रंजन ने फिर एक बार घड़ी देखी आधे घंटे में उसने यह तीसरी बार किया है| ‘सवा पांच..’ उसने मन ही मन दोहराया| ट्रेन साढ़े आठ बजे आएगी| सुबह ट्रैफिक भी कम होगा| इस लिहाज से एकाध घंटे की झपकी और ली जा सकती है| रोज़ नींद के लिए तरसता है और आज वक्त है, तो सो नहीं पा रहा है| अजब-सा उल्लास छाया है, मीठी-सी उमंग| ‘ये अहसास बाकी है ?’ अरसा हो गया, ऐसा कुछ महसूस किए| ऐसा क्या बल्कि ‘कुछ’ भी महसूस किए| शायद इसीलिए वह सो नहीं रहा है कि इस अहसास को जी भर कर जी लेना चाहता है, मानों खुद को अपनी संवेदनाओं के जीवित होने की तसल्ली देना चाह रहा हो|
अपर्णा नींद में कुनमुनाई, उसे लगा जैसे उसके खिलदंड अहसास अपर्णा को डिस्टर्ब कर रहे हो| वह दबे पाँव बेडरूम से बाहर आ गया| फ्रेश होकर कॉफ़ी का मग लिए बालकनी में इजी चेयर पर पैर फैलाकर बैठ गया| 
हवा में खुशगवार ठंडक है, अरुणोदय की आभा क्षितिज के किनारों से आसमान पर छिटकने लगी है| वह प्रकृति के अदभुत रंग संयोजन को मंत्रमुग्ध-सा निहार रहा है| कई बार वह शूट से इसी समय लौटता है लेकिन तब तन-मन इतने थके और बोझिल होते है कि कोई दृश्य नज़रो में ठहरता ही नहीं| अचानक उसे याद आया, अम्मा नहाकर माथे पर बड़ी-सी लाल बिंदी सजाती थी, तो पूरा घर ऐसी ही लालिमा से दमकने लगता था| हां, अम्मा आ रही है| 3-4 महीने के लिए, पहली बार, इसलिए उसे सब कुछ निखरा, उजला, खुशनुमा लग रहा है|
कहते है, माँ के लिये उसकी सारी संताने समान होती है लेकिन रंजन पर अम्मा का विशेष अनुराग था या कम से कम वह तो यही समझता था| दो बेटियों और दो बेटों में सबसे छोटा था, शायद यही वजह हो| वह तो अम्मा पर एकाधिकार जैसा व्यवहार करता| इसीलिए गांव के स्कूल से मैट्रिक के बाद जब कस्बे के कॉलेज में एडमिशन की बात आई तो उसका कलेजा मुँह को आ गया| पर पिताजी का कहना था, “यहां तो अम्मा के पल्लू से बंधे रहेंगे|” पिताजी अमूमन कम ही बोलते थे जो कुछ कहते उसे आज्ञा मान लिया जाता, फिर यहां तो सीधे-सीधे आक्षेप भी था| मतलब मनाही की कोई गुंजाइश नहीं थी|
इस तरह बस स्टैंड पर अतिरेक भरे नाटकीय विदाई दृश्य के बाद बिट्टू उर्फ़ प्रियरंजन पांडे का अम्मा से बिछोह हो गया| 
ट्रेन आधा घंटा लेट है| उसे याद आया, कस्बे से बी.ए. करने के बाद हिंदी के प्राध्यापक की सलाह और बड़े भैया के जोर देने पर उसने काशी वि.वि. में पत्रकारिता के कोर्स में प्रवेश लिया| तब अम्मा उसे छोड़ने पहली बार कस्बे के रेलवे-स्टेशन तक आई थी| लड्डू, मठरी, खुरमे के साथ ढेर सारी हिदायतें| सबसे महत्वपूर्ण “हर महीने घर जरुर आ जाना| हमारा मन नहीं लगेगा, बिटवा|”
पढाई तक तो यह धर्म निभ गया पर दिल्ली में पैर रखते ही सारे दायित्व, प्रेम लगाव होम हो जाते हैं| सिर्फ एक धर्म बचता है – काम| पहले संघर्ष, फिर चैनल की 24 घंटे की नौकरी शेष रही संवेदनाओं को कोल्ड-स्टोरेज में पहुँचाने के लिए काफी है|
