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मैं और अनिरुद्ध बहुत पुराने दोस्त थे । हमने साथ- साथ एक ही कॉलेज से एम बी ए किया था । कॉलेज खत्म करते ही हमने तुरन्त शादी करने का निर्णय ले लिया था क्योंकि दोनों के माता- पिता को कोई आपत्ति नहीं थी । शादी होते ही हम लोग शिमला घूमने के निकल लिए थे । मालूम था दोनों को कि नौकरी तो कहीं भी मिल ही जानी थी । लेकिन दोनों की ज़िद थी कि ,अच्छी कंपनी में ही नौकरी करनी है । इसके चलते हम दोनों ने अपने दो तीन महीने इसी कश्मकश में बिता दिये थे ।हमारी ज़िन्दगी मस्त चल रही थी ।कभी – कभी हम दोनों सोचते थे कि शायद दिल के फक्कड़ लोग  हमारी ही तरह होते होंगे और हों भी क्यों न !  हम दिल्ली वाले जो ठहरे । अरे भाई दिल्ली तो बैसे भी दिल वालों की ही कहलाई जाती है । अब हमारा रोज़ का काम था किसी न किसी कंपनी में रोज ऑनलाइन इंटरव्यूज़ देना । नतीजा ये कि कहीं पर इंटरव्यू अच्छा जाता तो पैकेज नहीं होता और कहीं पर पैकेज अच्छा तो कंपनी बड़ी किच-किच वाली जगह पर ।
अब कोई पूछे तो ज़रा हम दोनों से , कि जीवन में मन चाही चीज़ यहाँ पर कभी किसी को मिली है ? अधिकतर लोगों का पूरा जीवन कंम्प्रोमाइज़  में ही बीतता है ..।
आख़िर वो समय भी आ पहुँचा जब हम दोनों को दिल्ली में अपने – अपने हिसाब की कंपनियों में  नौकरी मिल गई थी । हम बहुत खुश थे । हमारे पाँच साल न जाने कहाँ कटे मालूम ही नहीं चला था ।
लेकिन अब हम दोनों ही लखनऊ में जॉब करते हैं ।मुझे तीन दिन पहले ही किसी काम से दिल्ली आना पड़ा था । आज रात की ट्रेन से वापस लखनऊ जा रही हूँ ।
स्टेशन पहुँची थी तो देखा ट्रेन अपने प्लेटफ़ार्म न. पर लग चुकी थी । मुझे ऊपर वाली बर्थ मिली थी ।कुली ने मेरे ब्रीफ़केस को ऊपर वाली बर्थ पर ही रख दिया था क्योंकि वहाँ रखने के लिए उसको मैंने ही कहा था ।कोई और सामान न होने के कारण मैंने भी चादर बिछाई और लेटना ही उचित समझा । लोग अपने – अपने सामान और बच्चों सहित आ जा रहे थे । लेकिन मैं बड़ी प्रसन्न थी  कि मेरी ऊपर वाली बर्थ है यहाँ कोई डिस्टर्ब करने वाला नहीं है जब तक मर्ज़ी लेटे रहो । तभी लगा कि ट्रेन हल्का सा रेंगी थी और रुक गई थी ।लोग अभी भी बोगी में आ रहे थे ।
वैसे आप सभी को ये बता दूँ कि मैं खुद से भी बहुत सारी बातें करती हूँ । जब कभी विचारों के दरमियान बैठी होती हूँ और उन विचारों से गुफ़्तगू कर रही होती हूँ तो अक्सर विचार और गुफ़्तगू दोनों में ही ठनक सी जाती है । मैं कुछ कहना चाहती हूँ और विचार हैं कि वो अपनी हाँकते हैं । अब वो हाँकते हैं या मुझे समझाने का प्रयत्न करते हैं  । ये अपने को समझ में नहीं आता ।
अपने को तो समझ आती है सही और सरल बात …।
ट्रेन आगे की ओर सरकने लगी थी ।लोग अपनी -अपनी बर्थ पर जम चुके थे ।जो पहले से जम गये थे वो तो खर्राटे भी भरने लगे थे ।मेरी आँखें उन सबको देख रही थी लेकिन मेरा दिमाग़ समाज को लेकर बहुत सी बातों में उलझा हुआ था ।
हम सब आज़ादी के इतने सालों बाद भी आज़ाद हैं ..या नहीं ..?
क्यों हम किसी की ग़लत बात को ग़लत नहीं कहते ?
क्यों हम सिस्टम के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाते ?
क्यों हम ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करते हैं जो चापलूसी या दलाली की खाते हैं ?
ऐसी कौन सी बात है जो आपको रोकती है ? अगर हमारा रास्ता निःस्वार्थ और निष्पक्ष होगा ,
तो ऐसी कौन सी बात  है जो हमें नेकी और सत्य के रास्ते से विमुख करती है ?
जितनी तेज़ी के साथ मेरे दिमाग़ में प्रश्न जन्म ले रहे थे उसी गति से शायद ट्रेन भी चल रही थी । ट्रेन की गति के कारण पटरियों से उठने वाली लय की धुन पर मेरा पूरा शरीर बर्थ पर इस तरह हिल रहा था जैसे कोई झूला , झुला  रहा हो ।
दिमाग़  वही समाज के लचर ढाँचे की उधेड़बुन में लगा हुआ था ।
लोकतंत्र का मतलब मनमानी कभी नहीं हो सकता । जब आपने – हमने अपने लिये कोई शासन बनाया है तो उसमें अच्छाई का प्रादुर्भाव ज़्यादा होना चाहिए… न कि गुंडाराज , बलात्कार या फिर क़ानून के साथ मनमानी …।आख़िर क़ानून हमारी सुरक्षा के लिए ही बना है ।
न जाने लोग अच्छाई के रास्तों पर काँटे बिछाने का प्रयत्न क्यों करते हैं ?
क्या वो इस बात को भूल जाते हैं .. कि किसी के पथ पर काँटे बिछाने से पहले खुद को कितना घायल और लहूलुहान होना पड़ता होगा ? या फिर मन न चाहते हुए भी उस रास्ते पर चलने को तैयार हो जाता होगा जिसको ग़ुलामी का नाम दिया जाता है ।
हम अगर एक अच्छे समाज की इच्छा रखते है तो सबसे पहले हमें खुद में सुधार लाना ही होगा । जब हम अपने अंदर की बुराइयों को ख़त्म करने का संकल्प लेंगे तब ही हम एक अच्छे समाज और अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे और उसके साथ न्याय भी कर सकते हैं
कभी -कभी तो लगता है कि शायद इस ओर कभी किसी ने  सोचा ही नहीं है….कि , हम लोग किसी की ग़ुलामी क्यों करें ?
