Tuesday, March 17, 2026
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लखनलाल पाल की कहानी – उजयारी बहू

गाँव में पंचायतें वैसे ही खत्म हो रही हैं, जैसे काबर माटी का कठिया गेहूँ। गेहूँ की किस्मों ने कठिया को अपने ही घर में पराया बना दिया। रो रहा है बेचारा खेतों के कोने में। क्या करे, तेजी से बदले जमाने में कठिया गेहूँ जमाने के हिसाब से अपने आपको बदल न सका। इस धरती पर तो वही ठहर पाता है, जिसमें जितनी शक्ति होती है। बिना शक्तिवाला इस संसार में खो जाता है, कुदरत का यही नियम है। जब से नए कानून ने जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया, उसी के साथ पंचायतें भी बह गईं। अब तो आदमी सीधा अदालत का दरवाजा खटखटाता है। वहाँ मुँहदेखा व्यवहार नहीं है। केस फँस गया, तो सजा का ही डौल है। फिर आजकल नई-जई बूढ़ों की सीख मानती कहाँ है। वे सभी को हुड्डने लगे। कुछ नेतागीरी में रमे हैं, तो कुछ वाहियात घूमते हैं। कुल मिलाकर पंचायत घर अपने विगत जीवन की याद में टेसुआ बहा रहा है।
गाँव का एक समाज पुरखों की इस प्रथा को आज भी चला रहा है। रघुआ ने इस पंचायत में जान डाल दी। गाँव भर में एक ही शोर है, रघुआ लुगाई कर लाया। कहाँ की है? कोई नहीं जानता। शायद पैंतीस हजार रुपये में खरीदी है। पन्द्रह हजार रुपये की बकरियाँ बेची थी और बीस हजार रुपये ब्याज पर उठाए थे। रुपये खर्च करके रघुआ बहू घर ले आया। बहू के घर में घुसते ही मुहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई।
रघुआ की बिरादरी बहू की जाति की टोह में है। दुल्हनियाँ कौन जाति की है, इस पर शोध स्तर पर काम होने लगा। कोई कहता है, धोबिन है तो कोई कहता है भंगिन है। रघुआ के सपोर्टर कहते बभनियाँ है और रघुआ कहता है जाति-बिरादरी की है। चाहे जिस जाति की हो, बहू खूबसूरत है। एकदम ऊँची-पूरी गोरी नारी। बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें झिन्नू साड़ी में बहुत सुन्दर लगती है। रघुआ की बाई बराबर बहू के साथ लगी रहती है। खरीदी बहू कोई कुछ कान में फूंक दे, तो पैंतीस हजार तो गए, बहू अलग से चली जाएगी l
एक दिन रघुआ की बाई ने बिरादरी की औरतों को बुलौआ देकर घर बुला लिया। बहू का नाम धराने के लिए। गोरी बहू देखकर औरतों ने उसका नाम उजयारी रख दिया। रघुआ की बाई ने इस खुशी में सबको मुट्ठी भर-भर कर बताशे बाँटे।
रघुआ का बाप चतरा बिरादरी की टोह में लगा था, वे क्या बातें करते हैं? हवा का रुख किधर को है? वैसे ही तिवारौ लगाए घूम रहा था चतरा। पर बिरादरी के घुटे मानुष ऐसे कैसे भेद बता देंगे? बिरादरी चुकरिया में गुड़ फोड़ रही थी। बिरादरी कैसे रोटी लेगी, क्या डांड़ लगाएगी, कोई नहीं जानता था सिवाय ऊपर वाले के। बिरादरी ने रघुआ के बाप से साफ-साफ कह दिया था कि जब तक तू बिरादरी को रोटी नहीं दे देता, तब तक तू कुजात रहेगा। तेरे घर का न कोई पानी पिएगा और न तुझे कोई पानी पिलाएगा। चतरा गुस्से से लाल हो जाता था पर गुस्सा को पीना उसकी मजबूरी थी। पाँव फँसा है, पोले दइयाँ उसे निकालना है। खैर कुछ भी हो रघुआ के दिन आनन्द से गुजरने लगे। दिन भर बिरादरी उसे क्या धौंस देती है, रात में सब भूल जाता था।
चतरा आस-पास के गाँवों में अपनी बिरादरी से मिला, पर उसके मन का उत्तर किसी ने न दिया। फिर भी उसने फुसला-पोटकर अपनी ओर मिलाने की भरसक चेष्टा की। सबने एक ही बात कही- ‘एक दिन का टिया धरकर बिरादरी को इकट्ठा कर लो चतरा भइया। पंच जो निर्णय कर देंगे, वही मानना पड़ेगा। कथा, भागवत, गंगा स्नान जो कुछ बिरादरी बताए, सो वह कर लेना। बिरादरी को कच्ची-पक्की रोटी दे देना, तेरा उद्धार हो जाएगा। जाति गंगा हम सबको पवित्र कर देती है।”
कोई चतरा से कहता – “सुना है, बहू सुन्दर है, कहाँ से फटकार दी?” बहू की बड़वाई सुनकर चतरा की छाती दो गज फूल जाती। वह हँसकर जवाब देता- “भइया तुम्हारई चरनन की किरपा है। क्या करें फाल बिगर गया था, बिरादरी का कोई आदमी मेरे लडके के दाँत तक देखने नहीं आता था। वंश तो चलाना ही था, मैंने कहा, बेटा पैसा लगे तो लग जाए, बहू तो आ जाएगी।’