उसे अपर्णा पसंन्द है, यह बात उसने सबसे पहले अम्मा को ही बताई थी| अम्मा ही गई थी, उनके घर रिश्ता लेकर| बड़ी खुश थी अम्मा| “चारों बच्चों के घर बस गए| हम बुड्ढा-बुड्ढी अब तीरथ-यात्रा करेंगे|” पर अम्मा की इच्छा दिल में ही रह गई और उसी साल, हमेशा की तरह बिना कुछ कहे सुने पिताजी अकेले ही चले गए, अनंत यात्रा पर| उसने बहुत मनाया अम्मा को साथ चलने को पर अम्मा गांव छोड़ने को तैयार नहीं हुई| बड़े भैया को कस्बे के पोस्ट–ऑफिस में लग गए| भाभी पास के गाँव की ही थी, बच्चे अभी छोटे थे| सो मकान पक्का करवाकर वे गाँव आ गए, अप-डाउन करने लगे| अनुष्का हुई थी, तब अम्मा आने वाली थी| लेकिन अपर्णा चाहती थी डिलीवरी लखनऊ में हो| अम्मा बड़ी दीदी के साथ अनु को देखने गई थी और वहीँ से लौट गई| अनु अब साल भर की होने आ गई है| पिछले हफ्ते अम्मा ने खुद फ़ोन करके कहा, “तुम सबकी बहुत याद आ रही है, बिटवा| कहो तो, महीना दो-महिना तुम्हारे पास चले आए|” अँधा क्या चाहे,दो आँखे| उसने तुरंत टिकट भिजवाई, अम्मा अकेली आ रही थी, इसलिए साथ का इंतजाम किया| कल बरसो बाद खुद सब्जी लेने गया| परवल, मैथी, कटहल, छोटे बैंगन और न जाने क्या क्या| अपर्णा देखते ही भड़क गई, “माई गॉड, ये सब बनाएगा कौन? या रिपोर्टिंग छोड़ शेफ बनने का इरादा है|” वह मुस्करा दिया, “ डोंट वारी डियर| ये सब मेरी अम्मा बनाएगी| तुम बस उंगलियाँ चाटती रहोगी, समझी|
ट्रेन आने का संकेत हुआ| तभी मोबाइल घनघनाया| असाइनमेंट डेस्क से वर्मा था, “आज क्या दे रहे हो भाई?” “मीटिंग में डिस्कस करते हैं|” उसने बात ख़त्म की| वैसे आज छुट्टी लेने का मन था पर अमितेश सिक लीव पर है, मुक्ता नगर पालिका चुनाव में व्यस्त है| वशिष्ठ बॉस का खास है, स्पेशल असाइनमेंट पर बेंगलूरू गया है| बाकी उसकी बीट पर ट्रेनी हैं| नया चैनल है, ज्यादा स्टाफ अफोर्ड नहीं कर सकता| उसे ज्वाइनिंग के समय ही साफ़ कर दिया गया था, “थ पोस्ट और पैकेज आपकी काबिलियत देखकर दिया जा रहा है, वर्ना कई सीनियर आना चाह रहे हैं| याद रखें, आपसे अतिरिक्त उम्मीदें रहेंगीं|”
ये ‘अतिरिक्त उम्मीदें’ लगभग रोज ही नया रूप धरकर प्रकट हो जाती| जॉब की दिक्कतों को समझते हुए भी कई बार अपर्णा झुंझला जाती| उसने अनु की देखभाल के लिए अखबार की नौकरी स्वेच्छा से छोड़ दी थी, “गृहस्थी क्या सिर्फ मेरी जिम्मेदारी है? महिना भर हो गया है, तुम्हें ऑफ मिले| मेरे लिए न सही, अनु के लिए ही प्रिंट में ट्राई क्यों नहीं करते? सोशल साइट्स पर लोग तुम्हारा लिखा कितना पसंद करते हैं| इतनी आपा-धापी नहीं रहेगी|” 
