Wednesday, February 11, 2026
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जयंती रंगनाथन की कहानी – एक दिन, हजार रातें

रेन चलने से काफी पहले आ गई थी वो स्टेशन। हमेशा के लिए मुंबई छोड़ रही थी। इसलिए सामान भी ज्यादा था। तीन बड़े सूटकेस। दो गत्ते के बक्से। बहुत कुछ तो वह मुंबई में ही छोड़ कर जा रही थी। सबसे बड़ी चीज, अपना सपना… सपना तो वह अब रातों को सोते समय भी नहीं देखती। कई दिनों से आंखों से नींद गायब है। 
मुंबई-दिल्ली राजधानी में नीचे की बर्थ थी उसकी। खिड़की के पास वह बैठी रही। साथ के यात्री आ गए। ट्रेन चल पड़ी, पर उसने चेहरा घुमा कर किसी की तरफ नहीं देखा। मुंबई सेंट्रल, दादर, कांदिवली, बोरिवली… उसकी आंखें ना चाहते हुए भी भर आईं। 
ट्रेन फर्राटे से चलने लगी। अचानक किसी ने उसे टहोका। उसके पास बैठी महिला कुछ जोर से कह रही थी, ‘बैरा चाय-बिस्किट लाया है।’
उसने नहीं में सिर हिलाया। कुछ देर बाद बड़ी मुश्किल से उसने सूप पिया। खाना भी खाया ना गया। उसके सहयात्रियों को लग रहा था, सोने की कोई जल्दी नहीं है। धीरे-धीरे ऊपर के बर्थ वाले अपनी जगह जाने लगे। वह नीचे के बर्थ में चादर बिछाने लगी थी कि सामने बैठे एक व्यक्ति ने आग्रह करते हुए पूछा, ‘आप अपनी ये नीचे वाली सीट मुझे दे सकती हैं क्या? दरअसल मुझे मिडिल बर्थ मिला है। मेरा पांव… आपने शायद देखा नहीं।’
उसकी तरफ बिना देखे यंत्रवत उसने नीचे बिछाई चादर निकाल ली और अपना हैंडबैग ले कर मिडिल बर्थ में चढ़ गई। यह भी नहीं सुना कि वह व्यक्ति लगातार उसे थैंक्यू-थैंक्यू कहे जा रहा है। 
धीरे-धीरे रेल गाड़ी के हिचकोलों और इंजन की आवाज की जगह सह यात्रियों के खर्राटों ने ले ली।
रात के चार बजे होंगे। हल्की सी रोशनी, ट्रेन की तेज गति और हिचकोलों में क्लोरोफॉर्म सा नशा है। हर कहीं से बस चलती सांसों की आवाजें। तेज एसी। अपने पांवों पर से गिर आए चादर को समेटने के लिए जब उसने करवट ली, तो उसका पैर टकरा गया। मद्धम रोशनी थी, सीट के एकदम छोर पर उंकडू सी बैठी थी वो! हड़बड़ा कर उठ बैठा। लड़की संकोच में आ गई।
‘आप सोई नहीं?’
लड़की ने बहुत मुश्किल से अपना मुंह खोलते हुए कहा, ‘मुझे नींद नहीं आती। बीच वाले बर्थ में बैठना थोड़ा मुश्किल था, सॉरी। आप सो जाइए। मैं ऊपर चली जाऊंगी।’
‘अरे नहीं। आपकी सीट है ये तो। आप बैठे रहिए। वैसे भी एकाध घंटे में सुबह हो ही जाएगी। आप बिलकुल नहीं सोईं?’
लड़की ने ना में सिर हिला दिया।
व्यक्ति उठ बैठा। लड़की ने देखा, उसका बायां पांव घुटने के नीचे से नहीं था।
ट्रेन ने लंबी सीटी दी। आसपास रोशनी सी झिलमिलाने लगी।
व्यक्ति बड़बड़ाया, ‘अब आ रहा है कोटा जंक्शन। लगता है ट्रेन आधे घंटे लेट चल रही है।’
देखते-देखते ट्रेन कई पटरियां बदलने लगी। स्टेशन का छोर नजर आने लगा।
अचानक उस व्यक्ति ने पूछा, ‘आप कुल्हड़ की चाय पिएंगी? यहां बड़ी अच्छी मिलती है। गाड़ी से उतरना भी नहीं पड़ेगा। बोलिए?’
