मेरे गृह सहायकों में दामी तीसरी थी। दामी सर्वेन्टक्वाटर्स से नहीं, बाहर से काम पर आती थी। आश्विन मास की नवरात्रि का पहला दिन था। सेंटर टेबल पर रखे आकर्षक काँच के कटोरे में लाल गुड़हल के फूल कमरे में रौनक बिखेर रहे थे। दामी के आने का समय देखकर मैंने गेट की कड़ी खोल दी। दामी समय की पक्की थी सो आ धमकी। जैसे ही उसकी नज़र कटोरे पर पड़ी तो उदास स्वर में बोली,”मैम साब! ये फूल सुबा से बहुत ढूंढ़ा, नहीं मिला। आप को कहाँ से मिला?”
“नहीं पता, सुबह जगदीश लाया।” मैंने उसकी ही टोन में बोला।
जगदीश हमारे यहाँ का रसोईया था। उसने अपना नाम मेरे मुँह से सुना तो ड्राइंग रूम में झाँकने चला आया। दामी को आया  देखकर बोला, “दामी चाय पियेगी क्या ?”
उसका इतना कहना था कि दामी अपने तांमियाँ सीकिया हाथ नचाते हुए खिसिया पड़ी।
“वैसे तो कभी चाय नहीं पूछता। इसको मालूम हे कि आज मय उपासी है तो चाय पिलायेगा। कितने गंदले नदी-नाला लाँघती-फलाँघती मय यहाँ पहुँचती हे। क्या ये नहीं जानता कि यहाँ से जाके पहले मैं नहाएगी उसके बाद…?” 
दामी ने एक साँस में व्रत के नेमधर्म वाली मजबूर पाती पढ़ डाली थी। उसके चेहरे से लग रहा था कि वह चाय पीना तो चाहती थी यदि व्रत नामक धजीर उसकी कलाई पर न बंधी होती ।
“जब भूखा नहीं रहा जाता तो काहे को बिरत रखती है, बाई। और हम पर बेबात ही भड़कती है।” 
कहते हुए जगदीश का चेहरा थोड़ा उतर सा गया जैसे उससे कोई बड़ी भूल हो गयी थी।
“उपवास में तो ज्यादा जरूरी होता है चाय पीना दामी! भूखे पेट काम क्या! भजन भी नहीं होता है बाई ।” मैंने कहा।
“ऐसा बिल्कुल नहीं मैम साब! माता रानी का सत्त भी कोई चीज़ होता हे। इसको भी बताना पड़ेगा कि हर बात का नेम-धरम होता है !” जगदीश की ओर घूरते हुए उसके जबड़े कस गए थे।
हालाँकि जगदीश ने उसकी बातों का बुरा न मानते हुए उसको बहुत समझाने की कोशिश की। उसने उसे बताया कि जब शरीर काम न करे तो भगवान को एक डिब्बे में बंद करके रख देना चाहिए। चक्कर खा कर गिरेगी तो न वो उठाने आएगा जिसके लिए तू उपासी है और न तेरा भगवान।  जगदीश ने चुहल की थी। 
दामी अपनी धुन में थी सो अपना राग अलापने में लगी थी। मेरा घर रणक्षेत्र बन चुका था । उसने बताया कि कहाँ-कहाँ वह नंगे पाँव यात्रा पर गयी। कितनी बार जीभ में भाला भुकवाकर जवारे-पूजा की। कितने मील कन्धे पर काँवर में गंगाजल ले जाकर महादेव को पूजा है। साथ में मन के भीतर दबी इच्छा को भी उसने उत्साहित स्वर में रेखांकित करते हुए बताया कि अबकी माता रानी ने सब ठीक रखा तो उसके आदमी की दारू भी छूट जाएगी। एक बार उसके जीवन में फिर से ख़ुशी लौट आएगी। बताते हुए उसके मन में पीली पीली तितलियाँ उड़ने लगी थीं। दामी की बहस की वजह या भूख की मार से उसका मुँह लाल हो चला था। होठों से तार टूटने लगे थे फिर भी वह चुप होने का नाम नहीं ले रही थी। 
मैं वहाँ होकर भी न होने जैसी ही थी लेकिन दामी ने अपने आदमी की दारू वाली बात कहकर मुझे दो दशक पीछे धकेल दिया। सुनते-सुनते दामी के बोल फीके होते चले गए और अतीत के गलियारे में भाभी की बातें और कराहटें सुनाई पड़ने लगीं।
“आज से मेरा नवरात्रि-व्रत शुरू हो रहा है। करती तो हर बार थी लेकिन इस बार सिर्फ ‘एक लौंग’ पर तुम्हारे लिए व्रत का संकल्प लिया है। तुम्हें भी ध्यान रखना होगा विनय! 
