Wednesday, February 11, 2026
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पल्लवी विनोद की कहानी – ब्रह्मकमल 

कैसे बनता है इंसान? महज़ अंडाणु और शुक्राणु का मिलन इंसान की वैयक्तिकता तय नहीं कर सकता है। ये मिलन उसे आँखों के रंग, बालों के घुंघरालेपन या इस तरह के कुछ और चिह्नों तक ही सीमित कर सकता है। उसके अतिरिक्त इंसान जो कुछ भी बनता है या जैसा भी बनता है उसके लिए वो ख़ुद ही जिम्मेदार होता है। अचानक से लगी आग से डर कर आप कमरे के अंदर घुटते हैं या बाहर जाने के दरवाजे तोड़ते हैं यह विशुद्ध रूप से आप पर निर्भर है पर आप जो भी करते हैं उसके लिए आग लगने से पहले की स्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं। हर परिस्थिति आपको आपसे थोड़ा अलग करती है। आप जीवन के हर मोड़ पर बदलते हैं। कभी पहले से अधिक परिपक्व कभी इतने परिपक्व कि भावनाओं का दख़ल आपकी ज़िन्दगी से ग़ायब हो जाता है। ठीक ऐसा ही बदलाव मेरे साथ भी हुआ
 
चौदह साल की एक बच्ची स्कूल से आए और उससे कहा जाए
 “माँ चली गई तुम्हारी
कहाँ गईं?”
तब तक एम्बुलेंस की आवाज़ आए और उसमें से माँ निकले, सोई हुई..
आज ये बात सोचकर आँख में कुछ तैरता है लेकिन उस समय समझ नहीं रहा था कि मुझे हो क्या रहा है। हमेशा एक ख़ालीपन मेरे सीने में मचलता रहता था। सब अचानक से बदल गया। पूरे दिन ऊधम मचाने वाली लड़की एकदम ठहर गई थी। जीवन में अचानक से आए इस बदलाव को समझने में बहुत महीने निकल गए तब आया कि माँ मुझे पढ़ते हुए देखकर सबसे ज़्यादा ख़ुश होती थीं। यह सोचकर मैंने किताबों से दोस्ती कर ली। बारहवीं की परीक्षा में स्कूल टॉप करने पर पापा की आँखों में आँसू के साथ होंठों पर पुरानी वाली मुस्कान भी दिखी। इस तरह मुझे जीने का कारण मिल गया था।
हिस्सों में बँटा जीवन आपको भी बाँटता है, छाँटता है। मैं भी तो बँटी हुई हूँ, माँ के जाने से पहले, माँ के जाने के बाद। दिल्ली जाने से पहले, दिल्ली जाने के बाद!! 
पापा! दिल्ली जाना जरूरी है क्या?”
जो तैयारी तुम्हें करनी है उसके लिए तो सब वहीं जाते हैं बेटा, तुम भी वहीं रह कर आगे की पढ़ाई करो। साथ ही साथ कोचिंग भी जॉइन कर लेना।
चली गई दिल्ली, पापा का हाथ पकड़कर..डरी सहमी… 
 
बिष्ट अंकल पापा के पड़ोसी और कॉलेज के दोस्त थे। वही दिल्ली में मेरे लोकल गार्डियन बन गए। आंटी ने मुझे देखते ही गले से लगा लिया। उनके दो बेटे थे। कुछ महीने बाद बड़े भैया की शादी थी और छोटा मुंबई में एम बी कर रहा था। सब लोग बहुत अच्छे लगे। पर सबसे अच्छी लगीं आंटीउनसे मिलकर मेरे मन का ख़ाली कोना फिर से भर रहा था। 
 
सुन तृषा तेरे अंकल को भेज रही हूँ जाना, आज रात यहीं रुकना। कल तेरी होने वाली भाभी को नाश्ते पर बुलाया है।
आज? पर आंटी मुझे मंडे को असाइनमेंट सबमिट करना है। लास्ट डेट है।
अरे अपनी कॉपी पेन यहीं लेती आना! भैया हेल्प कर देगा। वो ज्योग्राफ़ी में मास्टर है।
माँ बहुत दिन बाद मिली थी मुझेमना नहीं कर पाई।
रात ११ बजे तक हँसी मजाक चलता रहा। मेरे बालों में तेल लगाती आंटी को पता ही नहीं चला मेरी आँखें भीग रही हैं। 
 
वो ..माँ कह रही थीं कि तुम्हें असाइनमेंट में कुछ हेल्प चाहिए!”
नहीं भैया कुछ ख़ास नहीं, ये बुक्स इश्यू करवाए हैं।
फिर वो बुक्स देखने लगे, बताने लगे किन टॉपिक्स को अंडरलाइन करूँ।
इस बीच उनके हाथ किताबों से होते हुए मेरे जिस्म के उन हिस्सों पर कब गए, मैं समझ ही नहीं पाई!
ये .. ये क्या कर रहे हैं आप?”
अपने हाथों को फिर उसी जगह रखते हुए ..”क्या कर रहा हूँ
जितनी तेज़ी से उनके हाथ आए उतनी ही तेज़ी से मैंने उन्हें धक्का  दिया। मैं ग़ुस्से में काँप रही थी
ये नाटक क्या कर रही है? और..है ही क्या जो इतना ड्रामा कर रही है?”
एक ही क्षण में दिमाग़ को कितना शॉक दिया जा सकता था..
तुझे तो मजा ही गया होगा, किसी ने तो इस सपाट ज़मीन को छुआ।
सहेलियों ने बताए थे किस्से, कैसे कोई पागल आदमी उनके सामने आकर नंगा हो गया था। आज मेरे सामने कपड़ों से ढका आदमी नंगा हो गया था। मुझे तो ये भी समझ नहीं रहा था कि मेरी आँखें बंद हो गई थीं या अब खुली हैं।
 
