दिल्ली जैसा ‘बड़ा शहर’ और उसकी भीड़-भाड़ से भरी, साँसों को मोहताज़ ‘तंग गलियाँ’, पर यहाँ तो बड़े-बड़े चौराहे भी ऑक्सीजन को तरस रहें है, ट्रैफिक जाम होना आम बात है। किसी को फर्क पड़े न पड़े लेकिन रंगबिरंगी महंगी गाड़ियों से गुलजार, हाय रे  ये हताश चौराहें ! काला धुँआ उगलती गाड़ियों को ये कितनी ही दफ़े लाल आंखे दिखाएँ, थम जाओ, लेकिन जमीन से मात्र दो-चार इंच ऊँचे ये धृष्ट कदम, हवा से बातें करने की आतुरता में सबको कुचलते आगे बढ़ते चले जातें हैं| सिग्नल के ‘लाल रंग’ की आभा, ख़ासकर तपती दोपहर में अपने पूरे जोश के साथ सभी के मन-मस्तिष्क को अपने रंग में रंग लेती है तब कोई छू भर तो जाए ज़नाब, आंखे चार हुई नहीं कि आंखें लाल होते देर नहीं लगती, सूरज फिर प्रकाश देता है ये लाल आँखे अंगारे उगलने लगती है| हरा रंग!! आसान नहीं है, हरियाली तो स्याह कर दी, फिर भला बत्ती हरे होने कि उम्मीद भी कैसे कर लेतें हैं| रंग तो वैसे भी चंद मुट्ठी भर लोगों की कैद में छटपटाह रहें हैं| दिल्ली का ऐसा ही एक भीड़ भरा चौराहा जिसके किनारे एक साइकिल-स्कूटर पंचर वाले की दूकान,या उससे मिलती जुलती संकल्पना क्योंकि वो दुकान की परिभाषा के दायरे में नहीं आती..
खैर, उसकी दूकान लाल बत्ती से कोई एक-डेढ़ किलोमीटर पहले थी, लड़का-सा दिखने वाला दूकानदार? जिसे कभी हंसी-ठिठोली करते या गाड़ियों के भीतर झाँकते हुए नहीं देखा, न ही मोबाइल में आँख गड़ाए और ना ही कभी दुकान ताश बाजी का अड्डा बनती नजर आई | हाँ, कभी-कभी एक सात-आठ साल का छोटा बच्चा नीली वर्दी में बैठा रहता, दोनों चुपचाप कुछ ना कुछ कर अपने को व्यस्त-से दिखाते, खोये हुए से| बगल में पेड़ पर टायर लटके थे जिस पर ‘लाल’ चुन्नी शायद किसी देवी माता की, बाँधी हुई थी,मानो आस्था का यही ‘लाल रंग’ उसकी जिन्दगी की गाड़ी आगे बढ़ा रहा था| लाल बत्ती पर अक्सर कोई हवा भरवाने,पंचर लगवाने,छोटे मोटे काम के लिए रुक ही जाता,पानी देख जैसे प्यास लग जाती है,लाल बत्ती देख मानो  टायर पर बंधी लालचुन्नी उन लोगों को इशारे से बुला लेती है|  
लाल बत्ती आज हर शहर की समस्या से ज्यादा आदत बन चुकी है जिसे हम बस निभाते चले जा रहे हैं और इस थमी हुई लाल बत्ती के तले खड़े ये चौराहें, गाड़ियों से रिसने वाले काले धुँए को सोखने के लिए अभिशप्त हैं| पर इसी धुँए में अपना ‘ऑक्सीजन’ स्वयं निर्मित करने वाला वो लड़का-सा दिखने वाला दुकानदार अपना काम में लीन रहता| लाल बत्ती की लालिमा आज कुछ ज्यादा ही प्रकोप दिखा रही थी, लगातार बजते हॉर्न के बीच भी बहस-बाज़ी की तेज़ आवाज़े कानों में पड़ रही थी | ऑटो से झांका तो पाया कि दो  लोग उस लड़के से बहस कर रहे हैं, न मालूम किस बात पर बहस चल रही है, दो बार लाइट हो चुकी थी और “ये लो तीसरी भी हो गई…” गाड़ी कुछ कदम ही आगे खिसक पाई थी|
कुछ-कुछ समझ में आया स्कूटर पर ‘विराजमान’ जो सम्भवतः अपना काम करवा चुके थे उसे 10 रूपये  देना चाहते हैं जबकि उसके अनुसार टायर फट गया था “तीन जगह पंचर लगे हैं 30 रूपये लगेंगें|” एक हाथ से ‘गद्दी थामे’ पर गद्दी पर से लगभग उछलता हुआ वह चिल्लाकर बोला “सड़क किनारे तुम कमीने लोग खुद जानबूझ कर कींले फेंक देते हो ताकि हम जैसों के पंचर हो और तुम्हारी कमाई हो” वह दृढ़ता से बोला “एक तो आप गाली देकर बात न करो… यह 10 रूपये  भी ले जाइए पर बेईमानी का इल्जाम मत लगाओ” उसके शब्द प्रयोग चौंकाने वाले थे, इतने में लाल बत्ती खुल गई वो 10 रुपये फेंक तेज़ी से पलायन कर गये|पर आस्था को ठेस लगी और लालचुन्नी ने मानो लाल बत्ती को इशारा किया और ये चौथी बार लाल बत्ती,उफ़्फ़ !! तभी “सुनो भाईसाहब” की आवाज़ लगाता वह दौड़ा भागा आ रहा है, शायद 10 रूपये वापस करने या अपने अधिकार के पैसे मांगने, “अरे भाई साहब देख तो लीजिए” स्कूटर वाला विवशता छिपाते हुए, बाजू ऊपर करता हुआ उतरा, बत्ती की भीड़ ने घिरा था इसलिए सुनकर भी अनसुना न कर सका… “अपना हेलमेट तो लेते जाइए आगे मामू पकड़ लेंगे तो 500 रूपये मांग लेंगे उनसे तो आप बहस भी नहीं कर पायेंगे” आगे वाले ने तो हेलमेट लगाया हुआ था  अपने सर पर हल्के से हाथ रखते हुए दबी आवाज़ में बोला “अरे बाप रे…”  कहते हुए हेलमेट लगभग छीन लिया पर समझ नहीं आ रहा था इसको धन्यवाद कहूं या क्या कहूं , जेब से 50 रुपये निकाल कर लड़के को दे दिए तो लड़के ने भी पलट कर तुरंत 20 रूपये उसके हाथ में थमा दिए| और वापस लौट गया| ‘कार्बन’ के बीच जाने क्यों ‘ऑक्सीजन’ का-सा सुकून हुआ| ऑटो वाला हँसने लगा “मैडम यही वे लोग है जिनकी ईमानदारी पर यह दुनिया चल रही है,और उन्हें देखो दो पहिया स्कूटर पर हवा में उड़तें हैं जमीन को कुछ समझते ही नहीं”
सहायक आचार्य हिंदी विभाग कालिंदी महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क - rakshageeta14@gmail.com

5 टिप्पणी

  1. रक्षा जी, मैं खुद दिल्ली में रहा हु, आपकी कहानी बहुत ही सच्ची और दिल को छू लेने वाली है। मानो आपने वो तस्वीर मेरी आँखों के सामने से गुजार दी जो में कभी शब्दों में बयां नही कर पाया। thanks

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