भाभी मनुहार करते-करते घिघयाने-सी लगी थीं लेकिन भैया ने कठोरता से सिर्फ एक शब्द ही बोला।
“क्यों…?”
“क्योंकि जिस घर में माता का पाठ होता है उस में मदिरापान नहीं कर सकते विनय।”
“…..”
“बोलते क्यों नहीं ?”
“क्या बोलूँ ? तुमने व्रत मुझसे पूछकर तो किया नहीं है जो मैं कुछ बोलूँ।”
“इसका मतलब तुम पियोगे?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं।”
“विनय, तुम दारू को हाथ लगाना तो दूर उसकी तरफ़ देखोगे भी नहीं।” 
“….”
भाभी हतप्रभ उनके उत्तर की प्रतीक्षा करती रहीं लेकिन भैया नहीं बोले। इसके बावजूद भी उन्होंने पूरे मनोभाव से माता के लिए आस्था के जवारे बोकर कलश स्थापित किया। भाभी के व्रत का पहला दिन देवी की अचरी गुनगुनाते हुए गुजरा। साँझ ढले उनकी श्रद्धा का सूरज लालिमा लिए सागर की अतल गहराइयों में उतरने की तैयारी में ही था। हमेशा की तरह घर में फिर महफ़िल जुटने लगी। उस राक्षस भाई ने जिसे सब बेहद स्नेह करते थे नाक तक ख़ुद को नशे में डुबो लिया। पहले से भी बढ़कर नंगनाच के झंडे गाड़ दिए। घर में सूखे पत्ते की तरह काँप रह थे।
कहने को वो मेरा भाई था लेकिन भाभी के लिए मेरा मन काँप-काँप उठा । पतझड़ में गिरे पत्तों को तो फिर भी धरती का आसरा होता है। उस औरत को कौन सहारा देगा जिसका पति…। कितनी आरजू मिन्नत की थी माँ ने भाभी के पिताजी से। तब जाकर वे तैयार हुए थे वे अपनी बेटी का हाथ इस लड़के को देने के लिए। भाभी अखंड ज्योति के सामने माथा कूट-कूटकर उन्हीं बातों पर विलाप किये जा रही थीं लेकिन न उसने सुनी जिसे सुहाग के नाम पर वे वर्षों से अपने माथे पर चढ़ाए घूम रही थीं और न ही पत्थरों की मूर्तियों ने उनकी दुर्दशा पर अपनी प्रतिपुष्टि दी। 
हाँ,मैंने जरूर सभी का विरोध करते और सहते हुए नवें दिन होने वाले पारायण को नवरात्रि की परेवा की मध्यरात्रि को ही करवा दिया। और आस्तिकता का नारियल फुड़वाकर भाभी के हाथों ऐसी जगह फिंकवा दिया जहाँ से कोई स्त्री उसे लाँघ न सके। विश्वास के असीमित श्रद्धा भरे घट को इस तरह फूटते देखकर भाभी भभक कर रो पड़ी थीं। 
“भैया की पत्नी होने का मतलब ये नहीं होता कि तुम काठ की गूँगी गुड़िया हो भाभी।अपने लिए खुशी भैया में नहीं खुद में तलाशो।” अपने आँसुओं को छिपाते और समझाते हुए मैंने जब उनको गले से लगाया तो उनके मुँह से बस मेरा नाम ही फ़ूट सका। 
“केताss!” 
मैं सांत्वना के बोल नहीं आत्मविश्वास के कुछ शब्द बोलना चाहती थी कि तभी जगदीश ने तेज आवाज़ से मुझे पुकार दिया।
“मैम साबss…मैम…सा..।”
“….”
