“कष्ट शीश पर धरी शिला सा होता है और हर किसी को उसके सिर पर धरी शिला सबसे भारी लगती है। मुझे भी ऐसा ही लगता था।“
नुक्कड़ कैफे के एक हॉल में कुछ लोगों से घिरी बैठी श्रेया के हाथ में थमे चाय के कप से धुआं – धुआं भाप और दिल से धुआं– धुआं लफ़्ज निकल रहे हैं। लफ्ज़ लोगों के दिलों को अपनी नमी से नम करते हुए उनमें समा रहे हैं. वहां मौजूद लोगों ने भी हाथों में कप थामा हुआ है. बाहर बेहद ठंड है. चाय की चुस्की के साथ गर्म कप थामने में भी सुकून है.
“कष्ट की इस शिला को ढोते हुए मुझे अपने से डर लगने लगा था. मैं सामने या बगल से कोई ट्रक आता तो डरती. दिल किसी पत्ते सा कांप जाता कि कहीं यह वह हवा तो नहीं जो मुझे झड़ा ले जाएगी? दिमाग हाथों को तेज डांट लगाने लगता कि नहीं… तुम नहीं हिलोगे. यूं ही एक्टिवा के हैंडल को कस कर पकड़े रहोगे! पैदल चलते हुए दिमाग पांव को डांट लगाता कि नहीं… तुम नहीं लड़खड़ाओगे! यूं ही मजबूती से कदम दर कदम आगे बढ़ते जाओगे! और दिल कहता कि बस हाथों का एक हल्का झटका या एक तेज लड़खड़ाहट और फिर ‘धड़ाम’… सारे कष्टों से मुक्ति…
श्रेया ने एक लम्बी साँस ली जबकि लोगों की साँस ही रुक गई. कैफ़े की हवा तक इस मुक्ति की राह की कल्पना कर बोझिल हो उठी. श्रेया की बातों में रंग नहीं हैं. ज्यादातर बातें कष्ट के काले परिधान में हैं. काला नहीं तो धूसर– सलेटी सा कुछ, जो कैफे की दीवारों से बिल्कुल अलग है. कैफे की दीवारें चटख रंगों से रंगी हैं. दीवारों में उकेरी हुई रंग बिरंगी आकृतियों के बीच बहुत से लोगों की जिंदगी बदल चुके और ज़िंदगी बदलने में समर्थ, प्रेरक वाक्य खिले हैं. प्रेरक वाक्य जो महान व्यक्तियों के अनुभवों की कढ़ाई में उबल कर बनी मिठास भरी रबड़ी होते हैं. एक ओर की दीवार पर एक बैनर लटका हुआ है, जिसमें बड़े–बड़े लाल शब्दों में लिखा है– मानव पुस्तकालय. उसके नीचे नीले रंग में कुछ छोटे अक्षर हैं– पुस्तक क्रमांक– एक. तीसरी पंक्ति गुलाबी मोतियों से चमकते रंग में रंगी है–
‘जब तक सांसे हैं, लड़ना है, जीना है.’
आज कैफे एक नए अनुभव से आलोकित है। कुछ मानव पुस्तकों की आवाजें कैफे के अलग–अलग कोने की हवा में तरंगें उठा रही हैं। एक कोना श्रेया की आवाज से स्पंदित है.
‘मैं अपने घर में,अपने आस–पास में, अपने दोस्तों में एक अकेली थी; जो यूँ इस कदर बेरहम दर्द से लड़ रही थी. मेरी नजर में मैं दुनिया की सबसे दुर्भाग्यशाली लड़की थी. मेरा पेट दर्द जो मुझे चीथता,भोंकता,मरोड़ता रहता; उसके होते मैं और हो भी क्या सकती थी. आज मैं श्रेया आपको अपनी कहानी सुना रही हूँ तो इसलिए कि कहानी फिर क्या हुआ की पर्वत श्रृंखला है, जिसमें चढ़ते–उतरते हम जिंदगी के कई पलों को उनके ऊपर उठकर देख पाते हैं और क्यों हुआ के उत्तर ढूंढ पाने के काबिल होते हुए, कैसे की राह निकाल पाते हैं.
श्रेया की जबान एक पल को तालू से चिपक सी गई. आवाज गुम हुई, जो अगले ही पल वापस आ गई. शायद उसे शुरुआत कठिन लग रही थी,
‘जरुरी नहीं की हर किसी के जीवन में यह पल आये और जीवन में ऐसे पल आने का कारण हर किसी के लिए अलग हो सकता है लेकिन किसी-किसी की जिंदगी में कोई समय ऐसा कठिन गुजरता है कि उस समय की रेखा पर चलने से कहीं अधिक आसान चलना ही बंद कर देना लगता है, अपनी जिंदगी को खत्म कर लेना लगता है. मेरा यह वही वक्त था. हर दिन लगभग आठ से दस घंटे पेट का यह दर्द मेरी सवारी करता. मेरी लगाम उसके हाथ में होती. वह चाहता तो मैं अपनी जिंदगी जीती. वह चाहता तो मुझे बिस्तर से चिपक जाना होता. वह भी महीने में बीस से बाईस दिन. हर महीने यह दर्द दिन के किसी निश्चित समय पर शुरू होता जो अक्सर दोपहर बाद का समय होता. दर्द पहले हल्का होता, जो धीरे–धीरे बढ़ता जाता.यह किसी जोंक सा मुझसे चिपक मुझे चूसता, मैं रोती, ऐंठती. वह मोटा होता जाता फिर पेट भर रक्त चूस कर, दम भर मोटा होकर गिर जाता. उस रक्त को पचा पतला होता जाता और फिर अगले रोज उसी वक्त पर मेरे रक्त की तलाश में चला आता. दर्द मेरी शक्ति हर रहा था, तन से भी अधिक मन की. दर्द से थकता, हारता, मजबूर पड़ता मन बार–बार कहने लगा था कि हार जा और पा ले मुक्ति.
