उषा राजे सक्सेना की कलम से 'एक समंदर मेरे अंदर' की समीक्षा : चुप्पियाँ बुनती हैं अकेलापन 3
‘एक समंदर मेरे अंदर’ असम से मुंबई आए विस्थापित मध्य वर्गीय परिवार की एक तीन वर्षीय नन्हीं बच्ची कामना का बालिका से किशोरी, किशोरी से युवा, युवा से युवती, और युवती से प्रौढ़ होती हुई स्त्री  के विडंबनाओं, विसंगतियों,  वर्जनाओं, महत्वाकांक्षाओं और संघर्षो के बीच उसके अंदर पनपते अकेलेपन की है. परिस्थितियाँ ऐसी बनती है कि कामना का परिवार भिन्न-भिन्न कारणों से असम से ही नहीं, मुंबई शहर में भी बार-बार विस्थापित होता है. कामना स्वभाव से संवेदनशील है. यह विस्थापन कामना के अंदर बार-बार असुरक्षा, असमंजस और अस्थिरता के साथ अकेले पन की भावना उत्पन्न करते है.
कामना का परिवार मध्य वर्गीय आदर्शों और संस्कारों से युक्त एक चरित्रवान परिवार है. पिता काम पर जाते है। उनका व्यक्तित्व गंभीर है। वे अपनी तरह से प्रगतिशील और परिश्रमी है. माँ शालीन है और मितव्ययिता एवं कुशलता के साथ घर-गृहस्थी चलाती है. माँ और बच्चे पिता का आदर करते हैं  साथ ही उनके आज्ञाओं का चुपचाप पालन भी करते. परिवार अभावों के दिनों में मुंबई के चालों के गंदे और अनैतिक परिवेश में रहते हुए भी अपना मध्य वर्गीय साफ़-सुथरा जीवन स्तर बनाए रखता हैं. बच्चे माता-पिता से बहस नहीं करते है. प्रतिकूल समय में जवाब न देकर वे अधिकतर चुप लगा जाते हैं.
उपन्यास के आरंभ में ही पृ.-11 पर एक अहम संदर्भ आता है जब कामना के रिश्ते के मामा जो उसके परिवार को असम से मुंबई लेकर आए थे उन्हीं की रखैल सरला जो रिश्ते में उनकी भांजी लगती थी उससे देह व्यापार करवाते थे. सरला बहुत खूबसूरत थी. कामना को अच्छी लगती थी. एक दिन सरला के एक ग्राहक ने पास बैठी बालिका कामना का हाथ अपने हाथ में ले लिया था. सरला ने उससे कहा,  ‘आप इस लड़की को हाथ नहीं लगाएंगे. आपका सौदा मेरे साथ हुआ है. उसका हाथ छोड़ो.’  कामना के साथ कोई हादसा नहीं हुआ पर वह असहज, भयभीत, विचलित अवश्य हुई क्योंकि जब उसकी माँ वापस आईं तो उसने रोते-रोते उन्हें यह बात उन्हें बताई और रात को जब माँ ने यह बात पिता जी को बताई तो पिता जी चुपचाप, मामा जी को बिना बताए परिवार सहित वहाँ से शिफ्ट कर गए.
समुद्र तट पर बैठी कामना उस घटना को याद करते हुए कहती है, ‘पिता जी किसी को भी अपनी इज्जत से खेलने की इजाज़त नहीं दे सकते थे. पिता जी के पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी तो क्या हुआ? उनके पास आत्म-सम्मान की तो कमी कभी नहीं थी.’ पृ 11. कामना के बचपन में घटी इस घटना ने उस पर बहुत गहरा असर छोड़ा. कामना ने भी अपनी इज़्जत से खेलने की इजाजत किसी को नहीं दी यद्यपि उसके काम-काजी जीवन में हर क़दम पर ‘देह’ को लेकर ढेरों चुनौती पूर्ण स्थितियाँ आईं. पिता की तरह वह भी उन परिस्थितियों से चुपचाप पलायन करती, जूझती-संघर्ष करती विकल्प तलाशती स्वयं को दृढ़ और मजबूत करती रही.
अंदर बसर करती ये चुप्पियाँ मनुष्य का मनोविज्ञान बनाती हैं. इन्हीं चुप्पियों, आदर्शों और संस्कारों के बीच व्यक्ति के अंदर उगते अकेलेपन के साथ उसके अंतःस्थल में स्मृतियों का टापू  बनने लगता है. कामना का विस्थापन असम से होता है उसे वहाँ के खुले वातावरण की याद नहीं है पर मनोविज्ञान कहता है कि तीन वर्ष के बच्चे के अवचेतन मन में सारी छवियाँ बन चुकी होती है. अतः मुंबई की छोटी-छोटी गंदी गलियों, चालों और खोली में उसे घुटन और ऊब होती है.
इसलिए कामना को अपने बचपन की पहली याद समंदर तट पर खुद का दौड़ना-खिलखिलाना याद है. बालिका कामना का मन ‘स्पेस’ याने खुला वातावरण चाहता है. चालों में स्पेस कहाँ? यूँ भी स्मृतियाँ नॉस्टैल्जिक होती है.. ‘हैं। सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं.’
