अरे ये तो वही है न, मगर…आज इतनी जल्दी? यह कंपकंपाती सर्दी का धुंध में डूबा उनींदा सा प्रभात था, जिस पर रात की छाया अभी शेष थी। सड़कों पर इक्का दुक्का वाहन और दुक्का तिक्का लोग ही दीख रहे थे । ये भी वे लोग थे, समाज की आर्थिक संरचना में जिनके हिस्से मुँह अँधेरे जागकर हमारे तन और मन की खुराक के लिए दूध, अंडे, ब्रेड, मक्खन और अख़बार जैसी चीजों का वितरण आया है।
लेकिन इसका इतनी ठण्ड में इतनी सुबह यहाँ सड़क पर होने का क्या प्रयोजन हो सकता है? मन में आया कि ड्राइवर से रिवर्स करने को कहूँ, लेकिन तब तक कैब लेफ्ट टर्न ले चुकी थी। वैसे भी इस समय पाँच बज चुके थे और मात्र तीन घंटे में मुझे फ्लाइट पकड़नी थी। सो मैंने अपनी उत्सुकता को समय की कमी का वास्ता देकर शांत करने का प्रयास किया लेकिन मन में खलबली मची रही। एयरपोर्ट के पूरे रास्ते मेरा दिल और दिमाग दोनों उसी में उलझे रहे। दरअसल छह महीने पहले ही एक अंशकालिक प्रोजेक्ट के लिए मेरी नियुक्ति मेरे ही गृहनगर में हुई थी। जब अपने रहने के लिए मैं एक छोटा सा फ्लैट या स्टूडियो ढूंढ रही थी तो एक सुखद आश्चर्य की तरह मुझे पहली मंजिल पर एक छोटा सा मगर सुंदर सा बना हुआ स्टूडियो अपार्टमेंट राज नगर की उसी कॉलोनी में मिल गया जहाँ मेरा बचपन गुजरा था। बचपन से ही मेरे घर में मेरी माँ ने हम सब भाई बहनों को एक आदत डाली थी कि हमें दिन में कम से कम एक बार (जहाँ कहीं भी रहे, वहीं) आसपास के किसी भी मंदिर में मत्था जरूर टेकना है। चूंकि माँ ने इसके लिए सुबह, नहा कर जाने, कोई पारंपरिक कपड़े पहनने या पूजा की थाली जल या आदि ले जाने की कोई भी बाध्यता नहीं रखी थी। इसीलिए उम्र के अट्ठाईसवें साल में भी मैं इस नियम को एकाध अपवाद छोड़कर निभा पा रही थी और इसके लिए मुझे हमेशा सबसे उपयुक्त समय शाम का ही मिला। स्कूल हो या कॉलेज या फिर बाद में ऑफिस जाने की भाग दौड़, सुबह का समय कभी भी इस काम के लिए उपयुक्त नहीं लगा।
बचपन में शाम को पार्क में खेलते-खेलते ही बीच में कालोनी की ही मुख्य सड़क पर बने मंदिर तक हो आने से तो प्रसाद में मिले बताशे से संतोषी बचपन की जिह्वा भी मीठी हो जाती थी। इस मिठास के लालच में तो मेरी कई सहेलियां भी साथ हो लेती थीं। उसके बाद कॉलेज के समय में भी कोचिंग क्लास जाते या आते और अब, जब से मैं जॉब कर रही हूँ, तब से ऑफिस से लौटते हुए मंदिर में माथा टेककर यथासंभव कोई सिक्का चढ़ा कर अपने घर लौट आना दिनचर्या का एक अंग बन गया। इस बीच बड़े भाई और बहन का विवाह हो गया। पिताजी की पोस्टिंग दिल्ली हो जाने के कारण ग़ाज़ियाबाद हमसे छूट ही गया।
अपना सामान आधा-अधूरा सैट कर के शाम को मंदिर के लिए निकली तो बचपन की गलियों को पार करते हुए अजनबियों के साथ कुछ जाने पहचाने लोग भी मिलते गए। कुछ को मैंने पहचाना, तो कुछ ने मुझे। जल्दी-जल्दी और संक्षेप में आज यहाँ शिफ्ट होने की सूचना देती, मैं मंदिर की और बढ़ चली। एक गृहातुरता का भाव मुझ पर हावी हो रहा था, जो मंदिर पहुँचते ही और घना हो गया। मुख्य सड़क से जाकर मिलती कालोनी की सड़क के टी पॉइंट की बगल में बना यह छोटा सा मंदिर असल में एक पुराने विशाल पीपल के वृक्ष को घेरकर बना प्रतीत होता है क्योंकि पेड़ का मुख्य तना मंदिर के अंदर और शाखाएं छत की एक साफ कटान से निकल कर मंदिर के ऊपर छतरी सी तनी हुई हैं। बमुश्किल तीन, साढ़े तीन सौ वर्ग फुट में बने मंदिर में करीब-करीब सभी प्रमुख देवताओं की मूर्तियों की सेवा में पहले दो पुजारी रहा करते थे। लेकिन अब उन बुजुर्ग पुजारियों के अतिरिक्त तीन युवा पुजारी भी एक पंक्ति में आसन लगाए बैठे थे। पुराने पुजारियों में से एक ने तो मुझे पहचान भी लिया और “कित्तनी बड़ी हो गयी बिटिया।” कहते मेरे सर पर हाथ रख दिया।
