पुराने राजा महाराजा युद्ध करके अपने युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते थे। युद्ध से पहले सेना तरह तरह के युद्धाभ्यास करती थी। युद्ध का बिगुल बजते ही दोनों सेनाएं आमने सामने आती। तरह तरह के हथियारों का इस्तेमाल होता था। दोनों तरफ की सेनायें जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक देती थी | युग बदल गया। राज करने का तरीका बदल गया।
आज युद्ध का नहीं चुनावी बिगुल बजता है। अब तैयारियां नए ज़माने के नए हाई टेक तरीके से होती हैं। आईटी टीम सेनापति है, नेताजी राजा हैं और कार्यकर्ता इनकी सेना। तरह तरह के हथियार एक दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किये जाते हैं। चरित्र से लेकर परिवार तक पर सीधे अटैक होता है। जुबान से ऐसे ऐसे फूल झरते हैं कि जनता हैरान परेशान सी आँखे फाड़े राजनीती के इस नए रूप को देख कर सन्न है।

अर्चना चतुर्वेदी की चुटकी - युद्ध के हथियार 3

हमारे बडबोले नेताजी कहते हैं “लोकेश के पिता को ये नहीं पता” , तो जबाब आता है “जसोदाबेन के पति मूर्ख हैं ये भी नहीं जानते”। कभी चौकीदार चोर है। तो कभी पप्पू पगला है। कभी छप्पन इंच बनाम 28 इंच। ऐसा लगता है मानो गली के गुंडे आपस में लड़ रहे हैं। भाषा का स्तर ऐसे ऐसे आयाम छू रहा है कि भाषाविद कान पर ऊँगली धरे राम राम का जाप कर रहे हैं। जो माँ बाप फैशन टीवी पर चाइल्ड लोक का इस्तेमाल करते थे आज समाचार चैनलों पर ताला लगाना पड़ रहा है कि कहीं बच्चा सुनकर यही सब ना दोहराने लगे।
राजनीति जुबानी खेल हो चुकी है अब दिमाग और नीतियों की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी। दोनों तरफ के दावेदार तयारी के नाम पर रैली और पद यात्रा करते हैं और ऊँचे ऊँचे मंचो पर चढ़कर अपनी जुबान को बेलगाम छोड़ देते हैं।
सो अब किसी हथियार किसी रणनीति की मानो आवश्यकता ही  नहीं जुबानी जहाज हवा में उडाओ और ऐसा उडो कि पूरी दुनिया को लपेट मारो। राजनैतिक रणनीति के तहत  दोनों तरफ से ऐसे ऐसे विशेषण ऐसे ऐसे चुटकुले तैयार करके डिजिटल प्लेटफार्म पर फेंके जा रहे हैं कि इनके सामने जहर बुझे तीर भी बेमानी। ये जुबानी बम, एटमी बम से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। इनका जहर बच्चे बच्चे की जुबान पर असर कर चुका है।
जब तरकश से बदजुबानी के तीर ख़त्म होने लगते हैं तो जातिवादी गोले दागे जाते हैं | पहले धर्मयुद्ध होते थे। उसका अर्थ बदल धर्म को युद्ध का हथियार बना डाला है।
राम नाम की पालकी, मजहब बना कहार
सत्ता सुख को भोगने, ये कैसे हथियार ?
चाणक्य और विदुर जैसे नीतिवान लोग यदि आज राजनीती के ऐसे हथियार देखते तो अपनी नीतियाँ भूल माथे पर हाथ रखे। सूनी आँखों से ये दृश्य निहार रहे होते और मन ही मन “तौबा तौबा या “हे ईश्वर उठा लो” जैसे वाक्य दोहरा रहे होते।

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