पहली चुप्पी कामना के अंदर तब घर करती है जब वह तीन वर्ष की उम्र में माँ-बाप और बड़ी बहन गायत्री के साथ असम से पिता की छटनी हो जाने के कारण मुंबई आती है. विस्थापन के समय, यात्रा के दौरान माँ-बाप की असाधारण चुप्पियों से नन्हीं कामना अनायास ही संक्रमित होती है. दूसरी बार जब अम्मा-पापा उससे दो वर्ष बड़ी बहन गायत्री को जो अधिकार और दायित्व देते हैं। वह अधिकार और दायित्व उसे नहीं देते है. कामना माता-पिता से सवाल न करके चुप लगा जाती है. गायत्री भी उस पर रोब रखती है पर कामना हँसती-मुस्कराती सब कुछ चुपचाप सहन (स्वीकार) करती रहती है.
तीसरी बार मुंबई में पैदा हुए उसके दो छोटे भाई रमेश और नरेश को जब प्यार से रम्मी और नर्री कह कर पुकारा जाता है तो बालिका कामना का मन करता कि उसका भी कोई प्यार का नाम होता. पर वह मन मसोस कर चुप लगा जाती है. इन तमाम चुप्पियों के साथ कामना के अंदर ‘निश्छल प्यार, चाहत और पहचान की प्यास’ निरंतर बनी रहती है. यह ‘प्यार और चाहत की ख़लिश’ भी बड़ी मिथिकल,  जादुई और ऐबस्ट्रैक्ट भाव होती है जिसकी पूर्ति जीवन में कभी हो पाती है क्या?
जैसे-जैसे कामना बड़ी होती है अपने सामाजिक परिवेश में पर्दे के पीछे या खुले-आम वासना, जिस्म-फ़रोशी,  झूठ-फरेब,  बेईमानी आदि के खेल देखते हुए किशोरी से वयस्क होती है. वह चालों के अनैतिक, देह शोषण वाले निम्न-स्तरीय परिवेश को ‘विटनेस’ करती है पर कभी ‘डिसक्स’ नहीं करती, प्रश्न नहीं करती, इसलिए ये अंतहीन चुप्पियाँ उसके अंदर घर करती जाती हैं. कामना एक साधारण मध्य-वर्गीय परिवार की लड़की की तरह पढ़ती-लिखती, स्कूल-कालेज जाती, हँसती- खिलखिलाती, ‘देह के खेल’ से बचती-बचाती,  अपना विवेक बनाती वह खुद अपना चरित्र गढ़ती है.
प्रकाश-चंद्रा और सुरेन्द्र-वीरेन्द्र के प्रकरण (पृ.28-30) से वह एक निष्कर्ष पर पहुंचती है,  ‘सभी मर्द शायद एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं…स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं. विरले ही होंगे… जो स्त्री के आकर्षण से बचे रह सकते होंगे और खुद पर नियंत्रण रख पाते होंगे.’- पृ.31 आगे इसी संदर्भ में पृ.101 पर कहती है ‘मर्द… आखिर मर्द होता है और उसे पता होता है कि दिन में या किसी भी समय स्त्री अकेले क्यों आई है?… निश्चित रूप से मर्द और स्त्री ने समय तय किया होगा तो ताली दोनों ओर से बजती है.’ पृष्ठ-30 ‘… असरानी द्वारा दिए तरक्की के प्रलोभन के बाद, ‘उसने  तय कर लिया कि वह किसी भी अकेले मर्द के केबिन में और अकेले मर्द के कमरे में नहीं जायेगी.’- इस तरह के वाक्यों की पुनरावृति उपन्यास में कई बार हुई है. संभवतः मधु अरोड़ा कामना के माध्यम से कहना चाहती है कि स्त्री और फिर काम-काजी स्त्री यदि सतर्क न रहे तो उसका देह-शोषण हर पल होता रहेगा और वह हमेशा परिवार और समाज के संशय के घेरे में रहेगी. कामना सतर्क है वह अपने काम-काजी जीवन में स्त्री और पुरुष दोनों से मित्रता रखती है किंतु एक नैतिक दूरी बनाए रखती है. कामना अपना दर्शन आप बनाती है, यह दुनिया है यहाँ सब कुछ होता है. कामना आलोचनाएं नहीं करती है. ना ही किसी को अच्छा या बुरा कहती है. बस अपनी सीमाओं को देखते हुए परिस्थितियों के साथ समझौता करते हुए विकल्प खोजती, रास्ते बनाती आगे बढ़ती हुई अपने अभीष्ट को अपने परिश्रम, ईमान्दारी और सूझ-बूझ के बल पर प्राप्त करती है.