लड़की ने उसकी तरफ देख कर कहा, ‘रहने दीजिए अंकल। आपको तकलीफ होगी। दरवाजे तक चल कर…’
अंकल… आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट आई। अपना चादर फेंक कोने में रखी बैसाखी संभाल वह फौरन खड़ा हो गया। दरवाजे तक उसके पीछे-पीछे लड़की भी गई। सच कहा था उस आदमी ने। स्टेशन पर कंपार्टमेंट के ठीक सामने ठेले पर कुल्हड़ की गर्मागर्म चाय बिक रही थी। आसपास फैली चाय की सोंधी सुगंध। लपक कर उस आदमी ने दो कुल्हड़ चाय खरीद लिए। एक लड़की को पकड़ाया। 
एक घूंट लिया ही था कि ट्रेन चल पड़ी। ट्रेन का दरवाजा बंद। दोनों वहीं खड़े हो कर चाय की चुस्कियां लेने लगे। लाइट बस वहीं जल रही थी। अंदर कंपार्टमेंट में अंधेरा था। 
आदमी ने लड़की को ध्यान से देखा, बुझा चेहरा, आंखों के नीचे काले-गहरे गड़्डे। कंधे तक कटे बाल। जीन्स, नीले फूलों वाली कुर्ती। कंधे पर टंगा स्टोल और हैंडबैग। अपना हैंडबैग हमेशा साथ ले कर चलती है। यानी लोगों पर कम यकीं करती हैं। 
अपनी तरफ देखता पाकर लड़की हलका सा मुस्कराई, ‘थैंक्यू। बहुत अच्छी चाय है।’
आदमी भी मुस्कराया, ‘हां। मैं इस रूट पर आता-जाता रहता हूं। पर बहुत कम पी पाता हूं यहां की चाय। रात को अकसर सो जाता हूं।’
लड़की के चेहरे पर अजीब से भाव आए।
‘तुम कुछ कहना चाह रही हो?’
‘हूं। मैंने दिल्ली से मुंबई आते समय भी यहां चाय पी थी। उस समय मेरे कुछ दोस्त साथ में थे और उन दिनों मुझे नींद भी आया करती थी।’
‘अच्छा। मेरा पूछना अजीब लग सकता है… पर जब तुमने अंकल कह ही दिया है तो बता सकती हो। नींद नहीं आती, कोई खास बात।’
लड़की चुप रही। कुल्हड़ से उठता धुआं देखती रही।
‘क्या तुमने कभी प्लेन से सफर किया है?’
लड़की ने चौंक कर देखा और हां में सिर हिलाया।
‘पता है, ट्रेन और प्लेन के मुसाफिरों में क्या फर्क होता है? प्लेन में हम सब बहुत आत्मकेंद्रित होते हैं। पता नहीं ट्रेन में क्या जादू है, हमें लगता है कि साथ चलने वाले मुसाफिर हमारी यात्रा का एक हिस्सा हैं।’
लड़की के मुंह से हूं निकला।
‘तुम नहीं बताना चाहती। कोई बात नहीं। जाओ, नीचे की बर्थ पर आराम कर लो। दिल्ली आने में देर है।’
‘नहीं। आप सो जाइए। मैं यहां ठीक हूं।’ लड़की ने धीरे से कहा।
कुल्हड़ की चाय खत्म हो गई। आखिरी घूंट पीने के बाद लड़की ने होंठों को चटकाते हुए डस्टबिन में कुल्हड़ डाला। अब थोड़ी संभली हई लग रही थी।
‘आप बताइए, आपका पैर… एक्सीडेंट?’
आदमी ने रुक कर कहा, ‘हां, था तो एक्सीडेंट। मेरी गलती थी… भुगतना पड़ा दूसरों को। ’
‘गलती?’