– “ठीक रहा चतरा भइया, बस बिरादरी और संभाल लेना, तेरा बारे जैसा ब्याह बन जाएगा।”
आज बिरादरी की पंचायत थी। बड़े-बड़े पंच आस-पास के गाँवों से बुलाए गए थे। इतना कर्रा मामला गाँव का समाज अपने सिर कैसे ले लेता? आस-पास के पंचों का जमावड़ा देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस दुनिया से विदा हो गया हो और उसकी तेरहवीं में लोग इकट्ठे हुए हों।
मनुष्य धरती के सभी प्राणियों से इसलिए श्रेष्ठ है कि उसके पास दिमाग है, सोचने-समझने की शक्ति है, विचार कर सकता है। सभी पहलुओं को समझकर निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। दो-चार आदमी इधर बैठे थे तो दो-चार उधर। बूढ़ों का सुरैधा अलग लगा हुआ था। कोई बीड़ी सुड़क रहा था, तो कोई तम्बाकू की पीक थूक रहा था। सिगरेट तो ऐसे चोंख रहे थे जैसे गन्ना। बात का केन्द्र रघुआ और रघुआ की लुगाई थी। जो लड़का रडु़आ थे, उन्हें रघुआ से ईर्ष्या हो रही थी। जिनकी रघुआ के बाप से तनकई तन्ना-फुसकी  थी, वे इस घात में थे कि डांड़ कर्रा लगे तो उनके कलेजे का डाह बुझा जावै। कोई पंचायत में जाने को तो तैयार था, पर रोटी लेने से ठनगन कर रहा था।
बिरादरी की मेहरियों ने खसमों को जाती-जाती बेरा तक खूब समझाया। पुन्ना की बाई ने अपने आदमी को अल्टीमेटम देकर कहा- “भलु पुन्ना के नन्ना पाँत में नई जानै, बिरादरी खें साफ बता दइए।” खसम ने कान पर न धरी तो वह सन्नाकर बोली- “तै भलेई चलो जइए पाँति में, लडुअन कौ भूकौ होत ता, पै मैं जान वाली नहियाँ, धियान कर लैत।”
पुन्ना का नन्ना बेचारा बेमौत मरा जा रहा था। बीड़ी पीने में उसका मन नहीं लग रहा था। पंचों की ठसक सहे कि लुगाई की? अब तो सब रामभरोसे हैं, जो कुछ होगा, सो भुगता जाएगा। पुन्ना का नन्ना पुरखों को कोस रहा था कि लुगाइयों को पंचायत से बाहर क्यों रखा? लुगाई जात होती तो मैं कभी न आता। पुन्ना की  बाई को  पहुँचा देता। सारे टंटा दूर हो जाते। ई सास की दाई ने मेरी कुँआ-बहर जैसी हालत कर दी।
चार आदमी आपस में बतिया रहे थे। एक बोला “सुना है रघुआ की लुगाई साजी है?”
– “कक्का श्रीदेवी सी लगत।”
“हैं!” पहले वाले ने मुस्क्याकर आँखें सिकोड़ी। 
-“सुनो है, धोबिन है?” तीसरा वाला बोला।
-“ससुरा को बिरादरी की न मिली। बिरादरी की बईरें तू गई थी क्या?” 
– “जाति में आ गई कक्का, पंच धोबिन को बिरादरी की न बना पाएगा क्या?”
– “जाति-गंगा में कूरा-करकट सब कुछ मिल जाता है रे! अब तो यह सब पंचों के हाथों में है।”
-“अब क्या किया जाए कक्का, ससुरा रघुआ लुगायसौ हतो, अक्क लगी न धक्क, साजी देखकर खरीद लाया। कहत नहियाँ ‘प्यास न देखे धोबी घाट, इश्क न देखे जात-कुजात।” उन्हीं में तीसरा वाला बोला।
तीसरे की बात सुनकर दो हँस पड़े, चौथा न हँस पाया। वह उन्हें समझाते हुए बोला- “कक्का इस बारे में कोई सबूत नहीं है, हम फँस जाएंगे।” चौथे वाले  के तर्क से तीनों के मुँह लटक गए।
अब दूसरी तरफ की जमात। खुसर-पुसर मची। इतने धीरे से बोल रहे थे कि बात सीधे कान में पहुँचती थी, इधर-उधर बरबाद नहीं हो रही थी।
– “गर्रानो है चतरा, अच्छा पैसा है, मुखिया डांड़ हिसाब से लगाइयो।”
 – “कितनी पोपरटी होहै?” मुखिया ने एक आँख दबाई।
-” अभी नकद पचास हजार तो होंगे ही। रघुआ छिरियाँ पाले है, पाँच-छैः छिरियाँ अभी बेची थी, पन्द्रह-सोलह मौका पर है।”
– “चिन्ता न कर दाऊ जैसा तू चाहता है, वैसा ही होगा। कौन एक पंचायत आ निपटाई है, हजार निपटाकर फेंक दी। किसी ने उँगली नहीं उठाई।” मुखिया ने अपनी मूछों पर हाथ फेरा।
इस जमात के लोग मुखिया के ज्ञान के कायल हो गए। मुखिया ने अपना भभका बना लिया। उसने अभी से ही अच्छे पंच का सर्टीफिकेट दे दिया था। मुखिया ने गर्व से गर्दन हिलाई।
– “दाऊ सैंके-मैंके न सट्टे करे।” उसी जमात का एक आदमी बोला। वह कुछ सच्चाई जानता था। उससे रहा न गया। उसने कह दिया- “बहू खरीदने के लिए बीस हजार रुपये कर्ज लिए थे। कहाँ से आए पचास हजार कि साठ हजार?”
