
(1)
घर से बनारस
……………………
घर से बनारस के लिए चला तो बनारस
मेरे भीतर चल रहा था
मेरे श्वास-श्वास में रुधिर में
हजारों हजार बरस पुरानी गैरिक स्मृतियों
की लीलानगरी बसाए
मैं यान की गति से दौड़ रहा था
और वह दौड़ता हुआ
मेरे पास आ रहा था
पास—और पास…
वही आकुलता जो मुझमें थी
वही उसमें थी
बनारस की धरती पर पैर रखते ही
बनारस मुझे घेर लेता है
चारों ओर से भुजाएँ बढ़ाता हुआ
सदियों से बिछुड़ा कोई दोस्त जैसे
*
(2)
बनारस-प्रवास
…………………
मैं बनारस में हूँ बनारस
मुझमें
बनारस की टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार गलियों में चलते हुए
उड़ा जा रहा हूँ मैं कहाँ से कहाँ
बनारस मेरे आरपार बहता है
किसी ठंडी सनसनाती हवा की तरह
अनजानी छुअन लिए
मेरे रोम-रोम में प्रकंप जगाता
बनारस में बहा जा रहा हूँ मैं
किसी विह्वल, आत्म-विस्मृत पगले जोगी सा
गंगा के शीतल, हर्षाकुल पानियों
में चुप-चुप खोया हुआ
सूर्यनाथ और ब्रजेंद हँसकर छेड़ते हैं
गंगा तो अभी दूर है मनु जी,
पर गंगा की कल-कल सुन रहे हैं
मेरे विह्वल प्राण,
उन्हें कैसे बताऊँ गंगा तो मेरे भीतर बह रही है
मेरे भीतर बहते बनारस की तरह
*
(3)
माँ गंगा की गोद में
………………………….
रात भर सपना
सपने में बह रहा था मैं
किसी भोले शिशु की तरह
पानियों में हाथ-पैर मारता
खिलखिलाता
माँ गंगा मुझे गोद में उठाए
बह रही थी अनंत क्षितिजों के पार
अपनी अथाह जलराशि के विशाल वैभव के साथ
बह रही थी गंगा निर्द्वंद्व
निर्वाक्
और मैं गंगापुत्र बह रहा था
बहता जा रहा था अपनी वत्सला माँ गंगा
के वक्ष से चिपका, ठिठुरा
जीवन के अनंत छोरों की तरफ
वहाँ जहाँ कहीं है मुक्ति
*
(4)
सुबहे बनारस
…………………
यह सुबहे बनारस है
संगीत के बहते हुए ताजा सुरों के साथ
गुनगुनाती हुई भोर
कुछ आत्म-विस्मृत सी
डूबी-डूबी सपने में
डूबी अपने में
बरस रहे हैं सुर
गंगा तट पर
बरस रही है सुबह बनारस में
सितारा देवी के नृत्य की ताल
और अल्ला रक्खा खाँ के तबले की थाप पर
बरस रही है सुबह
बनारस
में
हम चार हैं यहाँ गंगा घाट पर
मैं, सूर्य भाई, ब्रजेंद्र त्रिपाठी और सुरेश्वर
चार मित्र मिले जो बहुत दिनों बाद
सुबहे बनारस के रस में भीगते हुए भीतर तक
चुप-चुप निर्वाक्
संगीत बस, संगीत बरस रहा है चतुर्दिक
हवाओं में बहते संगीत की गैरिक लय-तान
विभोर करती हैं हमें
गंगा की लहरों की कल-कल, कुल-कुल की तरह
और हम चुप-चुप बह रहे हैं
किसी अनहद नाद में
जो शब्दों से परे है, अछोर
अभी कुछ अँधेरा है
पर बनारस जाग गया है नींद का लिहाफ
उतारकर
गंगा के घाट, गंगा की रेती और पानियों पर
उतर रही है सुबह
और दूर तक सुनाई देती है उस्ताद विस्मिल्लाह खाँ
की शहनाई
शहनाई के बोल
गंगा की लहरों पर काँपते हैं
हवा में लरजते हैं
और दूर क्षितिजों के पार उतरने लगते हैं
केवल बनारस नहीं
बनारस की गंगा नहीं
अखिल ब्रह्मांड सुन रहा है
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के बोल
जो गंगा घाट पर उतरते हैं
तो समय थम जाता है
और हर चीज कालातीत
शिव के शांत, मृदुल हास्य की तरह
देखिए गंगा के घाट अब कितने साफ हो गए हैं
पहले बुरा था हाल
उल्लसित सुरेश्वर का स्वर,
हाँ-हाँ-हाँ, भाई सुरेश्वर, हाँ!