दर्द से मुक्ति की तलाश में इंसान दर दर भटक सकता है, अंधविश्वास पर विश्वास कर सकता है और विश्वास पर अंधविश्वास; पर बाज़ दफा ऐसा दर्द ऐसी बीमारी हर विश्वास को धता बता देते हैं। खबरों में अक्सर नजरें किसी ऐसी खबर पर जा टिकतीं कि दर्द से परेशान हो फलाने ने आत्महत्या की, बीमारी से अलाना हार गया। आज पीछे पलट कर देखूं तो लगता है कि बचपन से मन में बैठाये विश्वास ऐसे समय में हमें मजबूत बनाते हैं. विश्वास कि ईश्वर हैं, वे आपका भला करेंगे, इस जन्म में आप जो कष्ट भोग रहे हैं दरअसल पिछले जन्मों के बुरे कर्मों का परिणाम हैं. हिसाब बराबर होते ही आप के अच्छे दिन वापस आ जायेंगे. विश्वास प्रश्नों के परे होते हैं, तर्कों के भी परे. तर्कों से जिंदगी मुश्किल होती है विश्वासों से आसान. अपने इन विश्वासों को तर्कों की कसौटी पर कस आप अविश्वास की ओर तभी जा सकते हैं जब आप बहुत हिम्मती और मजबूत हों. जैसे भगत सिंह थे. सिर्फ अविश्वास आपको थोथा चना मात्र बना सकता है. मुझे कभी –कभी ईश्वर पर से विश्वास खो देने की अदम्य इच्छा होती पर फिर जन्म से आस्तिक मुझमें, दर्द से बेहाल मुझमें इतनी भी हिम्मत नहीं बचती कि विश्वास खो देने की हिम्मत जुटा सकूँ और दर्द सहना मेरी मजबूरी होता जाता।
दर्द की इस मजबूरी में घर एक बड़ा सहारा होता है.जब कभी भी उस नाजुक मोड़ पर खड़ी होती, जहां मन जिंदगी को पकड़ने और छोड़ने के दोराहे पर होता तो वहां मम्मी पापा साथ आ खड़े होते और साथ आ खड़ा होता खुद के ना रह जाने पर उनका दुख. जिसकी विशालता के आगे मां पापा की विवशता, जिंदगी पकड़े रखने की हिम्मत देती. श्रेया के हाथों की पकड़ चाय के कप पर मजबूती होती गई. मानो कप उसकी जिंदगी हो, उसने अपनी पकड़ छोड़ी कि वह जर्रा–जर्रा हो बिखर जाएगा. उसने एक बड़ा घूँट भरा. सुनने वाले कहानी में जकड़े रहे. उनमें मानव पुस्तक को सुनने की, जानने की उत्सुकता है, कहानी में दर्द में घुटने का, दर्द से लड़ने का जज्बा है, ज़िंदगी की जिजीविषा की आस है.
मेरे पास वह पल तो नहीं लेकिन उस पल तक पहुंचाने वाला रास्ता फिर–फिर लौटता, खुलता, मुझे पुकारता था. इस शिद्दत से आती पुकार से दो– एक बार मैं विचलित भी हुई पर किसी अपने का उस पल में साथ मिल जाने से उसकी ओर बढ़ने से बच गई.
श्रेया के यह कहते ही बिधुन सुनते उसके पाठकों के चेहरे पर जिज्ञासा उभर आई. एक आवाज कौंधी,
‘क्या कोई ऐसा वाकया साझा कर सकती हैं? जब आप उस कयामत के पल के बिल्कुल करीब थीं.’
यह काला मफलर लपेटे कोई युवा था. जिसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी दिखी श्रेया को. इस आवाज से उसका दिल एकबारगी लरज़ उठा.
क्या वह उस पल को यहां सब के सामने साझा कर ले? कैसे साझा कर ले? आज तक उसके अलावा कोई इस पल में उसकी सोच का साझीदार नहीं बना है. आज भी मानव पुस्तक के रूप में उसने आत्महत्या से बचने की राह साझा करने की चाह की थी पर ऐसा कोई वाकया साझा करने का तो नहीं सोचा था. उसका मन दो भागों में बंट एक के बाद एक शॉट खेलने लगा, यदि साझा नहीं करना है तो मानव पुस्तक बनने की चाह ही क्यों की? पुस्तकें अपनी बातें छुपाती नहीं है. वह जस की तस सबके सामने होती हैं. यह पढ़ने वाले के ऊपर है कि वह उस लिखे की गहराई तक पहुँचता है या ऊपर ही ऊपर पार कर जाता है.
