इस वर्ष भी सर्दी की छुट्टियों में जब मैं मायके आई तब हमेशा की तरह सबसे पहले माँ से निर्मला आंटी के बारे में ही पूछा।
“अभी माँ से ठीक से मिली भी नहीं और तुझे निर्मला आंटी की याद आ गई!“ माँ ने हँसते हुए उलाहना दिया।
“माँ…!” मैं लड़ियाते हुए उनसे लिपट गई।
“रहने दे-रहने दे, अब ज्यादा लाड़ मत दिखा।“ माँ ने रूठने का अभिनय किया फिर बताया कि वे भी बहुत दिनों से उनके घर नहीं जा पाई हैं। मैं जाने को तैयार हुई तो माँ ने रोक दिया।
“थकी है, कल चली जाना।” थकान तो थी ही सो मैं भी कल जाने की सोच कर वहीं दीवान पर लेट गई।

निर्मला आंटी का घर मेरे घर के पास ही है। माँ और आंटी बहुत अच्छी सखियाँ हैं। इस लिए दोनों घरों में बहुत ही घरेलू सम्बन्ध है। बचपन में एक बार माँ को मियादी बुखार चढ़ गया था। वे बुरी तरह कमजोर हो गई थीं। उसी दौरान मुझे चेचक भी निकल आई। उस समय पापा सरकारी दौरे पर थे। ऐसे में आंटी ने मेरी दवा से ले कर पथ्य तक का ध्यान रखा था। तबसे जैसे निर्मला आंटी के रूप में मुझे एक और माँ मिल गई थीं। 
बचपन में मैं हमेशा आंटी के घर जाने के लिए बहाने तलाशती रहती थी। आंटी का बड़ा बेटा उमेश और मैं हमउम्र हैं। महेश हमसे दो साल छोटा। हम तीनों अक्सर खेल में लड़ जाते और हंगामा खड़ा कर देते; पर डाँट हमेशा उमेश को ही पड़ती, उसकी गलती हो या न हो।

पता ही नहीं चला कि खेलते-कूदते हम कब बड़े हुए और अपनी-अपनी गृहस्थी में उलझ गए। सोचते-सोचते न जाने कब मेरी आँख लग गई।
*  
अगले दिन आंटी के घर पहुँची तो वे अपने कमरे में लेटी थीं। मुझे देखते ही उनका चेहरा खिल उठा।
“अरे उर्मी बेटा! कब आई ?” कहते हुए उठ कर आंटी ने अपनी बाहें पसार दीं।
“कल ही आई हूँ आंटी। उनके गले लग कर बोली मैं।
घर में सब कैसे हैं? तेरी सासू माँ कैसी हैं ? तुझे अब ज्यादा तंग तो नहीं करतीं न!”
“अरे नहीं आंटी जी! अब तो वे भी आप की तरह ही मुझे बहुत स्नेह करती हैं।” मैंने हँस कर जवाब दिया। सुन कर वे मुस्कुरा दीं।
“आप की तबीयत को क्या हो गया ? माँ बता रही थीं कि आप अक्सर बीमार रहने लगी हैं।इस बार मैं गम्भीर थी। 
“कुछ नहीं रे! तेरी माँ तो बस् यूँ ही मेरे लिए परेशान रहती है। तू अपने बारे में बता।आंटी ने बात टाल दी थी।
तभी गेट खटका। आंटी जाने को हुयीं पर मैंने उन्हें रोक दिया और स्वयं जा कर गेट खोल दी। अंकल जी थे। मैंने उन्हें प्रणाम किया, वे भी मुझे देख कर हल्के से मुस्कुराए। मैं फिर से आंटी के पास आ कर बैठ गई।
हाउस टैक्स की फ़ाइल कहाँ है ?” तभी एक रूखी, कर्कश आवाज़ कमरे में गूँज गई। आंटी मेरा मुँह देखते हुए कुछ सोचने लगीं। जैसे कुछ याद कर रही हों। कमरे में सन्नाटा पसर गया। थोड़ी ही देर बाद उस सन्नाटे को रौंदती हुयी उसी आवाज़ के साथ अंकल जी भी प्रकट हो गये। 
सुनाई नहीं दिया क्या ? उनके चेहरे पर सख्ती थी और वाणी ऐसी जैसे कानों के रास्ते आत्मा तक को झुलसा दे! मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अंकल जी को मेरी तनिक भी परवाह नहीं थी।  
मुझे याद नहीं कि फ़ाइल कहाँ रखी है।” आंटी दबी आवाज में बोलीं।
रात-दिन पड़ी रहती हो पर कौन सी चीज कहाँ रखी है? इससे तुम्हें कुछ लेना-देना नहीं। इस घर के प्रति तुम्हारी कोई जिम्मेदारी है भी कि नहीं…! अंकल जी लगातार बोले जा रहे थे।
आंटी की आँखें धीरे-धीरे पनीली हुईं फिर छलक पड़ीं। उनके आँसू देख कर मेरा मन भीग उठा। तब तक अंकल जी ने जोर से आलमारी का दरवाजा खोला और फ़ाइल ढूँढना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में फ़ाइल मिल गई थी शायद, वे पैर पटकते हुए चले गए।

