मैं उस घर से आती आवाजों का आदी होता जा रहा था। धीमे से तेज होती आवाजें फिर धीमी होती आवाज …ध्वनियों के साथ आती बातों द्वारा मैं उनकी कहानी के हर मोड़ को पहचानने लगा था। उस घर में कुल पांच लोग रहते थे या साढ़े चार क्योंकि एक तो पाँच साल का बच्चा ही था। लेकिन मुझे बस एक सदस्य को जानने में रुचि थी जो अपनी बड़ी–बड़ी आँखों से दुनिया को इस तरह देखती थी जैसे कोई बच्चा कुतूहल के साथ जादू का शो देख रहा हो।
उस घर से आती लगभग हर आवाज में उसका नाम होता था। उसके अलावा मौजूद हर इंसान उससे जुदा था। कभी एक बुजुर्ग आवाज आती, ‘’मेरे ही किसी बुरे कर्म की सजा के रूप में मिली है ये लड़की’’ तो दूसरी तरफ से एक तंज कसती आवाज आती, ‘‘तो अपने कर्म मेरे पल्ले क्यों बाँध दिया?’’ कभी–कभी बहुत तेज आवाज के साथ सुनाई देता, ‘‘ये पागल मुझे भी पागल बनाएगी’’ मैं मन ही मन चिढ़ कर बुदबुदाता, अभी क्या कम पागल हो ?
ये सारी आवाज़ें मेरे ठीक बग़ल वाले घर से आती थीं। मैं इस घर में अपने आधे–अधूरे स्वरूप के साथ पहली बार आया था। दो बेड रूम के डूप्लेक्स मकान के पीछे बने किराए के एक कमरे के सेट में मैं रहता था। हालाँकि मेरे हिस्से भी एक छोटा सी छत भी थी लेकिन लड़खड़ाते कदमों के साथ छत पर जाना ज़्यादा आसान बात नहीं थी। मेरे कमरे से एक दरवाज़ा पीछे को तरफ़ खुलता था जिससे लगा तक़रीबन छः बाई छः का आँगन उनके आँगन का ही एक हिस्सा था। चार फिट की बाउंडरी होने के बावजूद उनके आँगन की हलचल मैं देख सकता था। एक बार उनकी छत पर कुछ खनकती हुई आवाज सुनी। उस तरफ देखते ही आवाज आई, ‘‘ख़ुशबू वहाँ क्या कर रही हो?’’ जाने क्या सोच कर वो लड़की हंस पड़ी और नीचे चली गयी। इस तरह पता चला जिस लड़की को दिन भर याद किया जाता है, उसका नाम ख़ुशबू है। उसके चेहरे में कुछ अलग बात थी जो मैं महसूस नहीं कर पा रहा था। उसको और जानने की उत्कंठा में मैं उसके घर के हर सदस्य को ध्यान से देखने लगा था। एक बार ऑफिस से लौटते समय मोहल्ले के बाहर ठेला लगाए सब्जी वाले से उस घर की सबसे बुजुर्ग सदस्य अर्थात उनकी माँ कुछ मोल भाव कर रही थीं। थका हुआ उदास चेहरा जो कुछ–कुछ उस लड़की की तरह ही लग रहा था। उनके चेहरे की थकन मात्र उम्र की थकन नहीं थी उसे हताशा या नाउम्मीदी की थकन भी कह सकते थे। जिसे मैंने हमेशा अपनी माँ के चेहरे पर भी देखी थी।अपने शरीर को घसीटता वृद्ध मन शरीर का बोझ तो आसानी से ढो लेता है पर जब मन ही थक जाए तो उस शरीर को कैसे घसीटें?
