पुस्तक: साँची कहे कबीर (प्र.सं. 2023) कवि: हरीलाल ‘मिलन’ प्रकाशन: भावना प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: ₹695 पृष्ठ: 304
समीक्षक
डॉ नितिन सेठी
आज से लगभग छः सौ वर्ष पूर्व सन्त कबीरदास का प्रादुर्भाव माना जाता है। उन्होंने ज्ञान और भक्ति के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया। अपने फक्कड़पन और अक्खड़पन के कारण उन्होंने तत्कालीन समाज में फैले मिथ्याचारों और बाह्याडम्बरों के प्रति प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने ज्ञान की प्रत्येक परंपरा को विचार और बुद्धि की कसौटी पर परखा और तर्क से उसे प्रमाणित किया। कबीर की दृष्टि में वही सत्य है जिसे वे तर्क के आधार पर सिद्ध कर सकें। डॉ. रामचन्द्र तिवारी अपने आलेख कबीरदास और आधुनिक काव्य संवेदना में लिखते हैं,“मध्यकालीन कवियों में आज निर्विवाद रूप से कबीर को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। इसका मुख्य कारण धार्मिक रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों के प्रति उनका विद्रोही स्वर है। मध्यकाल में कबीर अकेले कवि हैं, जिन्होंने जीर्ण परम्पराओं का खुलकर विरोध किया है। पहले भी लोकचेतना में कबीर की प्रतिष्ठा कम नहीं थी। नाभादास ने  भक्तमाल में उनका आदरपूर्वक स्मरण किया है। लोकोक्तियों में भी तुलसी और सूर के बाद कबीर का ही महत्त्व स्वीकार किया गया है। इस महत्त्व का कारण उनकी दृढ़ आस्था, निर्भीक व्यक्तित्व और अविचल भक्ति रही है। आज कबीर को जो महत्त्व दिया जा रहा है, उसका कारण कुछ दूसरा है। आज का कवि और साहित्यकार कबीर की मानसिकता को अपनी काव्य संवेदना के काफी निकट पाता है।’’(डॉ. रामचन्द्र तिवारी,   ‘कबीर-मीमांसा’, पृ. 170) उल्लेखनीय है कि सन्त कवियों का उद्देश्य का काव्यसर्जना नहीं था। वे तो समाज सुधारक थे। मानवतावाद के परमपोषक सन्त कवियों में कबीरदास सन्तत्व के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हैं।
कबीरदास पर अनेक विद्वानों ने चिन्तन किया है। उनकी जीवनी और उपदेश विभिन्न रूपों में हमारे समक्ष आते हैं। परन्तु आज तक सन्त कबीरदास पर कोई महाकाव्य देखने में नहीं आया। कविवर रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ ने वर्ष 1975 में कबीरदास के जीवन पर आधारित एक खण्डकाव्य ‘ज्योति पुरुष’ की रचना की थी जिसके पांच सर्गों में उन्होंने कबीरदास का जीवन चरित निबद्ध किया था। कानपुर के वरिष्ठ कवि हरीलाल ‘मिलन’ द्वारा कबीरदास के जीवन पर एक महाकाव्य ‘साँची कहे कबीर’ की रचना वर्ष 2023 में की गई है। यह कृति भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित है। प्रस्तुत काव्य सन्त कबीरदास के जीवन पर प्रथम प्रबन्ध काव्य कहा जा सकता है जिसमें उनके जीवन, परिवार, व्यक्तित्व तथा दार्शनिक चिन्तन को बहुत ही सुन्दर रूप में चौदह सर्गों में प्रस्तुत किया गया है। ज्योतिपुरुष सन्त कबीरदास का जीवनचरित्र प्रस्तुत करने में हरीलाल मिलन ने पर्याप्त सफलता प्राप्त की है। 
        ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्य के प्रथम सोपान का नाम है ‘ढाई आखर’ जिसमें कवि भारत देश का परिचय देते हुए संत कबीर से भी परिचित करवाता है। भारतवर्ष का वर्णन करते हुए कवि लिखता है–
उत्तर में गिरिराज हिमालय जिसको शीश झुकाता
दक्षिण में जिसके चरणों में वृहत् सिंधु लहराता
जिसको दी प्रकृति ने अद्भुत रिद्धि सिद्धि सुंदरता 
संधि शान्ति का पाठ पढ़ातीं संस्कृति और सभ्यता
कबीरदास की विशिष्टता रही कि अनपढ़ होते हुए भी उन्होंने ऐसी-ऐसी गूढ़ बातें अपने काव्य में कहीं, जिनका आज भी कोई सानी नहीं है–
छूओ नहीं कभी मसि-कागद कलम न हाथ लगाए 
मुखरित शब्द अधर से होकर जनजीवन तक आए
सुहृद-सुधारक शुद्ध-विचारक युग-द्रष्टा बन दमके
ज्ञान-चेतना-दर्शन पथ के अग्रदूत हो चमके
द्वितीय सोपान ‘ममता’ में कबीरदास का जन्म दर्शाया गया है। नीरू-नीमा जुलाहे नवजात बालक को लहरतारा तालाब पर पाकर वात्सल्यवश अपने घर ले जाते हैं। कबीर जैसा महान व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों पर विरला ही होता है-
इतिहास स्वयं के पन्ने से ऐसे सुपात्र ले आता है 
रखकर जो प्राण हथेली पर अपना किरदार निभाता है
नीरू-नीमा थोड़े संशय में हैं इस बालक को लेकर परन्तु नीरू अपने मन में दृढ़ता लाती है और इस नवजात बालक के पालन-पोषण को अपना पुनीत कर्त्तव्य समझती है।एक ममतामयी माँ का रूप दर्शनीय है-
औरत हूँ, औरत होने का निर्भय हो फर्ज़ निभाऊँगी
मौला ने सौंपा इसे हमें मैं इसकी जान बचाऊँगी
             ‘उत्सर्ग’ नामक तृतीय सोपान में पड़ोसियों द्वारा नीमा-नीरू का विरोध दर्शाया गया है और अंत में सभी के द्वारा कबीर को पालने की सहमति भी दिखाई गई है। धर्मभीरु जनता अपना धर्मभ्रष्ट होने के भय से उस नवजात बालक को अपने समाज में शामिल नहीं करना चाहती परन्तु नीमा की निर्भयता के कारण सबको झुकना पड़ता है-
क्या पता नहीं है रब ही सब को सहेजने वाला 
हर जिस्म जान को जग में है वही भेजने वाला
         नीमा को विश्वास है कि यह बालक एक अद्भुत जीवन जीएगा–
इंसानों की धरती पर अद्भुत इंसान दिखेगा 
अपने जीवन कर्मों से अपनी तकदीर लिखेगा
नीमा-नीरू का मातृत्व भाव समाज के विरोध को धता बता देता है और नीरू की ममता समाज की हठधर्मिता से जीत जाती है। तभी वहाँ उपस्थित काज़ी भी इस बालक का महान भविष्य बाँच लेते हैं–
ले दीर्घश्वास काज़ी भी शब्दों में मधुरस घोले
स्वीकार किया हमने भी नीरू से हँसते बोले-
होगा मुट्ठी में सब कुछ पर सदा फ़क़ीर रहेगा
जिसका ‘महान’ है मतलब युग संत कबीर कहेगा
 कबीर अपने माता-पिता की छाया में पलने-बढ़ने लगते हैं। चतुर्थ सोपान ‘चिन्तन’ में कबीर का बचपन दिखाते हुए उन्हें उनके पारिवारिक कार्य हथकरघे पर बैठना दर्शाया गया है। मिलन जी ने यहाँ तत्कालीन राजव्यवस्था का हाल भी दर्शाया है–
सामंतवाद संचरणित कृषि मजदूरों का शोषण 
बोझिल लगान की रचना व्यथितों का करती दोहन
