आज वह थोड़ी देर से पहुंचा था , तब तक समारोह-हाल में हलचल बढ़ गई थी । समारोह के चीफ गेस्ट डी.एम. साहब आ चुके थे । जब वह भीतर जाने की कोशिश करने लगा तो कुछ लोगों ने उसे प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया । सोचा होगा इस समारोह में वेशभूषा और व्यक्तित्व से अनपढ़ सा लगने वाला यह आदमी अन्दर जाने की कोशिश क्यों कर रहा है ? उस वक्त उसे रोके जाने का कारण उसकी अति साधारण वेशभूषा और व्यक्तित्व ही हो शायद !
सर मैंने भी पुरस्कार हेतु ग्रामीण पत्रकारिता का अपना बायो डाटा भेजा था । आयोजन समिति की ओर से मुझे कल ही शाम को व्हाट्सएप से खबर मिली । मुझे भी पत्रकारिता हेतु इस सम्मान समारोह में सम्मानित करने के लिए बुलाया गया है सर ! मेसेज दिखाते हुए वह थोड़ा कातर हो उठा । मेरा घर 50 किलोमीटर दूर है , मेरी बस लेट हो गई ,इसलिए देर हुई … प्लीज मुझे अन्दर जाने दें ।”– कहते कहते एक संकोच का भाव उसके चेहरे पर तारी हो गया ।
क्या?”
जी सर !
“…………..”
थोड़ा पहले निकलते, तुमको समय पर तो कम से कम आना ही चाहिए न !और ये तुमने कपड़े किस तरह के पहन रखे हैं ? लोग देखेंगे तो आखिर हमारी क्या साख रह जाएगी ?”-शूट टाई पहने सामने खड़े जेंटलमैन के चेहरे पर एक निःशब्द और संवेदनहीन हाव-भाव पसरा हुआ था । उसके बावजूद उसे लगा कि उसने उससे कुछ कहा है । कई बार बिना कहे भी कुछ चीजें हाव-भाव से व्यक्त होती हैं । अगर सामने वाला एक विचित्र मनः स्थिति में हो तो हाव-भाव के स्वर भी उसे सुनाई देने लगते हैं । उसके साथ आज यही हुआ था । यह कैसा सम्मान समारोह था कि एक विचित्र किस्म के अनुशासन का डंडा भी यहां चलाया जा रहा था गोया आप तभी सम्मानित हो सकेंगे जब यहां की शर्तों के अनुरूप अपने आप को ढाल लेंगे। रोकटोक के बाद जब किसी तरह  वह भीतर पहुंचा तो हाल की कुर्सियां लगभग भरी हुई थीं ।
उसे याद आया ….जब वह चला था तो पत्नी ने कहा था – “जरा आराम से जाना । जल्दबादी करने से इधर-उधर होने की स्थितियाँ-परिस्थितियाँ बनने लग जाती हैं , और फिर आपके बैठने की व्यवस्था तो सामने की ओर होगी ही । सम्मान के लिए बुलाया गया है तो आपके लिए बैठने की जगह भी आरक्षित की गयी होगी | वहां आराम से जाकर निश्चिंत बैठ जाइएगा
पत्नी का भोला चेहरा उसकी आँखों के सामने अचानक घूम गया । सच को सच और झूठ को झूठ मानने वाली एक साधारण ग्रामीण स्त्री की समझ ऐसी ही होती है ।उसकी बातों में आकर उसने  भी कुछ ऐसा ही समझ लिया था । वह दुनियाँ की चालबाजियों और गुणा भाग से परे थी । उसका ऐसा सोचना गलत भी तो नहीं था।नैतिकता का तकाजा तो यही है कि जिसे आप सम्मान के लिए बुला रहे हैं उसका ध्यान रखें ।