आंटी अपने आँसू पोंछ रही थीं और मैं चुपचाप उन्हें देख रही थी।
सच्च उर्मी! मैंने फ़ाइल कहाँ रख दी थी, तनिक भी याद नहीं। आज-कल कुछ भी याद नहीं रहता। कोई भी चीज कहीं भी रख कर भूल जाती हूँ। लगा जैसे आंटी की आवाज़ गहरे कुएँ से आ रही हो। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर जो फुलझड़ियाँ-सी फ़ूटी थीं, अब वहाँ छोभ पसरा था।
“ये तो मुझसे भी हो जाता है आंटी! कई बार चीज़ें रख कर भूल जाती हूँ। इसमें इतना मायूस होने की कोई बात नहीं है।“ बात बदलने की गरज से मैंने उनसे कहा पर मैं जानती थी कि अंकल जी के व्यवहार से वे आहत हुयी थीं। थोड़ी देर बाद आंटी से फिर आने को कह कर मैं घर आ गई।
मैंने माँ को सारी बातें बतायीं। सुन कर उनके चेहरे का रंग बदल गया था।
“निर्मला की जगह मैं होती न! तब उस आदमी को पता चलता; पर ये निर्मला भी जाने किस मिट्टी की बनी है।कह कर माँ गुस्से में दाँत पीसती हुई रसोई में चली गईं।
 
मैं माँ से कितनी बार सुन चुकी थी कि उन दोनों की गृहस्थी एक साथ ही शुरू हुयी थी; पर दोनों में बहुत अंतर था। माँ-पापा में कभी लड़ाई नहीं होती और कभी होती भी तो हम दोनों भाई-बहन उनकी लड़ाई के मज़े लेते। ऐसा लगता जैसे बचपन के दो मित्र किसी खिलौने के लिए या खेल में हार-जीत को ले कर आपस में झगड़ रहे हों और थोड़ी देर बाद ही सुलह; पर आंटी-अंकल जी को मैंने कभी हँसते-बोलते नहीं देखा।
बचपन में जब मैं उनके घर खेलने जाती तो कभी उनके चेहरे पर तो कभी बाँह, पेट, पीठ पर काला निशान देखती। उस समय मैं इन बातों को समझ नहीं पाती थी; पर जैसे-जैसे बड़ी होती गई धीरे-धीरे सब समझ में आने लगा। घर के बाहर दूसरों के लिए अंकल जी का व्यवहार जितना मधुर था आंटी के साथ उतना ही कटु।