काश वो किस्सा मेरे जीवन का हिस्सा बना ही ना होताकाश मेरे जीवन में ये अफ़सोस ना आया होता! माँ तो जा चुकी थी फिर ये मैं किसकी खोज में उस घर की तरफ़ बढ़ गई थी। क्यों नहीं समझ पाई कि जो रिश्ते हमें जीवन से नहीं मिलते उनकी खोज में हमारे हिस्से सिर्फ भटकन ही आती है। 
तबीयत ख़राब है, इम्तिहान हैंसारे बहाने मुझे उस घर तक जाने से बचाते रहे। क्या वो समझी नहीं होंगी? क्या कभी उन्होंने अपने बेटे से मेरे ना आने का कारण पूछा होगा? क्या उन्हें मेरे ना आने का कारण समझ नहीं आया होगा? मैं नहीं गई पर वो तो मेरे पास सकती थीं। शर्मिंदा थीं तो माफ़ी माँगती मुझसे! एक बार तो कहतीं, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। शायद इस इकरारनामे से मेरी ज़िन्दगी इतनी पेचीदा ना हुई होती। मात्र सत्रह साल की उमर में उनके बेटे ने मेरा आत्मविश्वास छीन लिया था। मैं हर किसी की नज़र से डरने लगी थी। अपनी नज़र से भी
**
मेम साब! आप आज खाना क्या खाओगी?”
कुछ भी बना दो
आज भी नबीन ने ठीक उसी समय दरवाज़ा खटखटाया जब मुझे मेरे ही ख्यालों का भार पानी में डुबो रहा था। पता नहीं वो बिना बताए कैसे जान जाता है कि मुझे कब अपनी बगिया में अकेले बैठना है और कब इसकी चटरपटर सुननी है। नेपाल से आने वाले बहादुरों की भीड़ के बीच आया नबीन जब अकेला होता तो बिल्कुल अलग हो जाता था। कभी किसी ऊँचे टीले पर उसे बैठे देखो तो लगता वो कुछ बुदबुदा रहा रहा है। एक दिन उसने कहा, “मेमसाब, मेरा दोस्त कहता है ये सारा परबत जहाँ है वहाँ सागर था
हम्म
आपको तो सब पता होगा। आप तो बहुत पढ़ी लिखी हो
ये सब तुमसे किसने कहा
तनमय साब बोला था
हम्म..असल में इन पहाड़ों पर कुछ ऐसे शैवालों के फॉसिल्स पाए गए हैं जो समुद्रों में पाए जाते हैं। इसीलिए लगता है कि लाखों साल पहले यहाँ समंदर रहा होगा।
ये फासिल वासिल हमें समझ नहीं आते पर आप देखना मेमसाब एक दिन फिर से पहाड़ समंदर बन जाएगा, नदियाँ सूख जाएंगी और जंगल बंजर बन जाएँगे।
ये सब कहते हुए उसका गला भर आया ..फिर बात को बदलते हुए उसने कहा,
मेम साब कल मैंने तन्मय साहब को अपने हाथ का लड्डू खिलाया, बहुत प्रशंसा किया वो
तन्मय पहाड़ और जंगल पर एक किताब लिख रहा है। उसी सिलसिले में मेरे घर के पास मौजूद सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ है। पहली ही मुलाक़ात में उसने पहाड़ों और ट्रेकिंग के बहुत सारे किस्से सुनाए। उसके किस्सों को सुन कर लगता कि नौकरी छोड़ उसके जैसी दरवेशों सी ज़िन्दगी जियूँ। भूल जाऊँ मैं कौन थी और कौन हूँ
हमारी हर मुलाक़ात में उसके पास बहुत सारी बातें होती हैं। हर गाँव, हर शहर के किस्से उसकी आँखों और बातों से झरते रहते हैं। झरने के उस शोर में मन में ये सवाल भी उठता कि कोई पुरुष इतनी बातें कैसे कर सकता है? 
 ज़िन्दगी के लिए उसके दृष्टिकोण अलग थे, मलंग सा पहाड़ों की कहानियों में डूबा रहने वाला ..
 
   हम औरतों की पूरी ज़िन्दगी ही पुरुष को जाँचने में निकल जाती है। पीठ पर  उगी दो आँखों से हम वो भी देख लेते हैं जो पुरुष हमसे छिपाना चाहते हैं। फिर भी रिश्तों के नाम पर छली गईं मुझ जैसी औरतें कुछ अतिरिक्त सावधान रहती हैं। शायद यही वजह थी कि तन्मय की तरफ़ से मैं आश्वस्त नहीं हो पा रही थी। हर बार उसके ख्यालों को धकेल अपनी दुनिया में रम जाती। पर वो हर बार किसी नए काम के सिलसिले में मेरे सामने चला आता था। 
 
अरे तन्मय! ये क्या है?”
माँ ने आपके लिए भेजा है..वो हमारी तरफ़ डब्बे ख़ाली नहीं लौटाए जाते हैं।
मेरे चेहरे पर उग आए प्रश्नवाचक चिह्न को देखते ही वो कहने लगा, “नबीन भैया ने लड्डू दिए थे कहा था ये डिब्बा आपका ही है।
ओह! अच्छा..वो डिब्बा! आंटी को थैंक्स बोलना और तुम्हारी वो किताब ब्रह्मकमलकहाँ तक पहुँची?”
दिमाग़ तक पहुँच गई है, दिल तक पहुँचना बाक़ी है।
देखना! दिल का रास्ता थोड़ा संकरा होता है, संभाल कर आगे बढ़ना।”
बस एक बार रास्ता मिल जाए, कदम तो मैं संभाल ही लूँगा
हँसते हुए वो इस तरह की बातें कर जाता था कि मेरे पास चुप्पी ही बचती थी। 
मैंने उसकी आँखों में हमेशा ही एक कौतूहल महसूस किया है। अपनी बातों में वो अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कुछ कहता जिससे लगता कि वो मेरी कहानी पूछना चाहता है। कहानी तो हम सबकी ही होती है लेकिन ऐसी हर जगह जहाँ औरतें काम करती हैं, वहाँ कहानियाँ बहुत बनती हैं। एक सिरे पर धीमी आवाज़ में कही गई बातें भी दूसरे सिरे तक पहुँच जाती हैं। इन प्रलापों का भार इतना हल्का होता है कि ये उस तक भी पहुँच जाती हैं जिनके लिए बातें कही जा रही हैं। 
कपड़ों की करतनों के ढेर को देख ख़ुद को ही समझ नहीं आता है कि ख़ुद के कपड़े का हिस्सा कौन सा है? लेकिन ये समाज उन कटे हुए टुकड़ों से आपके कपड़े को मिलाने को पूरी कोशिश करता है।
कानाफूसियों के रूप में मेरी ज़िन्दगी की कतरन भी समाज के सामने फेंक दी गई थीं। लोग अपने हिसाब से मेरे जीवन से जुड़े किस्से गढ़ते थे। पर मेरे कपड़ों के हिस्सों को तो बस मैं ही पहचान सकती हूँ।
 
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पापा ने मुझसे पूछा था, “तुमको कोई लड़का पसंद हो तो बता दो। नहीं तो अपनी बिटिया के लिए राजकुमार मैं ख़ुद खोजूँगा
शादी करना जरूरी है क्या पापा?”
पापा ने मुस्कुराकर मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा
है कोई?”
नहीं
क्या कहती पापा से, उनकी लड़की किसी भी लड़के के सामने सहज नहीं हो पाती। सामने वाला देखे ना देखे लेकिन उसे लगता है हर किसी की आँखें उसके शरीर को तौल रही हैं। लड़कों की तरफ़ से बढ़े दोस्ती के हाथ से भी वो डर जाती है। जानबूझ कर ख़ुद को पढ़ाई में उलझाए रखती है और दिमाग़ ख़ाली होते ही वो ख़ुद को टटोलने लगती है। मैं एक बार फिर से बदल रही थी। शुरुआत में तो मैं बिष्ट परिवार से जुड़े रिश्तों के नाम पर मिले धोखे के दर्द में थी। बाद में वो दर्द अपमान से उपजे क्रोध में बदल गया। अगला चरण मेरे अंदर हीन भावना को लेकर आया। मैं हर वक़्त अपने ऊपर एक खोल पहन कर रहने लगी। सहेलियों के साथ हँसी मजाक करते समय मैं कुछ और होती, वास्तव में कुछ और.. कभी अपना मन किसी के साथ नहीं खोल पाती थी। असल में मैं किसी की आँख में अपने लिए बेचारगी या उपहास नहीं देखना चाहती थी। लोग मुझे अहंकारी बताते, कितने ही लोगों ने मुझे स्वकेंद्रित या आत्ममुग्ध कहा। उस विशेषता ने मेरी हीनभावना को दूसरों के सामने ढकने में मेरी बहुत मदद की। मैं यह समझ गई थी कि ये जितने भी सुपीरियारिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित लोग होते हैं वो सब चोट खाए लोग हैं जो किसी गहरी हीन भावना के गिरफ़्त में हैं।
 