मैं जवाब देता हूँ
पर कान तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
की तरफ लगे हैं
जिसके स्वर न जाने कब के हवा में बह रहे हैं
बहते रहेंगे अभी सदियों तक
गंगा के संग-संग बहती नौका में हम चारों मित्र
केवट भी
बहे जा रहे हैं आह्लादित उर
कि अचानक किसी बात पर हँसते हैं साथ-साथ
तो हँसती है गंगा मैया भी
उमगकर
असीसें देती है शीतल मन से
कि बेटे आए हैं आज बहुत दिनों बाद
जिएँ
जीते रहें खूब आनंद मनाएँ
लौटते हुए फिर आँखों में भरता हूँ मैं
गंगा का अनंत विस्तार
उसकी शीतल छुअन
उसकी असीसों पर असीसें
सिर और माथे पर उसकी उँगलियों की कँपकँपाहट
लौटते हुए फिर-फिर देखता हूँ
पीछे मुड़कर
मैं विह्वल सा
कि गंगा बह रही है
अपनी उमगती लहरों के साथ
आनंद लीला सी रचाए
एक गंगा मुझमें एक बाहर बह रही हैँ
गंगा के साथ-साथ बह रहा है पूरा बनारस भी
अनादि लय में
कि सुबह हो रही है
बनारस में सुबह।
*
(5)
छन्नू महाराज के लिए एक कविता
……………………………………………
बनारस है तो छन्नू महाराज भी हैं
छन्नू महाराज हैं तो उनकी होरी भी
कि खेलें मसाने में होरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी…
उमग रहे हैं स्वर उनके भीतर से
जैसे उमगती हैं लहरें गंगा की
शिव की जटाओं से विचित्र लास्य के साथ
वे बैठे हैं और गा रहे हैं
नहीं-नहीं, बैठे हैं और नाच रहे हैं
नाच रहे हैं उनके स्वर भी साथ-साथ—
खेलें मसाने में होरी दिगंबर,
खेलें मसाने में होरी…
चिता भस्म भर झोरी, दिगंबर खेलें मसाने में होरी…
नाच रहे हैं बोल छुन्नू मिश्र के
मसाने में नाच रहे
परम कौतुकी नटराज शिव की तरह
और हम सबके सब अवाक्
अहा, छन्नू महाराज अब छन्नू महाराज नहीं हैं
अपने स्वरों में घुलते जा रहे हैं वे हर पल
केवल देह है जो सामने है…
और स्वरों के साथ-साथ नाचती मुक्त केशराशि
वे जैसे हैं भी और नहीं भी
वे भी जैसे मसाने में होरी खेलते शिव में समा गए हैं
शिव में शिव का डमरू नाच बनकर…
और उनके साथ-साथ हम सब भी
जो मसाने में खेल रहे थे होरी
और बनारस में
बनारस की आत्मा का देख रहे थे
यह सम्मोहक लीला नृत्य
विदेह,
एकदम विदेह होकर!
गायन पूरा होते ही जैसे सब नींद से जागे हों
मंच से उतरे हैं छन्नू महाराज
और उनके साथ-साथ हम सब भी
बँधे किसी जोदू की डोर से
बतियाते हुए मन की आनंद लीला में मगन
कि अचानक क्लिक,
किसी ने उनके साथ मेरा फोटो खींचा है
किसने खींचा फोटो मुझे चाहिए,
मैं कहना चाहता हूँ
भीड़ में गर्दन उठाए
पर देखा तभी सब हँस रहे हैं
हँस रहा बनारस भी मस्ती में खुदर-खुदर
साथ-साथ गंगा मैया हँस रही है—
तुम्हें तो साक्षात छुन्नू मिश्र ही मिल गए
तो अब फोटो का क्या करोगे प्रकाश मनु?
