ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही थी  स्टेशन पर स्टेशन गुजरते जा रहे थे। मैं सरसरी निगाह से बाहर देख रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ झाड़ियां खेत मकान झोपड़े एक के बाद एक निकलते चले जा रहे थे। कहीं  सड़क पर बने क्रॉसिंग गेट पर खड़े इंतजार करते लोग तो कहीं सुदूर सड़क पर अकेली चली जाती बाइक। कुल मिलाकर चलती ट्रेन की खिड़की से दिखने वाला आम नजारा था जिसमें मेरी उतनी ही रुचि थी जितनी एक आम यात्री की हो सकती है। ट्रेन धीमी हो गई कोई स्टेशन आने वाला है मैं सतर्क हो खिड़की से बाहर देखने लगी। लंबे प्लेटफार्म के सिरे पर लगे बोर्ड पर लिखे शब्द ट्रेन की गति के कारण गड़बड़ हो गए जिन्हें पढ़ना मुश्किल था लेकिन मैंने पढ़ लिया।
शब्दों को नहीं उस बोर्ड के पीछे प्लेटफॉर्म की रेलिंग से परे नीम अमलतास के पेड़ों की छांव में बने उन रेलवे क्वार्टर पर लिखे अपनेपन को। जिन्हें बचपन से पढ़ती आ रही हूँ। कहीं किसी यात्रा से लौटने के अंतिम उबाऊ घंटों में इस स्टेशन के यह रेलवे क्वार्टर तसल्ली देते थे  अपना स्टेशन आने से भी पहले अपना चिर परिचित अंचल आने की। लंबी दूरी की कोई सुपर ट्रेन पकड़ने के लिए यही बड़ा स्टेशन था  मेरे कस्बे के पास, जो खुद भी कस्बा था पर भौगोलिक स्थिति के कारण जंक्शन भी था। स्टेशन मास्टर का ऑफिस छोटी सी टिकट खिड़की पीने के पानी के नल प्लेटफार्म पर लगी बेंच टी स्टॉल सभी तो वैसे ही थे।
तभी मेरी नजर प्लेटफॉर्म पर टंगे टीवी और ट्रेन के समय की जानकारी देते डिस्पले बोर्ड पर पड़ी एक मुस्कान उभरी ही होगी चेहरे पर बदलाव को देखकर जो स्टेशन को एक कदम आगे ले गया था। मैं प्लेटफार्म पर उतरते चढ़ते लोगों को देखने लगी शायद कोई परिचित चेहरा दिख जाए। हालांकि इस शहर में कोई जान पहचान का न था पर मेरे अपने शहर से भी तो कोई यहां दिख सकता है। कितने ही लोग यहां से ट्रेन पकड़ते हैं यह तो बाद में सोचा कि यह ट्रेन तो मेरे ही शहर जा रही है। तो क्या अपनेपन की महक तो कहीं भी ढूंढी जा सकती है। ट्रेन ने फिर गति पकड़ ली मैं फिर खिड़की के बाहर देखने लगी।
अब हर खेत पेड़ झाड़ियां जाने पहचाने से लगने लगे। पटरी के समानांतर चलती सड़क पर जाती  बस या बाइक पर किसी परिचित के होने की आस के चलते उन्हें ध्यान से देखने लगी। कुछ खेत उजाड़ पड़े थे तो कहीं फसल लहलहा रही थी कहीं पानी के पम्प थे तो कहीं कुंए की सूनी जगत। छोटे छोटे गाँवों में भी अब दो मंजिला  मकान सिर उठाए खड़े थे मैं गहरी सांस लेकर इस बदलाव में से भी अपनेपन की खुशबू अपने दिल दिमाग में भर रही थी। स्टेशन के पहले दिखने वाला वह पुराना स्कूल टूटकर नया बन चुका था अस्पताल की बाउंड्री वॉल पर चढ़ा नया रोगन उसे अपरिचित बना रहा था मेरा स्टेशन आ गया।
