उस दिन अलस्सुबह चाय की पहली घूँट के साथ वह कविता फेसबुक पर पोस्ट किए सेकंड भी नहीं बीता था कि उसका कमेंट आ गया, 
“आपका लिखा हुआ हर शब्द दिल छू लेता है! मेरा मन कैसे पढ़ लेती हैं आप?”
कुछ अवांछित अनुभूतियों का स्पर्श हुआ। मैंने स्वयं को समेट कर आवरण के भीतर कर लिया। नेट ऑफ करके फ़ोन बिस्तर पर एक ओर रख दिया।
यह जो आभासी जगत है, दिन-प्रतिदिन असली दुनिया जैसा ही भयावह स्पेस होता जा रहा है। इस भ्रम में होना कि मेरी हर पोस्ट पर पहला कमेंट कर वह मेरा स्नेहपात्र बन जाएगा, कितना बेमानी है। यद्यपि मात्र पुरुष होने से ही उसका सब दोष नहीं हो जाता। जाने कितनी ही स्त्रियों को ऐसी टिप्पणियों पर लहालोट होते देखती रही हूँ। अचंभित भी होती हूँ कि यह रिश्तों का कैसा भ्रमजाल है। ऐसा भी नहीं कि आरंभ में मैंने भी हर कमेंट को सत्य समझ पुलक का अनुभव न किया हो… किंतु मित्र सूची बढ़ने के साथ जब वही कमेंट उसी कमेंटकर्ता द्वारा अन्य मित्रों की पोस्ट पर भी पाया तब हर कमेंट मात्र एक औपचारिकता या निवेश सदृश ही प्रतीत होने लगा।
अगले ही पलों में मेरा भ्रमजाल कुछ और संकुचित हुआ, फिर तकिए पर औंधा हो पलकों को मूँद सो गया। बंद आँखों के सामने कुछ स्वप्न और कुछ ध्वनियाँ आकार लेने लगे,
“मम्मी देखो न, दीदी ने मेरा प्रोजेक्ट खराब कर दिया।अब मैडम डाटेंगी।”
“मम्मी, यह आपका खटारा प्रिंटर फिर कमांड नहीं ले रहा है।”
“निराया, उठो भई, तुम डेली चाय मँगाती हो और पीती नहीं हो।”
एक कप चाय की बर्बादी ने स्वप्न लोक में हलचल मचा दी। मैं उठ बैठी। साथ ही मेरा माइग्रेन भी सक्रिय हो उठा, वह समय की गम्भीरता को कब देख पाता है। बच्चों को स्कूल भेजा और विनीत को क्लिनिक!  तैयार होकर लैब में आई, तब तक रसोइया रमेश भी आ गया था। उसे एक कप चाय बनाने के लिए बोला। सामने मेज पर फ़ोन वाइब्रेट हो रहा था। मैं एकटक उसे देख रही थी जब टेक्नीशियन ने टोका,
“भाभी… फ़ोन!”
स्क्रीन पर ‘रिद्धि कालिंग’ डिस्प्ले हो रहा है। मैं फ़ोन बिना पिक किए ही आगे के संवाद लिख सकती हूँ-
“निराया… सच बता न…  मुझे हुआ क्या है?”
 “मैं बच तो जाऊँगी न?” 
“डॉक्टर ने कोई दवाई क्यों नहीं दी मुझे?”
इन सभी प्रश्नों के सरल उत्तर संदर्भित मरीज़ को, जिससे आपका मन भी जुड़ा हो, बताना इतना जटिल है कि अपने मिथ्या वक्तव्य से मैं उसे कुछ क्षणिक राहत पहुँचा भी दूँ तब भी मेरे मन-मस्तिष्क में उन आश्वासनों का बोझ अनिश्चितकाल तक पहाड़-सा धँसा ही रहता है।
कंपन से त्रस्त हुआ फ़ोन देखते-देखते स्थिर हो गया। उसे होना ही था पर एकबारगी लगा जैसे किसी दम तोड़ते व्यक्ति ने एक बूँद जल की आस में मेरे सामने प्राण त्याग दिए हो। मन में ग्लानि ने बसेरा कर लिया। फ़ोन उठाया, व्हाटसएप पर रिद्धि के चार संदेश दिख रहे हैं। नेट ऑफ करके व्हाट्सएप खोला।
“बिज़ी है क्या?”
“परेशान कर रही हूँ न तुम सबको?” 
“मन बहुत डर रहा है!”
“बात क्यों नहीं कर रही? कुछ तो बोल।”
‘बात क्यों नहीं कर रही’ पढ़ कर लगा कि जैसे आनंदी को लिखा मेरा सन्देश ही रिद्धि ने यहाँ कॉपी-पेस्ट कर दिया हो।
२.
जाने कौन सी कविता थी… जाने कौन सी वह घड़ी थी!
कमेंट हुए, रिप्लाई हुए और फिर वही हुआ जो प्रायः होता है… पोस्ट से मैसेंजर, मैसेंजर से व्हाट्सएप, व्हाट्सएप से कॉल और फिर अचानक ही सब मैसेज और सब कॉल… अनुत्तरित! आनंदी से हुई पुरानी चैट पढ़ने लगी,
“फ़ोन क्यों नहीं उठाती?”, मैंने पूछा हुआ था।
“उठा लूँगी तो जानेमन तुम जान नहीं जाओगी क्या कि मैं आनंदी नहीं आनंद हूँ”, और आगे थी चश्मा चढ़ाए दो इमोजी।
“चुड़ैल हो तुम! जब तक फ़ोन नहीं करोगी मैं नहीं करने वाली तुझसे बात।”  
“मेरे नन्हें बच्चे से शादी कर उसके सारे खिलौने दहेज में तू लेना चाहती है और भला चुड़ैल मैं हुई?”
आँखें असमंजस में ऊपर किए चार इमोजी पीछे-पीछे चली आई थीं।
… फिर फ़ोन पर हुई बातचीत का ज़िक्र और उसका चिढ़ाना कि अब तो यकीन हो गया न कि फ़ेक प्रोफ़ाइल नहीं हूँ!
दिन प्रतिदिन की कितनी ही बातें, उसके अनवरत दौरों का ज़िक्र, आधुनिक शिक्षा पर परिचर्चा, हास-परिहास और हर्ष की शैतानियों और शादी के लिए उसके जुनून का ज़िक्र और उसकी भेजी कई खूबसूरत कविताओं को पढ़ने का सौभाग्य। आखिरी वार्तालाप लगभग छह महीने पहले का है-
“हर्ष कैसा है? तेरे साथ है?”
“हाँ,और कहाँ? तेरे पति को गोदी लिए ही शहर-शहर घूमती हूँ। तू भी ऐसे ही प्यार से रखना उसे शादी के बाद। जानती है न वो कैसे सोता है?”
वह फिर शरारत पर उतर आई थी। आगे कुछ और कहती उस से पहले ही जल्दी से लिख दिया था मैंने-
“चल कॉल करना जब भी फ्री हो। शुभरात्रि।”
उत्तर में आदतानुसार संस्कृत का एक श्लोक भेजा हुआ था, जबकि सैकड़ों बार बताया था कि संस्कृत मैं समझ नहीं पाती।
फिर कितनी ही कॉल समय-समय पर हुईं। कितने ही संवादों से मैंने उसे जाना। उस से फ़ोन पर बात करना सरल था। संयत रहती थी। व्हाट्सएप पर तो कोई फिल्टर ही नहीं। मैं प्राय: असहज हो जाया करती थी। उसको कहती भी कि, “तू कितनी नालायक है!”