मंदिर के बाहर बने चौड़े, मगर कच्चे फुटपाथ पर कुम्हार और फूलवाले की दो पुरानी दुकानों के अलावा चाय, फल आदि की कुछ गुमटियां और ठेले बढ़ गए थे। मंदिर के ठीक सामने ट्राई साइकिल पर अपना चलता-फिरता घर बसाये विकलांग भिक्षुक हरिराम के अलावा सीढ़ियों पर प्रसाद के लिए लपकते बच्चे भी यथावत थे। यहाँ मेरा ध्यान खींचा तो हरिराम के नजदीक ही एक स्टूल पर लम्बी डंडी जुडी छतरी की छाया में बैठी एक लगभग पिचहत्तर से अस्सी वर्षीय वृद्धा ने। भिखारियों की आम दशा के विपरीत इसने बेहतर कपड़े पहने हुए थे। सलीके से बंधी छींट के प्रिंट की हलके रंग की साफ सुथरी सूती धोती, थोड़ा सा मैच करता फिटिंग का ब्लाउज, एक पुराना मगर अच्छा खासा लेडीज बैग, एक लाठी और हाथ में जुलाई की उमस से किंचित रक्षा करता छोटा सा बांस का फोल्डिंग पंखा। हाँ हाथ में एक छोटा सा तौलिया भी था, जिससे वह अपनी गर्दन से पसीना पौंछ रही थी। जब उसने मुझसे कुछ देने का आग्रह किया तो अन्य याचकों की गंवई भाषा और मांगने के दयनीय अंदाज के विपरीत उसकी साफ-सुथरी खड़ी बोली और किंचित सभ्य अंदाज से मेरी उत्सुकता चरम पर पहुँच गयी। मन तो कर रहा था कि उससे कुछ पूछूं, कुछ जानूँ, मगर शिफ्टिंग की थकावट ने इस इच्छा पर लग़ाम कस दी और मैं भिखारियों को पैसे न देने की अपनी आदत के विपरीत हरिराम के साथ उसे भी दस रूपये पकड़ा कर घर लौट आई।
घर आकर सोच ही रही थी कि बाकि बचा सामान लगाऊँ या कुछ खाने का बंदोबस्त करूँ कि मंदिर के रास्ते में मुझे पहचानने वाली पड़ोस की एक आंटी एक छोटी सी केतली में चाय और साथ में सेंडविच लेकर आ गयीं। मैं संकोच में भी थी और हैरान भी कि आज भी ऐसी सदाशयता बची है। आंटी दोनों चीज देकर यह कहकर चली गयी, “अभी रात का खाना बनाने की जल्दी है। तेरे लिए खाना लेकर आउंगी, तब खूब बातें करेंगे।” मेरे खाने के लिए मना करने पर प्यार की घुड़की देकर चली गयी कि ज्यादा बड़ी हो गयी है? तेरी मम्मी ने भी मेरी जचगी के समय मेरी बहुत मदद की थी। मुझे तो आज पहली बार मौका मिला है। चाय के साथ सेंडविच खाते हुए और फिर घर को समेटते-लगाते, मेरी आँखों के सामने वही वृद्धा घूम रही थी। रात को जब आंटी मेरा खाना लेकर आईं तो कुछ देर अपने परिवार के बारे में बताने और उनके परिवार के बारे में जानने के बाद मैंने अपनी शंका की गठरी उनके सामने खोल ही दी।
“हाँ सभी कहते हैं कि लगती तो ठीक-ठाक घर की है, फिर भीख क्यों मांगती है, राम जाने। सुबह लगभग सात, आठ बजे आकर बैठ जाती है। दोपहर डेढ़ दो बजे मंदिर बंद होने के बाद सड़क पार एक प्रॉपर्टी डीलर के ऑफिस के बाहर अहाते में सो जाती है, फिर पाँच बजे मंदिर खुलने से पहले यथावत आकर बैठ जाती है और लगभग नौ दस बजे तक बैठी रहती है। वहाँ से उठकर अपनी घर जाती है या किसी रैन- बसेरे में या कहीं और, यह सब मुझे नहीं पता। और छोड़ न तू भी! कौन है? कहाँ से आती है? इस सब से हमें क्या?”
