दिल्ली, मेरे ख्वाबों और मेरी आरजुओं का शहर। दिल्ली, जो कभी ‘दिलवालों की दिल्ली’ के नाम से मशहूर हुआ करती थी। वही दिल्ली अब ओपेन गैस चैम्बर के नाम से भी जानी जाती है । दिल्ली, जो सुल्तानों की लूट से लेकर शायरों का महबूब शहर हुआ करता था।जिस दिल्ली के बारे में उस्ताद शायर साहब ठंडी आह भरकर कहा करते थे “कौन जाए जौक,दिल्ली की गलियां छोड़कर”।उसी दिल्ली में तन -मन की बदहाली के बाद मुझ जैसे कलमकार को डॉक्टर का हुक्म हुआ कि “हवा पानी बदलो। दिल्ली से कम से कम सौ किलोमीटर दूर चले जाओ।तो शायद बच जाओ और सौ साल तक जियोगे। नहीं प्रदूषण के पंजे में आ गए तो खांस –खांस कर ज़िंदगी की ख़ुशहाली पर झाड़ू लग जायेगी । दिल्ली की हवा अब जानलेवा गैस बन चुकी है और पानी में इतनी गंदगी व्यापत हो गई है कि नयनाभिराम कमल खिलने के बजाय बजबजाती हुई जलकुंभी ही अटी पड़ी रहती है ।सो बेहतरी इसी में है कि कुछ वक्त के लिए पहाड़ या गांव चले जाओ”।
डॉक्टर की तजबीज “पहाड़ या गांव” वाली बात मेरे दिमाग मे कुलबुलाने लगी।
दिल्ली के आसपास की जो पहाड़ वाली जगहें थीं वहाँ के ठहरने का किराया पहाडग़ंज के होटलों से भी महंगा था। और रहा सवाल गाँव का तो ? दिल्ली के जिस इलाके में अपना जीवन गुजार रहा था वह गांव ही कहलाता था। ऐसा इलाका जहां बिल्डिंग्स और महंगाई आसमानी थी फिर भी नाम था गांव।
यानी उत्तराखंड के महंगे पहाड़ और यश चोपड़ा की फिल्मों वाला पंजाब का गाँव ,दोनों ही मेरी पहुंच से बाहर थे। सो मैंने अपने ही पुश्तैनी गांव की राह ली जो कि यूपी के अवध की तराई में था । यूपी का वही गांव जिसमें मैं पैदा तो हुआ था पर कभी रहा नहीं था । और जिससे मुझे एक अनजानी चिढ़ थी दिल्ली में रहते हुए भी। उन्हीं गांव वालों के घर जा रहा था जो दिल्ली में अपनत्व के कारण यूँ ही अकारण हमसे मिलने चले आते थे ।पर उन्हें देखकर मैं जल-भुन जाया करता था और उनके रहन -सहन तथा पहनावे को देखकर कहता था “देहाती कहीं के”।
अचानक दिल्ली से गांव जाने के लिए रेल आरक्षण मिलना मुश्किल था ।
दिल्ली के नकली गांव से अपने असली गांव जाने के लिए मैनें अपना सामान पैक किया दिल्ली को हसरत भरी निगाह से देखकर एक मारूफ शायरा का शेर पढ़ा –
“कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये ,
और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी ” ।
दिल्ली के रेलवे स्टेशन से ट्रेन में सीट न मिलने की वजह आनंद विहार से यूपी रोडवेज की बस पकड़ी और फिर बस अड्डे से बस के बाहर आते ही “वेलकम टू यूपी”।
रात भर के सफर के बाद सुबह -सुबह ही मैं अपने गांव पहुँच गया। वही गांव जिसका रेशा – रेशा खुरच कर अपने वजूद से मैं काफी पहले ही उतार चुका था । उतारना क्या ? वास्तव में दिल्ली में पले-बढ़े होने के कारण गंवई रंग और देहातीपन मैंने खुद में कभी आने ही नहीं दिया था। मुझे तो दिल्ली के अपने उस इलाके से भी चिढ़ हो जाती थी जब साइनबोर्ड पर इलाके के नाम के आगे गांव लगता था ।मैं मन ही मन बुदबुदाता “हे भगवान, ये दिल्ली जो कॉलोनी और पुरी के उपनामों से भरी हुई थी। वहाँ पर मेरे हिस्से में गांव का ही निवास आना था”। जिस गांव शब्द से ही मुझे इतनी चिढ़ थी आज मैं उसी गाँव की पनाह में था। गांव, गंवईपन, ग्रामीण और देहातीपन से मुझे एक खास किस्म की खीझ रहा करती थी।
वैसे अब दिल्ली से भी खासी बेजारी थी। सो गांव में मन लगने के आसार थे मगर गांव के अपने रंग -ढंग भी थे।
