Saturday, May 18, 2024
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सपना सिंह की कहानी – एक गली का मुसलमान हो जाना!

आज ये बगल का मकान खाली हो गया। बिका नहीं है, पर वो लोग दूसरी जगह शिफ्ट हो गए हैं। शायद एन सी आर में कहीं, गुड़गांव फरीदाबाद, या, नोयडा गाजियाबाद पता नहीं कहाँ। अम्मा जी को मालूम होगा। वही उनकी  छत से जुड़ी अपनी छत पर खड़ी होकर उनकी  बहू से बतियाती रहती हैं । पर वो अगर पूछेगी तो वह ठीक से बता नही पायेंगी। सारी बातें वो सुनती ही नहीं। नहीं नहीं,  सुनने मे कोई परेशानी नहीं है , ठीक से सुनने में परेशानी है। बातें घंटो करेंगी पर कुछ भी याद न रखेंगी। मुहल्लादारी निभाने की उसको फुर्सत नहीं मिलती। ये पता था ये लोग गली छोड़कर जा रहे हैं। काफी दिनों पहले बीरवारी बाजार में चाचीजी टकरा गई थीं । उसने प्रणाम किया तो कहने लगीं – हम जल्दी ही मकान छोडने वाले हैं। दोनों बेटे यहाँ रहना नहीं चाहते। कहते हैं समय रहते यहाँ से निकलना होगा। जैसी हवा चल रही, चीजें और खराब होंगी। 
                 हवा ? हवा तो इस शहर की जब तब खराब होती ही रहती है। देश का दिल है, राजधानी है। सबको यहाँ रहना हैं, यहीं की आलोचना करना है। परायों ने लूटा, अपनों ने खसोटा। फिर भी ,सबकुछ इतिहास के हवाले कर डटी हुई है। इधर नयी हवा बहने लगी है इस शहर में। और ये नयी हवा पूरी तरह प्रदूषित है। ये प्रदूषण सिर्फ साँसों के द्वारा इंसानी शरीर को ही प्रभावित करने वाला प्रदूषण नहीं है, बल्कि इंसानी दिमाग को प्रभावित करने वाला वैचारिक प्रदूषण है। अलगाववादी तत्वों द्वारा ऐतिहसिक तथ्यों का नया नैरेटिव सेट किया जा रहा। 
                आज का समय दहशत पैदा करता है। अपने काम काज से मतलब रखने वाला इंसान, जिसने कभी चींटी भी न मारी होगी, वो भी दूसरे इंसानों को मरता देख एक हिंसक खुशी से भर जा रहा। सिर्फ एक वजह से, कि वो मरने वाला इंसान उसके नहीं किसी और धर्म का मानने वाला है। डर के रहना आज के समय का सच बन चुका है। अपना पक्ष चुनना, गलत को गलत कह देना अब बहुत भारी बातें हो गई हैं। 
वो स्वयं एक ब्लॉगर है । बेबाक लिखती रही है। पर अब पिछले कुछ समय से परिवार वाले ही उसे चेताते रहे हैं। वह स्वयं भी इस डर को महसूस करने लगी है। राजनीति पर बात करते कतराने लगी है । अपने  विचारों को सरेआम व्यक्त करने से परहेज करने लगी है। 
ये अरोड़ा आंटी का मकान उसके मकान से तीसरा मकान है। हमेशा का आना जाना रहा है दोनों घरों का आपस में। पिछले चौबीस वर्ष से तो वही देख रही। बिल्कुल परिवार जैसा ही है उनका घर भी। आज वो भी कह रही थीं – अब इस गली में  गुजारा  नहीं …