डिब्बे के दरवाजे पर खड़े होकर मैंने भरपूर नजर प्लेटफार्म पर डाली मेरा अपना शहर जिसमें मैंने जिंदगी के 22 साल गुजारे हैं। बहुत दिनों से मां बाबूजी से मिलने का मन था उन्हें बिना बताए अचानक आना तय किया, मन था कि उन्हें चौका दूंगी। भैया से जरूर चर्चा की थी लेकिन उन्हें भी आने की तारीख नहीं बताई थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही ऑटो रिक्शा वालों ने घेर लिया लेकिन दोपहर की चिलचिलाती धूप भी मुझे साइकिल रिक्शा करने से नहीं रोक सकी। स्टेशन से घर तक के रास्ते से मैं अपने शहर को अपने बचपन को हौले हौले याद करते गुजारना चाहती थी।
स्टेशन के आसपास के वे हरे भरे पेड़ कट चुके थे। खोखेनुमा दुकानें हट चुकी थीं। उस जगह पर डामर की मोटी तह चढ़ाकर जमीन सुरक्षित कर दी गई थी ताकि वह वहाँ दोबारा न उग सकें।स्टेशन के प्रवेश की मुख्य सड़क खूब चौड़ी लेकिन खाली खाली लग रही थी। रिक्शा कब मुख्य सड़क पर आ गया पता ही नहीं चला। बाजार में चाय की गुमटी पर भीड़ थी लेकिन रौनक नहीं थी ,आवाज़ें थीं लेकिन बातचीत हँसी ठहाके गायब थे। पहले की तरह बड़े बड़े झुंड में खड़े लोग नहीं थे अब लोग अपने स्कूटर या बाइक से टिके अकेले ही चाय सुड़क रहे थे। अधिकांश हाथों में मोबाइल था कुछ का कान से लगा हुआ तो कुछ के अंगूठे तले दबा। मन कुछ उदास हुआ शायद वह बातें हंसी ठहाकों को सुनना चाहता था। बाजार की दुकानें अपनी समृद्धि को सड़क तक ढेर लगाकर प्रदर्शित कर रही थीं उनमे इक्का दुक्का ग्राहक भी थे लेकिन उसे सब बहुत सूना सा लगा। इस बार लगभग दो साल बाद आना हुआ था सब कुछ बहुत बदला-बदला लग रहा था बहुत अजनबी बेगाना सा।
बाजार के चौक पर मुड़ते ही रिक्शा मोहल्ले की उस चिर परिचित सड़क पर आ गया। बरसों पुरानी सीमेंट के ब्लॉक से बनी सड़क जो मौसम के थपेड़े अपने सीने पर झेलते हुए उम्र की मुलायमियत और चिकनापन खो कर चित्रित हो चुकी थी। कहीं-कहीं एक दो पेबल दम तोड़ कर कूच कर गए थे उनमें रिक्शे का पहिया खट से गिरता और उस झटके से सीट पर आगे सरक आई मैं फिर खुद को सहेजती सीट पर स्थापित करती। मेरी नजरें मोहल्ले के मकानों पर जम जातीं जिनके पुराने  रूप की यादें अभी भी दिलो-दिमाग में स्थापित थीं। वह उनका वर्तमान रूप देख ही कहाँ पा रही थी।
माधव काका का खपरैल का घर दिखने लगा जिस पर चौथ की रात कंकड़ फेंकते थे और भाग जाते थे। अब वह पक्का दो महला बन गया है पता नहीं अब मोहल्ले के लोग चोरी का दाग मिटाने किसके घर पर कंकड़ फेंकते होंगे ? सोचते हुए मेरे होठों पर मुस्कान फैल गई। कितना बचाती थीं दादी डांट डपट कर घर के अंदर बैठा देती थीं लेकिन हम मोरी पर जाने के बहाने आंगन में निकल ही आते। चलते आंगन में, तकते आसमान में, आंगन के चारों कोनों पर जाकर पंजों के बल उचक कर छत के परे झांकते कि चांद दिख जाए।
हाँ इस बेईमानी में इतनी ईमानदारी तो थी कि बिना चांद देखे कभी देख लेने की बात नहीं कहते। अगर चांद ही हमसे बेईमानी कर जाता और कभी बादल में छुपा होता या कभी अपनी चाल सुस्त कर छत की मुंडेर के नीचे ही दुका रह जाता तो ईमानदारी से मोरी पर जाते निपट कर पैर धोते और दादी के पास आकर बैठ जाते। बैठते बैठते छोटे या बड़े भाई को खो कर देते।