वह कहती, “मेरे पाँच बरस के बालक पर डोरे तू डालती है और फिल्टर मुझे लगाने के लिए बोलती है।”
“चुप कर, हर्ष के मन में शादी की यह ललक भी तूने ही डाली होगी”,मैं लगभग डाँट ही देती उसे।
“यकीन कर निराया! बहुत शौक है उसे शादी का, जाने क्यों! रोज़ ही शादी करना चाहता है। सबसे कहता है मुझ से शादी कर लो। पर तू याद रखना…तुझसे नहीं करूँगी जब तक संस्कृत नहीं सीखेगी!”
“क्या-क्या सीखूँ ? हिंदी और अंग्रेज़ी में भी हाथ तंग है मेरा तो”, मैं कह  देती।
“बस मेरे बेटे को खुश रखना सीख ले”, वह फिर खिलखिलातीI
“हे भगवान! तू चुप नहीं रह सकती क्या! जा बच्चों को पढ़ा। तेरे जैसी मास्टरनियों के कारण ही बच्चों का भविष्य अंधकारमय है।”
“मास्टरनी किसको बोल रही है? जॉइंट डायरेक्टर हूँ।”
“अच्छा मेरी माँ… जो भी है अभी जा! मुझे माफ़ कर जगदम्बा!”
…और फिर एक नया संस्कृत श्लोक। गुस्से की दो लाल इमोजी बना विदा ली। फिर वह समय भी आया कि तरस ही गई किसी भी भाषा में उसके सन्देश के लिए! कितने मैसेज किए समय-समय पर।
“नाराज़ है क्या? बुरा लगा हो तो कान पकड़ कर सॉरी…दिल से।”
“सब ठीक तो है? कॉल भी नहीं उठाती? बात क्यों नहीं करती?”
…सभी प्रश्न अनुत्तरित!
३.
रिद्धि की कॉल फिर से आ रही है, 
“हैलो…”,
“तू रहने दे। मुझे  बात ही नहीं करनी तुझसे। इतनी बिज़ी है तू?”
“सो रही थी, सच… बता न क्या हुआ? तू बोल”, मैंने मनुहार की।
“तुम लोगों को कितना परेशान कर रही हूँ न? पर और किस से कहूँ?”
“सबको नहीं खुद को”, कहते हुए मेरा स्वर भीग गया।
“हम लोग तो हैं ही तेरे लिए हमेशा। एक ही शहर में होते तो तुझे इतना परेशान न होना पड़ता।” 
“लेकिन मुझे हुआ क्या है?”,
दूसरी ओर से उसके कुछ असमंजस और कुछ उत्कंठा मिश्रित स्वर का आभास हुआ। हाँ, आभास ही तो, यह समझने की हिम्मत भी न थी कि वास्तव में वह विचार मंथन और यातना की किस प्रक्रिया से गुज़र रही होगी।
“इतना क्यों सोच रही है तू रिद्धि! डाक्टर्स इतनी फ़ीस ले रहे हैं उन्हें ही सोचने दे न”, कहकर सिर्फ सांत्वना ही दी जा सकती थी।
“कुछ तो बता? मैं बच तो जाऊँगी न?”
वह एक ऐसा सत्य जान लेने को आतुर थी, जो इस रोग की सामान्य परिणति हो सकता था। सीधे शब्दों में कहें तो एक घातक सत्य!
“कल का आश्वासन तो स्वयं ब्रह्मा भी नहीं दे सकते पगली, न तेरे लिए न मेरे लिए! बीमारी से नहीं मरेगी… यह लिख कर दे सकती हूँ।”  
मैंने सब कुछ जानते-समझते हुए भी उसे हँसाने की एक क्षीण सी कोशिश की, फिर स्वर को मुलायम करते हुए कहा, 
“हिम्मत रख! सब सही हो जायेगा। डॉ. उज्ज्वल से बात हुई थी। वे कह रहे थे कि सबसे अच्छी बात है कि ओरल थेरेपी है। बस दो-तीन महीने में एक बार आना होगा दिल्ली। कुछ समय शिमला से आ सकती है फिर इस बीच रौनक भैया दिल्ली में जॉब तलाश ही लेंगे।”
“ रौनक… वह तो डेनमार्क जा रहा है!”, उसने एक नई ही सूचना दी।
“डेनमार्क? क्यों?”
“एक ऑफ़र आया है वहाँ से… कहता है लाइफ़ टाइम मौक़ा है, वह आँसू ज़ब्त करती हुई बोली।
“तू पागल है क्या? तेरा लम्बा इलाज चलना है और बच्चों को भी कोई तो एक्टिव पैरेंट चाहिएगा न?”,मैंने थोड़ा हैरानी और चिंता से कहा।
“नहीं, उज्ज्वल बोल रहा था कि मैं जल्दी सही हो जाऊँगी।”
हे भगवान! यह लड़की या तो खुद पागल है या मुझे  कर देगी। मैंने गुस्से में फ़ोन रख दिया। दिमाग बुरी तरह घूम रहा था। रिद्धि न भी समझे तब भी रौनक भैया तो सब जानते हैं, कल ही तो फ़ोन आया था। खुद ही कह रहे थे कि बचेगी तो  नहीं अब यह!
यह सुनकर मेरी भी एकबारगी धड़कन रुक गई थी। मैंने विरोध करते हुए कहा था कि, 
“ऐसा क्यों सोचते हैं आप? बहुत कारगर दवाई है…चार  से पाँच साल तो मिल ही जाएँगे।”
“यह सब उसको मत बताना। झेल नहीं पाएगी”, वे अनमने से बोले। 
“हम्म.. ठीक है”, मैंने कहा था।
फ़ोन रख दिया लेकिन ‘रिद्धि नहीं बचेगी’ हवा में तैरता ही छूट गया। कितने वर्षों का साथ… अनगिनत स्मृतियों की साझा विरासत। क्या अब कोई ऐसा वेकेशन भी आएगा जब घूमने की जगह निर्धारित करने से पहले विचार करने के लिए रिद्धि होगी ही नहीं? उसकी अनुपस्थिति की कल्पना से ही मन भारी होने लगता है। शिवि और आरोही के एक ही कक्षा में होने से उपजी दोस्ती जो स्कूल और शहर बदलने पर भी फीकी नहीं पड़ी क्या अब यूँ ही स्मृतिशेष रह जाएगी?
खुशियाँ कितनी सापेक्ष होती हैं। कुछ माह पूर्व की ही तो बात है। ट्यूबरक्लोसिस हुआ है यह पता चलने पर कितना रोई थी रिद्धि, और अब… मैं तो कल्पना से ही सिहर उठी।
“मुझे कैसे हो गया? यह बीमारी तो गरीबों में होती है न!”
उसके स्वर में कातरता भी थी, क्षोभ और दुःख भी। नियति के आगे हम सब अकिंचन ही तो हैं, मन में सोचा। प्रकट में कहा था,
“नहीं, ऐसा किसी को भी हो सकता हैI हमारे देश की हवा में ही तैरते-उतराते हैं ये कीटाणु!”