चारों तरफ भौतिकता, अन्याय, लूटपाट का वातावरण था। कबीर का अपना परिवार भी निर्धनता के साये में था। ऐसे में कबीर ने भी अपने पिता का हाथ बँटाने का निश्चय किया और हथकरघे का काम सीखना शुरू किया परन्तु यह उनके जीवन का लक्ष्य नहीं था। इसी के साथ संसार में ही रहते हुए उनका आध्यात्मिक चिन्तन भी यहाँ से आरंभ होता है। कबीर जीवन के गूढ़ रहस्यों को अपने विचारों में सुलझाने का प्रयास करते हैं। आंतरिक ज्ञान और चिंतन का प्रस्फुटन यहीं से उनके जीवन में होता है–
हथकरघे से ज्यों उठता या जब-जब अवसर पाता
जाकर कबीर बागों में जड़-चेतन से बतियाता
कहते हैं लोग निरक्षर भीतर से साक्षर दिखता
पूछता प्रश्न फिर उत्तर मन के काग़ज़ पर लिखता
कबीर का चिन्तन यहाँ से मानव के उत्थान के लिए कार्य करना आरम्भ करता है। इसी महान कार्य के लिए ही तो वह धरती पर आए थे। वह सोचते हैं-
प्राणी में प्राण प्रकम्पन जीवों में सांसें बोईं 
जड़ जड़ में भी परिवर्तन सचमुच सत्ता है कोई
कबीर को मानो अपने जन्म का मूल कारण इन पँक्तियों में याद आ जाता है और मानवमात्र के कल्याण के लिए वे अलख जगाने के लिए कृतसंकल्पित होते हैं- 
बूँद से महासागर तक जन-जन में भरना होगा 
मंगलमय हो हर जीवन कुछ अद्भुत करना होगा
अपने चिन्तन को संकल्पित स्वरूप प्रदान करने के लिए पंचम सोपान ‘संकल्प’ में कबीरदास अपने जीवन के मार्गदर्शन के लिए गुरु रामानंद के शिष्य बनना चाहते हैं।कबीर गुरु रामानंद के पास जाते हैं।परन्तु उनका गुरु बनना रामानंद अस्वीकार कर देते हैं–
दूर से दंडवत् किया किंतु गुरु रामानंद न बोले कुछ 
भय में थे कहीं न पद छूले भीतर के भाव न खोले कुछ
परन्तु दृढ़निश्चयी कबीरदास रामानंद को ही अपना सद्गुरु बनाना चाहते हैं और इसीलिए वह पंचघाट की सीढ़ियों पर जाकर लेट जाते हैं। स्नान से लौटते समय गुरु रामानंद का पाँव कबीरदास के सिर पर पड़ता है। रामानंद के मुँह से अचानक राम-राम निकल आता है और कबीरदास इसे ही गुरुमंत्र और महामंत्र मान लेते हैं–
सुन ‘राम-राम’ बोला कबीर गुरुमंत्र आपसे पाया मैं 
वरदान मिल गया जीवन को आपकी कृपा में आया मैं
गुरु-मुख से राम-राम पाकर नाचने लगा वह गा-गाकर
गुरु की दीक्षा मिल गई सहज हो गया सफल दर्शन पाकर
     महाकाव्य के षष्ठ सोपान ‘गृहस्थ’ में कबीर को गृहस्थ आश्रम में रत् दिखाया गया है। गृहस्थ आश्रम को सर्वाधिक कठिन आश्रम बताया जाता है। कबीर और उनकी माता का कठिन परिश्रम, कबीर का लोई के साथ विवाह के दृश्य दर्शनीय हैं। कबीर अपनी देहयष्टि में भी ‘ज्योतिपुरुष’ दिखाई देते हैं। कबीर का शारीरिक वर्णन देखिए–
 नि:शंक स्वनिर्मित धवल वस्त्र गेहुँआ रंग सुंदर सजता 
 मंजुल-मुख शंखमयी ग्रीवा कद-काठी में अनुपम लगता
 आजानुबाहु सुकुमार पुष्ट मुखमंडल पर आभा छाई 
 नयनाभिराम सुंदर ललाट आकर्षित करती तरुणाई
कबीर का आत्मिक चिन्तन धीरे-धीरे पुष्ट हो रहा था और उनकी यात्रा बाहरी दुनिया से भीतरी दुनिया की ओर होने लगी थी। वे ज्ञान और विवेक के उच्च शिखर पर जैसे पहुँच गए थे। ज्ञानमार्ग के सच्चे राही कबीर का पावन व्यक्तित्व हिन्दू-मुस्लिम, दोनों को ही प्रभावित करता है। स्वयं कबीर मानवमात्र में समदृष्टि रखते थे। कवि लिखता है– 