ये जानने के बावजूद कि यह आवरण मुझे संकुचित कर रहा है मुझे मेरे ही दोस्तों से दूर कर रहा है,मैंने ख़ुद को ऐसा ही बनाए रखा। मुझे लगता था, लोग इसी तरह मेरे व्यक्तित्व की जटिलताओं में उलझे रहें। कोई  भी मेरे शारीरिक गुण दोष की तरफ़ ना देख पाए। 
पापा अपनी खोजबीन में लगे रहे और मैं विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली दवाइयों को टटोलती रही। बहुत खोज बीन के बाद पापा को अपनी पसंद का दामाद मिल ही गया।
शादी के बाद के दो दिन रस्मों में निकल गए। तीसरे दिन हम मिले। पहली बार किसी पुरुष का सामीप्य मुझे डरा नहीं रहा था। उससे बात करते हुए मैं उसकी बाहों की तरफ़ कब खिसक गई पता ही नहीं चला। उसका मेरे बालों को सहलाना, अपनी आँखों में मुझे बसाना ..सब कुछ इतना सुंदर था कि उस समय को  मैं रोकना चाह रही थी। 
थोड़ी धीमी गति से ही सही ..पर वो समय भी गुज़र गया। वैवाहिक रिश्तों में प्रेम दैहिक सीढ़ियों के सहारे आगे बढ़ता है। स्पर्श की भाषा से संवाद आगे बढ़ता है। मन की ढेर सारी परतों में शरीर के भी रहस्य छिपे होते हैं। जब उत्तेजना के क्षणों में सहलाती हुई उँगलियाँ कसमसाने लगती हैं।  स्पर्श अपनी कोमलता खोने लगता है..तन के गिरह खोलने में की गई असावधानी से मन के गिरह भी खुल जाते हैं। तब वो अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति इतना असहज हो जाता है कि चाह कर भी सामान्य नहीं रह पाता है।
जब मन हर स्पर्श पर सशंकित होने लगे तब अंगुलियों का सुर देह को समझ नहीं आता। अब वो     अंगुलियाँ भी अपने सहज लय में नहीं थी। देह का सिकुड़ना, सिमटना वो भी महसूस कर रही थीं। दोनों के तन को मन की आपत्तियाँ समझ रही थीं। हालांकि सब सामान्य होने का अभिनय कर रहे थे पर वास्तविकता अलग थी। अब उसकी मुस्कुराहट मुझे विद्रूप लग रही थी जैसेकोई मूवी अपने फर्स्ट शो में फ्लॉप हो गई हो। 
    हर मिलन उत्पीड़न जैसा महसूस होने लगा। जैसे ही वो मेरे गिरह खोलता मेरा मन सपाटसपाट दोहराने लगता। फिर समझ आने लगा कि उसके होंठ मुझे चूमने का अभिनय कर रहे हैं। कुछ क्रियाएँ सिर्फ़ इसलिए घट रही थीं क्योंकि उन्हें घटना था। धीरेधीरे हमारे भीतर दबी हुई कुंठाओं का विस्तार होने लगा। हमारे बीच का वार्तालाप घटता गया। उसके बाद हम अभिनय की स्थिति में भी नहीं रह गए।
तुम ये पैडेड ब्रा कब से पहन रही हो?”
अपमान का लाल रंग मेरी आँखों में भर गया था।
जेनेटिक प्रॉब्लम है या ..”
मेरी आँखों के सामने मेरे घर की हर औरत आकर खड़ी हो गई थी।माँ भी ..
इम्प्लांट भी तो होता है इसका!”
 मैं चीखना चाहती थी, उससे पूछना चाहती थी कि महज़ कुछ इंचेज़ तुम्हारे लिए इतने जरूरी हैं? पर इतना विश्वास मेरे अंदर बचा ही नहीं था। लगता था चुप रहकर, मुस्कुरा कर उसके अंदर अपने लिए प्रेम पैदा कर लूँगी। ये भी लगता कि कुछ ही दिनों की बात है, बच्चा होने के बाद सब ठीक हो जाएगा। इस उम्मीद में उस इंसान के सामने प्रस्तुत होती रही जिसकी अस्फुट क्रियाएँ मुझे नोच रही थीं। 
धीरे धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मेरे साथ रहने वाले इंसान के लिए भी मेरा साथ आसान नहीं है। वार्डरोब में छिपा कर रखी मैग्ज़ीन्स में मौज़ूद हर पन्ने मुझसे चीखचीख कर कह रहे थे, जो उसे चाहिए वो तुम्हारे पास नहीं है। उसके कमरे में घुसते ही जिस पेंटिंग को देख मैं उस आदमी के एस्थेटिक सेंस पर रीझ गई थी वो भी अब कुछ और ही समझा रही थी। स्त्री देह को लेकर उसके मन में एक फ़ितूर था वो उसे मुझसे कभी नहीं मिलेगा। मेरे पास आने के लिए उसे पोर्न वीडियोज़ का सहारा लेना पड़ता था। उन वीडियोज़ में भी एक जैसी देहयष्टि की तारिकाएँ थीं। सारे कारण मिलकर मुझे बीमार बना रहे थे। मेरे अंदर की हीन भावना का आधिपत्य मेरे समूचे वजूद को ख़त्म कर रहा था। 
दो साल चले उस रिश्ते में कुछ भी ठीक नहीं हुआ। कुढ़न को कोढ़ में बदलने की ओर बढ़ते रिश्ते को मैंने काट दिया। डिवोर्स के महीनों बाद पापा ने मुझसे कहा
दामाद जी देखने में तो बहुत अच्छे लगते थे। ऐसा कुछ होगा मैंने कभी सोचा ही नहीं था। लगता है उनको पहचानने में मेरी आँखें धोखा खा गईं।
असल में तो उसकी आँखें धोखा खा गईं थीं।
 
जान पहचान वालों को लगा इस अलगाव की वजह मेरी नौकरी है। आत्मसम्मान का जो खोल मैंने ओढ़ा हुआ था वह एक वैवाहिक रिश्तेको चलाने के लिए अनुकूल नहीं था। पिछले पाँच सालों में अपने तलाक के बहुत सारे कारण मुझे पता चले। मैं उन कारणों को सुनकर संतुष्ट थी क्योंकि उनमें से एक भी कारण मेरी देहयष्टि से जुड़ा नहीं था।
 