‘हां। मेरी पत्नी ने कहा था रात को गाड़ी मत चलाओ। इतना तेज मत चलाओ। पर मैंने…’
‘ओह। सॉरी। मैंने आपके घाव कुरेद दिए।’
‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। बोलने या कह देने से सच खत्म तो नहीं हो जाता ना? ऐसा भी नहीं है कि मैंने जीना छोड़ दिया। एक गल्ती की। हो जाती है सबसे।’
लड़की की आंखों में अचानक चमक सी आई, ‘आपके घरवालों ने कुछ कहा नहीं? आप टूटे नहीं? कैसे… ’
आदमी हलका सा हंसा, ‘हमारे परिवार वाले हमें हमारी गलतियों से नहीं तौलते। मैं खुद इतना शर्मिंदा था, एक्सीडेंट में मेरा पांव कट गया, मेरी पत्नी गुजर गईं, लगा था इसके बाद मैं जी नहीं पाऊंगा। पर जानती हो, जीने की वजह ढूंढ़नी नहीं पड़ती, मिल जाती है। आराम से।’
‘मुझे भी ममा माफ कर देंगी ना?’ लड़की के मुंह से अचानक निकला।
‘ऐसा क्या कर दिया तुमने?’
लड़की जैसे बोलने को आतुर थी, ‘मुझे और मेरी दोनों बहनों को मम्मा ने ही पाला, बढ़ा किया। पापा का बिजनेस था। दस साल पहले वे गुजर गए। मैं बीच की बहन हूं। बड़ी बहन टीचर हैं। पापा ने हम तीनों बहनों के नाम एक-एक फ्लैट लिया था, यह कहते हुए कि इनकी शादी में काम आएगा। ममा ने एक फ्लैट बेच कर दीदी की शादी की। पर मैं… ’
‘रुक क्यों गई?’
‘मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। जब हम तीन दोस्त फाइनल इयर में थे, हमने तय किया कि कैंपस इंटरव्यू में नहीं बैठेंगे। हम कोई अपना काम करेंगे, स्टार्ट अप। ममा चाहती थी मैं नौकरी कर लूं। पर मैंने उन्हें समझाया। यही नहीं, मुझे स्टार्ट अप में अपना शेअर लगाने के लिए पैसे चाहिए थे, मैं कहां से लाती? मेरे नाम एक फ्लैट था। मैंने मां को मनाया कि मुझे शादी करने के लिए पैसे नहीं चाहिए, मैं धूमधाम वाली शादी में यकीन नहीं रखती। मुझे वो अपनी कंपनी में लगाने के लिए पैसे दे दे। सबने मना किया ममा को। ताऊ जी, छोटे चाचू सबने। मैं तो पहले ही सबकी नजर में अफलातून थी। ना लड़कियों की तरह कपड़े पहनती, ना उनकी बात चुपचाप सुन लेती। मैं लड़ी, सबसे। मैंने कहा, मुझे शादी नहीं करनी, अपनी कंपनी खड़ी करनी है। ममा मुझे सपोर्ट करती थीं। उन्होंने मेरी बात मान ली… ’
‘फिर?’