पिछली बार जब मैं कानपुर आई थी तब मुझे आंटी का व्यवहार कुछ बदला हुआ-सा  महसूस हुआ था। चीजों पर गुस्सा उतारना, बात-बात पर झुंझलाना और कुछ कहते-कहते रुक जाना। आंटी के चेहरे पर अचानक आई ढेरों झुर्रियां और अस्त-व्यस्तता! ऐसी तो नहीं थीं वे।
“क्या हुआ आंटी? आप की तबीयत तो ठीक है?” एक दिन उनसे पूछ लिया था मैंने। 
“मुझे क्या होगा रे! पत्थर की जान है, गलने वाली नहीं।“ कहते हुए एक अजीब-सी हँसी उनके चेहरे पर थी।
“कुछ तो है आंटी! भले ही आप न बताएँ।“
सुन कर वे कुछ कहते-कहते रुक गई थीं। उनके चेहरे से लग रहा था जैसे बहुत कुछ कहना चाह कर भी कुछ कह नहीं पा रही थीं।
उस बार वापस जा कर मैंने उमेश को फोन पर कहा था, आंटी की हालत मुझे कुछ ठीक नहीं लग रही उमेश! उनका ध्यान नहीं रख रहे हो तुम लोग और अंकल जी को तो तुम दोनों मुझसे बेहतर जानते हो। कुछ कहते क्यूँ नहीं उन्हें?
तू ही बता उर्मी! मैं क्या करूँ ? कई बार समझा चुका हूँ। अब इस उम्र में पापा तो सुधरने से रहे। माँ भी घर छोड़ कर मेरे पास नहीं आएगीं। उमेश ने कहा था।
मैं निरुत्तर हो गई थी। तब से अब आई हूँ तो आंटी को बिस्तर पर देख रही हूँ।
*
उठ जा उर्मी ! चाय पी ले।माँ की आवाज सुन कर मैं चौंक कर उठ बैठी। 
क्या सोच रही है?” माँ ने चाय की प्याली थमाते हुए पूछा। 
आंटी के बारे में सोच रही हूँ। अंकल जी आज तक नहीं सुधरे!
क्या कहूँ! डरती हूँ कि उसके भीतर की घुटन, बेबसी और क्रोध, कहीं उसे ही न लील ले।कहते हुए माँ की आँखें नम हो गयीं।  
उसने तो निर्मला का जीवन ही तबाह कर दिया। मैंने निर्मला से कितनी बार कहा कि उस आदमी को उसकी सही जगह दिखा; पर नहीं, वह करवा चौथ और तीज का निर्जला व्रत रखती रही। उसके लिए, जिसने कभी उसकी भावनाओं की कद्र नहीं की। न ही वह सम्मान दिया जो उसे मिलना चाहिए। यहाँ तक कि निर्मला को कभी इंसान तक नहीं समझा उस आदमी ने। कह कर माँ अपने आँसू पोंछने लगीं।
 
अगले दिन जब मैं उनके घर पहुँची तब उन्हें काम करते देख बोल पड़ी, “तबीयत ठीक नहीं आपकी और आप काम में लगी हैं !”
“आज शाम को तुझे यहीं खाना है। हरी मटर की पूड़ी और खीर तुझे बहुत पसंद है न! उसी की तैयारी कर रही हूँ।”
“बिलकुल नहीं, आज आप दोनों का डिनर माँ बना रही हैं।” वही कहने आई हूँ। आप कुछ नहीं करेंगीं।” मैं उनके सामने से मटर की फलियाँ समेटते हुए बोली।
“ससुराल से आई है, एक दिन तो खा मेरे हाथ का!”
“मैं आपके हाथ का खाऊँ या माँ के हाथ का, एक ही बात है आंटी!  वैसे कुछ दिन के लिए आप किसी बहू को बुला क्यों नहीं लेतीं?”