दाऊ की बात कटते ही वह तिलमिला गया, घाघ किस्म का आदमी, वह बात संभालता हुआ बोला- “अरे तू सिटया गया क्या? बीस हजार रुपये तो चतरा ने इसलिए कर्जा लिए थे कि सब कोई जान जाए और भइया बिरादरी डांड़ मजे का लगाए।”
– “चतरा की यह बदमाशी हमारी समझ तरें नहीं आई। ऐसई हो सकत।” वह आदमी अपनी बात को वापस लेता हुआ बोला।
बिरादरी को पंच बुलौआ हुआ। पंचों की बात कौन टाल सकता है? घर से तो पहले ही निकल आए थे, जहाँ-तहाँ बैठकर रिहर्सल कर रहे थे। सभी उठ- उठकर नीम के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो गए। मैदान बड़ा था। चारों ओर कच्ची मिट्टी की दीवारें बनी थीं। चतरा ने गाँव भर की जाजमें माँगकर इकट्ठी कर ली थी, वही बिछा दी।
उसी मैदान में एक ओर चबूतरा बना था। पाँचों पंच उसी पर जा बैठे। ये पाँचों पंच अलग-अलग गाँवों के थे। बिरादरी में खूब नाम कमाया था, उसी का फायदा उन्हें मिला कि वे आज पंच बने बैठे हैं। बोलने में चतुर। मूँड़ पर बड़े-बड़े साफा बाँधे, हाथ में तेल लगी छड़ी। धोती-कुरता के ऊपर सदरी पहने लगता था कि ये पंच हैं। मुँह पर गम्भीरता, हर कोई उनके सामने बात करने से दंदकता है।
पाँचों पंच आराम से चबूतरा पर बिछी दरी पर बैठ गए। यह दरी पंचों के लिए स्पेशल लाई गई थी। शेष आदमी नीचे बिछी जाजिमों पर बैठ गए। वे पंच जिस-जिसके किसी रिश्ते में कुछ लगते थे, उनके भाव बढ़ गए। एक पंच कुन्टा का मामा लगता था। उसके पैर आज धरती पर नहीं रुप रहे थे। अक्ल से कुछ कच्चा था, सो गाँव वाले उसे ‘धत् तेरे की’ कहकर भगा देते थे। उन्हीं को देखकर आज वह ऐसे मुस्करा रहा था, जैसे भूमण्डल को उसने पैरों के नीचे दबा लिया हो।
पंचों की आपस में कानाफूसी हुई। लोगों के कान खड़े हो गए। पर उनकी आवाज इनके निरीह कान न सुन सके। वे सभी पंचों के मुँह की ओर ताक रहे थे।
एक पंच गम्भीर वाणी में बोला- “चतरा पंच काहे को बुलाए?” 
चतरा हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बुकरिया सा मिमयाया- “मुखिया साब तुम तो सब जानते हो।”
– “जानते तो सब कुछ हैं, तू अपने मुँह से तो बता। यहाँ बैठे चार लोग भी सुन लेंगे।” दूसरा पंच बोला।
– “पंचों मेरा लड़का रघुआ बहू कर लाया है। सामूँ आँखों का लड़का है, गलती तो उसने कर ही ली है। मैं चाहता हूँ कि बिरादरी मुझे सनाथ कर दे तो मैं तर जाऊँ।”
बिरादरी शांत बैठी थी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। पंचों ने बिरादरी की ओर देखा, फिर चतरा की ओर मुखातिब होकर कहा- “बिरादरी जाति-गंगा कहलाती है, वह तो तुझे सनाथ कर ही देगी पर यह तो बता बहू की जाति क्या है?”
पंच मुखिया की बात सुनकर चतरा बगलें झाँकने लगा। इसका उत्तर चतरा क्या बताए, इसी से उसने चिमाई साध ली।
 -“सुनो है धोबिन है।” पुन्ना का नन्ना बीच में बोला।  “-धोबिन कैसे है, वह तो बभनियाँ है।” रमोला ने फट्ट से पुन्ना के नन्ना की बात काट दी।
– “पंचो वह न धोबिन है, न बभनियाँ है, वह तो भंगिन है।” चतरा का समर्थक व्यंग्य से बोला- “जाति बिरादरी होत काहे को है? बिरादरी उसे जाति में समागम कर पाएगी या नहीं?”
          अब सभी बोलने लगे। शोर इतना बढ़ गया कि किसी को किसी की कोई बात स्पष्ट नहीं हो पा रही थी। पंचो ने हस्तक्षेप किया। वे खड़े होकर बोले- “तुम सब जने शांत हो जाओ। ऐसे पंचायत नहीं होती है।”
           पंचों की अपील का वहाँ असर हुआ। लोग चुप हो गए। चतरा हाथ जोड़े अभी भी खड़ा था। पंच बोले- “रघुआ को बुलाओ।” 
              रघुआ वहीं बैठा था, सो तुरन्त खड़ा हो गया। एक पंच ने पूछा- “काए भइया, बहू कौन जाति की है?”
-” साब जाति-बिरादरी की है।” रघुआ ने हाथ जोड़कर जवाब दिया।
– “तुझे कैसे पता कि बिरादरी की है?” दूसरे पंच ने मूँछों पर हाथ फिराया ।
– “साब उसी ने बताया था।” रघुआ शरमा गया। 
– “कौन उसी ने?” पंच कम नहीं थे, सो बात उकेरी।
रघुआ न बोला तो एक बूढ़ा बोल पड़ा -“बहू ने बताओ हो है।” रघुआ ने मुंडी हिला दी।