‘तीन साल पहले मैं मुंबई आई। इसी तरह ट्रेन में। हम तीनों दोस्त। जोश में भरे हुए। लग रहा था मुंबई जाएंगे, कंपनी शुरू करेंगे, बस रातोरात हम सफल हो जाएंगे… सपने देखते थे हम सब। मैंने भी खूब देखे। वो दिन अलग ही थे। सोते-जागते एक खुमारी थी। हमें फंड भी मिल गया। मैंने मुंबई में फ्लैट किराए पर लिया। हम सबने खूब मेहनत की। पर पता नहीं, कहां गलत हो गए। पहले ही साल हमें पांच करोड़ का नुकसान हो गया। हम तीन लोग थे। एक तो बीच में छोड़ कर अमेरिका चला गया, आगे पढ़ने। नुकसान बढ़ता गया। पिछले एक साल से मैं…’
लड़की आगे बोल नहीं पाई। आवाज भर्रा गई, आंखों में आंसू आ गए।
अपने बैग से उसने टिश्यू निकाला, आंखें पोंछीं। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। 
लड़की ने बोलना शुरू किया, ‘मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरा बैंक बैंलेंस तेजी से खत्म हो रहा था। मैं रोज अपने ऑफिस इस उम्मीद से जाती कि आज कुछ होगा, कोई अच्छी खबर आएगी। हमने अपना स्टाफ हटा दिया। बस हम दोनों रह गए। मां से हर रोज बात होती, उनसे कहती, सब ठीक है। अगली होली, दीवाली में घर आऊंगी। बीच-बीच में जाती थी उनसे मिलने। पर उन्हें कुछ बताया नहीं। बाकि लोग तो हमेशा इस इंतजार में खड़े मिले कि मैं कुछ गलती करूं और वे दबोच लें, मेरा जीना मुहाल कर दें। मैँ बहुत डरने लगी हूं सबसे। पिछले महीने हमें अपनी कंपनी बंद करनी पड़ी। मेरा दूसरा साथी, उसके घर वाले आ कर उसे अपने साथ चैन्नई ले गए। मैं बिलकुल अकेली थी मुंबई में। पैसे खत्म, कंपनी बंद। कहीं कोई उम्मीद नहीं। मैं रात भर सो नहीं पाती, किसी से मिलने का मन नहीं करता। दिन तो गुजर जाता, पर रात को… लगता है एक रात हजार रातों के बराबर है। ना व्हाट्सएप, ना फेसबुक, किसी पर नहीं जाती। मां को फोन करना भी कम कर दिया। नौ महीने हो गए घर गए। दीदी का बेटा हुआ था, तब गई थी। ममा मुझे देख कर शायद समझ गई थीं कि कुछ ठीक नहीं। छोटे चाचू ने सबके सामने मेरी खिल्ली उड़ाई। ममा से कहा कि अब तो तुम मुंबई जा कर मन्नत में रहोगी। उससे कम की उड़ान तो यह भरती नहीं। मैं पहले चाचू से लड़ लेती थी, उनको सुना देती थी। पर पता नहीं क्यों, उस दिन मैं कुछ भी बोल नहीं पाई। ममा समझ गईं। मुझसे पूछा, सब ठीक है। मैंने कह दिया हां। ममा ने थोड़ा मायूस हो कर कहा—बेटी, मेरे पास अब तुझे देने के लिए कुछ बचा नहीं है। मुझे उनकी बात लग गई… छोटी बहन कॉलेज में है। ममा को मुझसे बहुत उम्मीदें थीं। पर मैंने…’
उसकी आवाज बैठ गई। बोलते-बोलते शायद वह थक गई थी। आदमी का चेहरा शांत था। बस बैसाखी का सहारा ले कर वह बोगी की दीवार से टिक गया।
लड़की ने तुरंत कहा, ‘आप अंदर जा कर आराम कीजिए। मैंने आपको तब से खड़ा कर रखा है।’
आदमी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘तुम्हारी बात आधे में छोड़ कर कैसे जा सकता हूं? देखो बातों-बातों में छह बजने को आए।’
लडकी ने भी टेक लगाते हुए कहा, ‘हां, जिंदगी की अच्छी बात तो यही है कि समय नहीं ठहरता।’
आदमी के चेहरे पर अजीब से भाव आए।
लड़की ने कंधे उचकाते हुए पूछा, ‘क्या हुआ? क्या गलत कहा मैंने?’
‘नहीं। सोच रहा था कि जब तुम्हें जवाब पता है सवालों में क्यों उलझी हो?’
‘मैं समझी नहीं।’
‘तुमने कहा ना कि समय नहीं ठहरता। यही तो उत्तर है सब सवालों का। इसी में तो छिपा है हर समस्या का हल।’
लड़की चुप हो गई। 
बाहर रोशनी होने लगी। इक्का-दुक्का लोग उठने लगे। आदमी ने अचानक कहा, ‘अंदर चलें?’
दोनों अपनी जगह आ गए। लड़की खिड़की से टेक लगा कर बैठ गई।
आदमी ने तब तक चादर-तकिया समेट लिया था।
आराम से बैठने के बाद आदमी ने सवाल किया, ‘तो दिल्ली जा कर क्या करने का इरादा है?’
लड़की ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘आज से पहले सोचा नहीं था। समझ नहीं पा रही थी कि घर लौटने के बाद क्या करूंगी? मैं शायद घर लौटना ही नहीं चाहती थी। कुछ सोचूंगी अब… मेरे कॉलेज की एक लेक्चरार आजकल घर के पास कोचिंग सेंटर चलाती हैं। हमेशा मुझसे आयडिया लेती रहती हैं। मुझसे कहती रहती हैं, मेरे कोचिंग सेंटर को आगे बढ़ाओ।’
लड़की थोड़ी संभली हुई लग रही थी। सहज भी, ‘मुझे लगता था कि मैं अपने बारे में किसी को बता नहीं पाऊंगी। सब क्या कहेंगे? लूजर… पर आपसे बात करने के बाद अब हलका महसूस कर रही हूं। लूजर हो या विनर, क्या फर्क पड़ता है? बीता हुआ कल कुछ और था, आने वाला कल कुछ और होगा। ’
आदमी ने सिर हिलाया, ‘मैंने कहा था ना हम कई बार अजनबियों से खुल कर बात कर लेते हैँ। पता है क्यों? हमें ना कुछ पाने का डर होता है ना खोने का। मैं नहीं जानता तुम कौन हो, तुम नहीं जानती मेरे बारे में। हम एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते।’
लड़की सोचने लगी, ‘सही बात है।’
‘पर तुम्हारी एक गलतफहमी दूर करना चाहता हूं।’
‘जी,’ लड़की चौंकी।
‘तुमने मुझे अंकल कहा ना… दरअसल मेरी उम्र ज्यादा नहीं है। मैं उनतीस साल का हूं। एक्सीडेंट और दूसरी वजहों से मेरे बाल जल्दी सफेद हो गए। गिल्टी फील मत करो। इसमें तुम्हारी गलती थोड़े ही है। मैं लगता ही ऐसा हूं। और किसी की गलतफहमी मैं दूर नहीं करता, पर सोचा तुम्हें बता दूं।’
लड़की के चेहरे पर हलकी सी मुस्कुराहट आई, ‘सॉरी, पर एक बात कहूं। आपको अंकल कहा, इसलिए दिल खोल कर बात कर पाई। आपको बुरा तो नहीं लगा?’
‘नो, बिलकुल नहीं। पर मैं नहीं चाहता कि आने वाले दिनों में तुम मुझे एक अंकल की तरह याद रखो।’
दोनों हंसने लगे।
ट्रेन दिल्ली में प्रवेश कर चुकी थी। जाने-पहचाने स्टेशन। लोग अपना सामान सहेजने लगे। लड़की ने सीट के नीचे से अपना सूटकेस निकालना शुरू किया। अंकल कब अपना बैग ले कर आगे बढ़ गए, पता ही नहीं चला।
लड़की पूरी तरह तैयार थी, स्टेशन पर अपनी मां और बहन से मिलने, उनके गले लगने, उनसे हंस कर कहने कि देखो, लौट के बुद्धू घर का आई। घर जाते ही ममा से कहना होगा, अब मैं आ गई हूं, मैं सब संभाल लूंगी। अब तुम्हारी नहीं, मेरे देने की बारी है। बहन के साथ हर शनिवार संगीत सीखना भी शुरू कर देगी। चाचू को पहले की तरह उस्ताद बुलाना शुरू कर देगी। अपने बैग से कंघी निकाल कर उसने बालों पर हलके से फेरा, चेहरे पर कम्पॉक्ट लगाया, अपने सूखे होंठों पर हलकी सी लिपस्टिक लगाई। स्टेशन पर गाड़ी लग गई। 
उसने खिड़की से झांक कर देखा, अंकल उतर चुके थे। उसकी तरफ देख कर हाथ हिलाया और अपनी बैसाखी ठकठकाते हुए आगे बढ़ गए।
अचानक लड़की को लगने लगा, कोई बेहद अपना उससे दूर जा रहा है, फिर कभी ना मिलने को। वह पलटी ही थी कि उसके साथ के एक यात्री ने सवाल किया, ‘आप जिनसे बात कर रही थीं, वो शचींद्र हैं ना, फेमस लेखक, जो पिछले दो-तीन साल से खूब मोटिवेशनल किताबें लिख रहे है? मैंने उनकी कई किताबें पढ़ी हैं।’
लड़की की आंखों में पता नहीं क्यों आंसू आ गए। हाथ में एक नाम जो आ गया! ओह, अब इस नाम का वो क्या करेगी? फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेजेगी? या…  अजनबी को अजनबी ही रहने देगी। मन में हलकी सी उथल-पुथल मचने लगी। उसकी आंखें स्टेशन पर टिक गईं। मां और बहन उसकी तरफ देख कर हाथ हिला रहे थे। होंठों पर मुस्कान लिए वह सामान ले कर आगे बढ़ने लगी। वाकई सुबह हो चुकी थी!