‘अब इस गली  में  गुज़र नहीं ‘ ये बात उसके  कानों  में  हथौड़े सी  बज  रही । चौबीस  वर्ष पहले  जब वह ब्याह कर आई थी इस गली में तो कभी सपने में भी ये तस्वुर न था कि ये गली इतना बदल जायेगी। उसके  हाथ अपने रूटीन कार्य निबटाने के साथ अतीत और वर्तमान की मीमांसा भी कर रहे थे । दो सौ गज का एक मंजिल का घर था। पति दो भाई, तीन बहनों में सबसे छोटे थे। बहनें सब ब्याही जा चुकी थीं। जेठ जी रहते उसी घर में थे पर, खाना पीना अलग था । ससुर जी के गुजरते ही मकान भी बंट गया उसके हिस्से सास के साथ मकान का जो हिस्सा आया, वो इतना जरजर था कि, उसमें रहना मुश्किल। पैसे इतने नहीं थे कि, मकान को ठीक कराकर रहने लायक बना सकें। आखिर पिछला आधा हिस्सा बेचने का तय किया गया। ये दो सौ गज़ का मकान इस तरह लम्बाई में बना था कि इसका पिछला हिस्सा पीछे की गली में खुलता था । हिस्से में मिले 100 गज़ का  पिछला 50 गज़ बेच दिया  गया और  उससे मिले पैसे से  आगे के  हिस्से मे दो मंजिल और  बनाई गई और फिर ये घर रहने लायक बना । अब पिछले तमाम वर्षों से ये पचास गज़ में बना तीनमंजिला मकान ही उसका घर है।  इस गली में ये घर बिल्कुल बीच में स्थित है।  गली के दोनों तरफ मिलाकर लगभग बीस बाइस छोटे बड़े, ऊंचे, सकरे, लम्बे घर हैं। कुछ घरों में कुछ किरायेदार भी हैं जो समय समय पर बदलते रहते हैं। 
जब वह यहाँ आई थी तो इस गली में कुल पांच परिवार ही मुस्लिम थे। तीन उसकी लेन मे और दो सामने की लेन में। हाँ, पीछे वाली गली और इस गली के मुहाने पर सटे मंदिर के आगे वाली गली में ज्यादातर मुस्लिम परिवार थे। पर अब से पहले कभी इन बातों पर ध्यान नहीं गया।  अपनी गली के पांचों मुस्लिम परिवारो में पति का बचपन से आना जाना था ।फिर जब वो भी इसी गली की हो गई, वो भी उन घरों मे आने जाने लगी थी। ईद, होली में पूरी सड़क एक ही रंग में रंग जाती पता नहीं चलता कि, इस सड़क का आधा हिस्सा मुस्लिम बहुल है और आधा हिंदू बहुल। रामायण और महाभारत के जमाने में जैसे भारत के और शहरों के हर गली मुहल्लों की सड़कें सुनसान हो जाया करती थीं, वैसे ही ये सड़क भी सुनसान हो जाती थी ऐसा उसकी सास बताया करतीं। हमारे बच्चों के साथ उनके बच्चे भी तीर धनुष बनाकर खेलते और जय श्रीराम का जयघोष भी करते।  
               पर अब वो समय कहाँ रहा। वैसी अपनाईयत गायब सी हो गई है। शायद कभी थी ही नहीं। भीतर ही भीतर नफरत की एक लकड़ी सुलग रही थी और अब अनुकूल वातावरण के साथ वो सुलगन आग बन जाने की तैयारी में है। 
कुछ घटनाएं, जिनपर पहले ध्यान नही जाता था… अब बकायदा तूल पकड़ने लगी थीं। पहले भी मुहल्ले में चोरी चमारी होती थी, पर अब हर चोरी का ठिकरा मुस्लिम पड़ोसियों पर फोड़ा जाने लगा । सामने वाले वर्मा जी के घर के सामने से सायकिल गायब हो गई। शक उधर के लोगों पर गया । एक सुबह बिरवानी जी नीचली मंजिल पर बने स्टोर का ताला टूटा मिला, सामान सारा तितर बितर। उन्हीं लोगों का काम है… और कौन करेगा ये हिम्मत। अरे ये किसी के सगे नहीं। इनसे कुछ पूछते भी डर लगता। इनके यहाँ तो मार काट आम बात है। आज कल सबकी जुबान पर यही फुसफुसाहट सी बनी रहती। 