मिनट दो ही मिनट बाद उसे मूत आ जाता और वह भी इतनी जोर से कि हाथ से दबाकर रोका होता। दादी झुंझला जातीं गुस्सा दिखातीं लेकिन ठाकुर जी के सामने अपवित्र न हो जाए के डर से जल्दी जाओ भागो यहाँ  से कहकर भगा देतीं। घर में हम चाचा ताऊ के सात बच्चे थे। बारी-बारी जाते तब तक चांद को भी अपनी सुस्त चाल सामान्य कर ही लेना पड़ती और वह किसी न किसी को मुंडेर के ऊपर दिख ही जाता।
इस भयानक पाप और आसन्न दाग से घबराया वह जिस करुण स्वर में दादी से चांद की बदमाशी बखान करता कि मुँह दबाने के बाद भी हँसी रोकना मुश्किल हो जाता। “दादी मैं तो मोरी पर बैठा था कि एकदम से उजाला हो गया मुझे लगा जैसे गणेश जी के दांत चमक रहे हैं। मैंने घबरा कर यहाँ वहाँ देखा पर उजाला तो छत पर से आ रहा था। अगर सच में गणेश जी हुए तो गुस्सा न हो जाए इसलिए मैंने ऊपर देखा और” धप माथे पर हाथ इतनी जोर से पड़ता कि हम लोटपोट हो जाते।
नाटक यहीं खत्म थोड़ी होता दादी अब क्या होगा अब तो नन्नू पर चोरी लग जाएगी और फिर पूरी टोली निकल भागती माधव काका के घर पर कंकड़ फेंकने। खपरैल तो उस जमाने में सभी घरों में थे पर चोरी तो जैसे माधव काका के खपरैल पर कंकर फेंक कर ही दूर होती थी। उसके बाद  सरोज काकी की गालियां डंडा लेकर दरवाजा खोल बाहर आना अंधेरे में आंखें फाड़ फाड़ कर बच्चों बड़ों को ढूंढना पहचानना और उसी समय अगर गलती से चांद फिर बादलों की ओट से निकल आए तो सिर का पल्ला आंखों तक खींचकर देखने से बचना।  रिक्शा अब तक मोहल्ले के काफी अंदर पहुंच गया था मैं देख रही थी कई पुराने मकान टूट कर नए बन चुके थे लेकिन उनका पुराना रूप ही मानो आंखों में झूम रहा था
रेशम चाची का बाड़ा आसमान की हद को बांधकर सिर उठाए खड़ा था ना जाने किस बात पर इठलाता ? रात जब बिजली बंद हो जाती थी मोहल्ले के लड़के सड़कों पर चिल्लाते दौड़ते थे और छोटे से थोड़ी बड़ी हुई हम लड़कियां रेशम चाची के बाड़े में टूटी दीवारों के घेरे में सुरक्षित खेलती थीं। हमारे पास दौड़ भाग करने को लंबाई चौड़ाई बेशक कम होती पर सिर के ऊपर होता विस्तृत आसमान और उसमें टंके तारे जहां हमारी कल्पना निर्बाध उड़ान भरती। वही बाड़ा  लंबाई चौड़ाई के साथ ऊँचाई में भी सिकुड़ चुका था।
पता नहीं क्यों मेरा मन मोहल्ले के इस बदलाव पर खुश नहीं था वह सोच भी नहीं पा रहा था कि इस बदलाव को करने वाले कितने खुश होंगे। मुझे तो मेरी यादों का वह पुराना मोहल्ला ही याद आ रहा था मैं उसे ही ढूँढ रही थी। ऐसा भी नहीं था कि यह बदलाव मैं पहली बार देख रही थी वर्षों से हर छोटे-बड़े अंतराल पर आने पर मैं इस या उस बदलाव की साक्षी रही हूँ। एक-एक करके अधिकतर पुराने मकान टूट कर नए तरीके से बन चुके थे।  निसंतान बिंदु बुआ के गिरते ढलते छप्पर का घर जिसमें सिर झुका कर अंदर जाना पड़ता था और जिसके दरवाजे की चौखट के ऊपरी पाट को छूकर खुद के बड़े हो जाने का गुमान होता था जिसके पिछवाड़े लौकी गिलकी करेले की बेल फैली रहती थीं अब बिक चुका था