“आपके घूमने का समय हो गया है ।” जगदीश के साथ घड़ी के पैंडुलम ने भी पाँच बजे का घण्टा बजाया दिया तो उसकी घनघनाहट के बीच दामी की आवाज़ मुझे फ़िर से सुनाई पड़ने लगी।
“अरे! तुम लोग अभी भी…।”
“नहीं मैम साब! अभी करते हैं काम।”
जगदीश की बीवी झेंप कर बोली ।
मैंने दामी के साथ जगदीश और उसकी पत्नी से मामला जल्दी सुलटा कर काम सही समय पर खत्म करने की हिदायत दी और संध्या सैर की अपनी साथी मीता को बुलाने निकल पड़ी।
एक दरवाज़ा छोड़कर उसका घर था सो अपने दरवाज़े से निकलते ही उसे पुकारते हुए मैंने मीता का दरवाजा खटखटाया ।
“मीता चल। पहले से ही आज देर हो चुकी है ।”
“आप घूम आइये, मेरा मन नहीं है।” उसने दरवाज़ा खोलते हुए लटके होठों से कहा।
“क्या आप आप लगा रखा है ? और तुझे हुआ क्या? देखने में तो भली चंगी लग रही है।”
“हाँ, सही कहा ।”
“तो..।”
मेरे ‘तो’ पर वह इधर-उधर आले-वाले बनाती रही लेकिन जब मैं बिलकुल पीछे पड़ गयी तब बोली। 
“तू जा यार इस बार मैंने नवरात्रि का व्रत नहीं रखा है। लोग पूछेंगे तो क्या कहूँगी ?” 
“कह देना नहीं रखा व्रत, बस्स कोई खा थोड़े जाएगा।”
“नहीं कह सकती यार! तेरी जितनी हिम्मत भी नहीं मुझमें।”
मीता के चेहरे पर एक अलग तरह का डर-संकोच और असमंजस पसरता जा रहा था।जैसे कोई अपने शक्तिशाली हाथों से उसका गला दबोच रहा हो। मैंने उसको उसके हाल पर छोड़ने में ही भलाई समझी। पता नहीं लोग समाज से इतना क्यों और किस लिए डरते हैं? जबकि समाज तो स्वयं में एक ऐसा लट्टू है जो आठोंयाम दिग भ्रमित हो घूमता रहता है। मैं सोचते हुए बढ़ी जा रही थी लेकिन मन बुरी तरह से झुंझलाहट और खिन्नता से भर चुका था।
अक्तूबर की खुश्क शाम के रेशमी हवा के झोंकों में मिली सर्द खुनक ने मेरे कन्धे थपथपाए तब जाकर मेरा मन हल्का हुआ। आज मीता साथ नहीं आई थी इसलिए बड़े पार्क में न जाकर कॉलोनी के पार्क में ही घूमने चली गयी। 
हमेशा की तरह पार्क के गोल रास्ते पर लोग सरपट सैर कर रहे थे। मैं भी चुपचाप उन्हीं में शामिल हो टहलने लगी। मौसम की निर्मलता मन को भीतर तक तर-ओ-ताज़ा करने लगी थी। हरीतमा से भरे पार्क में सब ओर खुशहाली बिछी पड़ी थी।किसी डाल से पत्ते गिरते तो लगता पेड़ के प्रति आभार जता रहे हों। कोई फूल उत्तेजित हो हवा के साथ बेसाख्ता यदि उड़ना चाहता तो टहनी को गलबहियाँ डालकर उसे चूम लेता ।प्रकृति की भव्यता से मेरा मन भव्य हो चला था।
“रात्रि भोजन का मेनू जगदीश को जल्दी-जल्दी में पकड़ाया था । क्या उसने सुना होगा ठीक से ?” सोचते हुए अपनी ही धुन में चली जा रही थी कि अचानक  एक दृश्य पर आँखें अटक गयीं ।
“बाज़ार न खुलने की वजह से हमारी दैनंदिनी ध्वस्त पड़ी थी। क्या सारा खतरा निपट गया है? क्या बाज़ार बहाल हो गए ?”किसी को देखते हुए मेरे मुँह से बलात अस्फुट से शब्द निकल ही पड़े ।
“नहीं तो! आपसे किसने कहा ?” बगल से गुजरते हुए  एक स्त्री ने आठ कोने का मुँह बनाते हुए कहा। 
“नहीं,बस ऐसे ही । किसी को देखकर याद आ गया ।” 
“किसी” शब्द को सुनकर चकमक कर उसने भी मेरे झूलते हाथ को झटक कर चक्कर के दूसरी ओर इशारा किया।
“क्या?”
