मैं ठीक समय पर बैंक में पहुँच कर अपने कार्य में व्यस्त हो गयी। प्रतिदिन की भाँति आज भी प्रसन्न मन से मैं कार्यालय आयी थी। बैंक आकर जब कुछ सहकर्मियों ने मुझे मेरे जन्मदिन की बधाई दी तब मुझे स्मरण हुआ कि आज मेरा जन्मदिन है। जीवन के आपाधापी में आज का दिन मैं विस्मृत कर बैठी थी। कार्यालय में एक-दो परिचितों का भी फोन आया। तब से ही हृदय अशान्त-सा है…. विचलित-सा है। जन्म दिवस का स्मरण भी भला हृदय के विचलित होने का कारण हो सकता हैं? मैं दिन भर यही सोचती रही।
बैंक से घर आ कर पर्स व लंच बाक्स डायनिगं मेज पर रख, अंजली से चाय बनाने के लिए कह कर मैं सीधे बाथरूम में चली गई। मेरी छोटी बहन अंजली जो कि एक महिला काॅलेज में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत है, वह मुझसे पूर्व ही घर आ जाती है। उसका काॅलेज बन्द होने का समय मेरे बैंक बन्द होने से पहले है। अतः वह मुझसे पहले घर में उपस्थित रहती है। अंजली के घर में रहने से मुझे बड़ी राहत मिलती है। एक तो घर खुला मिलता है। घर खुला मिले तो घर में ताजी हवा व रोशनी रहती है। अन्यथा बन्द घर खोलने पर कुछ समय तक कमरे का वातावरण दमघोटूँ -सा रहता है। यूँ भी बन्द घर खोल कर प्रवेश करने में मुझे न जाने क्यों अकेलेपन की अनुभूति बढ़ जाती है। अंजली के पहले से घर में मौजूद रहने से मुझे अच्छा लगता है।
वाश वेसिन के शीशे में स्ंवय को देखते हुए मैं सोचने लगी कि घर से बैंक और बैंक से घर की दिनचर्या में समय कब इतना आगे बढ़ गया ? मुझे आभास तक न हुआ कि मैं उम्र की तिरपन सीढ़ियां पार कर चुकी हूँ। उफ्फ! तिरपन वर्ष ? यह तो समय की एक बड़ी अवधि है। मैंने दर्पण में स्वंय को देखा जैसे प्रथम बार देख रही हूँ स्ंवय को। काले-सफेद उलझे बाल, आँखों के चारों तरफ स्याह घेरे, नाक पर चश्मे का भूरा निशान, निस्तेज चेहरा। क्या ये मैं ही हूँ? अब से पूर्व तो मैं ऐसी नही थी, या कि स्वंय को इससे पूर्व ध्यान से देखा ही नही था, या उस दृष्टि से देखने की आवश्यकता ही न पड़ी हो, जैसे आज देख रही हूँ। सत्य यही है कि आज की दृष्टि से स्वंय को इससे पूर्व मैंने नही देखा था। समय की इतनी बड़ी अवधि पार कर गयी हूँ। इस अवधि में जीवन में क्या पाया? मैं सोचने लगी। हाथ-मुँह तो कब का मैं धो चुकी थी। किन्तु आज दर्पण के समक्ष खड़े हो कर स्वंय से बातें करने का मन हो रहा था। ’’ आखिर क्या पाया मैंने इस लम्बी अवधि में ? क्यों मैं उम्र के इस पड़ाव पर किसी अनजाने भय से बच्चों-की भाँति भयभीत रहने लगी हूँ? पहले तो मैं ऐसी नही थी? पहले क्या था मेरे पास और आज क्या नही है ?’’ मेरे हृदय में अनेक प्रश्न, अनेक आशंकाये व्याप्त होती जा रही हंै।
’’ दीदी, चाय ठंडी हो रही है। ’’ बाथरूम में कुछ ज्यादा समय लगता देख अंजली ने आवाज लगा दी है। विचारों पर विराम देते हुए मैं शीघ्रता से बाथरूम से बाहर आ गयी। मेरी चाय अंजली ने कमरे के कोने में रखी डायनिंग टेबल पर रख दी है तथा अपनी चाय ले कर टी0वी0 के सामने बैठ कर बड़े ही मनोयोग से अपनी पसंद का सीरियल देखते हुए पी रही है। अंजली को इस प्रकार आनन्द के साथ चाय पीते हुए देख कर मुझे अच्छा लग रहा है। मैं डायनिंग टेबल पर बैठ कर चुपचाप चाय पीने लगती हूँ, तथा अंजली को देखने लगती हूँ। घर के अधिकांशतः कार्य प्रतिदिन ऐसे ही संवादहीनता के बिना होते हैं, यंत्रवत्….।
