(1)
घर से बनारस
……………………
घर से बनारस के लिए चला तो बनारस
मेरे भीतर चल रहा था
मेरे श्वास-श्वास में रुधिर में
हजारों हजार बरस पुरानी गैरिक स्मृतियों
की लीलानगरी बसाए
मैं यान की गति से दौड़ रहा था
और वह दौड़ता हुआ
मेरे पास आ रहा था
पास—और पास…
वही आकुलता जो मुझमें थी
वही उसमें थी
बनारस की धरती पर पैर रखते ही
बनारस मुझे घेर लेता है
चारों ओर से भुजाएँ बढ़ाता हुआ
सदियों से बिछुड़ा कोई दोस्त जैसे
*
(2)
बनारस-प्रवास
…………………
मैं बनारस में हूँ बनारस
मुझमें
बनारस की टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार गलियों में चलते हुए
उड़ा जा रहा हूँ मैं कहाँ से कहाँ
बनारस मेरे आरपार बहता है
किसी ठंडी सनसनाती हवा की तरह
अनजानी छुअन लिए
मेरे रोम-रोम में प्रकंप जगाता
बनारस में बहा जा रहा हूँ मैं
किसी विह्वल, आत्म-विस्मृत पगले जोगी सा
गंगा के शीतल, हर्षाकुल पानियों
में चुप-चुप खोया हुआ
सूर्यनाथ और ब्रजेंद हँसकर छेड़ते हैं
गंगा तो अभी दूर है मनु जी,
पर गंगा की कल-कल सुन रहे हैं
मेरे विह्वल प्राण,
उन्हें कैसे बताऊँ गंगा तो मेरे भीतर बह रही है
मेरे भीतर बहते बनारस की तरह
*
(3)
माँ गंगा की गोद में
………………………….
रात भर सपना
सपने में बह रहा था मैं
किसी भोले शिशु की तरह
पानियों में हाथ-पैर मारता
खिलखिलाता
माँ गंगा मुझे गोद में उठाए
बह रही थी अनंत क्षितिजों के पार
अपनी अथाह जलराशि के विशाल वैभव के साथ
बह रही थी गंगा निर्द्वंद्व
निर्वाक्
और मैं गंगापुत्र बह रहा था
बहता जा रहा था अपनी वत्सला माँ गंगा
के वक्ष से चिपका, ठिठुरा
जीवन के अनंत छोरों की तरफ
वहाँ जहाँ कहीं है मुक्ति
*
(4)
सुबहे बनारस
…………………
यह सुबहे बनारस है
संगीत के बहते हुए ताजा सुरों के साथ
गुनगुनाती हुई भोर
कुछ आत्म-विस्मृत सी
डूबी-डूबी सपने में
डूबी अपने में
बरस रहे हैं सुर
गंगा तट पर
बरस रही है सुबह बनारस में
सितारा देवी के नृत्य की ताल
और अल्ला रक्खा खाँ के तबले की थाप पर
बरस रही है सुबह
बनारस
में
हम चार हैं यहाँ गंगा घाट पर
मैं, सूर्य भाई, ब्रजेंद्र त्रिपाठी और सुरेश्वर
चार मित्र मिले जो बहुत दिनों बाद
सुबहे बनारस के रस में भीगते हुए भीतर तक
चुप-चुप निर्वाक्
संगीत बस, संगीत बरस रहा है चतुर्दिक
हवाओं में बहते संगीत की गैरिक लय-तान
विभोर करती हैं हमें
गंगा की लहरों की कल-कल, कुल-कुल की तरह
और हम चुप-चुप बह रहे हैं
किसी अनहद नाद में
जो शब्दों से परे है, अछोर
अभी कुछ अँधेरा है
पर बनारस जाग गया है नींद का लिहाफ
उतारकर
गंगा के घाट, गंगा की रेती और पानियों पर
उतर रही है सुबह
और दूर तक सुनाई देती है उस्ताद विस्मिल्लाह खाँ
की शहनाई
शहनाई के बोल
गंगा की लहरों पर काँपते हैं
हवा में लरजते हैं
और दूर क्षितिजों के पार उतरने लगते हैं
केवल बनारस नहीं
बनारस की गंगा नहीं
अखिल ब्रह्मांड सुन रहा है
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के बोल
जो गंगा घाट पर उतरते हैं
तो समय थम जाता है
और हर चीज कालातीत
शिव के शांत, मृदुल हास्य की तरह
देखिए गंगा के घाट अब कितने साफ हो गए हैं
पहले बुरा था हाल
उल्लसित सुरेश्वर का स्वर,
हाँ-हाँ-हाँ, भाई सुरेश्वर, हाँ!
मैं जवाब देता हूँ
पर कान तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
की तरफ लगे हैं
जिसके स्वर न जाने कब के हवा में बह रहे हैं
बहते रहेंगे अभी सदियों तक
गंगा के संग-संग बहती नौका में हम चारों मित्र
केवट भी
बहे जा रहे हैं आह्लादित उर
कि अचानक किसी बात पर हँसते हैं साथ-साथ
तो हँसती है गंगा मैया भी