कुछ क्षण उसकी झिझक भरी चुप्पी कैफ़े की हवा में पसरी रही जिसे तोड़ा कैफ़े संचालक की धीर–गंभीर आवाज ने,
“पुस्तकें किसी प्रश्न का जवाब नहीं देतीं. वे बस अपनी बातें कहती हैं. आपको अपने प्रश्नों के उत्तर पुस्तक की बातों में ही तलाशने होते हैं. आशा करता हूं आप यह बात समझेंगे।”
इस बात ने श्रेया की तनी नसों को ढीला कर दिया. वह युवा कुछ कहने को हुआ पर फिर उसने सिर हिला दिया. पाठकों का मन भी इस तर्क से सहमत दिखा. कुछ देर की चुप्पी के बाद श्रेया की सधी आवाज गूंजी.
“यह दर्द के बहुत शुरुआती समय की बात है. दर्द जब शरीर तोड़ता– मरोड़ता तो लगता कि काश कोई ऐसी मशीन होती जिसमें मैं खुद को डाल सकती; काश वह मशीन मुझे कस लेती और फिर मरोड़ती, मसलती, दबाती कि दर्द से राहत मिलती पर ऐसी कोई मशीन तो कहीं है नहीं. जब दर्द होता तो भाई या पापा पैर– कमर दबाते। जब तक दबाते तब तक ही आराम मिलता, मम्मी के पास तो इतनी जोर से मालिश करने की ताकत ही नहीं होती कि मुझे आराम लगे. तब वे मुझ पर खड़े होकर खुन्दती; पर ये सब कितनी देर हो सकता था दिन भर तो नहीं. ऐसे दर्द की बेचैनी में लेटना दर्द पर एकाग्र होना लगता तो मैं चलने लगती. हमारे घर से कुछ दूर एक ओर पहाड़ी है तो एक ओर नाला. नाला पार कर लगभग एक किलोमीटर दूर एक रेलवे लाइन है. मैं अक्सर चलते हुए पहाड़ की ओर जाती. पहाड़ में चढ़ना अधिक मेहनत, अधिक एकाग्रता की मांग करता. पहाड़ चढ़ने में आती कठिनाइयों से शायद दर्द से ध्यान भटकता तो दर्द की तीव्रता कम हो जाती या शायद उसका एहसास नहीं होता या जाने यह कोई मेरा भ्रम था पर जो भी था, मैं अधिक से अधिक कठिनाई भरी राह पर चलना चाहती.
एक दिन पहाड़ी की एक पगडंडी के बगल से, पत्थरों के बीच से रास्ता बनाते हुए मैं चढ़ती चली जा रही थी, तभी पगडंडी पर ऊपर से दौड़ते–भागते आते दो ग्रामीण दिखे. मुझे चढ़ते देखा तो चिल्लाए – “भागो! भालू है! भालू है!”
एक पल को मुझे कुछ समझ नहीं आया पर जब उनके पीछे एक काली झबरीली पर डरावनी गेंद लुढ़कती दिखी तो मैं उनके आगे ही भाग पड़ी.
हमारा घर जंगल की सीमा पर ही था. वहां भालू, जंगली सूअर का आना कोई बड़ी या अचंभे वाली बात नहीं थी. जंगल की कई पगडंडियां इनके ही कदमों से बनी थीं, जिन पर चल कर वे पहाड़ी से उतर कर नाले तक पानी पीने जाया करते थे. कुछ सालों पहले उनके इसी रास्ते में हमारा घर खड़ा हो गया था. एक बार तो हमने यहाँ एक तेंदुआ और जंगली हाथियों के दल को भी देखा था. जिसमें चार बड़े और एक बच्चा हाथी था.
श्रेया के चेहरे और आवाज में रोमांच की एक चमक आई. उसकी आवाज में जो धीरता–गंभीरता अब तक थी उसकी तुलना में यह चमक किसी और ग्रह से आये सिग्नल सी लगी. यह चमक आई और चली गई. शाम होने लगी, सूरज डूबने से पहले बादल सिंदूरी हो उठा. बादल सब कुछ उन्नाबी कर देने पर आतुर दिखे. कैफ़े की खिड़की से दिखते आसमान की इस उन्नाबी आभा की झलक श्रेया के चेहरे के एक ओर चली आई.