स्कूल-कॉलेज और ऑफिस कहीं भी कामना अपना दैहिक-शोषण किसी भी क़ीमत पर नहीं होने देती है यह उसके माता-पिता के दिए हुए संस्कारों का प्रभाव है. विकट-भीषण स्थितियों में कभी वह पलायन करती है तो कभी डट कर मुक़ाबला भी करती है. धीरे धीरे मुंबई के सामाजिक वातावरण और परिवेश ने उसे घर के बाहर बिंदास, साहसी और मुखर बना दिया था. कामना मुंबई में पली-बढ़ी है अतः उसका मुंबईया परिवेश उसे ऑफिस में धीरे-धीरे तेज-तर्रार और मुखर व्यक्तित्व प्रदान करता है। मिस्टर सिंह के कामुक संकेत पर वह कहती है, ‘आपके गाल पर घड़ी उकेर सकती हूँ. इतना तेज काटूँगी कि न तो आप केबिन से निकल पाएंगे न किसी को मुंह दिखा पाएंगे.’ पृ118. वही तेज-तर्रार कामना अपने ही घर के अंदर इतनी विनीत, विनम्र और बेचारी हो जाती है कि जब सोम के पिता आते ही उससे कहते हैं, ‘….हम चार महीने के लिए आए है हमारे बेटे का घर है. तुम्हें हमारी अपनी और हमारे बेटे की सेवा करना होगा.’ तो वह कहती है, ‘…..आपका ही तो घर है….जितना हो सकेगा करूंगी.’ पृ. 152. कामना के आदर्श, संस्कार और अच्छी बनने की चाह उस पर इस क़दर उस पर हावी होते हैं कि वह यह भी नहीं कह पाती है कि यह घर मेरा भी है और आपके बेटे की तरह मैं भी ऑफिस जाती हूँ. वह बस इतना कह कर चुप हो जाती है कि ‘जितना हो सकेगा करूँगी’.
आधुनिक युग में एक काम-काजी स्त्री किस तरह चुनौतियाँ लेती-लेती अकेली होती जाती है इसे मधु अरोड़ा का उपन्यास ‘एक समंदर मेरे अंदर’ प्रमाणित करने में खूब अच्छी तरह सक्षम है. वास्तव में भारतीय स्त्री के लिए आज भी यह समस्या है कि वह घर और बाहर में से किसका चुनाव करे क्योंकि घर का संबंध रिश्तों से होता है जो जीवन को अर्थ देते है और बाहर अर्थात नौकरी का संबंध आज औरत की ज़रूरत और पहचान से जुड़ा है. दोनों में से किसी एक का चुनाव आज की आधुनिक स्त्री को जद्दोजहद में डाल देता है. यह कशमकश और बढ़ जाती है जब स्त्री दोनों को एक साथ पाना चाहती है वह भी अपनी शर्तों पर. इस प्रक्रिया में आए ‘ज़रूरती मांगों’ को पूरी करते-करते वह चुक जाती है अंततः अकेली होती चली जाती है यानी कही-न-कही अधूरा जीवन जीना उसकी नियति बन जाती है.
कामना पारिवारिक घरेलू झगड़े-झंझट पसंद नहीं करती है. अतः ऐसी स्थितियों में वह विरोध न कर,  हँसती-मुस्कराती हुई चुप लगा जाती है क्यों कि चुप रहने के संस्कार उसे अपने परिवार से मिला है. सहनशक्ति लड़कियों के गुण हैं. ‘अम्मा में सहनशक्ति गज़ब की थी. अम्मा के मुंह से कोई बात निकलवाना टेढ़ी खीर थी ’ पृ- 27. कामना की अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं हैं पर कर्मठ, मितव्ययी और कर्तव्यपरायण है. वे बच्चों को साफ सुथरा रखते हुए संस्कार-युक्त वातावरण देती हैं. कामना के माता-पिता दोनों ही पारंपरिक मध्य-वर्गीय सोच के साथ प्रगतिशील स्वभाव के है. ‘वे (पिता जी) खुद दसवीं पास थे पर सोच में कई पढ़े-लिखो की सोच को मात करते थे और बहुत सकारात्मक सोच रखते थे. उन्होंने चारों बच्चों को पढ़ाया.’ पृ.-25 यही संस्कार कामना को भी मिले हैं. उपन्यास पढ़ते हुए कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि लेखिका मधु अरोड़ा कामना के परिवार प्रति अति भावुक और प्रोटेक्टिव है,  वह उसके माता पिता को एक आदर्श, आत्मविश्वास से युक्त-संस्कारी और संभले हुए परिवार के रूप में चित्रित करती है. तमाम विसंगतियों,  विद्रूपताओं, विडंबनाओं के बीच कहीं भी परिवार के किसी सदस्य का चारित्रिक पतन नहीं होता है. काजल की कोठरी में रहते हुए भी उनमें से किसी के चरित्र पर कोई धब्बा नहीं लगता है. ‘पिता जी में आत्म सम्मान की कमी तो कभी नहीं थी. ……काम में इतने मुस्तैद थे कि जबतक….. काम न सध जाये वे चैन से नहीं बैठतें…. वे समय के इतने पाबंद थे कि सामने वाला उनके आने-जाने के समय को देख कर अपनी घड़ी का समय ठीक कर सकता था.’ पृ- 46. उनका परिवार कमियों में भी खुश था,  इस खुशी में अम्मा का सबसे बड़ा हाथ था. उन्होंने कभी अपनी देहरी नहीं लांघी थी….. अम्मा की सहनशक्ति गज़ब की थी पृ. 12 और 27. कामना के मन में अपने माता-पिता की बहुत सुंदर छवि है. पिता जो गंभीर हैं, सुसंस्कृत है, परिवार की सुरक्षा है. हर स्थिति में माँ के साथ खड़े होते हैं. पिता जो माँ के गर्भावस्था में ऑफिस भी जाते हैं और घर आकर आटा गूंधते हैं. कपड़े धोते है. जब वह सोम को देखती है. उससे मिलती है. बात-चीत करती है. उसके अवचेतन मन में पिता की छवि उभरती है. सोम सुदर्शन है, गंभीर हैं, अपने दायित्व को समझते हैं, चरित्रवान हैं. अच्छी नौकरी है और वह उसे पसंद करने लगती है. जब तक सगाई नहीं हो गई दोनों ने एक-दूसरे से दूरी बनाए रखी. सिनेमा तक साथ नहीं देखा. विवाह से पूर्व सोम ने कभी सीमा लांघने की कोशिश नहीं की. संपूर्ण उपन्यास में लेखिका अनजाने ही स्त्री-शुचिता की पैरवी करती हुई लगती है.
