संपादकीय : फैज़ की नज़्म पर विवाद में गलती कहाँ हो रही? 3
फ़ैज़ प्रगतिशील थे या नहीं इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। फ़ैज़ वामपन्थी थे या नहीं उससे भी कोई फ़र्क पड़ता। फ़र्क केवल आज के समय का है। आज हमें केवल इतनी सी बात समझनी होगी कि किसी भी रचना को उसके कालखण्ड से निकाल कर नयी सदी की सोच से उसकी व्याख्या करने से  अर्थ का अनर्थ हो जाता है। 

“जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाये जाएंगे,

हम अहल-ए-सफ़ा-मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे,

सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे…

…बस नाम रहेगा अल्लाह का… जो गायब भी है हाज़िर भी”

कानपुर में प्रदर्शनों के दौरान विद्यार्थियों ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म हम देखेंगे’ ज़ोर शोर से गाई। फ़ैकल्टी के एक सदस्य ने बुत उठवाये जाएंगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ पर ऐतराज़ उठाया। कहा गया कि यह नज़्म हिन्दू विरोधी है। 

फ़ैज ने पाकिस्तान के तानाशाह सैन्य शासक ज़िया-उल-हक़ के विरुद्ध इस नज़म की रचना की थी –  ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’।

ऐसा संस्कृत और हिन्दी की महत्वपूर्ण कृतियों के साथ होता रहा है कि उन में शामिल घटनाओं को 20वीं और 21वीं सदी के पैमाने से जांचा जाता है और घोषित कर दिया जाता है कि अमुक रचना दलित विरोधी या महिला विरोधी है।

शंबूक की हत्या के बारे में सवाल उठाए जाते हैं। जब रामायण लिखी गयी थी उस समय अम्बेडकर का लिखा संविधान भारत में लागू नहीं हुआ था। न ही तब कांग्रेस या भाजपा उस समय मौजूद थे जब बाबा तुलसीदास ने लिखा था – ढोल, गंवार, शूद्र ,पशु, नारी/ सकल ताड़ना के अधिकारी। 

वामहस्त आलोचकों ने खुल कर इन विषयों पर लिखा। और बाबा तुलसीदास की अस्थियों तक को गंगा से निकाल कर झकझोर दिया। इस पर भी बहुत से बुद्धिजीवियों ने ताड़न शब्द की अलग व्याख्या करके बात समझाने का प्रयास किया मगर बाबा तुलसीदास आलोचना से बच नहीं पाए।

सीता त्याग और अहल्या पर तो लगभग विलाप करती हुई कविताओं की एक बाढ़ सी आ चुकी है। हर दूसरी कविता की शुरूआत होती है… मैं सीता नहीं हूं… मैं द्रौपदी नहीं हूं… कोई इस बात को नहीं सोचता कि हर रचना का एक कालखण्ड होता है एक संदर्भ होता है। हमें रचना को उसके कालखण्ड से अलग करके नहीं देखना चाहिये क्योंकि 21वीं सदी की सोच उस समय से अलग हो सकती है। 

मज़ेदार बात यह है कि अनर्थ एकतरफ़ा नहीं होता। अब जैसे फ़ैज़ की कविता को हिन्दू विरोधी साबित करने के लिये कुतर्क दिये जा रहे हैं तो उससे कहीं अधिक कुतर्क उसे महान् साबित करने के लिये दिये जा रहे हैं। वे लिखते हैं – बस नाम रहेगा परमेश्वर का। अब भला सोचा जाए कि कौन मुसलमान (जो कि फ़ैज़ पक्के थे) अल्लाह की जगह परमेश्वर शब्द को स्वीकार करेगा। और फिर कहते हैं – और राज करेगा पूर्णब्रह्म!”

अरे भाई क्या फ़ैज़ की कविता कुरान शरीफ़ है क्या ? क्या फ़ैज़ ग़लती नहीं कर सकते ? फ़ैज़ एक इन्सान थे उनकी कविता अल्लाह का शब्द नहीं है। फ़ैज़ अपने मुल्क़ पाकिस्तान से बेहद प्यार करते हैं और अल्लाहताला से ताक़त मांगते हैं ताकि उस मुल्क़ के तानाशाह को हटा सकें। 

फ़ैज़ प्रगतिशील थे या नहीं इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। फ़ैज़ वामपन्थी थे या नहीं उससे भी कोई फ़र्क पड़ता। फ़र्क केवल आज के समय का है। आज हमें केवल इतनी सी बात समझनी होगी कि किसी भी रचना को उसके कालखण्ड से निकाल कर नयी सदी की सोच से उसकी व्याख्या करने से  अर्थ का अनर्थ हो जाता है। 

कुछ ऐसा ही मैं अपनी बीए ऑनर्स की पढ़ाई के दौरान कर चुका हूं। शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो पर एक लेख लिखते समय मेरा पहला वाक्य था – Othello is a bloody farce! मैंने भी वही ग़लती की थी कि शेक्सपीयर के समय के नाटक को बीसवीं सदी की सोच से समझने का प्रयास किया था। यह ग़लत है। हम सबको इस ग़लती से बचना होगा। 

यदि हम इससे अपने आपको नहीं रोक पाते तो वक़्त के किसी न किसी मोड़ पर हर साहित्यिक कृति की ऐसी व्याख्या की जाएगी कि रचना स्वयं ही मर जाएगी।

1 टिप्पणी

  1. सही कहा आपने “रचना को उस समय के संदर्भ में ही समझना उचित है। समय निरपेक्षता होने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है

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