“देखो न! मन्दिर की अध्यक्षा के रंग।”
हँसी तो मुझे भी आई कि इन्हीं को देखकर तो मुझे बाज़ार याद आया था लेकिन मैंने अनभिज्ञ बने रहने की कोशिश की। एक मिनट को तो ऐसा लगा जैसे दुर्गा माता अपने छः हाथों को घर पर छोड़कर अमृतवर्षी दो हाथ लिए सैर पर चली आई थीं। मैदान में घूमते लोग भी उन्हें गहराई से निहार रहे थे। उनके जान-पहचान के कई भद्र जन मिल गये जिन्होंने झुककर उन्हें प्रणाम भी किया था तो बाक़ायदा उन्होंने उनको आशीर्वाद भी दिया। 
अभी तक मैं उनको दूर से ही देख रही थी लेकिन गोल रास्ते पर चलते हुए आखिर कौन कितनी देर तक किसी से दूर रह सकता है ? सो जल्द ही हम एक दूसरे के सामने थे। मिसेज़ शर्मा मीता के मित्र की मित्र हैं। मीता कभी-कभी इनकी चर्चा मुझसे करती रहती थी इसलिए मैं भी इनको जानती थी।मिलते ही बातें शुरू हो गईं।
“कैसी हो मिसेज़ शर्मा ?”
“ठीक ही ठाक हैं ज़्यादा कुछ अच्छा है नहीं कहने को।” वे कहकर मौन हो गईं।
“जो स्त्री दूर से ताज़े खिले गुड़हल-सी लग रही थी वह इतनी अनमनी क्यों है?” मेरे मन में विचार कौंधा तो मैंने उनसे पूछ भी लिया । “क्या हुआ मिसेज शर्मा आज फिर शर्मा जी से झगड़ा…।” उन्होंने मुझे निर्विकार भाव से देखा। कहा कुछ नहीं।
“आपको नहीं बताना है तो मत बताइये मिसेज़ शर्मा! कोई जरूरी नहीं ।
“नहीं, ऐसी बात नहीं। मेरी उदासी में इस बार शर्मा जी का कोई हाथ नहीं, वे तो ख़ुद बेचारे-से हुए पड़े हैं; न दुकान खोल पा रहे हैं न ठीक से घर चला पा रहे हैं ।” उनकी आवाज़ में दुख लोढ़ गया था।
“अच्छा! तो आप इतनी परेशान क्यों हैं ?” 
“अरे पूछो ही मत!” कह कर वे मेरे साथ चलने लगीं।
“बताइए न मिसेज शर्मा! वैसे तो इन दिनों स्त्रियाँ बेहद खुश रहती हैं। हों भी क्यों नहीं ? उनके लिए ये श्रद्धा और अतिरिक्ति ख़ुशी के दिन जो होते हैं ।” मैंने उत्साहित होकर उनके ही मन की बात कही थी। वे फिर भी फीके पान-सी रची दिखती रहीं।
उनकी उदासी देख मेरा मन अकुला गया। उनकी ऊब दूर करने के लिए मैंने उनकी रुचि की खूब बातें की लेकिन उनका मन नहीं बदला। मैं आख़िरी कोशिश और करना चाहती थी। आख़िर किसी को हँसाना भी तो पुण्य का काम होता है। मेरी एक कोशिश से क्या पता ये मानसिक तकलीफ़ को थोड़ी देर ही सही भूल जायें। मैंने सोचा।
“क्या मंदिर खुल…?” जैसे ही मैंने उनसे मंदिर के बारे में पूछना चाहा तो मेरे अधूरे वाक्य को लपकते हुए वे बोलीं।
“काश! ऐसा होता मिसेज ढिल्लन!” 