             उसे कुछ वर्ष पहले की घटनाएं याद आती हैं। इसी गली में इधर और उधर के  एक लड़के और एक लड़की के खूबसूरत दिल एक ही धुन पर एक ही गीत गाने का सपना देखने लगे थे। लड़की के पिता डॉक्टर थे/हैं । इकलौती बेटी है अफरोज़ उनकी। नाजों से पली। डॉक्टर साहब भी बेहद सज्जन। गली वाले उन्हें कभी भी पुकार सकते थे। रात बिरात वो सबके लिए हाजिर रहते। 
                      मुसलमान की बेटी , हिन्दू बनियों का बेटा । असंभव सी प्रेम-कहानी । शुरू हुई जिम से । उस समय ‘ कहो न प्यार है’ पिक्चर का जमाना था ।हर लड़की के सपनों का राजकुमार रितिक रोशन महाशय थे । यहां मुहल्ले में ही रितिक की कार्बन कॉपी मौजूद था वो लड़का आकाश ! आकाश ने भी खुद को शीशे में देखा ही होगा । थोड़े डोले शोले बना ले तो सचमुच रितिक ही लगे ,ऐसा सोचा भी होगा । उस जमाने में गली गली जिम तो होते नहीं थे । यहां भी सबसे नजदीकी जिम लगभग पांच किलोमीटर दूर था । उधर अफ़रोज़ थोड़ी भारी बदन की थी । उसे भी जीरो फिगर की धुन थी । दोनों धुनी अपनी धुन पूरी करने उसी जिम में गये और जल्दी ही एक धुन के हो गए । 
आते जाते भी और जिम में भी मेल मुलाकात का अच्छा मौका रहता था । आरम्भिक देखा देखी के साथ जल्द ही बातचीत ही शुरू हो गई। दोनों ही उम्र के उस हसीन पड़ाव पर थे जब अधिकतर लड़के लड़कियों को शरीर के हार्मोन्स हरा देते हैं और उन्हें जो पहला बंदा बंदी मिलते हैं उसी पर ढह जाते हैं । दुनिया भर की शायरी कविताएं कहानियां फिल्में ऐसे ही भकचोन्हरों से इंस्पायर्ड होकर लिखी जाती हैं  । ज्यादातर ऐसे प्यार व्यार समय के साथ काल कवलित भी हो जाते हैं ।पर यहां तो सच्चा वाला मामला था । जाति, धर्म की औकात दिखानी थी जमाने को । 
इधर मुहल्ले में काना फूसी होने लगी थी । कानाफूसियां लड़के और लड़की के माता-पिता तक भी पहुंची । जाहिर है ,दोनों घरों में हंगामा बरपा ।  लड़की तो अड़ गई ,इधर लड़का भी एक जिद्दी । बेचारे के पिता ,ताऊ,चाचा समझाकर हार गये । घर की औरतों ने समझाया । मुहल्ले के समझदारों ने समझाया ।खूब ऊंच नीच बताया गया । वो लोग अपनी लड़की किसी कीमत हिन्दू घर में न रहने देंगे । कई सुनी-अनसुनी कहानियां लड़के को बताई गईं । पर प्रेम के मारों को कुछ उचित अनुचित नहीं नजर आता । दोनों ही अड़े थे । पहरे बिठाए गए , धमकाया गया । 
एक दिन अचानक दोनों लापता हो गए । कैसे ? बेकार का प्रश्न है । दुनियाभर के पहरों के बावजूद पहले भी तो कितने ही प्रेमी भागे हैं ,ये भी भाग लिए ! बालिग थे ,एक दिन विशेष विवाह अधिनियम के तहत कोर्ट मैरिज करके प्रकट हो गए बकायदा पुलिस प्रोटेक्शन के साथ । अब कर ही क्या सकते थे । हर मुसलमान चाकू कट्टा ही तो नहीं चलाता न , न ही हर हिंदू तलवार भांजता। डॉक्टर साहब के परिवार में भी पढ़ें लिखे सरकारी ,गैर सरकारी कामकाज में लगे लोग थे ।लड़के स्कूल कॉलेजों में पढ़ लिख रहे थे । कहां हिंदू मुस्लिम के फेर में पड़कर अपना भविष्य खराब करते । जिसने किया है वह स्वयं भुगतेगा ।