मैंने उनका झोला उठाने की पेशकश करते हुए कहा , “लाइए माँ जी ये झोला घर तक पहुंचा दूँ।” उन्होंने मना कर दिया। मुझे लगा कि शायद उन्हें मेरा झोला उठा कर चलते देखना अच्छा न लगे। मैंने कहा, “आप मेरे शरीर को देख कर घबराइए मत। मैं इतना भार उठाकर भी चल सकता हूँ।” वो सकपका कर बोलीं, “ अरे बेटा ये बात नहीं है।” ये कहते समय उनके चेहरे की स्निग्धता में ख़ुशी का गुलाबी रंग घुल गया था। मुझे अच्छा लगता था ये रंग…… ये रंग माँ के चेहरे पर भी खूब फ़बता था।
ख़ुशबू कभी पूरी दिखाई नहीं देती थी। कभी उसकी एक झलक दिखती कभी दूसरी, मैं अपने आँगन में बैठ कर अनुवाद का काम कर रहा होता और अपने छत पर टहलती ख़ुशबू के लम्बे बाल दिख जाते। कभी अलगनी पर कपड़े डालती उसकी बाहें दिख जातीं। शायद उसकी स्थिति में मैं ख़ुद को महसूस करता था। मैं भी तो अपने ही परिवार में रहकर सबसे अलग–थलग था। दो डॉक्टर भाइयों का नकारा भाई जिसे डिग्रियों से कभी लगाव नहीं रहा। मेरे हवेली नुमा घर के एक कोने में पड़ा मैं अक्सर सोचता था कि कुछ होता और ये छत मुझ पर गिर जाती। मलबे के भीतर दबे होने की स्थिति में ख़ुद को परखता और घबराकर छत से आँखें हटा देता था। साइड की दीवार पर माँ की बड़ी सी फोटो लगाई गयी थी। पहले ये फ़ोटो घर की बैठक में लगी थी। फिर किसी ने कह दिया कि मरे हुए लोगों की इतनी बड़ी फ़ोटो घर की बरक्कत रोक देती है। उस दिन ये फ़ोटो वहाँ से हट गयी। मैंने कहा, “मेरी बरक्कत तो वैसे भी रुकी हुई है इसे मेरे ही कमरे में लगा दो।”
असल में माँ तस्वीर से ज़्यादा मेरे साथ थी। उसकी हर बात मेरे आस–पास गूँजती रहती रहती थी। वो कहती, “ मृत्यु लोक में इंसान दुःख भोगने आता है। इसीलिए ईश्वर हर किसी को एक परिवार देता है जिसके साथ दुःख के दिन कट जाते हैं।”
शायद माँ को नहीं पता था अगर नियति में दुःख लिखा हो तो यही परिवार उस दर्द का कारण भी बन जाता है। जब तक माँ थी पिताजी के पेन्शन से मेरा भी गुज़ारा चल जाता था। लेकिन उनके जाने के बाद उनकी तीन संतानों में एक मात्र मैं ही लावारिस हो गया। घर के सभी कोनों से हँसने–बोलने की आवाज़ आती थी लेकिन मैं अपने कमरे में अकेला लेटा रहता था। मेरी प्रतिदिन की गिनी हुई आठ रोटियों का खर्चा मेरे भाइयों पर आ चुका था।
ऐसा नहीं था कि मेरे अकेलेपन के ज़िम्मेदार मेरे भाई थे। बचपन में पोलियो ने सिर्फ़ हाथ–पैर पर ही नहीं मेरे मन पर भी असर दिखाया था। मैं ख़ुद मैदान में अपने भाइयों को खेलते देख उनके लिए ताली नहीं बजा पाया और अपने लिए कमरे का अंधेरा चुन लिया। मुझे हर वक़्त लगता था मैं इस समाज लायक नहीं हूँ। कभी दबी–छिपी ज़ुबान में तो कभी सहानुभूति वश मेरे इस रूप को मेरे पिछले जन्म के करमों की सजा कहा गया। इस वाक्य को जितनी तरह का कपड़ा पहनाया जा सकता था उतनी तरह से सजाकर मेरे पास भेजा गया कि मैं इसे पसंद कर लूँ। लेकिन मेरा मन इसे स्वीकार कर ही नहीं पाता था। मुझे अगले या पिछले जन्म की दलीलों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।पढ़ाई से उचटा मन ज़बरदस्ती किताब खोले बैठे रहता है कि विकलांग कोटा से ही सही खाने–पीने लायक नौकरी मिल जाए लेकिन जिस भी जगह आवेदन डालता वहाँ मुझ जैसे लोगों की भीड़ थी। ये भी शायद मेरे पिछले जन्मों के पाप ही थे जो नौकरी पाने की क़तार में भी कुछ लोग मुझसे आगे खड़े थे। इस क़तार ने मुझे समझा दिया कि परिवार और अपनों का निःस्वार्थ प्रेम सब किताबी बातें हैं। असल में प्यार विनिमय की प्रक्रिया द्वारा चलने वाला व्यापार है। हम जब तक सामने वाले से लाभान्वित नहीं होते उसे कुछ भी नहीं दे सकते हैं। प्रेम भी नहीं!
