Wednesday, May 22, 2024
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कुसुम पालीवाल की कहानी – गूँज

“अरे .. नौटंकी . कहाँ चली गयी ? सुबह से साली ने घर सिर पर उठा रखा है गनेशी चिल्लाया था ..कि, उसकी आवाज सुनकर कंडे थापने घेर में गयी सरोज उसके पास आकर बोली।
“नौटंकी होगी तेरी अम्मा .. दुबारा नौटंकी बोला तो नोंच लुंगी तेरी जुबान को” और ऐसा कह कर हाँफने लगी थी वो ..।
“का बोली ससुरी ? हमारी अम्मा ने तुमारो का बिगाड़ो ? अम्मा को बखानवे की कैसे सोची तुमने “और घुमा कर एक झापड़ रसीद दिया था सरोज की कनपटी पर …..।
सरोज ने आव देखा न ताव और लौट कर एक झापड़ रसीद मारा अपने आदमी के गाल पर …और चिल्ला कर बोली ..
“लगा हाथ .. और लगा .. तुम आदमियों ने औरत को जानवर समझा है ..साला दारू में उड़ाता है मेरी कमाई और पक्ष ले रहा है अपनी महतारी का …” सरोज जो मन में आ रहा था, बके जा रही थी ..।
एक सन्नाटा सा छा गया था जरा सी झुग्गी में …..
सरोज का आदमी घर से बाहर कहीं निकल गया था और अम्मा बाहर बरामदे में बैठने चली गयीं थी।
और सरोज !…..सरोज सोच रही थी अपने जीवन के वो दिन जब वो अपने माँ-बाप के घर पर रानी की तरह रहती थी।
पिता स्कूल में चपरासी था और माँ कोठियों में काम करती थी।  माँ ने बताया था कि तू शादी के कई साल बाद हमारे घर में पैदा हुई थी। माँ और पिता जी ..जान छिड़कते थे मुझ पर।  आँखों से ओझल हुयी नहीं कि बस बैचेन हो उठते थे।
जब मैं पाँच साल की हुई तो माँ ने ही पिता जी से कहा …“सुनों ..सरोज के बापू, सरोज का स्कूल में एडमीशन करवा दो “
बापू दूसरे ही दिन मुझे सरकारी स्कूल में ले जा कर एडमीशन करा आये थे।  मुझे स्कूल में डलवा कर माँ बहुत खुश थी …क्योकि माँके विचार बहुत अलग थे।  वो खुद दसवीं पास थीं और पिता जी बारहवीं फेल।
माँ किस तरह खुश होकर मुझे सुबह स्कूल के लिए तैयार करती और पिता जी को टिफिन थमाती, तब फिर जातीं अपने काम पर।  पिता जी भी जिस स्कूल में नौकरी करते थे उससे पहले मुझे मेरे स्कूल छोड़ते फिर अपने स्कूल जाते …..।
दिन निकलते जा रहे थे और मैं बड़ी होती जा रही थी।  माँ खुश थी कि उसका आदमी और आदमियों की तरह दारू नही पिता है।  माँ और पिता की समझदारी से घर में बरकत हो रही थी।
मैं पढ़ने में होशियार होने के साथ -साथ नाक-नक्श में ठीक-ठाक ही थी, हमारे मुहल्ले में सब रानी कहते थे मुझको ….मैंने दसवीं की परीक्षा में 68% अंक प्राप्त किये थे,इसमें मेरी मेहनत तो थी ही,पर मेरे माता पिता का बहुत सहयोग था।  किस तरह दिन में काम और रात को मुझे पढ़ने के लिए उनका प्रोत्साहित करना, मैं बहुत भाग्यशाली समझती थी अपने आपको।  मैं आगे और पढ़ना चाहती थी।  रिज़ल्ट देख कर माँ ने भी तो कहा था …” हम अपनी गुडिया को खूब पढ़ाएंगे ..” और मैं माँ से लिपट कर बोल उठी थी ..।
“माँ ..आगे पढाओगी न मुझको ..”