बलू से रहा न गया। अठारह साल का लडका,          दाढी मूँछ की रेख अभी आ ही रही थी। शरीर से हृष्ट-पुष्ट, जोश भी खूब था। वह खौखरयाकर बोला- “मुझे ये समझ में नहीं आता कि पंच जाति-पाँति काहे को हुराए फिर रहे हैं? जाति-पाँति में उलझे रहेंगे, तो हमारा कभी विकास नहीं हो पाएगा। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और हम यहाँ जाति का धागा बिथोल रहे हैं। दूसरी जातियों के लोग हमें तुम्हें बेशऊर कहेंगे। इसीलिए जाति-पाँति छोड़ो, भौजाई साजी है। बिरादरी की पूँछ लम्बी न बढ़ाओ।”
– “बैठ जा रे ! सवाद-अवाद है नहियाँ। पंचाट है, मेहरिया से हँसी-मजाक नुहै, जब चाहो कर लेव। यहाँ तौलकर बात करी जात।” पंचायत में बैठा एक बुड्ढा बिगड़ गया।
बलु की इस विचारधारा ने लोगों के कलेजे चीर दिए। छाती में तीर घुसे से इतनी पीड़ा नहीं होती होगी, जितनी बलु की बातों से उन्हें पीड़ा हुई। आदमी बिलबिला उठे। कइयक मूँड़ पीटन लगे। कुछ चिल्लाए- “इन्हीं लोगों ने पंचायतें बरबाद की है। बीच में कुफर बोलकर सब सत्यानाश कर दिया।”
आपस में तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। परिणामस्वरूप दो पार्टी बन गई। लोगों को अब पता चला कि कौन किस पार्टी में है।
पंचों ने बात संभाली। वे लोगों को शांत कराते हुए बोले- “लला समाज में हमें भी रहना है और तुम्हें भी। कल के दिन अपना कोई पानी नहीं पिएगा।”   -“बाभन-बनिया तुम्हारा रोज पानी पीने आते हैं क्या?” बलु उखड़ गया।
बलु की सच बात लोगों को न पची। कोई तर्क भी न सूझा। इसलिए हँसिया तो हँसिया, नहीं तो पिट हँसिया ही सही। कुफर बोलने पर पंचों ने बलु पर दस सेर गुड़ का डांड़ धर दिया। बलु के बाप को बिरादरी की समझ थी। उसने अपने लड़के की भूल की माफी माँगी और रुपये देकर दस सेर गुड़ मंगा लिया। बलु को बहुत बुरा लगा। वह गुस्से में पैर पटकता हुआ पंचायत से बाहर जाने लगा।
दाऊ ने बलु को रोक कर समझाया “बलु तू क्यों बुरा मानता है? अभी देखा नहीं, दो पार्टियाँ बनने लगी थीं। पंच अगर रोकते नहीं तो थोड़ी देर में गाली-गलौज होने लगती। बलु गुस्से में फिर से अपने स्थान पर बैठ गया।
गुड़ खाते हुए पंच बोले- “खेत में मेंड होती है, अगर मेंड न हो तो खेत काहे का। पता ही न चले कौन खेत किसका है? पुरखा बेशऊर थोड़े थे। हमें पुरखों की परिपाटी पर तो चलना ही पड़ेगा।”
पंचों के सिर एक बार फिर इकट्ठे हुए। कुछ देर तक उनकी आपस में मुण्डी हिलती रही, फिर अलग हो गई। अब तीसरे पंच ने सामने बैठे लोगों की ओर देखा और खंखारकर बोला- “अगर सबके मन से हो जाए, तो बहू को यहीं बुला लिया जाए।’
– “बढ़ियल, बहुत बढ़ियल।” कई आवाजें एक साथ गूंजी।
बहू पंचों के सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी चाल से ही पता चल रहा था कि बहू ठसकीली है। सभी की नजरें उसी पर टिक गईं। बहू का पूरी तरह से मुआयना करता हुआ चौथा पंच बोला “बहू तेरी जाति क्या है?”
– “जाति बिरादरी की है।” बहू धीरे से बोली।
उसकी आवाज कोई न सुन सका। पंचायत में बैठा दाऊ जू रसिया था। वह बोला “बहू खूब जोर से बोल। मुँह उघाड़ ले, यहाँ शरम न कर। पंच परमेश्वर के सामने काहे की शरम?”
बहू ने एक झटका में साड़ी माथे तक सरका ली। चौकटा में गाज सी गिरी। दाँतों तले उँगली दाबकर रह गया आदमी। बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, गोरा खूबसूरत मुँह देखकर पंच दंग रह गए। बहू मुस्कराई और लजाती हुई बोली- “क्या पूछना चाहते हो, पूछो?  बिरादरी-बिरादरी चिल्लाते हो, क्या तुम सभी एक ही बिरादरी के हो? गेहूँ की तो किस्में बदल गईं, आदमी की किस्में नहीं बदलीं क्या, जो मेरी जाति-बिरादरी पूछ रहे हो?”
        समाज में खुसर-पुसर मच गई। पंच समेत सभी को साँप सा सूँघ गया। चोट जोरदार थी। पंचों की बोलती बन्द। कुछ लोग आपस में बतियाने लगे- “यह तो घाट-घाट का पानी पिए है। चारों तरफ की हवा खाई भई है, इससे पार न पा पाएंगे। लुगाई है, इसके मुँह का क्या टटाबैंडौ, पता नहीं क्या बक ठाड़ी हो।” दूसरा बोला- “बहू जैसी ठसकीली है, वैसे ही ठसकदार बातें है उसकी। मुस्कराकर कैसा जवाब दिया।”
खुस-पुस के बीच दाऊ टपके “पंचों होने दो पंचायत। खेत साजौ है, फिर चाहे बलकट रखा हो, चाहे गहने (रेहन) और चाहे मोल खरीदा हो। खेत में बीज अपना बोया जाएगा, तो फसल तो अपनी ही मानी जाएगी। बताओ सब जने यह बात गलत है कि सही ?”