देर तक उनके साथ खाना खाते बतियाता हूँ मैं
साथ में सूर्य भाई
उनकी बातें हैं कि थमती ही नहीं
और हमारी जिज्ञासाएँ अनंत
हम दुनिया के सबसे अलमस्त
गायक से रूबरू हैं
मैं और सूर्य भाई इशारे से एक-दूसरे से कहते हैं
और छुन्नू मिश्र हमसे बतियाते हुए
उसी आनंद से भोजन का रस ले रहे हैं
जिस रस के साथ गाया उन्होंने अभी-अभी
खेलें मसाने में होरी दिगंबर,
खेलें मसाने में होरी…
अब तक दिशाओं में गूँज रहे हैं उनके स्वर
दूर-दूर तलक
भीतर लहर पर लहर उठाते हुए
यह बनारस तो बड़ा अद्भुत है महाराज
इसकी हवाओं में इतनी गूँज क्यों है
क्या हर पुराने शहर मे होती है ऐसी ही पुकार
यह इतिहास की पुकार है कि संस्कृति की…?
मैं पूछना चाहता हूँ
पर इससे पहले ही
किसी बात पर ठहाका लगाकर
हँस पड़े हैं छन्नू महाराज
उनके साथ-साथ हँसता है पूरा बनारस
हँसती है गंगा मैया भी
बड़ी ही निर्मल मिठास से पगी हँसी
पुत्र, बहुत भोले हो…
यह शिव का मृदुल हास्य है
जो पूरे बनारस में व्याप रहा है—
कहीं से कोई स्वर आता है
और मैं चकित सा चारों ओर देखता हूँ
हवाओं में फिर-फिर गूँजता है स्वर,
जैसे गाते-गाते एकाएक नाच उठे हों
छुन्नू मिश्र—
खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी…!



वाह! अद्भुत, सुन्दर और मनोहर। केवल कविताएँ नहीं मन में व्यापा बनारस का रस है। धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य, संस्कृति और प्रेम की नगरी है बनारस। कहीं शिव का डमरू है तो कहीं बिस्मिल्लाह की शहनाई। बनारस है ही ऐसा हर किसी को अपनी बाहों में समेट लेता है। वहां की सुबह वहां की शाम अपने आप में अनोखी है। मुक्त कर देने वाली। गंगा मैया का तट तन-मन को उज्जवल कर देता है। हृदय में प्रेम एवं समर्पण की सात्विकता भर देता है। मनु जी ने अपने आत्मीय मित्रों सूर्यनाथ, सुरेश्वेर और बृजेन्द्र के साथ गंगा के घाट, पानी, रेती आदि के कण -कण में जिस स्नेह और अपनेपन को महसूस किया उन्हीं भाव-संवेदनों को अनूठी कलात्मकता से शब्दों में उकेरा है। छुन्नू महाराज के लिए कविता में आत्मीय प्रेम, कण-कण में व्याप्त कला और परस्पर मैत्री का अनुपम समन्वय है। पाठक, चारों मित्रों के साथ उन्हीं भावों की नाव में सवार हो जाता है। और फिर बनारस की सुबह, शाम छल छलाता जल और गीत-संगीत उसके अंदर भी तरंगित हो उठता होता है। इतना कुछ होने के बाद भी कविताओं में जोगी-सी फक्कड़ मस्ती अनूठा आनंद है।
वाह! अद्भुत, सुन्दर और मनोहर। केवल कविताएँ नहीं मन में व्यापा बनारस का रस है। धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य, संस्कृति और प्रेम की नगरी है बनारस। कहीं शिव का डमरू है तो कहीं बिस्मिल्लाह की शहनाई। बनारस है ही ऐसा हर किसी को अपनी बाहों में समेट लेता है। वहां की सुबह वहां की शाम अपने आप में अनोखी है। मुक्त कर देने वाली। गंगा मैया का तट तन-मन को उज्जवल कर देता है। हृदय में प्रेम एवं समर्पण की सात्विकता भर देता है। मनु जी ने अपने आत्मीय मित्रों सूर्यनाथ, सुरेश्वेर और बृजेन्द्र के साथ गंगा के घाट, पानी, रेती आदि के कण -कण में जिस स्नेह और अपनेपन को महसूस किया उन्हीं भाव-संवेदनों को अनूठी कलात्मकता से शब्दों में उकेरा है। छुन्नू महाराज के लिए कविता में आत्मीय प्रेम, कण-कण में व्याप्त कला और परस्पर मैत्री का अनुपम समन्वय है। पाठक, चारों मित्रों के साथ उन्हीं भावों की नाव में सवार हो जाता है। और फिर बनारस की सुबह, शाम छल छलाता जल और गीत-संगीत उसके अंदर भी तरंगित हो उठता होता है। इतना कुछ होने के बाद भी कविताओं में जोगी-सी फक्कड़ मस्ती अनूठा आनंद है।
