तहलका मच गया।
ये तो सोने पर सुहागा ही था कि एक ओर जहां विश्व नीड़म विद्यानिकेतन का स्वर्ण जयंती समारोह मनाए जाने की घोषणा ज़ोर- शोर से हुई, वहीं डॉक्टर लीली पुटियन की नियुक्ति की सौगात भी संस्थान को मिली।
पचास साल के इतिहास में ये पहला मौका था कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस इंस्टीट्यूट में उसी के एक पुराने छात्र को डायरेक्टर बनाया गया था। लीली पुटियन जी का बायोडेटा देखते ही बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने एकमत से उनके नियुक्ति प्रस्ताव पर मुहर लगाई थी।
डॉक्टर पुटियन पिछले कई वर्ष से ओमान के एक कॉलेज में डीन थे लेकिन किसी न किसी वजह से उनके नाम का डंका यहां भी बजता ही रहता था। वो यहां की एल्यूमनाई के भी मेंबर थे और कई साल पहले भी एक बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शिरकत कर चुके थे।
उनका परिवार मूल रूप से भारत के केरल प्रांत के एक छोटे से गांव का था जहां से उनके पिता के विस्थापित होकर राजस्थान में अा बसने के कारण वो अपने बचपन से ही यहां  थे। उनके परिवार के विस्थापन को लेकर भी वर्षों पहले तक कई अजीबो – गरीब कहानियां गूंजती रही थीं।
लोगों का अनुमान था कि वो संभवतः कन्वर्टेड क्रिश्चियन थे जो बाद में देश छोड़ कर परदेस में जा बसे। कभी कहा जाता था कि उनके पिता किशोरावस्था में गांव में बकरियां चराया करते थे और इसी दौरान उनका वहां की एक अमीर घराने की लड़की से प्रेम हो गया। उस प्रतिष्ठित जमींदार खानदान को ये नागवार गुजरा कि उनकी शहजादी सी कन्या एक चरवाहे के चंगुल में फंस जाए। अतः भारी धमकियों के बीच कुछ पैसा देकर उनके परिवार को वहां से चलता कर दिया गया और वे लोग भटकते- छिपते यहां राजस्थान के एक सरहदी गांव में आ बसे।
यहां आकर उनकी शादी हुई । यहीं नन्हे बालक लीलाधरन का जन्म परिवार में दो बहनों के बाद हुआ और एक छोटी सी दुकान की नौकरी करते हुए उसके पिता ने तन- मन- धन से प्रयास करके उसे ख़ूब पढ़ाया। ग्रामीण विद्यालय में एकमात्र अध्यापक ने जब देखा कि इस छोटी सी बस्ती में दो लीलाधर हैं, तो उन्होंने बालक का नाम उसकी कद काठी को देखते हुए लिलिपुटियन लिख दिया। और सरकारी कागज़ों में हमेशा के लिए केरल का ये वाशिंदा लीलाधरन राजस्थान का लिलिपुटियन हो गया।
बालक पढ़ने में बचपन से तेज़ था। चार जमात के बाद थोड़ी अंग्रेज़ी सीखा तो अपने नाम के अपने उच्चारण के चलते लीली पुटियन हो गया। और इसी संस्थान में कभी टॉप करने के बाद आगे पढ़ने के लिए लंदन चला गया।
बाद में कई देशों में रहने के बाद एक नामी कॉलेज के डीन के पद तक पहुंचा।
लेकिन ये सब तो इतिहास था।
यहां तो अब सब कुछ बदल गया था और कई दशक बीत जाने के बाद तो कहीं कोई भी ऐसा नहीं था जो इस बारे में कुछ भी जानता हो।
इन नए डायरेक्टर साहब के कभी हिन्दुस्तानी होने की कोई निशानी कहीं मौजूद न थी। लोग जानते थे तो बस इतना कि अबकी बार डायरेक्टर साहब विदेश से आ रहे हैं। ओमान से।
न जाने कैसे होंगे, किस तरह बोलते होंगे। उनके परिवार में कौन होगा। उन्हें भारत कैसा लगेगा, आदि आदि।इन दिनों जबसे मीडिया में ये खबर उछली थी कि ये लोकप्रिय वैश्विक संस्थान अपनी स्वर्णजयंती अनूठे ढंग से मनाने जा रहा है तभी से इस संस्थान से जुड़ी एक खबर और लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई थी।
ये खबर यहां हर साल आयोजित होने वाले युवा समारोह के नाम को लेकर थी।