मांगीलाल काका का तीन चश्मे का मकान एक एक चश्मे के तीन मकानों में बँट चुका था।  उसे देख मेरा मन हमेशा कड़वा हो जाता  तीनों मकानों में अलग अलग चटक रंग किए गए थे जो मकान मालिक उनके बेटों को एक दूसरे से अलग और अपने आप में ज्यादा प्रभावशाली होने का ऐलान तो करते थे, लेकिन किसी एक घर के पिछवाड़े बनी अंधेरी कोठरी से निकली सिसकियां उनकी पीठ पीछे उस प्रभाव की धज्जियां उड़ा देतीं।
ससुराल से स्टेशन और स्टेशन से चौक की सड़क पर मुड़ते तक मायके आने का जो उछाह मेरे मन में होता, मोहल्ले की सड़क पर मकान दर मकान आगे बढ़ते मन उन घरों को ढूंढता जो मेरे लिए मायके का पर्याय थे। जब उन घरों की जानी पहचानी सौंधी खुशबू की जगह हर बार नए बने मकानों के प्लास्टिक पेंट की गंध नथुनों से टकराती तो मन रीत सा जाता। रिक्शे के साथ दौड़ते बुआ आ गई दीदी आ गई चिल्लाते बच्चों की टोली समय के प्रवाह में गुम हो चुकी थी। अधखुले दरवाजों की ओट से झाँकती चाची भाभी की आँखें शायद अब टीवी के स्क्रीन पर या मोबाइल पर टिकी है जिन पर मेरे आने की सूचना तो कतई नहीं होती। शायद मोहल्ले की किसी भी लड़की या बुआ के आने की सूचना अब उन्हें वैसे नहीं मिलती थी जैसे कुछ सालों पहले मिलती थी या देने और लेने वाले ऐसी सूचनाओं आतुर रहते थे।
बड़े ओटले वाली दादी का घर अलबत्ता बहुत सालों तक पहले जैसा ही था पर इस बार कई सालों बाद आना हुआ। पता नहीं दादी अब हैं भी या नहीं ? मैंने अपने दिमाग पर जोर डाला कभी भाभी से इस बारे में कोई बात हुई हो। आजकल मोबाइल पर हुई बातें याद भी तो नहीं रहतीं। जब चिट्ठी आती थी उसे बार-बार बाँच लेती थी। पूरे मोहल्ले की जानकारियों का दस्तावेज होता था दसियों बार पढ़ी जाती थी कभी माँ की आवाज में खुद को सुनाई जाती कभी भाभी की स्टाइल में। ऐसा लगता आमने सामने बैठ कर बात हुई हो और सभी बातें दिमाग में स्थाई घर बना लेती थीं। अब तो मोबाइल पर बार-बार बात होती और और कहते खुद के हाल चाल ही देते लेते रहते हैं। मोहल्ले वालों के हाल चाल पूछने बताने पर फोन का पैसा अखरने लगता है।
रिक्शा वाला रिक्शे से नीचे उतर गया यहाँ से सड़क पर चढ़ाई है। बूढ़ा रिक्शावाला गमछे से मुँह गर्दन का पसीना पोंछता एक हाथ से हैंडल और दूसरे से सीट की रॉड थामे रिक्शा चला रहा है। मुझे उस पर दया आई खुद पर झुँझलाहट भी हुई, अब तो शहर में ऑटो रिक्शा चलने लगे हैं फिर भी हर बार रिक्शे से ही घर आती हूँ। भैया तो लेने आने को तैयार भी हों पर मैं ही नहीं बताती कि किस दिन पहुँचूगी। रिक्शे से चलते हुए पुरानी यादों से गुजरना अच्छा लगता है जो एक बार घर में पहुंचने के बाद इस तरह संभव नहीं होता। न ही भैया के साथ कार में बैठकर सर्र से निकल जाने पर यादों की खुशबू का वह आस्वाद दिमाग को सुकून देता है।