फिर मेरी क़िस्मत में शायद पिछले जनम के कुछ अच्छे कर्म भी थे। दो साल पहले मिली इस नौकरी ने अचानक से परिवार में मेरा मान बढ़ा दिया पहली बार मेरे बिस्तर पर नई चादर पड़ी। उस पर कढ़े हुए फूलों ने मुस्कराकर मुझसे कहा, “मख़मल और रेशम की दुनिया में आपका स्वागत है।”
पर मुझे इन सबसे कोई ख़ुशी नहीं मिल रही थी। माँ बहुत याद आ रही थी। मैं उनके लिए कुछ भी तो नहीं कर पाया। मेरे बेजान हाथ और पाँव चूमने वाली माँ को अपनी कमाई से कुछ भी देने का सुख मुझे नहीं मिला।
इंसान बहुत जटिल प्राणी है जिन ख़ुशियों को पाने की कल्पना कर के ख़ुद को खुश रखता है, उन्हें पाकर भी खुश नहीं हो पाता है। पहले सोचता था कि एक बार नौकरी लग जाएगी तब घर वालों को मेरी अहमियत समझ आ जाएगी लेकिन जब नौकरी और अहमियत दोनों मिल गयी है मेरा मन और विह्वल हो रहा था। एक अकुलाहट दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही थी। अब भाभियों के मायके से मेरे लिए रिश्ते आ रही थे। भाभियों का उमड़ता स्नेह देख कर लगता कि काश इसका आधा भी स्नेह इन लोगों ने पहले दे दिया होता तो मेरी शारीरिक अपंगता मेरे मन को अपनी जकड़ में ना लेती। जिनके रिश्ते आ रहे थे उनमें से ज़्यादातर ग़रीब परिवार की लड़कियाँ थी। ये बात भी मुझे हीनता से भर देती थी। मुझे पता था सामान्य हालत में कोई लड़की मुझसे शादी नहीं कर पाएगी। यहाँ भी मेरी नौकरी और उससे मिली तनख़्वाह का विनिमय एक बेचारी लड़की के साथ होगा मैंने इस तरह के हर रिश्ते के लिए मना कर दिया। इसके बाद कुछ आंशिक विकलांग लड़कियों के भी रिश्ते आए। मैंने उनके लिए भी मना कर दिया। मैं इस स्थिति के लिए तैयार नहीं था जहाँ दो अपंग वयस्क एक स्वस्थ्य परिवार को आगे बढ़ाएँ। नौकरी पाने के बाद मैं मन से और कमजोर हो गया था।फिर स्थानांतरण करवाकर इस शहर में चला आया। इस शहर में जो भी मिला बड़े प्यार से मिला। या ये कहें कि मेरे मन में किसी के लिए कोई पूर्वाग्रह न होने के कारण मुझे ऐसा लग रहा था। यहाँ मेरी शारीरिक कमी किसी के भी चेहरे पर कोई भी क्षोभ उत्पन्न नहीं करती थी। यहाँ मेरा स्वस्थ परिवार नहीं था जिनके बीच में मैं बेचारा या अलग–थलग सा लगूँ। ये सिर्फ़ मेरी दुनिया थी जहाँ लोगों का मुझसे परिचय मेरे इसी रूप के साथ हुआ था।
इसी दुनिया में अपनी धमक के साथ मेरे ही आस पास मौजूद ख़ुशबू भी है जिसके चेहरे की निश्छ्लता मुझे खींच रही है। पूरा दिन यही सोचते हुए गुज़रता है कि आख़िर ऐसी कौन सी वजह है जिसके कारण इस लड़की के साथ उसका परिवार ऐसा व्यवहार करता है। सुबह से रात तक काम करती ये लड़की अपने ही परिवार के लिए तर्ज्य क्यों है? फिर ख़ुद को समझाता है कि मैं उसमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा हूँ। आख़िर मैं उसके लिए क्या कर पाऊँगा?