सच तो यह है कि वह खुद भी ऊब गया है| पर क्या आसान है, इस तरह छोड़ना| प्रिंट में यह पैकेज मुश्किल है, वहां की अलग समीकरण हैं| इस साल फ्लैट बुक करने की योजना है, दो साल बाद अनु स्कूल जाने लगेगी|  
‘बिट्टू…”| इस निर्मम बेगाने शहर में यह संबोधन, उसका रोम-रोम जी उठा| अम्मा के जीवन में जैसे पतझड़ ठहर गया है| चेहरा मलीन, अधपके बाल, नीले किनारे की फीके रंग की धोती और सूना माथा..| अम्मा का  प्रशस्त लाल बिंदी से सजा माथा स्मरण हो आया| आँखों के किनारे अनायास सजल हो गए| ‘क्या कर पाया अम्मा के लिए? चलो, अब मौका मिला है|
अम्मा तो अनु और उसकी शरारतों को देखकर निहाल हो गई| थोड़ी झिझक और ना-नुकुर के बाद उसने अम्मा को प्रणाम किया| अपर्णा ने अम्मा का नहाने का पानी रखा और नाश्ते की तैयारी में जुट गई| घर से उठती ‘घरपन’ की सौंधी महक में रंजन आकंठ डूब गया| अम्मा के साथ नाश्ता कर आत्मतुष्टि से भरा दफ्तर के लिए रवाना हुआ|     
दफ्तर में पैर रखते ही रंजन ने माहौल में पसरा तनाव भांप लिया था| टी आर पी में खासी गिरावट आई थी| एडिटर्स से लेकर इंचार्ज तक सबकी क्लास लग चुकी थी| ‘अब हमारी बारी है’ उसने सोचा ‘टी आर पी मालिक के हाथ का चाबुक हो गई है| हफ्ते में एक बार फटकार दो और सब बिना दिमाग लगाए भागते रहेंगे| वही हुआ जिसका अंदेशा था, “रंजन, आखरी एक्सक्लूसिव कब दी है याद है? क्या करते रहते हो?”
“सर, परसों ही तो चली थी, आर्मी घोटाले वाली| वो मेरी बीट नहीं है, फिर भी..” रंजन ने प्रतिरोध करना चाहा|
“अरे यार, पहले तो बीट का राग न अलापा करो, तुम भी जानते हो चैनल की स्थिति और रही तुम्हारी स्टोरी तो उसमें क्या यू. एस. पी था? खाक! प्राइम न्यूज़ ने दो घंटे बाद ही स्टोरी में ब्रिगेडियर की गर्लफ्रेंड का तड़का लगाकर बाजी मार ली थी|” 
“पर सर, वो खबर गलत थी| वो गर्लफ्रेंड नहीं, सिंपल मेड थी|” 
“अब तुम मुझे जर्नलिस्म सिखाओगे? कल तक मुझे एक तड़कती-फड़कती खबर चाहिए| समझे?” एडिटर की आवाज सख्त हो आई| ‘रिपोर्टिंग में चल नहीं पाया| मालिक के तलवे चाट कर एडिटर बना हुआ है| फ्रस्ट्रेशन हम पर निकलता है|’ रंजन जलभुन गया|
दिनभर एक्सक्लूसिव की तलाश में रूटीन प्रेस-कांफ्रेंस छूटते- छूटते बची| वो तो भला हो कैमरामैन आसिफ का, जिसने एन वक्त पर फ़ोन करके याद दिलाया| 
करीब 8 बजे अपर्णा का फ़ोन आया कि अम्मा खाने के लिए इन्तजार कर रही हैं| ‘ओह, उसे पता है कि अम्मा कभी बच्चों के पहले खाती| अपर्णा को तो खैर आदत हो गई है|
मैथी की भाजी, भरवां परवल, तड़के वाली दाल, वाह| “तुमने सच ही कहा था, अम्मा के हाथों में जादू है|” अपर्णा की सहज प्रतिक्रिया थी| अम्मा ने वात्सल्य भाव से बहु को देखा|
कैसा भरा-पूरा सा महसूस हो रहा है| देर रात तक अम्मा से बतियाता रहा| अगली सुबह उठते ही एक्सक्लूसिव की तलवार सर पर लटकती दिखाई दी| सारे संपर्क टटोले, पर कहीं कुछ नहीं, जैसे पूरी दिल्ली सो गई हो|  