गांव पहुंचा तो कुल -खानदान के लोगों ने आत्मसात कर लिया। वही गांव जो मेरे लिए शर्म था मगर गांव के अपने कुनबे के लोगों के लिये अब मैं गर्व था। गांव में मुझे मिले रामजस काका जो मेरे ही समवय थे मगर रिश्ते में काका लगते थे। वह पैदा तो मुंबई में हुए थे और शुरू के कुछ वर्षों तक मुंबई के कान्वेंट स्कूल में पढ़े थे मगर बाद में समय का चक्र ऐसा घूमा कि उनके जीवन के अगले तीन दशक गांव में ही बीते और अब गांव में ही रम गए थे। पहले ग्राम प्रधान हुआ करते थे मगर फिलवक्त सात वोटों से प्रधानी हार गए थे। वह जान गए कि मैं अचानक गांव आया हूँ तो जरूर सब कुछ सामान्य नहीं है। वह रहते तो गांव में थे मगर उनके अंदर का शहर उनके जेहन और जीवन से निकल नहीं पाया था। मेरे स्वास्थ्य की समस्या के बारे में जानकर उन्होंने मुझे तसल्ली दी कि शुद्ध हवा, पानी ,भोजन का प्रबंध तो वह कर देंगे मगर गांव की पॉलिटिक्स और परसेप्शन में अगर मैं उलझा तो मैं शहरों के रास्तों से ज्यादा कन्फ्यूज हो जाऊंगा। गांव का अपना रंग-ढंग और चलन होता है। आज के गांव न तो यश चोपड़ा की फिल्मों की तरह सुंदर और हरे-भरे हैं और न ही मैथली शरण गुप्त के “अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है ” की तर्ज पर सहज-सरल रह गए हैं। गांव में खूंटा और नाली के विवाद के मुकदमे ढोते -ढोते दो पीढियां गश्त हो जाती हैं। गांव में सब कुछ सहज -सरल नहीं होता यहाँ की बौद्धिक जुगाली “लुटियंस जोन” के स्तर की होती है । जिस तरह वहाँ एक ड्रिंक पर सरकार बनाने या गिराने के दावे किए जाते हैं वैसे ही गाँव में जो बंदा कभी जनपद मुख्यालय से बाहर नहीं गया हो वह देश के किसी भी सेलेब्रिटी और वीआईपी से अपनी अंतरंगता के किस्से सुना सकता है । मैंने उनकी बातों को सजगता से सुना और गांठ बांध ली कि किसी भी घटना या वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी है ।न ही अच्छी और न ही बुरी बस तटस्थ रहना है ।
अलसुबह मुझे रामजस काका अपने साथ घुमाने निकले। उन्होंने कहा “गाँव में कोई मेरा नाम नहीं लेता। बहुत सारे लोग मुझे रामजस के शार्ट फार्म में आरजे बुलाते हैं।कुछ लोग प्रधान जी भी कहते हैं। आओ तुम्हे गाँव के कुछ रंग-ढंग और परशेप्शन बताता हूँ ” ।
मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा –
“गांव में अगर तुम्हारे जैसे महानगर से आया हुआ आदमी महीने भर से ऊपर ठहर जाए तो गांव वाले यही समझेंगे कि इस आदमी की नौकरी चली गई है। भले ही तुम्हारे खर्चों में उन्हें कोई कटौती नजर न आये मगर वह तुम्हे बेरोजगार ही समझेंगे”।
अपने को लेकर मैं कुछ जवाब दे पाता इससे पहले उन्होंने आगे कहा –
“और अगर रोज सुबह दौड़ने निकल जाओ तो गांव के लोग मान जाएंगे कि इस बंदे को शुगर हो गया है । यहाँ सुबह की दौड़ को फिटनेस से नहीं बल्कि शुगर से जोड़ा जाता है “।
अब तो मुझे भी उनकी गंवई बातों में दिलचस्पी आने लगी। मुझे मुस्कराते हुए देखकर उन्होंने उत्साह से आगे कहा –
“ अगर कम उम्र में ही ठीक- ठाक कमा कर औऱ लौट कर गांव में पर्याप्त खर्चा करने वाले इंसान के बारे में आधा गाँव मान लेता है कि शहर में जरूर यह आदमी दो नंबरी काम करता होगा।और अगर उस इंसान ने जल्दी शादी कर ली तो गांव में यह आम धारणा बन जाती है कि उस शख्स का बाहर कुछ इंटरकास्ट चक्कर चल रहा होगा इसीलिए घर वाले फटाफट शादी कर दिए”।
यह बात भी मुझे काफी मजेदार लगी।
रामजस काका ने मुस्करा कर कहा “ अगर लड़के की नौकरी लगी है और लड़का किसी वजह से शादी में देर कर रहा है तो लोगों का मेन आक्षेप यह रहेगा कि या तो लड़के के घर में बरम है या तो लड़का मांगलिक है। लोग बाग किसी गृहदोष या हैसियत से ज्यादा दहेज मांगने की बातें बनाने लगते हैं”।
मुझे उनकी बातों में काफी लुत्फ आया ।
रामजस काका ने उनकी बातों से मुझे मिले लुत्फ को भांपकर आगे कहा –