फिर उसे हँसाने की गरज से आगे कहा, “वैसे इस रोग का एक नाम राजयक्ष्मा कुछ रॉयल फीलिंग देता है।”
वह सच ही हँस पड़ी, बोली तब यही नाम बताऊँगी सबको। एक सुकून की किरण रोशदान से भीतर दाखिल हुई और फ़ोन रख दिया।
हम सभी विचलित हुए थे, पर विश्वास था कि भारत में लाखों को होता है क्षय रोग… नौ माह दवा लेगी सही हो जाएगी। बस मैं उसे यही समझाती रहती थी कि बेहतर महसूस करने और स्वस्थ होने का आभास होने पर भी दवा बंद नहीं कर देना चाहिए। अधिकतर मरीज़ यही गलती करते हैं।
पर्वत मुझे सदा से ही रोमांचित करते रहे हैं…  सदा पर्यटक बन कर ही गई हूँ, पर अब पिछले तीन बरस से रिद्धि के अनुभवों से वहाँ मौजूद जीवन की दुश्वारियों को भी जाना। चिकित्सा सेवाएँ तो बेहद दयनीय हैं, इतनी कि अभी तक हुए सभी टेस्ट और रिपोर्ट्स कोई ठोस डायग्नोसिस तक नहीं दिखा पाए हैं। रिद्धि को कहा भी था कि या तो यहाँ मेरे पास आ जा, विनीत का ही ट्रीटमेंट ले ले, नहीं तो दिल्ली ज़रूर दिखा ले।
तब वह बोली थी, “नहीं, अभी जाना सम्भव नहीं। ट्रीटमेंट तो शुरू हो गया है। बेहतर महसूस कर रही हूँ फिलहाल।”
बहुत टूटे हुए मन से फ़ोन आते थे उसके। तब बताती थी कि छोटे के साथ बच्चों ने स्कूल में खाना खाना बन्द कर दिया हैI बच्चे बोल रहे हैं कि उनकी मम्मी ने कहा है, “शोभित से दूर रहना… उसकी मम्मी से बीमारी उसे और तुम्हें भी हो सकती है।”
कितनी चुभन थी उन शब्दों में। एक माँ थी मैं भी, बच्चे के मन में उकेरे गए वह शब्द मेरी आत्मा को भी भेद गए थे… रिद्धि को कैसा लगा होगा शब्द-बाणों से भरी इस संवेदनहीनता पर, समझ सकती हूँ। एक बड़े प्ले-ग्राउंड में अपने भरे टिफ़िन और भरी आँखों के साथ दोस्तों को निहारता छह साल का मासूम बच्चा, जिसका हक़ है अभी केवल जीवन के सुखद रंगों को छूना, उमंगों को महसूस करना… उसे उपेक्षा  के स्याह आवरण में जबरन क्यों धकेला जा रहा है? उन माओं की आशंका भले ही काफी हद तक निर्मूल हो पर  चाहकर भी उन्हें पूर्णरूप से दोषी भी तो नहीं मान सकती।
रिद्धि की बेटी आरोही इतनी बड़ी तो नहीं कि बिना माँ के आसानी से सब सम्भाल सके, किंतु इतनी समझदार अवश्य है कि क्या माँ को नहीं बताना है, इसका भान ज़रूर है उसे। उम्र के इस मोड़ पर माँ का होना बेटियों के लिए कितना ज़रूरी होता है… मैं तो अभी तक हर बात माँ से साझा करती हूँ… जब तक न करूँ, चैन ही नहीं पड़ता।
दवाई नियमित लेने पर भी रिद्धि की हालत और बिगड़ती गई थी। दो माह के बाद री-चेकअप पर फेफड़ों में पानी बताया गया। पानी की जाँच की रिपोर्ट किसी अनहोनी का संदेश लेकर आई थी। स्पष्ट था कि जो व्याख्या की गई है वह फेफड़ों में कैंसर की ही घोषणा करती है। तब भी विनीत और मैं दोनों प्रार्थना कर रहे थे कि आगे होने वाली जाँचें ट्यूबरक्लोसिस की ही पुष्टि कर दें, तो बेहतर है। कल जो रोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे… आज उसकी ही पुष्टि चाहते थे।
रिद्धि को तुरंत दिल्ली आने के लिए बोला और विनीत भी दिल्ली रवाना हुए। दिल्ली के प्रतिष्ठित राजीव गाँधी मेमोरियल अस्पताल में डॉ. उज्ज्वल से संपर्क किया गया। दो दिन वहाँ रुक कर और सभी आवश्यक जाँच कराकर विनीत लौट आए थे। रिपोर्ट्स में १० से १५ दिन लगने थे हालाँकि यह तय था कि कैंसर न केवल फेफड़ों में बल्कि हड्डियों में भी अपने पैने दाँत मार चुका हैI अब बस जीन स्तर पर आइडेंटिफिकेशन कर दवाई शुरू होनी थी। दवाई भी अत्यंत महँगी थी और जर्मनी से आनी थी। आँकड़ों के अनुसार यह जीन टारगेट थैरेपी पाँच साल तक दे सकती है रिद्धि को।
रिद्धि को अभी न बताना ही उचित समझा गया क्योंकि वह बेहद अवसाद में थी और अनवरत रोती  थी। दिन में कई फ़ोन यही पूछने के लिए आते थे।
“कुछ छिपा तो नहीं रही न? लोग कहते हैं कि कैंसर है।”
“ऐसा कौन बोला?”,मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा।
कोई जवाब नहीं, बस हिचकियाँ।
“आज शाम को अपॉइंटमेंट है न…डॉ. उज्ज्वल से ही पूछ लेना। फालतू लोगों की बातों में आकर क्यों आँसू ज़ाया करती है”, मैंने उसे स्नेह से समझाना चाहा।
बहुत देर तक उसे समझाती रही थी। वह बस “हम्म.. हम्म” करती रही। फ़ोन रख कर भी मन विचलित था और मैं स्तब्ध थी कि यह कौन लोग हैं जो भयावह सत्य मरीज़ के सम्मुख स्पष्ट ही कह देने की सामर्थ्य रखते हैं।
इस मामले में रिद्धि का भी अविवेक उतना ही अचम्भित करता है। मुझे आश्चर्य होता है कि वह स्वयं समझ क्यों नहीं पा रही या समझ कर भी स्वीकारना नहीं चाह रही है। कभी-कभी सच बिल्कुल हमारे सामने बैठा होता है और हम उससे वैसे ही आँखें चुराते हैं जैसे मना करने का बावज़ूद मिठाई खाता बच्चा अपनी माँ से। फिर चोर आँखों से हम चुपके से उसकी तरफ़ देखते हैं और वह हमारी ही ओर देख  निर्लज्जता से मुस्कराता है। हम पुनः नज़र फेर लेते हैं और वह अपनी उपेक्षा से क्रोधित हो अचानक छलांग लगा कर हमें ज़मींदोज कर जाता है।
पानी निकालने के लिए एक दिन अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान कितनी ही बार वह शापित शब्द उसे सुनाया गया है। हर बार वह रोते हुए मुझे फ़ोन करती है और मैं अपनी समस्त अभिनय क्षमता का प्रयोग कर उसे विश्वास दिलाती हूँ कि ऐसा कहने वाले सब मूर्ख और जाहिल लोग हैं।
हालाँकि मैंने रौनक भैया से कई बार कहा कि डॉ. उज्ज्वल से बात कीजिए वह बता भी देंगे और काउंसिलिंग भी करवा देंगे। मेरा मानना है कि सच को स्वीकारने से आधी लड़ाई हम जीत लेते हैं पर उनका कहना था कि नहीं, रिद्धि को जब तक पता न चले बेहतर है!
