संदीप की आँखें बंद थीं, लेकिन उसे जमीन, आसमान, पेड़-पौधे, पहाड़, नदी और  सागर कभी बर्फ की तरह झक सफ़ेद तो कभी कोयले जैसी काली दिख रही थी।  वह आँखें खोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन खोल नहीं पा रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ पर है वह? क्या वह मर चुका है या फिर कोई सपना देख रहा है? 
मन ही मन संदीप यह भी सोच रहा था कि यह सपना नहीं हो सकता है, क्योंकि यदि यह सपना होता तो उसकी आँखें अब तक खुल चुकी होती। बचपन से आज तक जब भी वह सपने में डर जाता था या आँख खोलने की कोशिश करता था तो उसकी आँखें खुल जाती थीं। अगर यह सपना नहीं है तो फिर क्या वह सचमुच मर चुका है? शायद इसीलिए, फिल्मों के स्वर्ग या नरक की तरह उसे हर चीज सफ़ेद या फिर काली दिखाई दे रही है। हालांकि, इस सोच में एक अंतर यह था कि फिल्मों के स्वर्ग या नरक में चीजें सफ़ेद या काली के साथ-साथ रंगीन भी दिखाई देती हैं।   
संदीप आँखें खोलने की लगातार कोशिश करता रहा, छटपटाता रहा, पर उसकी हर कोशिश नाकाम रही। वह काफी थक चुका था। थकने से ज्यादा वह बेचैन था। लग रहा था कि तनाव से उसका सिर फट जायेगा। वह बेबस हो चुका था। निरीहता उसके चेहरे पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी।  
जब आँखें खुली तो संदीप ने देखा कि वह अस्तपताल में है। वह बेहद ही कमजोर महसूस कर रहा था। उसके होठों पर पपड़ियाँ पड़ी हुई थी। हालाँकि, उसकी ढाढ़ी बहुत घनी नहीं थी, फिर भी, काफी बढ़ी हुई दिख रही थी। वह मरीजों वाला गाउन पहने हुए था। उसके सामने और दायें-बाएँ कुछ और बेड लगे हुए थे। उसे छोड़, सभी मरीजों की नाक में आक्सीजन लगे हुए थे। उसके दायें तरफ रखे एक टेबल पर मॉनिटर पर उसका रक्तचाप, आक्सीजन का स्तर और नब्ज की दर प्रदर्शित हो रही थी।  
संदीप ने बेड के सामने की बेंच पर बैठी नर्स से पूछा, “मैं कौन से अस्तपताल में हूँ, कब से यहाँ भर्ती हूँ, मैं तो घर में था, मुझे सिर्फ बुखार और पेशाब करने के दौरान जलन की शिकायत थी, इतनी छोटी सी समस्या के लिए मुझे आईसीयू में क्यों रखा गया है, निरंतर बोलने से संदीप का गला सूखने लगा तो वह चुप हो गया, दोबारा बोलने की कोशिश की, पर उसके कंठ से आवाज नहीं निकल सकी?”। नर्स ने कहा “शांत रहिए, आपको अभी बात करने से परहेज करना चाहिए, आप शहर के सबसे बड़े अस्तपताल “कर्णावती” में भर्ती हैं, 5 दिनों के बाद आपको होश में आया है, आपकी सांसें चल रही थी, लेकिन आपके शरीर के अंग सुचारु रूप से काम नहीं कर रहे थे, बेहद ही नाजुक स्थिति में आईसीयू में लाया गया था आपको, डॉक्टर के अनुसार ज्यादा बुखार की वजह से आप कोमा में चले गए थे, डॉक्टरों को आपके बचने की संभावना न्यून दिख रही थी, आपकी पत्नी का तो रो-रोकर बुरा हाल था, आपकी पत्नी और बड़े भाई पिछले 5 दिनों से अस्तपताल में हैं, घर तक नहीं गए हैं”।  
संदीप, नर्स की बातें सुनकर घबड़ा गया, उसके मन में बुरे-बुरे ख्याल आने लगे, वह पत्नी और बेटियों के भविष्य के बारे में सोचकर बहुत ज्यादा चिंतित हो गया। बेटियाँ तो अभी नौवीं और दसवीं कक्षा में ही थीं। अगर वह मर गया तो उनकी शिक्षा का क्या होगा? कौन उनकी देखभाल करेगा? पत्नी उन्हें कैसे संभालेगी? अभी तो बचत से ज्यादा कर्ज हैं, उसने स्वयं का कोई बीमा भी नहीं करवाया है। 
संदीप जानता था, उसके मरने के बाद कोई भी उसके परिवार की मदद नहीं करेगा। जब वह बारहवीं में था तो उसके पिताजी की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी। तब भी उनकी मदद के लिए रिश्तेदार आगे नहीं आये थे, लेकिन वह और उसके भाई और बहन बड़े और समझदार थे, इसलिए, वे मुश्किल वक्त का सामना करने और उससे बाहर निकलने में सफल रहे।  
संदीप को लग रहा था कि शायद उसका अंत समय निकट आ गया है। वह 50 के वय में था, लेकिन इसके पहले उसकी तबीयत इतनी ज्यादा खराब कभी नहीं हुई थी। जीवन में पहली बार वह इतना कमजोर महसूस कर रहा था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।   