छू लिया ज्ञान का उच्च शिखर था खत्म जहाँ मेरा-तेरा 
व्यक्तित्व निराला था इतना हर जाति समझती थी ‘मेरा’
कबीरदास को निरंतर ध्यानमग्न देखकर नीरू-नीमा परेशान हो जाते हैं और कबीर को सांसारिकता से सम्बद्ध करने के लिए गृहस्थी में बाँधने का निर्णय करते हैं। कबीर का विवाह लोई से करवा दिया जाता है। प्रस्तुत महाकाव्य में हरीलाल ‘मिलन’ ने एक किंवदंती भी दर्शाई है–
हाँ, यहीं एक किंवदंती है,जनहित में कवि-मन लिखता है
इसमें कबीर का न्याय, प्रेम साहस, सद्भाव झलकता है
लोई से किसी दूसरे व्यक्ति को प्रेम था। कबीरदास लोई को उसके पास ले जाते हैं। कबीर की महानता, उदारता और तेजस्विता को देखकर अंत में वह व्यक्ति भी स्वयं कबीर का भक्त बन जाता है। कबीरदास लोई के साथ वापस लौट आते हैं– 
आनन पर पुष्पित पुण्डरीक अधरों पर मधुरिम हास लिए 
लौटे लोई के संग कबीर उर में पूर्ववत् प्रकाश लिए
सोपान के अंत में कबीर लोई को व्यापक, अलख, अनन्तिम, परमतत्त्व अविनाशी ईश्वर की उपासना का उपदेश मानव कल्याण के निमित्त देते हैं और लोई भी उन्हें आजीवन पत्नी-धर्म निभाने का वचन देती है–
‘सब सुखी रहें’ हित यात्रा में अवरोध न कभी बनाऊँगी 
सन्तता आपकी शिरोधार्य हँसकर तियधर्म निभाऊँगी
सप्तम सोपान ‘सृजन’ में कबीर के आर्थिक संघर्षों को दर्शाया गया है। उनके एक पुत्र कमाल और पुत्री कमाली का जन्म होता है। उनके घर पर मुड़ियों,साधु-सन्तों का आना-जाना लगा रहता है। घर में धनाभाव है परन्तु कबीरदास फक्कड़ हैं। कबीर अपनी ग़रीबी में ही अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। इसमें उनकी पत्नी लोई भी उनका साथ देती हैं परन्तु हम देखते हैं कि लोई अपनी बेटी कमाली को लेकर एक दिन अपने मायके चले जाती हैं। ‘निष्ठा’ नामक अष्टम सोपान में कबीर की अपने विचारों के प्रति दृढ़ता और अपने गुरु के प्रति निष्ठा दर्शाई गई है। विद्वानों का दल गुरु रामानंद को कबीर की गुरुदीक्षा पर उपालंभ देता है और कबीर के रामनाम मंत्रोच्चारण पर प्रश्नचिह्न उठाता है। रामानंद क्रोधपूर्वक कबीर को बुलवाते हैं और उनसे गुरुदीक्षा का प्रश्न उठाते हैं। कबीर उन्हें पंचघाट की सारी घटना बताते हैं। रामानंद क्रोध में अपनी चरणपादुका से कबीर के मस्तक पर चोट कर देते हैं परन्तु कबीर विनम्र भाव से इसे ही रामानंद जी की गुरुदीक्षा मान लेते हैं–
बोले विनम्र स्वर में कबीर प्रभु अभ्यन्तरित हुई इच्छा 
है आशीर्वाद पादुका का हो गई पूर्ण दीक्षा-शिक्षा
कबीर की गहन गुरुभक्ति और राम नाम में नैत्यिक निष्ठा को पहचान कर रामानंद जी उन्हें अपना सर्वोत्तम शिष्य घोषित करते हैं। धीरे-धीरे सभी जातियों के लोग कबीर के शिष्य बनते जाते हैं और उनकी शिष्य परंपरा बढ़ती जाती है।  नवम सर्ग ‘नेह’ में लोई पुनः कबीर के पास आती हैं और पति की आज्ञा मानने का संकल्प लेती हैं। लोई अब से स्वयं को कबीर की शिष्या मान लेती हैं। कवि लिखता है– 
और उम्र भर संत-कंत संग रही कांता खोई 
कवि कबीर थे यथा राममय तथा हो गई लोई