दफ्तर पहुँचते ही एडिटर का बुलावा आ गया, “कुछ मिला..? पता था| अब आईडिया आप दीजिए और स्टार रिपोर्टर कहलाएंगे ये| सुनो, गाजियाबाद के पास एक गांव में पुरानी हवेली का खंडहर है| मवेशी चराने वाली 10-12 साल की लड़की है, कहती है कि पिछले जन्म में वह इसकी मालकिन थी| हवेली का इतिहास और पूर्वजों के बारे में सब बताती है|”
“हाँ, इसका विडियो तो वायरल हो चुका है|” एक तो ये सोशल मीडिया ने हैरान कर रखा है| जो देखो, रिपोर्टर बन बैठा है| बेसिर-पैर का विडियो डाल दो, फिर चैनल वाले अपने 24 घंटे के अंधे कुँए को भरने फिरते रहगे, आपके आगे-पीछे|  
“सब्र तो करो, विडियो में इतना ही है| मुझे मेरे सोर्स ने बताया है कि लड़की के पास कोई खजाने का नक्शा भी है, जो हवेली में गड़े धन के बारे में है| अभी सिर्फ एक लोकल चैनल के पास लड़की की बाईट है| मसालेदार स्टोरी निकलकर आ सकती है| तुरंत निकल जाओ|”
आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में सत्यकांत तिवारी के नाटक का मंचन है| पुराना यार है, उसकी लेखनी का मुरीद| कॉलेज के समय लिखे उसके गीतों का नाटक में बखूबी प्रयोग करता है और क्रेडिट भी देता है| अपर्णा ने प्रोग्राम बना लिया था, अम्मा को भी तैयार कर लिया था| कार गाजियाबाद की दिशा में चल पड़ी| पहले उसकी आत्मा ऐसी स्टोरीज के लिए विद्रोह कर देती थी, पर अब उसने अपनी आत्मा की काउंसिलिंग करना सीख लिया है|
रंजन पहुँचते ही समझ गया कि पूरा फर्जीवाड़ा है| लड़की को लोकल चैनल ने पैसे दिए थे, स्कूप गढ़ने के लिए| बॉस को बताने को कोई फायदा नहीं था| नेशनल पर अभी खबर चली नहीं थी, स्टोरी तो करनी ही थी| लेकिन लड़की अचानक गायब हो गई| ऊपर से आदेश था कि बिना खबर के लौटना मत| रात रुकना पड़ा| अगले दिन शाम को लड़की प्रकट हुई, अपने पिता और 5 हजार की मांग के साथ| रंजन के लिए अब ये सब नया नहीं था| उसने यथासंभव संतुलित तरीके से स्टोरी कवर की और दिल्ली भागा| एडिटर खुश था, पूरे दिन खेलने लायक खबर बन गई थी और फ़ॉलो-उप की गुंजाइश सो अलग| उसने सबको बताया कि खबर उसकी थी| अमितेश भी लौट आया था| मौका देख रंजन ने तुरंत अगले दिन का ऑफ ले लिया और जल्दी काम समेट लिया|
शाम को सब बिड़ला मंदिर के लिए निकल गए| उसके बाद लाल किले पर लाइट एंड साउंड, फिर बढ़िया डिनर| अनु अब अम्मा से कितना घुलमिल गई है|     
अगले दिन वह अम्मा को रिश्तेदारों से मिलाने निकल गया| ‘टीवी वाले भैया” के नाते उनकी विशेष आवभगत से अम्मा के चेहरे पर गर्व मिश्रित ख़ुशी झलक रही थी| रात को अपर्णा ने टोक ही दिया, “ कभी हमारे लिए भी ऑफ अरेंज कर लिया करो|” अपर्णा की शिकायत गलत तो नहीं थी| दो महीनों से उसे ऑफ नहीं मिला था|