वे दोनों भी अपने बच्चों की पढ़ाई से बँधी हैं रे! छुट्टी में ही आ पाती हैं।कह कर वे एक उदास हँसी हँस दी थीं।
तो आप ही चली जाइये उनके पास। वहीँ रहिए अब।” 
मैं…!प्रश्नवाचक निगाहों से देखा उन्होंने मेरी तरफ। मैंने भी सिर हिला कर हामी भर दी। 
न जाने क्या सोच कर वे चुप रह गई। 
कुछ दिन बाद मैं वापस शिमला लौट आई और घरेलू दायित्वों में ऐसी उलझी कि बहुत समय तक कानपुर जाने का मौका ही नहीं मिला।
मैं जब भी माँ के पास फ़ोन करती तब आंटी की खोज खबर जरूर लेती और माँ को भी बोलती कि वे आंटी के पास चली जाया करें। उन्हें अच्छा लगेगा पर माँ को भी कम ही समय मिलता था। वह और पापा भी अकेले ही रहते थे परन्तु वे दोनों एक दूसरे के पूरक थे। इस लिए मुझे माँ की चिंता कभी नहीं हुयी। मैं जानती थी कि माँ के सिर में दर्द भी हुआ तो पापा घर का सारा काम स्वयं ही कर लेगें। पापा एक पति के साथ मित्र और गुरु का दायित्व भी निभाते थे। कभी जब माँ से कोई काम बिगड़ जाता तो वे कितने स्नेह से उन्हें समझा दिया करते थे! मैं देखती ही रह जाती थी। मैं माँ को बोलती भी थी, मेरे लिए भी पापा जैसा पति क्यों नहीं ढूँढा ?” तो माँ मुस्कुरा देतीं।  
मृदुल बहुत अच्छे हैं पर पापा जैसे नहीं। कभी-कभी उनके भीतर का पुरुषोचित दंभ जाग जाता है लेकिन वह क्षणिक ही होता है; पर अंकल जी को भगवान ने न जाने किस मिट्टी से गढ़ा है
*
धीरे-धीरे दो वर्ष बीत गये। सासू माँ की बीमारी और बेटियों की पढ़ाई के कारण मैं मायके जा ही नहीं पायी। आज काम खत्म कर के घर फोन करूँगी। मन में सोच ही रही थी कि अचानक ही फोन की घंटी बज उठी। 
हेल्लो”
उर्मी…! बोलते हुए उधर माँ की आवाज़ काँप रही थी। 
हाँ माँ! क्या हुआ? सब ठीक न? मैंने घबरा कर पूछा।
“…………..”
हेल्लो! क्या हुआ माँ! कुछ बोलो तो! चुप क्यूँ हो आप? आशंका से मेरा दिल धड़क उठा था। 
उर्मी !” 
हाँ माँ !” 
निर्मला नहीं रही। कह कर उधर माँ सिसकने लगी थीं। 
“अरे! कब ? कैसे ?” मैं हतप्रभ थी। उधर माँ ने सिसकियों के बीच क्या कहा, समझ नहीं आया। आँखों से आँसू झरने लगे।  
“क्या हुआ बहू? सब ठीक तो है?” मेरी हालत देख कर वहीँ बैठीं सासू माँ भी घबरा गयीं। 
उनको बताते हुए मेरी रुलाई फूट पड़ी। आंटी के बारे में मैं अक्सर बातें किया करती थी। घर में सब लोग उनके प्रति मेरे लगाव को जानते थे।
“ईश्वर उन्हें सद्गति दें।” कहते हुए वे मुझे सांत्वना देने लगीं।
आंटी की एक-एक बात मुझे याद आ रही थी। उनका प्यार-दुलार, उनका रोना-कराहना, उनके शरीर के काले-नीले निशान…! मेरे लिए दुःख की बात यह थी कि मैं आख़िरी बार उनसे मिल भी न पायी।