आज हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अपने नैतिक पतन की ओर अग्रसर होता जा रहा है । कुछ मजबूरी वश , तो कुछ जानबूझकर कर । कुछ लठैतों की लाठी से डरकर तो कुछ पेट के वशीभूत हो कर …।
इस पेट की आग ने तो स्त्री हो या पुरुष  …बहुत से लोगों को अपराध की दुनिया तक में धकेल दिया है । कुछ ने मेहनत न करने की सोची तो ग़ुलामी स्वीकार करके अपराध की दुनिया को पकड़ लिया । कुछ स्त्रियों ने आज के समय में व्याप्त आधुनिकीकरण की ग़ुलामी को स्वीकार किया और वैश्यावृत्ति ( देह व्यापार )के धंधे को हवा दी और अपनी आय का साधन  बनाया ।
ओफ्फ ! कितना निर्मम और कितना निर्लज्ज निर्णय अपने जीवन का …।
अब देखो न ! आजकल मौसम में खुश्बू कम नशा ज्यादा है । हवाएँ भी स्वार्थी हो उठी हैं । बारिश तन और मन दोनों में आग लगा देती है । लोगों की मुस्कान भी कातिल हो गई है और दोस्ती में चारों ओर दिखावा है ।सपने महत्वकांक्षी हो कर हॉवी हो गये हैं जिस्म और दिमाग पर और संघर्ष भी प्रतिद्वन्द्वी हो चला है । बस ऐसा लगता है कि कुछ बनने और दिखने की होड़ ने सोचने समझने के पहलू को ही खुंटी पर टाँग दिया है । सब चीज में , बातावरण में और इन्सान के मनों में ज़हर घुल चुका है । हर जगह पर स्वस्थ मन को आधुनिकता के आवरण ने अल्कोहल के घूँट पिलाना शुरु कर दिया है ।ये सभी चीज़ें काउंट करती हैं किसी एक के विनाश में ।
आज हम सबको खुद ही निर्णय करना होगा कि हम कैसे समाज का निर्माण चाहते हैं । हम एक साफ़ -सुथरा , शिक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त समाज चाहते हैं या एक मन से बीमार समाज चाहते हैं ?
ये निर्णय तो हमारा खुद का ही होना चाहिए । किसी सरकार या किसी और का नहीं ।
कभी तो ऐसा भी लगता है कि कहीं  न कहीं हमें ग़ुलाम  भी शायद हमारे मन ने ही बनाया है । क्योंकि हमारी – सबकी आँखों पर जो विदेशी चकाचौंध का आईना फ़िट किया है आज के फिल्म जगत और उद्योग जगत ने , वो भी अपने विज्ञापनों द्वारा ..हमें इस ओर ध्यान देना होगा । हमारी आज की युवा पीढ़ी के मन को विदेश की चमक- दमक और चकाचौंध ने अपने आग़ोश में बड़ी बेरहमी से जकड़ा हुआ है ।
मेरा तो यही मानना है कि हमारे भारत वर्ष की मिट्टी में वो ताक़त है जो और कहीं की मिट्टी में नहीं हो सकती । क्या आज की युवा पीढ़ी इसको भूल गई है ?
हमारे यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में टॉपर विद्यार्थियों ने अपनी आगामी सफलता के लिए ज़्यादातर विदेशी कंपनियों को ही चुनना स्वीकारा है । मुझे लगता है कि वहाँ की मोटी आय ( सेलरी) ने उनको एक बार फिर ग़ुलामी की ज़ंजीर पहना दी । परन्तु ये ज़ंजीर लोहे की नहीं है ..जैसे कि पहले के गुलामों को क़ैद करने के लिए हुआ करती थी बल्कि ये ज़ंजीर तो डॉलर , यूरो , पाउंड की है , जो कि आज के युवाओं को सहर्ष स्वीकार्य है । अगर वही आय हमारे भारत में युवाओं को मिलने लगे तो शायद युवाओं के इस विदेश गमन पर उनकी खुद की रोक अपने ऊपर लग सकती है ।
क्यों नहीं हम अपने भारत वर्ष में ही अपनी शिक्षा से व्यापार , नौकरी के नये विकल्प ढूँढते ?
लेकिन क्या हमारी सरकार इस ओर ध्यान देगी कि अपने भारत वर्ष की सरज़मीं पर अमीर हों या ग़रीब सभी नौजवानों को उनकी मेहनत उनकी शिक्षा और उनके स्वास्थ्य का ख़्याल रखा जाये  , और वो भी निष्पक्ष हो कर…?
हमारी अपनी सोच तो यही कहती हैं कि भ्रष्टाचार की चेन ऊपर से चलती है । नीचे वाला ग़ुलामी ही करता है —वो नौकरी में हो या व्यापार में हो या सरकार में हो , घर में हो या कहीं पर किसी भी विभाग में ही क्यों न हो । हमको अपने मन पर पूरी  रोक होनी चाहिए । हमारे अन्दर इतना तो धैर्य होना ही चाहिए कि हम सभी अपनी बारी आने तक का इन्तज़ार कर सकें….।
अब देखिये न ! लाइन कहीं भी और कैसी भी हो ….
लोगों  को न तो लाइन में खड़ा होना अच्छा लगता है । न ही ट्रेफ़िक लाइन के रूल फ़ॉलो करना अच्छा लगता है ।बस ! अपना काम पहले हो जाये इस चक्कर में काग़ज़ का नोट आगे सरका कर अपना उल्लू सीधा करके काउंटर पर बैठे क्लर्क या कोई भी अधिकारी का ईमान तुरन्त ख़रीद डालते हैं । या फिर उधर चालान की पर्ची कटने से पहले सेटिंग कर डालते हैं । अब जनता की निगाह में बदनाम होता है वो जो काग़ज़ के नोट थाम लेता है ।
क्या कभी रिश्वत देने वाले के मन में बिल्कुल नहीं आता कि मैं कोई अपराध कर रहा हूँ ?
मेरा एक सवाल उन सभी लोगों से है जो सिस्टम को गालियाँ देते हैं  । अरे भाई सिस्टम तो हम और आप सभी ने मिलकर बनाया है ।.. क्या ये भूल गये हैं आप सब ?
क्या आप अपने मन के गुलाम तो नहीं हैं ?
“ आप रिश्वत देंगे तो ही लोग लेंगे “  रिश्वत लेने वाले से पहले आपको थोड़ा विचार नहीं करना चाहिए  ?
जिस तरह पैदा करने वाले से महान पालने वाला कहलाता है , उसी तरह रिश्वत लेने वाले से पहले दोषी रिश्वत देने वाला होता है ..।
अचानक से ट्रेन में बहुत तेज़ी से झटका लगता है और एक झटके के साथ ट्रेन रुकती है ।
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मेरे मन में चल रहे सवालों का ज़ख़ीरा भी टूटकर बर्थ से नीचे गिर पड़ता है । मैं सिर उठा कर देखना चाहती हूँ लेकिन मेरी गर्दन में जो झटका लगा है वो बहुत पेन फ़ुल है । मैं अपने सिर को दोनों हाथ से थाम लेती हूँ ।पूरी बोगी में बर्थ पर लेटे हुए लोगों में चीख पुकार सी मच जाती है । मुझे चारों ओर हलचल सी दिखाई देती है । मैं नीचे की ओर देखने का फिर से प्रयास करती हूँ ।
“ रिंकू … रिंकू …तू ठीक है न बेटा …” एक चालीस वर्षीय महिला अपने बारह वर्ष के बेटे के सिर पर हाथ फेर रही थी और बदहवास होकर पूछे जा रही थी। वो इतना घबरा चुकी थीं कि वो उस घबराहट में समझ ही नहीं पा रही थीं कि बेटा सही सलामत हैं । और मैं अपनी गर्दन को पकड़े सोच और देख रही थी ..कि माँ का दिल माँ का ही होता है । अब देखो न ! उन्हें अपनी कोहनी से बहते हुए रक्त की चिंता बिल्कुल नहीं थी । उन्हें अपने जिगर के टुकड़े की चिंता अपने स्वास्थ्य से कहीं ज़्यादा थी ।
इतने में मेरी निगाह एक वृद्ध की ओर जाती है जो साइड वाली बर्थ पर कुछ समय पहले सो रहे थे ।पर अब वो वहाँ पर नहीं दिख रहे थे । इतने में मुझे सुनाई देता है कि वो किसी को पुकार रहे थे ….।
“अरे ….अनवर तू कहाँ है ? कहाँ है मेरा चंदा …तू कहाँ गया….अरे ! कोई तो देखो मेरे पोते को .. कहाँ चला गया ? देखो भाई ! मुझ बूढ़े पर थोड़ा सा रहम करो ,या अल्लाह..! “ और वो अपनी बैसाखी सम्भालते हुए शायद भीड़ में आगे बढ़ना चाहते थे और अनवर .. अनवर कहते हुए वो ज़ोर से फफक रहे थे ।
मुझसे रहा न गया । मैंने अपने दुपट्टे से अपनी गर्दन को चारों ओर से लपेटा  और मैं अपनी गर्दन को सम्भालते हुए ऊपर से उतर कर नीचे आई ।
“ अंकल जी आप यहाँ पर बैठो आ जायेगा आपका पोता “ ये कहते हुए मैंने उनको सीट पर पहुँचाया ।मैं अपनी गर्दन को सम्भाले आगे की बोगी की ओर बढ़ ही रही थी कि मैंने सामने से आते हुए टी सी को देखा था । उनको पास आते ही मैं उनसे पूछ बैठी थी ।
“ क्या हुआ सर ! इतना बड़ा झटका कैसे लगा ? कोई एक्सीडेंट या कोई फ़ॉल्ट ??”