मैं बनारस हूं, बनारस मुझमें….अद्भुत कविताएं।
छन्नू महाराज जैसे बनारस की संस्कृति की शान हैं। आपने हमें बनारस की यात्रा करवा दी।
सच में आपमें बनारस बसा है।
बनारस अपनी पूरी समग्रता में व्याप्त है इन कविताओं में।बधाई आपको इन महत्वपूर्ण कविताओं के लिए।
बनारस को केंद्र में रखकर रची गई अद्भुत कविताएँ।
गंगा की उत्ताल तरंगें, अथाह जलराशि तथा मंथर गति से बहते जाना मुग्ध कर देता है।
बनारस की कला,संस्कृति और समृद्ध अतीत को रूपाकार देती दिलोदिमाग पर छा जाने वाली रचनाएँ
बनारस में मेरी चार साल पोस्टिंग रही है।
मेरा पहला कविता संग्रह “अँधेरे से अँधेरा काटता हूँ”, वहीं से 1987 में प्रकाशित हुआ था।
इतनी उत्कृष्ट कविताओं के सृजन के लिए भूरिशः हार्दिक बधाई, मान्यवर।
हर हिंदू की आत्मा गंगा में जरूर बस्ती है जब भी हम उस जमीन से गुजरते हैं जिधर से गंगा बहती है तब हृदय अपने आप ही गंगा को छूने के लिए आतुर हो उठता है उसकी कल कल सुनने के लिए कान व्याकुल होने लगते हैं उसके तट पर जलती हुई चिताओं को देखकर हृदय से एक ही आवाज होती है मां अंत समय मेरा तुम्हारी ही गोद में हो मां के दर्शन करते ही लगता है जैसे मां का आंचल ही स्पर्श कर लिया हो मन बहुत हल्का हो जाता है।
जिसने भी बिस्मिल्लाह साहब की शहनाई के स्वर सुने हैं उन्हें बनारस के गंगा किनारे पहुंचते हीउस्ताद बिस्मिल्ला की शहनाई
के स्वरों के रिदम पर गंगा की लहरें प्रवाहित होते नजर आती हे
साक्षात् शिव ,हर हर महादेव,बम बम भोले के उच्चारण मात्र से सिहरन होती हे
आपकी कविताएं म गंगा के प्रति अगाध आत्मीय लगाव अध्यात्म में मगन तन और मन बनारस की गलियों में बांवरा सा हो जाता हे
छन्नी महाराज से भजन सुनकर होती खेले मसाने में ,,,,,,, तन
मन शिव मय हो जाता हे
आपको इन कविताओं को पढ़कर जो बनारस न गया हो वो भी एक बार मणिकर्णिका घाट में होती खेलत मसाने में ,शिव को अनुभूति जरूर महसूस करना चाहेगा
उत्तम कविताएं
इसी प्रकार बनारस पहुंचने के पहले ही आपके व्याकुलता मां गंगा से मिलने की व्याकुलता हे
आहा, आनन्दम् आनन्दम्। बनारस पर आपकी कविताएँ पढ़ कर निःशब्द हूँ। “सत् चित आनन्द” का दर्शन करा दिया आपने। आपने बनारस को क़तरा क़तरा जीया है, आपका मन बनारस के कण-कण में समाया हुआ है, गंगा मैया की लहर लहर में, बूँद बूँद में “अनन्त” की यात्रा हर पल कर रहा है। जो बनारस, जो गंगा आपकी धमनियों में बह रही है, आत्मा से आत्मा तक की अशेष यात्रा कर रही है, वही पाठक की नस नस में प्रवाहित होने लगती है।
बनारस में डूब कर वहाँ से बाहर आने की मानो इच्छा ही नहीं हो रही है। आपकी कविताएँ अद्भुत कैनवास की अप्रतिम सृष्टि कर रही हैं। इस कैनवास पर बनारस की विशेषताएँ अंकित होकर जीवन्त हो रही हैं।