दशम सर्ग का नाम है ‘राम’। इसमें कबीरदास को एक संत के रूप में दर्शाया गया है जो भक्ति की विलक्षण महिमा का बखान करते हैं, लोगों में राम नाम बाँटते हैं। कबीर अब सगुण और निर्गुण के विवादों से परे जाकर केवल एक अखंड परमात्मा का ही ध्यान करते हैं।रामनाम गुरुमंत्र को अपने जीवन की साँसों की तरह मानने वाले कबीर ढाई आखर के प्रेम में रत् में रहते हैं और इसी का प्रसाद सारे जगत् में बाँटते फिरते हैं। परन्तु वह अपना सामाजिक दायित्व भी नहीं छोड़ते। चरखा चलाते-चलाते ही वे अपने उपदेशामृत से भक्तों को निहाल करते हैं। कबीर चादर बुन रहे हैं और मानव अस्तित्व की उलटबाँसियों को भी सुलझा रहे हैं। झीनी-झीनी चदरिया में उन्हें मानव जीवन का सार और साम्य  दिखाई देते हैं। इसका मार्मिक वर्णन कवि ने किया है–
एक दूजे से है सम्पृक्त दीखता धागा-धागा मुक्त 
सभी में बुनकर का अस्तित्व सभी हैं चादर से संयुक्त
एकादश सोपान ‘प्रतिभा’ में कबीरदास का उज्ज्वल ज्ञानमयी स्वरूप द्रष्टव्य है। इसमें सिकंदर लोदी और कबीरदास का वाद विवाद दर्शाया गया है जिसमें कबीर निडर होकर सिकंदर लोदी को सही मार्ग पर चलने की सीख देते हैं और आध्यात्मिक चेतावनी देते हैं। कबीर के शब्द मानव जीवन का दार्शनिक सत्य उद्घाटित कर देते हैं– 
जन्म से सजाएँ मिलीं मुझको तन लोहा भी है कुन्दन भी 
मेरे हर अवयव पर काँटे मैं नागफनी मैं चन्दन भी
ले चल हरजीवन सत्पथ पर जो गिरे उन्हें अब उठने दे 
हो दिव्य अंशु समरसता की भीतर का सूरज उगने दे
संतों का जीवन चमत्कार और उपकार, दोनों का ही संयोजित रूप होता है। ‘उपकार’ नामक द्वादश सोपान में एक नर्तकी कबीर की कुटी के पास अपनी कोठी बनवा लेती है। ग्राहकों के बढ़ने पर ईर्ष्यावश वह कबीर की झोपड़ी में आग लगवा देती है।अचानक तेज आँधी चलती है और नर्तकी की कोठी भी जलने लगती है। अंत में नर्तकी जीवन के मर्म को समझकर कबीरदास की शरण में आ जाती है। कवि लिखता है- 
साँचि कह्यों क्षणभंगुर जीवन सोचि के भीतर तक वह जागी 
ज्ञान-प्रकाश हुआ मन में तज मोह-तिमिर कवि के बिग भागी
समय के साथ संत कबीरदास जगप्रसिद्ध हो जाते हैं। संतों का काम समाज को दिशा दिखाने का होता है। त्रयोदश सोपान ‘दिशा’ में कबीरदास जाति-धर्म, अंधविश्वास आदि के नाम पर होने वाले अपचारों के विरुद्ध जनता को फटकारते हैं और सरल-सहज जीवन जीने का संदेश देते हैं। प्रस्तुत सोपान में कवि ने कबीरदास की कुछ चर्चित साखियों और लगभग ढाई सौ दोहों का काव्य रूपांतर भी किया है।
संत कबीरदास जीवन के चौथे चरण में आ गए हैं। सद्भावनाओं के फूल बाँटते-बाँटते और सांप्रदायिक एकता को परिपुष्ट करते-करते अब उनकी प्रस्थानवेला सन्निकट है। चतुर्दश सोपान ‘एकता’ में कवि ने दर्शाया है कि मगहर की महानता सिद्ध करने के लिए संत कबीर काशी से मगहर प्रस्थान करते हैं-
‘मार्गहर’ मगहर का शुचि नाम लगाते लूटपाट से अर्थ 
नहीं कहते ‘हरि’ का है मार्ग अर्थ का करते लोग अनर्थ 