                  तो मुसलमान लड़की हिन्दू के घर की बहू बन गई । पर दोनों प्रेमी घर न बसा सके ।सब उसके सामने ही तो हुआ । दो बिल्कुल अलग संस्कृति के लोग , एक साथ रहने , सामंजस्य बनाने में दिक्कत तो आनी ही थी ।शायद दोनों प्रेमी युगल इस शहर इस माहौल से अलग , अपनों से दूर किसी और शहर किसी और माहौल में रहते तो एक दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह जान समझ पाते । किसी को प्रेम करना और उसके साथ रहना ,ये दोनों बहुत अलग बातें हैं । इसे वही व्यक्ति अच्छे से समझ सकते हैं, जिन्होंने जिससे प्रेम किया है उसी से विवाह भी किया । 
                दोनों के बीच फांक धीरे-धीरे बढ़ी और फिर बढ़ती ही गई । 
       सबसे पहले तो खान पान का मसला उठा । मुसलमानो के घर की लड़की  को रोज नानवेज खाने की आदत । अंडा नहीं तो मुर्गा , मुर्गा नहीं तो बकरा ,बकरा नहीं तो बड़ा । वैसे लड़कियां किसी भी क़ौम की हों इस मामले में तो एक ही होती हैं कि, जहां गई वहीं रच बस गईं । यहां गड़बड़ ये हुई कि , लड़की का मायका बस चार कदम दूर अगली गली में था ।आये दिन अम्मी का प्रेम उमड़ उठता और वो किसी न किसी तरह गोश्त , बिरयानी ,कबाब और मुर्ग मुसल्लम के कटोरदान बेटी तक पहुंचा देतीं । रोटी चावल तो हर घर में बनता है , अपने कमरे में लाकर चुपचाप खा लेगी बेटी । 
               मुसलमानो को लेकर जो जो पूर्वाग्रह और भ्रांतियां समान्य हिंदू परिवारों में व्याप्त थीं उससे ये गुप्ता परिवार अछूता नहीं ।बेटे के जिद ने मुसलमानी को घर में घुसा तो दिया था ,पर दिलों में दूरी थी ।एक चिढ़ी हुई नकार जिसकी तासीर दुल्हन तक पहुंच रही थी । दुल्हन अपने कमरे में मांस अंडा खाती है , पूरा घर भरभस्ट कर मारी है । भले दुल्हन रोज नहाती थी ,पर घर भर में उसको लेकर यही पूर्वाग्रह था कि ,ये तो गुसलखाने से हाथ मुंह धोकर आ जाती होगी ,इनके यहां तो बस जुमे को नहाते हैं । ये लोग तो लैट्रिन से आकर हाथ भी नहीं माजते ,में भगवान सोच लो तो ओकाई आ जाती है । दुल्हन को अभी भी रसोई में जाने की इजाजत नहीं थी । पानी का घड़ा , फ्रिज ,दूध उसे कुछ भी छूने नहीं दिया जाता और ये पूरी अश्लीलता से उसपर ज़ाहिर करते हुए किया जाता ।बेचारी रूआंसी हो जाती ।पति से कहती तो वो लापरवाही से कह देता – भाई ये सब तो होगा ही ,मै घर के मामलों में कैसे दखल दे सकता हूं ? वह चिढ़कर मुंह फेर लेती ।