मेरी चाय खत्म हो चुकी है, किन्तु विचारों का प्रवाह थम नही रहा है…… इस घर में मैं और अंजली ही तो रहते हैं। मेरे तीन अन्य भाई भी हैं जो इसी मकान के तीन अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। मेरे साथ मेरे भाई नही रहते या यूँ कहें कि मैं भाईयों के साथ नही रहती। मैं और अंजली इस बड़े से मकान के सबसे किनारे वाले छोटे हिस्से में एक साथ रहती हैं।
अंजली व मेरी उम्र में दस वर्ष का अंतर है। चारों भाई मुझसे छोटे हैं। अंजली हम सबसे छोटी है। मुझे याद आते हैं बचपन के दिन…..मैं और अंजली एक ही काॅलेज में पढ़ते थे। घर से एक साथ निकलते थे, अंजली प्राइमरी कक्षाओं की ओर मुड़ जाती थी, मैं इण्टरमीडिएट की। स्कूल छूटने पर हम एक साथ घर आ जाते थे। प्रारम्भ से ही अंजली भावनात्मक रूप से मुझसे जुड़ती चली गई थी। स्कूल में कोई समस्या होती तो वह सीधे मेरे पास आती। घर में किसी अन्य से अपनी कोई समस्या नही कहती। न माँ-पिता जी से न भाइयों से।
मुझे अब तक स्मरण हैं काॅलेज के प्रारम्भ के वे दिन जब अंजली मेरे साथ मेरी ही कक्षा में बैठना चाहती थी। बड़े यत्न से मैं उसे समझा कर उसकी कक्षा में पहुँचा कर आती थी। जब वह कुछ बड़ी होने लगी तो वह घर में सबसे अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहती कि, ’’मैं भी बड़ी हो कर अनामिका दीदी की तरह बनूँगी, बड़ी कक्षा में पढूँगी, प्रथम आऊँगी। ’’ उसकी बातें सुन कर मैं मुस्करा पड़ती। आज भी मैं मुस्करा पड़ती हूँ हृदय में उठती एक गहरी टीस के साथ कि अंजली का भाग्य मेरे भाग्य से कितना मिलता-जुलता है। वो कुछ-कुछ मेरे जैसा ही भाग्य ले कर आई है। बचपन की बाल सुलभ बातों में सत्य छुपा था कदाचित्।
अपनी शिक्षा पूरी कर मैं नौकरी कर तैयारियों में व्यस्त हो गयी थी कि एक दिन अकस्मात् पिताजी के शरीर के दाहिने अंग ने काम करना बन्द कर दिया। वह चलने -फिरने में असर्मथ हो गये। माँ पर घर के कार्यों के अतिरिक्त पिता जी की देखभाल का उत्तरदायित्व भी आ गया। वह घर में ही व्यस्त होती गयीं तथा पिता जी सामाजिक रूप से निष्क्रिय। लोगों के मुँह से मैंने सुना कि मैं विवाह योग्य हो गयी हूँ। लोग कहते रहे, समय मेरी उम्र को ले कर आगे बढ़ता रहा। इस बीच मुझे बैंक में नौकरी मिल गयी। पिता जी की दिनचर्या या यूँ कहें कि पूरा जीवन व्हीलचेयर तक सिमट गया। देखते-देखते मेरे चारों भाई भी शिक्षा पूरी कर नौकरियों पर लग गए। हम सबको आत्मनिर्भर होते देख पिता जी के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि के भाव छलक पड़ते। मैं घर में सबसे बड़ी थी। घर में सबसे बड़ी होने के कारण प्रारम्भ से ही आने-जाने वाले परिचितों, रिश्तेदारों की दृष्टि में आकर्षण का केन्द्र मैं थी। अब तो एक अच्छी नौकरी में भी मैं थी। अतः मेरा सामाजिक दायरा बढ़ता जा रहा था। शादी, पर्वों या अन्य किसी बुलावे पर माँ-पिता जी मुझे ही भेजते। अंजली मेरे साथ होती।
सभी मुझे अपने घर बुलाते, किन्तु मैंने किसी भी परिचित को अपने लिए विवाह का प्रस्ताव लाते नही सुना। जब कि सभी मेरी व्यवहार कुशलता व हँसमुख स्वभाव के प्रसंशक थे तथा उनके घरों में विवाह योग्य लड़के भी थे। इसका कारण मैं अपनी साधारण शक्लसूरत को समझती। लम्बा कद, छरहरी काया व गेहुँआ रंग होने के पश्चात् भी मुझे लगता कि मेरा चेहरा आर्कषक नही है या था।