“हाँ बेटा तुमको आगे पढायेंगे .. लड़की का अपना वज़ूद होना बहुत ज़रूरी है “
मैं माँ के विचारों से हमेशा बहुत सन्तुष्ट रहती थी ..लेकिन शायद मेरी किस्मत लिखने वाले ने कुछ और ही लिखा था मेरी किस्मत में।
एक दिन पिता जी के कोई रिश्तेदार हमारे घर पर आये थे उन्होंने मुझे देखा, तो पिता जी से एक दिन खाना खाते समय बोले थे।
“क्यों ..सुरेश ..! बिटिया के हाथ पीले करने हैं कि नाय करने ?
“हाँ ..! भईया ! क्यों नाय …करने तो हैं ?
कोई अच्छौ घर वर मिले तो बात चलाई जाये ….” तुरन्त पिता जी ने उनकी हाँ में हाँ मिलाकर हाँ जताई थी।
“अरे..! वो राम भरोसे को लड़का है तो, शरीर से भी अच्छौ है और लोगन तै सुनी है कि बहुत खेती तो है।  नौकरी नाय करतौ …लेकिन लड़की भूखी नाय मरेगी तेरी ..। ” तुरन्त पिता जी के वो दूर के भाई बोल उठे थे।
मैं किबाड़ की ओट से सब सुन रही थी और मैं पिता जी की बात से नाराज हो कर, दौड़ती हुई आकर किस तरह माँ के आँचल से लिपट गयी थी और रोते हुए बोली थी।
“माँ मुझे शादी नहीं करनी ..नही करनी ..नहीं करनी …। “
“अरे ..! कौन कर रहा है तेरी शादी “?
“वो .. जो पिता जी के भाई आये है न, वो .. “
“अरे ..! कोई घर की खेती है जो वो कहेंगे वही होगा ….अच्छा चल ..चल तू रोना धोना छोड़, मैं बात करुँगी “ये कह कर माँ मुझे छोड़ कर रसोई में चली गयी थी।
सुबह उठी तो वही चर्चा फिर मेरे कानों में पड़ी थी।  पिता जी के भाई तो जा चुके थे पर पिता जी के कानों में भर गये थे मेरी शादीका फितूर ..।
“सरोज की माँ ..! भईया ठीक ही तो कह रहे थे,अब बहुत पढ़ ली सरोज बिटिया।  ..दसवीं तो कर लिया है न बाबा ! ना…ना…… अब ज्यादा नही पढायेंगे, ज्यादा पढ़ ली तो लड़का नहीं मिलने वाला “पिता जी माँ से कह रहे थे।
“अजी ..! क्या बात करते हो ..? क्या हमारी बिटिया हमारा जैसा जीवन बितायेगी ? .. सारे हाथ घिस गये हैं मेरे ..औरों के घर बर्तन माझ माझ कर, थोड़ा और पढेगी तो छोटी मोटी कोई नौकरी तो कर सकेगी। कोई नौकरी वाला लड़का मिले तो बात करना ये खेती वाला लड़का क्या जाने कि औरत के भी कुछ अरमान होते हैं।  अब हमें देखो तुम नौकरी करते थे शहर में, तो हम सब शहर में तो हैं।
कहाँ बिटिया को गाँव में धकेल रहे हो जी “माँ एक दम से बरस उठीं थी पिता जी पर।
माँ की विचार धारा और औरतों से थोड़ा अलग थी।  उन्होंने मुझे हमेशा से कहा था कि ….
”बेटा जीवन में कभी ग़लत का साथ नही देना और ग़लत सहना भी मत .. अपनी इज्जत अपनी नज़रों में जब गिर जाती है तो इन्सान का जीवन बोझ बन जाता है …किसी को इतनी छूट मत देना कि वो तुम्हारा अपमान कहीं भी और किसी के बीच में कर सके …”
अचानक पिता जी की तेज़ आवाज से मैं चौंक गयी थी।
“तो क्या हाथ से इस लड़के को निकल जाने दूँ ?.अरे …सरोज की माँ !ये लड़की मेरी भी है मैं नहीं जानता क्या भला है और क्या बुरा ….”