कबीर का अंत समय निकट है, पंचतत्त्वों का पिंजरा त्यागकर उनके प्राण-पखेरू उड़ जाते हैं। उनके शव के स्थान पर कुछ फूल मिलते हैं जिसे हिन्दू-मुस्लिम आपस में बाँटकर उनका अंतिम संस्कार करते हैं। कवि की कलम संत कबीरदास को नमन करते हुए लिखती है-
युगों तक होंगे संत कबीर एकता, समरसता, सौहार्द 
न होगी विसंगतियों की धूल रहेंगे शिलालेख तक आर्द्र
‘महाकाव्य’ शब्द की व्युत्पत्ति दो शब्दों से मिलकर हुई है- महत्+काव्य। महत् शब्द का शाब्दिक अर्थ है – श्रेष्ठ, बड़ा। काव्य का अर्थ है-कवि का कर्म। इस प्रकार कवियों की श्रेष्ठ और बड़ी रचनाओं को महाकाव्य कहते हैं। महाकाव्य में भले ही किसी विशिष्ट नायक का चरित्रांकन किया जाए परन्तु महाकाव्य व्यक्तिपरक न होकर समाजपरक होता है। इसमें जीवन के विविध अंग समाहित होते हैं। इसमें जातीय जीवन और भावनाओं के चित्रण मिलते हैं। इतिहास प्रसिद्ध कथानक के महान नायक के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को समाज के प्रतिनिधि के रूप में अभिव्यक्ति दी जाती है। भामह  ‘काव्यालंकार’ में महाकाव्य का विवेचन करते हुए लिखते हैं-
सर्गबन्धो महाकाव्यं महतां च महच्च यत्।
अग्राम्यशब्दमर्थ्यं च सालंकारं सदाश्रयम्।।
मन्त्रदूत प्रयाणाजिनायकाभ्युदयैश्च यत् ।
पञ्चभिः सन्धिभिर्युक्तं नातिव्याख्येयमृद्धिमत् ॥
चतुर्वर्गाभिधानेऽपि भूयसार्थोपदेशकृत्।
युक्तं लोकस्वभावेन रसैश्च सकलैः पृथक् ॥
नायकं प्रागुपन्यस्य वंशवीर्यश्रुतादिभिः।
न तस्यैव वधं ब्रूयादन्योत्कर्षाभिधित्सया॥
यदि काव्यशरीरस्य न स व्यापितयेष्यते।
न चाभ्युदयभाक्तस्य मुधादौ ग्रहणस्तवौ॥ 
(भामह, काव्यालंकार, परि. 1,19-23)
       ‌ भामह के अनुसार महाकाव्य एक सर्गबद्ध रचना होती है। उसमें महान् चरित्रों को स्थान दिया जाता है और अलंकारों से समृद्ध शिष्ट भाषा का प्रयोग होता है। यथार्थ अथवा सच्ची घटनाओं से उसका कलेवर पुष्ट होता है। उसमें राजदरबार, दूत, आक्रमण, युद्ध आदि का वर्णन विस्तार के साथ किया जाता है। उसमें नायक के अभ्युदय का वर्णन होता है और किसी अन्य व्यक्ति का उत्कर्ष दिखाने की इच्छा से नायक का वध नहीं दिखाया जाता। नाटक की सारी सन्धियाँ उसमें रहती हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों वर्गों को उसमें स्थान दिया जाता है किन्तु प्रधानता ‘अर्थ’ को ही प्राप्त होती है।
हरीलाल ‘मिलन’ द्वारा रचित ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्य का कथानक सर्गबद्ध है जो कुल चौदह सर्गों में विभाजित है। मंगलाचरण की परंपरा में कवि ने प्रथम सर्ग में दस-बारह छंदों में भारत देश की वंदना की है। इसके पश्चात संत कबीर की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक एवं प्रेम की महत्ता का संकेत किया गया है। इन सर्गों के नाम भी इस प्रकार रखे गए हैं कि ये कबीर के जीवन की उत्तरोत्तर  आध्यात्मिक चेतना के सोपानों को दर्शाते हैं।ढाई आखर,ममता,  चिन्तन, संकल्प, सृजन, निष्ठा, राम, उपकार, एकता आदि सर्गों के शीर्षक कबीर के जीवन का एक बाहरी खाका ही मानो खींच देते हैं।अवांन्तर कथाएँ भी इसमें संयोजित की गई हैं। इनकी सहायता से कबीर के जीवन की विविध परिस्थितियों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