शनैः शनैः मेरे चारों भाइयों का विवाह हो गया। मेरे चेहरे पर समय ने लकीरें खींचनी प्रारम्भ कर दी थीं। ऋतुयें आतीं-जातीं उनके साथ मौसम भी परिवर्तित हो जाते। कभी गर्म तपिश भरे दिन, तो कभी बर्फीली ठंड लिए हुए शीत ऋतु। प्रारम्भ से ही मुझे मेरे घर के सामने का अमलतास का वृक्ष आकर्षित करता। तीव्र गर्मियों में जब हरियाली सूखने लगती। सृष्टि बियावान, उजाड़-सी दिखाई देती। तब यह अमलतास का वृक्ष पीले फूलों से भर जाता। सृष्टि में फैले सूनेपन को अपने आर्कषक पुष्पों से भर देता। उसकी इसी विशेषता के कारण मैं गर्मियों में बालकनी में खड़ी देर तक इस वृक्ष के सौंदर्य को निहारा करती।
विवाह की मेरी उम्र निकल चुकी थी, किन्तु अंजली विवाह की उम्र को छूने लगी थी। उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी थी। एक वर्ष घर में रहने के पश्चात् अकेलेपन से उब कर उसने अपने लिए नौकरी तलाशनी प्रारम्भ कर दी थी। स्वंय के प्रयत्नों से उसने अपने लिए एक बालिका डिग्री काॅलेज में लाइबे्ररियन की नौकरी प्राप्त कर ली । उसके दिन काॅलेज में व रातें घर में कटने लगीं। घर में आने -जाने वाले रिश्तेदारों से बेटियों के लिए रिश्ते बताने के लिए कहते-कहते पिताजी एक दिन इस दुनिया से चले गए। पिता जी के निधन के पश्चात् माँ अस्वस्थ रहने लगीं। भाईयों के अपने-अपने घर-संसार में व्यस्त हो जाने के कारण वे मुझे ही अंजली के लिए कोई योग्य वर तलाशने को लिए कहतीं। मैं जैसे ही बैंक से घर आती उनकी कातर मेरी तरफ उठ जातीं। मानों मैं कोई चमत्कार कर, अंजली के लिए योग्य वर ला कर उनके समक्ष खड़ा कर सकती हूँ। मैंने यह चमत्कार किया। इसी शहर के एक अच्छे लड़के से अंजली का विवाह तय कर दिया। लड़के वालों की इच्छानुसार विवाह कोर्ट में हुआ। मैं भी कोर्ट में विवाह के लिए सहमत थी। आर्थिक विवशतायें इधर भी थीं। अतः दोनों पक्ष कोर्ट विवाह हेतु सहमत थे। घर-गृहस्थी के सभी साजो-सामान, गहने, बर्तन, जेवर के साथ हमने अंजली को विदा किया। अंजली की ससुराल स्थनीय थी। अतः जब भी मिलने का मन होता अंजली हमसे मिलने आ जाती। कभी बता कर तो कभी बिना बताये। अंजली के विवाह के कुछ माह पश्चात् एक दिन माँ भी चल बसीं। अंजली का विवाह देखने की ही उनकी इच्छा शेष रही होगी। विवाह होते ही जीवन से उनका मोह छूट गया। माँ के चले जाने के पश्चात् मेरे जीवन में अकेलेपन का घनत्व बढ़ता गया।
स्मृतियों के विस्तृत पथ कुछ कदम ही मैं आगे बढ़ पायी हूँ कि रसोई में कुछ खटकने की आवाज आई। अंजली टी0वी0 बन्द कर रसोई में जा चुकी थी। वह रात का भोजन बनाने की तैयारी कर रही होगी। मेरी चाय कब की खत्म हो चुकी थी। किन्तु स्मृतियाँ हैं कि समाप्त ही नही होती हैं। किसी मैदान में बारिश के पश्चात् स्वतः उग आयी घास व असंख्य बिरवों सी स्मृतियाँ मानसपटल पर विस्तृत हो जाती हैं। रसोई से आती खटपट की ध्वनियाँ मेरी एकाग्रता को बाधित कर रही थीं।