पापा जब भी मेरे पास आते मेरी दूसरी शादी का ज़िक्र करते। मैं उन्हें समझाती , मुझे इस तरह रहना ही अच्छा लगता है। वो कहते ज़िन्दगी अकेले नहीं कटती बेटा। मैं उनकी बात काटते हुए कहती कि सब आदत की बात है पापा। फिर किसी के साथ रहकर ख़ुद को अनदेखा करने से अच्छा है अकेले और व्यस्त रहा जाए।
इन बातों को कहते समय मैं इनके खोखलेपन को महसूस करती थी।हर रात इस खोखलेपन की आवाज़ मुझे डराती थी। बिना सिलवटों का बिस्तर मुझे तरस खाती नज़रों से देखता था। रूमानियत में डूबी सहेलियों की तस्वीरों से चिढ़ होती थी। एक बार तोउसे ब्रेस्ट कैंसर हो जाएजैसी जहरीली इच्छा भी उग आई थी। उस इच्छा के उगते ही ग्लानि के भाव ने मुझे घूरा था। 
अवसाद के इस दलदल में डूबने से बचाने के लिए मैं ख़ुद को काम में व्यस्त रखने लगी।
 
***
तृषा..”
तन्मय ने मेरा नाम पहली बार लिया है। क्या कहेगा वो? कहीं कोई ऐसी-वैसी बात ना कर दे! अभीअभी तो उसकी मित्रता ने मुझे सहज करना शुरू किया था। कहीं ये भी..
आपसे ही कह रहा हूँ
मेरे फाइल पर से नज़र हटाते ही वो कहने लगा,
अगले महीने ट्रेकिंग पर चलेंगी?”
कहाँ?”
वो तो आप डिसाइड कीजिए। मेरा तो कश्मीर जाने का मन हैलेकिन उसमें दस पंद्रह दिन लग जाएँगे।
अरे नहीं! उतनी छुट्टी नहीं मिलेगी मुझे
तब केदारकांठा चलें? चार दिन में वापस भी जाएँगे।
श्योर!”
उम्म हाँ..डायरेक्ट संकरी चलेंगे। नाईट स्टे कर अगले दिन सुबह से ट्रेकिंग शुरू करेंगे। जुड़ा का तालाब पहुँच कर दूसरे दिन केदारकंठा बेस कैम्प फिर अगले दिन..”
मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया था और ये शुरू हो गया। अब सारा सीन यहीं समझा देगा। इसे टालने के लिए कुछ कहना ही होगा ..
हम्म अच्छा देखती हूँ, छुट्टी मिल जाएगी तो देखेंगे!”
देखेंगे! ये क्या हैचलिए ना प्लीज़..मैं आपको वो दुनिया दिखाना चाहता हूँ। ध्यानमग्न पहाड़ उनके प्रेम में लिपटी बर्फ की चादरें, सम्मोहित करता नीला आकाश और वो घाटियाँ जो सदियों से प्रेम कहानियाँ गुनगुना रही हैं।
तुम फिर शुरू हो गए, तुम राइटर्स का कुछ नहीं हो सकता।
हा हा, हाँ वो तो है पर ये भी जान लीजिए हम राइटर्स के बिना आप जैसे ब्यूरोक्रेट्स का भी कुछ नहीं हो सकता।
मेरे इतने सख़्त रवैये के बाद भी तन्मय मुझसे कितना सहज होता जा रहा है। क्या मैंने ख़ुद ही इसको इतनी छूट दे रखी है। शायद हाँ! मुझे भी तो उससे बातें करना अच्छा लगता था। 
ब्रह्मकमल! किताब का ये नाम क्यों चुना तुमने?”
इन फूलों ने मेरे जीवन को बदला है। इनसे मिलने से पहले मैं बहुत फ्रस्टेटेड टाइप का आदमी हुआ करता था। वो होते हैं ना जिन्हें अपने अलावा सारी दुनिया ही खूबसूरत दिखाई देती है।
अच्छा! लगते तो नहीं हो।
लगती तो आप भी वो नहीं हैं जो वास्तव में हैं।
मुझे असहज होता देख ख़ुद ही बोलने लगा
मैं जॉइंट फ़ैमिली में पला हूँ। मेरे अपने भाईबहन कजिंस सब हाइली एजुकेटेड, ब्रिलिएंट माइंडेड हैं। आई आई टियन, साइंटिस्ट, बैंकर और ब्यूरोक्रेट्स से भरे परिवार में एक मैं ही था निठल्ला … मसखरा।” 
हम्म मुझे लग ही रहा था, वैसे भी पढ़ने में सीरियस लोग ऐसे नहीं होते होंगे..यह सोच मैं अपनी मुस्कुराहट दबाने की कोशिश करने लगी।
आपको पता है, मैं किताब हाथ में लिए घंटों अपनी दुनिया में खोया रहता था। सोचता कि मैं ऑडिटोरियम के स्टेज की तरफ़ जा रहा हूँ।  सब लोग मेरी तारीफ़ कर रहे हैं। मेरे लिए क्लैपिंग हो रही है।
 
पहली बार मैंने उसके चेहरे पर उदासी देखी थी। वो उदासी भी बच्चों सी थी जैसे एग्जाम में नंबर कम आने पर होती है।
 
मुझसे कोई बात नहीं करता था। मेरी बातों को हूँ हूँ करके इग्नोर किया जाता। मैं दस भाई बहनों के परिवार में सबसे अकेला था। बस एक मम्मी थीं जिनको मेरी शैतानियों पर भी प्यार आता था।
उसकी बातें सुनते हुए मैं पहली बार उसके चेहरे को ध्यान से देख रही थी। कुछ मिनट पहले जिस लड़के को जज कर रही थी उसके लिए मेरी सोच बदल रही थी। घुंघुराले बालों वाला मासूम सा लड़का, किसी भी माँ को इस पर प्यार आता।
जब पापा मुझे पढ़ाई करने के लिए डाँटते तो वो मुझे पुचकारते हुए कहतीं, इतने बच्चे पढ़ तो रहे हैं एक नहीं पढ़ेगा तो आपका क्या बिगड़ जाएगा? पर मुझे उनके प्यार से ज़्यादा और लोगों की आँखों में अपने लिए उपहास दिखाई देता था। मेरी पर्सनालिटी ही अजीब हो गई थी। अपनी उमर से छोटा लगता था । इममैच्योर टाइप का लड़का जो लोगों को हँसाने के लिए अपना ही मजाक उड़ाता रहता था। लोग हँसते तो लगता ऐसे ही मैं उनको अपनी अहमियत जता पाऊँगा। 
आपको पता है! एक समय ऐसा भी था जब मैं अपने परिवार और दोस्तों के लिए महज़ एक क्लाउन बन कर रह गया था। वो क्लाउन जो परदा गिरते ही अपने कमरे में जाकर खूब रोता था।
 
यह सब बताते हुए उसकी आँखें भर गई थीं। कुछ तो था जो मेरी आँखों का दरवाज़ा खटखटा रहा था । मैं नहीं चाहती थी कि तन्मय पुरानी बातों में और उलझे। बात को बदलने के लिए मैंने पूछ लिया,
फिर ब्रह्मकमल का क्या रोल रहा?”
मेरे अट्ठारहवें जन्मदिन पर मम्मी मुझे बद्री नाथ और केदार नाथ ले गई थीं। घर में सब व्यस्त थे तो हम दोनों ही गए थे। रास्ते में माँ की तबियत बहुत खराब हो गई। मैं उन्हें संभालता रहा। किसी तरह हमने दर्शन किए। वहाँ प्रसाद में मिला था ब्रह्मकमल। तब माँ ने कहा था, तन्मय तुझे पता है! ये फूल रात को खिलते हैं और अगली सुबह तक मुरझा जाते हैं। बिना मिट्टी और खाद के चट्टानों पर खिल जाते हैं। फिर भी शंकर जी को इनसे बहुत प्यार है। ये कहते हुए माँ ने उसे मेरी हथेलियों पर रख दिया।
   तब मुझे एहसास हुआ कि मम्मी के लिए मैं उनका ब्रह्मकमल हूँ। सबसे अलग सबसे अद्भुत..उनके इस विश्वास ने मेरी सोच बदल दी।   ख़ुद को ग्रूम करने की कोशिश की फिर समझ में आया कि मुझमें एक मसखरा बनने के अलावा और क्या खूबी है।
 