आस–पास के लोगों से धीरे–धीरे बढ़ती नजदीकियों ने मुझे ख़ुशबू की माँ के इतना क़रीब कर दिया था कि वो अब मुझे सब्ज़ी का झोला उठाने दे देती थीं। उसके भाई साहब आते–जाते मुझे नमस्ते करने लगे हैं। एक दिन ऑफ़िस के लिए निकलते समय वो मिले और बोले, “शाम को घर पर बेटे के जन्मदिन का छोटा सा कार्यक्रम है आप भी आइएगा।” पूरे दिन ऑफ़िस में मैं यही सोचता रहा कि आज ख़ुशबू को ठीक से देखूंगा और उसको जानने की कोशिश करूँगा । लौटते समय अपनत्व दिखाते हुए बच्चे के लिए थोड़ा महँगा खिलौना ख़रीदा और नियत समय पर उसके घर पहुँच गया। वहाँ ज़्यादा लोग नहीं थे पाँच–छः लोग जिनके बच्चे उस बच्चे के हम उम्र थे और पड़ोस के एक दो और परिचित परिवार वहाँ मौजूद थे।
जन्मदिन की रस्में निभाई जा रही थी लेकिन ख़ुशबू वहाँ मौजूद नहीं थी। उसकी माँ मेरे पास ही बैठी थीं और मैं चाह कर भी ख़ुशबू के बारे में नहीं पूछ पा रहा था। आज से पहले मैं किसी के लिए भी इतना अधीर नहीं हुआ था। रसोईघर से छन कर आती पूरियाँ गवाह थीं कि ख़ुशबू वहीं पर है। पर ऐसा क्या है जो वो किसी के सामने नहीं आ रही है। खाने का निवाला मुँह में लिए मैं उसके स्वाद की अनुभूति नहीं कर पा रहा था जबकि मुझ जैसे ख़राब खाना बनाने वालों को बहुत दिन बाद अच्छा खाना खाने को मिला था। उस दिन ख़ुशबू को तो नहीं देख पाया लेकिन उसके परिवार से मेरी घनिष्ठता बढ़ गई थी। एक दिन बातों ही बातों में माँ जी से पूछ लिया, “भाई साहब के अलावा आपकी कोई और संतान है?”
माँ जी ने कहा, “हाँ एक बेटी है, खुशबू”
पर पता नहीं क्यों ख़ुशबू बोलते ही उनकी आँखें भर गई थीं। हो सकता है वो मेरी ग़लत फ़हमी हो। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “अच्छा वो कहाँ रहती हैं?” उन्होंने कहा, “यहीं रहती है, हमारे साथ” फिर अगला सवाल ना चाहते हुए भी मैंने पूछ ही लिया। “अच्छा! कभी दिखाई नहीं देतीं। उस दिन पार्टी में भी नहीं मौजूद थीं।”
माँ जी ने बात को संभालते हुए कहा, “अच्छा उस दिन ……….उस दिन तो उसकी तबीयत ठीक नहीं थी बेटा। इसी लिए कमरे से बाहर नहीं निकली।”
माँ जी ने इतनी आसानी से यह झूठ बोल दिया कि चाहते हुए भी आगे कुछ पूछ ही नहीं सका।
उधर घर से कॉल आयी कि बड़े भैया की तबियत बहुत ख़राब है। जिसके कारण मुझे वहाँ जाना पड़ा। वहाँ सबका व्यवहार मेरे लिए बदल चुका था। जिन चेहरों पर मैंने अपने लिए सिवाय बोझ के किसी और भाव को महसूस नहीं किया उन्हीं चेहरों पर मुझे देखते ही उभरी चमक देखी। बिस्तर पर पड़े मेरे बड़े भाई को असहाय स्थिति में देखकर मेरी आँख भर गयी। उन्होंने कहा, “ पराग! शादी कर लो बेटा। ये ज़िंदगी अकेले नहीं कटती है। तुम्हें जो भी लड़की पसंद हो उसी से कर लो।” मैं उनसे कुछ नहीं कह पाया और कहता भी क्या जिस भाई की आँखों में हमेशा श्रेष्ठ होने का दम्भ देखा उन आँखों में आज पश्चाताप के आँसू देख रहा था। उस दिन अपने कमरे में लगी माँ की तस्वीर के सामने खूब रोया। आँसुओं की तरलता के साथ मेरे अंदर जमी उपेक्षा और हीनता की परत धुल रही थी।अपने पिछले जीवन की कड़वाहट, भाई–भाभियों का बेगानापन, ख़ुद से नाराज़गी वो सब कुछ मेरे आँसुओं के साथ ही बह रही थी। तभी अपने अशक्त हाथ पर नज़र पड़ी मैंने उसे ठीक उसी तरह चूमा जैसे उन्हें माँ चूमा करती थी। ये मुझे क्या हो रहा था मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रहा था। वहाँ से जल्दी आने का वादा करके मैं लौटा आया। पिछली बार की तरह मन में रंच मात्र भी अकुलाहट नहीं थी। जाने क्यूँ इस बार ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं थी।
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया था। ख़ुशबू की आवाजाही छत पर बढ़ गयी थी। उसकी मुस्कान देख मेरे होंठ ख़ुद ब ख़ुद मुस्कुरा उठते थे। हालाँकि उसकी मुस्कान में मेरी उपस्थिति का कोई भी अंश नहीं था लेकिन मेरा मन पतंग हुआ जा रहा था। कितना भी कस कर खींचो हवा की दिशा में उड़ता ही जा रहा था। एक दिन मैंने उसके भाई से पूछ ही लिया, “माँ जी कह रही थीं कि आपकी बहन ख़ुशबू अक्सर बीमार रहती हैं । उनको हुआ क्या है?”