कामना हर स्थिति में अपनी सीमाओं को देखते हुए परिस्थितियों के साथ समझौता करते हुए विकल्प खोजती, रास्ते बनाती आगे बढ़ती हुई अपने अभीष्ट को अपने परिश्रम,  सदाशयता और ईमान्दारी के बल पर प्राप्त करती है. लेखिका उपन्यास में कई जगह कामना के सफलताओं के लिए अदृश्य शक्तियों को भी श्रेय देती है जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी. जबकि वे स्वयं पुस्तक के पिछले  आवरण पर लिखती हैं, ‘….उसकी इस कठिन यात्रा में वह (कामना) हिम्मत हारने लगती है, लड़खड़ाती है,  अकेली पड़ जाती है, लेकिन फिर से उठ खड़ी होती है और नए जोश-ख़रोश के साथ अपनी यात्रा जारी रखती है..’
मुंबई में दंगा हो गया था, कर्फ्यू लगा हुआ था उसने फोन पर सोम से पूछा, ‘….यदि आप अन्यथा न लें तो क्या मैं आपके ऑफिस रुक जाऊँ.’ सोम का उत्तर था, ‘आस-पास कोई पहचान का हो तो देख लीजिए….मेरे लिये संभव नहीं हो पायेगा. ऑफिस का मामला है…. आप देख लीजिये आप को क्या करना है.’ पृ-110. उस दिन वह एक बार फिर वह अकेली पड़ गई,  असुरक्षित हो गई. उस समय कामना को बुरा लगा था. वह सोम में सुरक्षा खोज रही है जो सोम नहीं दे रहे हैं पर वह हताश नहीं होती है, रोती नहीं है, किस्मत को नहीं कोसती है, हिम्मत नहीं हारती है, विकल्प खोजती है, निर्णय लेती है, ‘….. वह उन नामों को याद करती है जो महालक्ष्मी और दादर के पास रहते है…..उसे पापा के दूर के रिश्तेदार राम रतन जी याद आते हैं और वह पैदल चल पड़ती है….’ पृ. 111. उस समय उसे सोम का रूखा व्‍यवहार अच्छा नहीं लगा पर वह चुप रही. शायद बाद में उसे सोम की सावधानी और संतुलित सोच में अपने पिता की छवि दिखाई दी होगी. अतः विवाह के बंधन में बंधने के लिए वह सोम का ही चुनाव करती है. फिर भी उसकी ये चुप्पियां गहन होती जाती हैं… सर्पिणी सी- कुंडली मारे मन के किसी कोने में….