अच्छा तो वहाँ से एक ट्रैवलर, ब्लॉगर और राइटर तन्मय का जन्म हुआ।
 
कह सकती हैं।
 
वैसे तुम स्टैंड अप कॉमेडियन भी बन सकते थे।
 
हाँ! पर वो रोल मुझे उदास करता था।
 
हम ये बातें सन सेट पॉइंट पर बने रेस्तराँ में कर रहे थे। उसने बातों को बदलने के लिए कहा, “चलिए थोड़ा वॉक करते हैं।
सूरज डूबने वाला था। चिड़ियों की आवाज तेज हो गई थी। चीड़ के पेड़ों के साथ छुपम छुपाई खेलती धूप थक कर पहाड़ों के पीछे बने अपने घर की तरफ़ जाने लगी थी। तन्मय बिल्कुल शांत था, पहलीबार..
लड़के तो गंभीर ही अच्छे लगते हैंकिसी की कही ये बात सोच कर मैं मुस्कुरा रही थी। 
हर किसी की अपनी कहानी होती है। आपकी भी होगी। मैंने बहुत सारी सफल स्त्रियों को देखा है लेकिन आप सबसे अलग हैं। कुछ मिस्टीरियस सीकभी अपने कोकून में बंद होती तो कभी उससे बाहर आने के लिए छटपटाती…”
ओफ़फ़ तुम लिखने वालों की यही प्रॉब्लम होती है। हर जगह कहानी ढूँढने लगते हो। जानबूझ कर अपनी सिंपल सी आँखों को एक्स रेज़ बनाने की जरूरत नहीं है।
 
ये कहकर मैंने उसकी बातों को समेट तो दिया था लेकिन वास्तव में मैं बहुत घबरा गई थी। लगा कोई मेरे खोल में घुसने की कोशिश कर रहा है। 
 
रात के दो बज रहे थे और मेरी आँखों से नींद गायब थी। लग रहा मेरे हाथ से कुछ छूटने वाला है। ऐसा कुछ जिसने मुझे बड़े जतन से संभाल कर रखा था। पर अब वो मेरी मुट्ठी से फिसल रहा है। तन्मय मेरी तरफ़ बढ़ रहा था या मैं ही उसकी तरफ बढ़ रही थी।
जब भी वो मेरे बगल में बैठा होता, मैं नज़रें चुरा कर उसकी हथेलियोंको देखती थी। उसके माथे में कंगूरे बनाते उसके घुंघराले बालों को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। डूबते सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर देख मैंने अपने अंदर तरल एहसास का जन्म होता महसूस किया है ।इस वक़्त भी तो मुझे उसकी उदास आँखें ही याद रही हैं। ऐसा लग रहा है आगे बढ़कर उस उदासी को अपने होंठों पर रख लूँ। कह दूँ कि ये जो तुम बातबात पर कहते हो कि मैम आपके जैसी मजबूत महिला मैंने नहीं देखी, ये सब फ़रेब है। मैं बहुत कमजोर हूँ इतनी कि रात के सन्नाटे से डर जाती हूँ। जिन आम लड़कियों से अलग तुम मुझे समझते हो मैं उन्हीं जैसी हूँ। उनकी तरह मैं भी पुरुषगन्ध में डूबना चाहती हूँ..किसी की कलाइयों को पकड़ कर चलना चाहती हूँ। किसी के बाहों के घेरे में दुबक सोना चाहती हूँ।
  तभी मेरे अंदर बैठी घायल लड़की की आवाज आती है, नहीं तृषा!! तुम्हें ख़ुद को रोकना होगा। क्या चाहती हो तुम? फिर से टूटना, जिन हथेलियों को छूने की इच्छा तुम्हारे अंदर मचल रही है उन्हीं ने तुम्हें ठुकरा दिया तो क्या करोगी? एक बार फिर वही कहानी दोहराई जाएगी। क्या लग रहा है तुम्हें? तन्मय और लड़कों से अलग होगा!  पागल मत बनो तृषा, ख़ुद को जिस साँचे में ढाल चुकी हो उसी में रहने दो। तन्मय को अपने खोल के भीतर मत आने दो। 
 
हाँ यही ठीक रहेगा, मुझे नहीं जाना उसके साथ किसी ट्रेकिंग पर.. फिर मेरे पास तो छुट्टी ना मिलने का बहाना है। उसकी किताब पूरी होते ही वो यहाँ से चला जाएगा। फिर सब ठीक हो जाएगा। 
 
***
आप जिससे हाथ छुड़ाने की कोशिश करो अगर वही आपका हाथ छोड़ दे तो आप उदासी से भर जाते हैं। हमेशा से ही छोड़ कर आनेवालों से ज़्यादा दुःख छूट जाने वालों के हिस्से आया है। उसमें भी इस तरह यकायक छूट जाना..
 तन्मय भी ऐसे ही चला गया। एकदम से अचानकना जाने की कोई इत्तला दी, ना कारण बताया। शुरूशुरू में मैं ख़ुश थी। बिना किसी प्रयास के वो मेरे जीवन से चला गया था लेकिन कुछ दिन बाद से ही बेचैनी होने लगी। गेस्ट हाउस के लोगों ने बताया कि किसी अर्जेंट काम से उन्हें जाना पड़ा। बोल कर गया था कि जल्दी ही वापस आ जाएगा। चाहती तो उसे फ़ोन कर सकती थी लेकिन मैं ऐसा कोई संकेत नहीं देना चाह रही थी कि वो उलझ जाए। बारबार मोबाइल के कांटेक्ट लिस्ट में जाती फिर वापस लौट आती। ये क्या हो रहा था मुझे
किसी ने फिर से मुझे अवसाद की तरफ़ धकेल दिया था। तन्मय मेरा दोषी तो नहीं था? या था! क्यों आया मेरे इतने क़रीब
क़रीब आया था? हाँ आया था, इतनी बेवक़ूफ़ नहीं थी मैं कि उसकी गोलमोल करके कही गई बातों का अर्थ ना समझ पाती
 