                    एक और नया नाटक शुरू हो गया था ।जिस घर में कभी कौन पूजा कर रहा , कहां जल चढ़ा रहा ,पता भी नहीं चलता ,अब पूरे स्वांग के साथ पूजा पाठ किया जाने लगा और उस दौरान घर की बहु को दुरदुराया ही रहा गया । बहू भी तो शादी से पहले कभी एक वक्त की नमाज भी नहीं अदा करती थी , अचानक अल्ला मियां ही उसे अपने तारणहार नजर आने लगे । दूर मस्जिद से अजान की आवाज सुनाई पड़ते ही वह हाथ मुंह धोकर दुपट्टे से सिर कान ढककर नमाज़ पढ़ने बैठ जाती । धर्म जो अबतक अपने नीजि स्पेस में था ,इस घर में दोनों ही तरफ से उसका बेहुदा प्रदर्शन होने लगा।
दुल्हन का पड़ला हल्का पड़ रहा था ,वो अकेली कबतक घर भर से जूझती । लिहाजा वो अब मौका पाते ही पिता के घर पहुंच जाती । वो उसका कंफर्ट जोन था । जो घर इश्क़ में पड़ते ही बेगाना लगने लगा था और मोड़ की दूसरी गली का चौथा मकान उसे स्वर्ग सा सुंदर नज़र आता था अचानक अब असलीयत में दीखने लगा ! 
ये प्रेम के उलटे पांव लौटने के दिन थे । 
 अपनी लड़की के फीके पड़े चेहरे , उदासीन नज़रों ने घर वालों को और जोश से भर दिया । अब जब भी वो आती ,उसकी बुआ का बेटा भी उधर किसी काम से निकल आया।कैसी हो गुन्नू ? कहते हुए समय को परे रख देर देर बैठा रहता ।  कभी वो उसकी बाइक पर बैठकर शॉपिंग करने चली जाती तो कभी सिलने को डाले सलवार सूट लेने दर्जी के यहां ।जो सादिक पहले उसे लम्पट और आवारा लगता था अब उसमें उसे एक समझदार दोस्त नज़र आने लगा था। नजदीकियां बढ़ने लगी थीं ।
इधर पति को उसकी उलझनों से कोई लेना देना ही नहीं था जैसे । उसने दबी जुबान से एक दो बार कहा भी इस सबसे दूर किसी दूसरे मुहल्ले में चलकर रहते हैं ।पर पति ने उसे झिड़क दिया ।एक तो पहले ही अपने मन की शादी करके सबको नाराज़ कर रखा है,अब घर छोड़ कर और उनका दिल दुखा दूं?
उनके रिश्ते में ऐसी ही खींच तान दो साल तक चली और अंततः डोर टूट गई । जिस दिन दोनों का तलाक हुआ , दोनों के घर वालों ने राहत की सांस ली।लड़का लड़की एक दुसरे से आंखे चुराते रहे थोड़ी उदासी थोड़ी बेचैनी थोड़ी सी राहत भरे भावों की आवाजाही दिल में महसूसते दोनों ने अपनी प्रेम कहानी को तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर के खत्म कर दिया । 
दो महीने के अंदर लड़की का निकाह सादिक से पढ़वा दिया गया । चार महीने के अंदर लड़के का भी विवाह हो गया कुछ सालों में दोनों दो दो बच्चों के मां बाप बन गये लड़की मायके आती जाती रहती । पूर्व पति और उसके परिवार वालों से भी सामना होता , पहचान की कौंध आंखों को छूकर निकल जाती ।पर बच्चों को अपने माता पिता की हिस्ट्री क्या मालूम ? वो तो मुहल्ले के अन्य बच्चों के साथ मिलकर खेलते । उस गली उस मुहल्ले ने ऐसे दृश्य सहजता से स्वीकार कर लिया है। 
              वह जाने कितनी देर से वही सब सोच रही थी । जब भी पति से इस मुद्दे पर बात होती कि,अब ये जगह छोड़ देनी चाहिए…वह सोचने लगती।