महाकाव्य के तत्त्वों में चरित्र चित्रण भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। प्रस्तुत महाकाव्य में विभिन्न प्रकार के पात्रों का समावेश किया गया है।इन सबकी चरित्रगत दुर्बलताओं और विशेषताओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण कवि ने सफलतापूर्वक किया है। मुख्य पात्रों में संत कबीरदास, गुरुवर रामानंद और कबीर की पत्नी लोई को रखा जा सकता है। सामान्य पात्रों में अन्य सभी पात्र रखे जा सकते हैं। कबीर दास जन्म के समय से ही महाकाव्य को गति देते दिखाई देते हैं और अपने संत जीवन तक आते-आते उनका पावन चरित्र संपूर्ण महाकाव्य का केन्द्र बिन्दु बन जाता है। कबीर महान उद्देश्यों की प्राप्ति में लगे हुए महान नायक हैं।कबीरदास लोकप्रसिद्ध नायक हैं। तत्कालीन युग की विषम परिस्थितियों का समावेश कबीर के जीवन चरित्र को विस्तार देता है और काव्योचित गुण प्रदान करता है। कबीर ही महाकाव्य की संपूर्ण कथावस्तु के सूत्रधार हैं।
वर्णनाभिव्यंजना के अंतर्गत कवि ने प्रातः, रात्रि, संध्या, नदी आदि के साथ-साथ राजा-प्रजा संबंध, माता-पिता प्रेम, परिवार प्रेम आदि का भी यथास्थान वर्णन किया है। प्रकृति वर्णन में कवि का सूक्ष्म निरीक्षण प्राकृतिक सुषमा को रमणीय और सजीव रूप में दर्शाता है। प्रस्तुत महाकाव्य खड़ी बोली हिन्दी में लिखा गया है। कुछ सर्गों में कवि ने छंद परिवर्तिन भी किया है। सारगर्भित शैली में रचित ‘साँची कहे कबीर’ की भाषा प्रौढ़, प्रांजल और भावानुकूल है। शांत रस महाकाव्य का प्रधान रस है। इसी में भक्ति रस का भी परिपाक हुआ है जो इस महाकाव्य को निर्गुण भक्ति काव्यधारा का शांत सरोवर निर्दिष्ट करता है। इसी के साथ श्रृंगार, करुण, वीर रस आदि भी प्रयुक्त हुए हैं।
एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्य की रचना की गई है। कबीर के माध्यम से अन्याय पर न्याय की, असत्य पर सत्य की, घृणा पर प्रेम की और भोग-संग्रह पर त्याग की जीत दर्शाई गई है।प्रस्तुत महाकाव्य में संत कबीर के जीवन चरित्र के माध्यम से धार्मिक, सामाजिक व दार्शनिक मूल्यों का वर्णन किया गया है। धर्म भारतीय संस्कृति का मूलाधार रहा है। आस्था-विश्वास जैसे मूल्य संत काव्य की आधारभूमि हैं। ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्य का उद्देश्य कबीर के संतत्व की विजयपताका फहराना, सामाजिक वैमनस्यता का विनाश करना, असत्य पर सत्य की विजय दर्शाकर मानवमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना रहा है। कवि हरीलाल ‘मिलन’ बहुत हद तक इसमें सफल भी हुए हैं। सन्त कबीरदास के इन वचनों में कर्म और धर्म-दोनों का समन्वय दिखाई देता है। 
जीवन एक सेतु सुख-दुख का क्रमशः आना-जाना 
धूप-छाँह-सा एक खेल है रोना या मुस्काना
भले एक रोटी हो लेकिन सभी बाँटकर खाएँ 
अपने राम चाहते भी हैं सुख देकर सुख पाएँ
कर्म में कर्मकांड है व्यर्थ धर्म में आडंबर है व्यर्थ 