आंटी तो बर्तन समेट कर चली गयीं, लेकिन मैं अपनी जिज्ञासा नहीं समेट पाई और उसी को लिए बिस्तर पर लेटकर मन ही मन हिसाब लगाने लगी। सुबह सात, आठ बजे से डेढ़, दो बजे तक लगभग छह घंटे से ज्यादा और फिर पाँच से दस बजे तक पाँच घंटे यानि एक दिन में कम से कम ग्यारह घंटे एक स्टूल पर बिना किसी टेक के एक ही स्थिति में बैठे रहना, वह भी इस वृद्धावस्था में। हमें अभी युवावस्था में आठ नौ घंटे कम्प्यूटर के सामने बैठना पड़ जाये तो कमर दुखने लगती है।
मंदिर के मुख्य सड़क पर होने के कारण ऑफिस, बाजार या शाम को नियमानुसार कहीं भी आते-जाते मेरी नजर उस वृद्धा पर पड़ ही जाती। उसे लगातार एक ही अवस्था में बैठे देखकर उसके कमर के कल्पित दर्द को अनुभव कर मेरा मन द्रवित हो उठता। मन होता उससे बात करूँ मगर घर से दूर जॉब और घर दोनों को अकेले संभालने की जद्दोजहद इतना वक्त ही नहीं दे रही थी। फिर मैं स्वयं ही सोचती, देश भर में न जाने कितनी वृद्धाएं होंगी जो इससे भी बुरा जीवन बिताती होंगी, फिर मैं इसके बारे में क्यों इतना सोचती हूँ। लेकिन मेरे दिमाग से यह हटती ही नहीं थी। आखिर एक दिन मैं मंदिर से निकलते हुए उससे पूछ ही बैठी, अम्मा, तुम्हारा घर-परिवार है क्या?
“हाँ, सब है।” उसने बिलकुल बेपरवाही से जवाब दिया।
“फिर आप इस तरह सारा दिन…?”
“किस तरह?”
प्रश्न के उत्तर में इस प्रतिप्रश्न की उम्मीद नहीं थी मुझे। सो एक बार तो कुछ समझ नहीं आया, क्या जवाब दूँ, फिर कुछ सम्भल कर बोली, “आप पूरा दिन इस स्टूल पर बैठी रहती हैं?”
“तो क्या गन्दी जमीन पर बैठूं?”
ये समझ नहीं रही, मैं क्या पूछ रही हूँ, या जान बूझ कर अनजान बन रही है, उसके प्रश्नों पर कुढ़ते हुए भी मैंने अपना जासूसी मिशन नहीं छोड़ा “मतलब तुम थकती नहीं?”
“तुम नौकरी करती हो?” उफ़! फिर एक प्रश्न! मगर संयत होकर जवाब दिया, “हां करती हूँ।”
“तो वहाँ जाकर थकती हो या नहीं”?
“अरे वो तो मेरा काम है…।”- मैंने झुंझलाकर कर जवाब दिया।
“बस ऐसे ही यो मेरा काम है। अब काम है तो है। थकें तो थकें, काम थोड़े रुकता है।”
‘तो इन तिलों से तेल नहीं निकलेगा, मेरी बला से भाड़ में जाये बुढ़िया..।’
(गुस्से में अच्छे से अच्छा सभ्य व्यक्ति असभ्य हो जाता है।) मैं उसके बारे में जानने की असफलता पर भुनभुनाती घर लौट आई। इसके बाद उसके बारे में सोचना या कहूँ तो दया करना कम होते-होते बंद ही हो गया। हाँ मंदिर से निकलकर मैं कभी-कभी हरिराम के साथ उसे भी पॉँच रूपये पकड़ा देती। छोटा होते हुए भी मुख्य सड़क पर होने तथा आसपास घनी बसावट के कारण मैंने मंदिर को हर समय भक्तों से गुलज़ार पाया। इसीलिए यह तो निश्चित था कि वृद्धा समेत सभी याचकों के पास रात होते-होते अच्छी खासी रकम जुट जाती होगी।
उस दिन मेरा जन्मदिन था। हमारे घर में शुरू से ही किसी भी सदस्य के जन्मदिन पर सुबह उसके हाथों किसी अनाथाश्रम या अन्य आश्रय-गृह के संवासियों को भोजन आदि कराने की परम्परा रही है। लेकिन उस दिन सुबह न तो मेरे पास इतना समय था, न ही अकेले किसी आश्रम में जाकर भोजन कराने का मन था, सो माँ के सुझाव अनुसार मैं ऑफिस से लौटते हुए कुछ समोसे और दोने लेकर मंदिर पहुँच गयी ताकि नियमित दर्शन और भोज्य पदार्थ का वितरण दोनों अभिप्राय एक साथ सिद्ध हो जाएँ। मंदिर में पुजारियों और सीढ़ियों पर बैठे याचको को समोसे देने के बाद मैंने देखा कि वह वृद्धा वहाँ नहीं थी। हरिराम को समोसा देते हुए मैंने यूँही पूछ लिया कि वो नहीं आई आज?