“अक्सर मरने के विषय में सोचने वाली मैं उस पल क्यों नहीं रुकी? दरअसल मरना कोई नहीं चाहता. मरने की ओर बढ़ता हुआ इंसान भी यही चाहता है कि उसे हाथ बढ़ाकर कोई रोक ले.वह हर एक अंग से चिल्ला–चिल्ला कर कहता है कि मुझे रोक लो, मुझे रोक लो… उस दिन के बाद से मैंने पहाड़ी की ओर घूमने जाना बंद कर दिया. मुझे भालू से मारे जाने के डर से भी अधिक घायल कर दिए जाने का डर था कि भालू ने कहीं मेरी आंखें निकाल दीं या घायल कर दिया तो अपने इस दर्द के बोझ के साथ दूसरे दर्द का गट्ठर भी धरना होगा. उस दिन के बाद से मैं नाला पार कर रेलवे लाइन की ओर चलने लगी.
श्रेया ने हाथ में पकड़ा कप किनारे रख दिया. वह बताती रही, लोग सुनते रहे। पुस्तकें रोचक होती हैं. वे सीधे पहाड़ की चोटी से तलहटी में नहीं उतरती। वे टेढ़े–मेढ़े घुमावदार रास्तों से होते हुए नीचे उतरती हैं या ऊपर चढ़ती हैं और उसे भी रोचक होना था.
‘वह नाला सिर्फ बारिश में पानी से भरा होता, बाकी दिनों रेतीला नाला किसी धूप सेंकते अजगर सा पसरा पड़ा रहता. उसकी रेत में झीरी खोद कर गाँव के लोग अपने लिए पानी ले जाया करते. उस दिन मैं नाला पार कर आगे बढ़ती गई. दर्द हिलोरे ले रहा था. पैर लकड़ी की तरह मालूम होते थे और कमर दर्द से टूट रही थी. उन से लड़ते, लड़ने में राहत पाते मैं जब रेल की पटरियों से कुछ दूर थी तब दूर से एक ट्रेन ने सीटी बजाई. वह ट्रेन मेरी ओर चिंघाड़ती चली आ रही थी. उसी क्षण दर्द की एक तेज लहर ने मुझे दोहरा कर दिया. उस लहर में मानो कोई सम्मोहन था. अब वहां सिर्फ मैं और ट्रेन थे. दुनिया कहीं नहीं थी और ना थे ऐसे क्षणों में हमेशा साथ आ जाने वाले मम्मी पापा. मैं जड़ हो चुकी थी. गतिमान कुछ थी तो सिर्फ यह सोच कि ट्रेन के पहिये मेरे ऊपर से निकल जाए तो मुझे दर्द से मुक्ति मिल जाएगी. ट्रेन के सम्मोहन में मैंने पटरियों की ओर जैसे ही कदम बढ़ाये कि पीछे से पापा ने तेज आवाज में पुकारा ‘श्रेया’… मैं पलटी. जैसे किसी स्वप्न से जागी हुई सी भौंचक खड़ी रही. पापा कुछ कहते रहे, वह पल गुजर गया.
सच कहूँ तो वह पल टल जाना बहुत अहम होता है. वह एक पल ही होता है जब कोई जिंदगी छोड़ने का एकबारगी निर्णय ले लेता है. यदि किसी के साथ से या किसी भी तरह वह पल निकल जाए तो वापस उस पल तक पहुंचने में एक सफर पूरा करना होता है. कभी यह सफर बेहद छोटा होता है तो कभी इस पल पर लौटने में पूरी जिंदगी निकल जाती है और वह पल लौटता ही नहीं.
इस वाकये ने रहस्य खोला तो इस अनुभव का श्रेया के जीवन पर प्रभाव जानने की उत्सुकता कई पाठकों के चेहरे पर उभर आई पर उन्हें ख्याल रहा कि श्रेया पुस्तक है. कुछ पलों के मौन में श्रेया मानों खुद के अन्दर उतर फिर बाहर निकल आई,
‘उस दिन के बाद से दर्द के दौरान मेरा यूँ पागलों की तरह चलना, घर से निकलना, बंद हो गया. जिस साल दर्द पहले–पहल शुरू हुआ, तब मैं कॉलेज में गई ही थी. दर्द इस कदर भयानक था कि उसने उस साल पढ़ने की मोहलत ही नहीं दी थी. घर वालों ने कहा कि परीक्षाएं छोड़ दो; अगले साल दिला लेना लेकिन मेरी जिद थी, कि मैं अपना साल खराब नहीं करूंगी. मैंने दर्द सहते हुए, दर्द की दवाएं खाते हुए, किसी तरह पढ़ते हुए परीक्षाएं दिलाई और अच्छा ही हुआ यदि उस साल रुक गई होती, तो शायद आगे पढ़ ही ना पाई होती क्योंकि दर्द ने तो अगले बारह सालों तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा था; भले चार–पांच सालों बाद थोड़ी मोहलत देने लगा था.
पुस्तक के कट्ट– काले पृष्ठ पर एक सफ़ेद बिंदु टपका. जिसने पुस्तक की काली धूसर बातों के बीच में कुछ शुभ्र–धवल आशा का अहसास कराया। जैसे बादलों से भरी घनघोर काली अंधेरी रात में कुछ पल को चाँद चमक उठा. श्रेया ने एक थमी हुई साँस ली. उसका चेहरा भूत में डूबा, बहुतों के भविष्य की सुनहरी कल्पना में दिखा.