“ अरे ..मैडम ! अभी समय नहीं है कुछ भी बताने का , कृपया आप सब अपनी- अपनी  जगह पर  जाकर बैठें..। मालूम  नहीं साला हमारे देश में लोगों को मरने का न जाने कितना शौक़ है । साले खुद तो मरते ही हैं और न जाने कितनी जानों को अपने साथ लपेट कर ले जाते हैं —“
ये बड़बड़ा कर टी सी तो आगे बढ़ गया था लेकिन मेरे ज़हन में एक सवाल छोड़ गया था ।
ट्रेन अभी भी रुकी हुई थी । बोगी में बैठे लोगों की अफ़रा- तफ़री में कुछ कमी सी महसूस हुई तो थोड़ा दिमाग़ में राहत सी महसूस हुई । मैंने चारों ओर निगाह दौड़ाई ..लोग अपनी – अपनी बर्थ पर बैठ गये थे , लेकिन लोगों के चेहरों पर अभी भी दहशत भरे प्रश्न चिन्ह अंकित थे ।मैंने  वृद्ध अंकल की तरफ़ देखा तो वो आस भरी निगाह से मेरी ही ओर देख रहे थे । मन कर रहा था कि जाकर उनके पास उनकी ही बर्थ पर कुछ देर बैठूँ और पूछूँ , कि अनवर कहाँ पर था ? और किस सीट पर बैठा था ?
ये सोचते हुए मैं वृद्ध अंकल जी की सीट पर बैठ जाती हूँ । मैं उनके झुर्रियों से भरे चेहरे को बड़े ध्यान से देखने लगती हूँ ।
“ कहाँ पर था आपका पोता ? “ मैंने उनसे पूछा..
“ यहीं .. यहीं पर था । ऊपर वाली बर्थ पर ही तो था “ ये कहते – कहते उनकी आँखें फिर से नम हो चली थीं । मैंने देखा कि आँसू गालों पर बह चले थे वो नीची निगाह किये सिसकने लगे थे । मेरा मन भी पसीजने लगा था उनकी हालत को देख कर । मैंने उनका बूढ़ा हाथ अपने हाथ में लेकर फिर सांत्वना के शब्द बोलने चाहे थे कि मैं सामने से आते टी सी को देखने लगी थी ..।मैं सीट से उठ कर टी सी की  ओर फिर मुख़ातिब हुई थी ।मैं हैरान थी कि बोगी में किसी को कोई चिंता ही नहीं थी ।
“ सर … सर .. कु..छ मालूम हुआ कि नीचे क्या हुआ ? क्यों झटका खा कर ट्रेन रुकी थी .. “ मैंने नम्र  सुर में झट से टी सी के सामने अपने सवाल रख दिए थे ।
“ अरे ..कुछ नहीं हुआ । इस ट्रेन से कोई लड़का सामने से आती ट्रेन के सामने  मरने के लिए कूद गया था .. किसी यात्री ने देख लिया था उसी ने  झटके के साथ चेन खींची थी “
“ अरे..! क्या कह रहे हैं आप ? वो बचा या नहीं ? कौन था ? कुछ नाम पता ….मैंने हड़बड़ाकर पूछा ..”
“ कोई मुसलमान लड़का था । जेब से काग़ज़ बरामद हुआ है .. शायद अनवर नाम है “ ये कहते हुए वो आगे बढ़ गये थे ।मैंने देखा ….कि किनारे वाली सीट पर बैठे वृद्ध अंकल एक ज़ोर की चीख चीखें थे और लड़खड़ाते हुए अपनी सीट से नीचे गिर पड़े थे । मैं तुरन्त उनकी ओर भागी थी ..।
“ अरे ….अपने को सम्भालिए अंकल जी ! क्या करता था आपका पोता ? उसने इस तरह का क़दम कैसे उठाया ? वो भी आपको अकेला छोड़ कर “ अनायास ही दुख के समय में भी उनके पोते द्वारा उठाए क़दम पर मेरे शब्दों में थोड़ी सी नाराज़गी चली आई थी ..।
वो थोड़ी देर तक चुप रहे ।कुछ भी न बोले और नीचे  फ़र्श पर बेजान से बैठे रहे । शायद उन्हें अनवर की ख़बर का अभी भी यक़ीन नहीं आ रहा था , या अपने मन को सांत्वना दे रहे थे । मैं उनकी चुप्पी को समझ नहीं पा रही थी । समझती भी कैसे ? मैं उनको जानती तक नहीं थी कि , वो कौन हैं ? हम सिर्फ़ सफ़र के साथी थे ।वो बुजुर्ग थे ।मैं सिर्फ़ , उनके इस अकेले सफ़र में उनका दर्द बाँटना चाहती थी , क्योंकि जो उनके साथ था वो अब इस दुनिया से जा चुका था । मन में सोच रही थी कि हे ! ईश्वर तू ने ये अच्छा नहीं किया  ।
पर इसमें ईश्वर का क्या दोष था ? मेरे मन में अनेक बातें फिर से चल उठी थीं …कि तभी …..।
3
मैंने चौंक कर देखा  उनको कि वो अचानक से बोल उठे थे ।
“ या ..अल्लाह ! मुझे डर था  । मैं उस दिन समझ गया था कि मेरा नादान अनवर किसी मुसीबत में पड़ गया है …” वो बुदबुदाहट भरे कुछ अस्पष्ट लहजे में बोले थे …
“ कैसी मुसीबत .. ?
आप क्या बोल रहे हैं ..? होश में आइये ..” मैंने उनके कंधों को झकझोर कर इधर -उधर देखा । लोग हम दोनों को बातें करता देख कर अपनी – अपनी सीट को छोड़ कर हमारे चारों ओर खड़े हो गये थे । मुझे ये सब कुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था । मुझसे रुका न गया तो मैंने कह ही दिया …
“ आप लोग अपनी सीट पर जाएँ । क्या यहाँ कोई तमाशा हो रहा है ? “ मैं ये बोल ही रही थी कि इतने में भीड़ में से ही एक आवाज़ सुनाई दी ..