‘एक समंदर मेरे अंदर’ उपन्यास एक लंबी कहानी है, जो शुरू होती है नायिका कामना के सांसारिक दायित्वों से मुक्त होने के बाद जब वह ऑफिस से अवकाश ग्रहण करती है. जीवन के चौथे पहर में प्रवेश करती हुई कामिनी उदास,  मोह-भंग की अवस्था में जीवन से उचाट,  ‘मड आइलैंड’ मानसिक शांति की खोज में ‘कुछ दिनों के लिए खुद से मिलने’ के लिए आती है. मुंबई का समंदर उसे बचपन से आकर्षित करता रहा है. समंदर उसका बाल सखा, उसका पहला प्यार और ‘मैरीन ड्राइव’ तो उसके पहले और इकलौते प्रेम (सोम) का साक्षी है. वह स्वप्निल सी- यादों में खोई हुई देखती है दूर-दूर तक पानी ही पानी…’ पृ-1. वह आत्म विस्मृत सी- धुंधलके में गीले रेत में पालथी मार कर अनजाने ही आँखें बंद कर बैठ जाती है. वह लहरों की मधुर आवाज़ सुनती है लहरें उसे सहलाती है, वह धीरे-धीरे अपने आप से बाहर आने लगती है,  उसके अंदर जमा हआ अवसाद पिघलने लगता है वह लहरों की अटखेलियाँ अध-मुंदे आंखों से देखते हुए समंदर से पूछती है, ‘सुनोगे न मेरी बात?… आज के वक्त की सबसे बड़ी त्रासदी तो यही है ना कि कहना सब को है सुनने का वक्त किसी के पास नहीं है. मुझे भी अपनी कहानी सुनानी है इसीलिए तो तुम्हारे पास आई हूँ. तुम तो आधी सदी के मेरे सखा हो…. कितनी तो ठंडी सुबहें,  अलसाती दुपहरिया, सुरमई शामें,  शांत चाँदनी और अंधेरी रातें, मैंने तुम्हारे अलग-अलग तटों पर अकेले भी और सहेलियों के साथ या परिवार वालों के साथ गुज़ारी हैं. सुनोगे न मेरी कहानी…..वैसे भी मेरी तरफ तुम्हारा उधार निकलता है…..मेरा हक बनता है कि तुमसे कुछ मन की बात कहूँ…..’ पृष्ट-1-2
वह कहती है,  ‘ कितनी अजीब बात है वह यहाँ सब कुछ भूलने के लिए आई है……भूलने के बजाए उसे सब कुछ याद आने लगता है…बेतरतीबी से….कोई सिलसिला नहीं……..बेशक उसका भी वक्त बदला. भरपूर खुलापन मिला. बहुत बाद में धीरे-धीरे. सुविधाएँ संपन्नता और ऐशो-आराम दबे पाँव उसकी भी ज़िंदगी में आएं. उसके हिस्से में भी वह सब कुछ आया…ऊँचे पद से सेवा-निवृत पति,  और 21वीं सदी के कॉरपोरेट सेक्टर में लक्ष्यभेदी करते बेटे जो मुस्तैदी से अपने-अपने टार्गेट पूरा करने के चक्कर में पता नहीं कब मशीनों में बदल चुके है. उनके पास सिर उठा कर इधर-उधर देखने की फुर्सत नहीं की अम्मा-बाप की तरफ़ नज़र उठा कर देख भी लें……उसे लगता है कि वह पहले भी अकेली थी और आज भी अकेली है.’- पृष्ट-4-5.
लहरें एक मनोचिकिस्तक (साइकैट्रिस्ट) की तरह हल्के सुर उससे बातें करने लगती हैं. उसके के मन की ग्रंथियाँ धीरे-धीरे खुलने लगती हैं. वह अपने बचपन के दिनों में लौटती है, ‘….. अपने पिता की उँगली थामे एक छोटी सी लड़की घेरदार फ्रॉक पहने पानी से बचते-बचाते भाग रही है. चीख़ रही है. खुशी के मारे पागल हो रही है. सुबह के सन्नाटे में सिर्फ उस बच्ची की आवाज़ गूँज रही है…..’  उसे महसूस होता है, ‘अरे! यह बच्ची तो बचपन वाली कामना है, वह भी तो गायत्री की उँगली पकड़कर रेत पर भागा करती थी.’ …..और वह स्मृतियों के गुंजलक में भटकने लगती है ‘…..बेतरतीबी से….. एक बात का सिरा पकड़ती है तो वह कहाँ से कहाँ ले जाती है…..चलने दो यादों का यह सिलसिला…..कुछ तो तनाव कम होगा.’ -पृष्ट-3. वह नॉस्टैल्जिक हो उठती है.
कामना, माँ-बाप, भाई-बहन, घर-परिवार, बेटे, पति-ससुराल, दोस्त हर किसी के होते हुए भी वह अकेलेपन से त्रसित है. वह माँ-बाप भाई- बहन, पति सोम यहाँ तक भरे-पुरे ससुराल और सोम के मित्रों के साथ भी  ताल-मेल बैठा कर चलती है. फिर भी आंतरिक अकेले-पन से त्रसित है! क्या वह विरासत में मिली अपनी चुप्पियों के साथ सारे जीवन अकेलापन बुनती रही है?…..
लेखिका जो हर जगह साये की तरह कामना के साथ उपस्थित रहती है, कहती है ‘कामना की ज़िंदगी चकरघिन्नी की तरह घूम रही थी. पता नहीं किसका आशीर्वाद था कि वह कभी थकती नहीं थी. घर- ऑफिस का सब काम हँसते-हँसते करती थी. बेटों को होम-वर्क करने में मदद करती थी. सोम को घर आने में रात के आठ-साढे-आठ बज जाते थे. उनसे कोई कामना कर नहीं सकती थी. वे पहले ही थके हुए घर पहुँचते थे.’ पृष्ठ- 51 फिर भी वह हँसती है खिलखिलाती है. सोम उसके अंदर झांक कर नहीं देखते कि वह कितनी अकेली पड़ जाती घर, नौकरी और बच्चों को अकेले संभालते हुए. सोम उसके भावनाओं के संसार में प्रवेश नहीं कर पाते हैं. अतः वह आंतरिक अकेलेपन से अभिशप्त है.