“आई है, सुबह से बुखार था। दोपहर को सामने सोने गयी थी तो लौटकर आयी नहीं।”
‘बुखार में भी आ गयी थी? यह सोचते मैं समोसे बाँटती रही, लेकिन जब आखिरी दो समोसे बचे और लेने वाले ख़त्म हो गए तो मेरे पाँव स्वतः ही सड़क पार करने लगे।
प्रॉपर्टी डीलर के अहाते में वृद्धा अर्ध बेहोशी की हालत में फर्श पर एक चादर पर लेटी हुई थी। मैंने पास जाकर उसका माथा छुआ जो ज्वर से दहक रहा था। तभी डीलर का नौकर जवाहर ऑफिस से पानी लेकर निकला और उसके पल्लू के एक सिरे को भिगोकर उसके माथे पर रख दिया। मैंने उससे पूछा, “इनकी ये हालत कब से है? क्या कोई दवाई आदि दी है?”
“आज सुबह जब आई थी तभी बुखार था। कुम्हार ने इससे कहा भी था कि घर वापस चली जा। बोली, घर का तो ताला बंद होगा। वहाँ कौन देखेगा मुझे? यहाँ तो तुम सब हो। चाय वाले ने इसे चाय और दो बिस्कुट खिला दिए थे और कुम्हार ने क्रोसिन लाकर दे दी थी। एक खा ली थी बाकि इसके पल्ले में बंधी थी, उसमें से एक अभी थोड़ी देर पहले खिलाई है।”
“बस दो बिस्किट ही खाये हैं सुबह से? खाली पेट तो दवाई नुकसान कर जाएगी।” मुझे अब उसकी फ़िक्र हो आई थी।
“मैंने दोपहर को चाय में भिगोकर एक (ब्रैड) पीस जबरदस्ती खिलाया था।”
मैंने वृद्धा को हिलाया तो वह बेहोशी में बड़बड़ाने लगी, “रू… ना ना ना, रूठे…,…छूटे” अस्फुट से उसके स्वर कुछ ऐसा ही आभास दे रहे थे। मेरी प्रश्नवाचक नजरों को भांपकर जवाहर बोला, “गहरी नींद में भी अक्सर यही बड़बड़ाती है।“
अब तक पल्लू का सिरा उसके माथे की गर्मी से गर्म हो चुका था। उसे हटाकर अपना रुमाल भिगो कर उसके माथे पर रखते हुए मैंने पूछा, “सुना है, ये रोज दोपहर में यहाँ आकर सोती है, तुम्हें तो इसके बारे में कुछ न कुछ अवश्य पता होगा। कौन है, कहाँ से आती है?”