“ बाई दबे ..आप कौन हैं उस बुड्ढे की ?  खड़े हम अपने पैरों पर हैं और तकलीफ़ आपको हो रही है । क्या कोई समाज सेविका हैं ? .. आप  जैसी औरतों को तो बस बहाने मिलने चाहिए । कहीं कुछ देखा नहीं कि चल दी सेवा करने , अरे ..! सुना नहीं था आपने टी सी ने क्या नाम बताया था ?.. मुसलमान था मुसलमान । इस बूढ़े पर क्यों अपना समय बर्बाद कर रही हैं , एक मर गया तो कौन सी बड़ी बात हो गई । क़ौम न ख़त्म होने वाली इनकी । अरे ! क्या आपको मालूम नहीं कि ये पैदा भी तो दर्जन भर करते हैं । दुनिया में इन जैसे कितने ही रोज मरते रहते हैं  । अरे ..मैं तो कहता हूँ ये साले ..मादर चो…. ऐसे ही मरेंगे  ……“ ….वो मुँह में ही गाली को चबाते हुए कुछ न कुछ बोले ही चला जा रहा था कि ट्रेन एक झटके के साथ आगे की ओर बढ़ी थी ।ट्रेन के चलते ही अग़ल – बग़ल खड़े हुए कुछ लोग अपनी – अपनी बर्थ पर जाने लगे थे  ।
लेकिन मेरा मन तो उस जाहिल इन्सान की भाषा और उसकी ज़ुबान से टपकते ज़हर को सुनकर उसको जवाब देने के लिए व्याकुल हो उठा था ।
“ हे .. हैलो ! आपको तमीज़ नाम की चीज़ है ज़रा सी भी , आप कोई भी हों , इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता , पर मेरा जवाब भी सुन लें । मैं सबसे पहले एक इन्सान हूँ । न मैं हिंदू हूँ और न ही मुसलमान हूँ । आप अपने अन्दर का ये ज़हर अपने पास रखिये । यहाँ पर इस बोगी में न उड़ेलिए , मैं चाहूँ तो आपकी कम्प्लेन कर सकती हूँ दंगाई भाषा के प्रयुक्त करने पर , आप जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं न ..वो आपको सलाख़ों के पीछे भी ले जा सकती है । मानवता नाम की भी कोई चीज़ होती है । जो शायद आपके भीतर है ही नहीं । और हाँ ! आप किन पैरों पर खड़े हैं वो आपको देख कर ही मालूम पड़ रहा है । लंगड़े भी आपसे बेहतर होंगे । आपकी तो शक्ल ही कह रही है कि आप किसी के काम आने योग्य हैं ही नहीं  “
इतना कह कर मैं ग़ुस्से से काँपने लगी  थी ।
मैंने उस वृद्ध व्यक्ति के कंधों को पकड़ा और नीचे फ़र्श से उठाकर उनकी सीट पर बैठाने में उनको सहारा दिया । वो मुझे ही देख रहे थे । मैंने उनसे फिर से पूछा ।
“आप शायद मुझे कुछ बता रहे थे ….”
“और हाँ ….ये आपका पोता करता क्या था ? “ मैंने धीमें से फिर दुबारा उनसे प्रश्न किया था ।हालाँकि मुझे नहीं करना चाहिए था क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति अभी ठीक नहीं थी , लेकिन मेरे दुबारा प्रश्न करने पर उन्होंने मेरी ओर देखा था । बहुत कुछ था उस निगाह में , कितना कुछ कह देना चाह रही थीं उनकी बूढ़ी आँखें ..।
बुढ़ापा भी कितना मासूम होता है । किसी से थोड़ा सा प्यार और थोड़ी सी सहानुभूति  मिलने पर उसी का हो जाता है । बिल्कुल निश्छल , निष्कपट , बिल्कुल बालक जैसा ।
बोगी में खर्राटों की आवाज़ गूँज रही थी । लेकिन मुझे उनसे बात करना अच्छा लग रहा था । मैं जानना चाहती थी कि आख़िर मरने की वजह क्या रही होगी ?
वो मेरी ओर एक टक देखे ही जा रहे थे … फिर वो धीरे से बोले थे …।
“ कुछ रोज़ पहले किसी का फ़ोन आया था अनवर के पास । मैं पूरी बात नहीं सुन सका था । न जाने उनमें क्या – क्या बातें हो रही  थी  “ ये बोलते हुए उनको ज़ोर- ज़ोर से खांसी आने लगी थी ।थोड़ा सा रुक कर उन्होंने  कुर्ते की जेब से अपना रुमाल निकालकर अपनी नाक पोंछी और उसके बाद पूरा चेहरा । कुछ सोचते हुए दिमाग़ पर ज़ोर देते हुए वो पुनः आगे बोले ….।
“ हाँ .. हाँ .. याद आया ..कुछ बन्दूक , गोला- बारूद  और भी न जाने क्या क्या बात हो रही थी उसकी किसी से फ़ोन पर । तभी चौंक कर मैंने पूछा भी था अनवर से कि …..किससे बात कर रहे हो मिंया…? ये बन्दूक और गोला- बारूद से तुम्हारा क्या ताल्लुक़ है ?  बन्दूक – गोला – बारूद कोई बच्चों का खेल नहीं है मियाँ ! कहीं किसी के बहकावे में कुछ ग़लत  ऐसा-वैसा न कर बैठना ।“  लेकिन वो मुझ पर  ही झुंझला उठा था । शायद आपा खो बैठा था अपना  । उस दिन पहली बार वो मुझसे इतनी बेरुख़ी के साथ ज़ोर से चिल्ला कर बोला था ..।
“ अम्मी – अब्बू जब ज़िंदा थे उन्होंने हमसे कभी नहीं पूछा  था , तो अब आप को क्या पड़ी है ? आप अपने काम से काम रखें । “  और ये कहते हुए वो बाहर निकल गया था ।
“ मेरा अनवर बुरा लड़का नहीं था । उसने कभी मुझसे इस लहजे में बात नही की थी । जाने क्या हो गया था उस दिन फ़ोन पर ….” और ये कहते हुए वो अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में मरोड़ने – तोड़ने लगे थे.. मानो कि अपने मन के दर्द को अंगुलियों में उलझाकर निचोड़ना चाह रहे हों …।
 उनकी बात सुनकर मुझसे रुका न गया तो मैंने भी प्रश्न कर दिया था ..।
“ क्या फ़ौज में था आपका पोता “
“ नहीं ..”
“ नहीं ….तो ..फिर ? “ मैंने चौंक कर संशय भरी आवाज़ में फिर उनसे सवाल किया था ।
“ मुझको अब पूरा शक हो रहा है कि वो किसी ग़लत संगठन से जुड़ गया था .. या शायद किसी के बरगलाने में तो नहीं आ गया था । उसने अपनी जान दे दी  ..या अल्लाह !  तू ने किस दो राहें पर खड़ा कर दिया हमें । कैसे  चलेगा परिवार हमारा ? मैं बूढ़ा क्या बताऊँगा रज़िया को ? क्या जवाब दूँगा जब वो पूछेगी कि अनवर कहाँ है ? वो फूल सी बच्ची कुम्हला जायेगी । किसी के गुनाह की सजा तू किसको दे रहा है मेरे अल्लाह ….” और ये कहते हुए उन्होंने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया था । उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू बह कर उनकी कोहनियों को भीगो रहे थे ।
4
ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ चुकी थी ।
मैं अपनी बर्थ पर न जाकर उनकी ही बर्थ पर बैठी रही थी और थोड़ी देर तक  । मैं देख रही थी उनका दर्द निरन्तर बह रहा था और उनके कुर्ते को भिगो रहा था । वो मन ही मन  में न जाने क्या बुदबुदा रहे थे .. । मुझे लग रहा था कि पोते की रूह की शांति के लिए ज़रूर कुछ पढ़ रहे होंगे । तभी मुझे मन में आया  कि पूछूँ ….