‘जिद कभी–कभी जुनून में बदल जिंदगी के जर्रे–जर्रे को जगा देती है, संवार देती है लेकिन इस संवारने में आप अकेले नहीं होते. आपका परिवार तो होता ही है लेकिन बहुत से दूसरे लोग भी होते हैं जो आपके जाने–अनजाने आपकी जिंदगी संवारते हैं. मैं अपनी उस दोस्त को कभी नहीं भूलती जिसके साथ मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के समय हॉस्टल में रहती थी. वो दर्द से मुझे हलकान देख खुद भी हलकान हो उठती. जब मैं दर्द से तड़पती तो कभी अपनी कॉपी तो कभी अपनी पुस्तक लिए वह मुझ पर चलती और साथ ही पढ़ती होती. श्रेया की आवाज कृतज्ञता से भीग उठी. आज मैं जिस मुकाम पर हूँ इसमें कितने ही लोग है जो मुझ में छूटे हुए हैं. आप खुद को देखें तो पाते हैं कि उनके आप में छूटे होने और उनका छूटना महसूस कर सकने ने ही आप को आप बनाया है.
दर्द की शुरुआत के कुछ साल बाद के उन दिनों में दर्द था पर दर्द से मिली वक्ति मोहलत भी मिलने लगी थी. इस मोहलत को मैं अधिकतम निचोड़ लेना चाहती . कई जिंदगियाँ जिंदगी को घूंट घूंट पीते हुए, जीते हुए भी प्यासी रहती हैं. कई जिंदगियों को एक लम्बे सफ़र के बाद अमृत घट भी मिल जाता है और अमृत घट उसे ही मिलता है जो उसकी खोज में होता है। मैं इसकी खोज में थी. सात–आठ साल बाद समय के साथ भले दर्द की तीव्रता कम हुई और समय भी आठ– दस घंटे से कम हो छह– सात घंटे हो गया. दिन में तीन दर्द की गोलियों से मैं एक गोली तक उतर आई पर महीने में पंद्रह –सोलह दिन दर्द अब भी दर्द बना ही रहा. इलाज की कोशिशें, डॉक्टर–अस्पताल–दवाइयां, गंडे–ताबीज सब जारी ही रहे। कारण समझ के परे रहा. निवारण भी परे ही बना रहा. बस यह समझ आ गया था कि कष्ट बेहद हो पर जीवन निशाने पर नहीं है, सो जिंदगी चलती रही.
‘पहले पढ़ने की जिद थी फिर कुछ बनने की फिर जब बन गए तो जिद ने अपना चोला बदल लिया कि किसी से सहानुभूति नहीं चाहिए. यूँ ही महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र में कमजोर, कामचोर, बहानेबाज नहीं भी कहा जाये तो भी ‘महिला है’ तो कहा ही जाता है. मुझे अपने आप को साबित करना था. किसी को पता नहीं चलता था कि मैं रोज दर्द की दवाई लेकर काम कर रही हूँ. मम्मी पापा से दूर नौकरी शहर में थी पर काम के नए जोश में उनसे दूर रह कर भी उनकी शक्ति मुझे मिल ही जा रही थी.’
‘साल में कई मौसम आते जाते हैं। सूरज की शक्ति भी बदलती दिखती है फिर ये तो एक अदनी सी ज़िंदगी ही है। उस दिन दर्द ज्वार में समंदर की लहरों सा उठ रहा था. मुझे झिंझोड़ रहा था, पटखनी दे रहा था. मैं जिद में थी कि झुकुंगी नहीं लेकिन न झुकना जीतने या टूटने की ओर कदम बढ़ाना होता है. अब तक दोराहे पर ठिठकी खड़ी मैं उस रोज टूटने की ओर बढ़ चली थी. जाने क्यों उस रोज दर्द की गोली ने भी असर नहीं किया. दर्द से जलती हुई मैं ऑफिस से घर चली आई. वहां कमरे की चार दिवारी में मैं अकेली थी और था दर्द का दानव. इस दर्द के दानव के दमन में मुझे संभालने वाले घर वालों का सशरीर साथ नहीं था. उपस्थिति की कमी हरदम सिर्फ मानसिक सहारे से संभव नहीं. दर्द से जूझते रात हो गई, मैं थक कर बालकनी में चली आई. सामने दूर तक अँधेरा फैला हुआ था. मानों अँधेरे ने मुझे पुकारा. जाने क्या हुआ कि मैं रेलिंग कस कर पकड़ खड़ी हो गई.’
‘क्या तीन मंजिल की ऊंचाई गिर कर मर जाने के लिए पर्याप्त होगी? शायद हां, शायद नहीं!”
‘मैं नीचे की ओर झुकती चली गई कि सिर के बल गिरना ही मौत की गारंटी होगी. कमर से ऊपर का हिस्सा रेलिंग से जितना झुक सकता था मैंने झुका लिया. अब बस पैरों की एक उछाल और मैं सर के बल नीचे.