थोड़ी सी हिचक के बाद जवाहर ने उसके बारे में बताना शुरू किया।
“ये बिमला है, इसके आदमी की पसौंडा, साहिबाबाद में एक छोटी सी परचून की दुकान थी। अच्छी खासी गुजर हो जाती थी। बेटा तुराब नगर में एक कपड़े की दुकान पर नौकरी करता है। बाप बीमार हुआ तो बेटे ने जबरदस्ती दुकान बिकवा कर एक घर खरीद लिया। आदमी के मरने के बाद बेटे और बहु का व्यवहार इसके प्रति ख़राब होता जा रहा था। बहु सुबह बेटे के दुकान और पोतों के कालेज जाने के बाद इसे चाय के साथ दो (ब्रेड) पीस पकड़ाकर अपना खाना बांधकर रसोई को ताला लगाकर आस पड़ोस में गप्पे मरने निकल जाती थी। ये बेचारी भूख से बेहाल होकर पोतों के आने का इंतज़ार करती। आए दिन के झगड़ों से परेशान एक दिन इस बेचारी की मति मारी गयी, जो गुस्से में घर से निकल गयी। एक रिक्शा वाले से बोली, मुझे रईस नगर ले चल। वहाँ इसके भाई का परिवार रहता है, हालाँकि भाई के मरने के बाद उसके परिवार से कोई नाता नहीं रहा फिर भी इसने सोचा, जिस भतीजे को गोद खिलाया है, शायद वह कुछ तरस खाये। मगर जब अपनी कुख जाये को तरस नहीं आया तो मैडम तुम्हीं बताओं, भतीजा क्या कोई ऊपर से आया है। उसने तो इसे पहचानने से भी इंकार कर दिया। खूब रोई, गिड़गिड़ाई, फिर वहाँ से चल दी बेचारी। दो घंटे तक भटकने के बाद थककर इस मंदिर की सीढ़ियों पर पसर गयी। भूख से बैचेन होकर इसने मंदिर से निकलती एक महिला के सामने प्रसाद के लिए हाथ फैला दिए। इस बदहवासी की हालत में कुछ श्रद्धालुओं ने इसे भिखारी समझ इसके सामने रूपये और सिक्के डाल दिए।”
जवाहर और मैं बारी-बारी माथे पर बिमला के माथे पर गीला कपड़ा बदल रहे थे। जवाहर अंदर से एक और ठंडी बोतल ले आया और आगे बताने लगा।
‘बस मैडम, इसके खोटे भाग! उसी समय इसका बेटा इसे ढूँढ़ते हुए यहाँ पहुँचा था। ये सीन देखा तो मक्कार के मन में खुराफात आ गयी।
अगले दिन काम पर जाते हुए इस अभागन को दो रोटी साथ में बांध स्कूटी पर बैठाकर यहाँ छोड़ गया। बेचारी रोई गिड़गिड़ाई, इज्जत की दुहाई दी मगर उस नीच ने एक न सुनी। ऊपर से जाते-जाते धमका गया, “जो पैसे न आए तो घर नहीं ले जाऊँगा। सारा दिन मजे से परशाद खाइयो। रात को काम से लौटते हुए ले जाऊँगा।”
बस्स्स, चार साल हो गए। वो दिन और ये दिन है, चाहे जेठ तपे, सावन बरसे या पूस ठिठरे और चाहे बीमार-सीमार हो, सुबह काम पर जाते छोड़ जाता है और आते हुए ले जाता है। पंडित जी ने सीढ़ियों पर बैठने से मना कर दिया तो ये स्टूल आ गया। एक दो बार धूप से चक्कर खा बेहोश हो गयी तो काली छतरी में डंडी बांधकर दे दी। कुछ दिनों बाद वो दो सूखी रोटी भी देनी बंद कर दी।”
“हे भगवान, उसे अपनी इज्जत का भी ख्याल नहीं, लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे?”
“मैडम! बारह तेरह किलोमीटर पर है घर। कहता है, “यहाँ कौन जानता है हमें?” और अगर कभी किसी पहचान वाले ने देख भी लिया तो उसे कह देगा, “बुढ़ापे में पगला गयी है अम्मा।”
लगातार ठन्डे पानी का असर था या क्रोसिन की दूसरी गोली का, बुखार कम हो रहा था जिसकी वजह से बिमला को होश भी आ रहा था। होश में आते देख जवाहर ने पानी की बोतल उसके मुंह से लगा दी। एक घूंट पानी गटकते ही जो सबसे पहली बात क्षीण स्वर में बिमला के मुँह से निकली, वह थी- “अरे करमजले, सब कुछ बता दिया बिटिया को भी। ढिंढोरा पीट दे मेरे घर की बातों का।”
“किस-किस से, कब तक छिपाएगी अपने बेटे की काली करतूत अम्मा! उसे जो करने में शर्म नहीं आती वो तुझे बताने में आती है। पापी ने अपनी माँ को भिखारन बना दिया, कीड़े पड़ेंगे उसके!”