‘उसे लगता है वह पहले भी अकेली थी और आज भी अकेली है. तब पिता जी का अनुशासन बोलने की इजाज़त नहीं देता था, अम्मा चुप, पिता जी चुप, लेकिन उनकी चुप्पी में ही सारे कहे अनकहे आदेश छुपे होते थे. गायत्री चुप और उनको देखती कामना चुप और यह चुप्पी उसके स्वभाव का हिस्सा बनती चली गई है. ….’पृ-4.
वैसे देखा जाए तो शायद हम सभी अकेले होते हैं पर औरत का अकेलापन और भी ज़्यादा अकेला होता है,  उसके साथ ही यदि उसका देश-गाँव, मायका और स्नेही दोस्त भी छूट जाए तो वह खुद अपने लिए ‘परदेस’ बन जाती है. अपने मन में व्याप्त यह परदेस बहुत दाहक होता है. कामना सोचती है ‘… उसकी ज़िंदगी में जो भी दोस्त बन कर आया. वह ज्यादा दिन नहीं टिक पाया….ये उसके जीवन का एक उदास अध्याय है.’ कामना के माध्यम से लेखिका मध्य-वर्गीय परिवार में अकेलेपन से त्रसित स्त्रियों के पारिवारिक दायित्वों के साथ-साथ एक सफल काम-काजी, स्त्री और उनकी सफलताओं- असफलताओं, डर-भय, आशाओं-निराशाओं, लज्जा-शुचिता विवेचन करते हुए मध्य वर्गीय जीवन का आख्यान रचती हैं. ‘कामना ने पुरानी परंपराओं और वर्जनाओं को तोड़ा था…पिता जी अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में कामना (बेटी) के घर में थे और उन्होंने अंतिम सांस वहीं ली थी.’ पृ. 36 यहाँ लेखिका का ‘पुरानी परंपराओं और वर्जनाओं’ से मंतव्य एक मात्र एक बेटी के घर पिता के मृत्यु पर्यंत रहने से है.
कामना अपने माँ-बाप को लेकर बहुत प्रोटेक्टिव है उधर लेखिका कामना के चरित्र के लेकर प्रोटेक्टिव है. कामना एक ऐसी आदर्श चरित्र है कि काजल की कोठरी में रहते हुए भी उसमें इतना संयम और तेज है कि वह एकदम कोरी और साफ-सुथरी है. अपनी शुचिता को लेकर कामना इतनी सतर्क है कि सोम जिससे वह प्रेम करती है उससे भी हर तरह की दूरी बनाए रखती है। यहाँ तक कि उसके साथ फिल्म तक नहीं देखने जाती है. लेखिका कामना के माध्यम से उपन्यास में जगह-जगह स्त्री शुचिता की पैरवी करती दिखती है. एक जगह वह कहती है कोई उसे छू कर तो देखे वह उसे चीर कर रख देगी.
उपन्यास में जगह-जगह चालों वर्णन करते हुए लेखिका अत्यंत रोचक ढंग से चाल की गंदी गलियों और उनमें रहनेवालों के वीभत्स यथार्थ का खूबसूरत शब्द-चित्र खींचती है. जैसे- ‘….बाहर मुंडेर पर दिन भर कबूतरों की गुटरगूँ चलती रहती और उनके मल-मूत्र के बीच रहते थे सब लोग……आमने-सामने बिल्डिंगों के बीच ज़रा सी गली थी सिर्फ़ दो आदमियों के जाने लायक. उन दिनों खिड़कियों से कचरा फेंकने का रिवाज था. उस कचरे में दाल…कड़क रोटी,…गंधाती सब्ज़ी, चाय पत्ती मिला हुआ पानी….. ये सब कचरा गली में गुज़रने वाले आदमी के सिर पर ही गिरता….. ’ –पृ-6. वहीं आगे पन्ने पर देह-व्यापार का एक सटीक सजीव शब्द चित्र मिलता है, ‘शाम ढली नहीं कि कई कमरों में औरतें सजने लगती थी. बालों में गुलाब, मोगरे के फूलों के गजरे दिखाई देने लगते थे. रंग-बिरंगी साड़ियाँ, डीप गले के ब्लाउज़. वे इतनी बेशर्म थीं कि तैयार होते समय खिड़कियाँ भी बंद नहीं करतीं….वे अंधेरे में भी तेज़ क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ते और दबे पाँव अपनी पसंद की महिला के कमरे में घुस जाते और हल्के से दरवाज़ा बंद हो जाता था, खिड़कियाँ भी तब बंद हो जाती थीं….. आम तौर पर घर के मर्द लोग ही अपनी पत्नियों और बहनों के दलाली करते हैं. कामना खुली खिड़कियों से लड़कियों के सजते-धजते और कामुक इशारे करते देखती है….उस इमारत के हर कमरे में एक राज़ और एकराज़दार रहता था. पृष्ठ-7
पैसा, लालच, स्वार्थ, देह-व्यापार, शोषण, झूठ-बेईमानी, छल-कपट को नज़दीक से देखते-देखते कामिनी अपना विवेक स्वयं बनाती है. बचपन की छुई-मुई सी कामना जो अपनी बहन गायत्री को बिंदास कहती थी खुद बिंदास हो चली थी। हर पल कीचड़ में रहते हुए कमल की तरह खिली रहती है. कामना निम्न वर्गीय लोगों के हालात से वाकिफ़ है ‘वह सोचती है- कोई भी चंद्रा बन सकता है. किसी के बेटे सुरेन्द्र-वीरेन्द्र बन सकते हैं. पैसे और शारीरिक ज़रूरतों के लिये और प्रॉपर्टी के लिये इंसान कुछ भी कर सकता है. दुनिया के अनुभवों ने कामना को बहुत समृद्ध किया है.’