           फैमिली वाट्सेप ग्रुप हिंसक मैसज से भरे हुए हैं। सभी फारवर्डेड। कोई इतिहास का हवाला दे रहा तो कोई इनके खून की कट्टरता को सच बता रहा । पहले वो भी खूब मैसेज करती थी। फेसबुक से कोई सेक्युलर पोस्ट उठाई और चेंप दी । रवीश कुमार के तो कितने पोस्ट, वीडियो उसने इन ग्रुप्स में भेजे। बेचारे रवीश कुमार कहां कहां,किस किससे किस किस लिए गाली खा रहे, उन्हें भी नहीं पता होगा। अपने बहनोई से कितनी तो बहस हुई उसकी। सरकारी ओहदा है उनका। अच्छी खासी पावर है हाथ में । उनकी सुबह यू ट्यूब पर वीडियो देखने से शुरू होती है।वो वीडियो, जिनमें कोई भक्त दूसरी कौम को भर पेट गरियाता बैठा होता । उनके पास अपने तर्क हैं ही – देश की तो बात ही छोड़ो अब तो ये वैश्विक समस्या हो गये हैं । जहां कहीं कोई बम फूटा,इनका ही नाम आया । साले हत्यारे! इनका तो इतिहास ही यही है। ये तो अपने ही बाप भाई के सगे नहीं होते। इतिहास उठाकर देख लो आक्रमण, लूटपाट हत्यायें सब इनका किया।
अरे? वह सोच में पड़ जाती है…मने उसका पढ़ा हुआ इतिहास झूठ है। हमारे यहां के राजा महाराजा तो बड़े सज्जन थे  । फिर वो प्राचीन इतिहास में वर्णित रक्तपात से भरे पन्ने ,वो सब किसका इतिहास था ? सत्ता किसकी सगी होती है ? सत्ता के लिए अशोक महान ने क्या कम रक्त पात किया था ,क्या उसने नहीं अपने भाइयों की हत्या की थी? हत्यारों को महान बना देने की परम्परा तो आज भी चली आ रही,बस राजा महाराजा, बादशाह, नवाबों की जगह विभिन्न राजनैतिक दलों ने ले ली है।
वह जो सोच रही है वह भूले से भी ज़बान से निकल जाए तो ये उसके वाट्सैपी रिश्तेदार उसे सीधे देशद्रोही ही बना देते हैं।उसे आश्चर्य तो तब होता है जब वो अपने सामने जन्मे बच्चों को एक विशेष राजनैतिक रूझान से प्रेरित होकर अपने ही बड़ों से बद्तमिजी करते देखती है। अपने युवावस्था में उसने भी अपने बड़ों से राजनीतिक सामाजिक बहसें की है पर कभी लाइन क्रास नहीं की,बेलिहाज नहीं हुई। अब तो ये जमाना है कि अपनी इज्जत बचाने के लिए चुप हो जाओ। जैसे कि वो हो गई है। वाट्सेप पर मौजूद फैमिली ग्रुप्स में जाती ही नहीं ,सिवाय किसी के जन्मदिन, वैवाहिक सालगिरह आदि की मुबारकबाद देने । कमअक्ल युवाओं से बहस करके सिर्फ अपना मानसिक संतुलन जाता है हासिल कुछ नहीं होता । अधकचरे ज्ञान और हिंसा से भरे इनके अपरिपक्व मस्तिष्क के लिए उसे चिंता होती है। उसे पता है उनके जोश से भरे बेवकूफाना मैसज पर जो वो अपनी एग्रेसिव प्रतिक्रियाएं देना बंद कर चुकी है,उसका अर्थ वे अपनी जीत सममझते थे।उनकी ऐसी ही कंडीशनिंग आज का माहौल कर रहा है । बेवकूफियों के जवाब में चुप्पी चुन लेना, बेवकूफों को अपनी जीत लगती है ।