“अरे बस कर, नौ महीने कोख में रखा है, उसको मेरे ही सामने बद्दुआ दे रहा है नासपीटे।”
“देखा मैडम! रस्सी जल गयी मगर बल नहीं गया इस बुढ़िया का! हम सब इसका ख्याल रख रहे हैं, कोई दवाई देता है, कोई खाना तो कोई चाय पिलाता है और उस कपूत के लिए ये हमीं को गलियां देती है।”
बिमला अपना कांपता हाथ जवाहर के गाल से छुआ कर बोली, “अरे तुम सबको गालियाँ देकर क्या नरक में जाना है मुझे? मगर कैसा भी है, है तो मेरा जाया ही। रात का आसरा दे रखा है, ये क्या कम है। दिन तो किसी तरह बीत ही जाता है। बिटिया ये मुझे अभागन कह रहा था। अरे मेरे पास तो दो परिवार हैं एक रात का, एक दिन का।” कहते हुए बिमला की आँखों से आँसू ढुलक पड़े।
“मगर अम्मा, सब कहते हैं, तुम्हें सुबह शाम खूब दान मिलता है, फिर खाने पीने के लिए तुम उन लोगों की मोहताज़ क्यों हो?”
“वो जल्लाद हैं ना, इसकी सारी कमाई बटोरने के लिए। जिस रात पैसे कम लगते हैं, उसकी अगली सुबह इसे नाश्ता भी नहीं देता कम्बख्त।”
जवाहर मानो अपना गालियों का स्टॉक बिमला के बेटे पर खत्म करने पर तुला था।
और बिमला लगातार उसकी गालियों को अपनी ममता की ढाल से निरस्त कर रही थी। नाश्ता न देने की बात पर तो उसका स्वर अपनी बीमारी को भूल कर थोड़ा तीखा हो गया, “अरे तुझसे किसने कहा कि वो मुझे नाश्ता नहीं देता। बिटिया बात ये है कि बड़े-बड़े दानी आते हैं मंदिर में और तरह तरह की खाने पीने की चीजे बाँट जाते हैं। अब इस उम्र में इतना ज्यादा खाना, खास तौर से मीठा क्या मुझे हजम होता है? इसलिए इस मरे से मैंने एक दो बार कह दिया कि मैं नाश्ता नहीं कर के आयी और इसने अपने मन से इस बात का क्या से क्या बना दिया। इसे तो मौका चाहिए मेरे बेटे को बुरा-भला कहने का…।”
“झूठी! अगर मेरी बात गलत है तो अपने पैसे क्यों नहीं खर्च करती?”
“बात यह है बिटिया! अब जब मैं कमाती हूँ, तो मेरे पोते कोई न कोई फरमाइश कर देते हैं। एक को साइकिल दिलाई तो दूसरे ने मोबाईल के लिए मुँह फाड़ दिया। फिर तीज त्यौहार पर बहु को कुछ गहना कपड़ा मैं ही न दूँ तो क्या मेरे पड़ौसी देंगे।”
“इस बुढ़िया की इसी दरियादिली की वजह से उन सबका लालच सुरसा के मुँह सा बढ़ता जा रहा है। हर दो तीन महीने में इसके सामने एक जरुरत का गोल सेट कर देते है और यह लग जाती है उसके लिए पैसे बचाने में।” आक्रोश के कारण जवाहर अब अम्मा के स्थान पर पूरी तरह बुढ़िया शब्द पर ही उतर आया था। लेकिन बिमला इससे बेपरवाह मेरे टोकरी से समोसा निकाल कर खाने में व्यस्त हो गयी। मुझे काफी देर हो गयी थी सो उसे पहले से कुछ स्वस्थ पाकर मैं चलने को उद्यत हुई, तो बिमला ने यकायक मेरा हाथ पकड़ लिया।
“बिटिया तू उस दिन पूछ रही थी न, मेरी कमर नहीं दुखती। उस वक्त तो मैं टाल गयी थी, मगर अब जब इस मुये ने सब कुछ उगल ही दिया है तो अब ये बात क्या छिपाऊं? हाँ दुखती है, बहुत दुखती है इसलिए रोज सुबह शाम एक-एक गोली दर्द की गटक लेती हूँ या ये कहो एक गोली के साथ सारे दुःख दर्द निगल लेती हूँ।”
“लेकिन अम्मा इस तरह तो तुम्हारे गुर्दे ख़राब हो जायेंगे।”
“अब उम्र ही कितनी बची है बिटिया कि गुर्दे फुरदे की चिंता करूँ?”