किशोर अवस्था से लेकर वयस्क होते-होते उसके संपर्क में बहुत से किशोर, युवा और पुरुष साथी, मित्र और संबंधी होते हैं पर विवेकशील कामना अपनी सीमाएँ जानती है. उन्हीं सीमाओं के अंदर वह जीवन का अर्थ खोजते हुए एक सामान्य जीवन जीने के साथ थोड़ी सी जगह अपने लिए तलाशती है. सोम से उसकी मित्रता होती है. सोम उसे और लोगों से अलग नज़र आता है. वह उसे पसंद करने लगती है परंतु शादी होने तक उससे दूरी बनाए रखती है. यह उसके संस्कार हैं उसके आदर्श हैं. सोम सौम्य हैं धीर गंभीर है. कई अर्थों में उसे सोम में अपने पिता की छवि दिखती है. सोम सब सुनते हैं पर उसका साथ देने के लिए उसे दिलासा देने के लिए कुछ नहीं कहते है क्योंकि ‘सोम आदर्श पिता, आदर्श भाई, आदर्श बेटा सब कुछ थें….. कामना के दुख का सबसे बड़ा कारण था. वह कभी कुछ बोली नहीं थी.’ पृ. 152. कामना इस तरह के तमाम अवसरों पर अपनी प्रतिक्रिया ना देकर, चुप्पी साधती हुई अकेलापन बुनती हुई खुद को अपने आदर्शों के जाल में फंसा लेती है. कहते है न कि तुम्हारा बनने की चाह में न हो सके किसी के हम…..
सोम का परिवार चार महीने कामना के पास रहता है किस तरह वह ऑफिस और घर संभालती है किसी को इसकी परवाह नहीं है. सोम के ममी-डैडी और सोम सब उससे तमाम मध्यम वर्गीय घरेलू बहुओं की तरह सेवा-भाव की कामना रखते है. काम-काजी कामना पढ़ी-लिखी स्त्री अपने आदर्श और अच्छी बनने की चाह में एक घरेलू स्त्री बन कर रह जाती है. संभवतः उसके संस्कारों ने उसे एक तरफ सहनशील, कर्मठ, प्रगतिशील तो दूसरी तरफ संकोची और अपने आप में सिमट कर घुट-घुट कर रह जाना भी सिखाया हैं. किसी को कामना की चिंता या लगाव नहीं है. वह सोम से बहुत सी घर-गृहस्थी की बातें करना चाहती है. वे लोग सोम को अकेला नहीं छोड़ते हैं. सोम के पास उसके वक्त नहीं है. वे सोम के सामने उसकी खामियां निकालते हैं सोम उसका साथ ना देकर के चुप लगा जाते हैं. ऐसे में दिनों-दिन सोम उसके लिये अजनबी बन जाता है…. और कामना का अकेलापन गहराता चला जाता है.
मधु अरोड़ा उपन्यास में कामना के जीवन-गाथा के माध्यम से और भी बहुत सारी कहानियाँ कह जाती हैं जैसे बंबई (बॉम्बे) का धीरे-धीरे मुंबई में बदल जाने की,  मुंबई का ‘कमर्शियल हब’ और आर्थिक राजधानी होने की, मुंबई की एक सहिष्णु मिली-जुली संस्कृति का विकृत अराजक और अप-संस्कृत होते जाने की,  हरी-भरी मुंबई शहर का कॉन्‍क्रीट सिटी और टावर में बदलते जाने की, मुंबई के क्षेत्रफल का फैलाव का,  बढ़ती हुई भीड़ और मशरूम की तरह उगते झोपड़-पट्टी और चाल के साथ मुंबई का धीरे-धीरे देह व्यापार और अजनबियों का कारोबारी शहर होते जाने की. मधु अरोड़ा भारत-पाकिस्तान युद्ध से लेकर, मुंबई में बाढ़ के आने के साथ राजीव गाँधी की हत्या, ऑपरेशन ब्लू स्टार, बाबरी मस्जिद के ढहाने की,  हिंदू मुस्लिम झगड़ों की याने 1970 से लेकर 2008 तक होने वाली तमाम घटनाओं की जिक्र करती हैं.