लगभग 9 बजे डॉक्टर आईसीयू में आने वाले थे। नर्स ने संदीप के होश में आने की सूचना सुबह ही डॉक्टर को दे दी थी, इसलिए, डॉक्टर सबसे पहले संदीप की गहन जांच की। फिर, हँसते हुए बोले, “पुनर्जन्म के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई, वाकई में आप किस्मत वाले हैं, मुझे और यूरोलोजिस्ट डॉक्टर मुकेश पटेल को आपके कोमा से बाहर आने की कोई उम्मीद नहीं थी, हमें लग रहा था आप नहीं बच पाएंगे, आपका कोमा से बाहर आना किसी चमत्कार से कम नहीं है।“ 
बोलने में संदीप को तकलीफ हो रही थी, फिर भी उसने हिम्मत करके डॉक्टर से पूछा, “आखिर मुझे हुआ क्या था, सिर्फ बुखार ही तो था और पेशाब करने के दौरान थोड़ी जलन हो रही थी”। डॉक्टर ने कहा, “पेशाब करने के दौरान बैक्टीरिया आपके शरीर में प्रवेश कर गया था, जो बहुत ज्यादा खतरनाक है, वह इतना ज्यादा मायावी है कि पेशाब से कब खून में प्रवेश कर गया, पता ही नहीं चला, आपको संक्रमण था, यह निश्चित था, लेकिन यह किसकी वजह से हुआ था, और इसका कारक शरीर में कहाँ छुपा है का पता हमें नहीं चल पा रहा था और इसने आपके शरीर में संक्रमण के स्तर को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया था, बहुत बाद में ब्लड कल्चर की जांच से पता चला कि वायरस की जगह बैक्टीरिया आपकी नाजुक स्थिति का कारक है, यह इतना अधिक भयावह है कि अक्सर मस्तिष्क में प्रवेश करके रक्त स्राव का कारक बन जाता है और अक्सर इसकी वजह से मरीज की मृत्यु हो जाती है, इसके कारण अलग-अलग बीमारियों के लक्षण आपके शरीर में दिख रहे थे, लेकिन वास्तव में वैसी बीमारियाँ आपको थीं नहीं, कोमा के दौरान आपके शरीर में आक्सीजन की मात्रा बहुत ज्यादा कम हो गई थी, जिसकी वजह से आपको लगातार आक्सीजन दिया जा रहा था, यह तो ईश्वर की कृपा आप पर थी कि अंदाजे से दी गई दवा बैक्टीरिया को कुछ हद तक काबू करने में सफल रही, अन्यथा….आप शायद नहीं बच पाते, कहकर डॉक्टर साहब चुप हो गये।“ 
कुछ समय चुप रहने के बाद डॉक्टर ने पुनः कहा, “वैसे, अब चिंता करने की कोई बात नहीं है, आप खतरे से बाहर हैं, सबसे महत्वपूर्ण है, आपका होश में आना, लेकिन अभी कम से कम 15 दिनों तक आपको अस्तपताल में रहना होगा, क्योंकि यह बैक्टीरिया बहुत ही जिद्दी स्वभाव का है, इसका खात्मा करना आसान नहीं है, इसके समूल नाश में 5 से 6 महीने का समय लग सकता है, इसलिए, आपके शरीर में संक्रमण के स्तर के सामान्य होने के बाद ही आपको अस्तपताल से छुट्टी मिल पायेगी”। डॉक्टर की बातें सुनकर संदीप ने राहत की एक लंबी सांस ली।  
संदीप की पत्नी सुहानी ने बहुत मिन्नत की तो उसे 12 बजे मिलने की इजाजत दी गई, क्योंकि आईसीयू में मिलने का समय शाम को 5 से 6 बजे निर्धारित था। सुहानी, संदीप के सिरहाने में चुपचाप जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। सुहानी को भावुक देखकर संदीप भी भावुक हो गया, वह भी नि:शब्द रोने लगा, लेकिन कुछ देर के बाद संदीप ने अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए सुहानी से कहा, “हिम्मत रखो, अब संकट टल गया है, भगवान इतने निष्ठुर नहीं हैं, हमने कभी भी किसी का बुरा नहीं किया है, ईश्वर ने मुझे बचा लिया है, इसका अर्थ है कि मेरी हथेली में ज़िंदगी की लकीर लंबी है, तुम बेफिक्र रहो, मेरा बाल भी बांका नहीं होगा”। सुहानी चुपचाप संदीप की बातें सुन रही थी, पर उसने कोई जबाव नहीं दिया और भरे मन से आईसीयू से बाहर निकल गई। 
सुहानी के जाने के बाद संदीप सोचने लगा कितना क्षणभंगुर है इंसान का जीवन। अगले पल की खबर नहीं और हम पूरे जीवन की योजना बना लेते हैं। भगवान के अस्तित्व पर संदीप को कभी विश्वास नहीं था, लेकिन खुद के पुनर्जीवित होने के बाद ईश्वर पर उसका भरोसा अटूट बन गया। वह समझ गया था, दवा और ईलाज तभी काम करते हैं, जब ईश्वर की मर्जी होती है। 
अन्यथा लोगों के पैर फिसलते हैं और वे खुदा के प्यारे हो जाते हैं। चमत्कार तो ईश्वर ही कर सकते हैं, इंसान तो सिर्फ कोशिश कर सकता है।  

सतीश कुमार सिंह
मोबाइल-8294586892
सहायक महाप्रबंधक (ज्ञानार्जन एवं विकास)
भारतीय स्टेट बैंक
अहमदाबाद,
पिन कोड-380001
गुजरात

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