मुझे याद आ रही है बनारस की वह अद्वितीय शाम जब गंगा मैया की धारा में बड़ी सी नाव पर कुछ अन्य कवि मित्रों के साथ मैंने भी बैठ कर गंगा मैया पर कविताएँ पढ़ी थीं। उस कवि सम्मेलन की शर्त यही थी कि सभी कविताएँ केवल गंगा मैया पर ही होंगी। ऐसा दिव्य अनुभव था वह, न उसके पहले कभी हुआ और न उसके बाद कभी हुआ। हमारी कविताएँ सुन सुन कर मानो गंगा मैया विभोर होकर हमें थपकियाँ देकर स्वप्नलोक में ले गई हो ; कब इसी तरह पूरी रात काव्यलहरी गंगा की लहरों पर बहती रही और कब गंगा बनारस सहित हमारी आत्मा की गहराइयों में उतरती गई…… और फिर कब भोर में सूरज की पहली किरन ने हमें उस जादू से बाहर आने को विवश किया, हमें पता ही नहीं चला।
उस दिव्यानुभूति को मेरे दिलो-दिमाग़ में पुनः जीवन्त करने के लिए आपकी इन बनारसमय पाँचों कविताओं का आभार।
प्रिय शशि जी,
अभी-अभी मेरी बनारस केंद्रित कविताओं पर लिखे गए आपके शब्द पढ़े। क्या कहूं। कुछ भी कह पाने की हालत नहीं।
बरसों पहले बनारस की यात्रा की थी। उस समय किस पागलपन, किस बेखुदी में था, क्या कहूं। आज बता नहीं सकता। उसके लंबे अरसे बाद लिखी गईं ये कविताएं। लिखते समय जैसे फिर-फिर उस जिए हुए को जी रहा था, और मां गंगा के साथ एक निर्मल कालधारा में बह रहा था, जहां अखंड समाधि लगाए महाशिव के दर्शन हो रहे थे।
आपके शब्द इतने सरल और पवित्र हैं और उनमें मन और आत्मा का ऐसा उजाला है शशि जी, कि उन्हें पढ़ते हुए आज फिर से उस पूरे अनुभव को उसी मार्मिकता से जिया, जैसा कि तब जिया था, जब ये कविताएं लिखी गई थीं।
आपके आलोकमय शब्द कविता के मर्म तक पहुंचने हैं शशि जी, इसीलिए इन कविताओं की भावना को आप इतनी गहराई से समझ सकीं।
आपने बनारस में पूरी रात गंगा में नौका विहार करते हुए जिस काव्यपाठ का जिक्र किया, वह भी ऐसा ही दिव्य, अनन्य और अविस्मरणीय।
कविताओं पर आपकी इस सुंदर टिप्पणी के लिए, मैं आपको नमन करता हूं शशि जी।
मेरा बहुत-बहुत स्नेह और साधुवाद,
प्रकाश मनु
बनारस पर केंद्रित कविताओं की श्रृंखला जो बनारस को स्थूल सूक्ष्म ,धर्म संस्कृति संस्कार ,स्मृतियों और श्रुतियों के माध्यम से पाठक को परिचित कराती है।
कविता प्रेमियों के लिए यह एक सौगात और ज्ञान वर्धन दोनों ही है यथा कुछ शब्द गैरिक, उमग निर्वाक,,,,उनके ज्ञान में निश्चित रूप से वृद्धि करेंगे।
बनारस के सुप्रसिद्ध विभूतियों का भी परिचय यथा छन्नू महाराज,उस्ताद अल्ला रखाँ खां,उस्ताद बिस्मिल्लाह खां,,बेहद नैसर्गिक रूप से मिल जाता है।
बनारस की प्रसिद्ध मसान होली या होरी का संदर्भ भी इस जगत की क्षणभंगुता और भारतीय दर्शन की ऊंचाई को प्रबुद्ध पाठकों तक पहुंचाता है।
इस श्रृंखला को यदि दो किश्तों में पाठकों को परोसा जाता तो सोने पे सुहागा वाली बात हो सकती थी।
उत्कृष्ट, भावप्रवण,,मन को छूकर आर्द्र कर देने वाली भावनात्मक अनुभूति मुझे भी यादों के भंवर में घेर रही है। क्या.है.बनारस में जहां गंगा की हर.लहर में शिव हैं,शक्ति की प्रवाहमयता है पवित्रता है जो बह रही है अथाह जलराशि से होकर आत्मा में समाहित हो रही है,अंतर्मन तक भिंगो रही हैं।