मैं कमरे से निकल बाहर बालकनी में खड़ी हो गयी। स्मृतियाँ मेरे समक्ष आती जा रही थीं जैसे ये अभी कल की बात हो। ऋतुयें बदल रहीं थीं। शनैः शनैः वसंत ऋतु विदा ले रही थी। दबे पाँव ग्रीष्म ऋतु पूरी सृष्टि पर अपने पैर पसार रही थी। मेरे घर के सामने अमलतास का वृक्ष कलियों से परिपूर्ण होने लगा था। वृक्ष के पत्ते पीले हो कर भूमि पर गिरने लगे थे। बस कुछ ही दिनों में पूरा वृक्ष फूलों से भर जाएगा। वृक्षों पर पुरातन पीले पत्ते कहीं नज़र नही आयेंगे। घूल भरी गर्म हवाओं में, बियावान सृष्टि पर सौन्दर्य व जीवन्तता का सृजन करते ये अमलतास के फूल…….।
स्मृतियाँ मेरे समक्ष आती जा रही थीं जैसे अभी कल की बात हो- ’’……..स्थानीय विवाह की कुछ अच्छाईयाँ होती हैं तो कुछ समस्यायंे भी होती हैं। अंजली अपनी ससुराल में सामंजस्य कर सबसे घुलमिल कर रहने का प्रयत्न कर रही थी। नई जगह पर जाकर अचानक सब कुछ अच्छा तो नही हो जाता। नये रिश्तों को बनाने व विकसित करने में समय व प्रयत्न दोनों लगता हैं। स्थानीय होने के कारण अंजली अपने पति के साथ बहुधा आ जाया करती। न जाने कब? मेरे किस रिश्तेदार ने उसक पति के कान में अंजली के चरित्र को ले कर उल्टी-सीधी बातें भर दीं। और वह उन्हें सच मान बैठा। अंजली देखने में आर्कषक है। मैंने महिलाओं से सुना है कि वैवाहिक जीवन में सौन्दर्य व शक बहुधा साथ-साथ चलने लगते हैं। अंजली के साथ भी यही हुआ। बढ़ते-बढ़ते बात इतनी बढ़ गयी कि अंजली मेरे पास आ कर रहने लगी। माँ-पिता जी के न रहने पर इस संसार में मात्र मैं ही उसका संबल थी। मेरे पास रहते हुए अंजली के चेहरे पर शान्ति व सुकून के जो भाव आने लगे उनसे मुझे यह अनुमान लगाने में देर न लगी कि अंजली अपने इस वैवाहिक जीवन से कितनी त्रस्त थी। जो हुआ उसे विस्मृत तो नही जा सकता किन्तु हमें समय के साथ आगे बढ़ना ही होता है। काॅलेज के बाद शाम के शेष कुछ समय अंजली आस-पास के निर्धन बच्चें को पढ़ाने का कार्य करती हैं। उसका सपना निर्धन बच्चियों को इस प्रकार की शिक्षा देने की है कि वे न सिर्फ विकसित समाज के साथ चल सकें बल्कि समाज के विकास में अपना योगदान भी दें सकें। अंजली की यह सोच मुझमें भी उत्साह का संचार करती है।
उसके टूटे वैवाहिक जीवन को ले कर कोई प्रश्न न कर बैठे इस असहज स्थिति से बचने के लिए अंजली ने कहीं भी आना-जाना कम कर दिया है। अवकाश के दिनों में मैं कहीं, किसी रिश्तेदार के घर या बैंक की सहकर्मी के घर मिलने चली भी जाती किन्तु अंजली कहीं भी न जाती। घर से काॅलेज व काॅलेज से घर शेष समय कुछ निर्धन बच्चों की शिक्षा यही अंजली की दिनचर्या रह गयी है। आठ वर्ष हो गये भाईयों से बटवारे के पश्चात् मिले घर के इस हिस्से को ठीक करा कर मैं व अंजली इसमें रह रहे हैं। जो हुआ उसे विस्मृत तो नही किया जा सकता किन्तु न चाहते हुए भी उन चीजों पर विस्मृति का आवरण चढ़ा कर हमें समय के साथ आगे बढ़ना ही होता है ।
मैं स्मृतियों के जंगल में गुम हो गयी थी। टी0 वी0 के स्वर बालकनी तक आ रहे थे। कदाचित् अंजली रसोई में काम समाप्त कर ड्राइंग रूम में आ कर टी0 वी0 देख रही होगी। मैं भी बालकनी से ड्राइंगरूम में आ गयी। अंजली टी0 वी0 खोल कर माथे पर छलक आयी पसीने की बूँदों को पांेछ रही थी। मुझे देख कर मुस्कुराते हुए उसने दीवार पर लगी घड़ी तरफ एक दृष्टि डाली। कदाचित् यह समय उसके पसंदीदा धारावाहिक का था। वह सोफे पर बैठ कर रिमोट से चैनल बदल कर आराम से टी0वी0 देखने