शाम को मृदुल घर आए तो उनको मैंने सारी बात बतायी और कानपुर जाने की इच्छा व्यक्त की। माँ-पापा से मिले भी बहुत दिन हो गए थे। मृदुल ने मेरी अकेले की आनेजाने की टिकट करा दी। 
कानपुर सेंट्रल से पापा के साथ मैं अपने घर न जा कर सीधे आंटी के घर पहुँची। पापा मेरा सामान ले कर घर चले गये। अंकल जी को बाहर तख़त पर बैठे देख कर पहली बार मुझे उनसे घृणा हुई थी। उन्हें नज़रअंदाज कर मैं भीतर चली गई। हॉल में बैठे उमेश-महेश पर नज़र पड़ते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी। हम तीनों आपस में लिपट कर फूट-फूट कर रो पड़े। तब तक माँ भी आ गयीं। थोड़ी देर के बाद वे मुझे घर लिवा लाईं। मेरा सिर दर्द से फ़टा जा रहा था। फ़्रेश हो कर आई तो माँ ने चाय नाश्ता लगा दिया। उसके बाद सिर दर्द की दवा खा कर मैं लेटी तो सो गई। शाम को उठी तो माँ ने फिर से चाय थमा दी।
आंटी को क्या हुआ था माँ !
मेरे पूछने पर माँ की आँखें छलक पड़ीं। अपने पल्लू से आँसू पोंछते हुए वे बताने लगीं, “मैं भी न जान पाती। वो तो उस शाम को मैं ठेले से सब्जी लेने के लिए खड़ी थी तभी सामने से निर्मला की पड़ोसन निकल रही थी। वह मुझे देख कर रुक गयी। बातों-बातों में ही उसने बताया कि कल निर्मला के घर से तेज़-तेज़ आवाजें आ रही थीं। सुन कर मेरा दिल धड़क उठा था। उसके जाने के बाद मैं भागती गई तो निर्मला की हालत देख कर सब समझ गई। मुझे देख कर वह बिलख कर रो पड़ी थी। उसे रोता देख कर मैं अपने ऊपर संयम नहीं रख पायी थी उर्मी ! और भाई साहब के पास जा कर विफ़र पड़ी थी, “इस उम्र में निर्मला पर हाथ उठाते हुए आप को शर्म नहीं आती? आखिर ऐसा क्या कर देती है वह कि हमेशा आप का हाथ उठ जाता है?”
इस बार उसने जो ग़लती की है न! वह अक्षम्य है, मैंने एक चाँटा क्या मार दिया, मुझपर झपट पड़ी। उसने मेरे ऊपर हाथ उठाने का प्रयास किया है।वे अकड़ कर बोले। 
हाँ, तो क्या गलत किया उसने? ये जो उसने आज किया न! उसे बहुत पहले करना चाहिए था। मेरी बात सुन कर वह तिलमिला उठे थे।
आप अपना काम कीजिये, ये मेरे घर का मामला है! समझीं। मुझे उनसे किसी अच्छे व्यवहार की उम्मीद तो थी नहीं, सो वही हुआ।
मैं कुछ और कहती कि निर्मला आ कर मुझे खींच ले गई। मैं बहुत गुस्से में थी सो उसी पर फट पड़ी, अगर तूने हाथ उठाया ही था तो इस जल्लाद का मुँह क्यों नहीं नोच लिया! ताकि यह भी मुँह छुपाता फिरता। अरे छोड़ क्यूँ नहीं देती इस आदमी को! क्यूँ सहती है इतना!मैं चीख पड़ी थी उसपर। 
सहने के सिवा कोई रास्ता भी तो नहीं मेरे पास। कहाँ जाऊँ इस उम्र में?” फ़टे होंठ हिले थे उसके।
“उठ, अभी के अभी चल तू मेरे साथ।”
“मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे। तू जा यहाँ से।“  
तो मर इसी नर्क में! अरे एक जानवर को भी अगर बार-बार मारा जाए तो वह मारने वाले को सींग दिखता है या रस्सी तुड़ा कर भागने की चेष्टा करता है पर तू तो इंसान है! उसके साथ-साथ तूने भी ख़ुद को प्रताड़ित किया है। समझी! और कुछ गलत नहीं किया तूने। अपने बेटों को बता ये सब। लानत है ऐसे बेटों पर जिनके होते हुए माँ इस तरह से घुट-घुट कर जी रही है। क्रोध में मैं उसे रोता-सिसकता छोड़ कर चली आई। जब उम्मीद के सारे रास्ते बंद हो जाएँ, तो इंसान आख़िर कैसे जिये…! काश! मैंने उसका हौसला बढ़ाया होता। उसके जख्मों पर मरहम लगाया होता। मैं उस घटिया, दो कौड़ी के आदमी का गुस्सा उस मासूम पर उतार आई थी। दूसरे दिन जाने की सोच ही रही थी कि अचानक उसके न रहने की खबर मिली।“ कह कर माँ बिलख-बिलख कर रो पड़ी थीं। सिसकियाँ मेरी भी फूट पड़ीं।
*
आंटी की तेरहवीं को दो दिन हो गये थे। मुझे वापस जाना था। सोचा, एक बार आंटी के घर हो आऊँ, आख़िर मैं उन्हीं के लिए तो आई थी। अब उमेश-महेश के प्रति मेरा नज़रिया बदल गया था। माँ कुछ भी सीख दे दे; पर पिता का आचरण बेटों को स्वत: ही मिल जाता है…!
अपने पिता जैसे ये भी दोहरे व्यक्तित्व के होंगे, मैंने कभी नहीं सोचा था। इच्छा तो नहीं हो रही थी; पर फिर भी एक आख़री बार मैं गई।
 