“अरे .. तुम तो ऐसे भड़क रहे हो जैसे हमारी सरोज को और लड़के नहीं मिलेंगे …”माँ ने भी थोड़ा रोष दिखाते हुए बोला था।
और मैं सोच रही थी कि आज तक मैंने माँ को पिता जी से इतनी तेज आवाज में बात करते नही सुना था ….। मैं उस वक्त अपने को दोषी समझने लगी थी।
मैं कमरे से बाहर निकल आई थी मुझे आता देख पिता जी ने अपनी बातों का रुख ही बदल दिया था …।
“सरोज की माँ ..! लाओ ..खाने का डिब्बा लगाओ, नही तो देर हो जायेगी मुझे“ और पिता जी नहा -धोकर घर से निकल गये थे।
मैं माँ को देख रही थी और सोच रही थी कि माँ को मेरी कितनी चिंता थी।  वो बिलकुल नही चाहती थी कि मैं गाँव में ब्याही जाऊँ..।
दिन निकलते जा रहे थे और एक दिन फिर मैंने देखा कि वही रिश्तेदार किसी और को साथ लिए चले आ रहे हैं और उनके साथ में पिता जी भी थे।  घर में घुसते ही पिता जी ने शोर मचाना शुरू कर दिया था ….।
“अरे ..सरोज की माँ चाय बना ला।  देख तो कौन आया है “
मैंने माँ को देखा था, कैसी कातर नज़रों से माँ ने दरबाजे की ओट से पिता जी के दूर के भाई को देखा था।  मैं जानती थी माँ को फूटीआँख भी नही सुहा रहे थे, लेकिन माँ क्या कर सकती थी।
“अरे चाय नही आई अभी “पिता जी ने फिर से आवाज मारी थी तो चाय मैं ले गयी थी।  पिता जी के भाई के साथ में जो आये थे वो कैसे घूर घूर कर मुझे ही देख रहे थे।  रात का खाना दोनों
रिश्तेदारों ने खाया था।  और रात को ही चले गये थे।
बस उसी रात से शायद मेरी ग्रहदशा बदलने लगी थी। पिता जी के सामने माँ की एक न चली थी। जो माँ मुझे अन्याय न झेलने की राय देती थीं वो भी अपने पति यानि मेरे पिता जी के आगे कुछ न बोल सकी थीं। पिता जी को खेती वाले की ज़मीन दिख रही थी।  छै बीघा ज़मीन थी उनके पास।  बेटी को क्या कमी होगी।
बात पक्की हो गयी थी।  शादी की तैयारी होने लगी थी।  माँ ने शादी में देने के लिये एक तौले का सेट और अंगूठी, नाक की कील, और पायजेब खरीद ली थी,मेरे पसन्द की साड़ियाँ भी खरीदी थीं।  पाँच साड़ी दी थी मेरे लिए और घर में एक साड़ी सास के लिए और इनके लिए सूट था और एक अंगूठी, दो ननद थीं उनके लिए भी एक एक साड़ी थी।  गृहस्थी का जो सामान होता है वो सब था।  यहाँ तक कि पलंग,रजाई,तकिया तक …रिश्तेदार आँखें फाड़-फाड़ कर सारे सामान को देख रहे थे।
तभी मेरे कानों में आवाज पड़ी थी “सरोज के तो ठाट हो जायेंगे ..भई जमीन तो है ही उनके पास,सुना है एक भैंस और एक गईया भी है “
“हाँ .. हाँ बड़ी जिज्जी ..सही सुना है “ पिता जी बोल उठे थे।
“भाग्यबती है हमारी सरोज” बुआ की जगह बड़ी मौसी हुलक कर बोली थी।  सब ढोलक पर बन्नी गाये जा रहीं थीं और मैं सोच रही थी कि ये रीत किसने बनाई है कि जिस घर में अपना बचपन बीता हो वही छोड़कर एक दिन लड़की को जाना पड़ता है।  ये सोच कर उसकी आँखों के कोर भीग उठे थे।