“ आप कानपुर  उतरेंगे या लखनऊ ? क्या कोई स्टेशन पर लेने आयेगा आपको ? “
“ नहीं “ उनका उत्तर बिल्कुल सपाट था ।
“ पर आप उतरेंगे कहाँ पर “ मैंने फिर से पूछा…
“ लखनऊ …”
“ लखनऊ में कहाँ पर जाना है ? “
“ यहिया गंज “
“ कोई आयेगा  रेलवे स्टेशन पर आपको लेने ? “ मैंने फिर से पूछा था , लेकिन मैंने देखा था कि वो कुछ जवाब नही देना चाहते थे ।
“ अच्छा चलिए आप लेट जाइये “ उनकी मानसिक हालत को देखते हुए  उनसे ये कहकर , मैं भी लेटने के लिए ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गई थी । मेरी गर्दन में अभी भी दर्द काफ़ी था परन्तु मेरी आँखों में नींद नहीं थी । मैं बर्थ पर लेटकर अभी भी उसी लड़के अनवर के वारे में सोच रही थी । जिसको कुछ घंटे ही हुए हैं इस दुनिया को अलविदा कहे हुए …।
मेरा दिमाग़ फिर चलने लगा था ।
क्या उस लड़के ने आत्महत्या की है या कोई उसे मरने के लिए बाध्य कर रहा था । या फिर कहीं गेट से झाँक रहा हो और अचानक बैलेंस न बनने से नीचे गिर पड़ा ? या कहीं दूसरी  तरफ़ से आती हुई ट्रेन के सामने कूदना उसके किसी मोबाइल गेम का कोई टास्क तो नहीं था ? मेरा मन गुत्थियाँ सुलझाने में लगा था , मैं जितना सोचती उतना ही लिपटती जाती अपने ही प्रश्नों के मकड़ जाल में ..।
बर्थ पर लेटे लोगों के खर्राटे अभी भी सुनाई दे रहे थे । इतना बड़ा हादसा हो कर चुका था लेकिन मैं देख रही थी कि लोगों को अपनी -अपनी बर्थ पर नींद भी आ गई है । ये बात मुझे कहीं न कहीं मेरे मन को बहुत अखर रही थी और मुझे अंदर से परेशान कर रही थी । आज दुनिया को देख कर ऐसा लगता है जैसे लोगों में किसी की जान की क़ीमत या उसके प्रति संवेदना  ख़त्म हो रही है । एक दूसरे के प्रति मानवता के धर्म का हनन हो चुका है या शायद हनन होने की कगार पर है ।
मैं अपनी आदत से मजबूर हो आँखों पर हाथ रख कर अपने ही विचारों के मकड़ जाल में मकड़ी बन कर घूम रही थी और अपने ही चारों ओर जाला बुन रही थी और उसमें से निकलने का रास्ता भी । कभी – कभी मुझे अपने ऊपर ही नाराज़गी होती है कि मैं औरों की तरह क्यों नहीं हूँ ? क्यों मुझे हर चीज़ में परफ़ेक्शनिस्ट होना है या क्यों मुझे हर जगह परफ़ेक्शन की उम्मीद होती है ? ..मिस्टर अनिरुद्ध भी तो हमेशा ही और लोगों की तरह ही मुझसे कहते रहते हैं .. ।
“  ये देश और दुनिया जैसे चलती आई है न मनु ! ये वैसे ही चलेंगी । ये तुम्हारे सोचने से बनाये गये नियमों और उसूलों से चलने वाली नहीं है “ ।
और कितनी ही बार हमारी कहा सुनी इन्हीं बातों पर हो जाया करती है। मैं दिल की बात करती हूँ  , लोगों की भावनाओं की बात करती हूँ और मिस्टर अनिरुद्ध हैं कि हमेशा ही अपने दिमाग़ की सुन कर बात करते हैं और उसी की सुनकर निर्णय भी लेते हैं ।
ट्रेन लगातार सीटी मार रही थी । लग रहा था जैसे कोई स्टेशन आने वाला था ।मैंने  अपनी गर्दन को सहारा देते हुए नीचे झुककर उन वृद्ध अंकल को देखना चाहा था । वो अपनी सीट पर आँखें बंद किये लेटे थे लेकिन मुझे नहीं लगता था कि वो सो रहे हैं  । जिसका जवान पोता एक घटना का शिकार हो जाये उसकी आँखों में नींद कैसे समा सकती है । वहाँ तो दर्द का ज़लज़ला न जाने कहाँ पर ठहरा हुआ था ये समझना मेरे लिए भी बहुत मुश्किल था । उनकी इस शांत  हालत को देख कर मन यही सोच रहा था कि ये सत्य ही कहा गया है कि ..
दर्द इन्सान को पत्थर बना देता है । शायद वो भी इस वक्त और हालात में चट्टान बन चुके थे ।
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“ अरे ..ओ बाबा .. उठो ..क्या अनवर नाम का लड़का यहीं पर बैठा था “ एक जी आर पी के सिपाही ने धीरे से झकझोर कर वृद्ध से पूछा था ।
किसी की आवाज़ सुन कर मैं ऊपर की बर्थ से झाँकी थी । अपनी गर्दन को सहारा देते हुए लगभग कूदकर ही नीचे उतरी । मैंने देखा कि एक सिपाही वृद्ध को झकझोर कर उठाने का प्रयत्न कर रहा था । वृद्ध अपनी बर्थ पर ही उठकर बैठते हुए उनको बोल रहे थे ..
“ जी .. वो यहीं मेरे ऊपर वाली बर्थ पर ही था । वो मेरा पोता था “ … ये कहते हुए उनकी आवाज़ भरभराने लगी थी ।
“ बाबा आपके पोते की बाडी पोस्टमार्टम  के लिए भेजी जा चुकी है । जी आर पी पुलिस को उसकी जेब में  उसका  आई कार्ड मिला है । जिसके द्वारा घर का पता मिल गया है ।आप कल शाम में उसकी बाडी को सरकारी अस्पताल , कानपुर से घर मंगवा सकते हैं । “ ये कहते हुए वो सिपाही आगे की ओर बढ़ गया था ।
मैंने वृद्ध की ओर  देखा था । झुर्रियों से आच्छादित चेहरा पोते की मौत के दर्द की मार से काला हो उठा था । वो जाते हुए सिपाही को एक टक देख रहे थे जब तक कि वो आँखों से दूर ,दूसरी बोगी में नहीं चला गया था ।  उनकी इस हरकत पर मेरा मन भी पसीज उठा था । मैं उनके पास उनकी सीट पर ही बैठ गई थी । ट्रेन अपनी तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी । यात्रियों की हलचल देखकर लग रहा था कि शायद अब  थोड़ी देर में ही कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन आने वाला है । दस – बीस मिनट बाद ही ट्रेन की रफ़्तार धीमी होने लगी थी ।
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन आ गया था । कुलियों का जत्था सामान लेने के लिए बोगी में घुस आया था । कुछ नये यात्रियों का सामान कुली ट्रेन में रखने के लिए ला रहे थे ।  कुछ यात्रीगण अपने सामानों को खुद ले जाकर नीचे स्टेशन पर रख रहे थे । परन्तु मेरी नज़र वृद्ध अंकल पर ही टिकी थी । मैंने उनको कहा ..।
“ अंकल जी कानपुर आ गया है  आपको चाय – पानी तो नहीं पीना ? अगर चाय चाहिए हो तो मैं ले आऊँ ।पर उन्होंने न में सिर हिला दिया था ।
“ आप परेशान हैं ,मैंने कहा न आपसे ..आप परेशान न हों  । थोड़ी चाय पी लीजिए । आपको आराम आयेगा अंकल ! मैं लखनऊ में आपके घर तक आपको छोड़ दूँगी , मतलब आपके ठिकाने तक “ मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उनसे बोला था  । इतने में मेरी नज़र खिड़की से बाहर किताबों की स्टाल पर अटक गई थी और मैं बिना देर किए ट्रेन से नीचे उतर कर स्टाल के सामने जा खड़ी हुई थी क्योंकि जासूसी उपन्यास पढ़ना मेरी कमज़ोरी था ।उसमें भी अगर वेद प्रकाश कंबोज और कर्नल रंजीत में चयन करना पड़े तो मेरी पहली पसंद उपन्यासकार कर्नल रंजीत के उपन्यास ही मुझे हमेशा से भाते ।
“ भैया कर्नल रंजीत के उपन्यास  हैं क्या “
“ हाँ हैं । नाम बताइये । कौन से ? “
“ ट्रेन एक्सीडेंट” , “ ख़ाली सूटकेस “ या फिर “गहरी चाल “ मैंने एक साँस में बोला ।
“ मैडम ..क्यों नहीं , आज कल तो सभी को जासूसी उपन्यास चाहिए । अभी देता हूँ उसने तीनों उपन्यास झट से निकाल कर दे दिये थे । इधर ट्रेन ने सीटी मार दी थी । मैंने उसको पैसे दिए और तीनों उपन्यासों को हाथ में लेकर झट से ट्रेन में चढ़ गई थी । उन्हीं वृद्ध अंकल की सीट पर ही बैठ गई थी । मैं किताबों को टटोलने ही वाली थी .. कि  उन्होंने मुझे पुकारा था ।
“ बेटा ! ..