वहाँ पहुँची तो सब सो रहे थे। जैसे बहुत सारे दायित्वों के बोझ से निज़ात पा गये हों। उमेश की पत्नी निशा ने गेट खोला और मुझसे हुलस कर मिली फिर मुझे आंटी के कमरे में ले गई।
“ये सब क्या है?” बैठते हुए मैंने वहाँ बिखरा सामान देख कर पूछ लिया।
मम्मी के बक्से से निकला है।
अब मैंने ध्यान से देखा, कुछ खिलौने, छोटे-छोटे कपड़े, गहनों के खुले पड़े खाली डिब्बे, बनारसी साड़ियाँ, जिनकी ज़री अब काली पड़ चुकी थी और उमेश-महेश के बचपन के कुछ फोटोग्राफ़ बिखरे पड़े थे। जो शायद इनसब के लिए व्यर्थ थे। तभी मेरी निगाह साड़ियों के बीच से झाँकती एक डायरी पर अटक गई। मैं चौंकी। इस बीच निशा मेरे लिए पानी लेने चली गई थी। मैंने इधर-उधर देखा और धड़कते दिल से डायरी उठा कर अपनी कमर में खोंस ली। तभी निशा आ गई। अब वहाँ बैठना मेरे लिए भारी हो रहा था। मैं उठ कर चल दी।
“पानी तो पी लेतीं।” निशा बोली।
“इच्छा नहीं है निशा।”
अच्छा रुकिए, मैं जगाती हूँ सब को।” 
मेरी ट्रेन का समय हो रहा है; रुक नहीं पाऊँगी, सोने दो उन्हें। बोलते हुए मैं निकल आई।
मना करने के बावजूद भी माँ ने मेरे लिए खाने का सामान, कपड़े, अँचार और भी न जाने क्या-क्या बाँध दिया था। मन को बताये बिना मैंने चुपचाप डायरी अपने बैग में रख ली। चलते समय माँ से गले लग कर खूब रोई। माँ से मिलना भी कम ही होता था और आंटी का दर्द तो था ही सो आँखें खूब बरसीं। 
पापा ने ट्रेन में बैठा दिया और चलते-चलते उन्होंने सावधानी बरतने और पहुँचते ही फोन करने को कहा। ट्रेन धीरे-धीरे रेंगने लगी। पापा हाथ हिलाते हुए आँखों से ओझल हो गये और उनसे बिछड़ते हुए मेरी आँखें फिर छलक पड़ीं। 
*
रात हो चुकी थी। ट्रेन पूरी रफ़्तार से अपने साथ मुझे भी मंजिल की ओर लिए जा रही थी। सभी यात्री सुख की नींद सो रहे थे। पर मेरे सामने की बर्थ पर एक स्त्री अपने छोटे बच्चे के साथ जाग रही थी। मेरी आँखों में भी नींद कहाँ थी! मैंने बैग से डायरी निकाल कर सिरहाने का बल्ब जला लिया और सीट पर लेट गई। किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं होती और चुराना तो बहुत बुरी बात; पर इस डायरी को ले कर मेरे दिल में बहुत जिज्ञासा थी। आंटी डायरी लिखती थीं! ये तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। धड़कते दिल से डायरी खोल कर उसके पन्ने पलटने लगी।
 