मेरे हाथों पर मेहंदी का रंग अच्छा चढ़ा था… तो सुबह सब ..बुआ, चाची छेड़ रहीं थी कोई न कोई कुछ कुछ कहे ही जा रहा था।
“हमारे जीजा जी बहुत प्यार करेंगे हमारी दीदी को “बुआ की लड़की बोली ही थी .कि तभी …“अरे थोड़ा बहुत नहीं ..पागली ! बहुत सारा करेंगे “ये कह कर मौसी की लड़की और सभी लड़कियाँ ..ही..ही..ही. करके खिलखिला उठी थी ..।
सुबह से रस्में निभाते हुए रात का आठ बज चुका था, जयमाला की रस्म, भाँवर और बिदाई का समय आ पहुँचा था।  पिता जी नेअपनी लाड़ो की शादी में किसी चीज की कमी नही रखी थी।  सब लोग खुश थे।
बिदाई पर पिता जी फूट फूट कर रोये थे पर माँ ..! माँ बहुत हिम्मती थीं …गले लग कर माँ ने फिर से कहा था।
“बेटा सम्मान सबका करना …लेकिन अन्याय कभी न सहना “
और मैं सुनते ही माँ के आँचल से लग गई थी।  माँ ने मेरी पीठ थपथपाई थी और कहा था ..खुश रहो।
बस का सफर और गाँव के रास्ते .. हिलते डुलते सारी बारात और मैं अपनी ससुराल पहुँच गये थे।
दुल्हन का स्वागत जैसे होता है उन्होंने किया।  नेग दिवाई भी मैंने कर दी थी।  थोड़ी देर में सारी औरतें बधाई गीत गाने लगीं और मुँह दिखाई करने लगीं …सब घूँघट के अन्दर झाँक झाँक कर अपने विचार रखती और चली जातीं ..।
थोड़ी देर बाद मुझे एक कमरे में मेरी बड़ी ननद लेकर गईं और बोली..
“सरोज तुम यहाँ बैठो ..थोड़ा आराम करो, गनेशी अभी आ जायेगा “और ये कह कर चली गयीं ..।
रात का दो बज चुका था।  गनेशी दरवाज़ा ढुलकाकर अन्दर आ गया था।  मैंनें चौक कर अपना घूँघट ठीक किया और उठ बैठी थी ..।
“अरे… तुम क्यों उठ बैठी सरोज देबी “गनेशी ने कुछ लड़खड़ाते शब्दों में कहा था उससे..।
मैं समझ चुकी थी कि गनेशी ने दारू पी रखी है ..
मेरे सारे सपने एक ही पल में चूर चूर हो कर धाराशाही हो गये थे।  पिता जी को मैंने कभी दारू पीते नही देखा था।  मेरा मन भारी होचला था। कि, इतने में एक ..धम्म की आवाज पर मैने घूम कर देखा था ..तो देखा, गनेशी चारपाई पर औंधे मुंह पड़ा था।
मैंने झुककर उसके जूते उतार दिये थे।
लेकिन मैं सोच रही थी कि मेरा आगे का जीवन कैसा बीतने जा रहा है ..??
इस एक सवाल ने मेरे सामने मेरी सुहागरात के दिन ही मुँह फाड़ दिया था और मैं आँखें बन्द कर के चारपाई के कोने में लेट गयी थी, न जाने कब नींद ने अपनी गोद में ले लिया था, इसकी खबर ही न हुई …।
सुबह कमरे की कुंडी जोर से खड़क रही थी मैं घबरा कर उठी थी।  देखा बड़ी ननद बाहर खड़ी थी, उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा तो में संकोच से भर उठी थी ..कि न जाने क्या सोच रही हैं उनकी नज़रें ?