मैं निरुत्तर थी। भारी मन और कई प्रश्नों के उत्तर लेकर मैं घर लौट आई। लेकिन उस दिन के बाद मैंने शीला को पैसों के बदले फल और मेवा समेत पौष्टिक भोज्य पदार्थ देने आरम्भ कर दिए। सर्दियाँ शुरू होने पर अपना एक पुराना शाल और एक स्वेटर दे दिया।
एयरपोर्ट आ गया था सो मैं स्वयं को बिमला की कहानी से निकाल कर अपने वर्तमान में ले आई। बंगलौर में कांफ्रेंस के तीन दिन इतने व्यस्त थे कि बिमला का रत्ती सा ख्याल भी मेरे पास नहीं फटका। एक सफल लेकिन थकाऊ कांफ्रेंस से वापस आकर मैं जम कर सोई। दो दिन तक मैं मंदिर भी नहीं गयी।
तीसरे दिन मंगलवार था शाम को जब प्रसाद लेकर मंदिर पहुँची तो बिमला कुछ ज्यादा ही थकी और बीमार सी नजर आई। तभी मुझे उस दिन सुबह मुँह अँधेरे का दृश्य याद आ गया। मैंने प्रसाद देते हुए बिमला से पूछ लिया, उस दिन तुम इतनी सुबह क्यों आकर बैठ गयी थी, वो भी इतनी कड़कड़ाती सर्दी में? बिमला ने कोई जवाब नहीं दिया। बस शाल को आपने गिर्द कुछ और कस लिया, लेकिन उसकी पीली पड़ी आँखें बहुत कुछ कह रही थीं।
मेरे दुबारा पूछने पर हरिराम बोल उठा, “मैडम आपने किस दिन देखा? इसे तो मुँह-अँधेरे आते हुए पंद्रह बीस दिन हो गए।“
‘इतनी सर्दी में इतनी सुबह, अम्मा जान देनी है क्या, लालच की भी कोई हद होती है या नहीं?” मैं लगभग चिल्ला पड़ी। मुझे जाने क्यों इतना गुस्सा आ गया था। मगर बिमला अब भी चुप थी, बस उसकी पीली आँखे पनियाली हो आयीं। हरिराम कुछ बोलने लगा तो बिमला ने झिड़क दिया, “तू क्यों चौधरी बन रहा है? मेरे घर की बात, मैं जानूँ।”
“वाह री, बड़ी आयी मेरे घर वाली! जब बीमारी से लंबलेट होती है, तब तो तेरा घर नहीं आता यहाँ। वहाँ से कोई तेरी हालत जानने भी कभी आया है? अरे इसके घर से कोई इसकी कटी ऊँगली पे भी न मूतने आये, हुँह! बड़ी आई मेरा घर!” कुम्हार ने मुँह बिचका कर कहा, जो मुझे बिमला पर चिल्लाते देखकर वहाँ लपक आया था। चाय वाला अपनी गुमटी से ही चिल्ला कर बोला, “अरे भइया, ये मत कह क़ि इसका परिवार कुछ नहीं देता। इसके शरवण जैसे बेटे ने दिया तो है- स्टूल, छतरी और…
“दर्द की गोली।” कुम्हार ने वाक्य पूरा कर दिया।
हरिराम जोश में आये कुम्हार और चाय वाले को शांत करते हुए बोला, मैडम मैं बताता हूँ क्या बात है। इसके बड़े पोते ने मोटर साइकिल की फरमाइश रख दी है और इसके लिए सिर्फ तीन महीने का टैम दिया है कमी..ने ने। इसलिए अब इसका पोता सुबह-सुबह बाप की स्कूटी से यहाँ फेंक कर चला जाता है। इतनी सुबह क्या नहाती होगी क्या खाती होगी। यहाँ कुछ भक्त प्रसाद क्या दे देते हैं, कमीने ये समझते है यहाँ जेवनार लगी है।” आक्रोश से हरिराम का चेहरा भी तांबई हो रहा था।
” हे भगवान्! अम्मा उसने कह दिया और तू लग गयी उसकी ये नाजायज मांग पूरी करने में। हैरानी तो तेरे बेटे पर होती है, कैसा जल्लाद है? नहीं तो बच्चों को समझाये। मोटर साइकिल खरीदने के पैसे कमाएगी अब ये?” इतने जोर से बोल रही थी मैं कि आसपास के लोग मुझे देखने लगे और मैं झेंप गयी।
“आप ही समझाओ इसे मैडम, इस उम्र में ये कैसे इतनी देर बैठेगी।” अब तक चाय वाला भी जुट आया था। “कैसे बैठूंगी? एक आध गोली ज्यादा खा लिया करुँगी और क्या।”
