशहूर अल्फांसो प्रजाति का। जो इस सीजन में जल्द ही मार्केट में लांच होने जा रहा था, इसीलिए बड़े बाबू भी आम में इंटरेस्ट लेने लगे। वे आम के बड़े  शौकीन थे और जानकार भी। बड़े बाबू ने भी कई घंटे अग्निहोत्री जी से आम चर्चा की।
“देखिए अग्निहोत्री जी आम को यूं ही नहीं फलों का राजा कहा जाता है। आम की तमाम किस्मों में ‘अल्फांसो’ को सबसे अच्छा माना जाता है लेकिन अपने बेहतरीन स्वाद एवं कम उत्पादन की वजह से इसके दाम अक्सर आम लोगों के पहुंच से बहुत दूर होते हैं। भाई आम खाना है, तो खाना है। पिछले साल इसी सीजन में मैंने ₹800 प्रति दर्जन के भाव से अल्फांसो को खरीदा था ।” दोनों की बातचीत को पास ही खड़ा दफ्तर का प्यून रामलाल भी सुन रहा था।
वे रामलाल की तरफ देखते हुए बोले – रामलाल, इस खास  आम का स्वाद तुम्हारे जैसे लोगों के लिए और आम जनता तक पहुंचाने के लिए अब नई मार्केटिंग स्टार्ट हो गई है।
“कैसे सर ? हम भी वो वाला आम खा सकते हैं क्या?”
“अरे क्यों नहीं रामलाल, अब किसी महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान की तरह आसान मासिक किस्तों में यानी ईएमआई पर अल्फांसो को भी खरीद सकते हो। जब उसका स्वाद ही लेना है तो ईएमआई से ले लो।”
“भाई यह आइडिया बहुत अच्छा  है जब हम फ्रीज कूलर जैसी दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को ईएमआई पर खरीद सकते हैं तो फिर आम को क्यों नही? इस तरह हर कोई इस आम को खरीद सकता है। आम आदमी भी अल्फांसो आम खा सकता है। अल्फांसो खरीदो उसका स्वाद लो और  किस्त पटाते रहो। हां इसके लिए क्रेडिट कार्ड होना चाहिए। बस छै या बारह महीने की किस्त ही तो देनी पड़ेगी।”
“अरे साहब हम कहां ?” रामलाल थोड़ा झेपते हुए बोला।
दफ्तर का समय पूरा हो रहा था। रामलाल जल्दी-जल्दी  बिखरी हुई  फाइल समेटने लगा।
अग्निहोत्री जी ने कहा – “अच्छी चर्चा रही बड़े बाबू, चलूं लौटते हुए मंजुला जी के घर भी जाना है। फटाफट एक फोन लगा लेता हूं।” और वे फिर शंकर प्रसाद को फोन लगाने लगे
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