सुबह पौने सात बजे दुष्यंत का फ़ोन आया| उसने नौकरी छोड़ दी है| कॉपी राइटिंग का मास्टर है पर मिजाज जैसे गर्म तवा| कहीं टिकता नहीं| मतलब अब उससे यह ‘अतिरिक्त उम्मीद’ भी की जाएगी| इंटरव्यू में उसी ने उत्साह में बता दिया था, कि कॉपी राइटिंग का शौक है| दफ्तर पहुंचते ही लेटर हाथ में था, अगली व्यवस्था तक उसे दुष्यंत का काम भी देखना था, अपनी रिपोर्ट तो देनी ही थी| वह काम के बोझ तले दब गया| दफ्तर में दो लोगों से कहा-सुनी हो गई| रात 11.30 घर पहुंचा तो देखा अम्मा सोफे पर बैठी ऊंघ रही है| मतलब अम्मा ने अभी तक खाना नहीं खाया है| वह अचानक उबल पड़ा, “अम्मा, तुमको सबेरे बताया था न, देर हो जाएगी| फिर खाना क्यों नहीं खाया? तुम इस तरह इन्तजार करोगी तो मैं काम कैसे कर पाऊंगा, बताओ?” आवाज सुनकर अपर्णा आ गई, “मैंने बहुत कहा अम्मा से खाने के लिए..|” वह लज्जित-सी बोली| अपर्णा ने माहौल को हल्का करने की गरज से टीवी चला दिया और खाना गरम कर लाई| रातभर रंजन शर्मिदा होता रहा, ‘अम्मा बेचारी की क्या गलती? उसने कहां देखी है ऐसी नौकरियां?” 
अगले दिन खास रिपोर्टिंग नहीं थी| उसने जुटकर काम किया| चाय के लिए तक नहीं उठा| कॉपी राइटिंग के लिए एक अस्थायी नियुक्ति हो गई थी| फिर भी करते-करते 10 बजे घर पंहुचा| अपर्णा टेबल साफ कर रही थी| उसने इशारे से बताया अम्मा खा चुकी है| उसे तसल्ली हुई, चलो अम्मा ने एडजस्ट कर लिया| उसी के हिसाब से सबको एडजस्ट करना पड़ता है, चाहे अम्मा हो या अपर्णा| 
अम्मा ने गाजर का हलवा बनाया था| वह गाजर का हलवा लेकर अम्मा के कमरे में चला गया| उसे याद आया, अम्मा बिस्तर पर बैठकर खाने पर कितना नाराज होती थी| पर अम्मा इधर-उधर की बाते करती रही| कल की घटना का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं दिखा| पहले जब ज्यादा लाड़ में आता तो अम्मा की गोदी में सर रखकर लेटता| आज भी वैसा ही मन हुआ, पर अनु पहले ही अम्मा की गोदी में चढ़ी हुई थी|  
दो दिन इत्मिनान से निकले| तीसरे दिन वह शूट के निकला था कि अपर्णा का कॉल आया, अम्मा को अस्थमा का अटैक पड़ा है, वह उन्हें लेकर अस्पताल जा रही है| रंजन ने हाथ का काम निपटाया और अस्पताल भागा| पूरी शाम अम्मा के सिरहाने बैठा रहा| दफ्तर के 8-10 कॉल मिस्ड में चले गए| आधी रात को अम्मा को होश आया| अगल दिन दफ्तर जाना ही था| अनु को क्रश में छोड़कर अपर्णा अम्मा के पास आ गई| वह जानता है कि अनु को क्रश में छोड़ना अपर्णा को बिलकुल पसंद नहीं है| 
रंजन दफ्तर पहुंचा और न्यूज़ एडिटर का कॉल आया| वर्मा ने शिकायत कर दी थी| एडिटर ने उसे ऊँच-नीच समझाई और चेतावनी देकर रुखसत किया| अब किसी तरह की नरमी की गुंजाइश नहीं थी| फ़ोन पर अपर्णा और डॉक्टर के संपर्क में रहा| रात 10.30 अस्पताल पहुंचा| अम्मा अकेली थी| अनु के लिए अम्मा ने ही अपर्णा को घर भेज दिया था| अम्मा सूनी आँखों से अपरिचित माहौल और लोगो को देख रही थी| उसे देखते ही मुस्कराई| अम्मा की दशा और अपनी विवशता पर उसे रोना आ गया| देर तक अम्मा का हाथ थामे बैठा रहा|   