काश उसकी सोच के अनुसार ऐसा कुछ होता तो कितना अच्छा होता पर ऐसा कुछ भी होता हुआ यहां नहीं दिख रहा था उसे। पीछे एक खाली कुर्सी दिखी तो वह लपककर यूं बैठ गया जैसे कोई बच्चा दौड़कर बैठ जाता है । बैठते ही बगल में बैठा आदमी जो शक्लो-सूरत से थोड़ा शहरी और प्रबुद्ध लग रहा था घूरकर उसे देखने लगा। उसके देखने में एक हिकारत का भाव था पर उसे उस वक्त सिवाय एक अदद खाली कुर्सी के कुछ भी नजर नहीं आ रहा था | बगल वाले आदमी की हिकारत भरी नजरों को भी वह भूल गया | मुश्किल से पीछे मिली उस खाली कुर्सी पर जब वह बैठ गया तो उसे थोड़ी शांति मिली । यहां पहुंचने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी आज उसे । साईकिल से बस स्टैंड आया । बस भी लेट से मिली । सीजन की भीड़ इतनी कि बस में धक्के खाते, खड़े-खड़े डेढ़ घण्टे सफर में रहा।शहर पहुंचा तो ऑटो वालों ने रूला दिया । पॉलीटेकनिक ऑटोडोरियम तक का किराया एक सौ पचास से एक रूपये कम नहीं । वह वैसे भी लेट हो चुका था । मरता क्या न करता , डेढ़ सौ किराया देकर उसने जान छुड़ाई । कुर्सी पर बैठे बैठे जिस शान्ति को मन में वह महसूस कर रहा था वह भी जीवन में कहाँ ठहरती है ज्यादा देर ! वह बैठे-बैठे समारोह हाल की घटनाओं को देखने-परखने लगा | दृश्य जितना मन को शुकून देते हैं कई बार उतना ही कष्ट पहुंचाते हैं | उसके मन की बेचैनी धीरे धीरे बढ़ने लगी थी , जो शान्ति कुछ देर पहले मन में उठी थी वह एकाएक अब दूर जा रही थी
पापा आदमी पढ़ाई लिखाई क्यों करता है ?” उसकी १२ साल की बेटी ने एक बार यह सवाल किया था उससे | उन सवालों में वह फिर आज बैठे बैठे उलझने लगा था
वह क्या जवाब देता ? कहता कि नौकरी मिलती है पढ़ने-लिखने से तो वह फिर सवाल करती कि आपको फिर क्यों नहीं मिली? इसलिए उसने इतना भर कहा था कि पढ़ने-लिखने से आदमी की समझ बनती है । वह संवेदनशील बनता है | यह समझ ही जीवन में आजीविका तलाशने के काम भी आती है | आदमी दूसरों के काम भी आ सकता है पढ़ने-लिखने से ! मुझे ही देखो … पढ़-लिख कर आज मैं कुछ अखबारों के लिए न्यूज़ एजेंसी का काम करता हूँ | ग्रामीण क्षेत्रों में अखबार पहुंचाने से कुछ पैसे मिल जाते हैं, जिससे घर का खर्चा भी निकल आता है | कई ग्रामीणों कि समस्याएं जो सरकार और प्रशासन तक नहीं पहुंचती उन्हें अखबारों के माध्यम से मैं प्रशासन तक पहुँचाने का काम भी कर लेता हूँ , इससे ग्रामीणों का भला भी होता है और एक मनुष्य के रूप में उनके बीच मेरी विश्वसनीयता भी स्थापित होने लगती है । वे मेरा सम्मान भी करते हैं । इससे ज्यादा शिक्षा से और हम क्या उम्मीद कर सकते हैं।
यह सब तो ठीक है पापा ! पर इस पढ़ाई-लिखाई का क्या फायदा कि उससे हमें ढंग के एक जोडी कपड़े भी नसीब न हों !” — बेटी ने उसकी दुखती रग पर जैसे हाथ रख दिया था
वह हमेशा कहती मैं पढ़-लिख कर डीएम साहब जैसा ही कुछ बनूंगी !
इस छोटी उम्र में आखिर एक डीएम के बारे में वह क्या जानती-समझती है ? यही कि उसके पास एक आतंक पैदा करने वाला रूतबा और इधर उधर से कमाया हुआ अनाप-शनाप धन होता है | उनके बाकी के काले कारनामे जो इस तंत्र की स्वीकार्यता का लबादा ओढ़ चुके हैं , उसे उनके बारे में कहाँ पता है ।इस चमक-दमक के पीछे की काली कहानियाँ जो इस देश में आम हो चली हैं उसे आखिर कौन समझाएगा ? उसे किसने कहा होगा ऐसा बनने और कहने के लिए
वह समझते हुए भी समझ नहीं पाता है। शायद स्कूल के अध्यापकों ने ही सिखाया होगा ऐसा कहने को उसे | यह स्कूलों में एक फेशन सा हो गया है आजकल , जब भी बाहर से कोई अधिकारी आता है तो सबसे पहले बच्चों से उसका यही सवाल रहता है कि बच्चों तुम आगे क्या बनोगे ? जवाब भी रेडीमेड तैयार रहता है कि हमें तो बस कलेक्टर ही बनना है | यह सब तो ठीक है पर उसे लगता है कि एक अच्छे इंसान बनने या न बनने के सवाल अब स्कूलों में बच्चों के मन से गायब कर दिए गए हैं | उनकी जगह इन गैरजरूरी सवालों ने ले लिया है । स्कूल के टीचर भी आजकल कितने आक्रान्त होते हैं इन पद और रूतबा धारियों को देख कर ! सच बात तो यह है कि उनके मन की कुंठा और हीनताबोध ही उन्हें अपने बच्चों के मन में ऐसे सपने जगाने का उपक्रम रचते हैं
डीएम जैसे उसी रूतबे के आतंक से समूचा हाल किस तरह आतंकित है , आज वह उसका साक्षी बन रहा है | समूचा दृश्य उसकी आँखों की पुतलियों पर एक अँधेरे की परत की  तरह चढ़ने लगा है | नाम तो पत्रकारिता सम्मान समारोह है पर सारे सम्मानकर्मी हाल के इधर उधर किसी कोने में उसकी तरह ही दुबके हुए हैं । अब तक उनकी कहीं चर्चा तक नहीं हो रही । सबसे पहले सम्मान के हकदार तो वे सभी हैं पर वे उपेक्षित और अदृश्य हैं और कार्यक्रम का आरम्भ आये हुए वी.आई.पी अतिथियों के मेराथन सम्मान से हो चला है | मंच पर चमचमाते सोफे पर बैठे चारों अतिथि फूलों से लादे जा रहे हैं | हार पहनाने के सुख से आयोजन समिति के हर सदस्य के चेहरे पर हतप्रभ कर देने वाला वह खुशी का भाव है मानों उसे पहले कभी न देखा गया हो ! इतने पढ़े लिखे वी.आई. पी. लोग चाहें तो समाज को यह संदेश दे ही सकते हैं कि सम्मान करने की भी एक मर्यादित सीमा हो , चीजों की अति भी लोगों के मन में विकार पैदा करने लगती है । पर वे ऐसा कुछ भी संदेश देना क्यों नहीं चाहते ? कहीं उसके पीछे की भावना यह तो नहीं है कि ऐसा संदेश उनके रूतबे की ऊँचाई को छोटा कर सकता है । 
उसके मन में इस तरह के सवाल-जवाब बैठे-बैठे उठते रहे हैं । बैठे-बैठे ही एक सामान्य सी गिनती उसके भीतर चल रही है कि हरेक अतिथि को अब तक कितने बुके और कितनी फूल मालाएं चढ़ायी जा चुकी हैं ? यह संख्या बीस के उस पार जा चुकी है , याने इन मंचस्थ अतिथियों को हार पहनाने वालों की संख्या अब तक लगभग अस्सी के पार जा चुकी है | इस दरमियान एंकर के मुख से पढ़े जाने वाले गैरजरूरी कसीदों की बाढ़ भी हाल के भीतर बह उठी है जिसकी चपेट में उस जैसे शब्द सेवक आ गए हैं | इस जिले के अति संवेदनशील,कर्मठ और युवा  डीएम, जन जन के दिलों में बसने वाले लोकप्रिय डीएम , इस जिले के कर्णधार  और शासन की लोकप्रिय योजनाओं का लाभ आमजन तक पहुंचाने वाले करूणामयी डीएम ……और भी न जाने कितने विशेषणों की झड़ी लगा देने वाले एंकर महोदय की स्वर लहरियां उसके कानों को बेध रही हैं । वह सोचने लगा है कि बोलने वाले के शब्दों और कथनों में एक मर्यादा, संतुलन और विश्वनीयता न हो तो वे कानों को कितना चुभते हैं | शब्दों के पुनरूक्ति दोष और शब्दों के बेजा प्रयोग आज इन मंचों की शोभा बन गए हैं | इतने वर्षों की पत्रकारिता करते हुए  उसने देखा है कि सड़कें आज किस जर्जर हालत में हैं । लोगों को समय पर न रसोई गैस मिल रही न केरोसिन मिल रहा । मनरेगा मजदूरों की हालत कितनी खस्ता है ।सरकारी स्कूलों की हालत कितनी खराब है….इन सबका जिम्मेदार जिले का डीएम ही तो होता है । वह कर्मठ और ईमानदार हो तो सब सुधर जाए…. पर वह भला ऐसा क्यों करेगा । उसे तो लोगों के लिए नहीं बल्कि तंत्र के लिए काम करना है । उसके राजनैतिक आकाओं को खुश करना है ।
फिर भी डीएम के सम्मान में इस तरह की लफ्फाजी और इस तरह का झूठ …….?
इसी बीच उसकी नजर घड़ी पर गई है । पाँच बजने में बस घण्टे भर रह गए हैं । अतिथि सम्मान का मैराथन सिलसिला जो डेढ़ घण्टे से चल ही रहा था अब जाकर कहीं थमा है । घर को जाने वाली उसकी अंतिम 
बस पांच बजे है । उसे यह चिंता अब सताने लगी है कि कहीं उसकी बस छूट न जाए । घर में पत्नी भी बीमार है , उसे आज डॉक्टर के पास ले जाना था पर घर के जरूरी कामों को स्थगित करते हुए वह यहां इसलिए आ गया है कि इतने सालों की पत्रकारिता के लिए उसे सम्मानित किया जाएगा। घर से जब वह चला था तो मन में कई इच्छाएं लिए चला था कि सबके बीच इतने सालों के अनुभव को वह साझा करेगा । उसकी बातें बड़े लोगों के बीच गौर से सुनी जाएंगी । पर अब इतना कम समय रह गया है कि ऐसी कोई संभावना बची नहीं रह गई है ।अभी तो बचे हुए समय में अतिथियों के भाषण भी उसे सुनने होंगे । अंतिम बचे हुए दस मिनट में उस जैसे अकिंचनों के सम्मान की औपचारिकता निभाई जाएगी । यह समय की नियति है कि लोगों का उपयोग अब टूल्स की तरह होने लगा है । आज उसका भी एक टूल्स की तरह आयोजन समिति ने उपयोग किया है । उन जैसों को सीढ़ी बनाकर चीजों को कैसे साधा जा रहा है उसे शिद्दत से उसने महसूस किया है । मानसिक थकान इतनी बढ़ गई है कि उसकी रूचि अब अपने सम्मान के बजाय घर लौटने पर केंद्रित हो गई है। 
बहनों और भाईयों पत्रकारिता पुरस्कार समारोह एक उत्कृष्ठ आयोजन है ।इसके लिए आयोजकों को मैं कोटि कोटि बधाई देता हूँ । मैं वादा करता हूँ कि इस जिले को प्रदेश में पहले स्थान पर लाकर इसे स्वर्ग जैसा रूप दूँगा । बस आपका सहयोग मुझे चाहिए ।”— डीएम के जलेबीदार शब्दों से भरा वक्तब्य सुनते सुनते उसके कान अब पक गए हैं । इसी बीच वह आखरी घड़ी भी आ गई है । सबसे अंत में सम्मान पाने वालों के नाम घोषित होने लगे हैं ,बार-बार यह हिदायत दी जा रही है कि जल्दी-जल्दी मंच पर आइए और अपने पुरस्कार ग्रहण कीजिए ।हमारे अतिथियों को जल्दी लौटना भी है । यह बात इस तरह कही जा रही है जैसे समय की किसी देरी के लिए ये सम्मानित होने वाले बेचारे अकिंचन ही दोषी होंगे। उसके नाम की भी घोषणा हो रही है । मूलचंद बंजारे जल्दी आइए ,अपना पुरस्कार ग्रहण कीजिए । वह उठ रहा है , उठकर अब रोबोट की तरह चलने भी लगा है । चलते हुए उसके चेहरे पर कोई उत्साह नहीं है ।बगल में बैठा व्यक्ति जो दो घण्टे पूर्व उसे हिकारत के भाव से देख रहा था अब उसे अचरज से देख रहा है । यह अचरज उसके सम्मान पाने को लेकर है या उसकी वेशभूषा और व्यक्तित्व को लेकर है कहा नहीं जा सकता। 
वह मंच पर पहुंच गया है ।अब डी.एम. के हाथों पुरस्कार ले रहा है । इस दृश्य के भी फोटो उतारे जा रहे हैं ।कल अखबारों में इस फोटो को इस तरह परोसा जाएगा जैसे मूलचंद बंजारे ही इस समारोह का केंद्रीय पात्र रहा है । 
एक प्रमाण पत्र और बन्द लिफाफे में कुछ नगदी के साथ अब वह मंच से उतरने लगा है । मंच पर चढ़ने और उतरने में सिर्फ दो मिनट का समय दिया गया है उसे । उसके हिस्से में बस इतना ही था….एक प्रमाण पत्र ,कुछ नगदी जो मुश्किल से आने -जाने के खर्च के बराबर ही होगा और सिर्फ दो मिनट का समय !  उसकी अपनी अभिव्यक्ति जिसकी लालसा में वह खासकर यहां आया हुआ था वह व्यवस्था द्वारा सुनियोजित रूप में एक प्रमाण पत्र और कुछ नकदी के जरिए अधिक्रमित कर ली गयी है। उसके इतने वर्षों का अनुभव है कि हर साधारण आदमी की अभिव्यक्ति एक सुंदर आवरण के खोल से षडयंत्र पूर्वक ढँकी जा रही है। यह ऐसा अतिक्रमण है जो दुनियाँ को नजर ही नहीँ आता । आज उसने इसे अपनी नंगी आंखों से देखा है । इन दृश्यों के भयावह चित्र उसकी आँखों की पुतलियों पर ऊतर आए हैं।
वह अपनी कलाई पर टंगी हाथ घड़ी को देख रहा है जो स्कूल के दिनों में उसे वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर पुरस्कार के रूप में मिली थी । इस घड़ी को देखता है तो उसे आज भी कितना शुकून मिलता है । उसकी अभिव्यक्ति के जिंदा होने को इस घड़ी की सुईयाँ आज भी प्रमाणित करती नजर आती हैं ।
इसी घड़ी पर अब उसकी नजर है । इसमें अब शाम के पांच बजकर 15 मिनट हो चुके हैं। बहुत देर हो चुकी अब । उसकी आखरी बस निश्चित ही अब जा चुकी होगी । उसके चेहरे पर घर लौटने की चिंता की रेखाएं साफ-साफ दिख रही हैं । इस चिंता में समारोह हाल के भीतर पसरी भीड़ का कोई आदमी शामिल नहीं है । वे सब खाने पीने में मशगूल हैं । वहाँ बस एक शोर है और इस शोर में सम्मान समारोह के सफलतापूर्वक निपट जाने के चर्चे ठहाकों के रूप में हाल के भीतर गूंज रहे हैं । 

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