एंजाइटी की दवा टटोलती मेरी उँगलियाँ उस शाम पर अटक गईं। उस दिन हम बहुत देर तक साथ रहे थे। मैं सोचने लगी, मैंने उस शाम क्या पहना था? कहीं उसेना! कुर्ते के ऊपर मैंने जैकेट पहना हुआ था। ये क्या सोच रही हूँ मैं? ख़ुद को इतना निरीह क्यों बना रही हूँ। ऐसी कौन सी कमी है मुझमें
दवा गटक ली.. पापा को फ़ोन करती हूँ। हाँ
कैसी हो बेटा?”
गले में कुछ अटक रहा है। 
तृषा
हाँ पापा
ठीक तो हो ना! तुम्हारी आवाज़ ऐसी क्यों रही है?”
गले में अटका हुआ भार आँखों में चुका है। फ़ोन काट दिया, पापा को परेशान नहीं करना है।
पापा का फ़ोन फिर रहा है। 
मैं बेतहाशा हँस रही हूँ। मेरे साथ ही क्यों? चेहरा आँसुओं से भीग चुका है। 
पापा का फ़ोन फिर से रहा है..
मैं एक दम ठीक हूँ। इधर तो ठंड ख़त्म हो रही है। तुम्हारे उधर तो होगी अभी? वहाँ तो इस मौसम में भी बरफ़ पड़ने लगती है।
उफ़्फ़! पापा ने ये क्या याद दिला दिया? बरफ़पहाड़ों को गले लगाती बरफ़, मैं किसे गले लगाऊँ..
तृषा बेटा तुम ठीक तो हो ना! कोई बात हो तो मुझसे बताओ।”
“हाँ पापा, मैं ठीक हूँ। एकदम ठीक।”
“खुश रहा करो बेटा। तुम तो दुनिया की सबसे प्यारी बेटी हो। देखना एक दिन सब ठीक हो जाएगा।”
 
मैं भी तो पापा की ब्रह्मकमल हूँ। आज तक उन्होंने मुझसे कोई प्रश्न नहीं किया। मेरे हर फ़ैसले में साथ देते रहे। 
अचानक से दिमाग़ ने कहा, तन्मय किसी मुसीबत में तो नहीं फँसा? कहीं उसकी माँ को कुछ?? 
एंजाइटी की गोली ने असर दिखाना शुरू कर दिया था। मैंने तन्मय को फ़ोन मिला दिया। 
स्विच ऑफ
व्हाट्स ऐप कॉल भी रिसीव नहीं हो रही है।
एक मैसेज छोड़ देती हूँ..
कैसे हो तन्मय?”
जवाब देखने के लिए बारबार फ़ोन उठा रही हूँ। सिंगल टिक, ब्लॉक तो नहीं कर दिया
मेमसाब, चाय यहीं लाऊँ या बगीचे में बैठोगी?”
फिर से सही समय आया नबीन.. फ़ोन रख कर जाती हूँ। नहीं तो बारबार व्हाट्स ऐप चेक करूँगी। 
 
दस दिन और निकल गए, गोलियों ने व्यग्रता को दबा दिया था। पिट्यूनिया , पैंजी, डायन्थस, डेल्फ़िनियम और गुलदाउदी को देखतेहुए शामें कटने लगीं। मैंने मान लिया ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। कुछ दिन के लिए आकर तन्मय ने इसकी गति बढ़ा दी थी। अच्छा ही हुआ। कम से कम ये एक साल थोड़ा जल्दी निकल गया। 
 
मेमसाब, ड्राइवर साब बता रहा था कि कुछ महीनों में आपका ट्रांसफर हो जाएगा!”
हाँ होना तो चाहिए। तीन साल होने वाले हैं।
फिर कहाँ जाओगी आप?”
जहाँ सरकार भेज देगी।
मैं भी साथ जाऊँगा।
यहाँ तुम्हारे दोस्त हैं, वो सब भी छूट जाएँगे।
कोई दोस्त नहीं है।
इससे पूछूँ तन्मय के बारे में! क्या पता ये कुछ जानता हो?”
 
पता नहीं तन्मय साब कहाँ चला गया? कुछ नहीं बताया। उनका फ़ोन भी नहीं मिलता। बहुत अच्छा था वो। मुझको बहुत मानता था, नहीं वो सबको बहुत मानता था। बड़ा छोटा का फ़र्क़ नहीं करता था।”
 
शाम कट गई, रात ने अभी पहली जम्हाई भी नहीं ली। फिर से उसे सुलाने की कोशिश में आधी रात जागूँगी.. नींद की दवाइयाँ सिरहाने रख दी है लेकिन कोशिश करती हूँ कि उसके बग़ैर सो जाऊँ।                        
मोबाइल में अननोन नंबर फ़्लैश हो रहा है। इतनी रात कौन होगा? कहीं ..
तृषा
तन्मय!”
हाँ, कैसी हो?”
कहाँ हो तुम? ऐसे कौन ग़ायब होता है? ना कोई फ़ोन ना मैसेजहर चीज को मजाक बना कर रखा है तुमने! और ये किसका नंबर है?”
उधर एक दम चुप्पी थी..
तन्मय?”
फ़ैमिली अर्जेंसी थी। रात को ही निकलना पड़ा। मेरा मोबाइल खो गया था। घर पर इतनी टेंशन थी कि उस समय सिम के लिए भी अप्लाई नहीं कर पाया। किसी का भी नंबर याद नहीं था। आज ऑफिस से पता किया।
अच्छा सुनो, तुम्हें छुट्टी मिल गई है ना! मैं डायरेक्ट संकरी में मिलूँगा।
ये क्या बोल रहा है? ये कौन सा तरीका है
तृषा, क्या हुआ? छुट्टी मिल जाएगी ना! को वहाँ पहुँचना है।
जैसे यहाँ से ग़ायब हुए वैसे वहाँ भी ना पाए तो?”
मम्मी को अटैक गया था
क्या? कैसे?”
सब कुछ मिल कर बताऊंगा। आना ज़रूर,अच्छा! ये मेरा नंबर सेव कर लेना।
फ़ोन कटने के बाद अहसास हुआ कि पीछे से बहुत सारी आवाज़ें रही थीं। मैंने तो ये भी नहीं पूछा कि आंटी कैसी हैं।  फिर ध्यान आया कि आज तन्मय ने मुझे आप नहीं तुम कहा था। उसकी आवाज़ में कुछ अलग सा था जो मैं महसूस तो कर रही थी लेकिन समझ नहीं पा रही थी”
 ***
ये तन्मय है! कैसा हो गया है? उसे अपनी तरफ़ आते देख मेरी आँखें क्यों भर रही हैं। आंटी तो अब घर आ गई होंगी।                  
रास्ते में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
नहीं, तुम कैसे हो? आंटी कैसी हैं अब?” मेरे प्रश्न भीड़ की आवाज़ में दब गए थे।                                                       
अगले दिन की सुबह बहुत सुंदर थी। सुनहरे दुपट्टे से ढके पहाड़ों को देख तन्मय मुस्कुरा रहा था। 
मेरी तरफ़ देखते हुए बोला, “ज़िन्दगी जब भी परेशान करे इन पहाड़ोंके पास जाना। ये तुम्हें हमेशा ही पुचकारेंगे।” 
उसे सामान्य होता देख मुझे अच्छा लग रहा था। 
सफ़र शुरू हो चुका था। दवाइयों ने असर तो डाला ही था। मैं बहुत जल्दी थकने लगी। वो मुझे पीछे मुड़ कर देखता, फिर वापस आता। बर्फ शुरू होते ही मेरे जूतों के ऊपर माइक्रो स्पाइक्स लगा रहा था।  जुड़ा का तालाब पहुँचने वालों में हम सबसे आख़िरी थे। हम बीसतीस लोगों की भीड़ थी फिर भी बहुत शांति थी। आसमान की तरफ़ देखा तो लगा कि वो भी हमें देख रहा है। 
कल रात देखना इसकी तरफ़, ये तारे तुम्हें अपनी कहानियाँ सुनाएँगे।
तुम पहले भी चुके हो ना!”
पीछे से कैम्प वाले की आवाज आई, “ये तीसरी बार आया है।
अच्छा, आपको याद है! पहले किसके साथ आए थे?”
पहली बार तो अकेला आया था शायद, दूसरी बार कोई था, दोस्त था या भाई नहीं पता।
मन में सोचा, दोस्त ही होगा..
तन्मय मुझे देख मुस्कुरा रहा था। मेरे भी गाल शर्म से दहकने लगे मैंने क्यों पूछा कि वो पहले किसके साथ आया था।
कल भी आज जितना चलना होगा?”
नहीं कल तो कम चलना है लेकिन रास्ता कठिन है।
ठंड बहुत बढ़ रही थी। हम अपनेअपने स्लीपिंग बैग्स में चले गए। थकान के चलते नींद भी जल्दी ही गई।
 