सुबह मैं नहा धोकर तैयार हो कर कमरे में बैठी ही थी कि, तभी ननद आ कर बोलीं ..।
“रात को गनेशी थोड़ा लेट हो गया था “
“हाँ ..जिज्जी “
“तो ….कुछ … “
“और, मैंने अपनी गर्दन ..न ..में कह कर झुका ली थी “
“अरे …इतनी बार कहा है ..इतनी न पिआ कर ..माने तब न”
जिज्जी कहे जा रहीं थी ..उनके स्वर में हताशा थी ..क्यों न हो, आखिर वो भी तो एक औरत थीं..।
और मैं अपना भविष्य देख रही थी, सोच भी रही थी।  जिस पत्नी को सुहागरात वाले दिन अपने पति के जूते उतारने पड़ जायें तो आगे मालुम नहीं क्या-क्या करना पड़े..।
“क्या सोचने लगी सरोज “जिज्जी बोली थीं …।
मैंने धीरे से पूछा …
“क्या रोज पीते हैं “
“हाँ ..यही तो एक आदत पाल ली है अम्मा की सुनता नही है “
जिज्जी बोल रहीं थी और मेरा जी घबरा रहा था अपने भविष्य को लेकर …।
दो दिन ससुराल में बीत गये थे। गनेशी ने दिन में तो बात की थी उससे लेकिन रात में दारू पी कर आये थे दोनों ही दिन ..।
पिता जी आ गये थे ….मुझे ले जाने के लिए ..।
सुबह जाना था पिता जी के साथ, सारी तैयारी हो चुकी थी।
गनेशी बस अड्डे तक आये थे हम लोगों को छोड़ने।
बस में बैठी ही थी कि गनेशी ने हाथ पकड़ लिया था मेरा लेकिन बोला कुछ भी नहीं था ….मैं समझ गयी थी कि कुछ कहना तो चाहता था लेकिन कुछ बोल न सका था।
बस चल पड़ी थी और मैं गनेशी को देख रही थी कि कही तो उसकी आँखों में पश्चाताप नज़र आये।  एक नई नवेली दुल्हन बिना सुहागत मनाए ही वापस अपने घर जा रही थी।
माँ बाहर खड़ी हमारा ही इन्तज़ार कर रही थीं।
मैं रिक्शे से उतर कर माँ के गले लग गयी थी।
अन्दर मेरे बैठते ही माँ शरबत बना कर लाई और देते हुऐ मुझे देखने लगी …उसकी आँखे सब कुछ टटोल रही थी जैसे मेरे बदन की भाषा को पढ़ना चाहती हों।
मैंने घर पर आ कर माँ को कुछ भी बताना उचित नही समझा ..मैं नही चाहती थी माँ दुखी हों।  इन चार दिनों ने ही मेरे अन्दर बहुत परिवर्तन ला दिये थे। मेरा खिलखिलाना बन्द हो गया था। मैं मन ही मन अपने भविष्य को लेकर सोचने लगी थी।
एक हफ्ता माँ के घर कहाँ बीता ये मालुम ही नहीं पड़ा।  गनेशी मुझे ससुराल ले जाने के लिए आ चुका था .. माँ जो कुछ भी कर सकती थी मेरे लिए वो सब कुछ किया। हम दोनों बस मैं बैठ कर गाँव पहुँच चुके थे।  घर पर गनेशी की माँ ही थी बस …..।
सुबह झाड़ू लगा कर, नहा धोकर, खाना बना खाकर …आँगन में सास के साथ बैठ कर बातें करती रहती या फिर अपने कमरे में रहती।
एक हफ्ते बाद गनेशी बोले थे कि..” बैठी रहती हो गाय, भैसों को कुटटी काहे नहीं डालती हो सरोज .. थोड़ा अम्मा का भी हाथ बंटाया करो …”
बस उस दिन से जो हाथ बंटाया तो आज तक गोबर, गईया और भैंसिया में ही उलझ कर रह गयी थी ज़िन्दगी। चार बच्चे पैदा कर मारे थे गनेशी ने ..चारों लड़के थे।  सबसे कहता घूमता कि चार लड़कों का बाप हूँ .. लेकिन मेरा मन एक लड़की के लिए हमेशा तरसता रहा था।
अम्मा सारा तमाशा चुपचाप बैठी बैठी देखती रहती थीं।  गनेशी की दारू की आदत कम न हो कर बढ़ रही थी।  ज़मीन को टुकड़ा-टुकड़ा कर बेच रहा था गनेशी।  अब बस एक बीघा जमीन बची थी।  बहनें आ कर समझाती भी गनेशी को… तो, वो कुछ नहीं समझता था उनकी बातों को..।  इधर मुहल्ले की औरतें आ आकर ..और, अम्मा का दिमाग खराब करतीं…
“काकी बहुरिया का पैर ठीक नही है ..देखो तो घर का हाल कैसा हो गया है “
अम्मा सब जानतीं थीं ..कि इसमें बहुरिया का क्या हाथ है ?, जब अपना ही सिक्का खोटा है तो बहुरिया में क्यों दोष ढूंढा जाये।  और इधर गनेशी के लिए दारू जैसे उसका जीवन बन गयी थी।  अब ऐसा लग रहा था गनेशी उसको नहीं पी रहा बल्कि वो गनेशी को पी रही थी … अब तो गनेशी की चिड़चिड़ाने और गाली -गलौच करने की आदत पड़ गयी थी। मेरी आदत वो अच्छी तरह जानता था तो मुझसे टेढ़ा बोलने से कतराता था। मुझे माँ के समझाये वचन सब याद थे .।
घर के हालात ठीक नहीं थे,लड़कों को स्कूल न भेज सकने का दर्द मेरे मन में गनेशी के प्रति एक अजीब सा रोष प्रकट करता रहताथा।  सोचती थी लड़के हैं कैसे जीवन बितायेंगे ?
