Saturday, May 18, 2024
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अनिल पुरोहित की कविताएँ

1- धीरे धीरे
इंतज़ार रहता -रोज
एक नए मोड़ का।
सुहाना, स्वप्निल, रंगीन
पर धीरे – धीरे , बहता समय –
कोई मोड़ इसमें नहीं।
कभी-कभी देखता मुड़कर पीछे
दिख रहे  मोड़ – जाने कितने
पता ही नहीं चला -इस इंतज़ार में।
सब कुछ सिखा देता – समय ,
अपनी इस धीमी चाल में
पर अनभिज्ञ प्रकृति सारी।
कब बीज से बसा यह घना जंगल
कब रेत में ढल गया यह विशाल पर्वत
कब खिलखिलाता  बचपन, रुखसती को बेकरार ।
भरी हुई संघर्षों से  – प्रकृति सारी
पर चाल समय की , भर देती सहनशक्ति
धीमी समय की धीमी चोट
सब कुछ बदल देने की अद्भुत शक्ति
भरती रही जीवन में।
सुहाना बनाता रहा समय –
वो खिलखिलाता सूरज – पार क्षितिज्ञ   के
शायद उग रहा – या डूब रहा,
पर शिकन कोई नहीं।
2- लकीर
तुम्हें लकीर के पार जाना होगा
नहीं बाँधना मन -देख लकीर
वो पेड़ – किसी लकीर से नहीं बंधा
जड़ें उसकी – लकीर से परे
वो हवा- जो तन, मन को भर रही उमंगों से
लकीर के परे बही जा रही ।
वो नदी – लहलहाती सींच रही
जमीन तुम्हारी – जीवनदायिनी
कोई लकीर से नहीं बंधी ।
कब समझोगे प्रकृति के इशारे
जीवन नहीं परिसीमित –  किसी लकीर से।
सब कुछ अवरुद्ध
घुट गए तुम
बनी अनदेखी लकीर
या फिर सुन गाथा किसी प्राचीन लकीर की।
खिलखिला उठेगा जीवन,
भर जाएगी मुस्कान
जब गिरेगी दीवार अनदेखी लकीर की ।
उठाना ही होगा पांव तुम्हें
बहना होगा पवन के संग
पार करना है नदी की तरह
उस रोशनी की और – जो नहा रही
सब कुछ – लकीर के इधर और उधर
खोलो आँखें अपनी – मत करो इन्तजार किसी का
काफिला एक – इंतजार में भटक रहा सदियों से
कोई तो पार करे – यह लकीर ।
साथ देगी यह पवन, यह पेड़
यह नदी , यह रौशनी।
अधूरा अविकसित जो अबतक
इस लकीर से टकरा रहा ।
यहां नहीं थी यह लकीर
कोई नहीं जानता – कहाँ थी
कहाँ से आई – प्राचीन से प्राचीनतम
सरकती, सर्पीली लकीर
कहीं भी नहीं – यह लकीर
किसी ने खोद दी गहरी – मन में तुम्हारे
पाट दो यह खाई।
बढ़ाओ पांव अपने -जी लो अपना जीवन ।
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