वो अचानक से गंभीर हो गए और कहने लगे, “बीमारी है भी या नहीं मैं समझ नहीं पाता। ख़ुशबू शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है लेकिन मानसिक तौर पर कमज़ोर एक ऑटिस्टिक लड़की है।” किताबों में पढ़ा था, “कुछ देर के लिए धड़कन ठहर गयी” लेकिन इस बात का अर्थ मुझे उस रोज़ समझ आया था। आज से पहले इस वाक्य को सुना भर था लेकिन उस दिन पहली बार महसूस किया था। पूरी रात गूगल पर ऑटिस्टिक शब्द को सर्च करता रहा। हर प्रकार के उदाहरणों से ख़ुद को समझाता रहा लेकिन अंततः बस इतना समझ आया की ख़ुशबू सामाजिक तौर पर कटी हुई लड़की है। उसके भाई ने बताया था कि परिवार के घेरे से बाहर वो सुरक्षित नहीं रह सकती है। वैसे तो वो घर का सारा काम कर लेती है लेकिन उसके भीतर समाज के साथ सामंजस्य बैठाने की समझ नहीं है। उसका बौद्धिक विकास इतना धीमा है कि हज़ार कोशिशों के बाद कुछ ख़ास पढ़ नहीं पाई। भोर होने वाली थी और मैं अपनी क़िस्मत पर हँस रहा था इतने सालों में कोई पसंद भी आया, वो भी विकलांग ही निकला। तमाम कड़वाहटें जिन्हें मैं पिछले दरवाज़े से बाहर निकाल आया था वो फिर से खिड़कियों के रास्ते वापस मेरे घर में घुस गयीं थीं।क़िस्मत से ढेर सारे सवाल किए, मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? सुबह–सुबह मोबाइल की आवाज़ से नींद खुली। ख़ुशबू के भाई का फ़ोन था, माँ जी की तबियत अचानक ख़राब हो गयी थी। मैं जब वहाँ पहुँचा तब एंबुलेंस आ गई थी और ख़ुशबू उनका हाथ पकड़े रो रही थी। आज पहली बार अपनी आँखों के सामने इस तरह रोता देख मन भर गया। माँ जी को हार्ट अटैक आया था। हॉस्पिटल में डॉक्टर अपना काम कर रहे थे और हम दवाइयों तथा अन्य व्यवस्थाओं में लगे हुए थे। पोलियो का अधिकांश असर मेरे दाएँ हाथ और दाहिने पैर में हुआ था। लम्बे चले इलाज और उपकरणों ने मुझे चलने की शक्ति दे दी थी फिर भी मैं ख़ुद को सामान्य ना होने के लिए कोसता रहा। मुझे हमेशा लगता कि मुझे तो लोगों की बहुत ज़रूरत है पर मेरी ज़रूरत किसी को नहीं है।पर माँ जी के साथ हॉस्पिटल में बिताए पाँच दिन ने सबकी नज़र में मेरी अहमियत बढ़ा दी थी। ख़ुशबू के भाई जब बार–बार मुझे धन्यवाद देते तो मेरा शरीर थोड़ा और मज़बूत हो जाता था। मैं अब उन्हें भैया कहने लगा था। छठे दिन मैंने उनसे से कहा, “ आज रात आप घर चले जाइए। मैं माँ जी के पास रुक जाता हूँ। वैसे भी उनकी स्थिति में अब काफ़ी सुधार है।”
थोड़े संकोच के बाद भैया घर चले गए। मैं वहीं माँ जी के बग़ल में बैठ गया। थोड़ी देर बाद उनकी नींद खुल गई। उन्होंने मुझे देख मुस्कुराते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया। फिर वो कहने लगीं, “ बेटा मैं अभी मरना नहीं चाहती। अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी ख़ुशबू का क्या होगा? वो अनाथ हो जाएगी।” मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, “कुछ नहीं होगा आपको।”
थोड़ी देर बाद वो फिर बोलने लगीं ,”दुनिया में ऐसी कौन माँ होगी जो चाहेगी कि उसकी बेटी क़ी मौत उसके सामने ही हो जाए। लेकिन मैं चाहती हूँ। मेरे सामने जब लोग उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं। मेरे पीछे तो जाने क्या करेंगे।”