दूसरे दिन का रास्ता वाक़ई मुश्किल था। बर्फ पैरों को टिकने नहीं दे रही थी। तन्मय उस दिन मेरे पीछे था। शायद जान बूझ कर..ये वो तन्मय नहीं था जो अचानक ग़ायब हो गया था। मैं उसके खिलंदड़ी स्वभाव की वजह उसकी कम उम्र समझती थी। शायद शॉर्ट हाईट के चलते भीमुझसे साल तो छोटा ही होगा लेकिन अभी जो लड़का मुझे सहारा दिए चल रहा है वो मुझसे बहुत बड़ा है। 
क्या हुआ तन्मय बताओ ना!”
वहाँ चलती हवा की आवाज़ और उखड़ती साँसों के चलते उसे मेरी बात नहीं सुनाई दी।
वो सुनने के लिए थोड़ा पास गया था..ख़ुद को संभालते हुए मैंने फिर से पूछा,     
क्या हुआ है ? मुझसे नहीं बताओगे!”
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे कह रहा हो तुमसे कैसे छिपाऊँगा
चलो चला जाए, मौसम ख़राब हो रहा है।
यहाँ भी ऐवलांट आते हैं क्या?”
नहीं, चांसेज़ कम हैं पर नबीन की माने तो कभी भी कुछ भी हो सकता है।
वो ये कहते हुए बहुत उदास था। 
नबीन ने तुम्हें बहुत मिस किया।
हम्म और 
तुमने?”
 
हम केदारकंठा बेस कैम्प पहुँच गए थे। लोग वहाँ बर्फ से खेल रहे थे। चढ़ाई की थकन ने ठंड की तीव्रता को कम कर दिया था। मुझे उस दिन बचपन वाली तृषा याद रही थी। माँ के जाने से पहले वाली..
बर्फ का गोला तन्मय पर जा चुका था। मेरा ये रूप उसको हैरान करता तब तक मैंने दूसरा गोला भी उसकी तरफ़ उछाला। हम खिलखिला रहे थे, दौड़ रहे थे, बर्फ में फिसल रहे थे
मुझे नहीं मालूम इतना मुक्त मैं पहले कब हुई थी। सालों से मेरे ऊपर पड़े हुए खोल नीचे गिरे हुए थे। शरीर एकदम हल्का हो गया था.. 
थैंक यू तन्मय..ये ट्रिप तुम्हारा एहसान रहेगी मुझ पर
जलती हुई लकड़ियों से निकलते आग के लाल शोले हवा में आकर झूम रहे थे। 
जैसे ठंड अदृश्य होकर उनकी बाहों में ख़ुद को छिपा रही हो। मेरे सामने बैठा लड़का जिसकी बातों में मैं ख़ुद को भूलने लगती थी, एकदम शांत था।
आज की ठंड स्लीपिंग बैग को परास्त कर चुकी थी। 
अब सो जाओ, पीक पर जाने के लिए दो बजे ही निकलना होगा।
ये तुम अचानक से इतने बड़े कैसे हो गए?”
जैसे तुम अचानक से बच्ची बन गई हो। ऑफिस वाले आज तुम्हें इस तरह खेलते देख लेते तो सदमे में जाते।
मुझे इस बात पर और इस बात को सोचकर भी बहुत हँसी रही थी। उसने इन खिखिलाहटों को टोका नहीं थमने का इंतेज़ार किया।
वहाँ जाकर फिर बदल जाओगी?”
अगर ऐसी ही रही तो काम कौन करेगा और कौन करवाएगा!”
ऑफिस के अलावा भी ज़िन्दगी होती है
.
.
तुम बताओ, अचानक से क्या हो गया था।
मम्मी चली गईं तृषा
अरे! ये कब हुआ? फिर तुम यहाँ क्यों आए?”
अब वहाँ मेरे लिए कुछ बचा भी तो नहीं था।
अंकल ठीक हैं?”
हाँ, वो फिर से अपने हॉस्पिटल में व्यस्त हो गए हैं। इतना बड़ा हॉस्पिटल, इतने क़ाबिल डॉक्टर्स, मेरे पापा का गुरूर सब मिल कर भी मम्मी को नहीं बचा पाए।
मुझे पता था तन्मय रो रहा है। स्लीपिंग बैग से एक हाथ निकाल कर मैंने उसके सिर पर रखा। वो फूट गया..
“तुम्हें पता है, भैया का बेटा भी मेरी तरह है। भैया भाभी बहुत लम्बे हैं लेकिन उसकी हाइट सामान्य है। भैया को मुझसे इस बात की भी चिढ़ है कि उनका बेटा मेरी तरह क्यों है
दादी छोटी थीं उनके जीन्स ने जहाँजहाँ खेल दिखाया वहाँ उनका असर दिखा। मम्मी बताती थीं, वो बहुत प्यारी थीं लेकिन उनकी कम लंबाई और अनपढ़ होने के कारण दादा जी ने जीवन भर उनका अपमान किया।
वो चुप हो गया था। मेरी उंगलियाँ अब तक उसके बालों में बने कंगूरों में थीं। फिर उसने मेरी हथेली का दस्ताना उतार कर उसे अपनी दोनों हथेलियों के बीच में रख लिया। उसकी हथेलियाँ भी बिना दस्तानों की थीं। मेरी ठंडी हथेली को अपनी हथेलियों से उष्मित कर रहा था।                                            
 