“ जी .. जी ..हाँ कहिए “
“ शायद अल्लाह ने तुमको मेरी हिफ़ाज़त के लिए ही भेजा है इस सफ़र में … “  मैं पहली बार अपने लिए उनकी ज़ुबान से बेटा शब्द सुन कर बहुत खुश हुई थी । शायद अब जाकर वो अपने मन को समझा पाये थे कि मैं उनको सुरक्षित उनके घर पर पहुँचा दूँगी । मैंने सीट के नीचे झुक कर देखना चाहा था लेकिन मेरी दुखती गर्दन ने इजाज़त नहीं दी थी झुकने की । मैंने उनसे ही पूछ लिया था कि उनके पास कितना सामान है ? सामान में एक टीन का बक्सा और सिर्फ़ एक झोला ही था ।
कानपुर से चढ़े कुछ नये यात्री अपनी जगह पर बैठ चुके थे ,लेकिन लखनऊ आने में अभी दो – ढाई घंटे थे तो वो भी अपनी  कमर सीधी करने के लिये बर्थ पर लेटने की तैयारी चुके थे ।
मैं भी अपनी बर्थ पर जाकर लेट गई थी । मेरे गले में लगे झटके का दर्द यथावत ही था । कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ा था । लखनऊ पहुँच कर मुझे डाक्टर को दिखाना ही पड़ेगा , ये सोचकर आँखों को मैंने भी बंद कर लिया था कि एक छोटी सी झपकी ही ले लूँ  ।  सारी रात नींद ही कहाँ आई थी ।मैंने आँखों पर रुमाल डाला और  सोने का प्रयत्न किया । कानों में ट्रेन और पटरियों की आवाज़ आना कब बंद हो गई मालूम ही नहीं पड़ा था ।
6
अचानक से बोगी में लोगों की चहलक़दमी से नींद खुली तो देखा ट्रेन रुकी हुई थी । मैंने हड़बड़ा कर अपनी आँखों को मलते हुए इधर -उधर देखा कि क्या हुआ ? तभी नीचे खिड़की से सामने लिखा देखा लखनऊ जंक्शन ।ओह ! इतना जल्दी ! मन में इस ख्याल के आते ही मैंने साइड वाली बर्थ की ओर देखा तो वृद्ध अंकल शांत सो रहे थे । मुझे उनको सोता देखकर मन में बड़ा  सुकून सा मिल रहा था । उनके ऊपर ग़म का पहाड़ टूट कर चुका था , बुरा समय उनकी आँखों की नींद और दिल का चैन पल भर में लील गया था । जिसका सब कुछ सफ़र में लुट गया हो , उसकी आँखों में नींद कहाँ  होगी भला  । मैं ख्यालों से गुजर रही थी कि अचानक से उनकी आँख खुली देखकर उनसे कह बैठी थी ।
“ अंकल जी ! आपका लखनऊ शहर आ गया है , अब हमें उतरना चाहिए “ ये कहते हुए मैंने उनको उनकी बैसाखी थमाई थी और कुली को आवाज़ मारी थी । उसको अपना ब्रीफ़केस , बक्सा और थैला उठाने को बोला था ।
कुली ने सिर पर ब्रीफ़केस और बक्सा रखा और हाथ में थैला लटका लिया था । वो आगे की ओर बढ़ चला था उसके पीछे – पीछे हम दोनों । कुली सामान लेकर ट्रेन से नीचे उतरा और मैंने वृद्ध अंकल को ट्रेन से नीचे प्लेटफ़ार्म पर सहारा देकर उतारा । हम टैक्सी के लिए कुली के साथ ही आगे बढ़ने लगे थे । सवारियों को आता देख टैक्सी -ऑटो वाले मधुमक्खी की तरह चिपट जाते हैं ।.. पैसा ऐसे मांगेंगे जैसे किसी को पता नही है कि यहाँ के टैक्सी या ऑटो के रेट क्या हैं । एक दो टैक्सी को मना करने के बाद जब तीसरे ऑटो वाले से यहियागंज चलने के लिए पूछा तो जायज पैसों में वो तैयार हो गया था । कुली को पैसे देकर हम दोनों उसमें सवार होकर आगे बढ़ लिए थे ..। सुबह का समय था । ख़ाली सड़क देख कर दौड़ाने में लगा था ऑटो वाला । बहुत देर हो गई सहन करते हुए तो मुझसे रहा न गया ।
“ अरे ..भैया ! थोड़ा आराम से लो ऑटो , मेरी गर्दन में झटका आया हुआ है और आपने भी देखा न ! कि  बुज़ुर्ग साथ में हैं “ मैंने थोड़ा झुँझलाहट में उसको टोका ।
“ मैडम जी ! सड़कों का हाल देख रही हैं न आप , कोई नही बनवाने को तैयार होता है  , अरे ..! लोगों ने  इस मुहल्ले की गलियों में ऊँची -ऊँची बिल्डिंग खड़ी कर मारी हैं । मैडम जी ! ऐसा कोई घर नही होगा यहाँ , जिसमें चिकन की कढ़ाई न होती हो । थोक का काम होता है यहाँ पर , छोटी -बड़ी गाड़ियों की बहुत आवा – जाही रहती है । बहुत चिल्ला-चिल्ली है ।“  ये कहते हुए उसने तुरन्त पूछा ।
“ मैडम ! आपको कौन सी गली में जाना है “
“ अंकल जी किधर जाना है आपको “ मैंने कहा ही था कि अंकल जी खुद बोल उठे थे ।
“ अरे भाई ! “ हबीब गोश्त की दुकान “ का नाम तो सुना होगा । वही से बगल वाली गली है ,उसी में जाना है “ वो बोल रहे थे लेकिन उनका ध्यान कहीं भटका हुआ था ..।
“ ये लो जी ! आ गई आपकी हबीब गोश्त की दुकान “
“ हाँ .. हाँ ..यहीं .. यहीं ..ये बगल वाली गली में ही काट लो भाई ! “ थकी और भरभराई आवाज़ में उन्होंने ऑटो वाले से कहा ..।
“ हाँ .. हाँ ये ही .. ये ही सामने वाले मकान पर “
“ ये लो जी ! आ गया आपका घर “ ये कहते हुए ऑटो वाले ने ऑटो रोक दिया । उसने वृद्ध को नीचे उतारने में सहायता की और उनकी बैसाखी उनके हाथों में थमा दी । ऑटो के ड्राइवर ने अन्दर सीट के पीछे से बक्सा , ब्रीफ़केस और थैला उठाया और सड़क पर ही रख दिया था । मैंने उसको पैसे दिए और वो अपनी ऑटो लेकर गली से बाहर निकल गया था ।
मैंने उनके घर का दरवाज़ा देखा । बदरंग सा .. कुछ थोड़ा ऊपर से टूटा हुआ । मैंने बाहर लटकी हुई डोरी के साथ लगे  स्विच को दबा दिया था ये सोचकर कि शायद ये डोर बेल का ही  स्विच होगा । परन्तु अन्दर से कोई भी संकेत न मिलने पर मैंने दरवाज़े की साँकल को खटखटाया था । दो मिनट बाद ही ….।
“ कौन है “
भीतर से एक आवाज़ सुनाई दी और उसके साथ ही एक बेहद नाज़ुक और संगमरमरी बदन की लड़की ने दरवाज़ा खोल दिया था । शायद उसने दरवाज़ों की झिरी में से हमको देख लिया था ..। मैं कभी उसको देख रही थी तो कभी दरवाज़े के अन्दर लटके टाट के पर्दे को देख रही थी । कितना विरोधाभास था दोनों की रंगत में , एक तरफ ईश्वर की रचना का नाज़ुक फूल था तो दूसरी ओर छितरा हुआ फटा हुआ दरवाज़े पर लटका बेजान पर्दे का अस्तित्व… ओफ्फ .. मेरे अंदर न जाने क्यों अनायास ही कुछ टीस सी उठ गई थी । सिर पर दुपट्टे के पल्लू को सम्भाले वो आगे बढ़ी थी ।