“मिसेज ढिल्लन नहीं आप मुझे सिर्फ़ केता भी सकती हैं ।”
“हाँ जी..!”
उनकी आक्रामक उत्तेजना देखने लायक थी सो मैंने आगे बात बढ़ाई ।
“आप तो मुझे मंदिर से आई हुईं-सी लग रही हैं !”
“सही कहा आपने लेकिन मंदिर के भीतर नहीं, गेट के बाहर से ही अपनी पूजा अर्पण कर आयी हूँ।” कहते हुए उनके हृदय का आक्रोश ज्वालामुखी के लावे-सा फूट ही पड़ा। चेहरा ललाई लिए भभक पड़ा और वे लगी कोसने।
“ये दाढ़ीजार ‘किरोना’ का सब किया धरा है;न ये बैरी आता न मेरी मैया भूखी-प्यासी, सूनी-सूनी बैठी रहतीं।” वे गरम रेत पर पड़ी मछली की तरह तड़प कर कहतीं जा रही थीं कि कैसे वे कीर्तन मण्डली की अध्यक्षा होते हुए भी अपाहिज़ बनी बैठी हैं । उनका तो दिल करता है कि मन्दिर के बाहर ही कीर्तन के लिए बड़ी सी पल्ली बिछवा दें और तुक से कीर्तन करवाने लगें लेकिन पण्डित जी बड़े डरपोक हैं। कहने लगीं कि यदि पंडित जी थोड़ा भी उनका साथ देते तो वे धूमधाम से माता के जगराता करवातीं। 
मुक्ति की अदम्य कामना एक बार को फिर उनकी आँखों में लहरा गयी थी और  मन व्याकुलता की चरम सीमा पार करता जा रहा था। अपने दैवीय कर्मकांडों के लिए वे बेहद भावुक और दुःखी होती जा रही थीं।उनको देख मुझे अपने ऊपर शक हो आया कि कहीं मैं ही कहीं गलत राह पर तो नहीं निकल चुकी हूँ।खैर! 
“मिसेज़ शर्मा ! जरा ध्यान से देखो न पार्क के इर्द-गिर्द रास्तों पर हरे रंग की घास कैसे लहक कर पेड़ों को छू लेना चाहती है पर क्या घास कभी पेड़ों को छू सकती है? दोनों की अपनी अलग सत्ताएँ हैं। चिड़ियों को ही सुनकर देख लो उनके भोर-साँझ के कलरवी गीत की तरह क्या कोई गायक गा सकता है ? और तो और सुबह की बसंती पहली किरण जब निकलती है तो लगता है कि समूचे समुद्र पर किसी ने नारंगी गलीचा बिछा दिया है। वृक्षों की मांग में ईंगुर भर दिया है। क्या ये काम कोई मनुष्य कर सकता है?
“नहीं।”
“तो,जब ये सब उसकी सत्ता से ही हो रहा है तो क्या वो हमारे दो फूल,आरती,एक टुकड़ा मीठा भोग पाने के लिए बैठा होगा ? या नहीं मिलने की स्थिति में हमसे नाराज़ हो जाएगा? जन्मदाता क्या अपनी संतान से मुँह फेर सकता है ? बोलिये मिसेज़ शर्मा ।”
मेरी बातों पर वे कुछ बोली तो नहीं लेकिन सिरे से भड़क जरूर गयीं। कहने लगीं, “आप कहोगी कि मिसेज़ शर्मा बण्डलबाज हैं। पर हूँ बिल्कुल नहीं ऐसी। वैसे तो मैं ये बात किसी को बताना ही नहीं चाहती थी लेकिन आप की बातें जब ले ही आईं हैं मुझे इस मोड़ तक कि अब बिना कहे मेरा जी नहीं मानेगा तो कहती हूँ।”
“आप कहिये..।”