“और अगर कोई शादी बिना दहेज़ का कर लिये तो ज्यादातर गांव में कहेंगे कि लड़की प्रेगनेंट थी पहले से ही इज़्ज़त बचाने के चक्कर में लव मैरिज को अरेंज मैरिज में कन्वर्ट कर दिये लोग”।
रामजस काका की इस बात से मुझे काफी मजा आया । गांव की पहली सुबह में ही सतत मुस्कान मेरे अधरों पर खेलने लगी थी।
रामजस काका ने कहा
“गांव के युवकों के बारे में दो चार मजेदार बातें और सुनो जिनसे वो दो -चार होते हैं ।
पहला अगर कोई युवक खेत के तरफ झाँकने नही जाता तो गांव में लोग कहते हैं कि अभी बाप का पैसा है तभी उधर खेत -वेत झांकने नहीं जाता।दूसरे कुछ बरस बाद जब गांव वालों के तानों से आजिज होकर वही लड़का खेती -किसानी में रुचि लेने लगता है तब लोग कहते हैं कि देखा धीरे -धीरे चर्बी उतरने लगा है”।
यह विरोधाभास सुनकर मेरी हंसी छूट गई।
रामजस काका ने भी हंसते हुए कहा –
“ज्यादा हंसो मत । तुम जैसे शहर से गांव लौटे लोगों के बारे में भी आमतौर गाँव के लोग क्या समझते हैं ?यह भी सुनो ध्यान से ।अगर महानगर से मोटे होकर गांव आये तो गांव में यह आम राय होती है कि जरूर यह बंदा शहर में बीयर पीता होगा। और कहीं बंदा दुबला होकर गांव आये तो मान लेते हैं जरूर बंदा शहर में गांजा- चिलम पीता रहा होगा तभी उसे टीबी हो गया है और अब अपनी सेहत सुधारने गांव आया है।
मुझे अपनी दुबली-पतली सेहत का ख्याल आया तो थोड़ा अजीब भी लगा कि गाँव में लोग मुझे चिलमची या टीबी का मरीज समझेंगे।
रामजस काका ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा “और सुनो, अगर बाल बढ़ा के गांव लौटो तो गांव में काफी सारे लोगों को लगता है यह बंदा किसी ड्रामा कंपनी में नचनिया का काम करता है। हालांकि अपनी दरवाजे पर होने वाली नौटँकी नाच को भी गांव वाले आर्केस्ट्रा कहते हैं और वहीं दूसरा कोई किसी बड़े आर्केस्ट्रा में भी काम करे तो उसे नचनिया पुकारेंगे।कुल मिलाकर गाँव में बहुत मनोरंजन है। यहां कोई डिप्रेशन में नहीं आता और ये बतकहियां ही मनोचिकित्सक का काम करके मन की पीड़ा सोख लेती हैं”।
तब तक किसी ने उधर से कहा “गुड़ मॉर्निंग आरजे । हू इस दिस कूल ड्यूड विथ यू “ यह कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ हैंडशेक के लिए हाथ बढ़ाया।
“पाँय लागी मास्टर जी ,यह घर का ही लड़का है कूल ड्यूड नहीं। आपके प्रिय शिष्य रामकिशोर का बेटा राम प्रकाश है।दिल्ली से हवा-पानी बदलने गांव आया है” कहते हुए रामजस काका ने मुझे उनके पैर छूने का इशारा किया ।
मैं उनके पैरों पर झुकने लगा तो उन्होंने मुझे बीच में रोकते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और हंसते हुए कहा।
“हाथ मिलाओ यंग मैन । आई एम वेरी मॉडर्न। पर तुम ठहरे देहाती कहीं के”।
प्रिय दिलीप जी आपके द्वारा रचित व्यंग सदेव मुझे लुभाते हैं हंसाते हैं ,वे सचमुच अपनी जमीं पर खड़े उतरते हैं इसमें गांव की यात्रा पर निकला नायक जब हम उम्र काका से गांव के अलग अलग लोगों से रूबरू होता हे ,वह सब अनूठा हास्य से भरपूर हे उसमें चित भी गांव वाले की पट भी गांव वालों की
देहाती।के नाम से नायक को चिढ़ होती थी ,वही संबोधन खुद के लिए सुनकर उसकी भी हंसी निकल जाती है
बहुत खूब
प्रिय दिलीप जी आपके द्वारा रचित व्यंग सदेव मुझे लुभाते हैं हंसाते हैं ,वे सचमुच अपनी जमीं पर खड़े उतरते हैं इसमें गांव की यात्रा पर निकला नायक जब हम उम्र काका से गांव के अलग अलग लोगों से रूबरू होता हे ,वह सब अनूठा हास्य से भरपूर हे उसमें चित भी गांव वाले की पट भी गांव वालों की
देहाती।के नाम से नायक को चिढ़ होती थी ,वही संबोधन खुद के लिए सुनकर उसकी भी हंसी निकल जाती है
बहुत खूब
हार्दिक आभार कुंती जी,सादर