“नहीं खायेगी ज्यादा गोली! ज्यादा क्या बिलकुल नहीं खायेगी। सुन ले कान खोलकर।बस्स्स! अति हो गयी अत्याचार की अब तो।” मैं अब तक कुछ सोच चुकी थी उसके लिए, “अम्मा तू बारह महीने तीन सौ पैसठ दिन सुबह से रात तक यहाँ रहती है, रात गुजारने ही उस घर नाम की नर्क में जाती हैं न? सो तेरे लिए रात गुजारने का इंतज़ाम यहीं आसपास कर देंगे। फिर जब चाहे जितनी देर चाहे यहाँ बैठियो। जब तक चाहे आराम करियो। दोपहर में भी वहाँ सर्दी गर्मी में नहीं पड़ा रहना पड़ेगा। अपने ठिकाने पे जा के आराम करियो। समझी? “
“अरे बिटिया, मगर मेरे…।”
“अब ये मत कहियो कि तुझे उन जल्लादों की शक्ल देखे बिना चैन नहीं पड़ेगा।” लगभग घुड़क दिया मैंने। आसपास वाले देख रहे हैं, ये भी अब मैं नहीं सोच रही थी। जो मुझे जानते हैं कि मेरी भिखारियों के लिए कोई खास संवेदना नहीं रही है, वे मुझे देखते इस वक्त तो उन्हें हैरानी हो सकती थी। हैरान मैं खुद भी थी कि मेरा इतना काम पड़ा है। कांफ्रेंस से संबधित जाने कितने इमेल्स पड़े होंगे। उनके जवाब भी देने थे। इस बीच कई फोन कॉल्स भी काट चुकी थी मैं, लेकिन क्या मेरे मन ने बिमला को भिखारन माना था?
“सामने डीलर है न? उन्हें कहती हूँ, हजार दो हजार में आसपास ही कोई कमरा या खोली दिला देंगे तुझे। अपने गुजारे लायक तो तू दो चार घंटे बैठकर भी कमा लेगी।” ‘कमा लेगी‘ शब्द को मैंने व्यंगात्मक लहजे में जोर देकर बोला। बिमला समझी या नहीं, पता नहीं, मगर बाकि सब हँसने और ताली बजाने लगे। “ये तो बहुत बढ़िया सुझाई आपने मैडम!” जाने किसने कहा उस परिवार में से, ( हाँ परिवार ही तो है यह, अनोखा परिवार) मैंने नहीं ध्यान दिया, क्योंकि मैं मुड़ कर सड़क पार करने लगी थी।
पूरी कहानी किश्तों में पढ़ पाए शोभना जी। बहुत सामयिक कहानी है। आजकल ऐसा बहुत सुनाई और दिखाई भी दे रहा है, बस प्रसंग और संदर्भ अलग-अलग हैं।
कहानी सच्ची लगी।
शीर्षक शुरुआत में अजीब लगा लेकिन पूरी कहानी पढ़ने के बाद सार्थक ही लगा।
आजकल इंसानों के लिये रिश्तों के तो कोई मायने ही नहीं रह गए। सिर्फ पैसा ही सब कुछ है।
और माँ? जिसका वजूद ही नहीं उसका स्वाभिमान भी मर जाता है।लेकिन माँ का दिल फिर भी अपने बेटे और बच्चों में रहता है।
लेकिन कोई तो हद होनी चाहिये!!!!!!
इस कहानी को पढ़ते हुए एक बहुत पुरानी कहानी याद आ गई-
जिसमें प्रेमिका अपने प्रेमी से उसकी माँ के दिल की माँग करती है। और वह प्रेमिका के लिये अपनी माँ को मार देता है। जब दिल ले जाने लगता है तो राह में ठोकर लगती है और उस दिल से आवाज आती है -“बेटा!चोट तो नहीं लगी?”
प्रेमिका यह कहकर छोड़ देती है कि जब तुम अपने माँ के नहीं हुए तो मेरे क्या होगे?”
कहानी तो फिर कहानी ही थी लेकिन आजकल सच में भी ऐसा हो रहा है। सुबह से शाम तक स्टूल में बैठे रहना ,भीख माँगना और बच्चों का पैसे ले जाना!और माँ को भीख माँगने के लिये छोड़ देना कहाँ तक जायज है ?स्वार्थ की हद है!!
अगर यह विकास है ? , सभ्यता है? वर्तमान है?तो भविष्य बहुत बुरा है; इसमें कोई दो मत नहीं!
आपकी यह कहानी सोचने पर मजबूर करती है। पर एक दिशा भी दिखाती है।
कहानी ने बाँध कर रखा। प्रारंभ की जिज्ञासा अंत तक साथ नहीं छोड़ पाई।
बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई शोभना जी!