“कल ही मेरे माथे माता आई थीं। कैसी मोटी-मोटी आँखों में आँसू भरकर कह रही थीं। बेटी हम बहुत भूखे हैं। मन कलप कर रह गया। अब बताओ! ये भी कोई मज़ाक है?” मिसेज़ शर्मा ने अपनी पैनी नज़रें मेरे चेहरे पर गढ़ा दी थीं। कुछ पलों के लिए मैं अवाक रह गयी कि देखिये इंसान कितनी सफ़ाई से ख़ुद को धोखे में रखे हुए है लेकिन जल्द ही खुद को संयत करते हुए मैंने उनसे कहा।  “मिसेज़ शर्मा! आप सच कहती हो इस कोरोना की वजह से हम तो कैद होकर रह गए हैं जी!” जैसी चले बयार पीठ तब … वाली पँक्ति को मैंने याद कर गहरी साँस ली।
मेरी करुण आवाज़ के कम्पन ने उनकी  करुणा को तरंगित कर दिया था। उन्होंने पल भर के लिए ही सही मुझे ‘हमदुखनवा” समझ लिया था । उनकी सिकुड़ी भवें चैन से पसर गयीं । होंठ आराम की मुद्रा में आ गए। माथे की बिंदी जो दो खड़ी सिलवटों में टेढ़ी हुई जा रही थी वह सीधी हो दमकने लगी। उनकी चाल में नरमी आ गयी।अब वे पूरी तरह से मुझसे खुल चुकी थीं सो उन्होंने बताया कि मन्दिर भले न खुले हों लेकिन वे घर के नियम उतनी ही मजबूती से पालन कर रही थीं जितना कि वे पहले किया करती थीं। दिन में चार बार नहाना,मंदिर जाना फिर चाहे भले ही उन्हें गठिया की दवाई महीनों खानी पड़े लेकिन वे नियम की पक्की हैं।
ये सब बातें बताते हुए मिसेज शर्मा चहक उठी थीं। कुछ करने से ज़्यादा उसकी चर्चा करने में रस कैसे लिया जाता है, मैं देख रही थी। जल्द ही उन्होंने मुझसे  स्त्री-हक और स्नेहासिक्त पूछताछ शुरू कर दी थी।पहले पूछा कितने बच्चे हैं। पति क्या करते हैं? सास हैं या नहीं ? आदि आदि और साथ में सबसे अहम सवाल, आप का व्रत कैसा चल रहा मिसेज़ ढिल्लन?
“उतनी देर से मैं ही अपनी कहे जा रही हूँ।आप भी सुनाइये न! कुछ ।” 
उनके प्रश्न पर सबसे पहले तो मुझे ज़ोर से मीता की याद हो आई। इन्हीं कारणों से आज उसने अपने व्यवस्थित रूटीन में आमूलचूल बदलाव कर लिया था। इन्हीं औरतों को खुश करने की वजह से न जाने कितनी प्रतिभाएँ एक अदद व्रत वाली रूढ़ि में अपने को आबद्ध कर खुद पर से भरोसा खो देती हैं। उनके सहज और आत्मीय सवाल पर भी मेरा मन सहज नहीं रह सका और मैंने भीतर की नंगी कठोरता ओढ़ते हुए कहा, “मैं कोई व्रत उपवास नहीं करती मिसेज़ शर्मा !”
‘झूठ मत बोलिए मिसेज़ ढिल्लन,आपके चेहरे से साफ़-साफ़ झलक रहा है कि आप व्रती हैं। देखो न कैसा नूर झलक रहा है आपके चेहरे पर।” उन्होंने अतिरिक्त मनुहार से मुझे निहारा और बलाएँ लेने की मुद्रा में अपने दोनों हाथ कान तक ले गयीं।
लगने और होने में ही तो जीवन के सारे उतार-चढ़ाव समाहित है। बड़ा फर्क होता है करने और कहने में। कहना था। कहा, “नहीं, मिसेज़ शर्मा! बड़ी मुश्किल से सच बोलने की आदत लगी है तो अब झूठ न बोलूँगी और वैसे भी ‘करो कुछ और कहो कुछ’ ये काम हमारे धरमपुर वाले रमानाथ चाचा वाली चाची की तरह कोई और कर भी नहीं सकता।”
“कौन…?”
“सुनिए न मिसेज शर्मा !”