लगी। टी0 वी0 देखने में मेरी विशेष रूचि न थी। किन्तु मैंने अनुमान लगाया कि जो धारावाहिक अंजली देख रही थी वह प्रेम कथा पर आधारित कोई धारावाहिक था जिसे अंजली बड़े ही मनोयोग से देख रही थी। उसके चेहरे पर विस्तृत होती मुस्कराहट से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह नायक-नायिका कि प्रेम लोक में स्वंय को स्थापित करती जा रही है। किसी युवती की भाँति लज्जा व लालिमा के भाव उसके चेहरे पर दृष्टिगोचर हो रहे थे। मैं अंजली को टी0 वी0 देखने में व्यस्त देख कर खिड़की के पास आ कर खड़ी हो गयी।
ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका था। पूरी सृष्टि में अजीब-सा विरानापन व सन्नाटा पसरा हुआ था। पतझण की शुष्क हवाओं के झोंकों से वृक्षों से पीले पत्ते भूमि पर गिर कर इधर-उधर बेतरतीब पड़े थे। मेरा हृदय आज मेरे तिरपनवें जन्मदिन पर इतना विचलित क्यों हो रहा है? ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे सृष्टि पर पसरा विरानापन व सन्नाटा मरेे हृदय में समाता जा रहा है। एक भय-सा क्यों मेरे भीतर समाता जा रहा है कि मेरेे न रहने पर अंजली कैसे अकेली रहेगी? सभी भाईयों का विवाह हो चुका है। अब तो उन सबके बच्चे भी विवाह योग्य हो चुके हैं। उन सबकी अपनी विवशताएँ व व्यस्ततायें हैं। पास रह कर भी दूरियाँ इतनी बढ़ गयी हैं कि वो हमारे पास नही आ पाते, मैं और अंजली ही बहुधा उनके पास चले जाते हैं मिलने। यहाँ तक कि पर्व व प्रसन्नता के अवसर भी हमे अकेले मनाना पड़ जाता है, यदि हम पहल कर के उनके पास न जायें तो। मैंने पलट कर अंजली की तरफ देखा। वह निश्चिन्त भाव से टी0 वी0 देख रही थी। उसके चेहरे पर वही चिर परिचित प्रसन्नता के भाव विद्यमान थे।
अंजली को इस प्रकार प्रसन्न देख मुझे आत्मसंतुष्टि की अनुभूति हुई। मैंने खिड़की के बाहर देखा। आकाश से उतर कर साँझ शनैः शनैः पूरी सृष्टि पर फैलती जा रही थी। दिन भर चलने वाली गर्म हवायें शीतल पुरवा के झोंकों में परिवर्तित हो रही थीं। वृक्षों पर पतझण अपना प्रभाव छोड़ चुका था। अधिकांश वृक्ष पत्र-विहीन हो चुके थे, इन विपरीत परिस्थितियों में अमलतास के वृक्ष पृष्पों से भर गये थे। हरे पत्तों के मध्य बहुतायत में खिल उठे अमलतास के पीले गुच्छे कितने मनमोहम लग रहे थे। अमलतास के इन पुष्पों को देख कर सहसा मुझे सुखद अनुभूति होने लगी
अभी तक एक अनजानी आशंका से मेरा हृदय सदैव आशंकित रहता था कि मेरे न रहने पर अंजली कैसे अकेली रहेगी? बड़ी बहन के संबल की छत्रछाया अभी उसके सिर पर है। इस छत्रछाया में वह बेफिक्र हो कर रहती है। प्रकृति की भाँति जीवन में भी पतझण आता है। मेरा यह सोचना कि अकेलेपन के पतझण वाले दिन अंजली कैसे व्यतीत करेगी?… व्यर्थ है। पतझण में खिल उठे अमलतास के इन पुष्पों ने मेरा मार्ग दर्शन किया है। अकेलेपन के पतझण में अंजली के जीवन में भी अवश्य खिल उठेंगे पुष्प अमलतास के। प्रकृति का यही नियम है। वंचित बच्चों को शिक्षित करना अंजली का ध्येय भी है।
मेरी अन्र्तआत्मा ने धीरे से मुझसे कहा, ’’ चलो अनामिका, घर में चलो। खिड़की से ताजी हवा आने दो। प्रकृति ने सबके हिस्से की खुशियाँ सबको दी हैं। तुम्हे भी……अंजली को भी…….। ’’

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.