उसके एक बहनोई जो ऊंचे प्रशासनिक पद पर हैं, खुलेआम इन लोगों को गरिआते हैं। उनकी सुबह चाय पीते और इतिहास की नयी थ्योरी गढ़ने वाले वीडियो सुनकर होती है।इन वीडियोज में कोई भक्त नुमा व्यक्ति बैठा हुआ मध्यकालीन इतिहास पर स्यापे कर होता। या फिर किसी वीडियो में नेहरू गांधी को इस देश की सारी समस्याओं का जिम्मेदार मानते हुए देश की जनता को सच्चाई देखने सुनने की अपील होती। कुतर्को से भरे बिना किसी तथ्य के ऐसे प्रचार दिन रात वाट्सेप पर इधर उधर दौड़ते रहते ।बड़े सलीके से झूठ को सच बनाया और मनवाया जा रहा था। जो लोग इस झूठ की सच्चाई जानते थे वो चुप थे। क्योंकि बोलने के खतरे उन्होंने देखे थे। अपने ही कुटुंब के भक्त युवा तमीज की लाइन क्रॉस कर कुछ भी कह देते थे । जिन्हें देशभक्ति , देशप्रेम का कुछ नहीं पता वो आज की पिज्जा , मल्टिप्लेक्स , और मॉल वाली पीढ़ी छूटते ही उन्हें देशद्रोही घोषित करने में एक क्षण नहीं सोचती। अपनी इज्जत की धज्जियां उड़वाने से बेहतर उन्हें चुप रहना लगने लगा  । 
वो कहते हैं, ” कभी इनके मुहल्ले से अकेले गुजर कर देखिए… सुरक्षित निकल पाना मुश्किल है।सब समझ में आ जाएगा,जो इनकी बड़ी तरफदारी करती हैं…।” 
उसे अपना माजी याद आ जाता है।  रिक्शे का पैसा बचाने के चक्कर में वो जिस शार्टकट से कॉलेज जाती थी वो गली पूरी मुस्लिम कौम की थी।गली के दोनों ओर उन्ही की दुकान और घर। उन दिनों टेलीविजन पर रामायण आता था।  पूरा हिंदुस्तान रामानंद सागर के रामायण की भक्ति में ओत प्रोत था। बच्चों का प्रिय खेल जयथा तीर धनुष बनाकर जय श्रीराम का उद्घोष करते हुए काल्पनिक राक्षसों को मारना हुआ करता । उस गली में भी उसने बच्चों को तीर धनुष से खेलते और जय श्रीराम का उद्घोष करते देखा था। जो राम पूरे हिन्दुस्तान के थे वो अचानक सिर्फ कुछ लोगों के हो गए और इन कुछ लोगों ने राम को अगवा कर लिया है। उनके टर्म एंड कंडीशन पर ही राम को कोई और अपना सकता है, अन्यथा नहीं। 
सबकुछ कितना बदल गया है । याकि कुछ नहीं बदला। भीतर ही भीतर नफरतें तह पर तह जमाती जा रहीं थीं और अनुकूल स्थिति पाकर विस्फोटक रुप से ऊपर आ गई हैं। वो भी कितनी ही सेकुलर बनी रहती हो पर उसके भीतर भी एक डर तो कुंडली मारकर बैठ ही गया है। अब तो साथ वाले घर के लोग भी हफ्ते भर में घर खाली करने वाले हैं। पिछले आधे हिस्सा जो जिठानी के अधिकार में था उसका भी सौदा हो गया है। वो तो पांच महीने पहले ही ये मुहल्ला छोड़ अपने मायके में रहने चली गई थीं। अब मकान बिक जाये तो वो वहीं कहीं छोटा सा फ्लैट लेने का सोच रहीं।
समय रहते उन लोगों को भी यहां से निकलने का सोचना चाहिए। आज आने दो इन्हें,बात करती हूं।पर ये आदमी तो कोई बात ही नहीं सुनता। एक ही राग अलापना है – दो पीढ़ी से रह रहे इस गली में , यहीं बचपन बिताया, यहीं जवान हुए यहीं शादी हुई, बच्चों का जन्म हुआ। पूरी गली एक परिवार की तरह हर सुख दुःख में एक साथ रहे वर्षों से। शादी ब्याह,मरने जीने में कौन किसके घर खा पी रहा या सो रहा कुछ परवा नहीं।सब अपने ही तो हैं, इनसे कैसा डर?