– “तेरी बात सही है दाऊ।” पंच मुखिया ने दाऊ की बात का समर्थन किया। 
          आदमी-औरत के बीच बिसात बिछी थी। पुरुष तो अपने पाँसे फेंक चुके थे। अब बारी उजयारी की थी। जोर आजमाइस होने लगी। उजयारी अकेली मैदान में डट गई। उसने अपना पासा फेंका “पंचों कभी-कभी खेत तो अपना होता है, बीज किसी दूसरे का बुब जाता है पर फसल तो खेत वाले की ही कहलाती है। खेत वाला फसल चपोला अपने घर में रख लेता है। इसकी भनक वह किसी को नहीं लगने देता है। पंचों मैं यह जानना चाहती हूँ कि बीज महत्वपूर्ण है या खेत?”
– “ये मार दिया, दाऊ वे डरे चित्त। उजयारी ने दाऊ की बात काट दी। अब तो पंचों को भी निकड़ नहीं है।” दो नए लड़के धीरे-धीरे फुसफुसाए।
         लोगों को एहसास हो गया था कि पंचों की बात हल्की हो गई। इस औरत ने तो सबके मुँह बन्द कर दिए। लुगाई है, इससे उलझे सार नहीं है। हंड़िया हो तो उसके मुँह पर पारा रख दे, इसके मुँह पर क्या रख दें? कुल की होती तो लाज-शरम होती, मोल खरीदी। इस चड़वाक को रघुआ न जाने कहाँ से खरीद लाया?
       पंचों को उजयारी की बात ततइयाँ सी लगी। अकेला बलु खुश था। वह अपने दस सेर गुड़ का डांड़ भूल गया।
        बलु ने उजयारी की तरफ एक बार देखा। उजयारी की जीत पर बलु मुस्कराया। उस मुस्कान का अर्थ था- ‘भौजी मार लिया मैदान, थोड़ी और डटी रह, सब पीठ
दिखाकर भाग जाएंगे।’
     उजयारी भौजी ने भी उस मुस्कान का अर्थ समझा। उसने मुस्कान का उत्तर मुस्कान से दिया। उस मुस्कान का मतलब था- ‘लला चिन्ता न करो, पीठ दिखाने पर भी इन्हें न छोड़ूगी। रगेद-रगेद मारूँगी, ढूँढ़े गली न मिलेगी।’
        बिरादरी ने उन्हें मुस्कराता हुआ देख लिया था। उन्होंने समझा बलु उजयारी को बढ़ा रहा है। इसकी साँस पा गई, अब यह पीछे न हटेगी। वे खौखरयाने बहुत पर उनकी एक न चली। उन्हें लगा पंचायत बिगड़ जाएगी। यही सोचकर पुन्ना के नन्ना ने नारा सा लगाया -“पंचों फैसला होने दो, फालतू बातों में क्या रखा है।”
        पुन्ना के नन्ना की बात सबको जम गई। पंच फैसला सुनाने को तैयार हो गए।
चतरा सकपकाया। पंच न जाने कैसा फैसला सुनाएंगे। उसके पेट में भटा से चुरने लगे।
चौकटा में सन्नाटा छा गया।
       पंचों ने मिलकर फैसला सुनाया “रघुआ बहू कर लाया है, ठीक है। पंच रघुआ की बहू को स्वीकार करते हैं। बिरादरी में शामिल होने के लिए चतरा को डांड़ भरना पड़ेगा। पंचायत में उसे पच्चीस हजार रुपये जमा करने होंगे और कच्ची-पक्की रोटी बिरादरी को खिलानी पड़ेगी। उसका तरन तारन हो जाएगा। चतरा के डांड़ न भरे से वह कुजात बना रहेगा।”
“बोलो पंच-परमेश्वर की जय। बोलो शंकर भगवान की जय।” एक साथ कई आवाजों से वातावरण गूंज उठा।
 पंच चतरा से बोले “पंच फैसला मंजूर है?”
चतरा का शरीर जड़ हो गया, जैसे सारी देह से खून निचोड़ लिया हो।
 “पंचों का फैसला मैं नहीं मानती।” उजयारी कड़क कर बोली।
           इस आवाज से सभी चौंक पड़े। उन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें यह आवाज सुननी पड़ेगी। यह पहली आवाज थी। इससे पहले कभी ऐसी आवाज सुनी नहीं गई। वह भी ऐसे ठेठ अंदाज में। पंचों के कान ताते हो गए। आधे से ज्यादा तिलमिला उठे। यह तो पंचायत की सरासर बेइज्जती थी। उनकी छाती में घूँसा सा लगा। पंचों को ऐसी आशा नहीं थी कि लुगाई इतना कुफर बोल जाएगी। पंचों ने आदेश दिया- “सब भइया अपने ठौर पर बैठ जाएं।” 
पंच मुखिया बोला- “बहू तुझे पंच फैसला क्यों मान्य नहीं है?”
उजयारी अपनी बात से तिल भर न डिगी। वह बोली “पच्चीस हजार रुपये मेरा आदमी कहाँ से लाएगा? पच्चीस हजार रुपये जैसे-तैसे कर्जा लेकर डांड़ भर भी देंगे तो कच्ची-पक्की रोटी में पता है, बिरादरी कितने का खा जाएगी? तुम तो मेरे आदमी से मजदूरी करवाना चाहते हो? मेरा डुकर (ससुर) इसी खटका में मर जाएगा। हम कुजात बने रहेंगे, यह हमें मंजूर है। तुम्हारा फैसला हमें मंजूर नहीं है।”
पंच मुँह बा गए। वे एक दूसरे का मुँह देखने लगे। उजयारी झटका से घूमी और सीधे अपने घर को चली गई।  