उस रोज़ माँ जी के चेहरे में मुझे अपनी माँ का चेहरा दिख रहा था। मुझे माँ का वो बीमार बेबस चेहरा याद आ रहा था। जब वो मुझे अकेले छोड़ कर जाना नहीं चाहती थीं। खुशबू की माँ के आँसू मेरी आँखों से भी बरस रहे थे। उनकी आँखों में मैंने कुछ और भी महसूस किया। जिसे मैंने अनदेखा कर दिया। वो सवाल जिसने अभी–अभी उनके मन में जन्म लिया था मेरे अनदेखा करते ही मृत हो गया। कुछ देर के बाद दवाइयों के असर ने माँ जी को सुला दिया पर मेरे हिस्से की नींद आँखों से कोसों दूर किसी जंगल में भटक रही थी। उस मृत सवाल को सूंघ कर विचार रूपी श्वान मेरे दिमाग़ में घुस आए थे। उनके भौंकने की आवाज़ से मेरा सिर दर्द से फट रहा था । एक विचार कौंधा, क्या होगा अगर मैंने ख़ुशबू को अपना लिया? तब तक दूसरा विचार आया, उसके बाद आगे क्या होगा? हमारे परिवार का भविष्य क्या होगा? तभी तीसरा विचार आया, तुम भी तो अपंग हो। क्या दो दो ऐसे लोग एक साथ मिल कर एक पूरी ज़िंदगी नहीं बिता सकते? फिर चौथा विचार आया, आज परिस्थितियों के कारण ख़ुशबू से सहानुभूति है। कल ख़त्म हो जाएगी। फिर उसका क्या होगा? क्या होगा? वो समाज से नहीं जुड़ पाती पर मुझसे तो जुड़ ही जाएगी। फिर आया सबसे मज़बूत विचार, अरे लोग क्या कहेंगे? इन विचारों के बोझ ने मुझे बेहद थका दिया था। एक बार को लगा ख़ूब तेज़–तेज़ चिल्लाऊँ कि मैं अशक्त नहीं हूँ सब कुछ सम्भाल सकता हूँ और सारी फुसफुसाहटों को शांत कर दूँ। पर मेरे अंदर उस वक्त इतना भी दम नहीं बचा था।
माँ जी अब पूरी तरह स्वस्थ होकर घर आ गयी थीं। हमारे बीच उस रात का अंश भी नहीं बचा था। मैं उनके घर कभी भी बेहिचक जा सकता था। कभी मटर का निमोना खाने का निमंत्रण होता तो कभी गाजर का हलवा। उस घर में मेरे लिए एक और परिवर्तन आया था वो था ख़ुशबू की उपस्थिति…… ख़ुशबू को मुझसे छिपा कर नहीं रखा जाता था। जब भी माँ जी के कमरे में जाता ख़ुशबू पहले से मौजूद होती थी। शुरू–शुरू में वो मुझे देखते ही असहज हो जाती थी। या ज़मीन की तरफ़ देखने लगती थी लेकिन अब वो सहज हो रही थी। उसके हाथ की चाय वाक़ई अमृत थी। मैंने उसे ध्यान से देखा तो समझ आया कि वो चाय की तारीफ़ सुन कर मुस्कुराते हुए माँ जी की तरफ़ देखने लगती। कभी भैया उससे कुछ करने को कहते तो भी वो पहले माँ की तरफ़ ही देखती जैसे उनसे अनुमति ले रही हो।
एक दिन मैं माँ जी के साथ आँगन में बैठा हुआ था। अंदर से ख़ुशबू और उसके भतीजे के लड़ने की आवाज़ आयी। वो रोती हुई हमारे पास आयी और कहने लगी, “ माँ उसने फिर उसकी फ़ोटो फाड़ दी।”
माँ जी ने अपने सिर पकड़ लिया और बोलीं, “ तो जाने दे कौन तेरी फ़ोटो फाड़ी है?”
उसने ग़ुस्से में कहा, “ उसकी क्यों फाड़ी?”
माँ देख रही थीं कि कहीं इन दोनों की आवाज़ सुन कर भाभी ना आ जाएँ। उन्होंने ख़ुशबू को पुचकारते हुए कहा, “ मैं तेरे लिए नयी फ़ोटो मँगवा दूँगी। ठीक है।”
फिर मेरी तरफ़ मुख़ातिब होते हुए कहने लगीं, “ अरे बेटा तुम्हारे पास उसकी कोई फ़ोटो हो तो इसे दे देना।”
“ किसकी माँ ज़ी?”
“ अरे क्या नाम है उसका?”
तभी ख़ुशबू की आवाज़ आयी, “रणबीर कपूर”
मुझे हँसी आ गयी। मतलब सारा माजरा रणबीर कपूर के लिए बनाया गया था। मैंने ख़ुशबू से कहा, “ तुम्हें रणबीर कपूर पसंद है?”
