टेलिफ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ सुन कर मैं भावों के समुन्दर की लहरों में बह गया था।
तुम……नहीं …..यह सम्भव नहीं – शायद मैं स्वप्न देख रहा हूँ ।
“जी हाँ, मैं ही  बोल रही हूँ ।” और फिर मैं बार बार तुम्हारा नाम दोहराता चला गया ।
“जी भूल गए हो न आप मुझे ? मैं न कहती थी कि परदेस जा कर लोग बदल जाते हैं और आप हंस कर सर हिला दिया करते थे ।”
“तुम …. तुम कैसी हो ? तुम सच मुच …..”
“जी हाँ मैं ही हूँ आप की ……”
इतना कह कर तुम चुप हो गईं जैसे तुम ने अपने आप को कोई ग़लत बात कहने से रोक लिया हो। कुछ देर टेलिफ़ोन पर ख़ामोशी रही । इस बीच में मैं अपने आप को संभालने का प्रयत्न करता रहा । अभी मैं ठीक तरह से संभल भी न पाया था, कि तुम्हारी आवाज़ फिर सुनाई दी ।
“आप कैसे हैं ? “
“मैं – – -मैं बिलकुल ठीक हूँ”
तुम ने मेरे सोए हुए जज़्बात को फिर से झँझोड़ दिया । ऐसे साज़ को छेड़ दिया, जिस पर बरसों की धूल पड़ने से सुरीलापन ख़त्म हो चुका था, मगर झंकार मरी नहीं थी । तुम्हारी आवाज़ सुन कर जिस्म में एक बिजली सी कोंध गई, तूफ़ान सा बरपा हो गया, फ़िज़ा की लहरों में जैसे घुंगरूँ की झंकार गूँजने लगी और मैं इन लहरों में बहता चला गया । मैं ख़ुशियों के इन लमहों को अपनी आशाओं के फैले हुए आँचल में  समेट लेना चाहता था ताकी वह पहले की तरह फिर से कहीं छिन ना जाएँ ।

मैं इस उधेड़बुन में पड़ा रहा और मुझे याद नहीं तुम मुझसे कितनी देर बातें करती रहीं । मुझे होश उस समये आया  ,जब टेलिफ़ोन पर तुम्हारी गुड बाई कहने की आवाज़ सुनाई दी । इस के बाद सन्नाटा सा छा गया । मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं आकाश से धरती पर आ गिरा हूँ।

तुम एक स्वप्न की तरह अपनी झलक दिखा कर न जाने फिर कहाँ खो गईं । अजीब सा आलम था । ना जाने कितनी देर तक मैं अपने ओफिस की छत की ओर टकटकी लगाए देखता रहा और यादों का एक समुन्दर उमढ़ आया ।

मैं ओफिस से तो घर जाने के लिए निकला, मगर मेरे पाँव अपने आप मैख़ाने के सामने आ कर रुक गये और मैं एक कोने में बैठ कर खोए हुए सपनों को मय के प्यालों में उतारने लगा । कैसे भूल सकता हूँ वह आख़री मुलाक़ात । वह दूर दूर तक फैले हुए महलों के खंडरात, जहाँ कभी रोशनी से हर चीज़ जगमगाती हो गी ।

जहाँ शामें घुंगरुओं की  झंकार में ढल जाती हों गीं और तबले की थाप से गूँज उठता हो गा ख़ुशियाँ बिखेरता हुआ महल । हम ने भी वहीं ख़ुशियों को अपनी बाहों में समेटने की कोशिश की थी । एक एक कर के सारे दृष्य मेरी आँखों के सामने आने लगे । मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे तुम आज भी वहीं मेरा इंतज़ार कर रही हो ।

उस दिन तुम कितनी सुंदर लग रहीं थीं । बात बात पर खिलखिला कर हंस रहीं थीं । मगर तुम्हारी हँसी में कितनी उदासी छुपी थी । तुम्हारी आँखों में ग़म का समुन्दर अपनी कहानी सुनाने को बेचैन था । मगर तुम ने इस बाँध को टूटने नहीं दिया ।

जब अगले दिन मैंने तुम्हें ऐरपोर्ट पर देखा, तो तुम्हारी सूजी हुई आँखें अपनी कहानी स्वयं कह रहीं थीं । तुम से बिछड़ कर मैं अभी तक भटक रहा हूँ । इतने बड़े संसार में, इस जगमगाते शहर में, अकेला हूँ, बहुत तन्हा हूँ ।
लोग कहते हैं कि इस शहर में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं । मगर मुझे तो इन ख़ुशियों का कोई अंश ना मिल सका । शायद मैं इस के योग्य ही नहीं था । हाँ, ग़म को भुलाने के लिए शराब की कोई कमी नहीं थी । मैंने भी इसी का सहारा लिया । हर जाम में तुम्हारी तस्वीर नज़र आने लगी, और एक एक कर के, तुम्हारे वादे याद आने लगे । वादे, जो वादे ही हो कर रह गए ।

बड़ी उत्सुकता से तुम्हारे पत्रों की प्रतीक्षा रहती । तुम्हारे पत्र ही तो आशा की ऐसी डोर थे जिन्होंने मुझे बिखरने नहीं दिया । अचानक, वह डोर भी टूट गई। ऐसा लगता था, कि डाकिया जान बूझ कर तुम्हारे पत्र, मेरे तक नहीं पहुँचा रहा था ।

मेरे उत्सुक नयन प्रति दिन दरवाज़े की ओर टकटकी बांधे देखते रहते, कि शायद किसी दिन तुम्हारा पत्र आ जाए । किंतु ऐसा न हुआ । मन में अजीब-अजीब तरह के अंदेशे उठने लगे । परंतु नहीं, यह संभव नहीं है, कह कर दिल को दिलासा दे लेता । हो सकता है, किसी कारणवश तुम पत्र नहीं लिख पाईं । प्रति दिन व्याकुलता बढ़ती गई ।
फिर, एक दिन, तुम्हारी चुप्पी का रहस्य मालूम हो गया । तुम्हारे माता पिता ने, तुम्हें दुल्हन बना कर,शहनाइयों की गूँज से विदा कर दिया । पता चला कि तुम अपनी नई बगिया सजाने विदेश चली गईं थीं  ।
एक फीकी सी हँसी मेरे होंटों पर फैल गई और दो आँसू आँखों से छलक कर मेरी गालों पर आ कर बिखर गए।

मैंने सोचा कि प्यार , मुहब्बत, इश्क़ वग़ैरा सब मिथ्या है । ज़िंदगी का असली मज़ा लेना तो यह यौरपीनज़ ही जानते हैं । मैं भी निकल पड़ा लंदन की जगमगाती सड़कों पर ख़ुशी की तलाश में ।

उस शाम ख़ूब शराब पी और रातको बड़े मज़े की नींद आई ।
आहिस्ता आहिस्ता यहाँ की सभ्यता अपना जाल बुनती चली गई और मैंने सोचा कि मैंने ख़ुशी पा ली है । मगर आज तुम्हारी आवाज़ ने मुझे झँझोड़ कर रख दिया । तोड़ दिया ऐसे काल्पनिक जाल को जिसे मैं ख़ुशी समझ बैठा था । मुझे एहसास हुआ, कितनी खोखली और बे बुनियाद है यहाँ की ख़ुशी । ऐसा लगा कि जैसे मैं स्वप्न से जाग उठा हूँ । मैंने महसूस किया, कि मैं, अभी तक भटक रहा हूँ, तन्हा, ख़ुशी की तलाश में ।

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