आनंदी को फ़ोन मिलाया। जैसा कि अपेक्षित था, नहीं ही उठा, तो  खीझ कर मैसेज किया, 
“दुष्ट इतना ही लिख दे कि सब ठीक हैI तेरी चुप्पी जानलेवा है”, उत्तर तो क्या ही आता।
मन का बोझ हल्का करने के लिए उमाशंकर सर को व्हाट्सएप पर मैसेज किया, “आनंदी का आज भी कोई उत्तर नहीं आया। लोग अकारण, अनायास कैसे बदल जाते हैं।”
“अकारण क्यों.. ज़रूर तुमने ही कुछ कहा होगा। तुम्हारी ही आदत खराब है। चेक करो, ब्लॉक भी किया होगा तुमको।”
“जी, मैं ही बुरी हूँ। आप भी कर दीजिए ब्लॉक।”  
कह तो डाला था पर मन का कसैलापन और भी बढ़ गया। आँखों में आँसू आ गए। जो आप सुनना चाहो वही कहने वाला कोई दोस्त मिल जाए तब जीवन जन्नत न बन जाए पर मेरी ऐसी किस्मत कहाँ। रिद्धि और उमाशंकर सर तो यूँ भी बस मेरे जीवन में मेरी मानसिक शांति का हरण करने ही दाखिल हुए हैं। दोनों का जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी मुझसे भिन्न है। दोनों ही निर्दोष झूठ बोलने में माहिर और स्वयं को सदा परम ज्ञानी समझने वाले। उमाशंकर सर का जब भी  मन उदास होता है, कितनी ही देर, समय-असमय बात करते हैं। अब मैं भी किसी का कोई दुःख- तकलीफ़ नहीं सुनूँगी। कठोर निर्णय के साथ दाल का कुकर गैस पर रख दिया।
शिवि और दिवि भी स्कूल से लौट आए थे। दिवि देखते ही बोली, “आज मेरी मम्मा सैड-सैड क्यों है?”, सात साल की यह बच्ची सदा मेरा उतरा चेहरा पहचान लेती है।
“पापा से फिर लड़ाई हुई क्या?”, शिवि ने बैग रखते हुए  पूछा और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए सोफ़े पर लेट गई।
मैं तो चाह ही रही थी किसी से मन साझा करना, उसकी आशा के विपरीत आज जवाब दिया,
“नहीं। बस मन ऊब गया अब सबसे। आनंदी ने आज भी फ़ोन नहीं उठाया।”
“जाने दो न…आप क्यों करती हो बार-बार कॉल?”, वह त्योरियाँ चढ़ाती उठ बैठी।
शिवि कहाँ जानती है अभी कि मन में एक बार प्रवेश दे कर किसी को जाने देना कैसा कठिन होता है। तीन-चार स्क्वायर फ़ीट के स्थान में खड़ा एक व्यक्ति जब जाता है तब कितनी अधिक रिक्तता पीछे छोड़ जाता है। एक गहरा उच्छवास छोड़ प्रकट में कहा,
“बस डर लगता है कि किसी परेशानी में न हो। रिद्धि को देख कर जीवन की अनिश्चितता डराने लगी है।”
“उमाशंकर सर से भी लड़ाई हुई”, धीरे से आगे जोड़ा।
“फिर से?”, दिवि ने आश्चर्य जाहिर किया।
शिवि बोली, “व्हाट्सएप पर लोग लड़ाइयाँ लड़ लेते हैं यह बड़ा आश्चर्य है।”
जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य मानव मन है, मैंने सोचा और फिर इस आभासी जगत में एक संशय हर विश्वास के साथ दबे पाँव चला करता है।
पूरी रात नींद नहीं आई। बैचैनी सी रहीI रिश्ते सहजने का हुनर जाने कब सीख पाऊँगी। 
विनीत को बोला, “आनंदी अब बात ही नहीं करती।”
वह बोला, “तुम फेसबुक के इन झूठों में ही फँसी रहो। कैल्शियम लिया? खुद पर ध्यान दो।”
उसको कैसे समझाऊँ कि आनंदी से रिश्ता आभासी नहीं रहा है और फेसबुक पर भी इंसान ही हैं। हज़ारों की भीड़ में जाने कैसे किसी-किसी से मन बँध जाता है। विनीत को फिर जगायाI कहा, “तुम्हें इतनी ही चिंता है तो खुद ही क्यों नहीं देते रोज़ कैल्शियम। मोदी से फुर्सत मिले तब न।” वह कुछ नहीं बोला। मैंने इसे अपनी जीत माना और सो गई।
आज रिद्धि को डॉ. उज्ज्वल से मिलना था। उसे फ़ोन किया। उसकी आवाज़ की खनक विंडचाइम बनकर हवा में तैरती हुई सब नकारात्मकता को हर ले गई। फ़ोन उठाते ही बोली,
“उज्ज्वल बोला कोई भी तुम्हें कैंसर बोले तो कान के नीचे एक लगाना उसको।”
कितना विचित्र है कि विपदा इंसान को फिर से शैशव काल में पहुँचा देती है…बहलाना कितना सरल हो जाता है!
रिद्धि को कहा, “बिलकुल यही करना है। जीवन में स्ट्रेस देने वाली हर बात, हर व्यक्ति को एक ज़ोर का झापड़ रसीद करना है,” फिर भी असलियत जानने के लिए पूछना तो ज़रूरी था, 
“सी. टी.  रिपोर्ट में क्या आया?”
“अभी रिपोर्ट नहीं आई। वहाँ पहुँची तो वे सब कहने लगे कि ओहो! टेंशन पेशेंट आ गया। अब हमारा क्या होगा? देख तो पूरे अस्पताल में मुझे बदनाम किया इन लोगों ने। उज्ज्वल भी बोल रहा था आप कौन? आपको मैं नहीं जानता। मैं तो रोने वाली रिद्धि को ही जानता हूँ।”
वह हँसी। आगे बोली, “मैंने कहा कि आप तो अपनी सब डिग्री इस्तेमाल कर मुझे ठीक कर दो बस। फिर कभी नहीं रोऊँगी। वह बोला कि आपकी छोटी सी बीमारी के लिए इतनी भारी भरकम डिग्रियों की ज़रूरत ही नहीं।”
रिद्धि की हँसी से मेरी आँखें भीग गईं। यूँ ही तो डाक्टर्स को भगवान नहीं कहते। निरपेक्ष भाव से हर मरीज़ को जीने की आस दिए रखना…अपने स्नेहिल शब्दों से प्रतिपल मृत्यु के अंदेशे के दंश से मरीज़ को मुक्ति दिलाना… ऐसा तो कोई देवदूत ही कर सकता है न!
उमाशंकर सर के सन्देश हैं, “तुम्हें कोई परवाह नहीं। बस फेसबुक घूमो।”
“नहीं, रिद्धि से बात हो रही थी, वह खुश है आज! मन हल्का हुआ कुछ”, उन्हें सूचित किया।
“नावेल का लिंक भेज रहा हूँ। कुछ समय मिले तो पढ़ लेना।”
यहाँ जीवन मूर्त रूप में मेरे आस-पास अत्यधिक अवसादी उपन्यास निरंतर लिख रहा है। यह महाशय उस पर  भूल से भी सांत्वना के झूठे दो शब्द नहीं कहते। लिंक आ चुका है। सर जा चुके थे।
विनीत सही कहता है कि  अधिकतर लेखक हैं तो आत्मकेंद्रित। आप जान दे दो तब भी वे खुश नहीं। उनका लिखा सरहाते रहो। बस यह सतत प्रशंसा ही रिश्ते की बुनियाद है ।
५.
बेमन से लैब का काम निबटा रही थी। मेरे सामने झाँसी की चिलचिलाती गर्मी में अपने वज़न से भी ज्यादा वज़न की साड़ी पहने, लम्बे घूँघट में एक स्त्री बैठी है। एक लड़की उसकी गोदी में है और एक उसके साथ आए पुरुष, जो संभवत इन बच्चियों का पिता है, के साथ खड़ी है। रिपोर्ट्स के अनुसार तीसरा बच्चा इसके गर्भ में है। 
यह सब देख कर गुस्से से मेरा बदन काँप रहा है। कहना बहुत कुछ चाहती हूँ लेकिन अब बरसों का अनुभव कहता है कि अधिक बोलना उचित नहीं। उसके खून की रिपोर्ट भी मेरे पास आ चुकी है, जिसके अनुसार हीमोग्लोबिन केवल साढ़े पाँच ग्राम हैं। रिपोर्ट साइन कर उसकी और बढ़ाते हुए मैंने कहा,
“कभी सोचा है कि तुम्हारे बाद इन दोनों को कौन पालेगा।” 
वह शायद किन्ही ख्यालों में खोई थी। जाने कितनी मेरी बात समझी कितनी नहीं। बस घूँघट में से पति की ओर देखने लगी जो बिल के भुगतान में व्यस्त था। फ़ोन पर रिद्धि का नाम देख मैं उठ कर लैब से बाहर आ गई।
“रौनक किसी से बात करता है रे! पहले भी देखा था मैंने… फिर उस लड़की से बात भी की दोनों बोले- ‘कुछ नहीं है’। फिर रौनक बच्चों की कसम खाया कि अब कभी नहीं करूँगा लेकिन कल फिर मैंने देखा नंबर अलग था लड़की वही।”
मैं  स्तब्ध थी। रिद्धि की बंगाली मिश्रित हिंदी के कारण मैं ही कुछ गलत समझ रही हूँ क्या या वह यही कह रही है। कैंसर के दैत्य से जूझती पत्नी को छोड़कर कैसे कोई…  कछुआ फिर अपने पैर सिकोड़ने लगा। खोल में घुसने ही वाला था कि रोती हुई रिद्धि की साँस अवरुद्ध होती प्रतीत हुई और सिर बाहर निकाल मेरा कुछ कहना ज़रूरी हो गया।
सँभाल खुद को। पानी पी पहले। तू क्यों उनके पीछे अपनी जान देती है। करते हैं बात तो करने दे। कौन सा आकर इनका घर-परिवार सँभाल
लेगी। जाने क्यों प्रभु ने पुरुषों को पाषाण ही बनाया है। सारे पुरुष लम्पट ही हैं। बस सामाजिक प्रतिष्ठा के डर से सभी सभ्य बने रहते हैं। अब सोशल मीडिया ने हर घर तक वेश्यालय सुगमता से पहुँचा दिए हैं”, मेरा स्वर अनायास ही कड़वा हो चला था।
“सब कहते हैं कि मैं रोती बहुत हूँ। न रोऊँ तो क्या करूँ निराया…बोल तू? शरीर साथ नहीं देता। दवाई से पूरा दिन मुँह कड़वा… पूरे शरीर… हर हिस्से पर दवाई से रिएक्शन… हर दिन मौत से लड़ कर भी जीतने की कोशिश करती हूँ तो अपने परिवार के ही मोह में न? और वह भी मेरे साथ नहीं तब क्या करूँ?  बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाएगा इस का भी भरोसा नहीं अब तो मुझे।
“मैं तभी तो  कहती हूँ कि हिम्मत रख …मजबूत बन। हार मानने का तो तेरे पास विकल्प ही नहीं है।”
“बहुत हिम्मत रखती हूँ रे! लेकिन फिर टूट जाती हूँ। कल उज्ज्वल से भी बात की थी। दवाई की डोज़ कम की है। शरीर नहीं सह पा रहा। पूरे दिन पेट में जलन होती है।”
“कोई बात नहीं। हर लम्बी बीमारी में डोज़ घटती- बढ़ती रहती है, इस बात की चिंता न कर”, कुछ और सच्चे-झूठे आश्वासन दे कर फ़ोन रखा।
कितना सरल है हिम्मत रख कहना। कितना कठिन है धारा के खिलाफ बह नियति के फैसले को बदलना। कहाँ से जुटाएगी वह इतनी हिम्मत?
विनीत को फ़ोन करके बताया। वह मरीज़ों में घिरा था, झल्लाता सा बोला,
“अब ठीक है, रिद्धि पूरे दिन रोएगी तो बेचारा आदमी कहीं तो मन बहलाएगा।”
६.
बेचारे आदमी के शॉक से उभर पाती उससे पहले ही घर के ग्राउंड फ्लोर से आते शोर ने धड़कन बढ़ा दी। अभी कुछ दिन पहले घर के बाहर एक साँप निकला था, वही भीतर तो नहीं चला आया। इस बरस खूब मेह बरसा है। सब ओर आदमी से भी ऊँची घास उग आई है। जल्दी से सीढ़ियाँ उतरती नीचे पहुँची। बच्चे स्कूल से आ गए हैं। 
“क्या हुआ”, 
मैंने उत्तर सबके चेहरों पर तलाशा। शिवि हाथ आगे बढ़ाती हुई बोली,
“देखो, हम स्कूल से आए तो यह अनजान बच्चा अपना परमानेंट बैग टाँगें घर पर ही इंतज़ार करता मिला।”
“हे भगवान… अब इसे कौन सँभालेगा?”,  मैंने आँखें तरेरी।
“यह यहाँ आ कैसे गया…”, आगे पूछा।
“यही सवाल कब से हम सब भी कर रहे हैं, लेकिन यह इतना छोटा है कि बोलना भी नहीं जानता। कुछ पूछो तो बस गर्दन उचका निरीह आँखें हम पर टिका देता है”, शिवि खिलखिलाई।
पल भर मेरी नज़र हँसी के उजास पर रुकी, फिर उस उजास के स्थायी होने की दुआ करती वापस आगंतुक पर टिक गई।
मासूम शिशु को ठहराने के लिए एक काँच का केतलीनुमा महल दिया गया। घर आए मेहमान को भूखा रखना तो भारतीय संस्कृति के विपरीत होता, सो  तुरंत ड्राइवर को उसकी रुचि का खाना लाने भेजा गया।
नवजात शिशु सा दिखने वाला यह कछुआ जाने कहाँ से हमारे घर की पोर्च में मिला। आस-पास कोई नदी,तालाब या पोखर भी तो नहीं। बच्चों को एक नया खिलौना मिल गया। 
इसी बीच कुछ मित्रों ने इसे लक्ष्मी के आगमन का शुभ संकेत बताया है। विनीत को उम्मीद है कि प्रॉपर्टी की उनकी डील अब  फ़ाइनल हो जाएगी। सिर्फ़ मुझे ही वह नन्हा जीव सालमोनेला बैक्टीरिया का संग्रह लग रहा है और जो भी उसे छू रहा है मैं उसे समझा रही हूँ कि हाथ भली प्रकार साबुन से धोना जबकि जानती हूँ यह अनसुना ही रह जाने वाला है। जल्द से जल्द इसके निवास का पता चले तो जान बचे, मैंने सोचा।
वह छोटा सा कछुआ टर्टल से ‘टूटू’ हो गया। टूटू पुकारने पर अपनी गर्दन ऊपर उठा आँखें भी झपकाने लगा। भ्रमण के लिए उसे कोरिडोर में छोड़ा गया। वह तेजी से दौड़ पड़ा।
“अरे कछुए तो धीरे चलते हैं। हमारा टूटू अलग ही तेज है”, शिवि चिल्लाई।
मुझे ‘गुरुदेव’ का रायचरण स्मरण हो आया। घुटनों चलता मुन्ना उसे भी यूँ ही विशिष्ट लगता था।
“दीदी, इसी ने खरगोश को हराया होगा”, दिवि ने संशय निवारण किया।
दिवि और शिवि के चेहरे पर वही पुलक है जो पहली दफा अपने शिशु को चलता देख किसी माता-पिता को होती है। पूरी शाम शिवि उसे अपनी हथेली पर लिए ही अपनी पढ़ाई करती रही। हालाँकि पढ़ी कम उसे निहारती अधिक रही। दिवि ने कुछ बोलना चाहा तो उसे इशारे से चुप रहने को कह भरे गले से बोली,
“सो गया है”, आँसू की दो बूँदें उसके कोरो पर झिलमिला रही थीं। लड़कियों में मातृत्व उम्र का मोहताज नहीं होता। 
इसी भीगे हुए पल में फ़ोन बजा। उमाशंकर सर का था। मन का गीलापन ‘हैलो’ में भी घुल गया।
“क्या हुआ?”, चिंतित स्वर उभरा।
“कुछ नहीं। नया मेहमान आया है घर में”, मैं आँसू पोछते हुए हँस पड़ी। उन्हें पूरी कहानी बताई।
वे बोले, “विनीत सही कहता है। तुम दिवि से कम नहीं हो। किसी भी बात पर हँस सकती हो किसी भी बात पर रो सकती हो।”
उनका यह स्नेहसिक्त स्वर मुझे भाता है। जब वह अभिभावक की भूमिका में आते हैं तब मैं सच ही स्वयं में दिवि से भी अधिक बालपन महसूस करती हूँ किन्तु नाम में जुड़ा शंकर कब उन्हें रौद्र रूप में ले आएगा इसकी गणना का सही सूत्र मैं विगत तीन वर्षों में प्रतिदिन होने वाली अनगिनत बातों और समय-समय पर हुईं कई मुलाकातों के बाद भी नहीं जान पाई हूँ। बस कामना करती हूँ कि वे सभी कारक जो उन्हें उद्वेलित करते हैं, उनके जीवन से दूर हो जाएँ।
रात को टूटू को मेरे कमरे में ही इस हिदायत के साथ रख दिया गया है कि ध्यान रखिएगा। आज न आनंदी याद आई… न रिद्धि… न उमाशंकर सर से हुईं लड़ाइयाँ। यूँ लगा कि कोई नवजात शिशु बराबर में सोया है। लाइट ऑफ की, फिर लगा कहीं टूटू डरे न। विनीत बोले नदियों में रात को कौन बल्ब जलाता है। बात सही लगी। लाइट बंद कर दी। ए.सी. से ठण्ड खा सकता है तो वह भी बंद कर दिया गया। रात में उठ कर चार बार देखा, वह सोया नहीं था पानी में हाथ-पैर चलाते ही मिला।
“यह सोता क्यों नहीं?”, विनीत को जगाया।
“नई जगह है। कुछ दिन लगेंगे पहचानने में। तुम सो जाओ।” वह बोला।
फिर जाने कब आँख लगी सुबह उठते ही भाग कर टूटू को देखा। एकदम निश्चल पानी की सतह से कुछ नीचे पड़ा हुआ था। ‘टूटू-टूटू’ पुकारा, पर कोई हलचल नहीं। मेरी धड़कने बढ़ने लगीं। काँच की दीवार के साइड से उसके लेवल पर झुक कर देखा तो शैतान ने हौले से आँखें खोल, ‘कुछ देर और सोने दो न’ के भाव के साथ पुन: मूँद ली। किसी दिन यह आँख नहीं खुली तो… आगे का दृश्य सोचने की भी हिम्मत नहीं हुई।
बच्चे स्कूल चले गए। मैं यू ट्यूब पर टूटू की देखभाल के वीडियो देखने लगी। नाश्ता दे कर उसे सन बाथ के लिए धूप में बिठाया गया। बर्तन में दो बड़े पत्थर डाले गए ताकि वह अपनी इच्छानुसार जल-थल का चयन कर सके। समय- समय पर खाना दिया गया। शाम बच्चों के साथ खेलते बीती। परेशान होने पर या रास्ता न सूझने पर वह अपना एक पैर उठा मुँह पर रख लेता है। बच्चों को इसमें खूब आनंद आ रहा है।
टूटू के लिए विशेष रूप से कछुए को रखने के लिए ही डिज़ाईन किया गया बर्तन मँगाया गया। अब वह न केवल पत्थरों पर बल्कि उसमें लगे एक नन्हे पेड़ पर भी चढ़ कर बैठ जाता है। दाने डालने पर नन्हा मुँह खोल उन्हें खाने आता है। उसे खाना खाते देख असीम संतुष्टि का अनुभव होता है। यूँ ही तो स्त्रियों को अन्नपूर्णा नहीं कहा जाता। अवांछित मेहमान की भी क्षुधा तृप्ति उन्हें असीम संतोष देती है।
७.
रमेश को दोपहर के खाने के सब निर्देश दे कर अपने कमरे में आई तो रिद्धि की दो मिस्ड कॉल थीं और व्हाट्सएप पर छह नए मैसेज भी। इस लड़की के चहेरे पर मुस्कान बनाए रखना काश मेरे बस  में होता। जब वह अपने जीने की आस छोड़ रो रही होती है तब दिल होता है कि उसको कहूँ कि रिद्धि तू बच्चों की चिंता में न रोना… मैं हूँ वह हर सपना पूरा करने के लिए जो तूने उनके लिए देखा है, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति ऐसी है कि वह इस कथन को अपनी मृत्यु का प्रमाण पत्र मान लेगी। 
व्हाट्सएप पर कुछ तस्वीरें डाउनलोड हो चुकी हैं। दुर्भाग्य अपने वीभत्स रूप में मैसेंजर के स्क्रीन शॉट के रूप में सामने खड़ा है। किसी एकता से रिद्धि की मैसेंजर पर बात हुई है जिसके अनुसार रौनक भैया ने मेट्रोमोनियल साईट पर एकाउंट बनाकर एकता को अप्रोच किया है। एकता ने रिद्धि से उसके पूर्व पति के बारे में जानना चाहा है और रिद्धि ने प्रतिवाद करते हुए बताया है कि वह दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं। जवाब में एकता ने फ़ोटो भेजे हैं जिनके अनुसार भैया ने कहा है कि उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका है और अब वह कैंसर के अंतिम चरण में है। बात के सत्यापन के लिए रिद्धि की सभी रिपोर्ट्स के भी फ़ोटो भेजे गए थे।
प्रतीत हुआ कि  मेरा सिर ही नहीं समस्त ब्रह्मांड घूमता हुआ किसी गहरे गर्त में समाता जा रहा है। सिद्धार्थ के यशोधरा को सोता छोड़ कर जाने के लिए मेरा स्त्री मन कभी उन्हें माफ़ नहीं कर पाया है लेकिन आज में बुद्ध हो जाना चाहती हूँ। तमाम सुख, दुःख ,रिश्ते, नातों से ऊपर उठ जाना चाहती हूँ। लेकिन मैं एक बेहद साधारण स्त्री हूँ। न वेदनाओं को दृढता से परास्त करने की ताकत है और न बुद्ध जैसी तटस्थता लाने की सामर्थ्य।
‘गपशप’ ग्रुप में मंजरी दीदी का मैसेज है। बता रही हैं कि किसी बड़े कवि (उम्र और साहित्यिक कद, दोनों के अनुसार) ने उनकी फेसबुक की प्रोफ़ाइल पिक्चर पर दिलचस्प कमेंट किया,
“स्वर्ग की अप्सरा चाँदनी में नहाई है …किसकी तलाश में धरा पर चली आई है।”
“अस्सी वर्षीय बुजुर्ग कवि के चिरयुवा मन के कुंठित उद्गार!”, हँसी की चार इमोजी साथ लगाते हुए अंजना दीदी ने लिखा।
“हँसो नहीं… बोलो क्या करूँ?”, उनका  वॉइस मैसेज आया।
प्राइवेट स्कूलों में प्रोजेक्टस के भार से दबी यह दोनों ही मेरी प्रिय दीदियाँ समयाभाव में इसी तकनीक से वार्तालाप करती हैं।
“करना क्या है। खुश हो ले…”, अंजना दीदी बोली।
“…और यह कमेंट पढ़ते ही पति की ख़ुशी जो गायब होने वाली है उसका क्या”,  चिंतित स्वर उभरा।
“लिख दो अतीव आभार आदरणीय। कमेंट सहेज ले रही हूँ। बड़ा नाम है। कृपादृष्टि हुई तो पुरस्कार दिला सकता है…”
“न, न आदरणीय न लिखना… लिखना प्रिय सखा…”, अंजना दीदी की हँसी नहीं रुक पा रही थी।
“ऐसे लोग प्रमोट करेंगे तो पति डिमोट कर घर से निकाल देगा।”
ऐसी ही बेतुकी हँसी की कुछ फुलझड़ियाँ और छूटी फिर सभा विसर्जित हो गई। इन बेतुकी बातों से ही जीवन में सब रस है, मैंने फ़ोन बंद करते हुए सोचा। रिद्धि को भी फेसबुक पर कुछ ऐसे उदारमना कवियों से जोड़ दूँ क्या? मन में एक चोर प्रश्न उठा।
कुछ ही देर में पुनः नोटिफिकेशन की आवाज़ हुई। खोला तो मंजरी दीदी का सन्देश लिखा था, “दो मिनट तक निहार कर, फिर दिल पर पत्थर रख कर डिलीट कर दिया है कमेंट।”
“सही किया…”, अंजना दीदी और मेरा एक सा उत्तर एक साथ स्क्रीन पर दिखने लगा।
यंत्रचलित अवस्था में रिद्धि को फ़ोन मिलाया। यूँ मेरा मानना है कि रिश्तों में प्रेम भले ही कम भी मिले लेकिन मान पूरा होना चाहिए, किन्तु आज उसे बोला,  “इन सब पर ध्यान मत दे। इस लड़की को भी ब्लॉक कर। भैया, डॉक्टर के पास तेरे साथ जाते हैं…इलाज कराते हैं बहुत है। जर्मनी से दवाई मंगाने के लिए भी देख कितनी भाग-दौड़ की। तू बस अपनी सेहत पर ध्यान दे, जितना देख कर मन प्रसन्न रहे उतना ही देख बाकी सब से आँखें मूंद ले।”
ज़िन्दा रहने के लिए अंधा हो जाने का जाने कौन सा दर्शन मैंने उसे समझाया और कितना उसको समझ आया कह नहीं सकती लेकिन अपनी अर्धांगनी की मृत्यु से भयभीत हो उसकी मृत्यु की भी प्रतीक्षा किए बिना, अपने लिए साथी का पूर्वप्रबंध करने में प्रयासरत पुरुष के किसी भी कार्य से उसकी स्त्री को अपना चित्त, विचलित करना मुझे उचित नहीं जान पड़ता  यह और बात है कि मन तथ्यों को ठुकरा विगत भावनाओं के बहकावों में ही डूबा रहना चाहता है। रिद्धि का ज्ञात नहीं लेकिन मेरे मन में अवश्य ही पुरुषों के लिए कटुता बढ़ती गई और विनीत से प्रतिदिन होने वाले झगड़ों की आवृत्ति भी।
रात भर दोनों के मध्य अबोला ही रहा। सुबह सिर भारी। प्रतिदिन की तरह सबसे पहले उठकर टूटू को देखा। किसी सिद्ध योगी-सा निर्विकार पत्थर पर चढ़ा हुआ बैठा है। दो बार पुकारा पर कोई हरकत नहीं …प्रतिदिन का खेल! गार्ड को आवाज दी। कहा,
“यह भी हम सब-सा ही आलसी होता जा रहा है। कोरिडोर में छोड़ो इसे।”
 बाहर छोड़ा लेकिन और दिन जैसा चला नहीं पैर सिकोड़ वहीं का वहीं बैठ गया। बच्चों को स्कूल भेज टूटू को वापस पानी में छोड़ा…खाना दिया। शायद नाराज़ है, कुछ नहीं खाता। मजबूरी में लड़ाई को दरकिनार कर विनीत को पुकारा, 
“हम लोगो की तो कोई परवाह नहीं कम से कम इस पर तो ध्यान दो। कुछ खाता नहीं आज वैट को दिखाना होगा।”
“ठीक है…पता करता हूँ, लेकिन गुस्सा तो छोड़ो! करे कोई भरे कोई। यह क्या मतलब हुआ? मुझसे क्यों नाराज़ हो?”, 
विनीत बाँहों में भरता हुआ बोला। आँखें फिर भर आईं। किस से नाराज़ हूँ? विनीत से? रौनक भैया से? समस्त पुरुष जाति से? या सृष्टि के सबसे खराब कहानीकार ईश्वर से?
“रोते नहीं। हिम्मत रखते हैं”, 
विनीत मेरे आँसू पोंछता बोला। रौनक से बात हुई थी वह कह रहा था जैसा यह लोग सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है।
“उनका विश्वास करें कि एकता के भेजे स्क्रीन शॉट्स का?”, मैंने प्रतिवाद किया।
“जिस पर विश्वास कर शांति पा सको”, वह गहरा उच्छवास छोड़ता बोला।
कुछ भ्रम जीने के लिए आवश्यक हैं… मैंने सोचा।
विनीत ने ड्राइवर को पुकारते हुए कहा, “अरुण, टूटू को एक्वेरियम की दुकान पर दिखा कर लाओ, उन्हें अंदाजा रहता है। मैं वैट का पता करता हूँ,” मुझे आश्वासन दे क्लिनिक के लिए निकल गया।
अरुण ने वापस आकर बताया कि दुकानदार कहता है कि सब ठीक है। बस ठण्ड खा गया है। धूप में ज़्यादा रखो। एक गोली पानी में डालने के लिए दी है।
“हम्म … पूरा दिन तो इसके साथ धूप छाँव खेलते निकलता है, पर तब भी सुस्त हो गया। मानो मेरे मन की चिंता इसके तन को लग गई है।”
अब जब भी रसोई में जाओ तब लगता है कि एक बच्चा घर में उपासा है और हम सब तीन समय खा रहे हैं। बच्चे भी टूटू के पास ही उदास बैठे हैं। ड्रॉपर से उसे खीरे का रस पिलाना चाहा लेकिन वह मुँह नहीं खोलता।
“यह आया कहाँ से? इसकी माँ का पता करो। माँ के बिना कैसे बच्चा पनपेगा”, मैंने कहा।
टूटू को भेजने की बात सुनते ही दिवि रोती हुई भाग गई। उसे समझाने उसके पीछे आई तो वह मन्दिर में हाथ जोड़े बैठी सुबकती हुई मिली।
“बच्चों को माँ से दूर न किया करो प्रभु”, मैंने भी विनती की। एक डर ने भी मन में दस्तक दी। रिद्धि की बीमारी क्या उसके बच्चों से माँ और पिता दोनों ही छीन लेगी?
शिवि टूटू को हाथ में लिए आई है, “मम्मी देखो तो इसको आँख के पास यह छोटे-छोटे दाने कैसे?”
“हम्म…, टूटू को पानी में छोड़ कर हाथ धो साबुन से। हाथ मे न लिया कर इसे अब। दूर ही रहो”, मैंने चिंतित स्वर में हिदायत दीI जब चयन करना होता है, दयालुता पर मातृत्व प्रायः जीत ही जाया करता है।
“ऐसे मत बोलो”, शिवि का स्वर भीग उठा।
फिर खुद को संयत करती आगे बोली, “आजकल यह पानी में नहीं जाना चाहताI पत्थर पर ही बिठा देती हूँ।”
कुछ मित्रों को फ़ोन किया जिनके घर एक्वेरियम थे लेकिन वैट का नंबर नहीं मिल पाया। छोटे शहर में वैट का मिलना दुर्लभ ही प्रतीत होता है।
८.
नोटिफिकेशन की आवाज़ से कुछ उम्मीद जगी।फ़ोन देखा तो मैसेंजर पर आनंदी का सन्देश देख सुखद आश्चर्य हुआ।
 लिखा था, “नाराज़ नहीं हूँ परेशान थी।”
“एक बार बता तो देती। कितनी चिंता हो रही थीI आशा करती हूँ अब सब सुलझ गया होगा।”
“नहीं, सब उलझ गया है।”
“जीवन अनिश्चितताओं का दंश है आनंदी। सुलझ नहीं रहा तो स्वीकारने में ही शांति है।” 
शायद महेश जी किसी केस में उलझ गए होंगे। सरकारी नौकरी में ईमानदारी का यही पुरस्कार मिलता है, मन में सोचा।
“स्वीकार ही नहीं पा रही।”
मन में अब भय उत्पन्न हुआ।
“उचित लगे तो मुझे बता, शायद कुछ मदद कर पाऊँ?”