लखनलाल पाल
कृष्णा धाम के आगे अजनारी रोड नया
जीवन परिचय
नाम – लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा आदि में कहानियां प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001
ई-मेल – [email protected]         रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश


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9 टिप्पणी

  1. *औरत की कोई जाति नहीं होती*

    *डॉ०रामशंकर भारती*

    अंतरराष्ट्रीय पत्रिका *पुरवाई* में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार लखनलाल पाल की कहानी *उजयारी बहू* समाज में आदिमयुग से चले आरहे जातिवाद, जातिभेद, पंचायतों की तालिबानी सोच, पाखण्ड और प्रपंचों के मकड़जाल को बुरी तरह से छिन्नभिन्न करती हुई तमाम सामाजिक विद्रूपताओं को बखूबी वेनकाब करती है। यह कहानी स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक बनकर उभरी है। इक्कीसवीं सदी के गाँवों में भौतिक बदलाव भले ही आया है मगर आज भी गाँवों में जातिगत संकीर्णताओं के आलमदार पंचों के प्रेत गली-गली डोलते हुए जातिवाद के गठजोड़ की आड़ में समाज को दुहते रहते हैं। अपने व्यक्तिगत स्वार्थो, धंधा, दबंगई और वर्चस्व बनाने के लिए यह तथाकथित पंच, सरपंच ऊपर से जितने उजले दिखते हैं भीतर से उतने ही काले-कलूटे होते हैं। उनके चरित्र को क्या कहने – *मुर्गा-दारू और….* में बिकने वाले ये काँइया लोग गाँवों में हर जाति-बिरादरी में पाए जाते हैं। जो सीधे-साधे लोगों का शोषण करने का ही कारोबार करते हैंं। गाँवों, कस्बों से लेकर शहरों तक इस तरह के पंच और ठेकेदार बिना ढूंढे मिल जाएंगे।
    . वास्तव में ‘उजयारी बहू’ स्त्री अस्मिता की सशक्त प्रवक्ता है। वह सामाज की दकियानूसी सोच के आगे समर्पण नहीं करती बल्कि प्रतिपक्ष में तनकर खड़ी हो जाती है। जिसके कारण इन तथाकथित पंचों की हवा निकल जाती है। हम कितने ही पढ़े-लिखे हो जाएँ, कितनी भी सामाजिक समरसता की दुहाई देते रहें, स्त्री सम्मान की बातें करते रहें, लेकिन हमारी भीतरी हकीकत कुछ और ही है। हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के कुछ और जैसी बात है।
    दूसरी बात इस कहानी में इसकी जो बुनावट है, इसका जो कला पक्ष और संरचना है वह बहुत अनूठी है। पात्रों के नामकरण से लेकर उनके चरित्र चित्रण को प्रदर्शित करने में कथाकार लखनलाल पाल ने व्यंग्य मिश्रित हास्यरस का जो तड़का लगाया है वह बेजोड़ है। उस पर डौल, टेसुआ, पोले द इयाँ, सुरैधा, तन्ना फुसकी,ठनगन और सैंके- मैंके जैसे ठेठ देहाती शब्दों की मिठास का जायका कहानी में एक अलग आस्वाद उत्पन्न करता है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कहानी में सोच-सोच कर शब्द प्रायोजित किए गए हों। एक स्वाभाविक संवाद, परिसंवाद नदी के पानी की तरह बहता रहता है।
    गाँवों में 25% से अधिक पुरुष अविवाहित रहते हैं। हर टोला मोहल्ले में दो-चार रडु़आ-ठलुआ आपको यूं ही घूमते मिल जाएंगे। छिंदवाड़ा, नागपुर, उड़ीसा, बिहार आदि क्षेत्रों से दलालों के माध्यम से वहाँ से विवाह योग्य और कभी-कभी कच्ची उम्र की लड़कियों को वहाँ उनके परिजनों व ठेकेदारों को नेगदस्तूर चुकता करके उनको वहाँ से बुंदेलखंड के गाँवों में लाया जाता है। जिनके यहाँ ये आयातित लड़़कियाँ *उजयारी बहू* बनकर आतीं हैं उसे बछिया कराके समाज को पाँत देनी पड़ती है। दूसरे राज्यों व शहरों से बिहायता बनकर आईं ये महिलाएँ बेहद मेहनती व कामकाजी बनकर एक सफल दांमपत्य जीवन गाँव में जीती हैं। मैं ऐसी अनेक महिलाओं को जानता हूँ जो अपने मां-बाप को छोड़कर अपना समाज गाँव को छोड़कर आई हैं या उन्हें खरीदकर लाया गया है, उन्होंने वहाँ भीषण गरीबी भोगी है। शोषण झेला है, अब वे उस त्रासदी से मुक्त हो गई हैं और गाँवों में बिहायता बनकर शान से रह रहीं हैं।
    सच कहूँ,औरत की कोई जात नहीं होती। औरत जिस जाति में ब्याही दी जाती है, वही उसकी जाति हो जाती है। हाँ, जाति तो मर्द की ही होती है। इसीलिए तो वह अपनी जाति की मूँछ ऐंठता फिरता है उजयारी बहू कहानी के भीतर के संदेश पर भी हमें विचार करना होगा। कथाकार के नाते लखनलाल पाल के भीतर जो आग धधक रही है, समाजिक विसंगतियों और नाइंसाफियों को लेकर उनकी जो छटपटाहट है, विद्रोह है, उसे *उजयारी बहू* पुख्ता तौर बयान करती नजर आती है। यह कहानी हमें बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है। हम कितने ही आधुनिक हो जाएं स्त्रियों के प्रति हमारा नजरिया वही है जो हजारों साल पहले था। यह नजरिया कब बदलेगा…? औरत कब तक एक जिंश बनी रहेगी …? कब तक वह बेची और खरीदी जाती रहेगी..? कब तक नामुराद मुसंडे उसका शोषण करते रहेंगे. ..? कब टूटेगा समाज को तोड़ने वाला जातिवाद का गठजोड़… ?
    जैसे यक्ष प्रश्न *उजयारी बहू* ने हमारे सामने रखे हैं…
    आखिर कब तलाशेंगे हम इन सवालों के जवाब..?
    आखिर कब तक….?

    आदरणीय पाल साहब
    आपकी यह सशक्त कहानी एक उपन्यास का भी दरकार रखती है।

    • भारती जी आपको दिल से शुक्रिया
      लेखक कहानी लिख देता है और अपने पात्रों के साथ साथ बहता चला जाता है। वह नहीं जानता है कि पाठक इस पर क्या सोचेंगे, क्या रिएक्ट करेंगे। उसको कौन सी बात अच्छी लगेगी और कौन सी में मुंह बनाएगा। लेकिन आपने कहानी को संपूर्ण रूप से देखा है उसको परखा है वह मुझे आश्वस्त करती है कि मैंने समाज के बीच का जो चरित्र उठाया है वह स्थान विशेष का न रहकर पूरे क्षेत्र का,पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता हुआ आपने दिखा दिया है।
      यह घटना ३३ साल पुरानी है। जहां पंचायत हो रही थी उसमें मैं भी भागीदार था। मैं इस पटल के माध्यम से बताना चाहता हूं कि अपनी किसी भी कहानी या उपन्यास में स्वयं पात्र बनकर कभी नहीं आया हूं। कहानियां मैंने प्रथम पुरुष में लिखी है तब भी मैं उनमें नहीं था ।लेकिन इस कहानी के एक छोटे से पात्र के रूप में मेरी उपस्थिति है। शन्नो जी ने उस पात्र के संवाद को अपनी टिप्पणी में रखा है।
      स्वयं की प्रशंसा मुझे असहज करती है। हां रचना की प्रशंसा कोई विद्वान करता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। कहानी की ऐसी समीक्षाएं मेरा दिन बना देती है। मैं दिन भर इन्हीं में खोया हुआ खुश रहता हूं। खुश रहने के लिए भी तो कारण चाहिए होता है न। ये कारण मेरे लिए पर्याप्त है।
      भारती जी इतनी बढ़िया समीक्षा के लिए आपको दिल से शुक्रिया