इस शानदार रंगारंग कार्यक्रम का नाम कई वर्षों से लोगों के आकर्षण का विषय बना हुआ था – “धुस कुटुस”।कोई नहीं जानता था कि इसका अर्थ क्या है, ये नाम क्यों रखा गया है। इस अजीबो गरीब नाम का संबंध इस सांस्कृतिक कार्यक्रम से कैसे और क्यों जुड़ा हुआ है। बस, ये नाम सालों से चला आ रहा था तो सब छात्र व अन्य लोग इसे स्वीकार कर के उत्साह से मनाते चले आ रहे थे।
एक और मज़ेदार बात यह थी कि इस नाम पर वर्षों से शोध, खोज, पड़ताल भी ख़ूब हो रही थी। यहां तक कि गूगल सर्च तक में इस नाम को खूब खोजा जाता था। लेकिन इसका कोई मतलब कहीं नहीं मिलता था।
विशेष बात ये थी कि इस बार गोल्डन जुबिली होने के कारण ये कार्यक्रम और भी बड़े पैमाने पर धूमधाम से मनाया जाना था। इसकी तैयारियां अभी से आरंभ हो गई थीं।
ये भी एक संयोग ही था कि इधर नए डायरेक्टर साहब को ओमान से आकर ज्वॉइन करना था और उसके एक पखवाड़े के भीतर ही ये समारोह आयोजित होना था।
कॉलेज की प्रबंध कार्यकारिणी में ये चर्चा आम थी कि क्या इस समारोह का ये नाम बदल दिया जाए?
विदेश से आने वाले डायरेक्टर के सामने पहला ही प्रभाव कैसा पड़ेगा जब धूमधाम से मनाए जाने वाले उत्सव के नाम का अर्थ ही उन्हें बताया नहीं जा सकेगा।
वे क्या समझेंगे? उन पर कैसा इंप्रेशन पड़ेगा! एक नामी शिक्षण संस्थान सालों साल एक ऐसे समारोह के आयोजन का बोझ ढो रहा है जिसका मतलब तक यहां कोई नहीं जानता। डायरेक्टर महोदय सभी को लकीर का फकीर समझेंगे। उनका पहला प्रभाव ही ग़लत पड़ेगा।
और अगर समारोह से पहले आयोजित होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया ने उनसे ही कार्यक्रम के नाम का मतलब पूछ लिया तो उन्हें कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी? सब लोग बगलें झांकने लगेंगे। इतने उच्च कोटि के इंस्टीट्यूट की जग- हंसाई होगी। गोल्डन जुबिली होने से सारा शहर इकट्ठा होगा। देश- विदेश में ये चर्चा जाएगी कि संस्थान किसी नाम का अर्थ जाने बिना उस पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है!
गहन चर्चा और विचार विमर्श के बाद ये तय किया गया कि संस्थान के इस वार्षिक यूथ फेस्टिवल का नाम बदल दिया जाए। नए नाम की तलाश ज़ोर- शोर से शुरू हो गई। लेकिन इसमें एक समस्या थी।
वर्षों से मनाए जा रहे धुस- कुटुस समारोह से संबंधित तमाम प्रचार सामग्री, पोस्टर्स, बैनर्स, स्टेशनरी आदि सभी इसी नाम से थे। कार्यक्रम का पंजीकृत लोगो भी इस नाम को प्रमुखता से दर्शाता था। ऐसे में सब कुछ जल्दी में बदल डालना झंझट भरा तो था ही, काफ़ी खर्चीला भी था।
अतः काफ़ी सोच विचार के बाद नाम बदलने की योजना ठंडे बस्ते में चली गई। समय कम था, बीत गया और नए डायरेक्टर साहब आ गए। गर्मजोशी से उनकी अगवानी की गई। एक विदेशी विद्वान को अपना नया मुखिया पाकर लोग गर्व से भर उठे। जल्दी ही संस्थान के स्वर्णजयंती समारोह की तैयारियां शुरू हो गईं। छात्र जहां अपनी गतिविधियों में डूब गए, प्रबंधन ने अपनी तैयारी शुरू कर दी।
भारी जोश और उत्साह के बीच नए डायरेक्टर साहब की पहल पर किसी बड़े नेता को भी उद्घाटन के लिए बुलाने की कवायद शुरू हो गई। तमाम अखबारों, टीवी चैनलों व अन्य मीडिया के लोगों को बुला कर एक भव्य प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गई जिसमें नए डायरेक्टर का विधिवत परिचय भी हुआ।
और अंततः वही हुआ, जिसका अंदेशा था।
देश के सबसे बड़े न्यूज़ चैनल के एक जुझारू पत्रकार ने डायरेक्टर साहब से ये तल्ख सवाल कर ही डाला कि संस्थान अपने गोल्डन जुबिली समारोह में जो कल्चरल प्रोग्राम करने जा रहा है उसके नाम का मतलब क्या है?