वो मुस्कुराती हुई वहाँ से चली गयी।
तब माँ जी ने उदास आवाज़ में कहा, “ इन्हीं बातों पर बहू चिढ़ जाती है। कहती है कि हीरो को फ़ोटो रखने की बुद्धि है लेकिन और चीज़ों का होश नहीं रहता है। उसे कैसे समझाऊँ कि भगवान ने उसे ऐसा ही बनाया है। उसे इतनी अकल होती हमारे घर क्यों बैठी रहती?”
“पर माँ जी, ये घर तो ख़ुशबू का भी है।”
“ कौन समझता है बेटा? मैं तो माँ होकर भी नहीं समझ पाती कि इस पागल के मन में क्या चल रहा है? अपनी भाभी को सजते–संवरते देखती है तो इसका भी मन तैयार होकर रहने का करने लगता है।”
“ तो इसमें क्या बुराई है माँ जी? सामान्य लोगों जैसे नहीं होने का ये मतलब तो नहीं है कि हमारा अच्छा खाने, पहनने का मन ना करे।” मुझे अपनी भाभियों द्वारा दिया जाने खाना और कपड़ा याद आ गया। मुझे भी तो मेरे ही घर में सबसे ख़राब कमरा और बचा हुआ खाना मिला था।
माँ जी उस अपने रौ में कहे जा रही थीं, “ पर बहू को लगता है ये कम बुद्धि होने का नाटक करती है। काश भगवान इसका कोई अंग कमजोर बना देते पर दिमाग़ तो ठीक रखते। पढ़–लिख कर ये कोई नौकरी करती तो घर में भी इज्जत मिलती।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। वो जो कह रही थीं वही सत्य था।
तभी ख़ुशबू आयी और बोली, “ मुझे उसकी फ़ोटो कब देंगे?”
मैंने हँस कर कहा, “ शाम को भिजवा दूँगा।”
घर आते ही प्रिंटर से रणबीर की पाँच–छः अच्छी फ़ोटो निकाल कर माँ जी को दे दिया। और सोचने लगा, ख़ुशबू को खुश रखना कितना आसान है।
पर उसी शाम जब मैं किचन में अपना खाना बना रहा था। उसके घर से भाभी के चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। मुद्दा ख़ुशबू ही थी। थोड़ी देर बाद भैया की भी आवाज़ आयी। वो शायद ख़ुशबू को माफ़ी माँगने को कह रहे थे तभी माँ जी की आवाज़ सुनाई दी….”अरे माँग ले माफ़ी, तू तो पैदा ही इसीलिए हुई है।” शायद ख़ुशबू माफ़ी नहीं माँग रही थी।
तभी भाभी की आवाज़ आयी, “ बार–बार उधर की तरफ क्या देख रही हो। उनसे इतनी शर्म आ रही है तो ऐसी हरकत ही क्यों करती हो? मैं आप लोगों से कह दे रही हूँ इस पागल के साथ एक दिन भी यहाँ नहीं रहूँगी।”
उसके बाद भी कुछ आवाज़ें आ रही थीं। शायद भैया ने ख़ुशबू को थप्पड़ मारा था। शायद माँ जी के रोने की भी आवाज़ आ रही थी। मैं गैस बंद करके अपने कमरे में आ गया।
आज मुझे अहसास हो रहा था कि ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया है। ख़ुशबू की स्थिति की ज़िम्मेदार वो नहीं थी। उसे थोड़े प्यार के साथ समझाया जा सकता था। जब मैं अपने परिवार के साथ रहता था तब मैं भी इसी प्यार के लिए तरसता था। क्या सामान्य लोगों से इस स्नेह की उम्मीद करना हमारी गलती है?
माँ जी का डर बिल्कुल सही था। जो लड़की अपने परिवार में रह कर भी हर बात के लिए उनका चेहरा देखती थी, उनके जाने के बाद इस दुनिया में अपना अस्तित्व किस तरह बचा पाएगी?
अगली सुबह उस घर में सब कुछ सामान्य था। रोज़ की तरह ख़ुशबू धुले हुए कपड़ों को लेकर छत पर फैला रही थी। माँ जी ठेले वाले से मोल भाव कर रही थीं। मुझे देख कर थोड़ा असहज हो रही थीं लेकिन मैंने उनसे मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी मटर थोड़ी ज़्यादा ले लीजिए। ख़ुशबू के हाथ का निमोना खाए बहुत दिन हो गए।”
वो तुरंत सहज होकर बोलीं, “हाँ–हाँ बेटा, कल सुबह ही भिजवाती हूँ। टिफ़िन में वही लेकर जाना।”
अगली सुबह ठीक नौ बजे मेरे दरवाज़े पर थपथपाने की आवाज़ आयी। देखा तो ख़ुशबू टिफ़िन लिए खड़ी थी।
“अरे ख़ुशबू, ये क्या?”