वर्षों पहले की कोई तारीख थी। लिखा था, हमेशा सोचती हूँ, क्यों सहती गई एक बीमार मानसिकता को ? क्यों कमजोर पड़ जाती हूँ हर बार ? विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पाती हूँ? क्यूँ जिए जा रही हूँ ये यातना भरी ज़िंदगी? मुझमें शक्ति होती तो झोंक देती स्वयं को धधकती ज्वाला में। रोज-रोज जलने से अच्छा कि एक बार में ही स्वाहा हो जाती और छुटकारा पा जाती इस शापित जीवन से; पर जीना ही होगा मुझे, अपने बच्चों के लिए। उनके भविष्य के लिए मुझे ये सब सहना ही होगा। उनके बड़े होते ही ये दिन भी बदल जायेंगे। पढ़ कर मेरा दिल कराह उठा।

ओह्ह ! कितना भरोसा था आंटी को अपने बेटों पर। आंटी की पीड़ा मेरी आँखों से छलक पड़ी। मैं पन्ने पलटती गई। हर पन्ने पर आंटी की सिसकियाँ, कराह, देह पर लगे चोटों का व्यौरा और अंकल जी की बेशर्मी, अमानुषिकता और अनाचार की कहानी लिखी थी।

एक पेज़ पर मैं ठिठक गई। लिखा था, अब जिया नहीं जाता। दम घुटता है मेरा। मैं इतनी बुरी हूँ…! आज जब फोन पर उमेश को बताया कि बेदर्दी से पीट रहे उसके पिता को मैंने जोर से धक्का दे दिया तो वह भी मुझे ही दोषी ठहराने लगा कि ‘जैसे भी हों, वे हमारे पिता हैं, उस घर के मुखिया! और ये सुन कर आपकी बहुएँ भी तो …।’ मैं सन्न रह गई। अब तक मैं चुपचाप प्रताड़ित होती रही, वो ठीक था? आज मेरे प्रतिवाद से उनके पुरुषार्थ को भी ठेस पहुँची थी। कैसे जीऊँ ? अब तो चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। हे ईश्वर ! अब और साँसें नहीं चाहिए। नहीं जीना चाहती एक पल भी।“
                 
पढ़ कर मैं अपनी हिचकियाँ नहीं रोक पायी और साड़ी के पल्लू से मुँह दबा कर रो पड़ी। 
पौ फटने को थी। खिड़की के बाहर का दृश्य अब कुछ-कुछ दिखाई दे रहा था। मेरा स्टेशन भी आने वाला था। उतरते हुए कुछ छूट न जाय इस लिए मैंने अपना सामान समेट कर रख लिया। मेरी नज़र सामने की बर्थ पर दीनदुनिया से बेखबर अपने दुधमुहे बेटे की नैपी बदल रही स्त्री पर ठहर गई। उसने गंदी नैपी को अखबार में लपेट कर सीट के नीचे सरका दिया था और दूसरी पहना कर अपनी छाती से लगा, बच्चे के नर्म मुलायम बालों में स्नेह से उंगलियाँ फेरते हुए ममता से सींच रही थी। उसके चेहरे से वात्सल्य का सोता-सा फूट रहा था। ट्रेन की रफ़्तार अब धीमी हो चली थी।
*******


मीनाधर पाठक
कार्य – अध्यापन, स्वतंत्र लेखन  
शिक्षा- हिन्दी साहित्य से परास्नातक 
प्रकाशित कृतियाँ- (कथा-संग्रह) घुरिया और  व्यस्त चौराहे  के अलावा दस साझा संग्रह तथा एक साझा उन्यास

‘लमही’,सोच-विचार  ‘हिन्दुस्तान, जागरण-पुनर्नवा,‘कथाक्रम’,  हरिगंधा, भारतीय रेल, सोच-विचार, ककसाड़, ‘विश्वगाथा, देशबंधु, ‘निकट’, ’समहुत’, ‘उत्तर-प्रदेश’, ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’, जागरण- नई दुनिया,सरिता.  अनुसंधान, रचना उत्सव  आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं व ई पत्रिकाओं में कहानियाँ व कविताएँ प्रकाशित हुईं |
सम्मान- शोभना वेलफेयर सोसायटी द्वारा ‘शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान (2012) विश्व हिन्दी संस्थान कल्चरल आर्गनाइजेशन द्वारा उपन्यास ‘खट्टे मीठे रिश्ते’ में रचना धर्मिता हेतु सम्मान(2015)विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा ‘विद्यावाचस्पति सारस्वत सम्मान (2018)  तथा 92.7 big fm व रेडियो ‘बोल हरियाणा  ‘ पर कहानियाँ प्रसारित व  सम्मानित हुई..
मेल – meenadhardwivedi1967@gmail.com

3 टिप्पणी

  1. कहानी निर्मला आंटी अत्यंत मार्मिक और सारगर्भित कहानी लगी । लेखिका मीना धर द्विवेदी जी को हार्दिक बधाई ।

  2. बहुत ही मार्मिक कहानी l सुन है कि पुरुष का एक बार हाथ उठता है तो फिर उठता ही चला जाता है l फिर भी स्त्रियाँ विरोध नहीं कर पाती l उन्हें बच्चों कि शिक्षा का भी होता है l समाज साथ नहीं देता … वो विवश हो जाती हैं सब पीड़ा सहने को l आंटी का जाना दुखी कर गया तो बेटों का व्यवहार घाव पर नमक छिड़कने जैसा लगा l पितृसत्ता को रेशे -रेशे खोलती मार्मिक कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई मीना जी

  3. बहुत ही मार्मिक कहानी है मीना जी की।
    स्त्री आज भी प्रताड़ित की जाती है। हां, ढंका-तुपा रहता है सब।
    ऐसे में बेटों का साथ न देना और अखरा निर्मला को।
    अंत सकारात्मक पर द्विअर्थी ।
    जतन से पालती मां बुढ़ापे में उपेक्षित रह जा रही है आज

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