जयंती रंगनाथन
जयंती रंगनाथन
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं कहानीकार हैं. संपर्क - [email protected]
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5 टिप्पणी

  1. जयंती जी!

    बिल्कुल अलग तरह की बेहतरीन कहानी है आपकी। बहुत अच्छी लगी। ट्रेन में सफर करते हुए सभी एक दूसरे के करीब आ जाते हैं। कभी-कभी कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं जो जीवन की धारा को ही बदल देते हैं और यादों में ठहर जाते हैं।
    युवावस्था का उत्साह आकाश के तारे तोड़ लाने की इच्छा रखता है किंतु नियति किस ओर ले जायेगी,यह कोई नहीं जानता। प्लानिंग तो अच्छा सोच कर ही की जाती है लेकिन नतीजा कोई नहीं जानता। कहानी का अंत तो बहुत ही अच्छा लगा। बहुत सकारात्मक है। ईश्वर अगर सफलता का एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरे कई रास्ते रहते हैं जिनकी तलाश की जानी चाहिये।
    निराशा के गहन अंधकार में उम्मीद की एक छोटी सी किरण बहुत सहारा देती है।
    अंत तो बहुत आश्चर्यजनक रहा। कुछ लेखक वास्तव में बहुत अच्छे होते हैं। जिनका थोड़ा सा लिखा प्रेरणा बन जाता है, जीवन को दिशा दे जाता है।
    कहानी कल ही पढ़ ली थी लेकिन कल लिखा नहीं। बहुत ही साफ सुथरी और बहुत अच्छी कहानी के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आपको बधाई।

  2. यात्राएँ बहुत कुछ सिखाती हैं , समझाती हैं , हौसले बढ़ाती हैं , तभी तो यात्रा कहलाती हैं । वो भी ट्रेन की यात्रा जहां यात्री बात करते – करते कब दोस्त बन जाता है , कब जीवन का सूत्रधार बन जाता है या कभी-कभी रास्ते के साथ चलता कोई चुप सा दस्तावेज लिखता मुसाफ़िर, पता ही नहीं चलता । जयंती जी की भी कहानी कुछ ऐसी ही है ।
    मेरी बधाई आपको

  3. बहुत सुंदर कहानी चलचित्र की भाँति … कई चित्र चलते रहे आपकी कहानी के और अभी पूरी की गई अपनी ट्रेन यात्रा के सचमुच ट्रेन का सफ़र अलग अनोखे अनुभव देता है इतने अनजान चेहरों में भी अजनबीपन महसूस नहीं होता और यहाँ तो इस पात्र ने ट्रेन में जीने के खोए मकसद को ढूँढ लिया ।
    बधाई बेहतरीन कहानी के लिए ।

  4. बहुत समय बाद एक सरल, सहज, सुकून देती,अलग तरह की सकारात्मक सोच की बेहतरीन कहानी पढ़ने को मिली।साधुवाद जयंती जी॥ आपको बहुत-बहुत बधाई।

  5. अभी रात के 1.15 बजे समीक्षा लिखने बैठूं तो सचमुच सुबह हो जाएगी कारण कहानी से ज्यादा जयंती जी के बारे में लिखने लगूंगा .इनकी लिखी रूह की प्यास और गीली छतरी को एक सांस में पद गया. एक राज की बात है कहानी लेखन के मेंटर रही है जयपुर में…. अब बस कल समीक्षा लिखूंगा …. ट्रेन मुंबई से दिल्ली पहुंचा कर अब सोऊंगा….नमस्ते

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