उमगकर
असीसें देती है शीतल मन से
कि बेटे आए हैं आज बहुत दिनों बाद
जिएँ
जीते रहें खूब आनंद मनाएँ
लौटते हुए फिर आँखों में भरता हूँ मैं
गंगा का अनंत विस्तार
उसकी शीतल छुअन
उसकी असीसों पर असीसें
सिर और माथे पर उसकी उँगलियों की कँपकँपाहट
लौटते हुए फिर-फिर देखता हूँ
पीछे मुड़कर
मैं विह्वल सा
कि गंगा बह रही है
अपनी उमगती लहरों के साथ
आनंद लीला सी रचाए
एक गंगा मुझमें एक बाहर बह रही हैँ
गंगा के साथ-साथ बह रहा है पूरा बनारस भी
अनादि लय में
कि सुबह हो रही है
बनारस में सुबह।
*
(5)
छन्नू महाराज के लिए एक कविता
……………………………………………
बनारस है तो छन्नू महाराज भी हैं
छन्नू महाराज हैं तो उनकी होरी भी
कि खेलें मसाने में होरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी…
उमग रहे हैं स्वर उनके भीतर से
जैसे उमगती हैं लहरें गंगा की
शिव की जटाओं से विचित्र लास्य के साथ
वे बैठे हैं और गा रहे हैं
नहीं-नहीं, बैठे हैं और नाच रहे हैं
नाच रहे हैं उनके स्वर भी साथ-साथ—
खेलें मसाने में होरी दिगंबर,
खेलें मसाने में होरी…
चिता भस्म भर झोरी, दिगंबर खेलें मसाने में होरी…
नाच रहे हैं बोल छुन्नू मिश्र के
मसाने में नाच रहे
परम कौतुकी नटराज शिव की तरह
और हम सबके सब अवाक्
अहा, छन्नू महाराज अब छन्नू महाराज नहीं हैं
अपने स्वरों में घुलते जा रहे हैं वे हर पल
केवल देह है जो सामने है…
और स्वरों के साथ-साथ नाचती मुक्त केशराशि
वे जैसे हैं भी और नहीं भी
वे भी जैसे मसाने में होरी खेलते शिव में समा गए हैं
शिव में शिव का डमरू नाच बनकर…
और उनके साथ-साथ हम सब भी
जो मसाने में खेल रहे थे होरी
और बनारस में
बनारस की आत्मा का देख रहे थे
यह सम्मोहक लीला नृत्य
विदेह,
एकदम विदेह होकर!
गायन पूरा होते ही जैसे सब नींद से जागे हों
मंच से उतरे हैं छन्नू महाराज
और उनके साथ-साथ हम सब भी
बँधे किसी जोदू की डोर से
बतियाते हुए मन की आनंद लीला में मगन
कि अचानक क्लिक,
किसी ने उनके साथ मेरा फोटो खींचा है
किसने खींचा फोटो मुझे चाहिए,
मैं कहना चाहता हूँ
भीड़ में गर्दन उठाए
पर देखा तभी सब हँस रहे हैं
हँस रहा बनारस भी मस्ती में खुदर-खुदर
साथ-साथ गंगा मैया हँस रही है—
तुम्हें तो साक्षात छुन्नू मिश्र ही मिल गए
तो अब फोटो का क्या करोगे प्रकाश मनु?
देर तक उनके साथ खाना खाते बतियाता हूँ मैं
साथ में सूर्य भाई
उनकी बातें हैं कि थमती ही नहीं
और हमारी जिज्ञासाएँ अनंत
हम दुनिया के सबसे अलमस्त
गायक से रूबरू हैं
मैं और सूर्य भाई इशारे से एक-दूसरे से कहते हैं
और छुन्नू मिश्र हमसे बतियाते हुए
उसी आनंद से भोजन का रस ले रहे हैं
जिस रस के साथ गाया उन्होंने अभी-अभी
खेलें मसाने में होरी दिगंबर,
खेलें मसाने में होरी…
अब तक दिशाओं में गूँज रहे हैं उनके स्वर
दूर-दूर तलक
भीतर लहर पर लहर उठाते हुए
यह बनारस तो बड़ा अद्भुत है महाराज
इसकी हवाओं में इतनी गूँज क्यों है
क्या हर पुराने शहर मे होती है ऐसी ही पुकार
यह इतिहास की पुकार है कि संस्कृति की…?
मैं पूछना चाहता हूँ
पर इससे पहले ही
किसी बात पर ठहाका लगाकर
हँस पड़े हैं छन्नू महाराज
उनके साथ-साथ हँसता है पूरा बनारस
हँसती है गंगा मैया भी
बड़ी ही निर्मल मिठास से पगी हँसी
पुत्र, बहुत भोले हो…
यह शिव का मृदुल हास्य है
जो पूरे बनारस में व्याप रहा है—
कहीं से कोई स्वर आता है
और मैं चकित सा चारों ओर देखता हूँ
हवाओं में फिर-फिर गूँजता है स्वर,
जैसे गाते-गाते एकाएक नाच उठे हों
छुन्नू मिश्र—
खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी…!