तभी एक शंका मन में आई कि कहीं ना मरी, मात्र घायल हुई तो…मुसीबत खुद की भी और मेरी सेवा करने वाले मम्मी पापा की भी.’
‘मम्मी–पापा! एक झटका सा लगा. मैं यूं मर गई तो उनका क्या होगा? कितना प्यार करते हैं मुझे! वह तो बिल्कुल टूट जाएंगे. मेरा जाना उनकी जिंदगी से सुख का चला जाना और जिंदगी भर के दुख का बोझ उठाना होगा. क्या मैं मम्मी पापा को ऐसा दारुण दुख देना चाहती हूं?’
‘कभी –कभी कुछ प्रश्न कुछ आशंकाएँ आपकी जिंदगी बचा ले जाती हैं. इन प्रश्नों ने मुझे रोक लिया. रेलिंग से नीचे झुकती मैं सीधी खड़ी हो गई. मैंने वह पल फिर निकाल लिया. मैं बालकनी से अंदर कमरे में चली आई पर अंदर से बेहद विचलित मैं दर्द और प्रश्नों के ज्वालामुखी में जलती भुनती रही.’
‘कितनी बार मैं बार–बार लौटते इस पल को चकमा दे सकूंगी?’
‘क्या मेरा दर्द मेरी जिंदगी से भी बड़ा है ?’
‘पर मेरा दर्द इतना ज्यादा है! कैसे जिया जाये इतने दर्द के साथ? दुनिया में इससे भी अधिक दर्द शायद ही किसी को होगा? मन ने खुद को खुद के सबसे अधिक दर्द सहने, दुखी होने का दिलासा दे अपने इस कदम को सही ठहराना चाहा. अवचेतन मन ने धीमा सा विरोध दर्ज कराया,
‘पर दुनिया इतनी बड़ी है तुमने दुनिया देखी कहां है?
मन खुद को सबसे दुखी मानने अड़ सा गया था, वह किसी भी तरह अवचेतन को चुप करा देना चाहता था.
‘तो कहाँ देखूं दर्द की दुनिया कि खुद का जाना उचित मान सकूँ या कि रुकने की हिम्मत बटोर सकूँ.’
यह अवचेतन से प्रश्न नहीं अपितु प्रश्न के रूप में उसे चुप करने का हथियार था पर मन ने जवाब दे दिया,
खिड़की के गुलाबी कांच से आती धूप में श्रेया का चेहरा एक संघर्ष में डूबा दिखा। आधे उन्नाबी आधे सुनहरे चेहरे में एक फीकी हंसी फैली. इस फीकी हंसी के साथ दर्द और संतोष एक साथ उभर आये. उसके चेहरे में दो ओर से पड़ते दो रंग साथ मिलकर एक नया ही रंग बनाते दिखे. दो रंगों के मेल से बने नए रंग को जानना– समझना थोड़े रियाज़ की मांग करता है. ये रंग सिर्फ उन्हें समझ आये जिनका रियाज था. वह आगे बढ़ चली,
‘रात भर मन में विचारों के बवंडर चलते रहे और दर्द किसी चक्रवात सा अंदर तोड़फोड़ मचाता रहा. रात टूटते–समेटते किसी तरह गुजरी. अलसुबह बाहर निकल आई. कुछ ही दूर पार्क में पीपल के चबूतरे पर बैठ गई. अचानक ही हवा चलने लगी पर पीपल ताली बजाता चिढ़ाता लगा. आकाश में सूरज उगने की लालिमा झलक रही थी. दर्द की एक तेज लहर ने मुझे पेट दबा दोहरा होने पर मजबूर कर दिया. वह लहर कुछ कमजोर पड़ी तो फिर मैंने सिर उठाया. इस बार पीपल की पत्तियों के बीच से झांकता चांद दिखाई दिया. चांद और सूरज! एक ही आसमान में दोनों एक साथ. उस एक पल मुझ पर इस दुनिया की विराटता और रहस्यमयता का खुलासा सा हुआ. मैं किसी अनजाने, रहस्यमय सम्मोहन में कुछ बंध सी गई. जैसे किसी ने मुझे निर्देशित किया हो अचानक मैंने एक्टिवा उठाई और पास ही के मेडिकल कॉलेज अस्पताल की ओर बढ़ गई. रोज जिसके सामने से गुजरते हुए ऑफिस आया करती थी. दर्द मानो कील और हथौड़ी बन मेरे पेट की दीवार को ठोंक रहा था.’
‘अस्पताल पहुंची तो मुख्य द्वार पर अफरा–तफरी का माहौल दिखा. एक एंबुलेंस खाली खड़ी थी. कुछ लोग एक स्ट्रेचर के साथ दौड़ते हुए अस्पताल के ट्रामा सेंटर के अंदर जा रहे थे. दर्द अब भी हिलोरें मार रहा था. मैं उस दर्द के नोंक पर उंगली जमाए हुए उधर ही बढ़ गई. सामने जमीन पर कुछ खून की बूंदे गिरती गई थीं. उन बूंदों के साथ-साथ पांव रखती मैं बढ़ती गई. एक कमरे के सामने जाकर बरामदे में वो स्ट्रेचर रुक गया. साथ के लोग अंदर चले गए. उस स्ट्रेचर में लाल साड़ी पहनी एक महिला दर्द से ऐंठती दिखी, जिसके पास एक अन्य महिला खड़ी थी. उसके हाथ में एक प्लास्टिक बैग था, जिसमें एक कटा हुआ पैर रखा था. दिल यूँ घबराया मानों उसका एक टुकड़ा ही कट गया हो. मैं जहां थी वहां थमी रही. मेरा रोम–रोम मानो आंख और कान बन गए.’