“ अस -सलाम – अलैकुम अब्बा जान “ ये कहते हुए वो ख़ुशी से आगे आई ..।
“ वालेकुम -सलाम “  थरथराते  होंठों ने रज़िया को  जवाब तो दे दिया था लेकिन उन्होंने अपनी नज़रें न मिलाई  थीं ।
उसने अब्बा को कंधों से थामते हुए और मेरी ओर अभिवादन में अपना सिर हिलाते हुए आगे चलने के लिए कहा था । हम अन्दर की ओर बढ़ ही रहे थे कि अचानक से उसने पूछा था ..।
“ अब्बा ! अनवर कहाँ हैं ? क्या कुछ लेने गये हैं ? “  उसने ये उनसे पूछते हुए मेरी ओर देखा था , लेकिन मैं तो उसके प्रश्न पर उनकी ओर देख उठी थी । जिनका सब कुछ एक पल में लुट चुका था । उनकी ज़ुबान शायद अपनी पोते की बहू के आगे पत्थर हो गई थी । शब्द इतने भारी हो गये थे कि ज़ुबान से नही वो पिघल कर पानी रूप में आँखों से बह रहे थे ।
“ अब्बा ! आप रो क्यों रहे हैं और आप चुप क्यों हैं ? अनवर कहाँ हैं ? खुदा के रहम से कुछ तो बोलिए अब्बा .. या अल्लाह आप ख़ामोश क्यों हैं ?
औ…र .. ये आपके साथ ..आप किसको लायें हैं ? आप बोलते क्यों नही ? मेरे अनवर कहाँ हैं ? कहाँ छोड़ आएं हैं आप उनको “ और वो अपने अब्बू के कंधों को झकझोरने लगी थी । उसकी आवाज़ और प्रश्नों पर मेरा दिल और दिमाग़ ने जैसे काम करना बंद कर दिया था । मैंने किसी तरह से अपने को सम्भाला और  उस नाज़ुक कली को आगे बढ़कर अपनी बाँहों में समेट लिया था । वो छूटना चाहती थी मेरे घेरे से , उसने मुझे अजीब सी निगाह से देखा था । वो समझ रही थी कुछ या नही ? ये मुझे नहीं मालूम , परन्तु न जाने वो क्या पूछना चाहती थी मुझसे । मैं उसको जितना सम्भालने की कोशिश कर रही थी उसके साथ -साथ में भी बिखरती जा रही थी ….
“ जा…न  दे दी तेरे अनवर ने रज़िया ! खा गया उसको ये ज़ालिम आतंकवादी समाज और हमारा लचर सिस्टम ।शायद भटक गया था तेरा अनवर  कहीं …तो मारा गया  । अब वो सत्ता की साज़िश का शिकार बना या आतंकवाद का शिकार बना ये कुछ नहीं कहा जा सकता । “  एक भरभराई पसीजी हुई सी घायल आवाज़ गूँज उठी थी कमरे के वातावरण में …..।
मैंने घूम कर देखा उनको , वो बिल्कुल चट्टान बने बैठे थे ।शब्द भीगे हुए थे पर आँखों के आँसू सूख चुके थे ।
“ अनवर ऽ ऽ ऽ ऽ …” एक ऐसी चीत्कार जिसकी आवाज़ से दीवारें भी चीख  उठी थीं ।
रज़िया के हाथों की पकड़ मेरे कंधों के ऊपर से ढीली पड़ चुकी थी । वो ज़मीन पर गिर पड़ी थी । ज़मीन पर पड़ी किसी बिना पानी की मछली की तरह तड़प रही थी ।
मन सोचने पर आमादा हो रहा था । हम औरतों का जीवन भी बिल्कुल धरती के ही समान है । जब चाहें खोद दो , जब चाहे काट दो , जब चाहे इस पर रोप दो ।
रज़िया भी आज अपने गम से धरती के सीने को  गीला कर रही थी । उसने अपनी बाँहें ऐसे फैला ली थीं जैसे कि वो पूरी धरती को अपनी बाँहों में भर कर उसके सीने में अपना पूरा दर्द उड़ेल देना चाहती हो । आख़िर धरती हमारी माँ ही तो है । जिस तरह माँ के सीने से लग कर बच्चा अपने सारे गम भूल जाता है , वो भी अपना गम बाँट रही थी धरती के सीने से चिपक कर । ताजा घाव बहुत रुलाता और तड़पाता है .. ।  मैंने भी उसको नहीं उठाया धरती से ।  मैं चाहती थी कि वो अपना सारा दर्द बाँटकर ही एक मज़बूत इरादों को साथ लेकर खड़ी हो इसी धरती पर ..। धरती का सीना बहुत बड़ा है वो ही उसे हिम्मत और आगे जीने की राह सुझायेगी ।
7
वक्त काफ़ी हो चुका था ..। दो घंटे में मुझे इतना तो पता लग ही गया था कि घर के हालात ज़्यादा ठीक नहीं हैं । बस दाल -रोटी ही चल रही है इस घर की , ये सोचते हुए मैं वृद्ध अंकल की ओर मुड़ी और मैंने वापसी की इजाज़त माँगनी चाही थी । लेकिन वहीं दूसरी ओर मन बार -बार यही सोच रहा था कि
मैं इन दोनों के लिए कुछ खाने -पीने की चीजें  लाकर रख जाऊँ ..। ये सोचते हुए मानवता के नाते ही मैंने खुद आगे बढ़कर उनसे पूछा ..।
“ अंकल जी ! आपको कोई दिक़्क़त न हो तो मैं कुछ खाने का प्रबंध कर जाती हूँ । रज़िया की हालत नही है कि वो नादान अभी कुछ कर सकेगी । .. उसे अपना होश नहीं है वो क्या कर सकेगी । उसे मानसिक आराम की सख़्त ज़रूरत होगी  “ ये कहते – कहते मैं भी रो उठी थी ।
“ बेटा …हम सिर्फ़ वक्त के मारे हैं , हमें और शर्मिंदा मत करो , तुम्हारा एहसान हम कभी नहीं उतार सकेंगे । अल्लाह ने फ़रिश्ता बना कर भेजा है तुमको हमारे लिए , तुमने इस बूढ़े को अपनी बच्ची तक पहुँचाया , क्या ये कम बात है । आज का इंसान बहुत बदल गया है बेटा ..! कोई किसी के दर्द में खड़ा नहीं होता है । आज धर्म और मज़हब को लेकर लोगों में कट्टरता इस तरह बस गई है कि मानवता को ही भूल गया है “ ये कहते -कहते उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये थे ।
“ ये क्या कर रहे हैं आप .. एक तरफ हमको बेटी बोल रहे हैं दूसरी तरफ़ हाथ जोड़ कर मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं । ये सब मानवता के नाते मेरा फ़र्ज़ है । मैं अभी आती हूँ “ ये कह कर मैं उनके घर से गली की ओर निकल गई थी । कुछ खाने का सामान लेने के लिए ..।
सामने गली में ही एक बड़ी सी हलवाई की दुकान थी । मैं वहीँ से खाने का सामान पैक करवाने लगी । गली में चारों ओर कुछ अजीब सी हलचल  मची हुई थी । लोगों की भीड़ बहुत ज़्यादा बढ़ चुकी थी । मुझे कुछ लोगों के चेहरे पर भय और आतंक सा दिखाई दे रहा था । मैं थोड़ा डर सा गई थी कि आख़िर क्या हुआ है । वैसे जानती थी कि आज कल कोई भरोसा नही है कब और कहाँ किस बहाने से दंगा छिड़ जाए । ये सोच ही रही थी कि इतने में मैंने देखा एक जीप मेरे ही बगल से बड़ी तेज़ी के साथ गली में घुसी गई थी । मैंने आगे बढ़कर दुकानदार से पूछा भी कि ..