  2. आदरणीय लखनपाल जी ने उजियारी बहू के रूप में एक तीखा प्रश्न पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है । भाषा की दृष्टि से देखें तो बहुत ही सधी हुई भाषा में, साहित्यिक भाषा में यह कहानी लिखी गई है। स्त्री को वस्तु सदियों से समझा जा रहा था और आज भी गाँवों में वही स्थिति है। शहर में भी अक्सर यह स्थिति देखने को मिल जा रही है। प्रश्न उठता है आखिर कब तक ऐसा ही चलता रहेगा? इसे ही शब्द दिया है लखनपाल जी ने।
    अंत में उजियारी बहू का पंचों के फैसले को नकारना या अस्वीकार करना वक्त के परिवर्तन का उद्धोष करने जैसा है। स्त्री अब स्वयं को इंसान के रूप में देखना चाहती है और इसके लिए वह खुद के लिए स्वयं ही खड़ा होना सीख रही है। यह नई युग की अंगड़ाई है। लेखक को बहुत-बहुत बधाई।

  3. नीलम जी, आपने कहानी पढ़ी और इतनी प्यारी टिप्पणी लिखी। मन प्रसन्न हो गया। आपका बहुत बहुत आभार

  4. कहानी उजियारी बहू की शुरुआत प्रिय कथाकार लखन लाल पाल जी ने बहुत ही शानदार ढंग से की है कहानी की शुरुआत में ही बुंदेलखंड की काली माटी की महक और यहां पैदा होने वाले ताकतवर गेहूं कटिया गेहूं की गमक आने लगती है।
    आज भौतिकवादी युग में लोगों को गुणवत्ता नहीं चाहिए ज्यादा मात्रा चाहिए आज यह गेहूं भी अंतिम कगार पर पहुंच गया है क्योंकि इसकी फसल दूसरे गेहूं की अपेक्षा बहुत कम होती है और लेखक ने ग्रामीणपंचायतो की तुलना इसी गेहूं से करते हुए कहते हैं कि जब से देश में कानून व्यवस्था मुहाल हुई है तब से ग्रामीण पंचायते भी लगभग समाप्त सी होती जा रही हैं , परंतु अभी भी दूर दराज गांवों में पंचायती व्यवस्था का पूर्ण असर दिखाई देता है।
    उजियारी बहू, कहानी में ग्राम का रघुवा पैंतीस हजार में अपने लिए पत्नी खरीद कर ले आता है लेकिन गांव का नियम है की बिना हम ब्याह ही बहू को परिवार में रखने के लिए सामाजिक तौर पर डाढ़ भरना या दंड भरना पड़ता है तभी समाज उसे अपनी बिरादरी में सम्मिलित करते हैं अन्यथा दंड न भरने पर ना वह समाज के किसी व्यक्ति के हाथ का पानी पी सकता है ना पिला सकता है,
    रघुवा का पिता चतरा बिरादरी में सम्मिलित होने के लिए ग्राम की पंचायत बुलवाता है ,पंचायत में चतरा,रघुआ और उजियारी बहू के वाद संवाद पंचों से होते हैं ,महत्वपूर्ण बात अंत में ये होती हे कि उजियारी बहू पंचों की बातों का करारा जवाब देती हे और फैसला भी स्वयं घोषित करती हे ।
    इस कहानी के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं ,पहला ग्राम की पंचायतों का स्थान से लेकर बैठक का दृश्य लेखक ने बहुत ही सुंदर व्यवस्थित तरीके से खींचा हे ,बैठक पंचों के मत ,सभा में बैठे ग्रामीणों की खुसुरपुसुर बातें इत्यादि ग्रामीण जीवन की झलक दिखलाती हैं ,
    जब पंचायत उजियारी बहू को पंचों के सम्मुख बुलवाती हे और उसकी जाति पूछती हे ,तब बहु कहती हे कि गेहूं की कई जातियां बदल गई परन्तु इंसान की जात न बदली
    पंच दंग रह जाते हैं सोचते हैं माटी की हंडिया पर माटी का ढ़ककन ,पारा रखकर हंडिया का मुंह बंद किया जा सकता हे पर इस तेज बहु का मुंह,,,
    दूसरी बात ग्रामीणों के बीच में युवा पढ़ा लिखा लड़का बलू कहता हे जमाना कहां से कहां पहुंच गया ,आप लोग जाति में अटके हो
    पंच बलू की बात का विरोध करके उस पर दस किलो गुड का दंड लगा देते हैं ,,मगर बलू अपनी बात पर अडिग हे
    तीसरी बात कहानी में हास्य भी भरपूर हे ,जिन घरों में स्त्रियों का वर्चस्व होता हे ,ऐसे घर में गांव को एक स्त्री पंचायत में शिरकत करने जाने से पहले पति को हिदायत देती हे ,सुनो पुन्नू के नन्ना
    रघुआ को अच्छों दाढ़ लगवाईयो ,तुम लडुआ के भूखा भले चले जाओ ,में नई जेहों ,,,,,
    अंत में पंचायत जब पच्चीस हजार रुपए दंड कच्चा पक्का खाना तय करता हे बिरादरी में मिलने के लिए
    तो उजियारी बहू कड़क आवाज में विरोध करते हुए कहती हे
    मुझे यह दंड मंजूर नहीं पच्चीस हजार दंड भरने में मेरा पति मजदूरी करते करते थक जायेगा और मेरा बूढ़ा ससुर चिंता में मर जाएगा ,इससे तो हम बिरादरी से बाहर ही अच्छे हैं , जाति से कुजात सही ,कहकर मुड़कर पंचायत से चली जाती हे
    सारे पंच मुंह बाए अवाक ,ठगे से रह जाते हैं
    उजियारी बहू का निर्णय इस कहानी का सबसे शानदार पक्ष है आज की स्त्री की आवाज हे,जो अबला नहीं हे , बलू जैसे युवाओं की होशियार पढ़ी लिखी पौध हे जो समाज का देश का भविष्य बनाने वाले हैं ,आदमी में हिम्मत होनी चाहिए ,अगर हम सही हैं तो हमसे समाज हे ,समाज से हम नहीं।
    इतनी सुंदर संदेशात्मक स्त्री का गुण गान करती कहानी के लिए
    प्रिय लखनलाल जी आपको मेरा कोटि कोटि धन्यवाद

  5. कुंती जी आपने कहानी का रेशा रेशा बीन लिया है। कुछ चीजें तो कहानीकार भी नहीं सोच रहा था कि समीक्षक इस भाग को ऐसे भी देखेगा। आपने उन चीजों को एक अलग ढंग से परखा है। पूरी कहानी की समीक्षा कर दी है आपने। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका

  6. इस कहानी ने गांव की पंचायत का काला चिट्ठा खोलकर रख दिया बहुत बहुत शुभकामनाएं

  7. ‘दसबीघा’ में लहलहाती बोलियों की फ़सल – डॉ० रामशंकर भारती
    ••••••••••••••

    वरिष्ठ कथाकार डॉ० लखनलाल पाल लोकजीवन के विलक्षण चितेरे के रूप में सुविख्यात हैं। उनकी आँचलिक जीवन की कहानियों में ग्रामीण समाज व समय का परिवेश, वहाँ के प्रपंच, परिस्थितियाँ और परिणाम अपने यथावत् रूप में अभिव्यक्त होते हैं। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई’ में ही पूर्व प्रकाशित उनकी कहानियाँ ‘पेंशन’ तथा ‘उजयारी बहू’ को मैं इसी संदर्भ में देखता हूँ…
    ‘पुरवाई’ के ताजा अंक में प्रकाशित लखनलाल पाल की कहानी ‘दसबीघा’ कभी हँसाती है, कभी रुलाती है, तो कभी ऊहापोह में डालती है। एक कहानी तीन-तीन काम एक साथ करती हुई नज़र आती है।
    रगबर बाबा के बहाने उन्होंने गाँवों के संकीर्ण सोच के सनकी बुजुर्ग की मनःस्थिति का जीवंत चित्रण किया है। जैसा उन्होंने कहानी में लिखा है, वैसा गाँवों में होता भी है और मुझे लगता है कि जैसा गाँव में होता है, वैसा ही उन्होंने कहानी में लिखा है। डॉ०लखनलाल पाल जैसे लेखक से गाँव को पृथक नहीं किया जा सकता है। गाँव उसके मानस में सदैव कुलाँचे भरता रहता है। कहानी में जहाँ गाँवों में लंबे पाँव पसार चुके विसंगतियों, विद्रूपताओं और विडंबनाओं के अनेक वीभत्स दृश्य नानाविध देखने को मिलते हैं, वहीं गाँववालों की संकीर्ण मानसिकता, उनकी सनक, हनक और अपनी झूठी शानशौकत की खातिर मानवीय संवेदनाओं एवं जीवनमूल्यों की धरती को बंजर-ऊसर और बाँझ बनाते, यत्रतत्र सर्वत्र अपना अँगद पाँव जमाए बैठे ‘दसबीघा’ के मालिक और नायक रगबर बब्बा जैसे चरित्र अपनी धमाकेदार उपस्थित लेकर मौजूद रहते हैं। सेंतमेंत में मूँड़ व घर फुटउवल कराने वाले शंभू जैसे कांइया किस्म के खुराफाती लोगों को बेनकाब करने का काम भी यह कहानी बखूबी करती है…
    कहानी में गालियों के अनेक मौलिक संस्करण उभर के आए हैं। भदेस शब्दों के सहज प्रयोग से कहानी अपने किरदारों के यथार्थबोध के साथ न्याय करती नजर आती है। ऐसा लगता है कहानीकार ने ‘गारियों’ के मनोविज्ञान को कहानी के वातावरण से मेल बैठाने की भरपूर कोशिश की है। ‘दसबीघा’ की चौहद्दी में देसज तथा भदेस बोलियों के शब्दों की फसल लहलहाती नजर आती है। ‘दसबीघा’ में कुछ शब्द चित्र तो इतने मारक और सम्मोहक हैं कि उन्हें निगलने का मन करता है, मगर क्या करें बाद में टेंटुआ फटने के डर मनमसोस का रहना पड़ रहा है। अब इन्हें निगलूँ या न निगलूँ उन्होंने मुँह में पानी तो भर ही दिया है।
    अगर इन गरियाए शब्दों के अर्थबोध के भीतर उतरें तो हम बिना डूबे-उतराए बच नहीं सकते। कुछ शब्दों की बानगी यहाँ रखूँ, उससे पहले गोस्वामी तुलसीदासजी की एक चौपाई उद्धृत कर रहा हूँ-
    भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी।
    राम कथा जग मंगल करनी।।
    ऊपर दी गई चौपाई के अंतःआलोक में मुझे ‘दसबीघा’ की ‘गारियों’ और उसकी भदेसता में लोकमंगल ही लोकमंगल दिखाई दे रहा है। ‘दसबीघा’ में लहलहाते कुछ लोकमुखी शब्दावली यथा- दांदस, दोंथर, किलकियाऊ, हगता, टसुआ, डूंड़, टैनी, लादपांदकर,चुदना के, उसकारे, सुरुआ, दमार, डौरा, तातेश, पोंदन , भौसड़ौ, चुदना, नकुवन, निनुरना, डुकर आदिक प्रयोग से कहानी और भी समृद्ध हुई है।
    हालांकि इस प्रकार के ‘गरियाने’ में मेरी अरुचि अवश्य है।
    मगर रगबर बब्बा जैसे सनकी और उनसे भी ज्यादा गंदी गालियाँ देने वाले डुकर गाँवों में अभी भी मौजूद हैं …
    ‘दसबीघा’ कहानी की खिलंदड़ भाषा ठिठकती-ठुमकती हुई चलती है। जिसके कारण कहानी में जबरदस्त भाषाई प्रवाह विद्यमान है। यह प्रवाह ही ‘दसबीघा’ कहानी की प्राणवत्ता है। तमाम अंतर्विरोधों से जूझते थोथे दंभी रगबर बब्बा, बब्बा की काँख से चिपका रहने वाला राम सींग, सरमन और बहू के साथ ही उसका बच्चा जनाने आईं दाई जैसी पड़ौसी महिलाओं की आपसी सहज चुहल बब्बा… क…की फ…ट…ग .. जैसी शब्दावली की माँसल-गंध बरबस मन मोह लेती है।
    ग्रामीण परिवेश की एक सशक्त और मजेदार कहानी ‘दसबीघा’ के लिए आपको हार्दिक बधाई। डा.रामशंकर भारती, झाँसी

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