‘वह महिला जब ट्रेन में चढ़ ही रही थी कि अचानक ट्रेन चल पड़ी और वह पटरियों पर गिर गई. बहते खून से पूरा स्ट्रेचर भीगा हुआ था. उसकी घुटने के नीचे जहां से पैर कटा हुआ था, खून का लाल चहबच्चा था.’
‘उसे देखते ही सबसे पहली बात मन में आई कि इसे तो पक्का मुझसे ज्यादा ही दर्द हो रहा होगा पर मन अड़ा रहा कि दर्द मुझे भी कम नहीं हो रहा. कुछ पल उस औरत की तड़प देखने और उसके भविष्य की कल्पना ने मन को चुप करा दिया. मुझे सामने मेरे दर्द को चुनौती देता दर्द दिख रहा था. जिसने दर्द की दुनिया की ओर मेरे मन की राह खोल दी. अब मुझे दर्द की दुनिया देखनी थी और उस दुनिया में अपने दर्द का अस्तित्व जानना था, स्थान जानना था. अपने दर्द से और उस महिला के दर्द से हकबकाई मैं इधर–उधर देखते अस्पताल के कोरिडोर में आगे बढ़ती गई. मेरे सामने दर्द का दरिया बह रहा था. जो चीखों, कराहों, सिसकियों, सिसकारियों से डबक रहा था. अब तक मेरी नज़रों से ओझल दुनिया के दर्द के समंदर में बहुतों का दर्द धूप में नश्तर के चमकते फलक सा चमकदार, एकदम स्पष्ट नजर आ रहा था. जो मेरे दिल को टुकड़ों टुकड़ों में काट रहा था पर दिल का यूँ कटना ही दिल का जुड़ना भी था. मेरे दर्द की बहती नदी समंदर में सामने लगी अपना अस्तित्व जानने लगी. मेरे अपने दिल का दर्द रिसता हुआ तिरोहित होने लगा. दर्द से हलकान सिर्फ मैं नहीं हूँ! एहसास कि आप अकेले नहीं हैं; बहुत बड़ा संबल होता है. यह संबल यूं तो वर्षों से मेरे साथ था पर घर से दूर घरवालों से दूर आज इस वक्त यह एक नए कलेवर में मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि दर्द में मैं अकेली नहीं तो दर्द भी मेरे अकेले का नहीं.’
‘यहाँ हर चेहरा दर्द की दास्तान समेटे था. मेरे सामने नन्हा चार साल का बच्चा था. जिसके बाल कीमो से झड़ गए थे. वह कीमो का दर्द सह रहा था. वह दर्द जिसके सामने बड़े–बड़े भी हथियार डाल देते हैं. उस बच्चे की मां का दर्द सोचिए जिस के सामने उसका बच्चा कैंसर के दर्द से तड़प रहा है पर वह कुछ नहीं कर पा रही. उसका बस चलता तो वह बच्चे के हिस्से का दर्द भी खुद सह लेती’
यह सुनकर आपको बहुत अजीब लगेगा लेकिन उसकी पेशानी पर उभरी दर्द की लकीरों ने उस वक्त मुझे संबल दिया था, मुझे थामा था. मेरे सामने स्ट्रेचर पर पड़े उस दादा के दर्द ने मुझे दिलासा दिया था; जो अपने गैंग्रीन से गलते पांव के साथ अपने चौदह बरस के पोते को अनाथ छोड़ जाने की सोच में गले जा रहे थे. पास ही स्ट्रेचर में पड़ी थी– ठठरी सी देह. मैंने उस ठठरी देह की रिसती आँखों, और दबी हुई रुलाइयों से भी अपने लिए ताकत बटोरी थी, जिसे डॉक्टरों ने महज चार महीने का समय दिया था. वह मात्र हड्डी और हड्डी छोड़ती हुई खाल लिए एक युवा था, जिसे उसका पचासेक साल का पिता अपनी बाहों में किसी नन्हे बच्चे की तरह उठा कर लाया था. कहते हैं किसी पिता के लिए उसकी संतान का जनाज़ा सबसे भारी होता है. वह पिता हर पल इस भार की आशंका में दब रहा था. आखिर दर्द सिर्फ देह का ही तो नहीं होता. उस पल मुझे अहसास हुआ कि दुनिया में दर्द मिट्टी सा बिखरा हुआ है. हर किसी के हिस्से में अपना दर्द है. अपने दर्द की अनंत लगती रेखा आप ही छोटी हो जाएगी यदि आप अपने दर्द से कहीं अधिक निर्मम, व्यापक, बेरहम दर्दों को देख और महसूस कर सकें.’