किस वजह से इस पर लाखों रुपए बहाए जा रहे हैं? क्या होता है धुस – कुटुस???
सारे में सुईपटक सन्नाटा छा गया। पिनड्रॉप साइलेंस!
सब बगलें झांकने लगे। सीनियर प्रोफेसर्स की सांस जहां की तहां रुक गई। सबको लगा, अब डायरेक्टर उनसे पूछेंगे। सब नज़रें चुराने लगे। इसी का डर था। अब नए डायरेक्टर के सामने तो किरकिरी होगी ही, सारे कॉलेज की जग- हंसाई अलग होगी। ये सारा बवाल कल तमाम अखबारों में आ जाएगा। किसी को कुछ न सूझा।
पत्रकार समुदाय और भी जोश में आ गया।
प्रश्न पूछने वाले पत्रकार महाशय नज़रें कुछ और  तिरछी करते हुए अपनी बात फ़िर से दोहराने के लिए उठने लगे।
किन्तु तभी एक हल्की सी ख़लिश के साथ मुस्कुराते हुए डायरेक्टर महोदय ने माइक अपने सामने थोड़ा नज़दीक खिसकाया।
उन्होंने किसी से कुछ न पूछा, सहज रूप से बोले- “जेंटलमैन, देयर इज़ ए वेरी इंटरेस्टिंग स्टोरी बिहाइंड इट…इस नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, मैं आपको बताता हूं।” कह कर डायरेक्टर मानो आधी सदी पुरानी किसी घटना में खो गए, बोले- आज से पचास साल पहले मैं भी इसी संस्थान का एक छात्र था। मैं दक्षिण भारत से आने के कारण हिंदी नहीं जानता था लेकिन मैं गाना बहुत अच्छा गाता था। मुझे फिल्मी गानों के बोल पूरे याद नहीं रहते थे पर मैं उनकी धुन पकड़ कर उन्हें गाता था और साथी लोग पसन्द भी ख़ूब करते थे। एक दिन मैं स्टेज पर गा रहा था, गीत के बोल थे – “आओ ट्विस्ट करें, ज़िन्दगी है यही… गा उठा मौसम!”
मैं बहुत जोश में गा रहा था और लड़के तालियां- सीटियां बजा रहे थे। पर मैं बीच में बोल भूल गया और मैंने गाया..आओ ट्विस्ट करें… ज़िन्दगी है यही… धुस- कुटुस मौसम…
प्रेस कांफ्रेंस का सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सब हैरान थे कि डायरेक्टर साहब हंसते- हंसते रोने लगे थे।

1 टिप्पणी

  1. कई पाठक मुझसे पूछ रहे हैं कि ये शब्द “धुस कुटुस” आपकी कल्पना में कैसे और कहां से आया? मैं आपको बताना चाहता हूं कि वास्तव में ये शब्द एक सत्य वास्तविक घटना पर ही आधारित है। पिछली सदी के सातवें दशक में हम सब मित्र मिल कर फिल्मी गानों का कार्यक्रम “बिनाका गीत माला” सुना करते थे। मित्रों के बीच उस समय नए नए आए इस गीत “आओ ट्विस्ट करें, ज़िन्दगी है यही” पर चर्चा हो रही थी। मेरे मित्र को इसके बोल तो पूरी तरह याद नहीं थे,पर वो इस गीत को इन्हीं शब्दों के साथ गा रहा था। बाद में सही शब्द (गा उठा) पता चलने के बाद उस मित्र का ख़ूब मज़ाक उड़ाया गया और लड़कों ने उसका नाम ही इन शब्दों पर रख दिया। आज भी सत्तर वर्षीय वो मित्र अपने दोस्तों के बीच इसी नाम से पहचाना जाता है। मेरी ये कहानी लड़कपन की मीठी यादों को एक श्रद्धांजलि भी है। गया वक़्त तो हम पकड़ नहीं पाते, किंतु उन्हें यादों की सीप का मोती बना कर तो रख ही सकते हैं। शुभकामनाएं और बधाई मेरे पाठकों को…

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