अगली सुबह भैया को देख उसे हैरानी हुई, लज्जित-सा भी हुआ लेकिन हिम्मत बंध गई, “भैया, आपने क्यों तकलीफ की, हम तो थे यहां|”
“हाँ, हाँ वो तो है ही| हमें ही याद आ रही थी अम्मा की, सोचा देखते चलें|”
अपर्णा ने बताया, अम्मा ने ही जिद करके फ़ोन लगवाया था भैया को| उसी दिन अम्मा की अस्पताल से छुट्टी भी हो गई| दफ्तर में हालात बदतर होते जा रहे थे| दो और मंदी की भेंट चढ़ गए| भैया ने दो दिन बाद का टिकिट करा लिया था| दूसरे दिन अखबार पढ़ते हुए भैया ने सहसा कहा, “बिट्टू, हम सोच रहे थे, एक-दो दिन और रुक जाते और अम्मा को साथ ही ले जाते| दिल्ली की ठंड इनसे सहन ना होने की| वहां के वैद्य की दवा भी अम्मा को सुहाती है| तबियत संभल जाएगी, तो फिर आ जाएगी|”
अम्मा ने भैया से कुछ कहा है या वे खुद उसकी दिनचर्या देख इस नतीजे पर पहुंचे हैं, पता नहीं| एक पल को रंजन रुआंसा सा हो आया| पर अगले ही पल उसे लगा जैसे भैया उसे इस दुविधा से मुक्त कर रहे हो| उसे आभास हुआ कि पिछले 8-10 दिनों में वह शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद थक गया है| पूरे समय अजीब अपराध-बोध से घिरा रहता है| या तो काम ठीक से नहीं होता या अम्मा के लिए वक्त नहीं| ऊपर से छंटनी की तलवार| वह सर झुका कर सुनता रहा| पीछे से क़दमों की आहट हुई| ‘क्या अम्मा थी?’    
सामान बंधा देख अनु बिफर कर रो रही है| शायद समझ गई है कि अम्मा जा रही है| अपर्णा को भी अम्मा का खूब सहारा हो गया था| दोपहर दो की ट्रेन है| दफ्तर निकलते वक्त अम्मा पास आकर बैठी| बड़े दुलार से पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “मुन्ना तो है ही| गाड़ी पर आने के लिए परेशान मत होना| तबियत की खबर हम देते रहेंगे| तुम अपना, बहू को और बिटिया का ख्याल रखो| खाना बखत पर खा लिया करो बिट्टू|” अम्मा की आँखे भीग गई| कस्बे से विदाई का दृश्य याद आ गया| न जाने क्या छिन्न-से बिखर गया| अम्मा की हथेली थामे चुप बैठा रहा|
पौने दो बजे ठीक स्टेशन पहुँच गया| अम्मा अनु को गोद में लिए अपर्णा को कुछ समझा रही थी| उसने पैर छुए| अम्मा ने हमेशा की तरह निर्मल मुस्कान के साथ आशीषों की झड़ी लगा दी| उसे लगा वः कितना स्वार्थी और छोटा हो गया है| आत्मभर्त्सना की विकट परस्थिति से भी परे| 
 गाड़ी ने सीटी दी और थोड़ी देर में पनियाती आँखों से हाथ हिलती अम्मा की छवि आँखों से ओझल हो गई| उसे लगा वह गाड़ी में तब्दील हो गया है, जो सिर्फ दौड़ रही है, तेज रफ़्तार से और लोग किनारे खड़े पेड़ों की तरह पीछे छूटते जा रहे हैं|

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