“ आख़िर  माजरा क्या है भाई “ लोगों से पता लगा कि किसी के मकान को ढूँडते फिर रहे हैं .. ।
“ कौन हैं पुलिस वाले हैं “ मैंने  फिर पूछा ।
“ अरे ..नहीं  मुझे तो गुंडे से लग रहे थे “ ये कहते हुए वो किसी ग्राहक को सामान देने लगा था
“ मकान ….“  मैं मन ही मन बुदबुदा उठी थी ।
मैंने तुरन्त दुकान से खाने का पैकेट उठाया और उसके पैसे देकर  तेज़ी के साथ गली की ओर दौड़ पड़ी थी । हलवाई खुले पैसे देने के लिए पीछे से आवाज़ दे रहा था और मैं उसको अनसुना करके अन्दर गली में मुड़ गई थी । मैंने देखा उनके घर का दरवाज़ा खुला हुआ था । घर के बाहर भीड़ लगी थी । मेरा मन अज्ञात भय से काँप उठा था । मैं भीड़ को पार करके तेज क़दमों से अन्दर पहुँच गई थी ।
अन्दर के दृश्य को देख कर मेरी आँखें खुली की खुली रह गई थीं । मेरे हाथों से छूटकर खाने का पैकेट नीचे ज़मीन पर गिर गया था ।  वृद्ध अंकल की लाश मुड़िये पर अध लटकी  हुई थी  ।  बहीं पास में ही धरती को आँचल में समेटे रज़िया की लाश पड़ी थी । दृश्य को देखकर मेरे पैरों की जान निकल गई थी  । मुझे बहुत तेज उल्टी आने लगी थी ।मैंने अपना ब्रीफ़केस उठाया और मैं बाहर की ओर वापस मुड़ गई थी ।
मैंने गली से बाहर आकर गोमती नगर , पत्रकार पुरम के लिए टैक्सी  बुक की । पाँच मिनट में ही टैक्सी आ गई थी   । मैं  घर की ओर चल पड़ी थी ।
बेचैन मन में अनेक सवाल उठ रहे थे ।
अनवर मेरे लिए अभी भी एक प्रश्न ही बना हुआ था । मैंने अपने इस सफ़र में अपनी ही आँखों के सामने एक परिवार को ख़त्म होते देखा था ।
मेरा दिमाग़ फिर उतनी ही तेज़ी से चल रहा था जितनी तेज़ी से टैक्सी का पहिया …।
लोगों का ग़ुलामी परस्त होना क्या उनकी मजबूरी है या ज़रूरत ?
लोग धर्म और मज़हब के फेरे में कब तक उलझे रहेंगे ?
सत्ता गरीब और लाचारों को उनके हक मार -मार कर कितना सतायेगी ?
क्या सत्ता सिर्फ कुर्सी की भूखी होती है?
क्या उसका गरीब जनता के प्रति कोई कर्तव्य नही ?
आज हिंदू – मुस्लिम आपस में क्यों भिड़ जाते हैं ?
या क्यों सत्ता के लोलुप लोगों द्वारा अपने स्वार्थ  के निहित ये आपस में ही भिड़ा दिये जाते हैं ?
अगर हम न हिंदू हों और न मुसलमान , सिर्फ इन्सान कहलाएँ तो ये दुनिया कितनी ख़ूबसूरत बन जायेगी।
मेरा मन बड़ी तेज़ी से भागा जा रहा था इंसानी जज़्बातों में , तभी मैंने देखा कि गोमती नगर ,पत्रकार पुरम का मॉर्केट तो आ चुका है । मैंने चौंक कर टैक्सी वाले को कहा ।
“ भैया ! इधर ही राइट में बगल से दो मकान छोड़कर रोक दीजिएगा “
टैक्सी रुक गई थी । मैंने टैक्सी वाले का पेमेंट किया और  पर्स से चाबी निकालकर मकान का मेन गेट का ताला खोला और अंदर की ओर , आगे की तरफ बढ़ गई थी । मैंने दूसरी चाबी से घर का ताला खोला और अंदर घुसकर वापस डोर बंद कर लिया था । कमरे में सामने बेड देखकर मैं उसपर निढाल हो कर गिर पड़ी थी ।
नींद खुली तो देखा अनिरुद्ध आ चुके थे । बैंड पर ही बैठकर मुझे ही देख रहे थे ।
“ कितने बजे आई , क्या ट्रेन लेट थी “ उन्होंने मेरे माथे पर बिखरे बालों को माथे से उठाते हुए पूछा था ।
मैंने थोड़ा सरक कर अपने सिर को अनिरुद्ध की गोदी में  रख दिया था ..। मेरी आँखों से आँसू बह निकले थे ।
“ क्या हुआ ?, मेरी मनु और इतनी कमज़ोर ? न ये मुझे मंजूर  नही “ अनिरुद्ध ने झुककर मेरी आँखों में देखा था ।
“ अनिरुद्ध ! ये लोग ग़ुलामी क्यों करते हैं ? किसके बहकावों में आकर करते हैं ?
“ ओह ! तो ये बात है ..फिर कोई नई समस्या ….तुमको कितनी बार कहा कि दु..नि ..या ” वो कुछ बोलने ही वाला था कि ..
“ अनिरुद्ध ..! हम कब आज़ादी में साँस लेंगे ??…. “ और ये कहते -कहते वो फ़फ़क कर रो पड़ी थी ..।
अनिरुद्ध ने दुख की पराकाष्ठा में जकड़ी अपनी मनु को बाँहों में भर लिया था । लेकिन आज उसका मन भी चीख – चीख कर कुछ पूछ रहा है ।
 “। क्या मनु के प्रश्न का किसी के पास उत्तर है ..?? ”
शिक्षा - एम. ए. प्रकाशित पुस्तकें— चार काव्य संग्रह, दो कहानी संग्रह. संपर्क - kusum.paliwal@icloud.com

2 टिप्पणी

  1. समसामयिक सवालों को उठाती, हमारी संवेदनाओं को झकझोरती बढिया कहानी. बधाई माननीया.

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