हम कितने गंदे लोगों के बीच में रहते हैं तृषा। यहाँ आपकी एक कमी आपको इतना कमजोर बना देती है कि आप ज़िन्दगी ही ख़त्म कर लेते हैं। तुम्हें पता है अपनी हाइट के चलते मुझे स्कूल में बुली किया जाता था और घर परकोई नहीं समझता कि मेरे अंदर क्या चल रहा है। ग्रुप पिक्चर्स में मैं हमेशा सबके आगे बैठ जाता था। एक मसख़रे के अंदर कितना बड़ा तूफ़ान चल रहा है ये सोचने की फ़ुर्सत मेरे क़ाबिल भाई बहनों को नहीं थी। बस मम्मी थीं जो मुझे समझती थीं। जो मुझसे हमेशा कहती थीं कि किसी की हाइट, सुंदरता या एजुकेशनल डिग्री उसके क़ाबिल होने का पैमाना नहीं होती। तुम्हारी सफलता बस एक बात पर निर्भर करती है कि तुम एक इंसान के रूप में कितने परिपक्व हो।
 तन्मय वो कह रहा था जो मैं कहना चाहती थी..
सर्वाइवल ऑफ़ फ़िटेस्ट से उपजा ये समाज सड़ रह है। अनफिटलोग इसके लिए मजाक का विषय हैं। काला है तो मीम्स बनाओ, दुबला है तो मज़ाक़ उड़ाओ, छोटा है तो पीट लो, पढ़ने में कमजोर है तो कहो, गधा है-नकारा है।
सच ही तो कह रहा था तन्मय.. यही तो है समाज जिसके लायक बनने के लिए हम अपनी सारी इच्छाओं को मार देते हैं। मैं स्वयं इसके मानकों पर सिद्ध ना होते हुए भी तन्मय को पुरुष के लिए तय किए मानकों से विपरीत पाकर उसे जज कर रही थी।
तन्मय अब शांत था। मेरी हथेलियों को उसके होंठों की छुअन महसूस हो रही थी। समय को वहीं उसी क्षण रुक जाना चाहिए था।          
     
तृषा, जब मम्मी ने आख़िरी साँस ली तब मैं उनके पास था। उस समय लगा कि अब सब कुछ ख़त्म हो गया। उन्होंने अपने दाह संस्कार के लिए बहुत पहले मुझे चुन लिया था। हर एक रस्म मुझे कमज़ोर और अकेला कर रही थी। शुद्धि हवन की अग्नि को देख अचानक से तुम याद आई। लगा कि तुम हो मेरे पास..लेकिन अगले ही पल लगा क्या मैं तुम जैसी लड़की के लिए फिट हूँ
उसी दिन मैंने तुम्हें फ़ोन किया था। मुझे नहीं पता मैं तुम्हें डिज़र्व करता हूँ या नहीं लेकिन ख़ुद को आख़िरी मौक़ा देना चाहता था।          
बाहर चहलपहल शुरू हो गई थी। कैम्प से बाहर निकलते ही मैंने सबसे पहले आसमान की तरफ़ देखा। तारों की ऐसी चमक पहले कभी नहीं देखी थी। शायद वो भी मुझसे कुछ कहना चाह रहे थे।
 
हम पीक की तरफ़ बढ़ रहे थे। हर सिर पर रोशनी का एक पुंज था। ढलमलाते कदम एक दूसरे के पीछे चल रहे थे, उस खूबसूरत दृश्य को देखने जहाँ जाकर समय भी ठहरने वाला था।  पर ये सफ़र भी बहुत खूबसूरत था।  एक लंबी सी कतार में एक दूसरे के आगे पीछे चलते हम दोनों.. मुझे संभालता हुआ वो ..
पीक पर पहुँच कर सब कुछ ठहर गया था। सामने मौजूद हिमालय की लाल चोटियाँ बता रही थीं कि सूरज भी उन्हें उसी मुग्धता से देख रहा है। लोग कह रहे थे, सनराइज़ होने वाला है। मैं सोच रही थी सूरज तो यहीं था। अब तिमिर का खोल उतार रहा है।
मेरी आँखों से आँसू निकल रहे थे। तन्मय को मेरे आँसुओं पर कोई हैरत नहीं हुई। 
पहली बार मेरी भी यही हालत थी।
उस दृश्य को हम चुपचाप देख रहे थे। हथेलियाँ अभी भी एक दूसरे से जुड़ी हुईं थीं।
वापसी की तैयारी शुरू हो गई थी। 
 
मैं हर उस क्षण को सहेज रही थी जिनमें हम दोनों साथ थे। चट्टानों पर खिलखिलाते फूल मेरा मन मोह रहे थे। कितने ज़िद्दी हैं वो! मत दो मिट्टी, मत दो पानी! उन्हें तो तुम्हारे हाथों का स्पर्श भी नहीं चाहिए। उन्हें उगना आता है। बिहसना भी आता है। पता नहीं पूर्णता की वो कौन सी परिभाषा थी जिसके आधार पर समाज हमें फिट या अनफिट करार करता है। पर इस वक्त एक दूसरे से जुड़े दो कंधे इतना जानते थे कि जितनी भी दूर साथ चलेंगे एक दूसरे के पूरक बने रहेंगे। 
 


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2 टिप्पणी

  1. पितृ छाया में पलती एक अकेली लड़की के लिए जिंदगी मानो ठहर जाती है। हर कदम आगे बढ़ाना उसके लिए एक परीक्षा और अनुभव की तरह होता है।
    आगे जब पढ़ने दिल्ली जाती है
    तो माँ का स्नेह बेटे के कारण एक पल में धूमिल हो जाता है।

    वास्तव में जिंदगी जो सिखाती है वह किताबों में नहीं लिखा होता है, और कई बार समय उम्र से पहले ही कुछ अधिक समझदार बना देता है और या फिर एकदम खामोश कर देता है।

    यह भी बड़ा सच कहा कि “जो रिश्ते हमें जीवन से नहीं मिलते उनकी खोज में हमारे हिस्से में सिर्फ भटकन ही आती है।
    यह भी सही है कि जब आत्मविश्वास टूटता है तो हर नजर डरावनी लगती है अपनी खुद की सोच डर पैदा करती है।
    बहरहाल कहानी का उत्तरार्द्ध धीरे-धीरे एक सकारात्मक रोचकता उत्पन्न करता है।
    शादी के बाद का तृषा का जीवन परस्पर सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाया।
    यहाँ पर तृषा की मानसिक स्थिति का बहुत ही बारिक मनोवैज्ञानिक और कोमल वर्णन किया है।दो साल बाद ही शादी टूट गई।

    बाद में तनमय जीवन में आया! तनमय और तृषा! दोनों ही लगभग एक ही मानसिक स्थिति से गुजर रहे थे, बस परिस्थितियाँ अलग थीं।
    तनमय अपने परिवार में दस। भाई-बहनों के बीच भी अकेला था। वह बस माँ के लिये विशेष था और उसके लिए माँ थी।
    माँ ने खामोशी से यह बात तनमय को समझाई थी कि उसके लिए उसका पुत्र ब्रह्मकमल की तरह है।
    बिना मिट्टी और खाद के चट्टानों पर खिले यह फूल शंकर जी को बहुत प्रिय थे जो रात को खिलते किंतु अगली सुबह तक पूरी तरह मुरझा जाते थे।

    वह किताब लिख रहा था-ब्रह्मकमल!वह जानता था कि उसकी माँ के लिए वह ब्रह्म कमल है।
    कहानी का अंत काफी मर्मस्पर्शी लगा।
    कुल मिला कर एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक कहानी है। बेहद संवेदनशील।
    आपका शब्दकोश और भावानुकूल शब्द संयोजन काफी समृद्ध है।
    बेहतरीन कहानी के लिये बहुत-बहुत बधाई।

  2. वाह, वाह, बहुत ही सुंदर कहानी लिखी है आपने। लड़कियों और महिलाओं की मनःस्थिति का इतना अच्छा विवरण कहीं और नहीं पढ़ा है। यद्यपि तृषा और तन्मय को औरों से अलग दर्शाया गया है, उनकी मानसिक उलझनें सबों पर लागू होती है।
    इतनी सुंदर कहानी लिखने पर बहुत बधाई।

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