श्रेया ने खिड़की से बाहर देखा. सूरज आधा डूबा दिखा गया, खिड़की से आती उन्नाबी आभा में कालिमा फ़ैलने लगी. उसने एक पल को यह दृश्य, अपनी सांसों के साथ अपने रग-रग में पहुँच जाने दिया, इसे घूँट-घूँट पी लिया और आगे कहा,
‘दिशा के ज्ञान बिना किसी एक क्षण में आसमान में सूरज और सूरज की लालिमा देख यह नहीं बताया जा सकता कि सूर्योदय है कि सूर्यास्त. यह बताने के लिए क्षणों की निरंतरता जरुरी होती है. किसी एक क्षण में ही तय करना हो तो दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो उठता है. हर सूर्यास्त में दीखता सूरज उसी वक्त कहीं सूर्योदय में भी दीखता होता है.यह दृष्टिकोण ही है जो किसी एक क्षण को सूर्योदय कह सकता है और सूर्यास्त भी. उस वक्त मैं भर गई थी ईश्वर के प्रति असीम आभार से कि मेरी जिंदगी में मात्र देह का दर्द है, ज़िंदगी की आस बनी हुई है, सलामत हाथों–पैरों के नीचे ठोस जमीन है, सिर पर परिवार की घनी छाया है. आज इतने सालों बाद मुझे उस दर्द से छुटकारा मिल चुका है आज मैं इस मानव पुस्तकालय में खुली किताब बन अपनी बात कह रही हूँ. आप सब ही बताइए कि क्या बिना अँधेरे के आप चाँद–तारे देख सकते हैं? क्या हमारी जिंदगी में आया अँधेरा रौशनी की राह दिखाने आया नहीं हो सकता है. क्यों हमें जिंदगी पर विश्वास नहीं होना चाहिए.
श्रेया थम गई. थमी रह गई कमरे की हवा. दसियों सांसों का आरोह अवरोह मात्र महसूस होता रहा. श्रेया की नजर आत्महत्या का वाकया जानने के इच्छा रखने वाले उस युवा की ओर गई. उसने अपना पहलू बदला,अपने सूखे होंठों पर जीभ फिरा उन्हें गीला किया फिर
सीधा बैठ गया. किसी ने उससे कुछ पूछा तो वह उससे बात करने लगा, श्रेया उठ कर कैफ़े के उस हॉल से बाहर निकल गई. बाहर कैफे की खिड़की से चाँद झांकने लगा. चाँद से कुछ दूर एक तारा भी टिमटिमाता रहा.
श्रद्धा जी!
विषय के हिसाब से कहानी कुछ ज्यादा लंबी लगी। आपने दर्द को काफी खींच दिया।
हमें तो अपनी दायीं किडनी का स्टोन का दर्द याद आ गया। 20.5 एमएम की पथरी का जब दर्द उठा तो इतना चिल्ला रहे थे दर्द से कि अस्पताल ही दहल गया था। हम तो एक पल दर्द नहीं सह पाते और आपकी कहानी की नायिका ने इतने दिन कैसे सहा! उसके दर्द के चक्कर में हम दर्द से गुजरते रहे।
कहानी में सच्चाई हो सकती है, इतनी तकलीफ में आत्महत्या का मन भी बन सकता है।
पता नहीं क्यों इस कहानी को सिर्फ कहानी मानने का मन नहीं हो रहा। पर ऐसे सच नहीं होते ,हम यह भी नहीं कहेंगे। हमारी जिंदगी के अनुभवों में हमने हर तरह के दर्द को देखा है
आँतों में स्वैलिंग के कारण अपने 14 साल के बेटे को एग्जाम के दिनों में सुबह से लेकर शाम तक पेट दर्द से मछली की तरह तड़पते हुए देखा। और जाना की मछली की तरह तड़पना क्या होता है। सारे अस्पताल की टीम लग गई लेकिन कुछ नहीं कर सकी थी।
लेकिन जीवन में हर दिन इतने लंबे समय तक पेट दर्द की तकलीफ सहन सहज नहीं,वाकई ऐसी स्थिति में मौत ज्यादा बेहतर लगती है ऐसा लगता है ,कोई एक इंजेक्शन लगा दे और सब कुछ शांत हो जाए।
बहरहाल आपकी कहानी ने डराया ज्यादा जीवन के सच कभी-कभी बहुत कड़वे और डरावने होते हैं। कमजोर दिल वाले का तो पता नहीं क्या हाल हो।
पढ़ते हुए महसूस हुआ कि लेखन में दर्द को ज्यादा नहीं खींचना चाहिये।
कहानी भाषा-शैली की दृष्टि से पूरी तरह निर्दोष है ,लेकिन दर्द से रिश्ता तकलीफ देता है।
कहानी के लिये बधाई
मैं नीलिमा जी से पूर्णता सहमत हूँ। दर्द जब हद से गुज़र जाए तो दिल में कहीं चुभन पैदा करता है।अंत अच्छा है। बधाई