बनारस की धरती पर पैर रखते ही
बनारस मुझे घेर लेता है
चारों ओर से भुजाएँ बढ़ाता हुआ
सदियों से बिछुड़ा कोई दोस्त जैसे।ये पंक्तियां जैसे मन को उद्वेलित करती.हैं,बरसों पूर्व बिछुडे मित्र की तरह गले लगाने को आतुर, राजघाट से लेकर अस्सी घाट,हरिश्चंद्र घाट तक अर्ध चंद्राकार शृंखला इस भाव की साक्षी है। आदरणीय मनृ सर के हृदय की कोमलता और भावात्मक अनुभूति बनारस के परिवेश में घुली आत्मीयता को सहज ही पहचान लेती है। जहां शिव भी हैं और शक्ति भी,।शिव की मस्ती है तो,वैराग्य भी,चैतन्य योग है तो भोग भी।शक्ति की प्रधानता को सिद्ध करने वाली मां अन्नपूर्णा का आशीष सर्वत्र व्याप्त हो रहा है।
यह वात्सल्य भाव,यह अपनापन, यह रागात्मकता मनु सर. के हृदय को स्पर्श करती है।–
बनारस मेरे आरपार बहता है
किसी ठंडी सनसनाती हवा की तरह
अनजानी छुअन लिए
मेरे रोम-रोम में प्रकंप जगाता।
यही बनारस का रस.है जो प्रिय है,मधुर है और दिव्य भी।
इन कालजयी कविताओं में निहित संवेदना ,लगाव बनारस से कभी मुक्त नहीं होने देती।तभी तो वर्षों बाद बनारस की धरती पर पांच रखना उन्हें बांध लेता है। मै भी बनारस की बेटी हूं,वहां की माटी ने मुझे गढा है और वर्षों बाद सुदूर झारखंड की पठारी धरती से भी बनारस मुझे आकर्षित करता है,खींचता है। इन कविताओं में घुली मिली आत्मीयता, रागात्मक वैभव ,एक अनजाना आकर्षण बनारस की धरती को एक पहचान देता है।
मां गंगा की शीतल लहरों का उत्थान पतन भारतेंदु जी की याद दिलाता.है-नव उज्वल जलधार हार हीरक सी पतन,,बिच बिच छहरति बूंद मध्य मुक्तामनि पोहति।इस रचना का सौदर्य अद्भुत है ,एक एक शब्द बनारस के परिवेश, ज्ञन विराग और आध्यात्मिक विरासत को परिभाषित करता है।मैं इन रचनाओं के.सौदर्य में खो गई थी। बेहद समृद्ध और संवेदनशील भावनाओं के सहज प्रवाह में बहती हुई कलिता अंतर्मन भिंगो जाती है। अंतिम कविता में संगीत अपने विभिन्न अर्थो में आया है ,जिसे पढते हुए बरबस बिस्मिल्लाह खां की शहनाई याद आती है।जिसके.स्वर आज भी उसके वातावरण में गूंज रहे हैं,शिवता का एक अनहद नाद भी है जो अनवरत प्रतिध्वनित हो रहा है,-
संगीत बस, संगीत बरस रहा है चतुर्दिक
हवाओं में बहते संगीत की गैरिक लय-तान
विभोर करती हैं हमें
गंगा की लहरों की कल-कल, कुल-कुल की तरह
और हम चुप-चुप बह रहे हैं
किसी अनहद नाद में
जो शब्दों से परे है, अछोर
बनारस की हर सुबह पंछियों की गुन गुन,, सूर्य की किरणों में नहायी गंगाजल की लालिमा और हर हर महादेव की गूंज से भरी है। जलधारा में नहाते माथे पर चंदन का त्रिपुण्ड लगाये,,बनारस की गलियों में कचौडी जलेबी खाते बनारसी रंग में रंगे भक्तों का भी एक बनारस है जो साथ साथ चलता है। यही है सुबहे बनारस का अप्रतिम सौंदर्य। बहुत अच्छी भावप्रवण कविताएं,जितना भी लिखूं,शब्द कम पड जाते हैं। हार्दिक बधाई और अशेष अभिनंदन, प्रणाम सर। आपने मुझे वर्षों बाद अपने बनारस से निलवाया। बेहद खूबसूरत,अविस्मरणीय अनुभव आपने हम सबसे बांटा,हृदय से आभार।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर