रहीमा बेग़म का आंगन काफ़ी कुशादा था। आँगन के दाएं हिस्से में सुर्ख़ गुलाबों की क्यारियां लगी थीं ,जिनमें 2,4 कच्चे पक्के गुलाब ख़ुशी से झूम रहे थे। दायीं तऱफ मेहंदी के झाड़ और अमरूद का दरख़्त था। बुन्दू बावर्ची ने चारों तरफ नज़रे दौड़ायी , क़ायदे से जायज़ा लेने के बाद मेहंदी के सायेदार हिस्से की जानिब देगें चढ़वाने के इंतजाम में मसरूफ़ हो गए।

बुन्दू से कुछ ही फ़ासलों पर 2 लड़कियां मसाले पीसती जा रही थीं और बुन्दू के बेतहाशा निकले तोंद पर फब्तियां कसते हुए हंसती जा रही थीं। बुन्दू मियां लड़कियों की चुहलबाज़ी सुनते जाते और मुस्कुरा मुस्कुरा कर उन्हें और उकसाते जाते। गाहे बगाहे टीन शेड में बैठी झब्बन बुआ पे निगाह जाती तो फौरन चुस्ती दिखाते , रोटी बनाने वाली लड़कियों पे तेज़ आवाज़ लगा बैठते। और कोई वक़्त होता तो बुन्दू मियां की खामख़्वाह की दिल्लगी को मिनटों में दुरुस्त कर, झब्बन बुआ बाज़ की सख़्त नज़र रखतीं। पूरा गाँव जानता था बुन्दू मियां पलक झपकते, गर्म मसाले और अच्छी बोटियों को गायब कर देने का हुनर रखते थे। उनकी इस हाथ की सफ़ाई से वाकिफ़ होते हुए भी झब्बन आपा चुपचाप अफ़सुर्दा सी पानदान खोले कुछ रखती उठाती जा रही थीं।

इधर रोटी बेल रही लड़कियां हंसने हंसाने का एहतमाम जारी रखे हुए थीं। आते जाते लड़कों को देख कर कुछ इस दिलफ़रेब अंदाज़ में चहक कर हँसती कि लड़के दिल पर जब्र करके, झब्बन आपा की मौजूदगी का लिहाज करके आगे बढ़ जाते। ये हँसी ठिठोली मौजमस्ती झब्बन बुआ को नागवार गुज़र रही थी, मगर वो बिल्कुल ख़ामोश थीं।

रहीमा बेग़म ने उनका दिल तोड़ दिया था, नयी नयी कल की आयी बहू की तरफ़दारी में,झब्बन बुआ को नज़रअंदाज़ किया गया । 10दिन, सिर्फ़ 10 दिन पहले आयी दुल्हन अज़ीज़ हो गयी, रहीमा को बेटा अज़ीज़ हो गया,ये बदक़िस्मत बुआ ग़ैर हो गयी। वो बेवकूफ़ लड़की, जिसे बोलने की तमीज़ नहीं, दुल्हनापे वाले शऊर नहीं, उसके लिए रहीमा ने मेरी ज़बान काटी,बुआ की बात रद की गयी वो भी दुल्हन के सामने।

झब्बन बुआ के दिल मे नयी दुल्हन के लिए ज़हर भर चुका था।

“नबील ओ नबील” रहीमा बेग़म ने आवाज़ लगायी।

नबील मियां चेहरे पे ज़माने की बेचारगी सजाकर अम्मी के रूबरू खड़े हो गए।

“जी,अम्मी”

“फ़ोन करके पता तो कर लो,कितने लोग आ रहे हैं।ग़ज़ब के तुम्हारे ससुराल वाले हैं, अल्लाह जाने क्या मसला है सही से बताते नहीं,अभी अचानक से तयशुदा लोगो से ज़्यादा लोग आ गए तो मुश्किल हो जाएगी न,एक काम करो, दुल्हन के मामू से बात कर लो, संजीदा लगते हैं, अभी अंदाज़ा लग जायेगा मेहमानों का।”