मधु अरोड़ा, कामना के माध्यम से आधुनिक जीवन बढ़ते अकेलेपन के कारणों को परिभाषित करने का प्रयास करती है कि आज के वक्त में हम सब अपने अकेलेपन से अभिशप्त हैं. कामना के माँ-बाप के संदर्भ में भी यही बात आती है, गायत्री की शादी हो जाती है दोनों भाइयों की शादी हो जाती है और वे अपनी पत्नियों के साथ अलग घर बसा लेते हैं और इधर कामना के बेटे भी अपनी-अपनी हाई-फाई जॉब में व्यस्त हैं  ‘यही अकेलापन अम्मा और पिता जी को भी मिला, जब उनको बेटों की जरूरत थी तो कामना की भाभियाँ अलग फ्लैट लेकर अपने-अपने पतियों के साथ रहने चली गई थी. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि सास-ससुर जी रहे थे या मर रहे है.’
वस्तुतः  यह उपन्यास एक काम-काजी स्त्री कामना की कथा-व्यथा है जो वर्चस्ववादी समाज व्यवस्था पर सवाल उठाती है जिसमें स्त्री को अपने अपने सपनों और आकांक्षाओं के साथ कदम-कदम पर समझौता करना पड़ता है. यहाँ तक कि इस व्यवस्था में वह अपने घर को ‘अपना घर’ कहने का हौसला नहीं कर पाती है- संदर्भ पृष्ठ.152 कामना के अंदर घर हर समय रचता बसता रहता है तभी तो नौकरी करती दौड़ती-भागती घर और बाहर के सारे काम करती है. नौकरी से आते-आते सात बज जाते हैं. सोम खुश थे पर वह ‘वह मशीन बन कर रह गई थी पूरे परिवार के होते हुए भी उससे कोई बात करने वाला नहीं था. उसका मन करता कि सोम उससे अकेले में उससे बात करें……वह चाहती थी कि  सोम उसे लेकर थोड़ी देर बाहर जाएं….लेकिन वे उसकी यह इच्छा पूरी करने में सोम खुद को असमर्थ पाते थे.’ वे दोनों कभी जाना भी चाहते तो सास-ससुर भी साथ लग जाते. कामना एक अच्छी बहू, अच्छी पत्नी, अच्छी गृहस्थिन बनने के चक्कर में उद्वेलित होते हुए भी चुप लगा जाती. दुनिया के हर इंसान की तरह कामना भी अपने अंत-स्थल में छुपी तमाम चुप्पियों के बीच एक मुकम्मल जहाँ तलाशती है, पर मुकम्मल जहाँ होता कहाँ है वह तो क्षितिज में उगते एक इंद्रधनुष की तरह है जिसे पाने के लिये एक क़दम आगे बढ़ो तो वह एक क़दम पीछे हट जाता है…..
अंत में, संस्कृत में  एक कहावत है, ‘गद्यं कविनां निकषं वदन्ति’, यानि गद्य कवि की कसौटी है. गद्य लेखक अपने अनुभवों और विचारों की अभिव्यक्ति सहज और सरल भाषा में इस प्रकार करता है कि वह प्रभाव पूर्ण हो उठती है. मधु अरोड़ा अपनी भाषा को संप्रेषणीय बनाने के लिए प्रसंगों के अनुकूल सपाट और सरल भाषा के साथ देशज और प्रादेशिक भाषा का प्रयोग करती हुई चरित्रों से उनकी भाषा में संवाद भी कराती है. ‘एक समंदर मेरे अंदर’ की गद्य शैली पाठक को रुचिकर लगती है विशेषकर जब लेखिका मुंबई की गलियों और चालों के क्रियाकलापों का विस्तृत वर्णन करते हुए शब्द-चित्र खींचती हैं. पाठक उपन्यास को एक ही बैठक में समाप्त करने का प्रयास करने के साथ ही फ्लैश-बैक में लिखे इस आत्म-कथात्मक उपन्यास की नायिका कामना की स्मृतियों के समंदर से अनायास ही खुद को  आइडेन्टिफाई करने लगता है. लेखिका, कामना के माध्यम से इंसान के अंदर और बाहर निरंतर होते रहते विस्थापन के  बीच होते हुए अनुभवों को बाटते हुए एक मुकम्मल जहाँ खोजने का प्रयास करती है परंतु क्या मुकम्मल जहाँ किसी को मिलता है?
पूरे उपन्यास में लेखिका की उपस्थिति निरंतर बनी रहती है कहानी कामना की है वह अपने बाल सखा समुंदर को अपनी कहानी सुनाती है पर जल्दी ही लेखिका उसे नैरेट करने लगती है. चूंकि ‘एक समंदर मेरे अंदर’ का प्लॉट कॉम्पिलीकेटेड नहीं है अतः पाठक को कोई उलझन नहीं होती है और वह रुचि लेते हे पूरा उपन्यास एक ही बैठक में समाप्त करने का प्रयास करता है. ‘एक समंदर मेरे अंदर’ लेखिका का पहला उपन्यास है. उन्हें हार्दिक बधाई. सहज भाषा में लिखी पुस्तक पठनीय और मनोरंजक है आशा है कि हिंदी जगत में उपन्यास ‘एक समंदर मेरे अंदर’ का भरपूर स्वागत होगा.
पुस्तक – एक समंदर मेरे अंदर
रचनाकार – मधु अरोड़ा
समीक्षक – उषा राजे सक्सेना

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