“अच्छा कहिये।” 
हमारे धरमपुर में एक कुवैती चाची थीं। वैसे तो चाची का मन कुवैत से लौटने का बिल्कुल भी नहीं था लेकिन चाचा को पुरातन पंथी कहो या जड़ों से जुड़ा हुआ, उनका कहना था कि जहाँ उनकी छठी पूजी गयी है,वे वहीं से चार कन्धों पर दूसरी दुनिया के लिए रवाना होना चाहेंगे, इसलिए चाचा के आगे चाची की एक न चली। हाँलाकि उनके घर-परिवार के एक दो सदस्य ही पुस्तैनी धरोहर सम्हाल रहे थे बाद बाक़ी लोग जहाँ नौकरीपेशा कर रहे थे, वहीं  बस गये ।
देखते-देखते चाचा ने पत्नी के हिसाब से उस घर को आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित भी करवा लिया था फिर भी चाची कुवैती किट्टी पार्टी वाली सहेलियों को अपने बच्चों से ज़्यादा याद कर बिसूरती रहती थीं । कुवैती सभ्यता ने उन्हें अपने रंग में बहुत नहीं तो कम भी नहीं रँगा था।
धरमपुर कस्बे की कपड़ा वाली गली की हर औरत के पास उन दिनों बच्चों को सुलाने के लिए परियों की कहानियों की जगह कुवैती संस्मरण रहने लगे थे। माँ को कई बार कहते सुना था कि क्यों सब ये सोचते हैं,जिस लड़की ने अपना सोलहवाँ साल कुवैत की संस्कृति में देखा हो,वह भला दो-चार साल में वह कैसे उस संस्कृति को नोंच कर फेंक दे। उनके प्रति माँ के इस सद्भावनापूर्ण नज़रिए की वजह से ही चाची उनकी पक्की सहेली बन गयी थीं । वे जो कहना चाहें माँ उनको बिना मोल-तोल सुन लेती थीं ।
मुझे उनके घर ज्यादा खेलने की छूट तो नहीं थी लेकिन उनको देने-लेने या बुलाने जैसे कामों के लिए माँ मुझे ही भेजती थीं। इसी बहाने मैं उनके जीवनचर्या के रंग-ढंग देखने का सुख उठाती थी। मैंने ध्यानधर कर उन्हें कई बार देखा था और माँ को भी बताया था कि चाची जैसे घर के भीतर होती हैं वैसी बाहर बिलकुल नहीं होतीं लेकिन मेरी बात को माँ इधर-उधर से निकाल देतीं।
एक बार नवरात्रियों के दिन थे। माँ ने उन्हें बुलाने को मुझसे कहा।मैंने झटपट अपना खेल छोड़ा और दौड़ गयी। दोपहर का समय था।आँगन में उनका गुलाबी गाउन सूख रहा था। छिपकर मैंने उसे छुआ तो उँगलियों की आत्मा ठंडी हो गयी। जामुनी छींट का सूट पहने चाची,चाचा के साथ खाना खा कर उठतीं जा रही थीं।
मुझे देखकर बोली ।”उधर धूप में क्यों खड़ी है ? इधर आओ…!”