वो बहस करती है, “पर ये जो नये लोग आ रहे ये तो अजनबी ही हैं न । अब अपना बचा ही कौन यहां। बुजुर्ग या गुजर गये या गुजरने की राह पर हैं। बचे हुओं का कोई जोर अपने बाल बच्चे पर नहीं चलता। ईश्वर न करे कभी कोई दंगा वंगा हुआ तो वो बूढ़े थके बाज़ू बचा पायेंगे भला उन लोगों को ? उनकी सुनेगा कौन,सुनता कौन है? 
आजकल दिन रात उसे यहां से निकलने का ही ख्याल परेशान करता है। सारे रिश्तेदार भी यही सलाह देते हैं। जवान बेटियां हैं,ऐसी असुरक्षित जगह क्यों रहना? उसे बार बार बुरे ख्याल आते हैं। अगर कुछ हुआ तो क्या कर पायेगी वो, कैसे बचेगी,कैसे बचायेगी बेटियों को? उसके घर में सिवाय सब्ज़ी काटने के चाकू के और कोई हथियार भी नहीं है । 
उसे पति पर गुस्सा आता है। देखो तो भला फैमिली ग्रुप्स में फौरवर्डेड मैसज कर करके ऐसा लगता है जैसे उस कौम के सबसे बड़े दुश्मन यही हैं। नफरती मैसज के जवाब में चार और नफरती मैसज फौरवर्ड करने में तो कितने एक्टिव रहते थे और अब देखो उन्हीं लोगों के मुहल्ले से जाने को नहीं तैयार।
” कैसा उन लोगों का मुहल्ला ? बचपन से हम यहां रहे ,अब ये उनका मुहल्ला कैसे हो गया?”
” जब घर के आगे पीछे,दायें बायें ये पूरी गली यही लोग बस गये तो इन्हीं का मुहल्ला हुआ न , नाम भले तुलसीनगर हो । देख लेना कुछ दिन में नाम भी बदल जायेगा। आप कहीं और रहने का सोचो। खुद तो सुबह सात बजे के निकले रात नौ बजे आते हो…सारा दिन मैं अकेली रहती हूं। डर की वजह से पढ़ने लिखने में भी दिल नहीं लगता। कहीं कोई शोर होता है तो चौंक कर सारे दरवाजे खिड़कियां चेक करने लगती हूं। आखिर क्यों रहना ऐसी जगह? ” वो बोले जा रही है। 
एकाएक उसे एहसास हुआ वो जो कितना कितना विरोध करती थी अंधभक्ति से भरे हुए एकतरफा बातों का। कितना लड़ती और दुखी होती थी ऐसी ज़हालत से।अब अचानक वो भी उधर ही हो गई। उन जैसों की ही तरह शक शुबहों और डर से भरी हुई …
सपना सिंह
सपना सिंह
हिंदी की चर्चित कहानीकार. हंस, कथादेश, परिकथा, कथाक्रम, सखी(जागरण), निकट, अर्यसदेंश, युगवंशिका, माटी, इन्‍द्रपस्‍थ भारती आदि देश की प्रमुख पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित. आकशवाणी से कहानियों का निरतंर प्रसारण. संपर्क - sapnasingh21june@gmail.com
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1 टिप्पणी

  1. सपना सिंह जी की कहानी – एक गली का मुसलमान हो जाना – के नाम ने पढ़ने के लिए मजबूर किया और अब सुबह-सुबह कहानी पढ़ने के बाद कह सकता हूँ कि कहानी में बैचेन कर देने की ताक़त है।

    उन तक बधाई पहुंचे

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