विचक्षण की प्रतिभा में स्वार्थ भले हों विशद, सुघर है व्यर्थ
           पुस्तक की भूमिका ‘कबीर: सिद्धि से प्रसिद्धि तक’ में डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी लिखती हैं,“यह महाकाव्य कबीर साहब को उनके व्यक्तित्व व जीवन दर्शन के साथ समझने का एक स्तुत्य प्रयास है। महाकाव्यकार हरीलाल ‘मिलन’ जी ने बुद्धि व हृदय के समन्वयकारी विश्वबंधुत्व का संदेश सुनाने वाले साधना पंथ के उस अद्भुत नायक के प्रत्येक पक्ष को उकेरा है। यह ग्रंथ कबीर के परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक संरचना व स्थिति का स्पष्ट ब्यौरा प्रस्तुत करता है अर्थात् इस ग्रंथ का समाजशास्त्रीय महत्त्व भी अक्षुण्ण है। इन्द्रिय निग्रह से लेकर रहस्यवाद के गूढ़ विषयों को भी कवि मिलन जी ने पाठकों के लिए सहज संवेद्य बनाया है। गुरु के प्रति शिष्य कबीर के तल्लीन हृदय तक आपकी पहुँच बन पाई है। आडम्बरपूर्ण सामाजिक कुरीतियों को चीरने वाली कबीर की दिव्यदृष्टि को ग्रंथ ने भली-भाँति निरुपित किया है।  भाषा-शैली की दृष्टि से अपने अन्य ग्रंथों जैसे ‘ये आँसू’, ‘परित्यक्ता’, ‘दर्पण समय का’, ‘काग़ज़, कलम कविता’, ‘अंधेरे भी उजाले भी’, ‘म्रिया’ की भांति ‘साँची कहे कबीर’ भी वैविध्यपूर्ण, लालित्यपूर्ण, प्रांजल, भावानुरूप व सटीक है। महाकाव्य का शीर्षक अपने आप में संप्रेषणीय व रोचक है। ग्रंथ का विस्तार महाकाव्य की आधुनिक संकल्पनाओं के अनुरूप है। ग्रंथ में महानायक कबीर के अतिरिक्त नीरू-नीमा, लोई, गुरु रामानंद आदि के चारित्रिक विकास को यथोचित स्पेस मिला है। प्रांजल भाषा, सुसम्पन्न भावगत वैविध्य, संप्रेषणीय वैचारिक आधार-भूमि, छांदसिक समृद्धि, कलात्मक श्रेष्ठता, गांभीर्यपूर्ण चिंतन व तात्त्विक विवेचन के परिणामस्वरूप ‘साँची कहे कबीर’ एक सुपाठ्य व लोकप्रिय ग्रंथ बनने की संभावनाओं से परिपूर्ण है।”
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि कविवर हरीलाल ‘मिलन’ कृत ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्यत्व की विशिष्टताओं को समाहित किए हुए है। हरीलाल ‘मिलन’ ने अपनी काव्य प्रतिभा से कबीरदास के जीवन के उज्ज्वल पक्षों को पाठकों के समक्ष रखा है। उन्होंने सन्तकवि के अनेक दोहों और साखियों का भी भावानुवाद भी प्रस्तुत किया है, जो कबीरदास की लेखनी के समान ही मार्मिक बन पड़े हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कवि हरीलाल ‘मिलन’ स्वयं ही कबीरमय हो गए हैं। पुस्तक के अन्त में सन्दर्भ ग्रन्थसूची भी दी गई है जिसे देखकर पता लगता है कि इस महाकाव्य के प्रणयन से पूर्व कवि ने कबीरदास से सम्बंधित उपलब्ध सामग्री का गहनता से अवलोकन किया है। ‘साँची कहे कबीर’ महाकाव्य भाग-दौड़ भरे इस वैज्ञानिक युग में समाज को पुनः आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाने में प्रवृत्त होगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।
डॉ. नितिन सेठी
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