ये ही सोच कर मैंने घर से बाहर कुछ काम करने की सोची और मैंने तीन चार घरों में चौका बासन का काम पकड़ लिया था कि चार पैसे की सहायता ही होगी घर में।  सब कामों से निश्चिन्त हो कर ही मैं जितना पढ़ा सकती थी पढ़ाती थी अपने बेटों को।  मेरे ऊपर सारा काम, बच्चों की देख रेख और उस पर अम्मा भी, इन सब के बीच में पिसकर …मैं थोड़ा विद्रोही सी हो चली थी।  अपने वारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला इस घर में आ कर।
आज सोच रही थी कि ढंग से घर की सफाई करुँगी।  अम्मा का कोई सहारा नहीं था ..कि, थोड़ा सा सहारा होता ..और गनेशी को तो पीने से फुर्सत नहीं थी अब तो दिन में भी ठेके से पी कर आ जाता था।
सुबह यही सोच कर मैं जल्दी उठ गयी थी।  खाना बनाकर रख दिया था।  सुबह का नौ बजा था, इधर घर का सारा काम करके जब घेर में गोबर के कंडे थाप ही रही थी ..उसी समय गनेशी के चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थी ..न जाने क्या अंटशंट बके ही जा रहा था। मैं कान लगा कर सुन रही थी ..जैसे ही मेरे कान में नौटंकी शब्द गया ..बस न आव देखा न ताव ..बस ! उस समय माँ की शिक्षा याद रही थी।  हमेशा कहती थीं ..
“बेटा सब कुछ सह लेना, एक बात याद रखना औरत को धरती का नाम यूँ ही नहीं मिला वो सारा भार सह लेती है अपने कांन्धों पर .. लेकिन जब जब उसके साथ मनुष्य के द्वारा खिलवाड़ किया गया वो भी डगमगाती है और सब कुछ तहस नहस कर डालती है पल भर में…….”
“बेटा अपना अपमान मत होने देना, मर्द जाति का हाथ एक बार उठ जाता है तो बार बार उठता है और इस तरह औरत का पूरा अस्तित्व ही खतरे में आ जाता है “
नौटंकी शब्द से नफरत थी सरोज को .. सुना था उसने बचपन में कि नौटंकी में औरतों को नचाया जाता है, तभी से चिढ़न थी उसको इस शब्द से ……तभी तो गुस्से में बोल दिया था गनेशी को उसने ..कि ….
“नौटंकी होगी तेरी अम्मा ” …कैसा तिलमिला गया था गनेशी ! बीबी को कह सकता है लेकिन माँ के लिए सुनना गवारा नही था उसको.. ये दोहरी नीति पुरुषों की गले से नीचे नहीं उतर रही थी सरोज के। आज उसके दिमाग में बबंडर मचा हुआ था।
औरत को ये लोग कितने टुकड़ो में बाँट देना चाहते है ???
गनेशी के हाथ उठाने पर उसके द्वारा किये घात पर प्रतिघात बहुत ज़रूरी था आज उसके अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये …।
सरोज के थप्पड़ की गूंज उसकी छोटी सी झुग्गी में बहुत देर तक गूंजती रही थी ………,। ।
कुसुम पालीवाल
कुसुम पालीवाल
शिक्षा - एम. ए. प्रकाशित पुस्तकें— चार काव्य संग्रह, दो कहानी संग्रह. संपर्क - kusum.paliwal@icloud.com
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