वह तो यूँ रिक्शे से सड़क पर लगे वक्त द्वारा टांचे गए सीमेंट के एक एक पेबल पर से गुजरते हुए ही महसूस होता है। भैया जहाँ बदलाव से खुश होते मैं एक उदासी से भरी होती। जो उनके लिए रोजमर्रा की बातें हैं मेरे लिए मायके की कशिश। उन्हें चौक के मोड़ से घर तक अपने तरीके से जीना चाहती हूँ। उसके बाद तो ढेर सारी खबरें मिलती हैं जिन्हें सुना जाता महसूस थोड़ी न कर पाती वैसे जैसे करना चाहती हूँ। क्योंकि जब तक मैं उस में डूबती इतनी देर में दूसरी खबर सुना दी जाती।
रिक्शा चढ़ाई की मंथर गति पकड़ चुका था। अब बड़े ओटले वाली दादी का घर आने वाला था। पिछली याद में अब तक का मोहल्ले का एकमात्र घर जो अपने उसी स्वरूप में था जिस स्वरूप में उसकी यादें थीं। बड़े ओटले वाली दादी का यह नाम क्यों पड़ा यह तो मुझे कभी समझ नहीं आया क्योंकि उनका ओटला भी दूसरे घरों के ओटले जितना ही बड़ा था। थोड़े बड़े होने के बाद मेरे छोटे से दिमाग ने यह निष्कर्ष निकाला था शायद यह बड़े संबोधन ‘दादी ‘ के लिए था पर वह हमेशा ओटले से लगे दरवाजे पर बैठी दिखती थीं इसलिए उनका नाम ओटले और बड़ी दादी को मिलाकर बड़े ओटले वाली दादी हो गया।
मैंने हमेशा उन्हें दरवाजे पर देहली के अंदर अधखुले किवाड़ से बाहर देखते हुए ही देखा। सुबह स्कूल जाते हुए दोपहर में लौटते हुए शाम को खेलते हुए या रात में उनके दरवाजे का एक पट हमेशा बंद होता और दूसरा खुला। दादी खुले पट के अंदर आसन बिछाए सिर पर माथे तक पल्लू डाले कभी मेथी तोड़ती दिखती तो कभी मटर छीलती,   कभी सुपारी कतरती तो कभी राह चलते किसी के राम-राम का जवाब देती। मुझे आश्चर्य होता पूरे मोहल्ले में बड़ी दादी से उम्र में बड़ा शायद ही कोई था फिर भी दादी इतना लंबा पल्लू क्यों लेती हैं।
दादी के घर में उनकी दो बहुएं बेटे और तीन पोते थे। पोते तो हमारे साथ खेलते लेकिन उनसे कुछ पूछने की हिम्मत हम न कर पाते कहीं उन्होंने बड़ी दादी को बता दिया तो बहुत डाँट पड़ेगी। बड़े ओटले वाली दादी को मोहल्ले के किसी भी बच्चे को उसकी शैतानी पर उलजुलूल बातें करने या गाली गलौज करने पर डाँटने का पूरा हक था।
मोहल्ले में किसी बच्चे के माता-पिता की हिम्मत नहीं थी कि वह बड़ी दादी से पूछे कि क्यों डाँटा ? उस अधखुले कपाट के भीतर गहरा अंधेरा ही नजर आता था जो बड़ी दादी को थोड़ा सा डरावना बना देता था। गली से गुजरती हर बहू उनके घर के सामने पल्लू अच्छे से सिर पर जमा लेती तो हर लड़की गले में चिपका दुपट्टा सीने पर फैला लेती। जवान होते लड़के बालों की लट पीछे कर लेते और कमीज के बटन लगा लेते।  हालांकि एक विशेष कोने से भीतर देखने पर आँगन का उजाला भी नजर आता और दादी का कोमल मन भी।