“निमोना पराठा और चावल है। खा लीजिएगा।”
उसके पीछे थोड़ी दूर पर माँ जी भी खड़ी उसे देख रही थीं। मैंने उन्हें नमस्ते करते हुए ख़ुशबू से पूछा,
“ये तुमने बनाया है ना? भाभी से तो नहीं बनवा दिया?”
उसने हँस कर कहा, “ नहीं”
और वापस चली गयी। मुझे याद आया कि उसे “थैंक यू” तो बोला ही नहीं।
थोड़ी तेज आवाज़ में बोला, “थैंक यू ख़ुशबू”
उसने पलट कर कहा, “वेल कम”
कितनी प्यारी थी उसकी मुस्कान। बच्चों सी शक्ल वाली इस लड़की पर भाभी को इतना ग़ुस्सा कैसे आ जाता है? मैं ख़ुद को समझाता कि भाभी और भैया को जज नहीं करना चाहिए। लेकिन लगता, अगर ख़ुशबू उनकी अपनी बेटी होती तो भी क्या वो ऐसा ही करते? ईश्वर भी तो अपनी कमजोर रचनाओं को बलिष्ठ हाथों में सहेजने की ज़िम्मेदारी के साथ भेजता होगा? फिर अपनी ही सोची बात पर मनन करने लगा।
दिसम्बर की आख़िरी तारीख़ अपने शोर शराबे के साथ ख़त्म हो गयी थी।बहुत दिनों बाद निकली धूप ने नए साल के पहले रविवार का स्वागत किया था। धूप की तलाश में मैं बरसाती तक गया तो देखा कि अपने आँगन में ख़ुशबू माँ जी के पास बैठी थी। शायद उनके पैरों की मालिश कर रही थी। पता नहीं किस बात पर वो दोनों माँ–बेटी खिलखिला रही थीं। तब तक माँ जी ने ख़ुशबू को अपनी बाहों में भर कर चूम लिया। मेरी आँखों से वो स्नेह का पल आँसू बनकर छलक गया।
अगले दिन मैं माँ जी के सामने बैठा हुआ था। माँ जी ने ख़ुशबू से मेरे लिए हलवा लाने को कहा। मैंने कहा, “ हलवा अगर ख़ुशबू ने बनाया है तभी खाऊँगा।” मैंने भाभी के हाथ के हलवे से बचने के लिए ये बात कही थी। पर उस दिन ख़ुशबू ने मुझे उस तरह देखा जैसे वो अपनी माँ को देखती थी। मैंने उन आँखों में अपने लिए एक विश्वास देखा था। जो कभी किसी के लिए भी नहीं देखा था। उस एक पल ने मेरे मन से कुछ कहा। मन की अंदरूनी परत तक उस बात की तरंगें फैल गयी। उस उथल–पुथल के बीच मैं वो हलवा खा रहा था। खाते–खाते मैं माँ जी से कहने लगा, “यह जानते हुए भी कि मैं कमजोर हूँ। आप ख़ुशबू का हाथ मेरे हाथ में देंगीं?” माँ जी मुझे देख रही थीं। उनके दोनों हाथ आपस में जुड़े हुए थे जिन्हें मैंने अपने एक हाथ से पकड़ कर चूम लिया।
“ मैं अब चैन से मर सकूँगी बेटा।”
“ ये सब बात मत कीजिए। वैसे भी मैं थोड़ा लालची क़िस्म का इंसान हूँ।मेरे मन में ख़ुशबू के साथ आपका प्यार पाने का भी लालच है दहेज में मुझे वो भी चाहिए।”


बहुत सुंदर कहानी
पल्लवी विनोद जी बहुत ही ख़ूबसूरत कहानी है। यदि किसी भी तरह की विकलांगता हो तो सचमुच ही अन्य लोग तो क्या उसके अपने माता-पिता भी इस परिस्थिति का सामना ढंग से नहीं कर पाते और एक कॉम्प्लेक्स के शिकार हो जाते हैं और उस बच्चे का तो हाल बेहाल होता ही है। सब पात्रों के मनों की उथल पुथल ख़ूबसूरती से वर्णित है। शब्द विन्यास और शिल्प सराहनीय है। आपको बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर कहानी के लिये।
वाह अति सुंदर रचना और उसके भाव भी
बहुत मर्मस्पर्शी कहानी। इतनी अच्छी कहानी के लिए बधाई!