“महेश को ही पूछ”, उसने लिखा।
फिर अगला संदेश,
“कोई मेरी मदद नहीं कर सकता अब। हर्ष को खो दिया मैंने।”
नहीं, यह कैसा विचार मेरे मन में आ गया। प्रभु से हर्ष की लम्बी उम्र की प्रार्थना की। आनंदी ने बताया था हर्ष की माँ प्रसव के दौरान गुजर गई थी। आनंदी ने ही हर्ष का पालन-पोषण किया। यह बताते उसका स्वर भीग जाता है कि हर्ष को दुलारते उसकी अधेड़ छातियों में भी दूध उतर आया था।
दुश्चिंताओं को किनारे कर लिखा, “तेरे देवर ने हर्ष को अपने पास बुला लिया क्या?”
“नहीं, ईश्वर ने”
क्या सृष्टि का अंत निकट है? मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो गई थी। मेरे शब्द मेरा साथ छोड़ चुके थे। मैं कृष्ण तो नहीं कि कलपती माँ को ढाढस बँधा सकूँ। कब, कहाँ, कैसे, जैसे कई प्रश्न थे लेकिन मेरी यह तुच्छ जिज्ञासाएँ उसके दुःख के सम्मुख महत्वहीन थीं।
“चलती हूँ”, उसने लिखा।
कुछ चेतन हुई तो उत्तर दिया- “ऐसे मत जा। कुछ तो बोल। हृदयविदारक है यह घटना। महेश जी का नंबर देना प्लीज़।”
लेकिन वह जा चुकी थी। सम्भवतः वह रोती होगी। रिद्धि भी अवश्य ही रोती होगी। अपनों का जाना और अपनों को छोड़ कर जाना दोनों ही असहनीय दर्द देते हैं। अलग-अलग शहरों में बहते दोनों के आँसू तीसरे शहर आकर मेरी भी आँखें भिगो दे रहे हैं।
क्यों आया था हर्ष आनंदी के जीवन में? मोह उपजा कर विषाद देने? या पूर्वजन्म का कुछ स्नेह उधार लेने? पराए बच्चे में ऐसी ममता कौन डालता है कि अपने बच्चों को भी भुला दे। कितने समय बाद जाना था कि हर्ष उसका अपना नहीं है बल्कि दो बड़े युवा लड़के हैं आनंदी के। कभी उनका ज़िक्र ही नहीं आता था।
उसके और मेरे कुछ ही कॉमन फ्रेंड्स थे। उन्हें संपर्क किया। बड़ी मुश्किल से केवल एक को सर्पदंश की जानकारी थी। आनंदी सदा कहती थी, “निराया, मुझे इस बात से बहुत डर लगता है कि यह बच्चा किसी चीज़j से डर नहीं लगता। स्वयं ही खतरों को न्योता देता है।”
“लेकिन साँप कहाँ से स्वयं ही ले आएगा?”, मन में सोचा।
आंनदी को लिखा, “अध्यात्म और विज्ञान… तू दोनों की ज्ञाता है… भली प्रकार सृष्टिचक्र जानती है। कुछ भी कभी नष्ट नहीं होता, बस रूप बदल जाता है…मन एकाग्र कर…बदले रूप को पहचानने की चेष्टा कर।”
तन-मन दोनों ही आजकल भारी रहते हैं। रिद्धि और आनंदी दोनों को ही सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं मिलते। आनंदी तो फ़ोन भी नहीं उठाती।
रात सब नाराज़गी भुला विनीत को कुछ और ही कस कर पकड़े  हुए सोई हूँ। रविवार होने से सुबह जल्दी उठने की भी चिंता नहीं थी लेकिन तब भी नींद नियत समय पर खुल ही गई।
सुबह टूटू वहीं बैठा मिला है जहाँ कल शिवि ने बिठाया था।
शिवि भी आँखें मलती उठ आई है। रात सर्च किया था मैंने। पेपीलोमेटोसिस है इसे पक्के से! लिखा था कि नन्हे कछुओं में ज्यादा होती है। कभी खुद ही सही भी हो जाते हैं कभी मर भी जाते हैं। इलाज़ सर्जरी है। आज डॉक्टर को दिखाओ इसे।
“इतने छोटे से को इतने बड़े नाम की बीमारी…”, दिवि की उनींदी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
टूटू को आवाज दी। उसने बहुत धीमे से एक आँख खोली है, “कुछ खा ले बच्चे! ऐसे कैसे चलेगा”
टूटू को बाहर खुली हवा में रख रविवार को सोमवार की ओर बढ़ाया जाने लगा।
नहाकर नाश्ते के बाद बच्चों को पढ़ने बिठाया। बाहर बारिश की आवाज सुन चिंता हुई।
“टूटू कहाँ है?”, अरुण को आवाज़ दी।
“अंदर ही है”, वह बोला।
जाने क्यों अंदेशा-सा रहा। नीचे जाकर देखा। वहीं पत्थर पर वैसा ही बैठा है। फिर पुकारा- “टूटू… टूटू!”
“अरुण देखो तो..”, घबराहट बढ़ती जा रही है।
अरुण ने उसे उठाया। उलट-पलट कर देखा और बोला “… गया!”
“गया…!”, बस एक संक्षिप्त शब्द और मायने, कैसी उथल पुथल मचा देने में समर्थ।
विनीत सीढ़ियों से उतरते हुए कह रहे हैं, “एक वैट का नम्बर मिल गया है।”
मैं उन्हें चुप रहने का इशारा करती हूँ और विनीत निर्जीव-सी पड़ी देह की ओर देखते हैं।
“बच्चों को मत बताना”, वह कहते हैं, पर बच्चे उनके पीछे खड़े सब सुन चुके हैं।
“मैं आप सब से अब कभी बात नहीं करूँगी”, कहती दिवि वापस ऊपर दौड़ गई।
“मैं आज ही दूसरा कछुआ दिला दूँगा”, विनीत बोले।
“दूसरा कछुआ टूटू होगा क्या पापा?”, शिवि टूटू को हाथ मे ले हिचकियाँ ले रही है।
 
टूटू को बगीचे में हरसिंगार के पेड़ के नीचे दबाया जा रहा है। जाने किस दैवीय प्रेरणा से मैं आनंदी  का व्हाट्सएप खोलती हूँ। वह अभी भी  हर्ष की यादों पर अकेले ही काबिज़ रहना चाहती है पर महेश जी का नम्बर भेजा है। रिद्धि का फ़ोन आया है मैं यंत्रवत उठा कर कहती हूँ,
“हैलो!”
पृथ्वी के सीने में दबा सोता फूट कर भर्राये गले से बोलता है,
 “मैं बच तो जाऊँगी रे!”
उत्तर हरसिंगार भली भाँति जानता है।
अवसन्न चाँदनी, मौन अपने पाँव पसार रही है। प्रकृति के भाव भी कातर  दिखे, पंछियों के स्वर कमज़ोर होने लगे और दिन भर छोटे-बड़े होने वाले सभी प्रतिबिंब क्षीण होते-होते तिरोहित हो चले। नीरव अंधकार की दस्तक से भयभीत हो ज्यों मैं कच्ची नींद से जागी और अभी तक टूटू के शोक में जडवत बनी मैं, उसकी मासूम देह पर मिट्टी डलती देख अनायास चिल्ला पड़ती हूँ,  
“एक बार और देखो… कहीं ज़िंदा ही न हो… ऐसे कैसे मर सकता है? जाना ही था तब फिर आया ही क्यों?”
आवेग को और अधिक दबाना अब मेरे बस में न था। मेरे रुदन के स्वर के साथ ही एक और सोता फूट पड़ा ! 

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