किसी बच्चे के खेलते हुए गिरने से छिले घुटने पर दादी तेल हल्दी चूना लगवा कर ही घर भेजतीं। बड़े ओटले वाली दादी की बहुओं को हमने कभी दरवाजे पर या आगे वाले कमरे में नहीं देखा तो ओटले तक आने का तो सवाल ही नहीं। सब्जी तरकारी चूड़ी बिंदी क्लिप कंगी वाले या चाय छन्नी साबुनदानी कपड़े धोने के ब्रश वाले वही ओटले पर अपना सामान रखते। दादी देहरी के भीतर बैठी सामान देखते पसंद करती मोलभाव करतीं और कुछ सामान कुछ देर के लिए कमरे के अंधेरे में गुम हो जाते।
फिर वे बाहर आते और दादी कमर में खुसे बटुए की थैली निकालती और हिसाब करतीं। आसपास के घरों की बहुएं दादी से मोल भाव तो करवाना चाहती लेकिन उनके ओटले तक आने की हिम्मत न जुटा पाती। दादी को बहुओं का ओटले पर चकर चकर  चक्कर करना सख्त नापसंद था वह कहती थीं हमने इस उम्र तक देहरी नहीं लाँघी और यह आजकल की लड़कियां इनमें कोई शऊर  लिहाज ही नहीं है। दादी बदलते जमाने की इस बिगड़ती हवा की राह में सख्त दीवार की तरह बैठी होती मजाल जो यह हवा उनकी बहू को छू भी जाए। जब पूरा मोहल्ला परंपराओं में सुविधा पूर्व परिवर्तन कर रहा था बड़े ओटले वाली दादी की बहू तब भी पिछोड़ा ओढ़ कर बाहर निकलती।
रिक्शा उनके घर के सामने पहुँच गया। बचपन की खुशबू से सराबोर होने की अंतिम कड़ी की ओर मैंने बड़ी आस से देखा लेकिन वह ध्वस्त हो सड़क पर बिखरी मिली। ओटला नदारद था वहाँ गाड़ी चढ़ाने के लिए रपट बन चुकी थी। लकड़ी के कुंडी वाले दरवाजों का स्थान लोहे के गेट ने ले लिया था। बाहरी दीवाल पर दो चार गमले रखे थे। पहली मंजिल की गैलरी में दादी की छोटी बहू कपड़े सुखा रही थी। नए तरीके से बना वह मकान मेरे बचपन की आखिरी याद को ध्वस्त कर बनाया गया था। मैं अजनबी आंखों से उसे घूर रही थी तब तक छोटी भाभी ने मुझे देख लिया और ऊपर से जोर से बोलीं “अय दीदी कैसी आई सब खैरियत तो है ?” मैं कोई जवाब नहीं दे पाई बस ऐसा लगा जैसे किसी अनजान देश अजनबी परिवेश में आ गई हूँ।
रिक्शा घर के सामने रुक गया भतीजा देखते ही चिल्लाया बुआ आ गई जिसे सुन सोनू भैया और भाभी बाहर आ गए। भैया मेरा सामान उतारते उलहाने भरे स्वर में बोले एक फोन नहीं कर सकती थी मैं लेने आ जाता स्टेशन। इतनी गर्मी में रिक्शे से आई ऑटो कर लेती।
मायके आने का माँ पापा से मिलने का उछाह तो था लेकिन मन तो बचपन से मिलने भी आता है। उन यादों से जिन्हें संजोये विदा हो गई थी उन्हें फिर से जीने की इच्छा भी दिल के किसी कोने में दबी होती है जो समय की पगडंडियों के पक्के चौड़े रास्ते में बदल जाने से पूरी नहीं हो पाती।
मैंने एक बार सड़क के दोनों ओर बने मकानों पर नजर डाली फिर धीरे से कहा अगली बार से आपको ही फोन कर दूँगी या ऑटो से आऊंगी रिक्शे से आने में झुलस गई। यादों की तपिश से यह मैंने मन में कहा ताकि कोई सुन न ले।
कविता वर्मा
उपन्यास 'छूटी गलियाँ ' कहानी संग्रह परछाइयों के उजाले और कछु अकथ कहानी प्रकाशित। मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन इंदौर इकाई की सचिव। मातृभारती पर पहले ई उपन्यास 'आईना सच नहीं बोलता' की सहलेखिका। संपर्क - kvtverma27@gmail.com

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