 

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29,
फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327,
ईमेल – prakashmanu334@gmail.com

2 टिप्पणी

  1. वाह! अद्भुत, सुन्दर और मनोहर। केवल कविताएँ नहीं मन में व्यापा बनारस का रस है। धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य, संस्कृति और प्रेम की नगरी है बनारस। कहीं शिव का डमरू है तो कहीं बिस्मिल्लाह की शहनाई। बनारस है ही ऐसा हर किसी को अपनी बाहों में समेट लेता है। वहां की सुबह वहां की शाम अपने आप में अनोखी है। मुक्त कर देने वाली। गंगा मैया का तट तन-मन को उज्जवल कर देता है। हृदय में प्रेम एवं समर्पण की सात्विकता भर देता है। मनु जी ने अपने आत्मीय मित्रों सूर्यनाथ, सुरेश्वेर और बृजेन्द्र के साथ गंगा के घाट, पानी, रेती आदि के कण -कण में जिस स्नेह और अपनेपन को महसूस किया उन्हीं भाव-संवेदनों को अनूठी कलात्मकता से शब्दों में उकेरा है। छुन्नू महाराज के लिए कविता में आत्मीय प्रेम, कण-कण में व्याप्त कला और परस्पर मैत्री का अनुपम समन्वय है। पाठक, चारों मित्रों के साथ उन्हीं भावों की नाव में सवार हो जाता है। और फिर बनारस की सुबह, शाम छल छलाता जल और गीत-संगीत उसके अंदर भी तरंगित हो उठता होता है। इतना कुछ होने के बाद भी कविताओं में जोगी-सी फक्कड़ मस्ती अनूठा आनंद है।

  2. वाह! अद्भुत, सुन्दर और मनोहर। केवल कविताएँ नहीं मन में व्यापा बनारस का रस है। धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य, संस्कृति और प्रेम की नगरी है बनारस। कहीं शिव का डमरू है तो कहीं बिस्मिल्लाह की शहनाई। बनारस है ही ऐसा हर किसी को अपनी बाहों में समेट लेता है। वहां की सुबह वहां की शाम अपने आप में अनोखी है। मुक्त कर देने वाली। गंगा मैया का तट तन-मन को उज्जवल कर देता है। हृदय में प्रेम एवं समर्पण की सात्विकता भर देता है। मनु जी ने अपने आत्मीय मित्रों सूर्यनाथ, सुरेश्वेर और बृजेन्द्र के साथ गंगा के घाट, पानी, रेती आदि के कण -कण में जिस स्नेह और अपनेपन को महसूस किया उन्हीं भाव-संवेदनों को अनूठी कलात्मकता से शब्दों में उकेरा है। छुन्नू महाराज के लिए कविता में आत्मीय प्रेम, कण-कण में व्याप्त कला और परस्पर मैत्री का अनुपम समन्वय है। पाठक, चारों मित्रों के साथ उन्हीं भावों की नाव में सवार हो जाता है। और फिर बनारस की सुबह, शाम छल छलाता जल और गीत-संगीत उसके अंदर भी तरंगित हो उठता होता है। इतना कुछ होने के बाद भी कविताओं में जोगी-सी फक्कड़ मस्ती अनूठा आनंद है।

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