“जी,पता करता हूं।”

“और सुनो नबील” आवाज़ दबाते हुए रहीमा बेग़म फुसफुसाईं,”अपनी दुल्हन को एक दफ़ा फ़िर से समझा देना,भरा पूरा घर है,तमाशा बनवाने से फ़ायदा नहीं है, हफ़्ते बाद वापस ले आना।ज़रा क़ायदे से समझाना, और यूँ मुँह लटका के मत चलो,वो अब पूरी ज़िंदगी तुम्हारे साथ ही रहेगी।”आख़िरी जुमला कहते कहते रहीमा बेग़म ख़ुद ही हंस दीं, बेटे बहु की नादान मुहब्बतें, चेहरे पे मुस्कुराहट ले आयीं।

नबील 10 दिन पुराना, कमसिन सा दूल्हा था, मगर 10 दिनों बाद भी चेहरे से गुलाबी माइल सुर्खी ख़त्म न हुई थी।साफ़ ज़ाहिर हो रहा था, रात भर रोये हैं नबील मियां। 10 दिनों में ऐसी दीवानगी ऐसी मुहब्बत हुई राहिला से, कि दोनों दीन दुनिया से बेख़बर, एक मिनट भी नहीं छोड़ना  चाहते थे एक दूसरे को।नबील फिर भी शर्मीला और कमहिम्मती टाइप लड़का था,मगर इसके बरअक्स राहिला तेज़ तर्रार,ख़ूब हंसने बोलने वाली लड़की थी।

आज राहिला को उसके घर वाले लेने आ रहे थे,राहिला किसी क़ीमत अपने घर जाने को तैयार न थी। रात ही उसने साफ़ इनकार कर दिया था,सुबह झब्बन बुआ और रहीमा बेग़म के सामने साफ़ अल्फ़ाज़ में कह दिया,”मैं नबील को छोड़कर नहीं जाऊंगी, मेरा दिल नहीं कर रहा जाने को।इतने दिन तो रही हूँ, अम्मी और भाभी के साथ।अभी नहीं जाऊंगी, अभी नबील के साथ रहूंगी।”

नयी दुल्हन का साफ़ इनकार, और वो भी बेशर्मी के साथ।झब्बन बुआ के पावँ में लगी तो सर पर रुकी।नबील और रहीमा बेग़म के सामने ही झब्बन बुआ ने ख़ूब बातें सुनायीं।

मर्द के लिए दीवानी ये लड़की उनका ख़ून खौलाए दे रही थी।

अरे,ये क्या बात हुई?चलो माना आपस मे मुहब्बत है,तो ये तो फ़ितरी सी बात है।मगर इस तरह से ढिठाई से मुँह खोलकर, कौन दुल्हन मायके जाने से इनकार करती है? दिल की बात दिल में रखी जाती है, यूँ ज़ाहिर करके अपनी बेइज़्ज़ती कौन करवाता है?

रहीमा बेगम को बुरा लगा था, झब्बन बुआ का नयी दुल्हन को इस तरह से डांटना। कुछ भी हो ,नबील की मुहब्बत है वो, नबील भी तो उसके जाने का सुनकर उदास है।और इसमें हर्ज क्या है अगर राहिला ने अपने दिल की बात कह दी। दिल में रखना गुनाह नहीं, ज़बाँ पे लाना गुनाह हो गया?

उधर नबील अपने कमरे में,दुल्हन को गले से लगाये, उसके बालों को सहलाता जा रहा था,हफ़्ते 10 दिनों की जुदाई का तसव्वुर ख़ुद नबील को मारे डाल रहा था।

राहिला ने नबील की उंगलियों को चूमकर कहा,”क्या तुम नहीं चाहते मैं रूक जाऊँ? जाने के ख़याल से मेरा दिल टूट रहा है, क्या तुम्हारे दिल में कुछ नहीं हो रहा ?

“राहिला, मेरी जान! देखो, मान जाओ न,मुझे ख़बर है, तुम मुझे टूट कर चाहती हो,तुम्हारी बेतहाशा मुहब्बत ने मुझे दीवाना बना लिया है।

लेकिन,यूँ हमारे जज़्बों को सरेआम मत करो राहिला, दिल की बातें दिल मे छुपा कर रखते हैं ,यूँ सबको बताते नहीं हैं।

वादा करता हूं, हफ़्ते 10 दिन के अंदर तुम्हे वापस ले आऊंगा।यक़ीन रखो।”

“नबील दरवाज़ा खोलो, मेहमान आ गए हैं। बाहर आओ बेटा।” रहीमा बेग़म की आवाज़ आयी। नबील चुपचाप बाहर आ गया। ख़ुशनुमा माहौल में, मेहमानों को नाश्ता, खाना करवाया गया। राहिला चुपचाप उदासी के बादल चेहरे पे सजाए, मायके रुख़सत हो गयी।

अच्छा वक्त भी कम्बख़्त बेवा की जवानी जैसा होता है, इधर देखा, उधर पलक झपकते ग़ायब। नबील और राहिला की दीवानावार और तूफ़ानीख़ेज़ मुहब्बत को 3 महीने भी न हुए, दुबई से नबील के लिए वीज़ा आ गया।

सुकूँबख्श काम और अच्छी तनख़ाह का ऑफ़र,नबील, झब्बन बुआ और रहीमा बेग़म ख़ुशी से भर उठे। नबील जाने की तैयारी करने लगा, बहुत सारे काम थे, जो कम वक़्त में पूरे करने थे।

राहिला गुमसुम सी चुपचाप सारी कारगर्दगी देखा करती,और रात में नबील के सीने में चेहरा छुपाए बेआवाज़ आंसू बहाती। नबील ख़ुद पे जब्र करके राहिला को समझाता, उसकी पेट मे पल रही नयी ज़िन्दगी का वास्ता देता।मगर राहिला को क़रार न था, उसकी जिंदगी ,उसकी मुहब्बत दूर जा रही थी,भला सब्र कैसे आता राहिला को।

दुनियादारियों में फँसी मुहब्बतें छटपटा कर रह जाती हैं। और यूँ नबील आने वाले कल को बेहतर बनाने की ग़र्ज़ से, नम आँखें लिए राहिला की निगाहों से दूर हो गया।

दुनिया का नज़ाम कब रुका है किसी के आने जाने से। वक़्त की तेज़ रफ़्तार ट्रेन का कोई स्टेशन नही  होता,वो दौड़ती जाती है ज़िन्दगी की आख़िरी साँस तक बग़ैर रुके।

झब्बन आपा और रहीमा बेग़म रोज़ के मामूल पर आ गयीं।हां बस इतना फ़र्क हुआ, झब्बन आपा के दिल मे राहिला के लिए नर्म गोशा पैदा हो रहा था।

किसी की परवाह न करने वाली, दिल की साफ़ राहिला, उन्हें रफ्ता रफ़्ता अज़ीज़ होती जा रही थी।

रहीमा बेग़म शुरू से राहिला के साथ शफ़क़त से पेश आती थीं, उन्हें नबील और राहिला की शरारतें, एक दूसरे का वीडियो बनाना और फोटोज़ क्लिक करना कभी बुरा नही लगा था।

यूँ ही ज़िन्दगी की चाय, कभी ज़ायकेदार कभी फ़ीकी बेलज़्ज़त सी घूंट घूंट पीती राहिला की डिलीवरी के दिन भी क़रीब आ गए।

नबील के वीडियो कॉल्स, फ़ोन कॉल्स राहिला के दिल को बहलाते ज़रूर थे, सहारा नहीं दे पाते थे। वो इन दिनों मायूसी का लिबास पहने थोड़ी चिड़चिड़ी सी हो गयी थी।नबील से कॉल पर अक्सर बहस हो जाया करती, या फ़िर न चाहते हुए भी बातें तंज़िया हो जाती, और राहिला हर दफ़ा घन्टो रोया करती। उसे लगता मुहब्बतें भी अल्लाह की तरफ़ से अज़ाब हैं, जो खुशहाल बेपरवाह रूहों को तहस नहस कर, अज़ीयत में मुब्तिला कर देती हैं।

राहिला को शदीद ख्वाहिश होती, नबील उसके पेट पर हाथ फेरे, उसे छू कर देखे,उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर, हल्के हल्के दबाया करे।राहिला की बेचैनी ,घबराहट कम हो जाये। मगर नबील का उसके पास होना इक ख़्वाब ही तो था।

“तुम मुझे सुकून से रहने क्यों नही देते? हर वक़्त हिदायत देते रहते हो, मुझे इस तकलीफ़ में फंसा कर ख़ुद घूम रहे हो , ख़ुदा के लिए ये जुमलेबाज़ी बन्द करो अब।”

राहिला की तेज़ आवाज़ और तेज़ होकर उभरी,तो नबील हैरानी से स्पीकर की तरफ़ देखता रह गया।

“राहिला! मैं अपने सख़्त बिज़ी शेड्यूल में से वक़्त निकालकर तुम्हे कॉल करता हूं। तुम्हारी दवाएं बाक़ी की ज़रूरियात के लिए अम्मी से बार बार पूछा करता हूं।तुमसे बात करने की तलब में, काम के अलावा कहीं बाहर नहीं निकलता। लोग घूमते फ़िरते है, और मैं तुमसे फ़ोन पे लगा रहता हूं। क्या चाहती हो जान दे दूँ??”

“मैं बस यही चाहती हूँ, तुम मुझे कॉल न करो, और न ही अपनी शक्ल दिखाना। जैसे अब तक संभाला है खुद को, आगे भी संभाल लूंगी।अब आज के बाद मुझे कॉल करने का एहसान न करना, अल्लाह हाफ़िज़।”

कॉल डिस्कनेक्ट …….

मुहब्बत एक बेहद ज़िद्दी लड़की है, एक वक्त उसे सब चाहिए और उसी वक़्त कुछ भी नहीं चाहिए। मुहब्बत ने जब अना की तऱफ देखा, अना ने उसकी आँखों की रोशनी छीन ली। नबील और राहिला की मासूम दिलबराना मुहब्बत, गुस्से और अना के बोझ तले दब गयी। अना की जंग में अक्सर जुदाई जीत जाती है।

रहीमा बेग़म और झब्बन बुआ को इस जंग की ख़बर हो गयी थी।दोनो को समझाना गोया सेहरा में कुआं खोदना था। राहिला सेलफ़ोन लिए , घन्टो नबील की सूरत तका करती,उसका पूरा जिस्म इंतज़ार में तब्दील हो चुका था।

उधर नबील ने भी ख़ुद को बेहद मसरूफ़ कर लिया। इश्क़ ने ग़म और ग़ुस्से की चादर ओढ़ ली। न दिन दोस्त रहा, न रातें सहेली रहीं।

और ये सूरज चाँद भी अव्वल नम्बर के ढीठ निकले, कितना भी इनसे खफगी बरतो,रोज़ चले आते हैं दिन बढ़ाने।

आज सुबह से राहिला को अजीब सी दुश्वारी पेश आ रही थी।  गाहे बगाहे कमर से नीचे का हिस्सा दर्द से भर उठता, दोनो जांघों को जैसे कोई मरोड़े दे रहा था। राहिला इस नई किस्म की सूरतहाल से घबराकर रोने लगी। उसकी रुलाई में नबील का ग़ुस्सा नबील की बेगानगी और जचगी का दर्द, एक साथ झलक रहा था।

रहीमा बेग़म ने पहले से इंतज़ाम किया हुआ था, पेशेवर दाई ने अपनी तजुर्बेकार, एक्सरे मशीन जैसी आंखों से मुआयना किया। “पहलौठी का बच्चा है बीबी, रात 12 बजे से पहले न होगा। दर्द उठने दो,बस ख़्याल रहे, सांस बाहर न जा पाए।” दाई ने इन्ही हिदायतों के साथ राहिला को हिम्मत बंधाई और वहीं बैठकर चाय पीने लगी।

वक़्त के पैरों में जैसे जान न रही थी, आगे ही न बढ़ता था। दर्द की शिद्दत से राहिला का चेहरा सुर्ख़ हो रहा था,”उफ़ नबील!तुम्हे अब भी मेरी याद न आई, आज मैं मर जाऊँ तो..तो शायद अफ़सोस भी न होगा तुम्हे। हाय अम्मी! मेरा बच्चा, उसे भी तकलीफ़ हो रही होगी।”

“आह नबील! ज़ोर से चीखी राहिला।

“सब्र कर बच्ची, सांस पकड़ के रख। दर्द उठने दे, अभी सब ठीक हो जायेगा।”

“अब न बचूंगी अम्मी, अब नहीं..नहीं..

“अच्छी बातें बोल राहिला। क़ुदरत ने दुनिया की सारी औरतों को माँ बनने की सलाहियत दी है। बस थोड़ा सब्र कर।”

राहिला उस दर्द के जहान में नबील के ख़यालों में गुम हो गयी। “राहिला, तुम्हारे बालों में क्या खुश्बू भरी है, जी चाहता है सारी खुशबुएँ पी लूं और चैन से सो जाऊँ। मेरी दिली तमन्ना है, मेरी बेटी हो बिल्कुल तुम्हारे जैसी। ख़ूबसूरत प्यारी सी बेटी। हम दोनों हमेशा यूँ ही प्यार करेंगे एक दूसरे को ।”

“और जब बूढ़े हो जाएंगे ??”

“बूढ़े हो जाएंगे तब पोपले गालों पर ज़ोरदार किस किया करेंगे, च्यवनप्राश खाकर।”

राहिला हँस पड़ी। अरे!ग़ज़ब है बीबी, इधर दर्द से कराह रही है , इधर हँस भी रही है। मेरी बेटी हँस मत,दुआएं पढ़ ,ज़िन्दगी और मौत के बीच खड़ी है तू इस वक़्त।” दाई ने मुहब्बत से राहिला को देखते हुए कहा ।

“राहिला, लो बात कर लो, नबील का फ़ोन है।” कहते हुए रहीमा बेग़म ने सेलफ़ोन राहिला के कान के पास लगा दिया।

“राहिला, मेरी जान कैसी हो ..

“नबील..” राहिला सारा दर्द भूल कर हिलक हिलक कर रोने लगी।

“मुझे माफ़ कर दो ख़ुदारा, राहिला प्लीज़ रो मत। मैंने अम्मी से कह दिया है, तुम्हे हॉस्पिटल लेकर जा रही हैं। हिम्मत रखो मेरी जान, कुछ नहीं होगा। मैं आ रहा हूं, बहुत जल्द। मेरी ज़िंदगी मुझे माफ़ कर दो।”

“नबील” बस इतना ही कह सकी राहिला, सेलफ़ोन हाथ से छूट गया, दर्द की तेज़ लहरों ने कुछ सोचने समझने के काबिल न छोड़ा। बस कुछ लम्हों की बात थी, ये लम्हे दर्द के समंदर थे, इसी समंदर में डूबते उतराते, माँ और बच्चा साहिल से लगने की जीतोड़ कोशिश कर रहे थे।

“माशाअल्लाह!रहमत आयी है, बेटी हुई है।”

राहिला ने नीम बेहोशी के आलम में सुना, और आसूदगी से उसके लब मुस्कुरा उठे। नबील की बेटी, मेरे नबील की बेटी।

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