“चाची जी,आपको माँ ने बुलाया है ।”मुझे उनको चाची जी कहना माँ ने सिखाया था।
“अच्छा, मैं आना भी चाहती थी ।” 
वे बोलीं और उन्होंने मुझसे थोड़ा ठहरने को कहा और घर के मंदिर की ओर बढ़ गयीं। वही पास में उनका ‘ड्रेसिंग टेबल’ था। मैंने देखा उन्होंने एक डिब्बी खोलकर कुछ मुँह में डाला। शीशे के पास जाकर ताज़े सिंदूर की बिंदी लगाई और एक चुटकी सिंदूर से माँग थोड़ी और गाढ़ी कर ली। बिछिया उनके पाँव में चले गए, लाल चूड़ियां कलाई में और एक सूती धोती पहनकर वे मेरे साथ हो लीं। मैं उनको देख तो रही थी लेकिन माँ के अनुसार मुझे कुछ असामान्य नहीं लग रहा था। दो मिनट में हम दोनों माँ के पास पहुँच गए ।माँ स्थापना से थोड़ी दूरी पर अपना आसन लगाये बैठी थीं। नौ दिन उनकी बैठिकी वहीं रहती थी। चाची को देखकर माँ मुस्कुराकर बोली ” चाची के लिए चौकी ले आओ केता। हमारा आसन…।”
माँ की बात पर मैं चौकी लेने मुड़ी ही थी कि कान में आवाज़ पड़ी, “न जिज्जी! आप चिंता न करो हम भी व्रत हैं सो आपके पास ही बैठेगें।”
माँ ने उनसे जो भी कहा हो लेकिन मेरी देह झनझना गयी थी। आँखें फैल गईं। उनके घर के थोड़ी देर पहले के सारे दृश्य मेरे पुतलियों में दिपदिपा उठे। उन्हीं के सामने मैं माँ को सब कुछ बता देना चाहती थी लेकिन तब कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकी थी लेकिन आज इन बातों के मायने एक भी नहीं छिपे हैं मुझसे । 
“आपने इतना कहा और मुझे कुछ भी समझ नहीं आया, मिसेज़ ढिल्लन!आप क्या कह रही थीं।” मिसेज शर्मा ने उकताकर कहा।
“कोई बात नहीं…। इन बातों को समझकर भी कहाँ कोई समझने की चेष्टा करता है जो आप…।”
“नहीं ये बात बिलकुल नहीं है मिसेज़ ढिल्लन! पचास वसंत देखने के बाद व्रती और अव्रती को मैं चुटकियों  में पहचान लेती हूँ |” 
“हो सकता है मिसेज शर्मा ।” मैंने बात खत्म करने के मूड से कहा।
“हो नहीं….मैं सच कह रही हूँ। जिस प्रकार आपकी काया लग रही है,कोई दूर से देखकर बता देगा कि आपने व्रत रखा है।आख़िर मैया के उपास की महिमा निराली होती है।” अनुभव की ऊँगली मेरी ओर घुमाते-आँखें नचाते हुए वे बोलीं।
“मैं उनको देखकर हैरान थी कि आख़िर वे शरीर का हल्का होना, घर में सुख संपत्ति का बढ़ना सिर्फ़ व्रत उपवास से ही क्यों जोड़ा जाता है? जबकि  इन सबके लिए तो आदमी को खून पसीना एक करना पड़ता है।”
“क्या सोच रही हो मिसेज..?”
“यही मिसेज़ शर्मा ! अपनी काया को ऐसा रखने के लिए मैं उपवास नहीं योग आसन के साथ ‘डाईट प्लान’ फ़ॉलो करती हूँ। कब क्या और कितना खाना है? का विशेष ख़्याल रखती हूँ। उन्होंने ऊपर से नीचे तक मुझे अज़ीब भाव-भंगिमा से देखा औए एक लंपट-सा लुक दिया। मानो मैं बेहद क्षुद्र जीव थी।
“मिसेज़ ढिल्लन ये सब पढ़े-लिखे चोंचले हैं चोंचले और कुछ नहीं ।”
“अच्छा ठीक है मिसेज़ शर्मा! मेरा मानना वैसे भी कुछ अलग ही है। लोग कितना भी कहें लेकिन मुझे लगता है चाहे हम फलाहारी हों या अन्नाहारी सुबह ख़ाली होने का रूप एक ही होता है। इन सब कतिपय क्रिया कर्म की जगह मन के शुद्धिकरण के उपायों को हमें विधि से हासिल हों उसके लिए अनुष्ठान करने चाहिए।”
बिना कुछ कहे चट्ट से वे मेरे पीछे हो गईं और साड़ी की प्लीटों के साथ पल्ले को कमर से लपेट लिया। वे मुझसे छिटक कर दूर ऐसे चलने लगीं जैसे मुझे छूकर वे समूची छूत हो जाएंगी। मैदान से लगभग-लगभग सभी लोग जा चुके थे। इक्का-दुक्का जो थे वे भी पार्क छोड़ रहे थे।अपनी बहस नुमा बातचीत को एक खुशनुमा अंत देने के लिए मैंने आख़री वाक्य उनसे कहा।
“मिसेज़ शर्मा, मूर्छित रहकर जिंदा रहना मेरे लिए असंभव है।” और जब पीछे मुड़कर देखा तो पाया मिसेज शर्मा जा चुकी थीं ।

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